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महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्याएँ।थोड़ी देर में चाँद निकला और हम फिर बाहर निकले…. इस बार सब शांत था। जैसे हिम सो रहा हो। मैं थोड़ा अलग आरामकुर्सी खींचकर बैठ गया। यह मेरा मन इतना कल्पनाहीन क्यों हो गया है? इसी हिमालय को देखकर किसने-किसने क्या-क्या नहीं लिखा और यह मेरा मन है कि एक कविता तो दूर, एक पंक्ति, हाय, एक शब्द भी तो नहीं जानता। पर कुछ नहीं, यह सब कितना छोटा लग रहा है इस हिमसम्राट के समक्ष। पर धीरे-धीरे लगा कि मन के अंदर भी बादल थे जो छुट रहे हैं। कुछ ऐसा उभर रहा है जो इन शिखरों की ही प्रकृति का है…. कुछ ऐसा जो इसी ऊँचाई पर उठने की चेष्टा कर रहा है ताकि इनसे इन्हीं के स्तर पर मिल सके। लगा, यह हिमालय बड़े भाई की तरह ऊपर चढ़ गया है, और मुझे-छोटे भाई को-नीचे खड़ा हुआ, कुंठित और लज्जित देखकर थोड़ा उत्साहित भी कर रहा है, स्नेह भरी चुनौती भी दे रहा है-हिम्मत है? ऊँचे उठोगे? |
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Answer» कठिन शब्दार्थ- हिम= बर्फ का शासक। बादल छंटना = अवरोध दूर होना। उभरना = ऊपर निकलना, प्रकट होना। प्रकृति = स्वभाव। चेष्टा = प्रयत्न। ताकि = जिससे। स्तर = तल, समानता। कुंठित = उत्साहहीन। सन्दर्भ एवं प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक यात्रावृत्तान्त से उद्धृत है। इसके लेखक धर्मवीर भारती हैं। सूर्यास्त होने पर लेखक और अन्य सभी डाकबंगले के बरामदे से उठे और चाय आदि पीने में लग गए। अँधेरा होने के कारण बाहर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। पर्वत के शिखर भी अँधेरे में डूबे हुए थे। व्याख्या- लेखक कहता है कि थोड़ी देर के पश्चात् आकाश में चन्द्रमा उदय हुआ। उसकी चाँदनी फैल गई तो सभी लोग पुनः बाहर आ गए। इस समय सब जगह शांति फैली हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे बर्फ को भी नींद आ गई थी। लेखक ने आरामकुर्सी उठाई और कुछ दूर हटकर बैठ गया। वह सोचने लगा कि हिमालय के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर भी उसके मन में भाव क्यों नहीं उठ नहीं रहे हैं? वह कल्पना-शून्य क्यों हो गया था। इसी हिमालय को देखकर अनेक कवियों ने अनेक कविताएँ लिखी हैं। किन्तु लेखक का मन कविता की एक लाइन तो क्या एक शब्द भी लिखने में असमर्थ था। लेखक विचार कर रहा था कि कविता न लिख पाना बड़े महत्त्व की बात नहीं थी। हिमालय की विशालता के सामने सब कुछ छोटा प्रतीत हो रहा था। धीरे-धीरे लेखक का मन विचार-शून्यता से मुक्त होने लगा। हिमालय की ऊँची पर्वत-श्रेणियों के स्वभाव के अनुरूप ही उसके मन में कुछ भव्य भाव उत्पन्न हो रहे थे। इन भावों में कुछ ऐसा था जो उसको हिम-शिखरों की ऊँचाई तक उठाने का प्रयत्न कर रहा था। जिससे वह उन शिखरों के साथ समानता के भाव के साथ मिल सके। लेखक को ऐसा लग रहा था कि हिमालय बड़ा भाई है। वह ऊपर चढ़ गया है। वह अपने छोटे भाई लेखक को नीचे, उत्साहहीन तथा लज्जित खड़े देखकर उसका उत्साह बढ़ा रहा है। वह प्रेमपूर्वक उसको ललकार रहा है कि क्या वह भी ऊँचा और श्रेष्ठ बन सकता है। विशेष- |
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| 22402. |
वहीं मन रमता है-लेखक का मन कहाँ रमता है और क्यों? क्या आप भी लेखक के समान सोचते हैं? |
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Answer» लेखक का मन हिमालय की ऊँची, श्वेत, पवित्र और बर्फ से ढकी हुई चोटियों में ही रमता है। ये चोटियाँ उच्च मानवीय गुणों तथा मनोभावों की सूचक हैं। संसार की क्षुद्र बातों में पड़कर अपना जीवन नष्ट करना लेखक को उचित नहीं लगता। वह मानव जीवन के पवित्र और उच्च लक्ष्य-श्रेष्ठ मानवीय गुणों-के साथ ही अपना जीवन बिताना चाहता है। मैं भी सोचता हूँ कि मनुष्य को छोटी-छोटी अर्थहीन बातों में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। उसको उच्च मानवीय आदर्शों के लिए स्वयं को अर्पित कर देना चाहिए। |
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| 22403. |
लेखक ने तुलसी की पंक्ति ‘कबहुँक हों यहि रहनि रहौंगो’ का उल्लेख क्या भाव व्यक्त करने के लिए किया है? |
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Answer» लेखक ने तुलसीदास की विनयपत्रिका के एक पद की पंक्ति कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो’ का उल्लेख किया है। तुलसी सांसारिक माया-मोह की लघुता से ऊपर उठकर हिमालय के समान उच्च संत-स्वभाव को धारण करना चाहते हैं। लेखक ने इस पंक्ति को उल्लेख करके हिमालय को उच्च मानवीय भावों की ओर बढ़ने का प्रेरणास्रोत बताया है। |
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महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्याएँ।पर उस एक क्षण के हिम दर्शन ने हममें जाने क्या भर दिया था। सारी खिन्नता, निराशा, थकावट सब छुमन्तर हो गई। हम सब आकुल हो उठे। अभी ये बादल छंट जायेंगे और फिर हिमालय हमारे सामने खड़ा होगा-निरावृत्त… असीम सौंदर्यराशि हमारे सामने अभी-अभी अपना यूँघट धीरे से खिसका देगी और… और तब? और तब? सचमुच मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था। शुक्ल जी शांत थे, केवल मेरी ओर देखकर कभी-कभी मुस्करा देते थे, जिसका अभिप्राय था, ‘इतने अध पीर थे, कौसानी आया भी नहीं और मुँह लटका लिया। अब समझे यहाँ का जादू? |
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Answer» कठिन शब्दार्थ- हिम-दर्शन = बर्फ देखना। खिन्नता = अन्यमनस्कता। छू-मंतर होना = गायब हो जाना। निरावृत्त = बेपर्दा, आवरणरहित। सौन्दर्य राशि = अपार सुन्दरता। चूँघट = पर्दा। दिल बुरी तरह धड़कना = जिज्ञासा से व्याकुल होना। अभिप्राय = आशय। मुँह लटकाना = दु:खी होना, बेचैन होना। जादू = प्रभाव। सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक निबन्ध (यात्रावृत्त) से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. धर्मवीर भारती हैं। लेखक अपने कुछ मित्रों के साथ कौसानी के पर्यटन के लिए गया था। कौसानी की घाटी हिमालय की पर्वत श्रेणियों में स्थित थी। वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य अत्यन्त आकर्षक तथा पवित्र था। वहाँ उसने हिमालय की बर्फ को देखा। बादलों के हटने पर उसने उस बर्फ को देखा। यद्यपि उसको देखने का अवसर लेखक को थोड़े से समय के लिए ही मिला था। इसके बावजूद उसका मन प्रसन्नता से भर गया था। कुछ समय पहले उसमें जो निराशा, थकान और व्याकुलता थी, वह एक क्षण को बर्फ में देखने से दूर हो गई थी। अब उसके मन में यह व्याकुलता थी कि अभी थोड़ी देर में बादल हट जायेंगे और हिमालय उसको साफ-सार्फ दिखाई देगा। उसके ऊपर बादलों का पर्दा नहीं होगा। हिमालय का अपार सौन्दर्य उसके नेत्रों के सामने खुल जायेगा। इसके बाद उसको कैसा लगेगा-यह सोच-सोच कर वह बेचैन हो रहा था। शुक्ल जी शांत बैठे थे। वह कभी-कभी लेखक की ओर देखकर मुस्करा उठते थे। कौसानी आने से पहले लेखक बहुत खिन्न था। वह सोच रहा था कि कौसानी को सुन्दर बताकर उसको ठगा गया है। शुक्ल जी की मुस्कान इसी ओर इंगित कर रही थी। मानो वह कह रही थी-कौसानी पहुँचने से पहले ही तुम व्याकुल हो गए, उदास हो गए। देखा, कौसानी कितना सुन्दर और आकर्षक है! विशेष- |
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| 22405. |
“मेरी आँखों के सामने ब्रह्मानन्द का समां बाँध दिया। लेखक को ब्रह्मानन्द किससे प्राप्त हुआ? |
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Answer» गड़रिये की कन्याओं को पहाड़ी राग अलापते तथा नृत्य करते देखकर लेखक को ब्रह्मानन्द प्राप्त हुआ। |
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निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-ठेले पर बर्फ की सिलें लादे हुए बर्फ वाला आया। ठण्डे, चिकने, चमकते बर्फ से भाप उड़ रही थी। मेरे मित्र का जन्म स्थान अल्मोड़ा है, वे क्षण भर उस बर्फ को देखते रहे, उठती हुई भाप में खोये रहे और खोये-खोये से ही बोले, “यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।” और तत्काल शीर्षक मेरे मन में कौंध गया, ‘ठेले पर हिमालय’ । पर आपको इसलिए बता रहा हूँ कि अगर आप नये कवि हों तो भाई, इसे ले जायँ और इस शीर्षक पर दो-तीन सौ पंक्तियाँ बेडौल-बेतुकी लिख डालें-शीर्षक मौजूं है और अगर नयी कविता से नाराज हों, सुललित गीतकार हों तो भी गुंजाइश है, इस बर्फ को डाँटें, “उतर आओ। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की तरह क्यों चढ़े बैठे हो? ओ नये कवियो! ठेले पर लादो । पान की दुकानों पर बिको।”(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।(3) हिमालय की शोभा क्या है? |
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Answer» 1.सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ के ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से उद्धत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती जी हैं। प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने बर्फ का वर्णन किया है। 2.रेखांकित अंशों की व्याख्या- ठेले पर लदे हुए बर्फ को देखकर लेखक कहता है कि एक मेरा मित्र है जिनका जन्मस्थान अल्मोड़ा है। वे पल भर उसे बर्फ को एकटक देखते रहे। बर्फ से उठती हुई भाप को देखकर वे बोले कि ‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है’। मेरे मन में तुरन्त यह शीर्षक प्रवेश कर गया, ‘ठेले पर हिमालय।’ मैं आपको इसलिए बताना उचित समझता हूँ कि यदि आप एक नये कवि हों तो आप इसे ले जायें और इस पर दो-तीन सौ पंक्तियों में रचना कर दीजिए। यह शीर्षक बहुत ही रुचिकर है। यदि आपकी नयी कविता में रुचि नहीं है और सुललित कवि हैं तो झड़प लगावें कि नीचे उतर जाइये। ऊँचे शिखर पर बन्दरों की भाँति क्यों बैठे हो। ठेले पर चढ़ो और चाय, पान आदि की दुकानों पर बिको । 3.हिमालय की शोभा बर्फ है। |
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शुक्ल जी के साथ बस से कोसी में उतरने वाला व्यक्ति कौन था? |
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Answer» शुक्ल जी के साथ एक अन्य व्यक्ति भी कोसी में बस से उतरा। वह दुबला-पतला था। उसका चेहरा पतला और साँवला था । उसने एमिल जोला-सी दाढ़ी रखी हुई थी। वह ढीला-ढाला पतलून पहने था। उसके कंधे पर जर्किन पड़ी थी। उसके बगल में थर्मस अथवा कैमरा अथवा बाइनाकुलर लटका हुआ था। वह मशहूर चित्रकार सेन था। उसका स्वभाव मधुर था। |
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लेखक जब अनार के फूल और फल देखता है तो उसे किसकी याद आती है? |
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Answer» लेखक जब अनार के फूल और फल देखता है तो उसे माली के रुधिर की याद आती है। |
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‘मेरे अन्तःकरण में रोज भरतमिलाप का-सा समां बँध जाता है।’–भरतमिलाप का-सा समां बँधने का तात्पर्य क्या है? |
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Answer» लेखक जब पुस्तक उठाता है तो उसको लगता है कि जैसे उसके हाथ जिल्दसाज के हाथों का स्पर्श कर रहे हैं। जिल्दसाज उसका आमरण मित्र बन चुका है। उसने लेखक की एक पुस्तक की जिल्द बाँध कर उसको एक अनुपम प्रेम की भेंट दी है। जिल्दसाज की याद में लेखक का मन आनन्द से उसी प्रकार भर उठती है जिस प्रकार राम और भरत का मन एक दूसरे से मिलकर आनन्द भरसे उठा था। |
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“उसे पीड़ा हुई तो इन सबकी आँखें शून्य आकाश की ओर देखने लगीं।” यहाँ लेखक ने उसे’ सर्वनाम का प्रयोग किसके लिए किया है –(अ) किसान(ब) गड़रिया(स) बीमार भेड़(द) गरीब महिला |
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Answer» (स) बीमार भेड़ |
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महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्याएँ।अनखाते हुए बस से उतरा कि जहाँ था वहीं पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया। कितना अपार सौंदर्य बिखरा था सामने की घाटी में। इस कौसानी की पर्वतमाला ने अपने अंचल में यह जो कल्यूर की रंग-बिरंगी घाटी छिपा रखी है, इसमें किन्नर और यक्ष ही तो वास करते होंगे। पचासों मील चौड़ी यह घाटी, हरे मखमली कालीनों जैसे खेत, सुंदर गेरू की शिलाएँ काटकर बने हुए लाल-लाल रास्ते, जिनके किनारे सफेद-सफेद पत्थरों की कतार और इधर-उधर से आकर आपस में उलझा जाने वाली बेलों की लड़ियों-सी नदियाँ। मन में बेसाख्ता यही आया कि इन बेलों की लड़ियों को उठाकर कलाई में लपेट लूँ, आँखों से लगा लूँ। अकस्मात् हम एक दूसरे लोक में चले आए थे। इतना सुकुमार, इतना सुंदर, इतना सजा हुआ और इतना निष्कलंक कि लगा इस धरती पर तो जूते उतारकर, पाँव पोंछकर आगे बढ़ना चाहिए। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ-अनखाते हुए = अन्यमनस्क होते हुए। स्तब्ध = क्षुब्ध होते हुए गतिहीन। किन्नर और यक्ष = जनजातियों की दो पुरानी प्रजातियाँ। कतार = पंक्ति। लड़ियाँ — पंक्तियाँ। लोक – संसार। निष्कलंक — पवित्र। बेसाख्ता = यकायक। सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. धर्मवीर भारती है। कुछ साथियों के साथ लेखक हिमदर्शन के लिए कौसानी जा रहा था। उसने कौसानी की प्राकृतिक सुन्दरता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी। कोसी से बस चली तो वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। इस कारण लेखक खिन्न था! वहाँ बर्फ का नामोनिशान भी नहीं था। व्याख्या-लेखक कहता है कि वह बस से उतरा तो अत्यन्त खिन्न था। लेकिन सामने की घाटी में उसकी दृष्टि पड़ी तो देखा-वहाँ अपार प्राकृतिक सौन्दर्य भरा पड़ा था। कौसानी की पर्वत श्रेणी के बीच कल्यूर की तरह-तरह के रंगों से सुशोभित घाटी छिपी थी! लेखक ने सोचा कि प्राचीन-काल में इस घाटी में यक्ष और किन्नर नामक जनजातियों के लोग रहते होंगे। यह घाटी पचासों मील चौड़ी है। इसमें मखमल जैसे हरे-भरे खेत हैं, गेरू की सुन्दर चट्टानों को काटने से बने इसके रास्ते लाल हैं। इन रास्तों के किनारों पर पत्थरों की सफेद पंक्तियाँ हैं। इस घाटी में अनेक नदियाँ हैं जो इधर-उधर से आकर आपस में मिलती हैं। जैसे अनेक लतायें एक दूसरे से लिपट जाती हैं। लेखक ने अनायास सोचा कि वह इनको उठाये और अपनी कलाई में लपेट ले अथवा अपनी आँखों से लगा ले। अचानक लेखक इस संसार के बाहर किसी अन्य दुनियाँ में जा पहुँचा था। वह संसार इतना अधिक कोमल, सुन्दर, सुसज्जित और पवित्र था कि लेखक का मन हो रहा था। कि अपने जूते उतार ले और पैरों को पोंछकर ही उस भूमि पर पैर रखे। विशेष- |
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“इसको पहनना मेरी तीर्थयात्रा है” -विधवा द्वारा सिली हुई कमीज को पहनना तीर्थयात्रा क्यों है? |
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Answer» विधवा द्वारा सिली हुई कमीज में सिलाई करने वाली स्त्री के प्रेम तथा पवित्रता के भाव मिले हुए हैं। ये गुण तीर्थयात्रा करने से मिलते हैं। इसीलिए कमीज को पहनना तीर्थयात्रा के समान है। |
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गड़रिया और उसके परिवार की पूजा किसको कहा गया है? |
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Answer» भेड़ों की सेवा को गड़रिया और उसके परिवार की पूजा कहा गया है। |
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“बरफानी देशों में वह मानो विष्णु के समान क्षीरसागर में लेटा है। यह कथन किसके बारे में है? |
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Answer» यह कथन बर्फीले प्रदेशों में रहकर भेड़ चराने वाले गड़रियों के बारे में है। |
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फकीरी अपने आसन से कब गिर जाती है? उसकी रक्षा कैसे हो सकती है? |
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Answer» मजदूरी तथा फकीरी मनुष्य के विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक हैं। बिना मजदूरी किए फकीरी का उच्च भाव शिथिल हो जाता है। फकीरी अपने आसन से गिर जाती है। श्रमशीलता से विमुख होने पर फकीरी में ताजगी तथा नवीनता नहीं रहती। वह बासी हो जाती है। उसके आदर्श पतित हो जाते हैं। फकीरी की मौलिकता बनाए रखने तथा उसकी श्रेष्ठता की रक्षा के लिए उसका श्रम से जुड़ा रहना जरूरी है। |
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नया साहित्य तथा नई कविता कहाँ से निकलेंगे? नए साहित्यकार तथा कवि साहित्य-साधना किस प्रकारे करेंगे? |
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Answer» नया साहित्य मजदूरों के हृदय से निकलेगा। नई कविता उनके कंठ से फूटेगी । ये नए साहित्यकार तथा नए कवि आनन्द पूर्वक खेतों में काम करेंगे। वे कपड़ों की सिलाई करेंगे तथा जूते तैयार करेंगे। वे लकड़ी की चीजें बनायेंगे तथा संतराश बनकर पत्थरों की कटाई-छटाई करेंगे। उनके हाथ में कुल्हाड़ी तथा सिर पर टोकरी होगी। उनके सिर तथा पैर नंगे होंगे। वे धूल में लिपटे और कीचड़ में सने होंगे। वे वन में जाकर लकड़ी काटेंगे। इस तरह शारीरिक श्रम ही उनकी साहित्य साधना होगा। |
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आजकल मनुष्य की चिन्तन शक्ति क्यों थक गई है? इससे क्या हानि होने की संभावना है? इस हानि से किस प्रकार बचा जा सकता है? |
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Answer» आजकल मनुष्य की चिन्तन शक्ति थक गई है। विचारक मानसिक चिन्तन में डूबे रहते हैं। वे शारीरिक श्रम नहीं करते। इससे जीवन नीरस हो गया है। स्वप्न पुराने हो गए हैं। कविता में नयापन नहीं है। बिना मजदूरी के चिन्तन बेकार हो गया है। इस हानि से बचने के लिए शारीरिक श्रम करना चाहिए। प्रेम मजदूरी से ही इस हानि से रक्षा हो सकती है। साहित्यकारों तथा कवियों को मेहनत के काम करने होंगे तभी नया साहित्य और मौलिक कविता का जन्म होगा। |
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पद्मासन निष्प्रयोज्य क्यों सिद्ध हो चुके हैं? ईश्वर किन आसनों से प्राप्त हो सकता है? |
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Answer» मजदूरी अर्थात् शारीरिक श्रम के अभाव में मानसिक चिन्तन बेकार रहता है। श्रम के अभाव में धामिक क्रियाएँ तथा कला- कौशल अधूरे हैं। पद्मासन करने से ईश्वर प्राप्त नहीं होता। खेत जोतने, बोने, फसल काटने तथा मजदूरी करने में शरीर की जो मुद्राएँ बनती हैं, ईश्वर का साक्षात्कार उन्हीं से हो सकता है। लकड़ी का काम करने वाले बढ़ई, ईंट-पत्थर का काम करने वाले मिस्त्री और संतराश, लुहार, किसान आदि कवि, योगी, महात्मा आदि के समान ही श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं। इनके श्रम-रूपी आसन ही ईश्वर-प्राप्ति करा सकते हैं। |
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अनाथ विधवा थोड़ी देर रुकने के बाद क्या कहकर पुनः कमीज सिलने लगी?(क) हे कृष्ण(ख) हे राम(ग) हे प्रभु(घ) हे ईश्वर। |
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Answer» अनाथ विधवा थोड़ी देर रुकने के बाद हे राम कहकर पुनः कमीज सिलने लगी। |
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गड़रिये के जीवन से संबंधित सफेद वस्तु नहीं है –(क) रुधिर(ख) भेड़े(ग) बर्फ(घ) पर्वत |
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Answer» गड़रिये के जीवन से संबंधित सफेद वस्तु नहीं है रुधिर |
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किसान के ईश्वर प्रेम का केन्द्र है(क) मंदिर(ख) साधु-सन्त(ख) कीर्तन(घ) खेती |
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Answer» किसान के ईश्वर प्रेम का केन्द्र है खेती। |
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“बरफानी देशों में वह मानो विष्णु के समान क्षीरसागर में लेटा है।”- लेखक का यह कथन किसके बारे में है? ‘मजदूरी और प्रेम’ नामक निबंध के आधार पर उसका वर्णन कीजिए। |
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Answer» लेखक ने एक बूढ़े गड़रिये को देखा। जंगल में उसकी भेड़े पेड़ों की पत्तियाँ खा रही हैं। वह ऊन कात रहा है। उसके बाल सफेद हैं किन्तु मुख पर स्वास्थ्य की लालिमा है। जिस प्रकार भगवान विष्णु क्षीर-सागर में रहते हैं, उसी प्रकार वह बर्फीले प्रदेश में निवास करता है। उसकी दो जवान कन्यायें हैं। उन्होंने अपने माता-पिता तथा भेड़ों के सिवाय किसी को नहीं देखा है। उनका यौवन पवित्र है। वे पिता के साथ जंगल में घूमर्ती और भेड़े चराती हैं। उसकी पत्नी बैठी रोटी पका रही है। उसका परिवार बेमकान, बेघर तथा बेनाम है। वे जहाँ भी जाते हैं, एक कुटिया बना लेते हैं और प्रकृति के सान्निध्य में रहते हैं। उनके जीवन में बर्फ की पवित्रता तथा बर्फ की सुगंध है। भेड़ों की सेवा ही उनकी ईश्वर पूजा है। किसी भेड़ के बीमार होने पर वे दिन-रात उसकी देखभाल करते हैं। उसके ठीक होने पर वे मंगल मनाते हैं। उसकी कन्याओं को पहाड़ी गीत गाते और नाचते देखकर, उनकी सरलता, प्रकृति के प्रति निकटता, प्रेम, सेवा आदि के भाव देखकर लेखक के मन में उसके जैसा जीवन व्यतीत करने की इच्छा पैदा हुई । उसने समझा कि मूक जीवन से ही उसका कल्याण होगा। भौतिक ज्ञान से परमात्मा प्राप्त नहीं होता। पंडितों के तर्क-वितर्क बेकार हैं। सरल, पवित्र जीवन से ही परमात्मा को स्नेह प्राप्त होता है तथा मनुष्य का कल्याण होता है। |
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“मजदूरी और फकीरी का अन्योन्याश्रित संबंध है’ तर्क सहित स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» मनुष्य की विविध कामनाएँ उसको स्वार्थ के वशीभूत कर घुमाती रहती हैं। परन्तु उसका जीवन आध्यात्मिक सौरमण्डल की चाल है। अंतत: यह चाल जीवन का परमार्थ रूप है। यहाँ स्वार्थ का अभाव है। जब स्वार्थ कोई वस्तु है ही नहीं तब निष्काम और कामनापूर्ण कर्म करना दोनों ही एक बात हैं। उनमें कोई अन्तर नहीं है। अत: मजदूरी और फकीरी का अन्योन्याश्रय संबंध है। |
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“भोले भाव मिलैं रघुराई। यह कथन किसका है? |
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Answer» “भोले भाव मिलें रघुराई”- यह गुरु नानक का कथन है। |
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“जब कभी मैं इन बेमुकुट के गोपालों के दर्शन करता हूँ, मेरा सिर स्वयं ही झुक जाता है।” लेखक का सिर किसके सामने झुक जाता है तथा क्यों? |
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Answer» सरदार पूर्ण सिंह ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘मजदूरी और प्रेम’ में किसानों को बेमुकुट का गोपाल कहा है। श्रीकृष्ण गोपालन करते थे। उनके सिर पर मोर मुकुट था किन्तु किसान बिना मुकुट के ही अपने प्रेम, त्याग और मजदूरी के कारण लेखक की श्रेष्ठता का पात्र बन गया है। वह खेत ही हवनशाला में अपने तन का हवन करता है। प्रत्येक फूल, फल, पत्ते में वह आहुति देता दिखाई देता है। वह अन्न पैदा करने में ब्रह्मा के समान है। वह मौन रहकर प्रेमभाव के साथ श्रम करने में लगा रहता है। किसान का जीवन सरल है। वह साग-पात खाता है और नदियों का ठंडा पानी पीता है। वह पढ़ा-लिखा नहीं है। पूजा-प्रार्थना मंदिर आदि से उसे सरोकार नहीं है। उसे गायों से प्रेम है। वह उनकी सेवा करता है। वह नेत्रों की मौन भाषा में प्रार्थना करता है। उसका जीवन प्रकृति की निकटता में बीतता है। वह अतिथि सत्कार करने वाला है। वह किसी को धोखा नहीं देता। कोई उसे धोखा दे तो वह जान नहीं पाता। वह अत्यन्त भोला है। ईश्वर उसके भोलेपन पर रीझकर उसे साक्षात दर्शन देता है। उसकी फैंस की झोंपड़ी से छनकर सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश उसके बिस्तर पर पड़ता है। उसके पैर नंगे हैं। कमर में लँगोटी और सिर पर टोपी लगाये, हाथ में लाठी लिए जाता किसान अपने त्याग और सादगी के कारण फकीर जैसा लगता है। वह अन्नदाता है। राजा-महाराजाओं तथा गरीब लोगों का पेट भरने वाला है। उसको देखकर लेखक का सिर श्रद्धापूर्वक झुक जाता है। |
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महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्याएँ।ये तमाम बातें उसी समय मेरे मन में आयीं और मैंने अपने गुरुजन मित्र को बतायीं भी। वे हँसे भी, पर मुझे लगा कि वह बर्फ कहीं उनके मन को खरोंच गई है और ईमान की बात यह है कि जिसने 50 मील दूर से भी बादलों के बीच नीले आकाश में हिमालय की शिखर-रेखा को चाँद-तारों से बात करते देखा है, चाँदनी में उजली बर्फ को धुंधली हलके नीले जल में दूधिया समुद्र की तरह मचलते और जगमगाते देखा है, उसके मन पर हिमालय की बर्फ एक ऐसी खरोंच छोड़ जाती है जो हर बार याद आने पर पिरा उठती है। मैं जानता हूँ, क्योंकि वह बर्फ मैंने भी देखी है। |
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Answer» कठिन-शब्दार्थ-तमाम = सभी। खरोंच = चुभन। ईमान = धर्म, सच्चाई। शिखर = रेखा-चोटी का क्षेत्र। धुंधली = अस्पष्ट। दूधिया = सफेद। पिरा उठना = टीस पैदा होना। सन्दर्भ एवं प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक निबन्ध (यात्रावृत्त) से लिया गया है। इसके लेखक डॉ. धर्मवीर भारती हैं। लेखक कह रहा है कि हिमालय की बर्फ का आकर्षण अत्यन्त प्रबल है। उसकी स्मृति दर्शक के मन में सदा रहती है। उससे दूर होने की एक टीस, एक चुभन उसके मन में बनी रहती है। लेखक के गुरुजन मित्र के मन में जो चुभन है, उससे लेखक परिचित है। व्याख्या-लेखक कहता है कि ठेले पर लदी बर्फ की सिल्लियाँ देखकर उसके मित्र ने उसको हिमालय की शोभा कहा तो तत्काल लेखक को ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक सूझ गया। फिर उसने उसके बारे में तरह-तरह की बातें सोची। जो बातें उसके मन में आईं वे सभी उसने अपने गुरुजन मित्र को बताईं। सुनकर वे हँसे किन्तु लेखक को लगा कि वह बर्फ उनके मन में कहीं चुभ गई है। जिसने पचास मील दूर से भी नीले आकाश में चन्द्रमा और तारों के प्रकाश में हिमालय के शिखरों पर जमी सफेद बर्फ को झिलमिलाते देखा हो तथा उसको चाँदनी में हलके नीले जल में दूध के समान सफेद समुद्र की तरह मचलते और जगमगाते देखा है, उसके मन पर हिमालय की बर्फ की एक खरोंच बनी रह जाती है। जब भी उसको हिमालय की बर्फ याद आती है तो उसके मन में एक टीस उठती है। यह एक सच्चाई है। लेखक कहता है कि वह इस सच्चाई से अपरिचित नहीं है, क्योंकि उसने इस बर्फ को स्वयं देखा है। विशेष- |
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| 22427. |
बस पर सवार लेखक ने साथ-साथ बहने वाली किस नदी का ज़िक्र किया है? |
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Answer» बस पर सवार लेखक ने साथ-साथ बहने वाली कोसी नदी का ज़िक्र किया है। |
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| 22428. |
चाँदनी रात में डाकबंगले के बरामदे में विचारमग्न लेखक की तंद्रा कैसे टूटी? |
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Answer» लेखक विचारमग्न था। तभी सेन रवीन्द्रनाथ टैगोर की कोई कविता गाने लगा। उसे सुनकर लेखक की तंद्रा टूट गई। |
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फसल को नदियों के जल का जादू क्यों कहा गया है? |
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Answer» फसल की सिंचाई के लिए नदियों का जल विभिन्न रीतियों से प्रयोग किया जाता है, जिससे फसल विकसित होकर समय पर तैयार होती है, पकती है। बिना जल के फसल का होना लगभग असंभव हो जाता है। इसलिए फसलों को नदी का जादू कहा है। |
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| 22430. |
निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-हिमालय की शीतलता माथे को छू रही है और सारे संघर्ष, सारे अन्तर्द्वन्द्व, सारे ताप जैसे नष्ट हो रहे हैं। क्यों पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप कहा था और उसे नष्ट करने के लिए वे क्यों हिमालय जाते थे, यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था और अकस्मात् एक दूसरा तथ्य मेरे मन के क्षितिज पर उदित हुआ। कितनी, कितनी पुरानी है यह हिमराशि । जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत, अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ। कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को कहा है-चिरन्तन हिम।(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।(3) कुछ विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम क्यों कहा है? |
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Answer» 1.सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से लिया गया है। इन पंक्तियों में लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि प्राचीनकाल से साधकों के हिमालय पर जाने का क्या प्रयोजन था? 2.रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक स्पष्ट करता है कि पुराने साधकों ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप की संज्ञा दी थी और वे इस कष्ट से मुक्त होने के लिए हिमालय जाते थे। यह बात मेरी समझ में आयी । हिमालय तापे का नाशक और शीतलता का सूचक है। एकाएक मेरे मन में यह विचार आया कि यह हिमराशि कितनी पुरानी है, न जाने किस काल से यह उत्तुंग शिखरों पर जमा हुआ है। इसीलिए विदेशियों ने हिमालय की बर्फ को चिरंतन हिम की संज्ञा प्रदान की है। 3.न जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत, अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ। कुछ विदेशियों ने इसीलिए इस हिमालय की बर्फ को चिरन्तन हिम भी कहा है। |
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| 22431. |
सही वाक्यांश चुनकर पूरा वाक्य फिर से लिखिए :लालबहादुर शास्त्री केंद्रीय सरकार में मंत्री बने, क्योंकि …(अ) जनता ने इसके लिए मांग की थी।(ब) राष्ट्रपति ने उनके लिए सिफारिश की थी।(क) नेहरू जी ने उनसे इसके लिए अनुरोध किया था। |
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Answer» लालबहादुर शास्त्री केंद्रीय सरकार में मंत्री बने, क्योंकि नेहरू जी ने उनसे इसके लिए अनुरोध किया था। |
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| 22432. |
निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-आज भी उसकी याद आती है तो मन पिरा उठता है। कल ठेले के बर्फ को देखकर मेरे मित्र उपन्यासकार जिस तरह स्मृतियों में डूब गये, उसे दर्द को समझता हूँ और जब ठेले पर हिमालय की बात कहकर हँसता हूँ तो वह उस दर्द को भुलाने का ही बहाना है। ये बर्फ की ऊँचाइयाँ बार-बार बुलाती हैं और हम हैं कि चौराहों पर खड़े ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। किसी ऐसे क्षण में ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने कहा था-‘कबहुँक हैं यदि रहिन रहगो’-मैं क्या कभी ऐसे भी रह सकेंगा, वास्तविक हिमशिखरों की ऊँचाइयों पर?(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।(3) किसने हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है? |
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Answer» 1.सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से अवतरित है। इस अवतरण में लेखक कहता है कि मुझे बार-बार हिमालय का स्मरण आता है। हिमालय की ऊँचाइयों को देखने की इच्छा उसके मन में बार-बार उत्पन्न होती है। 2.रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक कहता है कि आज भी जब हिमालय की याद आती है तो मन दर्द के मारे कराह उठता है। मेरे उपन्यासकार मित्र ठेले की बर्फ को देखकर स्मृतियों में डूब जाते थे। जब हिमालय का वास्तविक दर्शन होता तो क्या स्थिति होती। मैं उनके इस दर्द को भली-भाँति समझता हूँ। बर्फ की ऊँचाइयों को देखकर ऐसा मालूम होता है जैसे वे मुझे बुला रही हैं। हम ठेले पर लदे बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। उन्हें भी हिमालय की ऊँची-ऊँची शिखरों से बेहद लगाव था। 3.तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है। |
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| 22433. |
सही वाक्यांश चुनकर पूरा वाक्य फिर से लिखिए : कच्छ को हम ‘म्यूज़ियम’ कह सकते हैं, क्योंकि …(अ) यहाँ तरह-तरह के पशु-पक्षी पाए जाते हैं।(ब) यहाँ तरह-तरह की वनस्पतियाँ मिलती हैं।(क) यहाँ अनेक दर्शनीय स्थानों का वैविध्य है। |
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Answer» कच्छ को हम ‘म्यूज़ियम’ कह सकते हैं, क्योंकि यहाँ अनेक दर्शनीय स्थानों का वैविध्य है। |
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फसल को मिट्टी का गुणधर्म क्यों कहा गया है? |
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Answer» धूप और हवा, नदियों का जल और परिश्रम के बाद भी बिना मिट्टी के फसल की कल्पना तक नहीं की जा सकती। साथ ही हर फसल के लिए अलग तरह की मिट्टी की आवश्यकता होती है। इसलिए फसल को मिट्टी का गुणधर्म कहा गया है। |
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| 22435. |
सही वाक्यांश चुनकर पूरा वाक्य फिर से लिखिए :शास्त्री जी सन् 1932 में जेल गए, क्योंकि ………….(अ) वे नमक कानून तोड़ने के आंदोलन में शामिल हुए थे।(ब) उन्होंने किसान – आंदोलन में भाग लिया था।(क) वे ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के प्रमुख नेता थे। |
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Answer» शास्त्री जी सन् 1932 में जेल गए, क्योंकि उन्होंने किसान – आंदोलन में भाग लिया था। |
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| 22436. |
सही वाक्यांश चुनकर पूरा वाक्य फिर से लिखिए :शास्त्री जी लोकसेवा मंडल में शामिल हो गए, क्योंकि…………(अ) वे सामाजिक कार्य करना चाहते थे।(ब) उसके अध्यक्ष से वे बहुत प्रभावित थे।(क) उसमें शामिल होने के लिए शुल्क नहीं देना पड़ता था। |
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Answer» शास्त्री जी लोकसेवा मंडल में शामिल हो गए, क्योंकि वे सामाजिक कार्य करना चाहते थे। |
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निम्नलिखित वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिएअच्छी किस्मत वाला ……………..चार रास्तों का समूह ……………..अपने में लीन …………..जहां कोई न रहता हो ……………जिसका कोई पार न हो …………….जिसमें कोई कलंक न हो ……………. |
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Answer» चार रास्तों का समूह = चौराहा अपने में लीन = आत्मलीन जहां कोई न रहता हो = निर्जन जिसका कोई पार न हो = अपार जिसकी कोई सीमा न हो = असीम जिसमें कोई कलंक न हो = निष्कलंक अच्छी किस्मत वाला = भाग्यशाली। |
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| 22438. |
लेखक ने बैजनाथ पहुँच कर हिमालय से किस रूप में भेंट की? |
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Answer» लेखक ने बैजनाथ पहुँच कर देखा कि गोमती निरन्तर प्रवाहित हो रही थी। गोमती की उज्ज्वल जलराशि में हिमालय की बर्फीली चोटियों की छाया तैर रही थी। लेखक ने नदी के इस जल में तैरते हुए हिमालय से भेंट की। |
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| 22439. |
महत्वपूर्ण गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्याएँ।हल चलाने वाले और भेड़ चराने वाले प्रायः स्वभाव से ही साधु होते हैं। हल चलाने वाले अपने शरीर का हवन किया करते हैं। खेत उनकी हवनशाला है। उनके हवनकुण्ड की ज्वाला की किरणें चावल के लंबे और सफेद दानों के रूप में निकलती हैं। गेहूँ के लाल-लाल दाने इस अग्नि की चिनगारियों की डालियाँ-सी हैं। मैं जब कभी अनार के फूल और फल देखता हूँ तब मुझे बाग के माली का रुधिर याद आ जाता है। उसकी मेहनत के कण जमीन में गिरकर उगे हैं और हवा तथा प्रकाश की सहायता से मीठे फलों के रूप में नजर आ रहे हैं। किसान मुझे अन्न में, फूल में, फल में आहुति देता हुआ सा दिखाई पड़ता है। कहते हैं, ब्रह्माहुति से जगत् पैदा हुआ है। अन्न पैदा करने में किसान भी ब्रह्मा के समान है। खेती उसके ईश्वरी प्रेम का केंद्र है। उसका सारा जीवन पत्ते-पत्ते में, फूल-फूल में, फल-फल में बिखर रही है। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ-साधु = सज्जन, सीधे-सादे। हवन = यज्ञ। ज्वाला = अग्नि। रुधिर = रक्त, खून। आहुति = हवन-सामग्री। ब्रह्माहुति = ब्रह्मा द्वारा यज्ञ की अग्नि में डाले गए पदार्थ जगत = संसार। सन्दर्भ व प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘मजदूरी और प्रेम, शीर्षक निबन्ध से लिया गया है। इसके लेखक सरदार पूर्णसिंह हैं। लेखक कहते हैं कि श्रमसाध्य जीवन पवित्र और श्रेष्ठ होता है। किसानों और मजदूरों के कार्य का मूल्य पैसों से नहीं आँका जा सकता। किसान अपने खेत में जो श्रम करता है वही उसकी ईश्वराधना है। अन्न और फल पैदा करने वाला किसान सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के समान है। व्याख्या-सरदार पूर्ण सिंह श्रम के प्रशंसक हैं। वह कहते हैं कि खेत जोतने वाले किसान तथा भेड़ चराने वाले गड़रिये स्वभाव से ही सीधे-सादे और सज्जन होते हैं। किसानों के खेत उनकी यज्ञशाला हैं। उस यज्ञशाला में वह अपने शरीर का हवन करते हैं। खेत में उपजे चावल के सफेद दाने यज्ञ कुंड से निकलने वाली अग्नि की लपटें हैं। गेहूँ के साफ दाने इस आग में उठने वाली चिनगारियों जैसे प्रतीत होते हैं। अनार के लाल फूलों और फलों को देखकर पता चलता है कि माली ने उनको पैदा करने में अपना खून बहाया है। किसान का श्रम ही खेत में अन्न के दानों के रूप में पैदा हुआ है। वही हवा और पानी पाकर मीठे फलों के रूप में दिखाई दे रहा है। अन्न, फूल एवं फल सभी किसान द्वारा खेत की यज्ञशाला में दी गई आहुति का परिणाम हैं। लेखक को इन सब में किसान के दर्शन होते हैं। बताया जाता है कि ब्रह्मा ने यज्ञ किया था तो हवन कुंड में दी गई आहुति से इस संसार का जन्म हुआ था। किसान भी ब्रह्मा के समान है। वह खेती करके अन्न पैदा करता है। वह ईश्वर के प्रति अपना प्रेम खेत में श्रम करके प्रकट करता है। प्रत्येक पत्ते, फल और फूल में किसान का जीवन समाया हुआ है। विशेष- |
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| 22440. |
‘मजदूरी और प्रेम’ निबन्ध का सारांश लिखिए। |
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Answer» परिचय-सरदार पूर्णसिंह द्वारा लिखित निबंधों में ‘मजदूरी और प्रेम’ का महत्वपूर्ण स्थान है। इसमें किसान तथा श्रमिकों को ईश्वर का सच्चा प्रतिनिधि बताया गया है तथा श्रम की महत्ता प्रतिपादित की गई है। हल चलाने वाले का जीवन-हल चलाने वाले तथा भेड़ चराने वाले स्वभाव से सज्जन होते हैं। वे खेत की हवन शाला में अपने श्रम की आहुति दिया करते हैं। ब्रह्महुत से जगत पैदा हुआ है। किसान अन्न पैदा करने में ब्रह्मा के समान है। अन्न तथा फलों में उसका ही श्रम दिखाई देता है। वह साग-पात खाता है। ठंडे चस्मों तथा नदियों का पानी पीता है। वह पढ़ा-लिखा नहीं है। जप-तप नहीं करता, खेती ही उसके ईश्वरीय प्रेम का केन्द्र है। वह पशु-पालन करता है। वह तथा उसका परिवार प्राकृतिक जीवन जीते हैं। उसकी आवश्यकताएँ सीमित हैं। लेखक को किसान के सरल जीवन में ईश्वर के दर्शन होते हैं। गड़रिये का जीवन-एक बार लेखक ने एक बूढ़े गड़रिये को देखा। वह पेड़ के नीचे बैठा ऊन कात रहा था। उसकी भेड़े वहाँ चर रही थीं। उसके सिर के बाल सफेद थे किन्तु मुँह पर स्वास्थ्य की लालिमा थी। उसका कोई स्थायी घर नहीं था। जहाँ जाता था वहीं घास की झोंपड़ी बना लेता था। उसकी स्त्री रोटी पकाती थी। उसकी दो जवान कन्यायें थीं। वे भेड़ चराते समय पिता के साथ रहती थीं। उन्होंने अपने माता-पिता के अतिरिक्त किसी को नहीं देखा था। गड़रिया पवित्र प्राकृतिक जीवन जीता था। उसकी युवा पुत्रियों की पवित्रता सूर्य, बर्फ और वन की सुगंध के समान थी। वे सभी अपनी भेड़ों की प्रेमपूर्वक देखभाल करते थे। किसी भेड़ के बीमार होने पर चिन्तित तथा उसकी सेवा में रत रहते थे। स्वस्थ होने पर प्रसन्न होते थे। वे ईश्वर की वाणी को सुनते नहीं प्रत्यक्ष देखते थे। इससे उनको ब्रह्मानंद की प्राप्ति होती थी। लेखक को यह देखकर लगता है कि अनपढ़ लोग ही ईश्वर को साक्षात् देख पाते हैं-पंडितों के उपदेश निरर्थक हैं। पुस्तकों द्वारा प्रदत्त ज्ञान अपूर्ण है। गड़रिये के परिवार की प्रेम मजदूरी का मूल्य कोई नहीं चुका सकता है। मजदूर की मजदूरी-दिन-भर श्रम करने वाले की मजदूरी कुछ पैसों में नहीं दी जा सकती। मजदूर के शरीर के सभी अंग ईश्वर ने बनाए हैं और पैसे जिस धातु से बने हैं, वह भी ईश्वर ने बनाई है। अन्न, धन एवं जल भी ईश्वर की देन हैं। मजदूर की मजदूरी प्रेम-सेवा से ही दी जा सकती है। एक जिल्दसाज ने लेखक को एक किताब की जिल्द बनाई थी। वह उसका आमरण मित्र बन गया था। पुस्तक उठाते ही लेखक के मन में भरत-मिलाप का आनन्द आने लगता था। एक अनाथ विधवा ने गाढ़े की कमीज रातभर जागकर सिली ! भूखी, दु:खी वह विधवा थककर रुक जाती फिर ‘हे राम’ कहकर सीने लगती है। इस कमीज में उसके सुख, दु:ख और पवित्रता मिली हुई है। इस कमीज को पहनकर लेखक को तीर्थयात्रा का पुण्य मिलता है। यह उसके शरीर का नहीं आत्मा का वस्त्र है। ऐसा श्रम ईश्वर की प्रार्थना है। प्रार्थना शब्दों में नहीं होती। ऐसी प्रार्थना ईश्वर तत्काल सुनता है। प्रेम-मजदूरी-मनुष्य के हाथों से हुए कार्यों में उसकी आत्मा की पवित्रता मिली होती है। राफेल के बनाए चित्रों में कला-कुशलता के साथ उसकी आत्मा दिखाई देती है। उनकी तुलना में कैमरे से खिंचे फोटो निर्जीव लगते हैं। अपने हाथ से उगाये आलू में जो स्वाद आती है, वह डिब्बाबन्द चीजों में नहीं आता। जिन चीजों में मनुष्य के हाथ लगते हैं, उनमें उसकी पवित्रता तथा प्रेम मिल जाता है। प्रियतमा द्वारा बनाया रूखा-सूखा खाना होटल के भोजन से ज्यादा स्वादिष्ट होता है। उसके द्वारा लाए पानी में प्रेम का अमृत मिश्रण है। उसकी इस प्रेम और त्याग भरी सेवा का बदला लेखक नहीं दे सकता। वह सुबह उठती है, आटो पीसती है.गाय का दूध निकालती है। मक्खन निकालती है, चूल्हे पर रोटी बनाती है। वह पूर्व दिशा की लालिमा से अधिक आनन्ददायिनी लगती है। वह रोटी नहीं अमूल्य पदार्थ है। ऐसा संयमपूर्ण प्रेम ही योग है। मजदूरी और कला-श्रम आनन्द देने वाला होता है। उसको रुपयों से नहीं खरीदा जा सकता। श्रम करने वाले की पूजा ही ईश्वर की पूजा है। भगवान मंदिर-मस्जिद में नहीं मनुष्य की अनमोल आत्मा में मिलता है। मनुष्य और उसके श्रम का तिरस्कार नास्तिकता है। बिना श्रम, बिना हाथ के कला-कौशल, विचार और चिन्तन बेकार है। दान के धन पर आराम से रहने से धर्म में अनाचार फैलता है। हाथ से काम करने वाला मजदूर ही सच्चा महात्मा और योगी है। आरामतलबी से जीवन तथा चिन्तन में बासीपन आ गया है। मशीनी सभ्यता मनुष्य को नष्ट कर देगी। नई सभ्यता श्रमिकों के श्रम से ही फलेगी-फूलेगी। मजदूरी और फकीरी-मजदूरी और फकीरी का संयोग मानवता के विकास के लिए आवश्यक है। बिना परिश्रम फकीरी भी बासी हो जाती है। प्रकृति में नित्य नवीनता है। उसकी उपेक्षा कर बिस्तर पर पड़े-पड़े, बिना हाथों से श्रम किए चिन्तन करना ठीक नहीं है। साधु-संन्यासी श्रम करेंगे तभी उनकी बुद्धि निर्मल होगी। श्रम में एक नए ईश्वर के दर्शन होते हैं। श्रम ही ईश्वर का भजन है, मनुष्य को धातु से नहीं खरीदना चाहिए। प्रेम, सेवा और समानता के व्यवहार से उसकी आत्मा को अपना बनाना चाहिए। सभी मनुष्य आपस में भाई-बहन हैं। वे एक ही पिता ईश्वर की संतान हैं। यह सारा संसार एक ही परिवार है। मजदूरी निष्काम कर्म है। उसमें स्वार्थ का अभाव है। मजदूरी और फकीरी अभिन्न हैं। जोन ऑफ आर्ट, टाल्सटाय, उमर खैयाम, खलीफा उमर, कबीर, रैदास, गुरु नानक, भगवाने श्रीकृष्ण आदि का जीवन श्रमपूर्ण चिन्तन का उदाहरण है। |
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| 22441. |
सरदार पूर्णसिंह का जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्य-सेवा का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» जीवन-परिचय-सरदार पूर्णसिंह का जन्म एबटाबाद (वर्तमान पाकिस्तान) में सन् 1881 में हुआ था। आपकी शिक्षा रावलपिंडी तथा लाहौर में हुई। सन् 1900 में आप रसायन विज्ञान का विशिष्ट अध्ययन करने जापान गए। वहाँ स्वामी रामतीर्थ से आपकी भेट हुई। स्वामीजी से प्रभावित होकर आपने संन्यास ग्रहणकर लिया तथा भारत लौट आए। बाद में आप देहरादून के इंपीरियल फारेस्ट इंस्टीट्यूट में रसायन विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त हुए। आपने ग्वालियर में रहकर धार्मिक साहित्य लिखा। पंजाब में कृषि कर्म अपनाया। चूँकि आप शिक्षक बने इसीलिए आप अध्यापक पूर्णसिंह के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। सन् 1931 में आपका देहावसान हो गया। |
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| 22442. |
सरदार पूर्ण सिंह मजदूरी को समाज के नैतिक उत्थान के लिए तो वर्तमान अर्थशास्त्री उसको आर्थिक उत्थान के लिए जरूरी मानते हैं-इस संबंध में अपने विचार तर्कपूर्ण ढंग से लिखिए। |
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Answer» ‘मजदूरी और प्रेम’ शीर्षक निबंध में सरदार पूर्ण सिंह ने मजदूरी को मानवता तथा समाज के लिए महत्वपूर्ण माना है। लेखक मानता है कि श्रमिक के श्रम में उसका प्रेम, पवित्रता तथा अपनत्व का भाव मिला रहता है। हम उसका मूल्य चंद सिक्कों से नहीं चुका सकते। उसका मूल्य प्रेम और सेवाभाव द्वारा ही चुकाया जा सकता है। समाज के नैतिक उत्थान के लिए मजदूरी को मान देना आवश्यक है। उसके बिना धार्मिक तथा साहित्यक चिन्तन भी अपूर्ण रहता है। लेखक ने मजदूरी का वर्णन उसके प्रचलित स्वरूप से हटकर आसान ढंग से किया है। वर्तमान अर्थशास्त्री उत्पादन में मजदूरी को एक साधन मात्र मानते हैं। उनका दृष्टिकोण मानवीय नहीं है। अर्थशास्त्र कहता है कि पूँजी से श्रम खरीदा जा सकता है। पूर्ण सिंह इसके विपरीत इसको आदमियों की तिजारते तथा मूर्खतापूर्ण बातें मानते हैं। आजकल श्रमिक के शोषण की बात होती है। परन्तु अर्थशास्त्र इसको शोषण नहीं मानता। देशों की सरकारें भी मजदूरों के शोषण से पूँजीपतियों को नहीं रोक पातीं। कारखानों में श्रमिकों को एक मशीन समझा जाता है। उसको कम पैसा देकर अधिक श्रम कराया जाता है। इस तरह मजदूरी का महत्व जानते हुए भी उसको सम्मान न देकर उसका शोषण किया जाता है। |
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| 22443. |
निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-सूरज डूबने लगा और धीरे-धीरे ग्लेशियरों में पिघली केसर बहने लगी। बर्फ कमल के लाल फूलो में बदलने लगी, घाटियाँ गहरी नीली हो गयीं। अँधेरा होने लगा तो हम उठे और मुँह-हाथ धोने और चाय पीने में लगे। पर सब चुपचाप थे, गुमसुम जैसे सबका कुछ छिन गया हो या शायद सबको कुछ ऐसा मिल गया हो, जिसे अन्दर-ही-अन्दर सहजेने में सब आत्मलीन हो अपने में डूब गये हों।(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।(3) किस समय बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने सी प्रतीत होने लगी? |
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Answer» 1.सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा रचित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से लिया गया है। प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने कौसानी की सायंकालीन बेला का चित्रण किया है। 2.रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक कहता है कि जब सूर्य अस्त होने का समय आया तो ग्लेशियरों में पिघली केसर प्रवाहित होने लगी। बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने-सी प्रतीत होने लगी और घाटियाँ नीली दिखायी पड़ने लगीं। अँधेरा हो गया। मैं उठा और हाथ-मुँह धोकर चाय पीने लगा। उस समय का वातावरण बिल्कुल शान्त था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सबका सर्वस्व छिन गया हो या सभी को सब कुछ मिल गया हो और ऐसा लग रहा था जैसे सभी अन्दर-अन्दर संजोने में तल्लीन होकर आत्मविभोर हो गये हों। यह दृश्य अत्यन्त मनमोहक था। 3.सूर्य अस्त के समय बर्फ कमल के लाल फूलों में बदलने सी प्रतीत होने लगी। |
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| 22444. |
सूरज डूबने लगा तो ग्लेशियरों में क्या बहने लगा? |
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Answer» सूरज डूबने लगा तो ग्लेशियरों में पिघली केसर बहने लगी। |
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| 22445. |
महत्वपूर्ण गद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्याएँ।गुरु नानक ने ठीक कहा है-”भोले भाव मिलें रघुराई’, भोले-भाले किसानों को ईश्वर अपने खुले दीदार का दर्शन देता है। उनकी फूस की छतों में से सूर्य और चंद्रमा छन-छनकर उनके बिस्तरों पर पड़ते हैं। ये प्रकृति के जवान साधु हैं। जब कभी मैं इन बे-मुकुट के गोपालों के दर्शन करता हूँ, मेरा सिर स्वयं ही झुक जाता है। जब मुझे किसी फकीर के दर्शन होते हैं तब मुझे मालूम होता है कि नंगे सिर, नंगे पाँव, एक टोपी सिर पर, एक लँगोटी कमर में, एक काली कमली कंधे पर, एक लंबी लाठी हाथ में लिए हुए गौवों का मित्र, बैलों का हमजोली, पक्षियों का हमराज, महाराजाओं का अन्नदाता, बादशाहों को ताज पहनाने और सिंहासन पर बिठाने वाला, भूखों और नंगों को पालने वाला, समाज के पुष्पोद्यान का माली और खेतों का वाली जा रहा है। |
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Answer» कठिन शब्दार्थ-बे मुकुट = बिना मुकुट वाले। गोपाल = ग्वाला। हमजोली = साथी। हमराज = मन की बातें जानने वाला। ताज = राज्य, सत्ता। पुष्पोद्यान = बगीची। सन्दर्भ व प्रसंग-उपर्युक्त गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘मजदूरी और प्रेम’ शीर्षक निबंध से लिया गया है। इसके लेखक अध्यापक पूर्णसिंह हैं। लेखक किसानों की श्रमशीलता की प्रशंसा करता है। किसानों में दया, वीरता और प्रेम के गुण होते हैं। ये गुण अन्य लोगों में नहीं पाये जाते॥ व्याख्या-लेखक कहता है कि गुरु नानक देव का यह कथन ठीक ही है कि ईश्वर भोले-भाले भावुक लोगों को ही प्राप्त होता है। किसान स्वभाव से भोला होता है। ईश्वर उसको साक्षात् दर्शन देता है। किसान का जीवन सादा तथा प्राकृतिक है। उसकी घास-फूस से बनी झोंपड़ी से सूर्य और चन्द्रमा की किरणें निकलकर उसके बिस्तर पर गिरती हैं। युवा होते हुए भी किसान स्वभाव से साधु जैसा होता है। वह गायों का पालन करने वाला है। किन्तु श्रीकृष्ण के समान उसके सिर पर मुकुट सुसज्जित नहीं है। लेखक का सिर उसको देखकर झुक जाता है। लेखक को किसान किसी फकीर के समान सरल प्रतीत होता है। उसके सिर और पैर नंगे हैं। उसकी कमर में एक लँगोटी, सिर पर टोपी, कंधे पर काला कम्बल तथा हाथ में लम्बी लाठी है। वह गायों का दोस्त है, बैलों का साथी है, पक्षियों के मन की बातें जानने वाला है, वह राजा-महाराजाओं को भोजन देने वाला तथा सम्राटों को सत्ता प्रदान करने वाला है। वह भूखे-नंगे, गरीबों का पालन-पोषण करने वाला है। वह समाजरूपी फूलों के बगीचे का माली है तथा खेतों का स्वामी है। विशेष- |
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| 22446. |
निम्नलिखित शब्दों के दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिएपहाड़सूरज ……………धरती …………..कमल ……………मुंह ……………नदी …………….बादल ………….हाथ ………… |
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Answer» पहाड़ = पर्वत, नग |
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लेखक द्वारा दिए गए उदाहरण का उल्लेख करके बताइये कि हाथ की मेहनत से चीज में रस किस तरह भर जाती है? |
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Answer» हाथ की मेहनत से चीज में रस भर जाता है। ऐसा रस मशीनों से बनी चीजों में नहीं होता। लेखक खेत में आलू बोता है। वह उसमें पानी देता है। उसके आस-पास पैदा हुई खर-पतवार की निराई-गुड़ाई करता है। यह आलू उसने अपने श्रम से तैयार किया है। इसमें उसके मन के भाव, प्रेम और पवित्रता सूक्ष्म रूप से मिले हुए हैं। इस आलू में उसको बड़ा स्वाद मिलता है। उतने स्वादिष्ट डिब्बे में बन्द बाजार में मिलने वाले खाद्य पदार्थ नहीं होते। |
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“ईश्वर तो कुछ ऐसी ही मूक प्रार्थनाएँ सुनता है और तत्काल सुनता है।”-ईश्वर कैसी प्रार्थनाएँ सुनता है? ‘मजदूरी और प्रेम’ पाठ के आधार पर उत्तर दीजिए। |
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Answer» एक अनाथ विधवा ने लेखक के लिए गाढ़े की कमीज सिली। उसने पूरी रात जागकर काम किया। काम करते-करते उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे उसको अपना दुःख भरा जीवन याद आ जाता था। कल दिन में उसने कुछ नहीं खाया था। रात में भी खाना नहीं मिला। वह सोच रही थी कि कमीज की सिलाई पूरी होने पर कल उसको खाना मिलेगा। उसकी एक-एक टाँके से आशा बँधी थी। काम करते-करते वह थक गई। कमीज उसके घुटने पर फैली थी। उसने कुछ देर रुककर आराम किया। उसकी खुली आँखें ईश्वर के ध्यान में लीन र्थी। कुछ देर बाद ‘हे राम’ कहकर वह पुन: कमीज सिलने लगी। लेखक की मान्यता है कि उसके श्रम में उसका प्रेम, पवित्रता तथा सुख-दु:ख मिले हुए हैं। वह कमीज नहीं एक दिव्य वस्त्र है। उसको पहनना तीर्थयात्रा करने के समान है। ईश्वर ऐसे श्रमशील पवित्र लोगों की मूक प्रार्थना अवश्य सुनता है और बिना विलम्ब किए सुनता है। शब्दों में की गई प्रार्थना प्रभावहीन होती है जो शब्द मन से निकलते हैं, वही प्रार्थना ईश्वर के यहाँ सुनी जाती है। प्रेम और सेवा से परिपूर्ण श्रम ही सच्ची प्रार्थना है। उसके लिए शब्दों की जरूरत नहीं होती, न किसी मंदिर, मस्जिद में जाने की आवश्यकता होती है। ऐसा काम किसी संध्या, नमाज, प्रार्थना से कम नहीं होता। |
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लेखक ने कौसानी गाँव में डूबते सूरज का जो वर्णन किया है, उसे अपने शब्दों में लिखिए? |
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Answer» सूरज ढल रहा था। दूर स्थित शिखरों पर दरें, ग्लेशियर, ढोल तथा घाटियाँ कुछ धुंधली दिखाई दे रही थीं। ग्लेशियरों की बर्फ केसर के समान पीली दिखाई दे रही थी। पर्वत शिखरों पर जमी बर्फ लाल कमल जैसी हो गई थी। कौसानी की घाटियाँ भी पीली दिखाई देने लगी थीं। |
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सही वाक्यांश चुनकर पूरा वाक्य फिर से लिखिए :ईशवर हमारे गुनाहों को माफ कर देता है, क्योंकि …(अ) वह हमारा मालिक है।(ब) हमारे गुनाहों को वह अपने गुनाह मान लेता है।(क) वह बड़ा मेहरबान (दयालु) है। |
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Answer» ईशवर हमारे गुनाहों को माफ कर देता है, क्योंकि वह बड़ा मेहरबान (दयालु) है। |
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