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“जब कभी मैं इन बेमुकुट के गोपालों के दर्शन करता हूँ, मेरा सिर स्वयं ही झुक जाता है।” लेखक का सिर किसके सामने झुक जाता है तथा क्यों?

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सरदार पूर्ण सिंह ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘मजदूरी और प्रेम’ में किसानों को बेमुकुट का गोपाल कहा है। श्रीकृष्ण गोपालन करते थे। उनके सिर पर मोर मुकुट था किन्तु किसान बिना मुकुट के ही अपने प्रेम, त्याग और मजदूरी के कारण लेखक की श्रेष्ठता का पात्र बन गया है। वह खेत ही हवनशाला में अपने तन का हवन करता है। प्रत्येक फूल, फल, पत्ते में वह आहुति देता दिखाई देता है। वह अन्न पैदा करने में ब्रह्मा के समान है। वह मौन रहकर प्रेमभाव के साथ श्रम करने में लगा रहता है।

किसान का जीवन सरल है। वह साग-पात खाता है और नदियों का ठंडा पानी पीता है। वह पढ़ा-लिखा नहीं है। पूजा-प्रार्थना मंदिर आदि से उसे सरोकार नहीं है। उसे गायों से प्रेम है। वह उनकी सेवा करता है। वह नेत्रों की मौन भाषा में प्रार्थना करता है। उसका जीवन प्रकृति की निकटता में बीतता है। वह अतिथि सत्कार करने वाला है। वह किसी को धोखा नहीं देता। कोई उसे धोखा दे तो वह जान नहीं पाता। वह अत्यन्त भोला है। ईश्वर उसके भोलेपन पर रीझकर उसे साक्षात दर्शन देता है। उसकी फैंस की झोंपड़ी से छनकर सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश उसके बिस्तर पर पड़ता है। उसके पैर नंगे हैं। कमर में लँगोटी और सिर पर टोपी लगाये, हाथ में लाठी लिए जाता किसान अपने त्याग और सादगी के कारण फकीर जैसा लगता है। वह अन्नदाता है। राजा-महाराजाओं तथा गरीब लोगों का पेट भरने वाला है। उसको देखकर लेखक का सिर श्रद्धापूर्वक झुक जाता है।



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