This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
| 22351. |
तताँरा ने वामीरो से क्या याचना की? |
|
Answer» तताँरा ने वामीरो से अगले दिन उसी स्थान पर उससे मिलने की याचना की। इससे पूर्व उसने एक और याचना की कि वह अपना अधूरा गाना पूरा करे। |
|
| 22352. |
जब कोई राह न सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसने शक्ति भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा। |
|
Answer» इसका आशय है कि गाँववालों और वामीरो की माँ दुवारा अपमानित होने के बाद तताँरा के क्रोध का ठिकाना न रहा। क्रोध में ही उसने अपनी तलवार निकालकर उसे पूरी शक्ति से धरती में घोंप दिया और पूरी ताकत से खींचने लगा, जिससे धरती में सीधी दरार आ गई और धरती दो टुकड़ों में बँट गई। |
|
| 22353. |
क्रोध में तताँरा ने क्या किया? |
|
Answer» गाँववालों और वामीरो की माँ द्वारा अपमानित होने के बाद तताँरा के क्रोध का ठिकाना न रहा। क्रोध में ही उसने अपनी तलवार निकालकर उसे पूरी शक्ति से धरती में घोंप दिया और पूरी ताकत से खींचने लगा, जिससे धरती में सीधी दरार आ गई और धरती दो टुकड़ों में बँट गई। |
|
| 22354. |
प्राचीन काल में मनोरंजन और शक्ति-प्रदर्शन के लिए किस प्रकार के आयोजन किए जाते थे? |
|
Answer» प्राचीन काल में मनोरंजन और शक्ति प्रदर्शन के लिए अनेक प्रकार के आयोजन किए जाते थे। पशु-पर्व, कुश्ती, दंगल तथा मेलों का आयोजन किया जाता था। पशु-पर्व में हृष्ट-पुष्ट पशुओं का प्रदर्शन होता था। युवकों की शक्ति-परीक्षा के लिए उन्हें पशुओं से भिड़ाया जाता था। इसमें सभी लोग हिस्सा लेते थे। पासा गाँव में वर्ष में एक ऐसा मेला होता था जिसमें सभी गाँवों के लोग इकट्ठे होते थे। उसमें नृत्य-संगीत और भोजन का भी प्रबंध होता था। |
|
| 22355. |
तताँरा-वामीरो की त्यागमयी मृत्यु से निकोबार में क्या परिवर्तन आया? |
|
Answer» तताँरा-वामीरो की त्यागमयी मृत्यु से निकोबार में यह परिवर्तन आया कि वहाँ लोग अब दूसरे गाँवों से भी वैवाहिक संबंध स्थापित करने लगे। दोनों की त्यागमयी मृत्यु ने लोगों की विचारधारा में एक सुखद तथा अद्भुत परिवर्तन ला दिया तथा उनकी रूढ़िवादी परंपराएँ भी परिवर्तित हो गईं। |
|
| 22356. |
सोचिए, अगर परतदार शैल न होते तो कोयला एवं खनिज तेल कहाँ से मिलता? |
|
Answer» अगर परतदार शैल न होते तो कोयला एवं खनिज तेल नहीं मिल पाता। |
|
| 22357. |
निकोबार द्वीप समूह के विभक्त होने के बारे में निकोबारियों का क्या विश्वास है? |
|
Answer» निकोबार द्वीपसमूह के विभक्त होने के बारे में निकोबारियों का यह विश्वास है कि प्राचीन काल में ये दोनों द्वीप एक ही थे। इनके विभक्त होने में तताँरा और वामीरो की प्रेम-कथा की त्यागमयी मृत्यु है, जो एक सुखद परिवर्तन के लिए थी। |
|
| 22358. |
तताँरा और वामीरो के गाँव की क्या रीति थी? |
|
Answer» तताँरा और वामीरो के गाँव की रीति थी कि वहाँ के निवासी केवल अपने गाँववालों के साथ ही विवाह कर सकते थे। गाँव के बाहर के किसी लड़के या लड़की से विवाह करना अनुचित माना जाता था। |
|
| 22359. |
वामीरो ने तताँरा को बेरुखी से क्या जवाब दिया? |
|
Answer» वामीरो ने तताँरा को बेरुखी से जवाब दिया कि वह उसके कहने पर गाना क्यों गाए? वह पहले उसे बताए कि वह कौन है? वह उससे असंगत प्रश्न क्यों कर रहा है? वह उसे घूर क्यों रहा है? वह अपने गाँव के पुरुष के अलावा किसी अन्य को जवाब देने को विवश नहीं है। |
|
| 22360. |
निकोबार के लोग तताँरा को क्यों पसंद करते थे? |
|
Answer» निकोबार के लोग तताँरा को उसके साहसी और परोपकारी स्वभाव के कारण पसंद करते थे। वह सदैव दूसरों की सहायता करने में विश्वास रखता था और समूचे दूद्वीपवासियों की सेवा करना अपना कर्तव्य समझता था। |
|
| 22361. |
वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में क्या परिवर्तन आया? |
|
Answer» वामीरो से मिलने के बाद तताँरा के जीवन में अद्भुत परिवर्तन आया। वह वामीरो से मिलकर सम्मोहित-सा हो गया। उसके शांत जीवन में हलचल मच गई। वह स्वयं को रोमांचित अनुभव कर रहा था। वह वामीरो की प्रतीक्षा में दिन बिताने लगा। प्रतीक्षा का एक-एक पल उसे पहाड़ की तरह भारी प्रतीत होता था। वह हमेशा अनिर्णय की स्थिति में रहता था कि दामीरो उससे मिलने आएगी या नहीं अर्थात् उसके मन में आशंका-सी बनी रहती थी। |
|
| 22362. |
रूढ़ियों और परंपराओं का बंधन प्रेम की राह में बाधक नहीं बन सकता। तताँरा-वामीरो कथा के आधार पर स्पष्ट कीजिए। |
|
Answer» तताँरा पासा गाँव का सुंदर, साहसी और नेकदिल नवयुवक था और वामीरो लपाती गाँव की जो अंदमान-निकोबार द्वीप समूह का भाग है। वामीरो के गाँव की परंपरा थी कि गाँव के नवयुवक और युवतियाँ अपने ही गाँव में वैवाहिक संबंध स्थापित कर सकते थे, अन्य किसी गाँव में नहीं। एक शाम जब तताँरा शाम के समय सागर तट पर घूम रहा था तो उसने मधुर गायन सुना और उधर गया जहाँ गीत गाती वामीरो को देख वह अपनी सुध-बुध खो बैठा। तताँरा को देखकर वामीरो की भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी। वामीरो अपने गाँव की परंपरा जानती थी फिर भी दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे। वे लोगों द्वारा समझाने पर भी एक दूसरे से प्रेम करते रहे। इससे स्पष्ट होता है कि रूढ़ियों और परंपराओं का बंधन प्रेम की राह में बाधक नहीं बन सकता है। |
|
| 22363. |
‘तताँरा-वामीरो कथा’ पाठ के आधार पर तताँरा का चरित्र-चित्रण कीजिए। |
|
Answer» ‘तताँरा-वामीरो कथा’ का नायक तताँरा है जो पासा गाँव का रहने वाला है। उसके चरित्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- (क) आकर्षक व्यक्तित्व – तताँरा आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी है। वह शारीरिक रूप से बलिष्ठ, सुंदर और आकर्षक है। उसे देखते ही वामीरो प्रथम मुलाकात में उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। (ख) मानवीय गुणों से युक्त – तताँरा मानवीय गुणों से युक्त है। वह नेक, उदार, सहयोगी और परोपकारी है जो हर किसी की मदद को तत्पर रहता है। (ग) सम्मान का पात्र – तताँरा अपने व्यवहार एवं सहयोग पूर्ण स्वभाव के कारण द्वीपवासियों के सम्मान का पात्र है। उसे दूसरे गाँव के लोग भी अपने यहाँ निमंत्रित करते हैं। (घ) दैवीय शक्ति संपन्न व्यक्ति – तताँरा के पास लकड़ी की तलवार थी जो उसे अद्भुत दैवीय शक्ति का स्वामी बनाए हुए थी। इस तलवार की मदद से साहसिक और विलक्षण कार्य करता था, परंतु इसका उपयोग दूसरों का अहित करने के लिए नहीं करता था। |
|
| 22364. |
तताँरा ने अपने क्रोध के शमन के लिए क्या किया? |
|
Answer» वामीरो की माँ और गाँववालों द्वारा अपमानित होने के बाद क्रोधित हो उठा। उसे समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। उसने अपनी तलवार निकालकर धरती में पूरी शक्ति से घोंप दी और पूरी शक्ति से धरती को काटने लगा। इससे वह पसीने से लथपथ होकर निढाल हो गया और गिर पड़ा। |
|
| 22365. |
कोसी किसका नाम है? |
|
Answer» कोसी एक नदी तथा एक स्थान का नाम है। |
|
| 22366. |
तताँरा वामीरो के प्रश्न का जवाब देने के बजाए उससे एक ही आग्रह क्यों किए जा रहा था? |
|
Answer» तताँरा वामीरो के रूप सौंदर्य और मधुर गान में अपनी सुध-बुध खो बैठा था। वह सम्मोहित-सा वामीरो को देखता जा रहा था। सम्मोहन के कारण वामीरो की आवाज या कोई प्रश्न उसे ठीक से सुनाई ही नहीं दे रहा था, इसलिए वह बार-बार तुमने गाना क्यों रोक दिया? गाओ, गीत पूरा करो का आग्रह किए जा रहा था। |
|
| 22367. |
वामीरो और तताँरा अगले दिन तो मिले पर वे एक शब्द भी क्यों नहीं बोल पाए? |
|
Answer» वामीरो और तताँरा यद्यपि एक ही बार मिले थे परंतु वे दोनों एक-दूसरे को गहराई से चाहने लगे थे। अपने प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए उनके पास कोई शब्द न था। वे अपने मनोभावों को व्यक्त करने में सर्वथा असमर्थ थे, इसलिए वे मिलकर भी अपने प्रेम की मौन अभिव्यक्ति ही कर सके। |
|
| 22368. |
तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद कहाँ गया? वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए। |
|
Answer» तताँरा खूब परिश्रम करने के बाद समुद्र के किनारे टहलने गया था। संध्या का समय था। उस समय क्षितिज पर सूरज डूबने को था। ठंडी हवाएँ चल रही थीं। पक्षियों की चहचहाहट से वातावरण गूंज रहा था। सूरज की अंतिम रंग-बिरंगी किरणें, पानी में घुलकर अद्भुत स्वर्गिक सौंदर्य की रचना कर रही थीं। |
|
| 22369. |
तताँरा द्वारा पूछने पर भी वामीरो उसे कोई जवाब क्यों नहीं दे रही थी? |
|
Answer» पहली ही नज़र में तताँरा को देखते ही वामीरो विस्मित हो गई। उसके मन में कोमल भावना का संचार हो गया। घर पहुँचने पर उसे भीतर ही भीतर बेचैनी-सी महसूस होने लगी। इस बेचैनी से मुक्त होने का उसका प्रयास दिखावा मात्र था। वह झल्लाहट में दरवाजा बंद कर मन को किसी और दिशा में ले जाने का प्रयास करने लगी। |
|
| 22370. |
वामीरो तताँरा को क्यों भूलना चाहती थी ? पर वह चाहकर भी ऐसा क्यों नहीं कर पा रही थी? |
|
Answer» वामीरो को अपने गाँव की रीति का भलीभाँति ज्ञान था कि जिसके अनुसार वह अपने गाँव के अलावा किसी अन्य गाँव के युवक से वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकती हैं, इसलिए वह तताँरा को भूलना चाहती थी। वह चाहकर भी ऐसा इसलिए नहीं कर सकती थी क्योंकि तताँरा का याचना भरा चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम जाता था। |
|
| 22371. |
“और यकीन कीजिए, इसे बिलकुल ढूँढ़ना नहीं पड़ा। बैठे-बिठाये मिल गया।” लेखक ने यह किसके बारे में कहा है? |
|
Answer» लेखक ने यह बात अपने निबंध के शीर्षक के बारे में कही। लेखक अपने एक गुरुजन उपन्यासकार मित्र के साथ पान की दुकान पर खड़ा था। वहाँ एक बर्फ वाला ठेले पर बर्फ की सिल्लियाँ लाद कर लाया। बर्फ में से भाप उड़ रही थी। लेखक के मित्र अल्मोड़ा के रहने वाले थे। वे बोले-यह बर्फ तो हिमालय की शोभा है। सुनते ही लेखक ने तुरन्त अपने लेख’ का शीर्षक ‘ठेले पर हिमालय’ रख दिया। |
|
| 22372. |
“शास्त्री जी का संपूर्ण जीवन श्रम, सेवा, सादगी और समर्पण का अनुपम उदाहरण है।” |
|
Answer» शास्त्री जी कर्म को ईश्वर मानकर उसकी पूजा के रूप में श्रम करते थे। देश और समाज की सेवा में ही उन्हें जीवन की सार्थकता लगती थी। उन्हें सादा भोजन और सादा पहनावा ही पसंद था। उन्होंने जो कुछ किया पूरी निष्ठा और लगन से किया। उनकी ये विशेषताएँ बहुत कम लोगों में पाई जाती हैं। |
|
| 22373. |
सम्मोहन टूटने और होश आने के बाद तताँरा ने क्या किया? |
|
Answer» सम्मोहन टूटने और होश आने के बाद तताँरा को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह वामीरो के सामने रास्ता रोककर निवेदन भरे स्वर में कहने लगा, “मुझे माफ़ कर दो। जीवन में पहली बार मैं इस तरह विचलित हुआ हूँ। मैं तुम्हारा रास्ता छोड़ दूंगा। बस अपना नाम बता दो।” |
|
| 22374. |
वामीरो से मिलने के बाद तताँरा का अगला दिन कैसे बीता? |
|
Answer» वामीरो से मिलने के बाद तताँरा ने उससे अगले दिन भी आने की याचना की थी। वह वामीरो से बिछड़कर व्यथित था। वामीरो से मिलने की प्रतीक्षा में उसका समय काटना पहाड़ के समान भारी हो रहा था। ऐसे में उसे दिन उत्साहहीन, ठंडा, नीरस और ऊबाऊ प्रतीत हो रहा था। |
|
| 22375. |
तताँरा कौन था? ग्रामवासियों के साथ उसके संबंध कैसे थे? |
|
Answer» तताँरा अविभाजित अंदमान निकोबार द्वीप समूह के पासा गाँव का नवयुवक था, जो अपने साहसिक कारनामों और विलक्षण तलवार के लिए प्रसिद्ध था। वह अपने उदार एवं मददगार स्वभाव के लिए भी प्रसिद्ध था। |
|
| 22376. |
शास्त्री जी ने देश की किस आकांक्षा को पूरा किया? कैसे? |
|
Answer» प्रधानमंत्री के रूप में पंडित नेहरू एक समृद्ध राजनीतिक विरासत छोड़कर गए थे। उनकी मृत्यु के बाद उसे कुशलतापूर्वक सँभालकर शास्त्री जी ने देश की आकांक्षा पूरी की। शास्त्री जी का चरित्र निर्मल था। उनमें अद्भुत संकल्पशक्ति थी। राष्ट्र को लाभ पहुंचाना उनके हर कर्म का एकमात्र उद्देश्य रहता था। उनके इन्हीं गुणों के बल पर वे नेहरू जी की विरासत को सँभालने और उसे आगे बढ़ाने का कठिन काम पूरा कर सके। |
|
| 22377. |
अगर महात्मा गाँधी आपके स्वप्न में आयें तो आप उनसे कौन-कौन से प्रश्न पूछेगे? और महात्मा गाँधी क्या-क्या उत्तर देंगे? सोचिए और बताइए। |
|
Answer» अगर महात्मा गाँधी मेरे स्वप्न में आएँ तो मैं उनसे निम्नलिखित प्रश्न पूछूगा और बापू उनके निम्नलिखित उत्तर देंगे। मैं : बापूजी, सत्य क्या है? गाँधीजी : जिसका नाश कभी नहीं होता, जो अनंत और सदा भरोसेलायक है, वही सत्य है। मैं : बापूजी, क्या जीवन में पूरी तरह अहिंसक बनना संभव है? गाँधीजी : जहाँ तक हो सके वहाँ तक किसी जीव को आघात नहीं पहुँचाना चाहिए। मैं : बापूजी, आपने अपने व्यस्त जीवन में से अपनी आत्मकथा लिखने का समय कैसे निकाला? गाँधीजी : मुझे कई बार लंबी – लंबी जेलयात्राएँ करनी पड़ती थीं। उनका उपयोग मैं आत्मकथा लिखने में करता था। आत्मकथा का अधिकांश भाग जेल में ही लिखा गया। |
|
| 22378. |
निम्नलिखित मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए- (क) सुध-बुध खोना (ख) बाट जोहना (ग) खुशी का ठिकाना न रहना (घ) आग बबूला होना (ङ) आवाज़ उठाना |
|
Answer» मुहावरे – वाक्य प्रयोग (क) सुध-बुध खोना – लता मंगेशकर का मधुर गीत सुनकर कुछ श्रोता अपनी सुध-बुध खो बैठे। (ख) बाट जोहना – घर लौटने में देर होने पर सुमन मेरी बाट जोहने लगती है। (ग) खुशी का ठिकाना न रहना – बेटे के आई.ए.एस. बनने पर माँ-बाप की खुशी का ठिकाना न रहा। (घ) आग बबूला होना – रिक्शेवाले द्वारा किराया माँगते ही पुलिसवाला आग बबूला हो गया। (ङ) आवाज़ उठाना – आवाज़ उठाए बिना कभी अधिकार नहीं मिलते हैं। |
|
| 22379. |
कोसी से कौसानी जाने वाली सड़क को ‘अजगर- सी’ क्यों कहा गया है? |
|
Answer» कोसी से कौसानी जाने वाली सड़क टेड़ी-मेड़ी, ऊपर-नीचे रेंगती हुई और करीली थी। |
|
| 22380. |
“शास्त्री जी का व्यक्तित्व बापू के अधिक करीब था। |
|
Answer» गाँधीजी देश के बहुत बड़े नेता थे। फिर भी उनमें अद्भुत विनम्रता, सादगी और सरलता थी। इन गुणों ने उन्हें अधिक महान और लोकप्रिय बना दिया था। गाँधीजी के ये गुण लालबहादुर शास्त्री में भी थे। इसीलिए शास्त्री जी का व्यक्तित्व बापू से अधिक करीब था। |
|
| 22381. |
“शास्त्री जी को निष्काम कर्मयोगी कहना अधिक उचित है।” |
|
Answer» शास्त्री जी के लिए कर्म ही ईश्वर था। बिना किसी फल की आशा के वे संपूर्ण भाव से कर्म में लगे रहते थे। जब भी उन्हें अपने कर्म का फल पाने के अवसर मिले, उन्होंने उनकी उपेक्षा की। फल पाने के लालच से उन्होंने कभी कोई काम नहीं किया। शास्त्री जी के इस स्वभाव को देखते हुए उन्हें केवल ‘कर्मयोगी’ कहना पर्याप्त नहीं है। उन्हें निष्काम कर्मयोगी ही कहना अधिक उचित है। |
|
| 22382. |
कोसी तक लेखक किस प्रकार पहुँचा? उसको कोसी में क्यों उतरना पड़ा? |
|
Answer» लेखक नैनीताल से रानी खेत, मझकाली होते हुए कोसी पहुँचा। रास्ते में भयानक मोड़ थे। रास्ता बहुत कष्टपूर्ण, सूखा और कुरूप था। पहाड़ सूखे थे। रास्ते में कहीं पानी का निशान भी नहीं था। कहीं हरियाली भी नहीं थी। ढालों को काटकर बनाया गया रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा था। वहाँ से एक सड़क अल्मोड़ा तथा दूसरी कौसानी जाती थी। लेखक की बस अल्मोड़ा जा रही थी। उसको कौसानी जाना था। अत: वह कोसी उतर गया। |
|
| 22383. |
स्विटजरलैंड का आभास कौसानी में ही होता है।’ यह कथन है –(क) जवाहरलाल नेहरू का(ख) कमला नेहरू का(ग) सुभाष चन्द्र बोस का(घ) महात्मा गाँधी का। |
|
Answer» (घ) महात्मा गाँधी का। |
|
| 22384. |
समुद्र के किनारे गया तताँरा अपनी सुध-बुध क्यों खोने लगा? |
|
Answer» समुद्र के किनारे शाम का वातावरण अत्यंत मनोहारी था। समुद्र की ओर से शीतल हवा के झोंके आ रहे थे। वातावरण शांत था। ऐसे में तताँरा ने कहीं पास से आता मधुर गीत सुना। अपने पास आते इस गीत को सुनकर तताँरा अपनी सुध-बुध खोने लगा। |
|
| 22385. |
वामीरो क्यों न जान सकी कि कोई अजनबी उसे निहारे जा रहा है? |
|
Answer» वामीरो समुद्र के किनारे बैठी ढलती हुई शाम के सौंदर्य में बेसुध-सी सूर्य के आकर्षक रंग को निहार रही थी जो समुद्र के शरीर पर पड़ रहा था। वह मधुर स्वर में गीत गाए जा रही थी। वह गाने में इतनी खोई थी कि उसे अजनबी द्वारा निहारे जाने का ध्यान न आया। |
|
| 22386. |
बिलकुल ठगे गए हम लोग”- लेखक को क्यों लगा कि उसको ठगा गया है? |
|
Answer» बस कौसानी के अड्डे पर रुकी। वह एक छोटा और उजड़ा-सा गाँव था। वहाँ बर्फ का नामोनिशान भी नहीं था ! लेखक बर्फ को निकट से देखने के इरादे से कौसानी गया था। उसने कौसानी की बहुत तारीफ सुनी थी। उसके मित्रों ने उसको कश्मीर से भी सुन्दर बताया था। अत: लेखक को लगा कि उसने लोगों की बातों पर विश्वास करके गलती की। उसके अनुसार वह बुरी तरह ठगा गया था। |
|
| 22387. |
“इसी से हम भी शीर का बल हिमालय देखता है।”-यह कथन है –(क) डॉ. भारती का(ख) शुक्ल जी का(ग) चित्रकार सेन का(घ) उपन्यासकार मित्र का। |
|
Answer» (ग) चित्रकार सेन का |
|
| 22388. |
वातावरण ऐसा था उस समय कि हम लोग बहुत निकट थे।आज की स्थिति देखकर लगता है, जैसे वह सपना ही था।आज वह सपना खो गया। |
|
Answer» लेखिका व उनके भाई मनमोहन वर्मा को बचपन से ऐसे संस्कार मिले थे कि चाहे हिन्दु हो या मुस्लिम, मिल-जुलकर भाईचारे के साथ रहना चाहिए। जवारा के नवाब और लेखिका के परिवारवालों के साथ बहुत घनिष्ट संबंध था। लोग एक-दूसरे के त्यौहार आपस में मनाया करते थे। उनके भाई मनमोहन वर्मा के यहाँ भी हिन्दी और उर्दूभाषा चलती थी। वे स्वयं अपने घर में अवधी बोलते थे। हिन्दू-मुस्लिम जैसी कोई भावना उस समय के लोगों में नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद हिन्दुस्तान – पाकिस्तान के बँटवारे के साथ दोनों धर्मों के लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ गई हैं। आये दिन दोनों के बीच दंगे-फसाद होते रहते हैं। तब लेखिका को वो दिन एक सपना लगता है, जब नवाब और उनके परिवार एकसाथ मिलजुल कर रहते थे। आज वह सपना हो गया है। वह सपना कहीं खो गया है, क्योंकि पुनः इन दोनों धर्मों के लोगों में पहले की तरह सहजता नहीं आ सकती। परिवार की तरह एकजुट होकर रहने की भावना समाप्त हो गई है। |
|
| 22389. |
अनखाते हुए बस से उतरा कि जहाँ था वहीं पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रहा गया।” कौन स्तब्ध खड़ा रह गया तथा क्यों? |
|
Answer» लेखक जब कौसानी के बस-अड्डे पर बस से उतरा तो वह अत्यन्त खिन्न था। जहाँ वह बस से उतरा था, वहाँ से उसकी निगाह एक ओर पड़ी। उसने देखा कि सामने की घाटी अपार प्राकृतिक सौन्दर्य से भरी थी। पचासों मील चौड़ी इस घाटी में लाल-लाल रास्ते थे। ये गेरू की शिलाओं के काटने से बने थे। उनके किनारे सफेद थे। उसमें अनेक नदियाँ बह रही थीं। उसमें हरे-भरे खेत थे। पूरी घाटी अत्यन्त सुन्दर थी। लेखक उसे देखता ही रह गया और जहाँ था वहाँ पर ही स्तब्ध खड़ा रह गया। |
|
| 22390. |
'‘कोसी से बस चली तो रास्ते का सारा दृश्य बदल गया।” उस दृश्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए? |
|
Answer» कोसी तक का रास्ता अच्छा नहीं था। कोसी से बस चली तो रास्ते का दृश्य बदल गया, पत्थरों पर कल-कल करती हुई कोसो बह रही थी। उसके किनारे छोटे-छोटे गाँव और हरे-भरे खेत थे। सोमेश्वर की वह घाटी बहुत सुन्दर थी। मार्ग में कोसी नदी तथा उसमें गिरने वाले नदीनालों के पुल थे। एक के बाद एक बस स्टेशन, पहाड़ी, डाकखाने, चाय की दुकानें आदि भी रास्ते में मिले। कहीं-कहीं सड़क निर्जन चीड़ के जंगलों से गुजरी। सड़क टेढ़ी-मेढ़ी, ऊँची-नीची तथा केंकरीली थी। उस पर बस धीरे-धीरे चल रही थी। रास्ता सुहाना था। |
|
| 22391. |
सुध-बुध खोए तताँरा की तंद्रा कैसे टूटी? तंद्रा टूटने पर उसने क्या किया? |
|
Answer» मधुर गीत सुनकर सुध-बुध खोए तताँरा की तंद्रा तब टूटी जब लहरों के प्रबल वेग ने उसकी तंद्रा भंग की। तंद्रा टूटने और सचेत होने पर तताँरा उधर जाने को विवश हो गया जिधर से अब भी मधुर गीत की आवाज आ रही थी। |
|
| 22392. |
शास्त्री जी किसे संपूर्ण भाव से समर्पित रहते थे? |
|
Answer» शास्त्री जी कर्म को ही अपना ईश्वर मानते थे और उसीके प्रति संपूर्ण भाव से समर्पित रहते थे। |
|
| 22393. |
श्रीमती इंदिरा गाँधी शास्त्री जी को अपना राजनैतिक गुरु क्यों मानती थी? |
|
Answer» शास्त्री जी को भारतीय राजनीति की सही और गहरी जानकारी थी। इसीसे प्रभावित होकर श्रीमती इंदिरा गाँधी शास्त्री जी को अपना राजनैतिक गुरु मानती थी। |
|
| 22394. |
शास्त्री जी की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी? |
|
Answer» शास्त्री जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे एक साधारण परिवार में पैदा हुए थे और उनकी परवरिश भी साधारण परिवार में ही हुई थी। जब वे देश के प्रधानमंत्री बने तब भी वे साधारण ही बने रहे। |
|
| 22395. |
निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-सच तो यह है कि सिर्फ बर्फ को बहुत निकट से देख पाने के लिए ही हम लोग कौसानी गये थे। नैनीताल से रानीखेत और रानीखेत से मझकाली के भयानक मोड़ों को पार करते हुए कोसी । कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा चली जाती है, दूसरी कौसानी। कितना कष्टप्रद, कितना सूखी और कितना कुरूप है वह रास्ता । पानी का कहीं नाम-निशान नहीं, सूखे भूरे पहाड़, हरियाली का नाम नहीं । ढालों को काटकर बनाये हुए टेढ़े-मेढ़े खेतं, जो थोड़े से हों तो शायद अच्छे भी लगें, पर उनको एकरस सिलसिला बिल्कुल शैतान की आँत मालूम पड़ता है।(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।(3) बर्फ को पास से देखने के लिये लेखक कहाँ गया? |
|
Answer» 1.सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी गद्य’ में धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले परे हिमालय’ से लिया गया है। लेखक बर्फ को निकट से देखने के लिए कौसानी जाता है। वह रास्ते में पड़े मुख्य दृश्यों का वर्णन करता है। 2.रेखांकित अंशों की व्याख्या- लेखक बताता है कि कौसानी जाने के लिए नैनीताल से रानीखेत जाना पड़ता है। और रानीखेत से मझकाली के दुर्गम मोड़ों को पार करते हुए एक रास्ता कोसी जाता है। कोसी से एक सड़क अल्मोड़ा को जाती है और दूसरी सड़क कौसानी को जाती है। यह मार्ग अत्यन्त कष्टप्रद और दुर्गम है। मार्ग में पानी कहीं नहीं दिखायी पड़ता है। सूखे-सूखे पहाड़ दिखायी पड़ते हैं। हरे-भरे दृश्य देखने को मन तरस जाता है। ढालों को काटकर टेढ़े-मेढ़े खेत तैयार किये जाते हैं, जो देखने में अच्छे नहीं लगते हैं। 3.बर्फ को पास से देखने के लिये लेखक कौसानी गया। |
|
| 22396. |
दूसरे दिन लेखक ने किस स्थान की यात्रा की? |
|
Answer» दूसरे दिन लेखक सभी के साथ घाटी में उतरकर बारह मील दूर बैजनाथ पहुँचा। वहाँ गोमती नदी बहती थी। गोमती नदी की जलराशि अत्यन्त स्वच्छ थी। उसमें हिमालय पर्वत की बर्फ से ढंकी हुई चोटियों की छाया पड़ रही थी। लेखक ने पानी में बनी हिमालय की चोटियों को जी भरकर निहारा। वह उस दृश्य में डूबा रहा। उसने सोचा कि इन चोटियों पर कभी वह पहुँचेगा भी अथवा नहीं? |
|
| 22397. |
निम्न में समास-विग्रह कीजिए और समास का नाम भी बताइए-हिमालय, शीर्षासन, जलराशि, पर्वतमाला, तन्द्रालस, प्रसन्नवदन। |
|
Answer» हिमालय – हिम का आलय – षष्ठी तत्पुरुष समास |
|
| 22398. |
हिमालय को देखकर सबसे ज्यादा खुश कौन था? उसकी खुशी के बारे में बताइए। |
|
Answer» हिमालय को देखकर चित्रकार सेन सव्रसे ज्यादा खुश थी। वह बच्चों की तरह चंचल और चिड़ियों की तरह चहकता हुआ दिखाई दे रहा था। वह कवीन्द्र रवीन्द्र की कोई कविता गा रहा था। अकस्मात् वह शीर्षासन करने लगा। कहने लगा-‘सब जीनियस लोग शीर का बल खड़ा होकर दुनियाँ को देखता है। इसी से हम भी शीर का बल हिमालय देखता है। |
|
| 22399. |
लेखक के मन में आज भी क्या पीर उठती है? वह उसको भुलाने के लिए क्या करता है? |
|
Answer» हिमालय की उन बर्फीली चोटियों की स्मृति आज भी जब लेखक को होती है तो उसका मन एक अज्ञात पीड़ा से भर उठता है। वह उस पीड़ा से मुक्ति चाहता है तो ठेले पर लदी हुई बर्फ की सिलों को देखकर अपना मन बहला लेता है। उनको देखकर हिमालय की बर्फ की याद ताजा कर लेता है। ठेले पर हिमालय’ कहकर वह हँसता है। उसकी यह हँसी उस पीड़ा को भुलाने का बहाना है। |
|
| 22400. |
महत्त्वपूर्ण गद्यांशों की सन्दर्भ सहित व्याख्याएँ।वे बर्फ की ऊँचाइयाँ बार-बार बुलाती हैं, और हम हैं कि चौराहों पर खड़े, ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। किसी ऐसे ही क्षण में, ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने नहीं कहा था … कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो…. मैं क्या कभी ऐसे भी रह सकूँगा वास्तविक हिमशिखरों की ऊँचाइयों पर? और तब मन में आता है कि फिर हिमालय को किसी के हाथ संदेशा भेज दूँ…. नहीं बंधु… आऊँगा। मैं फिर-लौट-लौट कर वहीं आऊँगा। उन्हीं ऊँचाइयों पर तो मेरा आवास है। वहीं मन रमता है… मैं करूँ तो क्या करूँ? |
|
Answer» कठिन शब्दार्थ- बर्फ की ऊँचाइयाँ = हिमालय के बर्फ से ढके उन्नत शिखर। रहनि = जीवन। मन रमना = मन लगना। सन्दर्भ एवं प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘सृजन’ में संकलित ‘ठेले पर हिमालय’ शीर्षक यात्रा वृत्तान्त से उद्धृत है। इसके रचयिता डा. धर्मवीर भारती हैं। लेखक कहता है कि जब उसको कौसानी के हिमावृत्त शिखरों की याद आती है तो उसके मन में एक तरह की पीड़ा जन्म लेती है। एक दिन पूर्व उसके उपन्यासकार मित्र ने ठेले पर लदी बर्फ की सिलों को देखा था तो हिमालय के हिम को स्मरण करके उनका मन भी दर्द से भर उठा था। लेखक उनके मन की पीड़ा को समझता है। वह बर्फ की उन सिलों को ‘ठेले पर हिमालय’ कहकर हँसता है। उसकी यह हँसी उस दर्द को भुलाने का एक बहाना है। व्याख्या-लेखक बता रहा है कि हिमालय के बर्फ से ढंके शिखर लोगों को बार-बार बुलाते हैं। किन्तु वे वहाँ न जाकर चौराहे पर खड़े ठेले पर लदी हुई बर्फ की शिलाओं को देखकर ही प्रसन्न हो जाते हैं। कभी महाकवि तुलसीदास भी ऐसे ही ठेले पर लदे हिमालयों से घिर गए थे अर्थात् सांसारिक मोह-माया ने उनको अपने आकर्षण में जकड़ लिया था। उस समय उनसे मुक्त होने का विचार उनके मन में प्रकट हुआ था और उन्होंने प्रार्थना की थी कि वह भगवान राम की कृपा से इस मोह-माया से मुक्त जीवन जीने का अवसर पायेंगे। लेखक सोच रहा है कि क्या वह भी इसी तरह वास्तविक हिम शिखरों की ऊँचाइयों पर रह सकेगा? आशय यह है कि वह जीवन के चिरंतन सत्य को जान सकेगा? वास्तविक उन्नत जीवन की कामना से प्रेरित होकर हिमालय के पास संदेश भेजना चाहता है कि वह पुनः उसके पास आयेगा। वह हिमालय को स्वयं को आने का विश्वास दिलाता है। वह कहता है कि वह बार-बार वहीं आएगा। उसका विश्वास उन ऊँचाइयों पर ही है, उसका मन वहीं लगता है। वह अपने मन को रोकने में असमर्थ है। विशेष- |
|