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वातावरण ऐसा था उस समय कि हम लोग बहुत निकट थे।आज की स्थिति देखकर लगता है, जैसे वह सपना ही था।आज वह सपना खो गया।

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लेखिका व उनके भाई मनमोहन वर्मा को बचपन से ऐसे संस्कार मिले थे कि चाहे हिन्दु हो या मुस्लिम, मिल-जुलकर भाईचारे के साथ रहना चाहिए। जवारा के नवाब और लेखिका के परिवारवालों के साथ बहुत घनिष्ट संबंध था। लोग एक-दूसरे के त्यौहार आपस में मनाया करते थे। उनके भाई मनमोहन वर्मा के यहाँ भी हिन्दी और उर्दूभाषा चलती थी। वे स्वयं अपने घर में अवधी बोलते थे।

हिन्दू-मुस्लिम जैसी कोई भावना उस समय के लोगों में नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद हिन्दुस्तान – पाकिस्तान के बँटवारे के साथ दोनों धर्मों के लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ गई हैं। आये दिन दोनों के बीच दंगे-फसाद होते रहते हैं। तब लेखिका को वो दिन एक सपना लगता है, जब नवाब और उनके परिवार एकसाथ मिलजुल कर रहते थे। आज वह सपना हो गया है। वह सपना कहीं खो गया है, क्योंकि पुनः इन दोनों धर्मों के लोगों में पहले की तरह सहजता नहीं आ सकती। परिवार की तरह एकजुट होकर रहने की भावना समाप्त हो गई है।



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