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“शास्त्री जी को निष्काम कर्मयोगी कहना अधिक उचित है।”

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शास्त्री जी के लिए कर्म ही ईश्वर था। बिना किसी फल की आशा के वे संपूर्ण भाव से कर्म में लगे रहते थे। जब भी उन्हें अपने कर्म का फल पाने के अवसर मिले, उन्होंने उनकी उपेक्षा की। फल पाने के लालच से उन्होंने कभी कोई काम नहीं किया। शास्त्री जी के इस स्वभाव को देखते हुए उन्हें केवल ‘कर्मयोगी’ कहना पर्याप्त नहीं है। उन्हें निष्काम कर्मयोगी ही कहना अधिक उचित है।



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