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लेखक के मन में आज भी क्या पीर उठती है? वह उसको भुलाने के लिए क्या करता है?

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हिमालय की उन बर्फीली चोटियों की स्मृति आज भी जब लेखक को होती है तो उसका मन एक अज्ञात पीड़ा से भर उठता है। वह उस पीड़ा से मुक्ति चाहता है तो ठेले पर लदी हुई बर्फ की सिलों को देखकर अपना मन बहला लेता है। उनको देखकर हिमालय की बर्फ की याद ताजा कर लेता है। ठेले पर हिमालय’ कहकर वह हँसता है। उसकी यह हँसी उस पीड़ा को भुलाने का बहाना है।



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