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आजकल मनुष्य की चिन्तन शक्ति क्यों थक गई है? इससे क्या हानि होने की संभावना है? इस हानि से किस प्रकार बचा जा सकता है?

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आजकल मनुष्य की चिन्तन शक्ति थक गई है। विचारक मानसिक चिन्तन में डूबे रहते हैं। वे शारीरिक श्रम नहीं करते। इससे जीवन नीरस हो गया है। स्वप्न पुराने हो गए हैं। कविता में नयापन नहीं है। बिना मजदूरी के चिन्तन बेकार हो गया है। इस हानि से बचने के लिए शारीरिक श्रम करना चाहिए। प्रेम मजदूरी से ही इस हानि से रक्षा हो सकती है। साहित्यकारों तथा कवियों को मेहनत के काम करने होंगे तभी नया साहित्य और मौलिक कविता का जन्म होगा।



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