1.

निम्नांकित गद्यांशों में रेखांकित अंशों की सन्दर्भ सहित व्याख्या और तथ्यपरक प्रश्नों के उत्तर दीजिये-आज भी उसकी याद आती है तो मन पिरा उठता है। कल ठेले के बर्फ को देखकर मेरे मित्र उपन्यासकार जिस तरह स्मृतियों में डूब गये, उसे दर्द को समझता हूँ और जब ठेले पर हिमालय की बात कहकर हँसता हूँ तो वह उस दर्द को भुलाने का ही बहाना है। ये बर्फ की ऊँचाइयाँ बार-बार बुलाती हैं और हम हैं कि चौराहों पर खड़े ठेले पर लदकर निकलने वाली बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। किसी ऐसे क्षण में ऐसे ही ठेलों पर लदे हिमालयों से घिरकर ही तो तुलसी ने कहा था-‘कबहुँक हैं यदि रहिन रहगो’-मैं क्या कभी ऐसे भी रह सकेंगा, वास्तविक हिमशिखरों की ऊँचाइयों पर?(1) उपर्युक्त गद्यांश का संदर्भ लिखिए।(2) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।(3) किसने हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है?

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1.सन्दर्भप्रस्तुत गद्यांश धर्मवीर भारती द्वारा लिखित ‘ठेले पर हिमालय’ नामक पाठ से अवतरित है। इस अवतरण में लेखक कहता है कि मुझे बार-बार हिमालय का स्मरण आता है। हिमालय की ऊँचाइयों को देखने की इच्छा उसके मन में बार-बार उत्पन्न होती है।

2.रेखांकित अंशों की व्याख्यालेखक कहता है कि आज भी जब हिमालय की याद आती है तो मन दर्द के मारे कराह उठता है। मेरे उपन्यासकार मित्र ठेले की बर्फ को देखकर स्मृतियों में डूब जाते थे। जब हिमालय का वास्तविक दर्शन होता तो क्या स्थिति होती। मैं उनके इस दर्द को भली-भाँति समझता हूँ। बर्फ की ऊँचाइयों को देखकर ऐसा मालूम होता है जैसे वे मुझे बुला रही हैं। हम ठेले पर लदे बर्फ को ही देखकर मन बहला लेते हैं। तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की अपनी इच्छा व्यक्त की थी। उन्हें भी हिमालय की ऊँची-ऊँची शिखरों से बेहद लगाव था।

3.तुलसी ने भी हिमालय के शिखरों पर रहने की इच्छा व्यक्त की है।



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