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वहीं मन रमता है-लेखक का मन कहाँ रमता है और क्यों? क्या आप भी लेखक के समान सोचते हैं?

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लेखक का मन हिमालय की ऊँची, श्वेत, पवित्र और बर्फ से ढकी हुई चोटियों में ही रमता है। ये चोटियाँ उच्च मानवीय गुणों तथा मनोभावों की सूचक हैं। संसार की क्षुद्र बातों में पड़कर अपना जीवन नष्ट करना लेखक को उचित नहीं लगता। वह मानव जीवन के पवित्र और उच्च लक्ष्य-श्रेष्ठ मानवीय गुणों-के साथ ही अपना जीवन बिताना चाहता है। मैं भी सोचता हूँ कि मनुष्य को छोटी-छोटी अर्थहीन बातों में समय नष्ट नहीं करना चाहिए। उसको उच्च मानवीय आदर्शों के लिए स्वयं को अर्पित कर देना चाहिए।



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