This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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बड़े पैमाने पर किया गया रंगरोगान खर्च किस प्रकार का खर्च है ?(अ) राजस्व खर्च(ब) पूँजीगत खर्च(क) प्रसारित राजस्व खर्च(ड) प्रबंधकीय खर्च |
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Answer» सही विकल्प है (क) प्रसारित राजस्व खर्च |
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इनामों का वितरण कहाँ लिखा जायेगा ?(अ) उपज-खर्च खाते उधार(ब) आवक-जावक खाते उधार(क) आर्थिक चिट्ठा में इनामी फंड में से घटाया जायेगा(ड) आर्थिक चिट्ठा में इनामी फंड के विनियोग में से घटाया जायेगा । |
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Answer» सही विकल्प है (क) आर्थिक चिट्ठा में इनामी फंड में से घटाया जायेगा |
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स्थिर फंड के विनियोग पर ब्याज कहाँ लिखा जायेगा ?(अ) आर्थिक चिट्ठा में स्थिर फंड में जोड़ा जायेगा ।(ब) आर्थिक चिट्ठा में पूँजीकोष में जोड़ा जायेगा ।(क) आर्थिक चिट्ठा में स्थिर फंड के विनियोग में जोड़ा जायेगा ।(ड) उपज-खर्च खाते के जमा पक्ष में लिखा जायेगा । |
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Answer» सही विकल्प है (ड) उपज-खर्च खाते के जमा पक्ष में लिखा जायेगा । |
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सक्रिय साझेदार से आप क्या समझते हैं ? |
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Answer» सक्रिय साझेदार अर्थात् ऐसा साझेदार जो धन्धे में पूँजी लगाता है और लाभ में हिस्सा लेता है तथा धन्धे का संचालन करता है । उसे सक्रिय साझेदार कहते हैं । |
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उपज-खर्च खाते की जमा शेष क्या कहलायेगी ?(अ) उपज की खर्च की अपेक्षा वृद्धि(ब) खर्च की उपज की अपेक्षा वृद्धि(क) प्रारंभिक रोकड़/बैंक शेष(ड) अंतिम रोकड़/बैंक शेष |
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Answer» सही विकल्प है (अ) उपज की खर्च की अपेक्षा वृद्धि |
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पूँजीकृत की गई आय कहाँ लिखी जायेगी ?(अ) उपज-खर्च खाते के उधार पक्ष में(ब) उपज-खर्च खाते के जमा पक्ष में(क) आर्थिक चिट्ठा के पूँजी कोष में जोड़ा जायेगा(ड) आर्थिक चिट्ठा के पूँजीकोष में से घटाया जायेगा । |
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Answer» सही विकल्प है (क) आर्थिक चिट्ठा के पूँजी कोष में जोड़ा जायेगा |
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साझेदारी का विसर्जन कब होता है ? |
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Answer» यदि कोई साझेदार पागल हो जाये, उसकी मृत्यु हो जाये या वह दिवालिया हो जाये तो संस्था का विसर्जन हो जाता है । |
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उपज-खर्च खाते की उधार शेष को क्या कहेंगे ? |
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Answer» उपज-खर्च खाते की उधार शेष को ‘उपज की अपेक्षा खर्च की वृद्धि’ कहलायेगी । |
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सखावत यह किस प्रकार की आय गिनी जायेगी ? |
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Answer» सखावत यह पूँजीगत आय गिनी जायेगी । |
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संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:विशेष उद्देश्य के लिये फंड (Funds for Specific purpose) |
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Answer» गैरव्यापारिक संस्था को कितने ही दान या सखावत किसी विशेष निश्चित उद्देश्य के लिये प्राप्त होते है । इस प्रकार की प्राप्त दान की राशि अलग निश्चित फंड के खाते दर्शाया जाता है । जैसे : किसी अच्छे कार्य के लिये प्रमुख का सन्मान करना तय किया जाये और उसके लिये इकट्ठा किया गया फंड, कोई टुर्नामेन्ट के आयोजन में विजेता को ईनाम देने के लिये फंड । इस संबंध में जब कोई खर्च किया जाये तब उस खर्च को खर्च के रूप में उपज-खर्च खाते में दर्शाया नहीं जाता परंतु आर्थिक चिट्ठा के दायित्व पक्ष में संबंधित खर्च में से घटाया जाता है । जैसे : इनाम का खर्च आर्थिक चिट्ठा के पूँजी-दायित्व पक्ष में ईनामी फंड में से घटा दिया जायेगा । उसी प्रकार अगर फंड की राशि का निश्चित प्रकार की प्रतिभुतियों में विनियोग किया गया हो तब प्राप्त ब्याज की राशि को संबंधित फंड में जोड़ दिया जाता है । किसी विशेष परिस्थिति में अगर विशेष फंड की रकम की अपेक्षा उससे जुड़ा खर्च किया गया हो और वह अधिक हो तब अतिरिक्त राशि को राजस्व खर्च गिनकर उपज-खर्च खाते उधार किया जाता है । |
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संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:प्राप्ति-भुगतान खाता (आय-व्यय खाता) (Receipt and Payment Account) |
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Answer» प्राप्ति-भुगतान खाता (आय-व्यय खाता) (Receipt and Payment Account): गैरव्यापारिक संस्था में रोकड़ तथा बैंक के व्यवहारों को लिखने के लिये आय-व्यय खाता तैयार किया जाता है । गैरव्यापारिक संस्था में ज्यादातर नकद व्यवहार अधिक प्रमाण में होते है । गैरव्यापारिक संस्था में प्राप्त रोकड़ की आय और चकाया रोकड खर्च के आधार पर जिसे तैयार किया जाता है वह आय-व्यय खाता कहलाता है । इसका स्वरूप रोकड़ खाता जैसा है । |
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संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:उपज-खर्च खाता (Income-Expenditure Account) |
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Answer» उपज-खर्च खाता (Income-Expenditure Account) : गैरव्यापारिक संस्था में व्यापारिक संस्था के लाभ-हानि खाते जैसा ही स्वरूप उपज-खर्च प्रकार का खाता है । प्रत्येक हिसाबी वर्ष के अंत में गैरव्यापारिक संस्था का परिणाम जानने के लिये जिस खाते को तैयार किया जाता है वह उपज-खर्च खाता कहलाता है । उपज-खर्च खाते के उधार पक्ष में चालू वर्ष के राजस्व खर्च और जमा पक्ष में चालू वर्ष की राजस्व आय को दर्शाया जाता है । उपज-खर्च खाते के द्वारा संस्था के नियमित खर्च को पूरा करने के लिये पूर्ण प्रमाण में आय है या नहीं वह जाना जाता है । |
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संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:प्रसारित राजस्व खर्च (Deferred Revenue Expense) |
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Answer» व्यापार-धंधे में कितने ही खर्च इस प्रकार के होते है जिनका लाभ लंबे समय तक व्यवसाय को प्राप्त होता रहता है । वह खर्च निश्चित वर्ष में ही चुकाया गया जाता है, परंतु उसका लाभ कुछ वर्षों तक प्राप्त होता रहता है । इसलिये इन खर्चों को जिस वर्ष यह खर्च किया गया हो सिर्फ उसी वर्ष में राजस्व खर्च के रूप में अपलिखित करने के बदले उसका लाभ जितने वर्षों तक मिलने की संभावना हो या जितने वर्षों के बीच में उसे बाँटने का निर्णय किया गया हो उतने वर्ष में प्रमाणसर भाग देकर अपलिखित किया जाता है । इस खर्च को प्रसारित राजस्व खर्च के रूप में जाना जाता है । जो राशि अपलिखित की जाती है उसे उपज-खर्च खाते के उधार पक्ष में दर्शाया जाता है । तथा ऐसे खर्च का जो भाग अपलिखित न किया गया हो उसे आर्थिक चिट्ठा के संपत्ति-लेना पक्ष में सबसे अंत में दर्शाया जाता है । जैसे : विज्ञापन प्रसारित खर्च, मैदान लेवलिंग खर्च, मकान रंगरोगान खर्च । |
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वसीयत अर्थात् क्या ? उसका लेखा कहाँ किया जायेगा ? |
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Answer» वसीयत (Legacy) अर्थात् जब व्यक्ति के द्वारा वसीयतनामा तैयार कर अपनी खुद की निजी संपत्ति संस्था को वसीयत में हमेशा के लिये दी जाये । वसीयत को आर्थिक चिट्ठा के पूँजी-दायित्व पक्ष में पूँजीगत आय के रूप में पूँजीकोष में जोड़ दिया जायेगा । |
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गैरव्यापारिक संस्था में खर्च का वर्गीकरण उदाहरण सहित समझाइए । |
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Answer» खर्च का वर्गीकरण (Classification of Expenses) : गैरव्यापारिक संस्था में खर्च को तीन भागों में बाँटा जा सकता है : (1) पूँजीगत खर्च (Capital Expense) : जो खर्च संस्था में नियमित रूप से या बारंबार न किये जाते हो और जिसका लाभ संस्था को लंबे समय तक मिलता हो तथा जिसके द्वारा संस्था को स्थायी स्वरूप की संपत्ति प्राप्त होती हो उसे पूँजीगत खर्च कहते हैं । जैसे : फर्निचर. यंत्र. जमीन. मकान, लायब्रेरी की पुस्तकें, विनियोग, खेलकूद के साधन, एक्स-रे मशीन, स्वीमिंग पुल वगैरह । पूँजीगत खर्च में संपत्ति की खरीदी से संबंधित तमाम खर्च, स्थापित करने का खर्च, स्टेम्प फीस एवं दस्तावेजी खर्च सभी को पूँजीगत खर्च मानकर संपत्ति की किंमत में जोड़ दिया जाता है । प्रत्येक पूँजीगत खर्च आर्थिक चिट्ठा के संपत्ति-लेना पक्ष में दर्शाये जाते है । (2) राजख खर्च (Revenue Expense) : संस्था की रोजबरोज की प्रवृत्ति चलाने के लिये जो खर्च नियमित रूप से किये जाते हो तथा जिस खर्च का लाभ संस्था को चालू वर्ष तक ही मिलनेवाला हो उसे राजस्व खर्च के रूप में जाना जाता है । जैसे : दिन-प्रतिदिन के संचालन खर्च वेतन, भाड़ा, डाकतार, करवेरा, स्टेशनरी, छपाई खर्च, टेलीफोन खर्च, मोबाईल खर्च, मनोरंजन का कार्यक्रम खर्च, वर्तमान पत्रों का लवाजम, संपत्ति का मरम्मत खर्च, संपत्तियों की घिसाई, मैदान मरम्मत खर्च वगैरह । प्रत्येक राजस्व खर्च उपज-खर्च खाते के उधार पक्ष में बताये जाते है । (3) प्रसारित राजस्व खर्च या स्थगित राजस्व खर्च (Deferred Revenue Expense) : कुछ खर्च ऐसे होते है कि जिनकी लाभ जिस वर्ष खर्च चुकाया गया हो उस वर्ष के अलावा उसके बाद के अमुक वर्षों तक प्राप्त होता रहता है । इसलिये यह खर्च जिस वर्ष किये गये हो उस वर्ष पूरे राजस्व खर्च के रूप में अपलिखित करने के बदले अमुक वर्षों में प्रमाणसर अपलिखित किया जाता है । उसे प्रसारित राजस्व खर्च कहते हैं । ऐसे खर्चों का जो भाग अपलिखित न किया गया हो उसे अवास्तविक संपत्ति के रूप में आर्थिक चिट्ठा में संपत्ति पक्ष में अंत में दर्शाया जाता है । जैसे : बड़े पैमाने पर किया विज्ञापन अभिवृद्धि खर्च, प्राथमिक खर्च, शेयर या डिबेंचर प्रकाशित करने का खर्च या बट्टा । |
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प्राप्ति-भुगतान खाता का अर्थ समझाकर उसे तैयार करने के ध्यान में रखने योग्य मुद्दे लिखिए । |
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Answer» गैरव्यापारिक संस्था में वर्ष के दरम्यान प्राप्त रोकड़ आय और चुकाये रोकड़ खर्च का जो सारांश (तारीज) तैयार किया जाता है उसे प्राप्ति-भुगतान के रूप में जाना जाता है । यह खाता वर्ष के दौरान हुए रोकड़ व्यवहारों का सारांश है । इसका स्वरूप रोकड़ खाते की तरह होता है । प्राप्ति-भुगतान खाता तैयार करते समय ध्यान में रखने योग्य मुद्दे : (Points to be considered during preparation of Receipt-Payment Account) :
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गैरव्यापारिक संस्था के आय का वर्गीकरण उदाहरण सहित समझाइए । |
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Answer» आय का वर्गीकरण (Classification of Incomes) : संस्था की आय दो प्रकार की होती है : (1) पूँजीगत आय (Capital Income) : जो आय संस्था को नियमित रूप से या बारंबार प्राप्त न होती हो और जिस आय का लाभ संस्था को लंबे समय तक प्राप्त होता हो उसे पूँजीगत आय कहते हैं । जैसे : ली लोन, प्राप्त वसीयत, निश्चित उद्देश्य के लिये प्राप्त दान, आजीवन सदस्य शुल्क, या आजीवन चंदा वगैरह । गैरव्यापारिक संस्था में प्राप्त ऋण के अलावा की पूँजीगत आय । जैसे : दान, वसियत वगैरह पूँजीकोष में जोड़ दी जाती है । तथा इनामी फंड वगैरह आर्थिक चिट्ठा के दायित्व पक्ष में पूँजीकोष से अलग दर्शाया जाता है । प्रत्येक पूँजीगत आय आर्थिक चिट्ठा के पूँजी-दायित्व पक्ष में दर्शायी जाती है । (2) राजस्व आय (Revenue Income) : जो आय संस्था को नियमित रूप से प्राप्त होती हो और संस्था की प्रवृत्ति में से उत्पन्न होती हो वह आय राजस्व आय कहलाती है । जैसे : विनियोग पर ब्याज, मनोरंजन कार्यक्रम की आय, सदस्यों का वार्षिक शुल्क, पस्ती विक्रय, खेलकूद के मैदान के किराये की आय, लोकर्स का किराया, सरकार से प्राप्त ग्रान्ट, (सहाय या सबसिडी) वगैरह । प्रत्येक राजस्व आय को उपज-खर्च खाते के जमा पक्ष में दर्शाया जाता है । |
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साझेदारी का मुख्य उद्देश्य क्या है ? |
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Answer» साझेदारी का मुख्य उद्देश्य धन्धा करके लाभ प्राप्त करना तथा उसका वितरण करना है । |
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सहकारी समिति को किसकी प्रशिक्षण शाला कहा जाता है ?(A) सेवा की(B) समृद्धि की(C) तानाशाही की(D) लोकशाही की |
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Answer» सही विकल्प है (D) लोकशाही की |
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साझेदारी संस्था में निर्णय किस तरह लिए जा सकते है ? |
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Answer» साझेदारी संस्था में निर्णय लेते समय सम्बन्धित बात पर आवश्यक चर्चा-विचारणा होती है । प्रत्येक साझेदार का मंतव्य जानने के बाद में धन्धे के हित में सर्व सहमति से निर्णय लिया जाता है । |
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सामान्य साझेदारी में अधिक से अधिक कितने सदस्य हो सकते है ?(A) 10(B) 20(C) 30(D) 50 |
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Answer» सही विकल्प है (B) 20 |
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सहकारी समिति में पैसे की अपेक्षा मनुष्य को अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है । |
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Answer» यह विधान सही है । सहकारी समिति में पैसे का वर्चस्व कम किया जाता है । प्रति व्यक्ति एक मत, डिविडेन्ड की मर्यादा वगैरह के द्वारा पैसे का वर्चस्व घटाकर व्यक्ति के गौरव को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है । सभी सदस्यों को समान माना जाता है और उच्च नैतिक मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है । इस तरह, सहकारी समिति में पैसे की अपेक्षा मनुष्य को अधिक महत्त्व दिया जाता है । |
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धन्धाकीय साहस का सबसे प्राचीन व सरल स्वरूप कौन-सा है ?(A) व्यक्तिगत मालिकी(B) साझेदारी संस्था(C) सहकारी समिति(D) कम्पनी स्वरूप |
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Answer» सही विकल्प है (A) व्यक्तिगत मालिकी |
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साझेदारी संस्था में अधिक से अधिक कितने साझेदार हो सकते हैं ? |
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Answer» बैंकिंग धन्धा करनेवाली संस्था में अधिक से अधिक दस और अन्य किसी भी व्यवस्था में अधिक से अधिक बीस साझेदार हो सकते है । |
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कम्पनी को आर्थिक विकास का इन्जिन किसलिए कहा जाता है ? |
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Answer» कम्पनी स्वरूप के विकास से व्यापार-उद्योग का तेजी से विकास हुआ है । इस प्रकार कम्पनी को आर्थिक विकास के इन्जिन के रूप में पहचाना जाता है । |
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सदस्यों के आर्थिक उत्कर्ष के लिए सेवा को महत्त्व देते है ……………………….(A) व्यक्तिगत मालिकी(B) निजी कम्पनी(C) सार्वजनिक कम्पनी(D) सहकारी समिति |
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Answer» सही विकल्प है (D) सहकारी समिति |
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सहकारी समिति पूँजीवादी व्यवस्था के दोषों को दूर करता है । |
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Answer» यह विधान सही है । सहकारी समिति में आय की असमानता, संपत्ति का केन्द्रीकरण, एकाधिकार, जमाखोरी, कालाबाजार, तस्करी, व्याजखोरी, कृत्रिम तंगी उत्पन्न करना, वर्गभेद वगैरह पूँजीवाद के दूषणों को दूर करने का प्रयास करती है। |
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स्थापक धंधादारी साहस का सर्जक है । |
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Answer» यह विधान सही है । जॉइन्ट स्टॉक कम्पनी वास्तव में एक कानूनन कृत्रिम व्यक्ति है । कम्पनी जीवन्त व्यक्ति न होने के कारण अपने आप अस्तित्व में नहीं आती है । उसकी स्थापना या रचना विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा की जाती है । धंधादारी साहस की स्थापना करनेवाले व्यक्तियों को स्थापक कहते हैं । वे लाभकारक अवसरों की जाँच करके उसे मूर्तिमंत करने का कार्य करते हैं । |
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कम्पनी में पूँजी प्राप्ति हेतु आम जनता को दिया जानेवाला आमंत्रण अर्थात् …………………….(A) आवेदन-पत्र(B) नियमन-पत्र(C) टेबल ‘अ’(D) विज्ञापन-पत्र |
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Answer» सही विकल्प है (D) विज्ञापन-पत्र |
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साझेदारी संस्था के धन्धे में परिवर्तनशीलता अधिक है । |
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Answer» साझेदारी एक स्थितिस्थापक व्यवस्था है । व्यक्तिगत मालिकी की तरह साझेदारी में भी परिवर्तनशीलता का लाभ देखने को मिलता है । समयानुसार धंधे की नीति में या धन्धे में परिवर्तन करने की साझेदारी में छूट है । धन्धा लाभदायक न लगे तो साझेदारों की संमति से उसमें परिवर्तन किया जा सकता है । इसलिए साझेदारी संस्था के धन्धे में परिवर्तनशीलता अधिक है । |
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प्रवर्तक आर्थिक जगत के फरिश्ते हैं । |
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Answer» प्रवर्तक (Promoter) का कम्पनी की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, क्योंकि प्रवर्तक कम्पनी की स्थापना की पूर्व तैयारी से लगाकर कम्पनी का पंजीयन (रजिस्ट्रेशन) हो तब तक की विधि अपने नाम से करता है, इस हेतु पूर्व-तैयारी, जाँच-पड़ताल, विशेषज्ञों से सलाह, धन्धे का प्रकार, लाभ की संभावना, धन्धे का स्थल, आवश्यक पूँजी, पूँजी के प्राप्ति-स्थान इत्यादि पर विचार करता है । इस हेतु आवश्यक सामग्री, जमीन, मकान, यंत्र-सामग्री, कच्चा माल, औजार, मजदूर इत्यादि प्राप्त करते हैं । आवश्यक दस्तावेज निष्णातों से तैयार करवाते हैं व कम्पनी का पंजीयन करवाते हैं । ये सब निजी जिम्मेदारी स्वीकार करके करते हैं । इस प्रकार प्रवर्तक कम्पनी की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते है, इसलिए प्रवर्तक आर्थिक जगत के फरिश्ते माने जाते हैं । |
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कौन-सी धारा से कंपनी का कार्य-क्षेत्र निश्चित होता है ? |
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Answer» उद्देश्य की धारा से कंपनी का कार्य-क्षेत्र निश्चित होता है । |
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Where do the quantitative and qualitative changes occur? |
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Answer» Quantitative and qualitative changes are characteristics of economic development. During economic development, ‘output’ which is a quantitative change increases. Due to research and innovation, the quality of the products which is a qualitative aspect also improves. However, it should be noted that there is more of qualitative improvement rather than quantitative. |
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Meaning of Economic Development |
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Answer» Meaning of Economic Development:
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गरीब एवं मध्यम वर्ग के व्यक्तियों के लिये सहकारी समिति एक आशीर्वाद है । |
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Answer» यह विधान सही है । सहकारी समिति गरीब और मध्यम वर्ग के मनुष्यों को उनकी आवश्यकता के लिए स्वावलंबी बनाते हैं । उन्हें मालिक या मध्यस्थी या दलालों के शोषण में से मुक्त किया जाता है, शुद्ध और ऊँची गुणवत्तावाली जीवन-आवश्यकता की वस्तुएँ और सेवाएँ योग्य भाव से प्रस्तुत करती है, बचत की भावना खिलती है और उनकी आर्थिक स्थिति सुधरती है । इसलिये गरीब एवं मध्यम वर्ग के व्यक्तियों के लिये सहकारी समिति आशीर्वाद स्वरूप है । |
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कम्पनी की स्थापना अर्थात् स्थापक की मानस-संतान । (Promotion is the brain child of the promoters) |
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Answer» यह विधान सही है । जब से स्थापकों के मन में कम्पनी की स्थापना का विचार आये तब से वैचारिक दृष्टि से कम्पनी का जन्म हो गया ऐसा कहेंगे । स्थापक अपनी कल्पना-शक्ति, धन्धाकीय सूझ और योग्यता के द्वारा नये धंधे की खोज करके, उसकी जाँच करके, आवश्यक पूँजी साधन-सामग्री और मानव-शक्ति एकत्र करके धंधे की स्थापना करते हैं । इसलिए ऐसा कहा जाता है कि कम्पनी की स्थापना अर्थात् स्थापक की मानस-संतान । |
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साझेदारी संस्था के पंजीकरण से होनेवाले लाभ-हानि बताइए । |
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Answer» साझेदारी संस्था के पंजीकरण से लाभ :
साझेदारी संस्था पंजीकृत नहीं कराने से होनेवाली हानियाँ :
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संयुक्त हिन्दू परिवार के धन्धे का संचालन किसके द्वारा होता है ?(A) मालिक(B) कर्ता(C) प्रबन्धक(D) साझेदार |
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Answer» सही विकल्प है (B) कर्ता |
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संयुक्त हिन्दू परिवार की सदस्यता कैसे प्राप्त होती है ? |
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Answer» परिवार में जन्म लेनेवाला पुरुष व्यक्ति अपने आप संयुक्त हिन्दू परिवार का सदस्य बन जाता है । इसका सदस्य-पद जन्म से प्राप्त होता है। |
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संयुक्त हिन्दू परिवार संस्था में कर्ता कौन होता है ? उसके अन्य सदस्यों की जिम्मेदारी कैसी होती है ? |
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Answer» संयुक्त हिन्दू परिवार में परिवार का सबसे बड़ी उम्र का सदस्य उसका कर्ता होता है । उसके अन्य सदस्यों की जिम्मेदारी उसके दायित्व तक सीमित रहती है । |
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प्रवर्तक अथवा प्रवर्तकों के कार्य (Function of Promoters). |
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Answer» जस्टिस सी. काकबर्न के अनुसार प्रवर्तक की परिभाषा : “प्रवर्तक वह व्यक्ति है, जो किसी निश्चित उद्देश्य के सन्दर्भ में कम्पनी का निर्माण करने तथा उसे चालू करने का दायित्व अपने ऊपर लेता है और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु आवश्यक कार्य करता है ।” प्रवर्तक कम्पनी की स्थापना का विचार करते हैं । कम्पनी की स्थापना के लिए पूर्व तैयारी करते हैं । कम्पनी के किसी-भी कार्य के लिए निजी जिम्मेदारी से रजिस्ट्रेशन की विधि तक स्वयं के नाम से करते हैं । वे धन्धे के प्रकार, धन्धे का स्थल, धन्धे का आकार, पूँजी की आवश्यकता, पूँजी के प्राप्ति-स्थान एवं विशेषज्ञों की सलाह इत्यादि पर विचार करते हैं एवं करार करते हैं । |
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साझेदारी के प्रकार बताकर प्रत्येक पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए । |
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Answer» सामान्य रूप से प्रत्येक साझेदार धन्धे में पूँजी लगाता है, संचालन में हिस्सा लेता है तथा लाभ में भी हिस्सा प्राप्त करता है । कितनी बार साझेदार धन्धे में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं तो कितनी ही बार निष्क्रिय रहकर सिर्फ धन्धे के लाभ में ही भाग लेने में रस रखते हैं । इस तरह, साझेदारों के हित की कक्षा अलग-अलग होती है । साझेदारों के कार्य, गुण और अधिकार के आधार पर | उसके निम्नलिखित प्रकार किये गये हैं : (1) सक्रिय साझेदार (Active Partner) : जो साझेदार पेढ़ी में पूँजी लगाता है, लाभ-हानि को भोगता है और पेढ़ी के संचालन में सक्रिय हिस्सा लेता है उसे सक्रिय साझेदार कहा जाता है । ऐसे साझेदारों की जिम्मेदारी अमर्यादित होती है । इससे पेढ़ी के नुकसान या ऋण के लिये उसे ही जिम्मेदार माना जाता है । आवश्यकता पड़ने पर उसे अपनी निजी मिल्कतों को बेचकर भी ऋण चुकता करना पड़ता है । (2) निष्क्रिय साझेदार (Sleeping or Inactive Partner) : जो साझेदार दूसरे साझेदारों की तरह पेढ़ी में पूँजी लगाते हैं, लाभहानि को भी भोगते हैं, परंतु पेढ़ी के संचालन में सक्रिय भाग नहीं लेते, उन्हें निष्क्रिय या सुषुप्त साझेदार कहते हैं । ऐसे साझेदारों का दायित्व असीमित होता है । (3) नाममात्र का साझेदार (Nominal Partner) : जो साझेदार पेढ़ी में पूँजी नहीं लगाते, लाभ-हानि नहीं भोगते तथा पेढ़ी के संचालन में भी भाग नहीं लेते, परंतु पेढ़ी को शान प्राप्त हो इस तरह सिर्फ खुद का नाम ही पेढ़ी को देते हैं, उन्हें नाममात्र का साझेदार कहा जाता है । ऐसे साझेदारों का दायित्व भी असीमित होता है । नयी पेढ़ी के लिये ऐसा साझेदार उपयोगी है । वह पेढ़ी के संचालन के साथ सीधे नहीं परंतु अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रहता है । वह पेढ़ी के नुकसान के लिये अन्य साझेदारों की तरह ही जिम्मेदार गिना जाता है । पेढ़ी के संचालन पर उसका परोक्ष काबू होता है । (4) मात्र लाभ का साझेदार : जो व्यक्ति पेढ़ी के धन्धे में पूँजी लगाये या न लगाये परंतु सिर्फ पेढ़ी के लाभ में ही भाग ले, हानि में नहीं, उसे मात्र लाभ का साझेदार कहते हैं । पेढ़ी के मैनेजर या खास कुशलतावाले कर्मचारी को इस तरह से साझेदार बनाया जा सकता है । (5) मानद साझेदार : अगर कोई व्यक्ति अपनी वाणी, आचरण या लिखावट से खुद पेढ़ी का साझेदार है ऐसा दिखावा करे और उसके आधार पर कोई त्राहित व्यक्ति पेढ़ी को ऋण प्रदान करे तो वह दिखावा करनेवाला व्यक्ति इस ऋण के लिये मानद साझेदार मान कर जिम्मेदार कहलायेगा । वह पेढ़ी में करार नहीं करता, संचालन में भाग नहीं लेता या लाभ में हिस्सा भी प्राप्त नहीं करता । (6) अवयस्क साझेदार : नाबालिग व्यक्ति करार करने में समर्थ नहीं होता । अर्थात् वह साझेदार नहीं बन सकता, परंतु उसे साझेदारी के लाभ के लिये पेढ़ी में शामिल किया जा सकता है । मृत्यु प्राप्त साझेदार के अवयस्क बालक को इस तरह से साझेदारी में शामिल किया जा सकता है । इस तरह उसे पेढ़ी के लाभ में हिस्सा देने के लिये पेढ़ी में शामिल किया जाता है । ऐसे व्यक्ति की निजी मिल्कियत पेढी के ऋण के लिये जिम्मेदार नहीं रहती । ऐसा व्यक्ति अवयस्क साझेदार नहीं कहलाता । हालांकि वयस्क होने पर छ: मास के भीतर अगर उसकी इच्छा हो तो साझेदार बनना पसंद कर सकता है । अगर उसे साझेदार के रूप में न रहना हो तो वयस्क होने पर छ: मास के अंदर |
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What are the various indicators of Economic development? |
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Answer» Various indicators of Economic development:
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Definitions of Economic Development. |
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Answer» Definitions of Economic Development:
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what are the Indicators of Development. |
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Answer» 1. Growth Rate of National Income 2. Growth Rate of Per Capita Income 3. Physical Quality of Life – PQL 4. Human Development Index – HDI Other indicators of Economic Development:
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पंजीकृत कराने से आप क्या समझते हैं ? साझेदारी संस्था में पंजीकृत कराने की विधि समझाइए । |
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Answer» भारत में साझेदारी पेढ़ी का पंजीकृत कराने की शुरूआत 1932 के भागीदारी कानून के तहत हुई है । इस कानून के अनुसार साझेदारी संस्था को पंजीकृत कराना अनिवार्य नहीं, परंतु ऐच्छिक है । अगर पेढ़ी पंजीकृत न की गई हो तो उससे होनेवाली हानि को सहने की बजाय पंजीकृत करवाकर उसके लाभ प्राप्त करना हितावह है । 1932 के भारतीय साझेदारी कानून के अंतर्गत कोई भी साझेदारी पेढ़ी उस विस्तार के रजिस्ट्रार से पंजीकृत करवाई जा सकती है । यह रजिस्ट्रार राज्य सरकार के द्वारा साझेदारी संस्था को दर्ज करने के लिये नियुक्त किया गया अधिकारी है । पेढ़ी को पंजीकृत करवाने के लिए एक निश्चित पत्रक में निम्न विवरण जरूरी फीस के साथ रजिस्ट्रार को भेजना पड़ता है :
इस पत्रक पर सभी साझेदारों के हस्ताक्षर होना चाहिए । रजिस्ट्रार उपरोक्त पत्रक मिलने पर उसकी जाँच कर साझेदारी पेढ़ी को पंजीकृत करता है । |
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सहकारी समिति का अर्थ एवं लाभ समझाइए । |
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Answer» सहकारी समिति के लाभ : सहकारी मंडली व्यापार-व्यवस्था के स्वरूप में लोकप्रिय है । उसके लाभ निम्नलिखित हैं : (1) आर्थिक शोषण में से मुक्ति : सहकारी मंडली अपने सदस्यों का आर्थिक शोषण रोककर उनका आर्थिक हित सिद्ध करती है । इसमें आर्थिक रूप से निर्बल व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के शोषण से मुक्ति प्राप्त करने के लिये तथा खुद के आर्थिक हित की रक्षा के लिये एकत्रित होते हैं । (2) स्थापना की सरलता : कंपनी की तुलना में उसकी स्थापना प्रमाण में सरल है । सहकारी मंडली के लिये उपनियम छपे हुए तैयार ही होते हैं उसमें आवश्यक परिवर्तन करके मंडली का रजिस्ट्रेशन करवाया जा सकता है । इसके अलावा स्थापना का खर्च भी कंपनी के प्रमाण में कम है, कारण कि उसकी शेयरपूँजी के लिये दलाली वगैरह के खर्च नहीं करने पड़ते । हालांकि व्यक्तिगत मालिकी या साझेदारी की तरह स्थापना का कार्य यहाँ सरल नहीं है । परंतु उसे कोर्पोरेट संस्थाओं के जो लाभ मिलते हैं, उसे देखते हुए यह खर्च अधिक नहीं है । (3) कायमी अस्तित्व : सहकारी मंडली का अस्तित्व उसके सदस्यों की अपेक्षा अलग होने से सदस्य की मृत्यु, दिवालियेपन या पागलपन से मंडली के अस्तित्व पर कोई असर नहीं होता । इस बारे में सहकारी मंडली की स्थिति कंपनी जैसी ही है । (4) अलग व्यक्तित्व : सहकारी समिति कानून की दृष्टि से एक अलग व्यक्ति है । उसके सदस्यों से उसका अस्तित्व अलग है । इससे मंडली खुद के नाम पर संपत्ति एकत्रित कर सकती है, खुद के नाम से दावा कर सकती है और कोर्पोरेट संस्था को मिलनेवाले सभी लाभों को प्राप्त कर सकती है । (5) लोकशाही संचालन : सहकारी मंडली का संचालन सैद्धांतिक रूप से ही नहीं, परंतु व्यवहार भी लोकशाही ढंग से चलता है । एक तो उसमें प्रत्येक सदस्य को एक ही मत देने का अधिकार है, फिर भले ही किसी भी सदस्य के पास एक ही शेयर हो । इस तरह पूँजी को नहीं, परंतु मनुष्य को महत्त्व दिया जाता है तथा एक ही समूह, वर्ग या गाँव के व्यक्ति सदस्य होने से बड़े प्रमाण में सभा में हाजिर रह सकते हैं और चर्चा कर सकते हैं । (6) मध्यस्थी दूर : सामान्य रूप से माल के उत्पादक और उसके ग्राहकों के बीच अनेक मध्यस्थ सेवा देते हैं । परंतु सहकारी संस्था में ऐसे मध्यस्थ (बिचौलिये) दूर होने से ग्राहकों को सस्ती और अच्छी गुणवत्ता का माल या सेवा प्राप्त होते हैं । (7) बचतपूर्ण संचालन : सहकारी समिति में संचालन खर्च प्रमाण में कम होता है । उसके कुछ कारण हैं : एक, उसके ज्यादातर कार्यकर मानद् सेवा देते हैं, इससे खर्च बचता है । दूसरे, उसके सदस्य भी उसकी प्रवृत्ति को सहायता प्रदान करते हैं, इससे विज्ञापन-खर्च भी कम होता है । (8) सरकारी मदद : सामान्य रूप से सहकारी समिति आर्थिक रूप से निर्बल व्यक्तियों का मंडल होने से सरकार उसे अनेक प्रकार से सहायता देती है । जैसे- उसके शेयर सरकार खरीदती है, उसे लोन देती है, उसके कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देती है । उसके संचालकों को मार्गदर्शन भी देती है तथा कितनी बातों में क्रय-विक्रय में भी उसे पसंदगी देती है । जैसे – अंकुशित वस्तुओं का विक्रय करने में सरकार सहकारी ग्राहक भंडार को पसंदगी देती है । (9) विनियोग सुरक्षित : सहकारी समिति में सदस्यों का विनियोग सामान्य रूप से सुरक्षित रहता है । इसका कारण यह है कि सहकारी समिति के सदस्यों की शेयर पूँजी या उसके अन्य हित पर कोई दावा चल नहीं सकता । इसके साथ ही खूब ज्यादा नहीं, परंतु उचित डिविडेंड मिलता है । (10) कर-बोझ कम : कंपनी की तुलना में सहकारी समिति पर कर-बोझ कम रहता है । (11) विकास के लिये रकम की सुविधा : सहकारी समिति अपना सभी लाभ सदस्यों के बीच डिविडेंड के रूप में बाँट नहीं सकती, परंतु उसमें कानून के अनुसार अनिवार्य रूप से कुछ निश्चित प्रतिशत रकम अनामत खाते ले जानी पड़ती है । इस तरह, मंडली को खुद की रकम में से ही विकास के लिये पूर्ण रकम प्राप्त हो जाती है । इस अनामत-कोष का उपयोग दवाखाना, पाठशाला, बाग-बगीचे वगैरह सामाजिक प्रवृत्तियों के पीछे किया जाता है । (12) बिनआर्थिक लाभ : सहकारी समिति के सदस्यों में स्वाश्रय, सहकार और भाईचारे का विकास करने में उपयोगी है । इस तरह समाज में सहकार की भावना विकसित होती है । इसके उपरांत सहकारी मंडली समाज-कल्याण, शिक्षण वगैरह के लिये अलग फंड रखती है जो समाज के लिये लाभदायी है । |
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साझेदारी संस्था (Partership firm) के लाभ समझाइए । |
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Answer» साझेदारी संस्था के लाभ (Merits of Partnership) निम्नानुसार हैं : (1) स्थापना की सरलता : साझेदारी पेढ़ी की स्थापना का कार्य सरल बिनखर्चीली है । इसके लिए कोई कानून की विधि नहीं करनी पड़ती या किसी की मंजूरी नहीं प्राप्त करनी होती । साझेदार खुद की सरलता के लिये जो करार करे वही अस्तित्व में आता है । कानून के अनुसार साझेदारी पेढ़ी का पंजीकरण भी अनिवार्य नहीं है । जितनी सरलता से उसे स्थापित किया जा सकता है उतनी ही सरलता से उसका परिवर्तन या विसर्जन किया जा सकता है । (2) अधिक पूँजी की सुविधा : व्यक्तिगत मालिकी की तुलना में साझेदारी में अधिक पूँजी प्राप्त होगी यह स्वाभाविक है । कारण कि एक की अपेक्षा अधिक व्यक्तियों के साधन तो विशाल होंगे ही । भविष्य में धंधे का विकास होने पर जब अधिक पूँजी की आवश्यकता पड़े तब नये साझेदारों को शामिल कर अधिक पूँजी प्राप्त की जा सकती है और साझेदारों से लोन भी ली जा सकती है । (3) कार्यक्षमता की उच्च गुणवत्ता : साझेदारी में प्रत्येक साझेदार अपनी कार्यक्षमता बढ़ाने का प्रयत्न करता है । इसका कारण यह है कि संचालन में उसके सक्रिय हिस्से और बदले के साथ सीधा संबंध है । प्रत्येक भागीदार की अमर्यादित जिम्मेदारी के कारण साहसवृत्ति पर अंकुश रहता है, तथा प्रत्येक साझेदार मितव्ययिता पूर्ण संचालन करने के लिये प्रेरित होता है । (4) कार्यक्षम व्यवस्थातंत्र : साझेदारी में कार्यक्षम व्यवस्थातंत्र की रचना सरलता से की जा सकती है । जो व्यक्ति जिस कार्य को करने के लिये अधिक लायक हो उसे ही वह कार्य सौंपा जा सकता है । इस तरह, धंधे में श्रम-विभाजन और विशिष्टीकरण का उपयोग कर कार्यक्षमता में वृद्धि की जा सकती है । (5) परिपक्व और त्वरित निर्णय : व्यक्तिगत मालिकी में व्यापारी अकेला होने से कई बार भूल से भरे हुए निर्णय ले लेता है, जबकि साझेदारी में सभी साझेदार एकत्रित होकर चर्चा-विचारणा कर निर्णय करने से यह निर्णय समझदारीपूर्वक और परिपक्व होता है, क्योंकि सभी साझेदारों के बुद्धि, कौशल और अनुभव का वह परिणाम होता है । (6) धंधे में आसान परिवर्तन : साझेदारी एक स्थितिस्थापक व्यवस्था है । व्यक्तिगत मालिकी की तरह साझेदारी में भी परिवर्तनक्षमता का लाभ देखने को मिलता है । समयानुसार धंधे की नीति में या धंधे में परिवर्तन करने की साझेदारों को छूट है । धंधा लाभदायक न लगे तो साझेदारों की संमति से उसमें परिवर्तन किया जा सकता है । (7) अधिक शाख प्राप्त करने की संभावना : साझेदारों की अधिक संख्या और प्रत्येक की जिम्मेदारी अमर्यादित होने से व्यापारी वर्ग पेढ़ी को उधार माल देने या ऋण देने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं । लेनदार अपना कर्ज चाहे किसी भी साझेदार से उसकी निजी मिलकत में से वसूल कर सकता है । अर्थात् कम ब्याज पर अधिक रकम पेढ़ी को प्राप्त हो सकती है तथा लंबे समय के लिये व्यापारी उधार माल का विक्रय भी कर सकते हैं । (8) रहस्यों की गुप्तता : साझेदारी में धंधे का रहस्य गुप्त रखा जा सकता है, क्योंकि साझेदारों के द्वारा लिये गये निर्णय घोषित नहीं करने होते या पेढ़ी को हिसाब घोषित नहीं करने होते । जब तक साझेदारों के बीच एकता, सहकार और विश्वास का वातावरण होता है तब तक धन्धे के रहस्यों को गुप्त रखा जा सकता है । हालांकि व्यक्तिगत मालिकी में जितनी गुप्तता रहती है उतनी साझेदारी पेढ़ी में नहीं रहती । (9) आयकर में राहत : साझेदारी में धन्धे की आय सभी साझेदारों के बीच वितरित हो जाने से प्रमाण में निम्न दर से आयकर भरना पड़ता है । भारत में आयकर कानून में 1992 में हुए सुधार के अनुसार अब यह राहत मिलनी बंद हो गयी है । पेढ़ी की आय इन्कमटैक्स के उद्देश्य के लिये साझेदारों के बीच वितरित नहीं की जाती । परंतु उस पर अलग रूप से महत्तम दर पर आयकर भरना पड़ता है । अर्थात् जब आयकर की दृष्टि से साझेदारी पेढ़ी और जोइन्ट स्टॉक कंपनी में कोई अंतर नहीं रहा । (10) जोखिम का बँटवारा : साझेदारी में दो या अधिक साझेदार होने से जोखिम और जिम्मेदारी सबके बीच वितरित हो जाती है । इससे अधिक जोखिमवाले या शाखवाले धन्धे के लिये साझेदारी अधिक अनुकूल है । (11) आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण : साझेदारी संस्था में कम पूँजी से दो या दो से अधिक व्यक्ति शामिल होते हैं व छोटे पैमाने पर धन्धा करके लाभ को आपस में बाँटते हैं । जिससे किसी निश्चित व्यक्ति या संस्था के पास आर्थिक सत्ता केन्द्रित नहीं रहती । (12) ग्राहकों के साथ ज्वलंत संपर्क : साझेदारी संस्था में ग्राहकों एवं कर्मचारियों की संख्या अन्य बड़ी-बड़ी इकाइयों की अपेक्षा सीमित होती है, परिणामस्वरूप मालिक द्वारा ग्राहकों एवं कर्मचारियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क कर उनकी समस्याएँ, उनकी मांग एवं निराकरण आसानी से किया जाता है, जिससे कर्मचारी व ग्राहक संतुष्ट रहते हैं । |
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कम्पनी के प्रकार समझाइए । |
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Answer» (A) विशेष कानून द्वारा सर्जित कम्पनी (Statutory Company) : ऐसी कम्पनी की स्थापना संसद या विधानसभा के विशेष कानून द्वारा अस्तित्व में आती है । जैसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) इत्यादि । (B) सदस्य संख्या की दृष्टि से (From the view point of Number of member) : (I) सार्वजनिक कम्पनी (Public Company) : भारतीय कम्पनी अधिनियम के अनुसार जो कम्पनी निजी कम्पनी नहीं है वह सार्वजनिक कम्पनी है । जिसमें कम से कम 7 सदस्य अनिवार्य है । अधिक से अधिक संख्या पर कोई नियंत्रण नहीं । ऐसी कम्पनी अपने अंश (share) और ऋण-पत्र खरीदने के लिए आमजनता को आमंत्रण दे सकती है । अंश के परिवर्तन पर कोई नियंत्रण नहीं होता । सार्वजनिक कम्पनी के सदस्यों का दायित्व की दृष्टि से तीन प्रकार है ।
(II) निजी कम्पनी (Private Company) : निजी कम्पनी अर्थात् ऐसी कम्पनी कि जिसमें सदस्यों की संख्या कम से कम 2 और अधिक से अधिक 200 तक होते है । निजी कम्पनी शेयर-परिवर्तन पर नियंत्रण होता है । आम जनता को अंश व ऋण-पत्र क्रय हेतु आमंत्रण नहीं दे सकती । निजी कम्पनी के सदस्यों का दायित्व की दृष्टि से तीन प्रकार है ।
(III) एक व्यक्ति की कम्पनी (One person Company) : अर्थात् ऐसी कम्पनी कि जिसमें एक व्यक्ति सदस्य के रूप में हो । एक व्यक्ति की (निजी) कम्पनी, कम्पनी में संचालक हो ऐसे एक सदस्य के रूप में करार कर सकती है । एक व्यक्ति की कम्पनी में ऐसे व्यक्ति की लिखित सहमति अनिवार्य होती है । इसके अलावा कम्पनी के रजिस्ट्रेशन के समय आवेदन-पत्र व नियमन-पत्र कम्पनी रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता है । एक व्यक्ति की कम्पनी की रचना की व्यवस्था 1956 की कम्पनी कानून में नहीं थी, लेकिन सन् 2013 के कम्पनी कानून के अनुसार निजी कम्पनी एक व्यक्ति की कम्पनी हो सकती है । (C) वर्चस्व की दृष्टि से (From the view point of Domination) : (I) सरकारी कम्पनी (Government Company) : ऐसी कम्पनी जिसमें भरपाई की हुई पूँजी में कम से कम 51% पूँजी
(II) शासक कम्पनी (Holding Company) : कोई एक कम्पनी दूसरी कम्पनी के 50 प्रतिशत से अधिक शेयर धारण करती हो और कम्पनी के बहमती संचालकों को नियुक्त करने का अधिकार रखती हो तो उन्हें शासक कम्पनी कहते हैं । (III) गौण/सहायक कम्पनी (Subsidiary Company) : अर्थात् ऐसी कम्पनी कि जिसमें किसी कम्पनी के (1).50% से अधिक शेयर शासक कम्पनी कम्पनी के पास में हो व (2) जिस कम्पनी के बहुमति संचालकों को नियुक्त करने का अधिकार शासक कम्पनी का हो तो गौण कम्पनी कहलाती है । (D) पंजियन की दृष्टि से (From the view point of place of Registration) : (I) भारतीय कम्पनी (Indian Company) : जिस कम्पनी का पंजियन भारत में, भारतीय कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत या संसद अथवा विधानसभा में विशेष कानून द्वारा हुई हो ऐसी कम्पनी को भारतीय कम्पनी कहते हैं । ऐसी कम्पनी में सार्वजनिक कम्पनी, निजी कम्पनी या सरकारी कम्पनी हो सकती है । (II) विदेशी कम्पनी (Foreign Company) : जिस कम्पनी का पंजियन भारत के बाहर हुआ हो, जिनका रजिस्टर्ड कार्यालय भारत में न हो और जिनके धन्धे का स्थल भारत में हो तो उन्हें विदेशी कम्पनी कहते हैं । |
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संयुक्त हिन्दू परिवार हिन्दू अविभाजित परिवार का अर्थ एवं लक्षण स्पष्ट कीजिए । |
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Answer» अर्थ : हिन्दू अधिनियम के अनुसार धन्धा वंश परम्परागत है । वारिसदार के रूप में प्राप्त धन्धा अविभाजित हिन्दू परिवार को संयुक्त हिन्दू परिवार (JHF – Joint Hindu Family) अथवा हिन्दू अविभाजित परिवार HUF – Hindu Undivided Family) की संस्था कहा जाता है । परिवार के पुरुष सदस्य इसके सदस्य कहलाते है । ऐसी संस्था का संचालन परिवार के बड़े-बुजुर्ग करते है, जिसे कर्ता कहा जाता है । यदि परिवार में सबसे बड़े व्यक्ति संचालन करना न चाहे तो उनके बाद के व्यक्ति को संचालन सौंपा जाता है । ऐसी संस्थाओं का अस्तित्व भारत व नेपाल में देखने को मिलता है । लक्षण :
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