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साझेदारी संस्था (Partership firm) के लाभ समझाइए । |
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Answer» साझेदारी संस्था के लाभ (Merits of Partnership) निम्नानुसार हैं : (1) स्थापना की सरलता : साझेदारी पेढ़ी की स्थापना का कार्य सरल बिनखर्चीली है । इसके लिए कोई कानून की विधि नहीं करनी पड़ती या किसी की मंजूरी नहीं प्राप्त करनी होती । साझेदार खुद की सरलता के लिये जो करार करे वही अस्तित्व में आता है । कानून के अनुसार साझेदारी पेढ़ी का पंजीकरण भी अनिवार्य नहीं है । जितनी सरलता से उसे स्थापित किया जा सकता है उतनी ही सरलता से उसका परिवर्तन या विसर्जन किया जा सकता है । (2) अधिक पूँजी की सुविधा : व्यक्तिगत मालिकी की तुलना में साझेदारी में अधिक पूँजी प्राप्त होगी यह स्वाभाविक है । कारण कि एक की अपेक्षा अधिक व्यक्तियों के साधन तो विशाल होंगे ही । भविष्य में धंधे का विकास होने पर जब अधिक पूँजी की आवश्यकता पड़े तब नये साझेदारों को शामिल कर अधिक पूँजी प्राप्त की जा सकती है और साझेदारों से लोन भी ली जा सकती है । (3) कार्यक्षमता की उच्च गुणवत्ता : साझेदारी में प्रत्येक साझेदार अपनी कार्यक्षमता बढ़ाने का प्रयत्न करता है । इसका कारण यह है कि संचालन में उसके सक्रिय हिस्से और बदले के साथ सीधा संबंध है । प्रत्येक भागीदार की अमर्यादित जिम्मेदारी के कारण साहसवृत्ति पर अंकुश रहता है, तथा प्रत्येक साझेदार मितव्ययिता पूर्ण संचालन करने के लिये प्रेरित होता है । (4) कार्यक्षम व्यवस्थातंत्र : साझेदारी में कार्यक्षम व्यवस्थातंत्र की रचना सरलता से की जा सकती है । जो व्यक्ति जिस कार्य को करने के लिये अधिक लायक हो उसे ही वह कार्य सौंपा जा सकता है । इस तरह, धंधे में श्रम-विभाजन और विशिष्टीकरण का उपयोग कर कार्यक्षमता में वृद्धि की जा सकती है । (5) परिपक्व और त्वरित निर्णय : व्यक्तिगत मालिकी में व्यापारी अकेला होने से कई बार भूल से भरे हुए निर्णय ले लेता है, जबकि साझेदारी में सभी साझेदार एकत्रित होकर चर्चा-विचारणा कर निर्णय करने से यह निर्णय समझदारीपूर्वक और परिपक्व होता है, क्योंकि सभी साझेदारों के बुद्धि, कौशल और अनुभव का वह परिणाम होता है । (6) धंधे में आसान परिवर्तन : साझेदारी एक स्थितिस्थापक व्यवस्था है । व्यक्तिगत मालिकी की तरह साझेदारी में भी परिवर्तनक्षमता का लाभ देखने को मिलता है । समयानुसार धंधे की नीति में या धंधे में परिवर्तन करने की साझेदारों को छूट है । धंधा लाभदायक न लगे तो साझेदारों की संमति से उसमें परिवर्तन किया जा सकता है । (7) अधिक शाख प्राप्त करने की संभावना : साझेदारों की अधिक संख्या और प्रत्येक की जिम्मेदारी अमर्यादित होने से व्यापारी वर्ग पेढ़ी को उधार माल देने या ऋण देने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं । लेनदार अपना कर्ज चाहे किसी भी साझेदार से उसकी निजी मिलकत में से वसूल कर सकता है । अर्थात् कम ब्याज पर अधिक रकम पेढ़ी को प्राप्त हो सकती है तथा लंबे समय के लिये व्यापारी उधार माल का विक्रय भी कर सकते हैं । (8) रहस्यों की गुप्तता : साझेदारी में धंधे का रहस्य गुप्त रखा जा सकता है, क्योंकि साझेदारों के द्वारा लिये गये निर्णय घोषित नहीं करने होते या पेढ़ी को हिसाब घोषित नहीं करने होते । जब तक साझेदारों के बीच एकता, सहकार और विश्वास का वातावरण होता है तब तक धन्धे के रहस्यों को गुप्त रखा जा सकता है । हालांकि व्यक्तिगत मालिकी में जितनी गुप्तता रहती है उतनी साझेदारी पेढ़ी में नहीं रहती । (9) आयकर में राहत : साझेदारी में धन्धे की आय सभी साझेदारों के बीच वितरित हो जाने से प्रमाण में निम्न दर से आयकर भरना पड़ता है । भारत में आयकर कानून में 1992 में हुए सुधार के अनुसार अब यह राहत मिलनी बंद हो गयी है । पेढ़ी की आय इन्कमटैक्स के उद्देश्य के लिये साझेदारों के बीच वितरित नहीं की जाती । परंतु उस पर अलग रूप से महत्तम दर पर आयकर भरना पड़ता है । अर्थात् जब आयकर की दृष्टि से साझेदारी पेढ़ी और जोइन्ट स्टॉक कंपनी में कोई अंतर नहीं रहा । (10) जोखिम का बँटवारा : साझेदारी में दो या अधिक साझेदार होने से जोखिम और जिम्मेदारी सबके बीच वितरित हो जाती है । इससे अधिक जोखिमवाले या शाखवाले धन्धे के लिये साझेदारी अधिक अनुकूल है । (11) आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण : साझेदारी संस्था में कम पूँजी से दो या दो से अधिक व्यक्ति शामिल होते हैं व छोटे पैमाने पर धन्धा करके लाभ को आपस में बाँटते हैं । जिससे किसी निश्चित व्यक्ति या संस्था के पास आर्थिक सत्ता केन्द्रित नहीं रहती । (12) ग्राहकों के साथ ज्वलंत संपर्क : साझेदारी संस्था में ग्राहकों एवं कर्मचारियों की संख्या अन्य बड़ी-बड़ी इकाइयों की अपेक्षा सीमित होती है, परिणामस्वरूप मालिक द्वारा ग्राहकों एवं कर्मचारियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क कर उनकी समस्याएँ, उनकी मांग एवं निराकरण आसानी से किया जाता है, जिससे कर्मचारी व ग्राहक संतुष्ट रहते हैं । |
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