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कम्पनी के प्रकार समझाइए ।

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(A) विशेष कानून द्वारा सर्जित कम्पनी (Statutory Company) :

ऐसी कम्पनी की स्थापना संसद या विधानसभा के विशेष कानून द्वारा अस्तित्व में आती है । जैसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) इत्यादि ।

(B) सदस्य संख्या की दृष्टि से (From the view point of Number of member) :

(I) सार्वजनिक कम्पनी (Public Company) : भारतीय कम्पनी अधिनियम के अनुसार जो कम्पनी निजी कम्पनी नहीं है वह सार्वजनिक कम्पनी है । जिसमें कम से कम 7 सदस्य अनिवार्य है । अधिक से अधिक संख्या पर कोई नियंत्रण नहीं । ऐसी कम्पनी अपने अंश (share) और ऋण-पत्र खरीदने के लिए आमजनता को आमंत्रण दे सकती है । अंश के परिवर्तन पर कोई नियंत्रण नहीं होता । सार्वजनिक कम्पनी के सदस्यों का दायित्व की दृष्टि से तीन प्रकार है ।

  • अंश (share) पूँजी से सीमित दायित्ववाली कम्पनी : कम्पनी के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा कम्पनी के क्रय किये गए शेयर की दार्शनिक मूल्य तक ही सीमित होती है । ऐसी कम्पनी को अपने नाम के अन्त में ‘लिमिटेड’ (Limited) शब्द लगाना पड़ता है।
  • गारन्टी द्वारा सीमित दायित्ववाली कम्पनी : कम्पनी के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा दी गई गारन्टी तक सीमित होता है । कम्पनी के विसर्जन के समय दी गई गारन्टी जितनी रकम चुकानी पड़ती है ।
  • असीमित दायित्ववाली कम्पनी : ऐसी कम्पनी के सदस्यों का दायित्व असीमित होता है । यदि कम्पनी की सम्पत्तियों की अपेक्षाकृत ऋण बढ़ जाये तो सदस्य व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माने जाते है । कम्पनी के विसर्जन के समय में सदस्यों को अपनी निजी सम्पत्तियों में से हिस्सा देना पड़ता है ।

(II) निजी कम्पनी (Private Company) : निजी कम्पनी अर्थात् ऐसी कम्पनी कि जिसमें सदस्यों की संख्या कम से कम 2 और अधिक से अधिक 200 तक होते है । निजी कम्पनी शेयर-परिवर्तन पर नियंत्रण होता है । आम जनता को अंश व ऋण-पत्र क्रय हेतु आमंत्रण नहीं दे सकती । निजी कम्पनी के सदस्यों का दायित्व की दृष्टि से तीन प्रकार है ।

  • सीमित दायित्ववाली कम्पनी : इसमें सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा क्रय किये गए अंश की दार्शनिक कीमत तक ही सीमित होता है । सीमित दायित्ववाली निजी कम्पनी को अपने नाम के अन्त में ‘प्राईवेट लिमिटेड’ (Private Limited) शब्द लगाना पड़ता है ।
  • गारन्टी द्वारा सीमित दायित्ववाली कम्पनी : कम्पनी के सदस्यों का दायित्व उनके द्वारा दी गई गारन्टी की रकम तक सीमित होता है । कम्पनी के विसर्जन के दौरान सदस्यों द्वारा दी गई गारन्टी की रकम चुकानी पड़ती है । कम्पनी को अपने नाम के अन्त में प्राईवेट . (Private) शब्द लिखना पड़ता है ।
  • असीमित दायित्ववाली कम्पनी : कम्पनी के सदस्यों का दायित्व असीमित होता है । कम्पनी की सम्पत्तियों की अपेक्षाकृत ऋण/ उधार बढ़ जाने की स्थिति में सदस्य व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होते है । कम्पनी के विसर्जन के दौरान-सदस्यों को अपनी निजी/व्यक्तिगत सम्पत्तियों में से हिस्सा देना पड़ता है । ऐसी कम्पनी को अपने नाम के अन्त में ‘प्राईवेट’ (Private) शब्द लिखना पड़ता है ।

(III) एक व्यक्ति की कम्पनी (One person Company) : अर्थात् ऐसी कम्पनी कि जिसमें एक व्यक्ति सदस्य के रूप में हो । एक व्यक्ति की (निजी) कम्पनी, कम्पनी में संचालक हो ऐसे एक सदस्य के रूप में करार कर सकती है । एक व्यक्ति की कम्पनी में ऐसे व्यक्ति की लिखित सहमति अनिवार्य होती है । इसके अलावा कम्पनी के रजिस्ट्रेशन के समय आवेदन-पत्र व नियमन-पत्र कम्पनी रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ता है । एक व्यक्ति की कम्पनी की रचना की व्यवस्था 1956 की कम्पनी कानून में नहीं थी, लेकिन सन् 2013 के कम्पनी कानून के अनुसार निजी कम्पनी एक व्यक्ति की कम्पनी हो सकती है ।

(C) वर्चस्व की दृष्टि से (From the view point of Domination) :

(I) सरकारी कम्पनी (Government Company) : ऐसी कम्पनी जिसमें भरपाई की हुई पूँजी में कम से कम 51% पूँजी

  1. केन्द्र सरकार अथवा
  2. राज्य सरकार अथवा
  3. एक से अधिक राज्य सरकारों अथवा
  4. केन्द्र सरकार और एक या एक से अधिक राज्य सरकारों के साथ मिलकर पूँजी लगाई हो तो उन्हें सरकारी कम्पनी कहते हैं । जैसे अशोक होटल लिमिटेड, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL), महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (MTNL) ।

(II) शासक कम्पनी (Holding Company) : कोई एक कम्पनी दूसरी कम्पनी के 50 प्रतिशत से अधिक शेयर धारण करती हो और कम्पनी के बहमती संचालकों को नियुक्त करने का अधिकार रखती हो तो उन्हें शासक कम्पनी कहते हैं ।

(III) गौण/सहायक कम्पनी (Subsidiary Company) : अर्थात् ऐसी कम्पनी कि जिसमें किसी कम्पनी के (1).50% से अधिक शेयर शासक कम्पनी कम्पनी के पास में हो व (2) जिस कम्पनी के बहुमति संचालकों को नियुक्त करने का अधिकार शासक कम्पनी का हो तो गौण कम्पनी कहलाती है ।

(D) पंजियन की दृष्टि से (From the view point of place of Registration) :

(I) भारतीय कम्पनी (Indian Company) : जिस कम्पनी का पंजियन भारत में, भारतीय कम्पनी अधिनियम के अन्तर्गत या संसद अथवा विधानसभा में विशेष कानून द्वारा हुई हो ऐसी कम्पनी को भारतीय कम्पनी कहते हैं । ऐसी कम्पनी में सार्वजनिक कम्पनी, निजी कम्पनी या सरकारी कम्पनी हो सकती है ।

(II) विदेशी कम्पनी (Foreign Company) : जिस कम्पनी का पंजियन भारत के बाहर हुआ हो, जिनका रजिस्टर्ड कार्यालय भारत में न हो और जिनके धन्धे का स्थल भारत में हो तो उन्हें विदेशी कम्पनी कहते हैं ।



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