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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

बहुल कार्यपालिका का एक लक्षण बताइए।

Answer»

इस व्यवस्था में कार्यकारिणी सम्बन्धी शक्तियाँ एक व्यक्ति के हाथों में निहित न होकर अनेक व्यक्तियों की एक परिषद् अथवा अनेक अधिकारियों के समूह में निहित होती हैं।

2.

शक्ति-पृथक्करण के सिद्धान्त का प्रतिपादक कौन था?

Answer»

मॉण्टेस्क्यू शक्ति-पृथक्करण सिद्धान्त का प्रतिपादक व समर्थक है।

3.

‘न्यायिक सक्रियतावाद’ से क्या आशय है?या‘न्यायिक सक्रियतावाद’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

Answer»

न्यायिक सक्रियतावाद का आशय है- “संविधान, कानून और अपने दायित्वों के प्रसंग में कानूनी व्याख्या से आगे बढ़कर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और सामाजिक-आर्थिक न्याय की आवश्यकता को दृष्टि में रखते हुए संविधान और कानून की रचनात्मक व्याख्या करते हुए न्यायपालिका का जनसाधारण के हितों की रक्षा के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना।”

न्यायिक सक्रियतावाद के विविध रूप और मान्यताएँ इस प्रकार हैं-
⦁    जनहितकारी अभियोगों को मान्यता।
⦁    कानूनी-न्याय के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक न्याय पर बल।
⦁    न्यायपालिका को शासन की स्वेच्छाचारिता पर नियन्त्रण का अधिकार है।
⦁    न्यायपालिका शासन को आवश्यक निर्देश दे सकती है।

न्यायिक सक्रियतावाद के आधार पर न्यायपालिका ने सम्बद्ध देशों की समस्त राजव्यवस्था में बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण स्थिति प्राप्त कर ली है।
न्यायपालिका द्वारा अपनाई गई न्यायिक सक्रियतावाद की यह स्थिति बहुत अधिक विवाद का विषय बनी हुई है। आलोचकों का कहना है कि न्यायपालिका ‘न्यायिक सक्रियतावाद’ के आधार पर ‘व्यवस्थापिका के तीसरे सदन’ की भूमिका निभाने की चेष्टा कर रही है। कुछ अन्य इसे एक तरह की न्यायिक तानाशाही’ कहते हैं। ये आलोचनाएँ अतिशयोक्तिपूर्ण होते हुए भी इनमें ‘सत्य के अंश हो सकते हैं, लेकिन स्थिति का दूसरा पक्ष यह है कि जब केन्द्रीय और राज्य स्तर की विधायी और कार्यपालिका संस्थाएँ अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं रहीं, तब न्यायपालिका ने परिस्थितियों से प्रेरित और बाध्य होकर ही न्यायिक सक्रियता की स्थिति को अपनाया है। इस प्रकार आज की स्थिति के लिए स्वयं न्यायपालिका उत्तरदायी नहीं है। न्यायपालिका ने अपनी इस भूमिका के आधार पर जनता में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास को बनाए रखा है और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों के प्रहरी की भूमिका निभाई है।
न्यायिक सक्रियता के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी यह मानना होगा कि न्यायिक सक्रियता मात्र एक अस्थायी स्थिति ही हो सकती हैं। एक ऐसी लक्ष्मण रेखा अंकित करने की आवश्यकता है जिससे न्यायपालिका व्यवस्थापिका या कार्यपालिका के दायित्वों को न हथिया ले।’

4.

सरकार के शक्ति-विभाजन की उपयोगिता बताइए।

Answer»

इसमें नागरिक निरंकुश नहीं हो पाता तथा शासन में सुगमता व कार्यकुशलता की वृद्धि होती है।

5.

व्यवस्थापिका का महत्त्व लिखिए।

Answer»

व्यवस्थापिका का महत्त्व
सरकार के सभी अंगों में व्यवस्थापिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। गार्नर के अनुसार-“राज्य की इच्छा जिन अंगों द्वारा व्यक्त होती है, उनमें व्यवस्थापिका का स्थान नि:सन्देह सर्वोच्च है।” गिलक्रिस्ट का कथन है—“व्यवस्थापिका शक्ति का अधिक भाग है।” वास्तव में व्यवस्थापिका यदि अपने कार्यों को सम्पादित न करे, तो कार्यपालिका और न्यायपालिका भी अपना दायित्व पूरा नहीं कर सकती हैं। व्यवस्थापिका केवल कानूनों का निर्माण ही नहीं करती है, वरन् प्रशासन से सम्बन्धित नीतियों का निर्धारण भी करती है तथा कार्यपालिका की शक्ति पर भी नियन्त्रण स्थापित करती है। संसदात्मक शासन प्रणाली में व्यवस्थापिका के कार्यों में अधिक वृद्धि हो जाती है।

6.

न्यायपालिका के दो कार्यों का उल्लेख कीजिए तथा स्वतन्त्र न्यायपालिका के पक्ष में दो तर्क प्रस्तुत कीजिए।यालोकतन्त्रात्मक शासन में स्वतन्त्र न्यायपालिका की आवश्यकता एवं महत्ता पर प्रकाश डालिए। 

Answer»

किसी लोकतन्त्रात्मक शासन में एक स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका सर्वथा अनिवार्य है। इसे आधुनिक और प्रगतिशील संविधानों एवं शासन-व्यवस्था का प्रमुख लक्षण माना जाता है। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के महत्त्व को निम्नलिखित रूपों में प्रकट किया जा सकता है।

1. लोकतन्त्र की रक्षा हेतु – लोकतन्त्र के अनिवार्य तत्त्व स्वतन्त्रता और समानता हैं। नागरिकों की स्वतन्त्रता और कानून की दृष्टि से व्यक्तियों की समानता—इन दो उद्देश्यों की प्राप्ति स्वतन्त्र न्यायपालिका द्वारा ही सम्भव है। इस दृष्टि से स्वतन्त्र न्यायपालिका को ‘लोकतन्त्र का प्राण’ कहा जाता है।
2. संविधान की रक्षा हेतु – आधुनिक युग के राज्यों में संविधान की सर्वोच्चता का विचार प्रचलित है। संविधान की रक्षा का दायित्व न्यायपालिका का होता है। न्यायपालिका द्वारा इस दायित्व का भली-भाँति निर्वाह उस समय ही सम्भव है, जब न्यायपालिका स्वतन्त्र और निष्पक्ष हो। स्वतन्त्र न्यायपालिका संविधान की धाराओं की स्पष्ट व्याख्या करती है तथा व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका के उन कार्यों को जो संविधान के विरुद्ध होते हैं, अवैध घोषित कर देती है। इस प्रकार स्वतन्त्र न्यायपालिका संविधान की रक्षा करती है।
3. न्याय की रक्षा हेतु – न्यायपालिका का प्रथम और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य न्याय करना है। न्यायपालिका यह कार्य तभी ठीक प्रकार से कर सकती है, जबकि वह निष्पक्ष और स्वतन्त्र हो तथा व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के प्रभाव से पूर्ण रूप से मुक्त हो।
4. नागरिक अधिकारों की रक्षा हेतु – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का महत्त्व अन्य कारणों की अपेक्षा नागरिक अधिकारों की रक्षा की दृष्टि से अधिक है। इसके लिए न्यायपालिका का स्वतन्त्र और निष्पक्ष होना अत्यन्त आवश्यक है।

न्यायपालिका के दो कार्य न्यायपालिका के दो कार्य निम्नलिखित हैं-
1. कानूनों की व्याख्या करना – कानूनों की भाषा सदैव स्पष्ट नहीं होती है और अनेक बार कानूनों की भाषा के सम्बन्ध में अनेक प्रकार के विवाद उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार की प्रत्येक परिस्थिति में कानूनों की अधिकारपूर्ण व्याख्या करने का कार्य न्यायपालिका ही करती है। न्यायालयों द्वारा की गयी इस प्रकार की व्याख्याओं की स्थिति कानून के समान ही होती है।
2. लेख जारी करना  – सामान्य नागरिकों या सरकारी अधिकारियों के द्वारा जब अनुचित या अपने अधिकार-क्षेत्र के बाहर कोई कार्य किया जाता है तो न्यायालय उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए विविध प्रकार के लेख जारी करता है। इस प्रकार के लेखों में बन्दी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश और प्रतिषेध आदि लेख प्रमुख हैं।

7.

व्यवस्थापिका के चार कार्य बताइए। या व्यवस्थापिका के दो कार्य बताइए।

Answer»

⦁    कानूनों का निर्माण करना,
⦁    संविधान में संशोधन करना,
⦁    कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखना तथा
⦁    वित्तीय कार्य करना।

8.

एक सदनात्मक व्यवस्थापिका के दो लाभ स्पष्ट कीजिए।याएक-सदनात्मक व्यवस्थापिका के दो गुण बताइए।या“एक-सदनात्मक व्यवस्थापिका में जहाँ धन व समय की बचत होती है वहीं कार्य में गतिरोध भी कम आता है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।

Answer»

एक-सदनात्मक व्यवस्थापिका वाले देशों में व्यवस्थापन-कार्य में धन और समय की पर्याप्त बचत हो जाती है, क्योंकि एक ही सदन होने से विधेयक को दूसरे सदन में भेजने की आवश्यकता नहीं रह जाती। इससे दूसरे सदन में होने वाली समय और धन की बर्बादी को रोका जा सकता है। लॉर्ड ब्राइस के शब्दों में, “यदि द्वितीय सदन प्रथम सदन का विरोध करता है तो अहितकर है और यदि वह उसके साथ सहयोग करता है तो अनावश्यक है।

9.

द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका के पक्ष में दो तर्क दीजिए।

Answer»

⦁    द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका में द्वितीय सदन प्रथम सदन की निरंकुशता पर रोक लगाता है।
⦁    द्वि-सदनात्मक व्यवस्थापिका के कार्य में परिपक्वता उत्पन्न होती है।

10.

भारत में राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है?

Answer»

भारत में राष्ट्रपति का चुनाव जनता द्वारा अप्रत्यक्ष तरीके से किया जाता है। एक निर्वाचन मण्डल के सदस्य राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं।

11.

स्वतन्त्र न्यायपालिका के दो गुणों का उल्लेख कीजिए। 

Answer»

⦁    निष्पक्ष न्याय की प्राप्ति तथा
⦁    नागरिकों की स्वतन्त्रता एवं अधिकारों की रक्षा।

12.

एक-सदनीय व्यवस्थापिका के दो दोष बताइए।

Answer»

⦁    सदन के निरंकुश होने की आशंका तथा
⦁    राज्यों के उचित प्रतिनिधित्व का अभाव।

13.

द्वि-सदनात्मक विधानमण्डल (व्यवस्थापिका) की दो मुख्य विशेषताएँ बताइए।

Answer»

⦁    इस व्यवस्था में दोनों सदन एक-दूसरे पर नियन्त्रण रखते हैं।
⦁    इस व्यवस्था में अल्पसंख्यकों तथा विशिष्ट हित को भी समुचित प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है।

14.

द्वि-सदनीय व्यवस्थापिका के दो दोष लिखिए।

Answer»

⦁    दोनों सदनों के बीच प्रायः टकराव की सम्भावना बनी रहती है।
⦁    राज्य के व्यय में वृद्धि हो जाती है।

15.

द्वि-सदनीय व्यवस्थापिका के दो लाभ बताइए।

Answer»

⦁    प्रथम सदन की निरंकुशता पर नियन्त्रण तथा
⦁    स्वतन्त्रता की रक्षा का उत्तम साधन।

16.

अध्यक्षात्मक शासन में राष्ट्रपति विधि-निर्माण को कैसे प्रभावित कर सकता है?

Answer»

अध्यक्षात्मक शासन में राष्ट्रपति व्यवस्थापिका को सन्देश भेजकर और ‘विलम्ब निषेधाधिकार का प्रयोग करके सीमित रूप से विधि-निर्माण को प्रभावित कर सकता है।

17.

न्यायपालिका के दो कार्य बताइए।

Answer»

न्यायपालिका के दो कार्य हैं-

⦁    कानूनों की व्याख्या करना तथा निर्णय देना एवं
⦁    मौलिक अधिकारों की रक्षा करना।

18.

एक-सदनीय व्यवस्थापिका के दो गुण बताइए।

Answer»

⦁    प्रबल उत्तरदायित्व की भावना तथा
⦁    समय और धन की बचत।

19.

न्यायपालिका के कार्यों का वर्णन कीजिए। याआधुनिक काल में न्यायपालिका के कार्यों में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हो गई है।” इस कथन के आलोक में न्यायपालिका के कार्यों का वर्णन कीजिए। याआधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में न्यायपालिका के कार्यों की समीक्षा कीजिए।यान्यायपालिका की स्वतन्त्रता क्यों आवश्यक है? इसकी स्वतन्त्रता बनाए रखने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? याआधुनिक लोकतन्त्र में स्वतन्त्र न्यायपालिका का क्या महत्त्व है? न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए? याआधुनिक राज्य में न्यायपालिका के कार्यों एवं उसकी बढ़ती हुई महत्ता की व्याख्या कीजिए। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को बनाए रखने हेतु क्या व्यवस्था की जानी चाहिए? याआधुनिक लोकतान्त्रिक राज्यों में न्यायपालिका के कार्यों तथा स्वतन्त्र न्यायपालिका के महत्त्व का वर्णन कीजिए। 

Answer»

न्यायपालिका के कार्य
आधुनिक लोकतन्त्रात्मक प्रणाली में न्यायपालिका को मुख्यत: निम्नलिखित कार्य करने पड़ते है-
1. न्याय करना – न्यायपालिका का मुख्य कार्य न्याय करना है। कार्यपालिका कानून का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को पकड़कर न्यायपालिका के समक्ष प्रस्तुत करती है। न्यायपालिका उन समस्त मुकदमों को सुनती है जो उसके सामने आते हैं तथा उन पर अपना न्यायपूर्ण निर्णय देती है।
2. कानूनों की व्याख्या करना – न्यायपालिका विधानमण्डल में बनाये हुए कानूनों की व्याख्या के साथ-साथ उन कानूनों की व्याख्या भी करती है जो स्पष्ट नहीं होते। न्यायपालिका के द्वारा की गयी कानून की व्याख्या अन्तिम होती है और कोई भी व्यक्ति उस व्याख्या को मानने से इन्कार नहीं कर सकता।
3. कानूनों का निर्माण – साधारणतया कानून निर्माण का कार्य विधानमण्डल करता है, परन्तु कई दशाओं में न्यायपालिका भी कानूनों का निर्माण करती है। कानून की व्याख्या करते समय न्यायाधीश कानून के कई नये अर्थों को जन्म देते हैं, जिससे कानूनों का स्वरूप ही बदल जाता है और एक नये कानून का निर्माण हो जाता है। कई बार न्यायपालिका के सामने ऐसे मुकदमे भी आते हैं, जहाँ उपलब्ध कानूनों के आधार पर निर्णय नहीं किया जा सकता। ऐसे समय पर न्यायाधीश न्याय के नियमों, निष्पक्षता तथा ईमानदारी के आधार पर निर्णय करते हैं। यही निर्णय भविष्य में कानून बन जाते हैं।
4. संविधान का संरक्षण – संविधान की सर्वोच्चता को बनाये रखने का उत्तरदायित्व न्यायपालिका पर होता है। यदि व्यवस्थापिका कोई ऐसा कानून बनाये, जो संविधान की धाराओं के विरुद्ध हो तो न्यायपालिका उस कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। न्यायपालिका की इस शक्ति को न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) का नाम दिया गया है। संविधान की व्याख्या करने का अधिकार भी न्यायपालिका को प्राप्त होता है। इसी प्रकार न्यायपालिका संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती है।
5. संघ का संरक्षण – जिन देशों ने संघात्मक शासन-प्रणाली को अपनाया है, वहाँ न्यायपालिका संघ के संरक्षक के रूप में भी कार्य करती है। संघात्मक शासन-प्रणाली में कई बार केन्द्र तथा राज्यों के मध्य विभिन्न प्रकार के मतभेद उत्पन्न हो जाते हैं, इनका निर्णय न्यायपालिका द्वारा ही किया जाता है। न्यायपालिका का यह कार्य है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि केन्द्र राज्यों के कार्य में हस्तक्षेप न करे और न ही राज्य केन्द्र के कार्यों में।
6. नागरिक अधिकारों का संरक्षण – लोकतन्त्र को जीवित रखने के लिए नागरिकों की स्वतन्त्रता और अधिकारों की सुरक्षा अत्यन्त आवश्यक है। यदि इनकी सुरक्षा नहीं की जाती तो कार्यपालिका निरंकुश और तानाशाह बन सकती है। नागरिकों की स्वतन्त्रता तथा अधिकारों की सुरक्षा न्यायपालिका द्वारा की जाती है। अनेक राज्यों में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की व्यवस्था का संविधान में उल्लेख कर दिया गया है जिससे उन्हें संविधान और न्यायपालिका को संरक्षण प्राप्त हो सके। इस प्रकार न्यायपालिका का विशेष उत्तरदायित्व होता है कि वह सदैव यह दृष्टि में रखे कि सरकार का कोई अंग इन अधिकारों का अतिक्रमण न कर सके।
7. परामर्श देना – कई देशों में न्यायपालिका कानून सम्बन्धी परामर्श भी देती है। भारत में राष्ट्रपति किसी भी विषय पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श ले सकता है, परन्तु इस सलाह को मानना या न मानना राष्ट्रपति पर निर्भर है।
8. प्रशासनिक कार्य – कई देशों में न्यायालयों को प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते हैं। भारत में उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय तथा अधीनस्थ न्यायालयों पर प्रशासकीय नियन्त्रण रहता है।
9. आज्ञा-पत्र जारी करना – न्यायपालिका जनता को आदेश दे सकती है कि वे अमुक कार्य नहीं कर सकते और यह किसी कार्य को करवा भी सकती है। यदि वे कार्य न किये जाएँ तो न्यायालय बिना अभियोग चलाये दण्ड दे सकता है अथवा मानहानि का अभियोग लगाकर जुर्माना आदि भी कर सकता है।
10. कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड के कार्य – न्यायपालिका कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड का भी कार्य करती है, जिसका अर्थ है कि न्यायपालिका को भी सभी मुकदमों के निर्णयों तथा सरकार को दिये गये परामर्शो का रिकॉर्ड भी रखना पड़ता है। इन निर्णयों तथा परामर्शों की प्रतियाँ किसी भी समय प्राप्त की जा सकती हैं।

न्यायपालिका का महत्त्व
व्यक्ति एक विचारशील प्राणी है और इसके साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति के अपने कुछ विशेष स्वार्थ भी होते हैं। व्यक्ति के विचारों और उसके स्वार्थों में इस प्रकार के भेद होने के कारण उनमें परस्पर संघर्ष नितान्त स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त शासन-कार्य करते हुए शासक वर्ग ‘अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर सकता है। ऐसी स्थिति में सदैव ही एक ऐसी सत्ता की आवश्यकता रहती है जो व्यक्तियों के पारस्परिक विवादों को हल कर सके और शासक वर्ग को अपनी सीमाओं में रहने के लिए बाध्य कर सके। इन कार्यों को करने वाली सत्ता का नाम ही न्यायपालिका है।
राज्य के आदिकाल से लेकर आज तक किसी-न-किसी रूप में न्याय विभाग का अस्तित्व सदैव ही रहा है और सामान्य जनता के दृष्टिकोण से न्यायिक कार्य का सम्पादन सर्वाधिक महत्त्व रखता है। राज्य में व्यवस्थापिका और कार्यपालिका की व्यवस्था चाहे कितनी ही पूर्ण और श्रेष्ठ क्यों न हो, परन्तु यदि न्याय करने में पक्षपात किया जाता है, अनावश्यक व्यय और विलम्ब होता है। या न्याय विभाग में अन्य किसी प्रकार का दोष है तो जनजीवन नितान्त दु:खपूर्ण हो जाएगा। न्याय विभाग के सम्बन्ध में ब्राइस ने अपनी श्रेष्ठ शब्दावली में कहा है कि न्याय विभाग की कुशलता से बढ़कर सरकार की उत्तमता की दूसरी कोई भी कसौटी नहीं है, क्योंकि किसी और चीज से नागरिक की सुरक्षा और हितों पर इतना प्रभाव नहीं पड़ता है, जितना कि उसके इस ज्ञान से कि वह एक निश्चित, शीघ्र व अपक्षपाती न्याय शासन पर निर्भर रह सकता है। वर्तमान समय में तो न्यायपालिका का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया है, क्योकि अभियोगों के निर्णय के साथ-साथ न्यायपालिका संविधान की व्याख्या और रक्षा का कार्य भी करती है।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता बनाये रखने हेतु उपाय
स्वतन्त्र न्यायपालिका उत्तम शासन की कसौटी है। इसलिए यह आवश्यक है कि न्यायपालिका का संगठन और कार्यविधि ऐसी हो जिससे वह बिना किसी भय और दबाव के स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य कर सके। स्वतन्त्र न्यायपालिका बनाये रखने के लिए निम्नलिखित व्यवस्था होनी चाहिए-
1. न्यायाधीशों की नियुक्ति और कार्यकाल – अधिकांश देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल का निर्धारण कार्यपालिका के द्वारा किया जाता है। नियुक्ति का आधार योग्यता और प्रतिभा को बनाया जाता है।
2. न्यायाधीशों का वेतन – न्यायाधीशों को वेतन के रूप में अच्छी धनराशि मिलनी चाहिए। उचित वेतन होने पर ही वे निष्पक्षता और ईमानदारी से काम कर पाएँगे।
3. न्यायाधीशों की पदोन्नति – न्यायाधीशों की पदोन्नति के भी निश्चित नियम होने चाहिए। योग्यता और वरिष्ठता के आधार पर ही न्यायाधीशों की पदोन्नति होनी चाहिए। पदोन्नति का अधिकार नियुक्त करने वाली संस्था या कार्यपालिका को न होकर उच्चतम न्यायालय को होना चाहिए।
4. न्यायाधीशों को हटाना – न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने के लिए भी एक निश्चित प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिए। न्यायाधीशों को भ्रष्ट या अयोग्य होने पर ही उनके पद से हटाया जाना चाहिए।
5. न्याय तथा शासन सम्बन्धी कार्यों का विभाजन – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी अनिवार्य है कि शासन तथा न्याय विभाग दोनों के कार्यक्षेत्र अलग-अलग हों। यदि कार्यपालिका और न्यायपालिका पृथक् नहीं हैं तो न्यायाधीश अपने प्रशासनिक उत्तरदायित्व को पूरा करने के लिए अपनी न्यायिक शक्तियों का दुरुपयोग कर सकते हैं।
6. न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी पद देने से अलग रखा जाना – सेवानिवृत्त होने के बाद किसी भी न्यायाधीश को अन्य किसी सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए।
7. न्यायाधीशों के निर्णयों, कार्यों और चरित्र की अनुचित आलोचना पर प्रतिबन्ध – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए यह भी आवश्यक है कि न्यायाधीशों के कार्यकाल में कोई भी उनके वैयक्तिक चरित्र अथवा कार्यों पर टिप्पणी न करे और उनके निर्णयों की आलोचना न करे।

20.

कार्यपालिका का एक न्यायिक कार्य बताइए।

Answer»

प्रशासनिक विभाग द्वारा अर्थदण्ड देना, कार्यपालिका का एक न्यायिक कार्य है।

21.

न्यायाधीशों की स्वतन्त्रता बनाये रखने के दो उपाय बताइए।

Answer»

⦁    योग्य व प्रतिभावान न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ तथा
⦁    न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण।

22.

एक आदर्श न्यायाधीश के दो प्रमुख गुण लिखिए।

Answer»

⦁    निष्पक्षता तथा
⦁    कानूनों का पूर्ण ज्ञान।

23.

किस देश में उच्च सदन के सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत किये जाते हैं ?(क) इंग्लैण्ड में(ख) भारत में(ग) अमेरिका में(घ) कनाडा में

Answer»

सही विकल्प है (घ) कनाडा में

24.

किस देश में उच्च सदन का गठन वंश-परम्परा के आधार पर होता है ?(क) इटली में(ख) जापान में(ग) इंग्लैण्ड में(घ) कनाडा में

Answer»

सही विकल्प है (ग) इंग्लैण्ड में

25.

लोकतन्त्र में न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का संक्षेप में वर्णन कीजिए।यान्यायपालिका की स्वतन्त्रता को सुनिश्चित करने के दो उपायों का उल्लेख कीजिए। यान्यायपालिका की स्वतन्त्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के दो उपाय लिखिए।

Answer»

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता
न्यायपालिका का कार्यक्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है और उसके द्वारा विविध प्रकार के कार्य किये जाते हैं, लेकिन न्यायपालिका इस प्रकार के कार्यों को उसी समय कुशलतापूर्वक सम्पन्न कर सकती है जबकि न्यायपालिका स्वतन्त्र हो। न्यायपालिका की स्वतन्त्रता से हमारा आशय यह है कि न्यायपालिका को कानूनों की व्याख्या करने और न्याय प्रदान करने के सम्बन्ध में स्वतन्त्र रूप से अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए और उन्हें कर्त्तव्यपालन में किसी से अनुचित तौर पर प्रभावित नहीं होना चाहिए। सीधे-सादे शब्दों में इसका आशय यह है कि न्यायपालिका, व्यवस्थापिका और कार्यपालिका किसी राजनीतिक दल, किसी वर्ग विशेष और अन्य सभी दबावों से मुक्त रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करे।

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने के दो उपाय निम्नलिखित हैं-
⦁    न्यायाधीश की योग्यता – न्यायाधीशों का पद केवल ऐसे ही व्यक्तियों को दिया जाए जिनकी व्यावसायिक कुशलता और निष्पक्षता सर्वमान्य हो। राज्य-व्यवस्था के संचालन में न्यायाधिकारी वर्ग का बहुत अधिक महत्त्व होता है और अयोग्य न्यायाधीश इस महत्त्व को नष्ट कर देंगे।
⦁    कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण – न्यायपालिका की स्वतन्त्रता के लिए आवश्यक है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे से पृथक् रखा जाना चाहिए। एक ही व्यक्ति के सत्ता अभियोक्ता और साथ-ही-साथ न्यायाधीश होने पर स्वतन्त्र न्याय की आशा नहीं की जा सकती है।

26.

अध्यक्षात्मक कार्यपालिका है-(क) इंग्लैण्ड में(ख) चीन में(ग) जापान में(घ) संयुक्त राज्य अमेरिका में

Answer»

सही विकल्प है (घ) संयुक्त राज्य अमेरिका में

27.

नाममात्र की कार्यपालिका है-(क) संयुक्त राज्य अमेरिका में(ख) फ्रांस में(ग) पाकिस्तान में(घ) इंग्लैण्ड में

Answer»

सही विकल्प है (घ) इंग्लैण्ड में

28.

किस प्रकार की शासन प्रणाली में नाममात्र की और वास्तविक कार्यपालिका होती है ?

Answer»

संसदात्मक शासन प्रणाली में।

29.

नाममात्र की कार्यपालिका का एक उदाहरण दीजिए।

Answer»

भारत का राष्ट्रपति व ब्रिटेन की सम्राज्ञी नाममात्र की कार्यपालिका के उदाहरण हैं।

30.

कार्यपालिका के चार कार्यों का वर्णन कीजिए। याआधुनिक राज्यों में कार्यपालिका के किन्हीं चार कार्यों का समुचित उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।

Answer»

कार्यपालिका के कार्य कार्यपालिका के चार कार्य निम्नवत् हैं-

1. आन्तरिक शासन सम्बन्धी कार्य – प्रत्येक राज्य, राजनीतिक रूप में संगठित समाज है। और इस संगठित समाज की सर्वप्रथम आवश्यकता शान्ति और व्यवस्था बनाये रखना होता है। तथा यह कार्य कार्यपालिका के द्वारा ही किया जाता है। इसके अतिरिक्त व्यापार और यातायात, शिक्षा और स्वास्थ्य से सम्बन्धित सुविधाओं की व्यवस्था और कृषि पर नियन्त्रण, आदि कार्य भी कार्यपालिका द्वारा ही किये जाते हैं।
2. सैनिक कार्य – सामान्यतया राज्य की कार्यपालिका का प्रधान सेनाओं के सभी अंगों (स्थल, जल और वायु) के प्रधान के रूप में कार्य करता है और विदेशी आक्रमण से देश की रक्षा करना कार्यपालिका का महत्त्वपूर्ण कार्य होता है। अपने इस कार्य के अन्तर्गत कार्यपालिका आवश्यकतानुसार युद्ध अथवा शान्ति की घोषणा कर सकती है।
3. विधि-निर्माण सम्बन्धी कार्य – कार्यपालिका के विधि-निर्माण सम्बन्धी कार्य बहुत कुछ सीमा तक शासन-व्यवस्था के स्वरूप पर निर्भर करते हैं। सभी प्रकार की शासन-व्यवस्थाओं में कार्यपालिका को विधानमण्डल का अधिवेशन बुलाने और स्थगित करने का अधिकार होता है। संसदात्मक शासन में तो कार्यपालिका विधि-निर्माण के क्षेत्र में व्यवस्थापिका का नेतृत्व करती है और विशेष परिस्थितियों में लोकप्रिय सदन को भंग करते हुए नव-निर्वाचन का आदेश दे सकती है। वर्तमान समय में तो यहाँ तक कहा जा सकता है कि कार्यपालिका ही व्यवस्थापिका की स्वीकृति से कानूनों का निर्माण करती है।
4. वित्तीय कार्य – यद्यपि वार्षिक बजट स्वीकृत करने का कार्य व्यवस्थापिका द्वारा किया जाता है, किन्तु इस बजट का प्रारूप तैयार करने का कार्य कार्यपालिका ही कर सकती है। कार्यपालिका का वित्त विभाग आय के विभिन्न साधनों द्वारा प्राप्त आय के उपभोग पर विचार करता है।

31.

कार्यपालिका के दो प्रमुख कार्य बताइए।

Answer»

⦁    कार्यपालिका व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित कानूनों को कार्यान्वित करती है तथा
⦁    विदेश नीति का संचालन करती है।

32.

न्यायाधीशों की नियुक्ति की विधियाँ लिखिए।

Answer»

⦁    जनता द्वारा निर्वाचन,
⦁    व्यवस्थापिका द्वारा निर्वाचन तथा
⦁    कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति।

33.

सर्वप्रथम किस देश में न्यायाधीशों का निर्वाचन जनसाधारण द्वारा किया गया?(क) इंग्लैण्ड में(ख) जर्मनी में(ग) भारत में(घ) फ्रांस में

Answer»

सही विकल्प है (घ) फ्रांस में

34.

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता महत्त्वपूर्ण है-(क) लोकतन्त्र की रक्षा हेतु(ख) देश की शान्ति हेतु(ग) देश की बाहरी सुरक्षा हेतु(घ) देश की प्रगति हेतु

Answer»

सही विकल्प है (क) लोकतन्त्र की रक्षा हेतु

35.

भारत की केन्द्रीय व्यवस्थापिका का नाम क्या है?

Answer»

भारत की केन्द्रीय व्यवस्थापिका का नाम ‘संसद है।

36.

कार्यपालिका के निर्माण (नियुक्ति) की प्रमुख विधियों को लिखिए।

Answer»

आधुनिक समय में कार्यपालिका की नियुक्ति विभिन्न देशों में अलग-अलग पद्धतियों से की जाती है। इस विषय में निम्नलिखित पद्धतियाँ प्रमुख हैं-

1. वंशानुगत पद्धति – इस पद्धति का सम्बन्ध राजतन्त्रीय शासन से है। इसमें पद की अवधि आजीवन होती है और उत्तराधिकार ज्येष्ठाधिकार कानून द्वारा शासित होता है। प्राचीन व मध्य युग में कार्यपालिका के निर्माण की यह सर्वाधिक प्रचलित पद्धति रही है। यद्यपि वर्तमान समय में यह पद्धति लोकप्रिय नहीं है, किन्तु ब्रिटेन, स्वीडन, डेनमार्क, जापान आदि देशों में नाममात्र की कार्यपालिका की नियुक्ति वंशानुगत पद्धति के आधार पर की जाती है।
2. जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन – कुछ देशों में कार्यपालिका का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। मैक्सिको, ब्राजील, पेरू आदि लैटिन अमेरिकी देशों में राष्ट्रपति को सर्वसाधारण जनता द्वारा ही निर्वाचित किया जाता है।
3. जनता द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन – इस पद्धति में सर्वसाधारण जनता द्वारा एक निर्वाचक मण्डल का निर्वाचन किया जाता है और इस निर्वाचक मण्डल द्वारा कार्यकारिणी का चुनाव किया जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति के निर्वाचन की यही पद्धति है, किन्तु व्यवहार में राष्ट्रपति के चुनाव ने प्रत्यक्ष चुनाव का रूप ग्रहण कर लिया है।
4. व्यवस्थापिका द्वारा निर्वाचन – इस पद्धति में कार्यपालिका को व्यवस्थापिका द्वारा चुना जाता है। स्विट्जरलैण्ड में कार्यपालिका प्रधान के चुनाव की यही पद्धति है।
5. मनोनयन – संसदात्मक शासन-व्यवस्था वाले देशों में सम्राट् या राष्ट्रपति तो नाममात्र की कार्यपालिका होती है; अत: इन शासन-व्यवस्थाओं में वास्तविक कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिपरिषद् की नियुक्ति का प्रश्न अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। ब्रिटेन में जिस राजनीतिक दल को ‘लोक-सदन’ (House of Commons) में बहुमत प्राप्त होता है, सम्राट् के द्वारा उस दल के नेता को प्रधानमन्त्री पद पर नियुक्त किया जाता है। इसी व्यक्ति द्वारा साधारणतया अपने ही राजनीतिक दल से सहयोगियों की टीम को चुनकर मन्त्रिपरिषद् का निर्माण किया जाता है। भारत में इसी पद्धति का अनुसरण किया गया है। वास्तविक कार्यपालिका के निर्माण के सम्बन्ध में यही पद्धति सर्वाधिक सन्तोषजनक पायी गयी है।

37.

नाममात्र की और वास्तविक कार्यपालिका में अन्तर किस सरकार का लक्षण है?(क) संसदात्मक(ख) अध्यक्षात्मक(ग) राजतन्त्र(घ) संघात्मक

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सही विकल्प है (क) संसदात्मक

38.

निम्नलिखित में से कौन-सा सरकार का आवश्यक अंग है?(क) राजनीतिक दल(ख) न्यायपालिका(ग) जनमत(घ) निर्वाचन आयोग

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सही विकल्प है (ख) न्यायपालिका

39.

व्यवस्थापिका द्वारा कार्यपालिका को नियन्त्रित करने का एक साधन लिखिए।

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काम रोको प्रस्ताव रखकर।

40.

निम्नलिखित में से कौन-सा सरकार का अंग नहीं है? (क) कार्यपालिका(ख) व्यवस्थापिका(ग) लोकमत(घ) न्यायपालिका

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सही विकल्प है (ग) लोकमत

41.

व्यवस्थापिका कार्यपालिका पर किस प्रकार नियन्त्रण रखती है? विवेचना कीजिए।यासंसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के मध्य उचित सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। यासंसदीय शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका किस प्रकार कार्यपालिका को नियन्त्रित करती है? 

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सरकार के तीनों अंगों में व्यवस्थापिका का स्थान महत्त्वपूर्ण समझा जाता है, क्योंकि व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित कानूनों के आधार पर ही कार्यपालिका शासन करती है तथा न्यायपालिका न्याय प्रदान करती है। इस प्रकार व्यवस्थापिका शासन का मूलाधार है। इसके अतिरिक्त व्यवस्थापिका जनता द्वारा निर्वाचित संस्था है, यह जन-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। इस कारण भी लोकतन्त्र में इसका बहुत अधिक महत्त्व होना नितान्त स्वाभाविक है।
कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के सम्बन्ध की प्रकृति ही शासन की दो प्रमुख प्रणालियोंसंसदात्मक (Parliamentary) प्रणाली और अध्यक्षात्मक (Presidential) प्रणाली में भेद स्थापित करती है। संसदात्मक प्रणाली में कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के मध्य सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ होता है।
कार्यपालिका को व्यवस्थापिका की एक समिति कहा जा सकता है। अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका सिद्धान्त रूप में सर्वथा एक-दूसरे से अलग होते हैं, परन्तु शासने की आवश्यकताएँ इन्हें पूर्णरूपेण पृथकू नहीं रहने देती हैं। इस प्रकार व्यवहार रूप में दोनों एक-दूसरे को नियन्त्रित और मर्यादित करती हैं। प्रत्येक राज्य में कार्यपालिका को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ विधायी कार्य करने पड़ते हैं और व्यवस्थापिका को कुछ कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य करने पड़ते हैं। कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के सम्बन्ध का अध्ययन दो रूपों में किया जा सकता है-

⦁    कार्यपालिका की विधायी शक्तियाँ और उसका व्यवस्थापिका पर नियन्त्रण।
⦁    व्यवस्थापिका की प्रशासनिक शक्तियाँ और उसका कार्यपालिका पर नियन्त्रण।

1. कार्यपालिका की विधायी शक्तियाँ और उसका व्यवस्थापिका पर नियन्त्रण- कार्यपालिका कई प्रकार से विधायी अर्थात् कानून- निर्माण सम्बन्धी कार्यों में भाग लेती है। संसदीय शासन-प्रणाली वाले देशों में कार्यपालिका को व्यवस्थापिका का अधिवेशन बुलाने, उसको स्थगित करने तथा समाप्त करने का अधिकार होता है। वह निम्न सदन को भंग करके नये चुनाव के लिए आदेश दे सकती है, परन्तु अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली वाले देशों में कार्यपालिका व्यवस्थापिका को समय-समय पर देश की कानून सम्बन्धी आवश्यकताओं से अवगत कराती रहती है और उसका उचित नेतृत्व और पथ-प्रदर्शन करती है। कार्यपालिका समस्त विधेयकों का प्रारूप (Draft) तैयार करती है और व्यवस्थापिका में उन्हें प्रस्तुत करती है तथा विपक्ष की आलोचनाओं को सहन करती हुई पारित कराती है। अध्यक्षात्मक प्रणाली में कार्यपालिका अप्रत्यक्ष रूप से विधायी कार्य को प्रभावित करती है। दूसरे शब्दों में, इस प्रणाली में राष्ट्रपति को केवल सन्देशों के माध्यम से ही व्यवस्थापिका का ध्यान आलोचनाओं की ओर आकर्षित करने का अधिकार होता है। अमेरिका के राष्ट्रपति को व्यवस्थापिका (काँग्रेस) को सन्देश भेजने का अधिकार है।
संसदात्मक तथा अध्यक्षात्मक दोनों प्रकार की प्रणालियों में कार्यपालिका को अध्यादेश जारी करने तथा व्यवस्थापिका द्वारा पारित विधेयकों के सम्बन्ध में निषेधाधिकार प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त होता है। ब्रिटेन की संसद सम्राट् के निषेधाधिकार की उपेक्षा नहीं कर सकती। बहुत-से राज्यों में व्यवस्थापिका बहुमत के आधार पर इसे अस्वीकार कर सकती है। हैमिल्टन के अनुसार, “निषेधाधिकार कार्यपालिका के लिए कवच का काम करता है। कुछ देशों में प्रतिनिध्यात्मक विधायी प्रणाली का प्रयोग किया जाने लगा है, जिसके कारण कार्यपालिका की विधायी शक्तियों को क्षेत्र और अधिक विकसित हो गया है।

2. व्यवस्थापिका की प्रशासनिक शक्तियाँ और उसका व्यवस्थापिका पर नियन्त्रण – दूसरी ओर कार्यपालिका भी कई प्रकार से व्यवस्थापिका द्वारा नियन्त्रित होती है। संसदीय प्रणाली में यह नियन्त्रण अध्यक्षात्मक प्रणाली की अपेक्षा अधिक होता है। संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका का जीवन व्यवस्थापिका की इच्छा पर निर्भर होता है। दूसरे शब्दों में, कार्यपालिका उस समय तक अपने पद पर बनी रहती है जब तक कि उसे व्यवस्थापिका का विश्वास प्राप्त है। व्यवस्थापिका अविश्वास प्रस्ताव पारित करके, कार्यपालिका के शासन सम्बन्धी आचरण की निन्दा का प्रस्ताव स्वीकृत करके, अनुदान स्वीकार करके अथवा सरकार द्वारा प्रस्तुत किसी प्रस्ताव को अस्वीकृत करके मन्त्रिमण्डल को अपने पद से हटा सकती है। अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली में इस प्रकार के नियन्त्रण उपलब्ध नहीं होते हैं। इसमें कार्यपालिका को नियन्त्रित करने के दूसरे साधन हैं। अमेरिका में लोक सदन (House of Representatives) राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा पद से हटा सकता है। इसी प्रकार सीनेट को कार्यपालिका द्वारा की गयी उच्च नियुक्तियों को स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार है तथा राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक सन्धि के लिए उसकी अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है।
कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के सम्बन्धों के उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों ही एक-दूसरे पर नियन्त्रण रखती हैं। ऐसी स्थिति में यह अत्यन्त आवश्यक होता है कि इन दोनों के सम्बन्ध परस्पर सहयोगपूर्ण होने चाहिए। यदि पारस्परिक सहयोग नहीं रहेगा तो शासन-कार्य सुचारु रूप से चलना असम्भव हो जायेगा।

42.

व्यवस्थापिका के दो कार्यों का उल्लेख कीजिए तथा किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए जिनसे व्यवस्थापिका कार्यपालिका पर नियन्त्रण स्थापित करती है। याव्यवस्थापिका द्वारा कार्यपालिका पर नियन्त्रण के दो साधन बताइए। याकार्यपालिका पर नियन्त्रण रखने के लिए विधायिका कौन-से साधन अपनाती है? ऐसे किन्हीं चार साधनों का उल्लेख कीजिए।

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सरकार के तीनों अंगों द्वारा महत्त्वपूर्ण कार्य किये जाते हैं, लेकिन इन तीनों में व्यवस्थापक विभाग सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। सामान्यतया व्यवस्थापिका निम्नलिखित साधनों से कार्यपालिका पर नियन्त्रण करती है।

⦁    आर्थिक नियन्त्रण – वर्तमान समय में व्यवस्थापिका कानून-निर्माण के साथ-साथ राष्ट्रीय वित्त पर नियन्त्रण करने का कार्य भी करती है। व्यवस्थापिका की स्वीकृति के बिना, कार्यपालिका आय-व्यय से सम्बन्धित कोई कार्य नहीं कर सकती।
⦁    प्रशासन सम्बन्धी कार्यों पर नियन्त्रण – संसदात्मक शासन में व्यवस्थापिका प्रश्नों, स्थगन प्रस्तावों, निन्दा प्रस्तावों और अविश्वास प्रस्तावों के माध्यम से कार्यपालिका पर प्रत्यक्ष नियन्त्रण रखती है और कार्यपालिका का अस्तित्व व्यवस्थापिका की इच्छा पर निर्भर करता है।
⦁    समितियों और आयोगों की नियुक्ति द्वारा नियन्त्रण – विधानमण्डल समय-समय पर किन्हीं विशेष कार्यों की जाँच करने के लिए समितियों और आयोगों की नियुक्ति का कार्य करता है और इनके माध्यम से कार्यपालिका के कार्यों की छानबीन करता है।
⦁    जनभावनाओं की अभिवृद्धि द्वारा नियन्त्रण – लोकतन्त्र में व्यवस्थापिका एक ऐसा स्थान है जहाँ पर जनता के प्रतिनिधि सरकार (कार्यपालिका) का ध्यान जनता के कष्टों की ओर आकर्षित करते हैं और शासन को जनहित के कार्य करने के लिए प्रेरित करते हैं।

व्यवस्थापिका के दो कार्य
व्यवस्थापिका के दो कार्य निम्नवत हैं-
⦁    कानूनों का निर्माण – व्यवस्थापिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य कानूनों का निर्माण करना है। यह आवश्यकता के अनुसार नए कानून बनाती है, पुराने कानूनों में संशोधन करती है और अनावश्यक कानूनों को रद्द करती है।
⦁    संविधान में संशोधन – व्यवस्थापिका को संविधान करने का अधिकार भी प्राप्त होता है। संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न प्रकार की है। इंग्लैण्ड में व्यवस्थापिका (ब्रिटिश संसद) ही सर्वोपरि है। वह साधारण कानूनों के समान ही संविधान में संशोधन कर सकती है। परन्तु संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत में संशोधन की विशेष प्रक्रिया अपनाई जाती है।

43.

सरकार के अंगों की संख्या कितनी है?(क) एक(ख) दो(ग) तीन(घ) चार

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सही विकल्प है (ग) तीन

44.

किन देशों में व्यवस्थापिका के दोनों सदनों द्वारा कार्यपालिका के अध्यक्ष या समिति का चुनाव होता है?

Answer»

स्विट्जरलैण्ड, यूगोस्लाविया और तुर्की।

45.

व्यवस्थापिका का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है-(क) कानून बनवाना(ख) कार्यपालिका पर नियन्त्रण(ग) संविधान संशोधन(घ) बजट पास करना

Answer»

सही विकल्प है (क) कानून बनवाना

46.

प्रत्येक साझेदार को लाभ मिलना ही चाहिए ।

Answer»

साझेदारी पेढ़ी धन्धाकीय प्रवृत्ति करती है । साझेदारी का उद्देश्य कानूनी रूप से चलनेवाले धन्धे का लाभ बाँटना है । लाभ का वितरण करार में निश्चित किये गये अनुसार किया जाता है । अगर करार में निश्चित न किया गया हो तो लाभ सभी साझेदार के बीच समान हिस्से में बाँट लिया जाता है । प्रत्येक साझेदार को लाभ मिलना चाहिए ।

47.

इनमें से कौन-सा साझेदार संस्था में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेता ?(A) अवयस्क साझेदार(B) सक्रिय साझेदार(C) नाम मात्र का साझेदार(D) निष्क्रिय साझेदार

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सही विकल्प है (D) निष्क्रिय साझेदार

48.

कार्यपालिका का कार्य है- (क) कानून बनाना(ख) विधानसभा के अध्यक्ष का चुनाव करना(ग) बजट पारित करना(घ) प्रशासन चलाना या विधि को लागू करना

Answer»

(घ) प्रशासन चलाना या विधि को लागू करना

49.

पूँजी प्रकार के खर्च कहाँ दर्शाये जाते है ?(अ) आर्थिक चिट्ठा के संपत्ति पक्ष में(ब) आर्थिक चिट्ठा में जिम्मेदारी पक्ष में(क) उपज-खर्च खाते के उधार पक्ष में(ड) आवक-जावक खाते के उधार पक्ष में

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सही विकल्प है (अ) आर्थिक चिट्ठा के संपत्ति पक्ष में

50.

आवक-जावक खाता यह ………………………… खाता जैसा है, जबकि उपज-खर्च खाता यह, ……………………………. खाता जैसा है ।(अ) लाभ-हानि, रोकड़(ब) आर्थिक चिट्ठा, लाभ-हानि(क) लाभ-हानि, आर्थिक चिट्ठा(ड) रोकड़, लाभ-हानि

Answer»

सही विकल्प है (ड) रोकड़, लाभ-हानि