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व्यवस्थापिका कार्यपालिका पर किस प्रकार नियन्त्रण रखती है? विवेचना कीजिए।यासंसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के मध्य उचित सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। यासंसदीय शासन-प्रणाली में व्यवस्थापिका किस प्रकार कार्यपालिका को नियन्त्रित करती है? 

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सरकार के तीनों अंगों में व्यवस्थापिका का स्थान महत्त्वपूर्ण समझा जाता है, क्योंकि व्यवस्थापिका द्वारा निर्मित कानूनों के आधार पर ही कार्यपालिका शासन करती है तथा न्यायपालिका न्याय प्रदान करती है। इस प्रकार व्यवस्थापिका शासन का मूलाधार है। इसके अतिरिक्त व्यवस्थापिका जनता द्वारा निर्वाचित संस्था है, यह जन-आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है। इस कारण भी लोकतन्त्र में इसका बहुत अधिक महत्त्व होना नितान्त स्वाभाविक है।
कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के सम्बन्ध की प्रकृति ही शासन की दो प्रमुख प्रणालियोंसंसदात्मक (Parliamentary) प्रणाली और अध्यक्षात्मक (Presidential) प्रणाली में भेद स्थापित करती है। संसदात्मक प्रणाली में कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के मध्य सम्बन्ध बहुत घनिष्ठ होता है।
कार्यपालिका को व्यवस्थापिका की एक समिति कहा जा सकता है। अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका सिद्धान्त रूप में सर्वथा एक-दूसरे से अलग होते हैं, परन्तु शासने की आवश्यकताएँ इन्हें पूर्णरूपेण पृथकू नहीं रहने देती हैं। इस प्रकार व्यवहार रूप में दोनों एक-दूसरे को नियन्त्रित और मर्यादित करती हैं। प्रत्येक राज्य में कार्यपालिका को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से कुछ विधायी कार्य करने पड़ते हैं और व्यवस्थापिका को कुछ कार्यपालिका सम्बन्धी कार्य करने पड़ते हैं। कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के सम्बन्ध का अध्ययन दो रूपों में किया जा सकता है-

⦁    कार्यपालिका की विधायी शक्तियाँ और उसका व्यवस्थापिका पर नियन्त्रण।
⦁    व्यवस्थापिका की प्रशासनिक शक्तियाँ और उसका कार्यपालिका पर नियन्त्रण।

1. कार्यपालिका की विधायी शक्तियाँ और उसका व्यवस्थापिका पर नियन्त्रण- कार्यपालिका कई प्रकार से विधायी अर्थात् कानून- निर्माण सम्बन्धी कार्यों में भाग लेती है। संसदीय शासन-प्रणाली वाले देशों में कार्यपालिका को व्यवस्थापिका का अधिवेशन बुलाने, उसको स्थगित करने तथा समाप्त करने का अधिकार होता है। वह निम्न सदन को भंग करके नये चुनाव के लिए आदेश दे सकती है, परन्तु अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली वाले देशों में कार्यपालिका व्यवस्थापिका को समय-समय पर देश की कानून सम्बन्धी आवश्यकताओं से अवगत कराती रहती है और उसका उचित नेतृत्व और पथ-प्रदर्शन करती है। कार्यपालिका समस्त विधेयकों का प्रारूप (Draft) तैयार करती है और व्यवस्थापिका में उन्हें प्रस्तुत करती है तथा विपक्ष की आलोचनाओं को सहन करती हुई पारित कराती है। अध्यक्षात्मक प्रणाली में कार्यपालिका अप्रत्यक्ष रूप से विधायी कार्य को प्रभावित करती है। दूसरे शब्दों में, इस प्रणाली में राष्ट्रपति को केवल सन्देशों के माध्यम से ही व्यवस्थापिका का ध्यान आलोचनाओं की ओर आकर्षित करने का अधिकार होता है। अमेरिका के राष्ट्रपति को व्यवस्थापिका (काँग्रेस) को सन्देश भेजने का अधिकार है।
संसदात्मक तथा अध्यक्षात्मक दोनों प्रकार की प्रणालियों में कार्यपालिका को अध्यादेश जारी करने तथा व्यवस्थापिका द्वारा पारित विधेयकों के सम्बन्ध में निषेधाधिकार प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त होता है। ब्रिटेन की संसद सम्राट् के निषेधाधिकार की उपेक्षा नहीं कर सकती। बहुत-से राज्यों में व्यवस्थापिका बहुमत के आधार पर इसे अस्वीकार कर सकती है। हैमिल्टन के अनुसार, “निषेधाधिकार कार्यपालिका के लिए कवच का काम करता है। कुछ देशों में प्रतिनिध्यात्मक विधायी प्रणाली का प्रयोग किया जाने लगा है, जिसके कारण कार्यपालिका की विधायी शक्तियों को क्षेत्र और अधिक विकसित हो गया है।

2. व्यवस्थापिका की प्रशासनिक शक्तियाँ और उसका व्यवस्थापिका पर नियन्त्रण – दूसरी ओर कार्यपालिका भी कई प्रकार से व्यवस्थापिका द्वारा नियन्त्रित होती है। संसदीय प्रणाली में यह नियन्त्रण अध्यक्षात्मक प्रणाली की अपेक्षा अधिक होता है। संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका का जीवन व्यवस्थापिका की इच्छा पर निर्भर होता है। दूसरे शब्दों में, कार्यपालिका उस समय तक अपने पद पर बनी रहती है जब तक कि उसे व्यवस्थापिका का विश्वास प्राप्त है। व्यवस्थापिका अविश्वास प्रस्ताव पारित करके, कार्यपालिका के शासन सम्बन्धी आचरण की निन्दा का प्रस्ताव स्वीकृत करके, अनुदान स्वीकार करके अथवा सरकार द्वारा प्रस्तुत किसी प्रस्ताव को अस्वीकृत करके मन्त्रिमण्डल को अपने पद से हटा सकती है। अध्यक्षात्मक शासन-प्रणाली में इस प्रकार के नियन्त्रण उपलब्ध नहीं होते हैं। इसमें कार्यपालिका को नियन्त्रित करने के दूसरे साधन हैं। अमेरिका में लोक सदन (House of Representatives) राष्ट्रपति को महाभियोग द्वारा पद से हटा सकता है। इसी प्रकार सीनेट को कार्यपालिका द्वारा की गयी उच्च नियुक्तियों को स्वीकृति प्रदान करने का अधिकार है तथा राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक सन्धि के लिए उसकी अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है।
कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के सम्बन्धों के उपर्युक्त वर्णन से यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों ही एक-दूसरे पर नियन्त्रण रखती हैं। ऐसी स्थिति में यह अत्यन्त आवश्यक होता है कि इन दोनों के सम्बन्ध परस्पर सहयोगपूर्ण होने चाहिए। यदि पारस्परिक सहयोग नहीं रहेगा तो शासन-कार्य सुचारु रूप से चलना असम्भव हो जायेगा।



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