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‘न्यायिक सक्रियतावाद’ से क्या आशय है?या‘न्यायिक सक्रियतावाद’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

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न्यायिक सक्रियतावाद का आशय है- “संविधान, कानून और अपने दायित्वों के प्रसंग में कानूनी व्याख्या से आगे बढ़कर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और सामाजिक-आर्थिक न्याय की आवश्यकता को दृष्टि में रखते हुए संविधान और कानून की रचनात्मक व्याख्या करते हुए न्यायपालिका का जनसाधारण के हितों की रक्षा के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना।”

न्यायिक सक्रियतावाद के विविध रूप और मान्यताएँ इस प्रकार हैं-
⦁    जनहितकारी अभियोगों को मान्यता।
⦁    कानूनी-न्याय के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक न्याय पर बल।
⦁    न्यायपालिका को शासन की स्वेच्छाचारिता पर नियन्त्रण का अधिकार है।
⦁    न्यायपालिका शासन को आवश्यक निर्देश दे सकती है।

न्यायिक सक्रियतावाद के आधार पर न्यायपालिका ने सम्बद्ध देशों की समस्त राजव्यवस्था में बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण स्थिति प्राप्त कर ली है।
न्यायपालिका द्वारा अपनाई गई न्यायिक सक्रियतावाद की यह स्थिति बहुत अधिक विवाद का विषय बनी हुई है। आलोचकों का कहना है कि न्यायपालिका ‘न्यायिक सक्रियतावाद’ के आधार पर ‘व्यवस्थापिका के तीसरे सदन’ की भूमिका निभाने की चेष्टा कर रही है। कुछ अन्य इसे एक तरह की न्यायिक तानाशाही’ कहते हैं। ये आलोचनाएँ अतिशयोक्तिपूर्ण होते हुए भी इनमें ‘सत्य के अंश हो सकते हैं, लेकिन स्थिति का दूसरा पक्ष यह है कि जब केन्द्रीय और राज्य स्तर की विधायी और कार्यपालिका संस्थाएँ अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं रहीं, तब न्यायपालिका ने परिस्थितियों से प्रेरित और बाध्य होकर ही न्यायिक सक्रियता की स्थिति को अपनाया है। इस प्रकार आज की स्थिति के लिए स्वयं न्यायपालिका उत्तरदायी नहीं है। न्यायपालिका ने अपनी इस भूमिका के आधार पर जनता में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के प्रति विश्वास को बनाए रखा है और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों के प्रहरी की भूमिका निभाई है।
न्यायिक सक्रियता के महत्त्व को स्वीकार करते हुए भी यह मानना होगा कि न्यायिक सक्रियता मात्र एक अस्थायी स्थिति ही हो सकती हैं। एक ऐसी लक्ष्मण रेखा अंकित करने की आवश्यकता है जिससे न्यायपालिका व्यवस्थापिका या कार्यपालिका के दायित्वों को न हथिया ले।’



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