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प्राप्ति-भुगतान खाता का अर्थ समझाकर उसे तैयार करने के ध्यान में रखने योग्य मुद्दे लिखिए ।

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गैरव्यापारिक संस्था में वर्ष के दरम्यान प्राप्त रोकड़ आय और चुकाये रोकड़ खर्च का जो सारांश (तारीज) तैयार किया जाता है उसे प्राप्ति-भुगतान के रूप में जाना जाता है । यह खाता वर्ष के दौरान हुए रोकड़ व्यवहारों का सारांश है । इसका स्वरूप रोकड़ खाते की तरह होता है ।

प्राप्ति-भुगतान खाता तैयार करते समय ध्यान में रखने योग्य मुद्दे : (Points to be considered during preparation of Receipt-Payment Account) :

  1. इस खाते में सभी प्रकार की आय जो नकद में या चेक से प्राप्त हुई हो, तथा सभी प्रकार के नकद भुगतान (व्यय) या चेक से भुगतान उनका लेखा किया जाता है ।
  2. इस खाते में राजस्व या पूँजीगत दोनों प्रकार की प्राप्ति और भुगतान लिखी जाती है ।
  3. इस खाते में चालू वर्ष, पिछले वर्ष या आनेवाले वर्ष का प्राप्ति-भुगतान लिखा जाता है ।
  4. प्रारंभिक रोकड़ शेष या बैंक शेष प्राप्ति-भुगतान खाते के उधार पक्ष में, प्रारंभिक बैंक ओवरड्राफ्ट हो तो जमा पक्ष में दर्शाया जाता है ।
  5. इस खाते में बिन रोकड़ व्यवहार जैसे : घिसाई, डूबत ऋण, नहीं चुकाया खर्च, नहीं मिली आय, शाख के व्यवहारों का लेखा नहीं किया जाता ।
  6. वर्ष के अंत में शेष ज्ञात किया जाता है । (i) अगर जमा पक्ष का योग अधिक हो तब अंतर की राशि उधार पक्ष में ‘अंतिम बैंक ओवरड्राफ्ट’ और (ii) अगर उधार पक्ष का योग अधिक आये तब अंतर की राशि जमा पक्ष में ‘अंतिम रोकड़ शेष और बैंक शेष’ कहलायेगी ।


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