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कम्पनी की स्थापना अर्थात् स्थापक की मानस-संतान । (Promotion is the brain child of the promoters)

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यह विधान सही है । जब से स्थापकों के मन में कम्पनी की स्थापना का विचार आये तब से वैचारिक दृष्टि से कम्पनी का जन्म हो गया ऐसा कहेंगे । स्थापक अपनी कल्पना-शक्ति, धन्धाकीय सूझ और योग्यता के द्वारा नये धंधे की खोज करके, उसकी जाँच करके, आवश्यक पूँजी साधन-सामग्री और मानव-शक्ति एकत्र करके धंधे की स्थापना करते हैं । इसलिए ऐसा कहा जाता है कि कम्पनी की स्थापना अर्थात् स्थापक की मानस-संतान ।



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