This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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विपदा के बारे में रहीम क्या कहते हैं? |
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Answer» रहीमजी कहते हैं कि थोड़े समय के लिए आई विपत्ति बुरी नहीं है। विपत्ति के उस समय में हमें मालूम हो जाता है कि कौन हमारा हितकारी है और कौन हमारा अहित चाहता है। इस तरह थोड़े समय की विपदा हमें थोड़ा कष्ट भले देती हो, पर वह हमें अपने सच्चे हितैषियों का ज्ञान करा देती है। इस प्रकार अल्पकाल की विपदा हमारी आँखें खोल जाती है। इसलिए उसे बुरी नहीं माननी चाहिए। |
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| 29052. |
सु, वि तथा प्र उपसर्गों का प्रयोग करके दो-दो शब्द बनाइए। |
Answer»
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| 29053. |
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक शब्द में लिखिए :राम ने सुवर्णमृग के रूप में किसका उद्धार किया?पत्थर के स्पर्श से राम ने किस नारी को शापमुक्त किया? |
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Answer» 1. मारीच का 2. अहल्या को |
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| 29054. |
सही विकल्प चुनकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए :हिंदी के शीर्ष कवि के रूप में ………. का नाम आता है। (सूरदासजी, तुलसीदासजी)बाबा ………. ने तुलसीदासजी को अपने पास रखा। (हरिदास, भारती)जटायु सूर्य के सारथी का …………. था। (पुत्र, अनुज)गोस्वामी तुलसीदासजी का श्रेष्ठ ग्रंथ ……….. है। (रामायण, रामचरितमानस)संसार राम को ………….. नाम से जानता है। (पतितपावन, पालनकर्ता) |
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Answer» 1. तुलसीदासजी 2. हरिदास 3. पुत्र 4. रामचरितमानस 5. पतितपावन |
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| 29055. |
‘तू दयालु, दीन हौं।’ नामक पद के द्वारा भक्त कवि तुलसीदास ने भगवान श्रीराम की महत्ता के बारे क्या कहा है? |
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Answer» ‘तू दयालु, दीन हौं।’ पद में तुलसीदासजी भगवान श्रीराम को अत्यंत समर्थ और भक्तवत्सल कहते हैं। भगवान श्रीराम बड़े दयालु और महान दाता हैं। वे अपने भक्तों के पापों के समूह का नाश करनेवाले हैं। वे अनाथों के नाथ और भक्तों के दुःख हरनेवाले हैं। भगवान राम परब्रह्म हैं। वे सबके स्वामी हैं। उनसे संबंध जुड़ जाने पर भक्त को माता, पिता, गुरु, मित्र और हितैषी का अभाव नहीं रहता। श्रीराम के रूप में उसे समर्थ रक्षक मिल जाता है। इस प्रकार इस पद में तुलसीदास अपने आराध्य भगवान राम की अपार महिमा पर प्रकाश डालते हैं। |
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| 29056. |
संसार राम को किस नाम से जानता है?A. मनभावनB. चित्तचोरC. गोपीवल्लभD. पतितपावन |
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Answer» सही विकल्प है D. पतितपावन |
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| 29057. |
तुलसीदासजी किसके चरण नहीं छोड़ना चाहते? |
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Answer» तुलसीदासजी अपने स्वामी श्रीराम के चरण नहीं छोड़ना चाहते। |
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| 29058. |
तुलसीदास ने भगवान के कौन-कौन से गुण बताए है? |
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Answer» तुलसीदासजी कहते हैं कि भगवान अत्यंत दयालु, दानी और पापहर्ता हैं। वे अनाथों के नाथ, दुखियों के दुःख दूर करनेवाले तथा सब तरह से हितैषी हैं। |
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| 29059. |
तुलसीदास किसके परम भक्त थे? |
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Answer» तुलसीदास भगवान श्रीराम के परम भक्त थे। |
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| 29060. |
यदि राम ब्रह्म हैं, तो तुलसीदास कौन हैं? |
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Answer» यदि राम ब्रह्म हैं, वो तुलसीदास संसार के बंधन में पड़े । हुए जीव हैं। |
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| 29061. |
अगर तुलसीदास प्रसिद्ध पातकी हैं, तो श्रीराम कौन हैं? |
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Answer» अगर तुलसीदास प्रसिद्ध पातकी हैं, तो श्रीराम पापों के समूह का नाश करनेवाले हैं। |
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| 29062. |
तुलसीदास अपने आपको क्या मानते हैं?A. प्रसिद्ध पातकीB. प्रसिद्ध भक्तC. महाकविD. श्रेष्ठ कथाकार |
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Answer» A. प्रसिद्ध पातकी |
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| 29063. |
माया के प्रति विवश होकर कौन-कौन सोचते हैं? |
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Answer» देवता, राक्षस, मुनि, नाग (हाथी), मनुष्य – ये सब माया के प्रति विवश होकर सोचते हैं। |
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| 29064. |
कवि पाप पुंजहारी किसे कहते हैं? |
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Answer» कवि भगवान श्रीराम को ‘पापपुंजहारी’ कहते हैं। |
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| 29065. |
तुलसीदास भगवान श्रीराम की शरण क्यों चाहते हैं? |
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Answer» तुलसीदास भगवान श्रीराम की शरण चाहते हैं। क्योंकि, राम के समान दु:खों को दूर करनेवाला दूसरा कोई नहीं हैं। |
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| 29066. |
तुलसीदास के मत से कौन पतितपावन हैं.? |
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Answer» तुलसीदासजी के मत से उनके स्वामी श्रीराम पतितपावन हैं। |
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| 29067. |
भगवान ने हठ करके किनका उद्धार किया? |
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Answer» भगवान ने हठ करके पक्षी, मृग, व्याध, पाषाण, वृक्ष और यवन का उद्धार किया। |
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| 29068. |
वास्तव में तुलसीदास क्या चाहते हैं? |
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Answer» वास्तव में तुलसीदास किसी भी तरह भगवान के चरणों – की शरण पाना चाहते हैं। |
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| 29069. |
प्रभु दानी है, तो कवि क्या है? |
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Answer» प्रभु दानी हैं, तो कवि भिखारी हैं। |
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| 29070. |
दयालु और दानी भगवान के सामने तुलसीदास अपने आपको क्या मानते है? |
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Answer» दयालु और दानी भगवान के सामने तुलसीदास अपने आपको दीन और भिखारी मानते हैं। |
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| 29071. |
तुलसीदास भगवान से कोई भी नाता जोड़ने को क्यों तैयार है? |
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Answer» तुलसीदास भगवान से कोई भी नाता जोड़ने को तैयार हैं, क्योंकि वे भगवान की शरण पाना चाहते हैं। |
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| 29072. |
तुलसीदासजी प्रभु के चरणों को छोड़कर कहीं ओर क्यों नहीं जाना चाहते हैं? |
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Answer» तुलसीदासजी के अनुसार प्रभु श्रीराम पतितपावन हैं। वे दौन-दुःखी जनों के प्रेमी हैं। उन्होंने हठ करके अनेक दुष्टों का उद्धार किया है। पक्षी, मृग, व्याध, पाषाण, वृक्ष और यवन का उद्धार करने में भी उन्होंने देर नहीं की। बाकी देवता, मुनि और मनुष्य आदि माया के वशीभूत हैं। उनसे संबंध जोड़ने का अर्थ नहीं है। श्रीराम जैसी दया और सामर्थ्य और किसी में नहीं है। इसलिए तुलसीदासजी अपने प्रभु के चरणों को छोड़कर और कहीं जाना नहीं चाहते। |
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| 29073. |
भगवान को अति दीन कैसे लगते हैं? |
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Answer» भगवान को अति दीन प्रिय लगते हैं। |
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| 29074. |
शब्दसमूह के लिए एक शब्द दीजिए।जिसकी रक्षा करनेवाला कोई न हो |
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Answer» सही उत्तर है अनाथ |
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| 29075. |
शब्दसमूह के लिए एक शब्द दीजिए।पापियों का उद्धार करनेवाला ईश्वर |
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Answer» सही विकल्प है पापोद्धारक |
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| 29076. |
तुलसीदास भगवान को अपना क्या-क्या मानते हैं? |
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Answer» तुलसीदास भगवान को अपने माता, पिता, गुरु और मित्र : मानते हैं। |
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| 29077. |
नाथ तू अनाथ को, अनाथ कौन मोंसो?मो समान आरत नहि, आरतिहर तोसो॥ |
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Answer» तुलसी भगवान से कहते हैं कि जिनका संसार में कोई रक्षक नहीं है, उनकी रक्षा आप ही करते हैं। मेरे जैसा और कोई अनाथ नहीं है। इसलिए आपको हो मेरी रक्षा करनी होगी, मेरे समान कोई दुःखी नहीं है। अपने दुःख दूर करने के लिए मैं आपको ही पुकालमा, क्योंकि आपके समान दुखियों के दुःख हरनेवाला दूसरा कोई नहीं है। |
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| 29078. |
भगवान से तुलसीदास के कौन-कौन से नाते हैं? |
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Answer» तुलसीदास किसी-न-किसी प्रकार से भगवान की शरण में रहना चाहते हैं। इसलिए वे उनसे दयालु और दयापात्र, दाता और भिक्षुक, पतितपावन और पापी, अनाथों के नाथ और अनाथ का संबंध बताते हैं। इसके अतिरिक्त वे उन्हें अपने माता, पिता, गुरु और मित्र के रूप में भी देखते हैं। इस प्रकार तुलसीदास के भगवान से अनेक नाते हैं। |
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| 29079. |
तुलसीदास ने अपने और भगवान के बीच कौन-कौन से संबंध जोड़े है? क्यों? |
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Answer» तुलसीदास किसी भी रूप में भगवान से जुड़े रहना चाहते हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि भगवान दयालु है तो वह दोन अर्थात् दया के पात्र हैं। यदि प्रभु दानी हैं, वो तुलसीदासजी भिखारी हैं। प्रभु पापों का नाश करते हैं, तो तुलसीदास जैसा कोई पापी नहीं। प्रभु अनाथों के नाथ हैं, तो तुलसीदासजी जैसा कोई अनाथ नहीं। यदि प्रभु दुःख दूर करते हैं, तो तुलसीदासजी जैसा कोई दुःखी नहीं हैं। प्रभु ब्रह्म हैं, तो तुलसीदास जीव है। प्रभु स्वामी हैं, तो तुलसीदासजी सेवक हैं। भगवान ही तुलसीदास के माता, पिता, गुरु, सखा आदि सबकुछ है। इस प्रकार तुलसीदास ने भगवान से अपने अनेक संबंध जोड़े हैं। इसका कारण यह है कि वे किसी भी संबंध से भगवान की शरण पाना चाहते हैं। |
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| 29080. |
देव, दनुज, मुनि, नाग, मनुज, सब मायाबिबस बिचारे।तिनके हाथ दासतुलसी प्रभु, कहा अपनपौ हारे ॥ |
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Answer» हे भगवान राम! देवता, राक्षस, मुनि, हाथी, वृक्ष, यवन, देवता आदि सब माया के वशीभूत हैं। इनमें मुझ जैसों के प्रति अपनापन नहीं हो सकता। इसलिए इनसे किसी तरह की सहायता की आशा करना व्यर्थं है। हे प्रभु, मायारहित केवल आप ही हैं। मुझ जैसे भक्तों का ख्याल केवल आप ही रख सकते हैं। इसलिए आपके सिवा मैं और किसी की शरण में जाने की बात नहीं सोच सकता। |
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| 29081. |
खानपान की मिश्रित संस्कृति के लाभ तथा हानि लिखिए ? |
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Answer» खान-पान की मिश्रित संस्कृति के लाभ – खानपान की मिश्रित संस्कृति के करण हम विविध प्रांतों के विविध व्यंजनों को खाने का आनंद ले पाते हैं। हमारे पास अब खाने की अनेक वेराइटी हैं और हम अपनी पसंदीदा वस्तुएँ आसानी से बाजार से प्राप्त कर सकते हैं या घर में भी बना सकते हैं। इससे हम एक ही खाद्य-पदार्थ को बार-बार खाने की बोरियत से बचे रहते हैं और भोजन के प्रति हमारी रुचि बनी रहती है। खान-पान की मिश्रित संस्कृति राष्ट्रीय एकता में भी सहायक है। जब विभिन्न प्रांतों के व्यक्ति एक-दूसरे के प्रांत का भोजन पसंद करने लगते हैं तो उनके बीच आत्मीयता उत्पन्न होती है। वे एक दूसरे की संस्कृति, रहन-सहन, भाषा-बोली आदि के तौर-तरीकों के प्रति भी आकर्षित होते हैं। खान-पान की मिश्रित संस्कृति से हानियाँ-खान – पान की मिश्रित संस्कृति के कारण स्थानीय व्यंजनों को बनाने में कमी आई है। स्थानीय व्यंजन जो प्रांत विशेष की संस्कृति के परिचायक होते हैं, वे कहीं लुप्त हो रहे हैं। साथ ही उनकी गुणवत्ता में भी कमी आ रही है। खान-पान की मिश्रित संस्कृति के कारण कई बार हम व्यंजनों का सही स्वाद महीं ले पाते क्योंकि खान-पान की मिश्रित संस्कृति के कारण अक्सर पार्टियों में एक साथ ढेरों व्यंजन रख दिए जाते हैं और लोग एक ही प्लेट में सारे व्यंजन परोस लेते हैं। जिससे उन सबका स्वाद गड्ड मेड्ड हो जाता है और हम किसी भी व्यंजन का स्वाद ठीक से नहीं ले पाते। |
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| 29082. |
हम खानपान की मिश्रित संस्कृति का भरपूर आनन्द क्यों नही ले पा रहे हैं ? |
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Answer» खान-पान की मिश्रित या विविध संस्कृति यूँ तो हमें कुछ चुनने का अवसर देती है, परंतु हम उसको लाभ प्रायः नहीं उठा रहे हैं। अक्सर प्रीतिभोजों और पार्टियों में एक साथ ढेरों चीजें रख दी जाती हैं और हमें एक ही प्लेट में कई तरह के और कई बार तो बिलकुल विपरीत प्रकृति वाले व्यंजन परोस लेते हैं, जिसके कारण उनका स्वाद गड्डमड्ड हो जाता है और हम कई बार असली चीजों का असली और अलग स्वाद नहीं ले पाते। |
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| 29083. |
खानपाने के द्वारा राष्ट्रीय एकता का बीज किस प्रकार अंकुरित होगा। |
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Answer» हम विभिन्न प्रांतों के निवासी खान-पान के माध्यम से भी एक-दूसरे के निकट आते हैं। और एक-दूसरे को जानते हैं। इस दृष्टि से देखें तो खान-पान की नई संस्कृति में हमें राष्ट्रीय एकता के लिए नए बीज मिल सकते हैं। |
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| 29084. |
आजादी के बाद से नौकरियों-तबादलों का नया विस्तार हम किस रूप में देखते हैं ? |
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Answer» आजादी के बाद उद्योग-धंधों, नौकरियों, तबादलों का जो एक नया विस्तार हुआ है, उसे हम इस रूप में देखते हैं कि उसके कारण खानपान की चीजें किसी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में पहुँची । हैं। बड़े शहरों के मध्यमवर्गीय स्कूलों में जब दोपहर के वक्त बच्चों के टिफिन-डिब्बे खुलते हैं तो उनसे विभिन्न प्रदेशों के व्यंजनों की खुशबू उठती है। |
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| 29085. |
स्थानीय व्यंजनों को बनाने में कमी क्यों आई है ? |
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Answer» एक प्रांत का व्यंजन दूसरे प्रांत में आसानी से मिल जाता है। ये विविध व्यंजन लोगों को आकर्षित करते हैं। इसलिए स्थानीय व्यंजनों की माँग कम होने लगी है। फलस्वरूप इन्हें बनाने में कमी आई है। |
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| 29086. |
स्थानीय व्यंजनों के पुनरुद्धार की आवश्यकता क्यों है ? |
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Answer» विभिन्न प्रांतों के विविध व्यंजन आसानी से उपलब्ध हो जाने के कारण स्थानीय व्यंजनों को बनाने में कमी आती जा रही है। स्थानीय व्यंजन प्रांत विशेष की पहचान होंते हैं, वहाँ की संस्कृति के परिचायक होते हैं। उनका लुप्त होना दुर्भाग्यपूर्ण है। अतः प्रांतीय व्यंजन का पुनरुद्धार जरूरी है। |
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| 29087. |
खानपान के निर्माण से लेकर भोजन ग्रहण करने तक की प्रक्रिया में स्वच्छता तथा सफाई की जो-जो बातें ध्यान देने योग्य हैं, उन्हें लिखिए। |
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Answer» खाना बनाने से पहले, खाने से पहले, खाने के बाद हाथों को अच्छी तरह साबुन से धोना चाहिए। रसोई की साफ-सफाई विशेष तौर पर करनी चाहिए। सिंक, वॉश बेसिन आदि जैसी जगहों पर नियमित रूप से सफाई करनी चाहिए। खाने की किसी भी वस्तु को खुला नहीं छोड़ना चाहिए। कच्चे और पके हुए खाने को अलग-अलग रखना चाहिए। खाना पकाने तथा खाने के लिए उपयोग में आने वाले बर्तनों, फ्रिज, ओवन आदि को भी साफ रखना चाहिए। कभी भी गीले बर्तनों को रैक में नहीं रखना चाहिए, न ही बिना सूखाए डिब्बों आदि के ढक्कन लगाकर रखना चाहिए। ताजी सब्जियों-फलों । का प्रयोग करना चाहिए। उपयोग में आने वाले मसाले, अनाजों तथा अन्य सामग्री का भंडारण भी सही तरीके से करना चाहिए तथा एक्सपायरी डेट वाली वस्तुओं पर तारीख अवश्य देखनी चाहिए। बहुत ज्यादा तेल, मसालों से बने, भोजन का उपयोग नहीं करना चाहिए। खाने को सही तापमान पर पकाना चाहिए और ज्यादा पकाकर सब्जियों आदि के पौष्टिक तत्व नष्ट नहीं करने चाहिए। साथ ही ओवन का प्रयोग करते समय तापमान का खास ध्यान रखना चाहिए। खाद्य पदार्थों को हमेशा ढककर रखना चाहिए और ताजा भोजन ही खाना चाहिए। खाना पकाने तथा पीने के लिए साफ पानी का उपयोग करना चाहिए। सब्जियों तथा फलों को अच्छी तरह धोकर प्रयोग में लाना चाहिए। खाना पकाने के लिए सोयाबीन, सनफ्लावर, मक्का या ऑलिव ऑइल के प्रयोग को प्राथमिकता देनी चाहिए। खाने में शक्कर तथा नमक दोनों की मात्रा का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। जंकफूड, सॉफ्ट ड्रिंक तथा आर्टिफिशियल शक्कर से बने जूस आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए। रात का खाना जितनी जल्दी हो, खा लेना चाहिए। |
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| 29088. |
समानार्थी शब्द लिखिए।अधमदनुजमनुजपातकीआरतचेरो |
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Answer» 1. नीच 2. राक्षस 3. मनुष्य 4. पापी 5. दुःखी 6. दास |
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| 29089. |
‘तोहि-मोहि नाते अनेक, मानिए जो भावे’ का भावार्थ स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» तुलसीदास ने भगवान से अपने अनेक नाते बताए हैं। वे भगवान से कहते हैं कि इनमें से जो नाता आपको स्वीकार हो, उस नाते से मेरे से जुड़े रहें। तुलसी जानते हैं कि जब तक भगवान से एक निश्चित नाता नहीं होता तब तक भक्ति करने में आनंद नहीं आता। एक नाता जुड़ जाने से ही भक्ति में गहराई आती है। उससे भगवान को एक निश्चित संबोधन से पुकारने में सरलता होती है और अपनत्व बढ़ाने में मदद मिलती है। इसलिए तुलसीदास भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे उनसे कोई एक निश्चित नाता बनाकर उन्हें अपना ले। |
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| 29090. |
निम्नलिखित प्रत्येक वाक्य में से विशेषण पहचानकर लिखिए :मैं बड़ा पापी हूँ और तू पापों को दूर करनेवाला है।हे प्रभु! तू ही मेरा हितैषी है, और कोई नहीं।तुलसीदास भगवान से कोई निश्चित नाता बनाकर उनके हो जाना चाहते है।प्रभु राम दानी हैं और तुलसीदास भीख मांगनेवाले हैं। |
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Answer» 1. पापी 2. हितैषी 3. निश्चित 4. दानी |
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| 29091. |
निम्नलिखित विधान ‘सही’ हैं या ‘गलत’ यह बताइए :भगवान को अत्यंत दीन लोग ही प्रिय हैं।तुलसीदासजी राम को अपना परिचय अत्यंत पापी के रूप में कराते हैं।श्रीराम परम-ब्रह्म हैं।तुलसीदासजी राम से किसी भी तरह से नाता जोड़ना नहीं चाहते। |
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Answer» 1. सही 2. सही 3. सही 4. गलत |
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| 29092. |
निम्नलिखित शब्दों के प्रत्यय पहचानकर लिखिए :पापीत्यागीबड़ाईबड़प्पनशिकारीबुराईयशोदादयालुसामार्थ्यअपनत्वदनुजमनुजमायारहितरक्षकसहायताअरतहरउद्धारकपातकी |
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Answer» 1. पापी – पाप + ई 2. त्यागी – त्याग + ई 3. बड़ाई – बड़ा + ई 4. बड़प्पन – बड़ा + पन 5. शिकारी – शिकार + ई 6. बुराई – बुरा + ई 7. यशोदा – यश + दा 8. दयालु – दया + लु 9. सामार्थ्य – समर्थ + य 10. अपनत्व – अपना + त्व 11. दनुज – दनु + ज 12. मनुज – मनु + ज 13. मायारहित – माया + रहित 14. रक्षक – रक्षा + क 15. सहायता – सहाय + ता 16. अरतहर – अरत + हर 17. उद्धारक – उद्धार + क 18. पातकी – पातक + ई |
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| 29093. |
निम्नलिखित शब्दसमूह के लिए एक शब्द लिखिए :किसी दूसरे स्थान परदुःखों को दूर करनेवाला |
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Answer» 1. अन्यत्र 2. आरतिहर |
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| 29094. |
निम्नलिखित शब्दों के उपसर्ग पहचानकर लिखिए :समर्पणअटूटअनेकसुवर्णअनुचरअनाथउद्धारअनर्थसमर्थअत्यंतअवकृपाअसमान |
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Answer» 1. समर्पण – सम् + अर्पण 2. अटूट – अ + टूट 3. अनेक – अन् + एक 4. सुवर्ण – सु + वर्ण 5. अनुचर – अनु + चर 6. अनाथ – अ+ नाथ 7. उद्धार – उत् + धार 8. अनर्थ – अन् + अर्थ 9. समर्थ – सम् + अर्थ 10. अत्यंत – अति + अंत 11. अवकृपा – अब + कृपा 12. असमान – अ + समान |
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| 29095. |
निम्नलिखित शब्दों के विरोधी शब्द लिखिए :विनयपापीमानवदानीकृपाउद्धारसमान |
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Answer» 1. उदंडता 2. पुण्यशाली 3. दानव 4. भिखारी 5. अवकृपा 6. पतन 7. असमान |
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| 29096. |
दीनबन्धु कौन है?A. धनवानB. बलवानC. मनुष्यD. भगवान |
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Answer» सही विकल्प है D. भगवान |
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| 29097. |
निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची शब्द लिखिए :विधिखगबिटपव्याधदीनतातसखानाताशरण |
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Answer» 1. प्रकार 2. पक्षी 3. वृक्ष 4. शिकारी 5. दरिद्र 6. पिता 7. मित्र 8. रिश्ता 9. आश्रय |
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| 29098. |
रहीम कड़वे मुखवाली मनुष्य की प्रकृति को कैसे समझाते हैं? |
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Answer» कड़वे मुखवाले मनुष्य की प्रकृति कड़वी ककड़ी के समान होती है। कुछ लोगों की जबान कड़वी होती है। वे हमेशा कड़वे बोल हो बोलते हैं। वे यह नहीं सोचते कि उनकी कड़वी वाणी सुननेवालों को कितनी चोट पहुंचाती है। ऐसे लोगों का मुंह ककड़ी के मुंह के समान होता है। कटुवाणी बोलकर दूसरे के दिल को चोट पहुंचाना अपराध है। इसलिए ककड़ी का मुंह काटकर उस पर नमक लगाने जैसी सजा ककड़ी को दी जाती है, वैसी ही सजा इन कड़वी जबानवालों को भी देनी चाहिए। |
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| 29099. |
लोग किसके सगे होते हैं?A. अपनों केB. परायों केC. संपत्ति केD. विपत्ति के |
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Answer» C. संपत्ति के |
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| 29100. |
कौआ और कोयल का भेद कब खुलता है ? |
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Answer» कौआ और कोयल शक्ल-सूरत और रंग-रूप में एक जैसे दिखाई देते हैं। उनका भेद तब खुलता है, जब वसंत ऋतु आती है और कोयल कुहू कुहू कर मीठे बोल बोलती है। तब पता चल जाता है कि उनमें से कोयल कौन है और कौआ कौन है? |
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