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This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

28951.

राम नगर की लड़ाई ( 22 नवम्बर, 1848) में किस की हार हुई?

Answer»

राम नगर की लड़ाई ( 22 नवम्बर, 1848) में अंग्रेजों की हार हुई।

28952.

चन्द्रशेखर आजाद ने ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” की स्थापना कहाँ पर की थी ?(क) पंजाब में(ख) इलाहाबाद में(ग) दिल्ली में(घ) लखनऊ में

Answer»

सही विकल्प है (ग) दिल्ली में

28953.

पहला आंग्ल-सिक्ख युद्ध कब हुआ?

Answer»

1845-46 में।

28954.

भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर सन् 1907 ई० को हुआ तथा उन्हें फाँसी 23 मार्च सन् 1931 ई० को दी गयी। बताइए कि वे कुल कितने समय जीवित रहे ?

Answer»

भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को हुआ था और उन्हें फाँसी 23 मार्च 1931 को हुई। इस प्रकार वे कुल 23 वर्ष, 5 महीने और 25 दिन जीवित रहे।

28955.

‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की स्थापना कब की गयी थी ?

Answer»

‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना सन् 1924 ई० में कानपुर में की गयी थी।

28956.

पंजाब को 1849 ई० में अंग्रेजी साम्राज्य में शामिल करने वाला भारत का गवर्नर जनरल था(A) लॉर्ड कर्जन(B) लॉर्ड डल्हौज़ी(C) लॉर्ड वैलजली(D) लॉर्ड माउंटबेटन

Answer»

सही विकल्प है (B) लॉर्ड डल्हौज़ी

28957.

पहला आंग्ल-सिक्ख युद्ध हुआ(A) 1843-44 ई० में(B) 1847-48 ई० में(C) 1830-31 ई० में(D) 1845-46 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (D) 1845-46 ई० में

28958.

भैरोंवाल की सन्धि कब हुई?

Answer»

26 दिसम्बर, 1846 को।

28959.

भैरोंवाल की सन्धि क्यों की गई?

Answer»

लाहौर की संधि के अनुसार महाराजा और नागरिकों की सुरक्षा के लिए लाहौर में एक वर्ष के लिए अंग्रेजी सेना रखी गई थी। अवधि समाप्त होने पर लॉर्ड हार्डिंग ने इस सेना को वहां स्थायी रूप से रखने की योजना बनाई। परन्तु महारानी जिंदां को यह बात मान्य नहीं थी। इसलिए 15 दिसम्बर, 1846 ई० को लाहौर दरबार के मंत्रियों और सरदारों की एक विशेष सभा बुलाई गई। इस सभा में गवर्नर जनरल की केवल उन्हीं शर्तों का उल्लेख किया गया जिनके आधार पर सिक्ख 1846 ई० के बाद लाहौर में अंग्रेजी सेना रखने के लिए सहमत हुए थे। इस प्रकार महारानी जिंदा तथा प्रमुख सिक्ख सरदारों ने 16 दिसंबर, 1846 को भैरोंवाल के संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।

28960.

लाहौर की दूसरी सन्धि कब हुई?

Answer»

11 मार्च, 1846 को।

28961.

प्रथम आंग्ल-सिक्ख युद्ध की किस लड़ाई में सिक्खों की जीत हुई?

Answer»

बद्दोवाल की लड़ाई में।

28962.

मुदकी की लड़ाई में सिक्खों की हार क्यों हुई?

Answer»

(1) सिक्ख सरदार लाल सिंह ने गद्दारी की और युद्ध के मैदान से भाग निकला।

(2) अंग्रेजों की तुलना में सिक्ख सैनिकों की संख्या कम थी।

28963.

सभराओं की लड़ाई हुई(A) 10 फरवरी, 1846 ई०(B) 10 फरवरी, 1849 ई०(C) 20 फरवरी, 1846 ई०(D) 10 फरवरी, 1830 ई०

Answer»

सही विकल्प है (A) 10 फरवरी, 1846 ई०

28964.

महाराजा दलीप सिंह के बारे में आप क्या जानते हैं?

Answer»

महाराजा दलीप सिंह पंजाब (लाहौर राज्य) का अंतिम सिक्ख शासक था। प्रथम ऐंग्लो-सिक्ख युद्ध के समय वह नाबालिग था। अत: 1846 ई० की भैरोंवाल की सन्धि के अनुसार लाहौर-राज्य के शासन प्रबन्ध के लिए एक कौंसिल ऑफ़ रीजैंसी की स्थापना की गई। इसे महाराजा के बालिग होने तक कार्य करना था। परन्तु दूसरे ऐंग्लो-सिक्ख युद्ध में सिक्ख पुनः पराजित हुए। परिणामस्वरूप महाराजा दलीप सिंह को राजगद्दी से उतार दिया गया और उसकी 4-5 लाख रु० के बीच वार्षिक पेंशन निश्चित कर दी गई। पंजाब अंग्रेजी साम्राज्य का अंग बन गया।

28965.

भगतसिंह को फाँसी दी गयी(क) 23 मार्च, 1925 ई० को(ख) 23 मार्च, 1927 ई० को(ग) 23 मार्च, 1931 ई० को(घ) 23 मार्च, 1935 ई० को

Answer»

सही विकल्प है (ग) 23 मार्च, 1931 ई० को

28966.

बंगाल में क्रान्तिकारी गतिविधियों का नेतृत्व किस-किसने किया?

Answer»

बंगाल में क्रान्तिकारी गतिविधियों का नेतृत्व सुभाषचन्द्र बोस और जे०एम० सेन गुप्त ने किया।

28967.

पंजाब तथा बंगाल की प्रमुख क्रान्तिकारी गतिविधियों पर प्रकाश डालिए।

Answer»

क्रान्तिकारी आन्दोलन उन्नीसवीं सदी के अन्त तथा बीसवीं सदी के शुरू में भारत में चला। यह आन्दोलन तिलक-पक्षीय राजनीतिक उग्रवाद से बिल्कुल भिन्न था। क्रान्तिकारी लोग अपीलों, प्रेरणाओं और शान्तिपूर्ण संघर्षों में विश्वास नहीं रखते थे। उनका यह निश्चित मत था कि पशु बल से स्थापित किये गये साम्राज्यवाद को हिंसा के बिना उखाड़ फेंकना सम्भव नहीं। ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रियावादी और दमन नीति ने उन्हें निराश कर दिया थी। वे प्रशासन और उसके हिन्दुस्तानी सहायकों की हिम्मत पस्त करने के लिए हिंसात्मक कार्य में विश्वास रखते थे। वे अपने आन्दोलन को चलाने के लिए सशस्त्र आक्रमण करना तथा राजकोषों पर डकैती डालने के कार्य को बुरा नहीं समझते थे। इस आन्दोलन में विदेशों में स्थित राष्ट्रवादी भारतीयों ने भी खुलकर भाग लिया।

क्रान्तिकारी आन्दोलन के केन्द्र एवं गतिविधियाँ

क्रान्तिकारी राष्ट्रवादियों का सर्वप्रथम केन्द्र महाराष्ट्र था। सन् 1899 ई० में जनता की घृणा के पात्र रैण्ड और रिहर्स्ट की हत्या कर दी गयी जिसमें श्यामजी कृष्ण वर्मा का हाथ था। वह भागकर लन्दन पहुँच गये। जहाँ उन्होंने सन् 1905 ई० में इण्डियन होमरूल सोसायटी की स्थापना की। उनकी सहायता से विनायक दामोदर सावरकर भी लन्दन पहुँचकर ‘इण्डिया हाउस’ में क्रान्तिकारी दल के नेता हो गये। वी० डी० सावरकर ने ‘अभिनव भारत’ सोसायटी के सदस्यों के लिए पिस्तौलें भेजने की व्यवस्था की। विनायक सावरकर के भाई गणेश सावरकर पर अभियोग चलाया गया तथा सन् 1909 ई० में उन्हें गोली से उड़ा दिया गया।

बंगाल में क्रान्तिकारियों का नेतृत्व अरविन्द घोष के भाई वी०के० घोष ने किया। उन्होंने ‘युगान्तर’ अखबार के माध्यम से जनता को राजनीतिक और धार्मिक शिक्षा देना आरम्भ किया। वी०एन० दत्त और वी०के० घोष के नेतृत्व में अनेक क्रान्तिकारी समितियाँ बनायी गयीं जिनमें ‘अनुशीलन समिति’ प्रमुख थी। इस समिति की शाखाएँ कलकत्ता (कोलकाता) तथा ढाका में थीं। इस समिति ने आतंकवादी कार्यक्रम शुरू किया। सन् 1907 ई० में लेफ्टिनेण्ट गवर्नर की गाड़ी को बम से उड़ाने का विफल प्रयास किया गया। प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस इस समिति के महत्त्वपूर्ण सदस्य थे। चाकी ने स्वयं को गोली से उड़ा लिया, खुदीराम बोस को फाँसी दे दी गयी।

कलकत्ता (कोलकाता) षड्यन्त्र में अरविन्द घोष, वी०के० घोष, हेमचन्द्र दास, नरेन्द्र गोसाईं, के०एल० दत्त, एस०एन० बोस आदि को गिरफ्तार करके मुकदमे चलाये गये। के०एल० दत्त तथा एस०एन० बोस को फाँसी पर लटका दिया गया। क्रान्तिकारियों ने चुन-चुनकर पुलिस अफसरों, मजिस्ट्रेटों, सरकारी वकीलों, विरोधी गवाहों, गद्दारों, देशद्रोहियों आदि को गोली से उड़ा दिया।

मदनलाल ढींगरा ने इंग्लैण्ड में, भारत में आक्रमणकारियों को दी गयी अमानुषिक सजाओं के विरोध में सरं विलियम कर्जन वायली को गोली से उड़ा दिया। इस कारण उन्हें फाँसी दे दी गयी।

पॉण्डिचेरी (पुदुचेरी) भी क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र था। एम०पी० तिरुमल आचार्य और वी०वी०एस० अय्यर यहाँ के मुख्य कार्यकर्ता थे। उनके एक शिष्य वाँची अय्यर को जिला मजिस्ट्रेट को गोली से उड़ाने के अपराध में फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

क्रान्तिकारी गतिविधियों का एक केन्द्र अमेरिका के पैसिफिक तट पर था।’इण्डो-अमेरिकन एसोसिएशन तथा ‘यंग इण्डिया एसोसिएशन के मुख्य कार्यालय कैलिफोर्निया में थे तथा अन्य स्थानों पर इनकी शाखाएँ थीं। इनके कार्यकर्ता मुख्यत: बंगाली छात्र थे जिन्हें आयरिश-अमेरिकन छात्रों का सहयोग प्राप्त था। बंगाल और पंजाब में सन् 1913-16 ई० के दौरान क्रान्तिकारी आन्दोलन उग्र रूप में था। पंजाब के कुछ क्रान्तिकारियों ने भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग की जान लेने की कोशिश की। दिल्ली षड्यन्त्र केस में अमीरचन्द, अवध बिहारी, बालमुकुन्द, बसन्त कुमार और विश्वास को मौत की सजा हुई। कनाडा के सिक्ख लोगों के लौटने से पंजाब में क्रान्तिकारी आन्दोलन को बल मिला।

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक पार्टी ने सरकार के दमन और आतंक का मुकाबला करते हुए क्रान्तिकारी आन्दोलन को बल दिया। सरदार भगतसिंह, यतीन्द्रनाथ दास और चन्द्रशेखर आजाद जैसे क्रान्तिकारियों ने देश के लिए अपना जीवन दे दिया।

28968.

द्वितीय सिक्ख युद्ध पर नोट लिखें।

Answer»

1848 ई० में अंग्रेज़ों और सिक्खों में पुनः युद्ध छिड़ गया। अंग्रेजों ने मुलतान के लोकप्रिय गवर्नर दीवान मूलराज को ज़बरदस्ती हटा दिया था। यह बात वहां के नागरिक सहन न कर सके और उन्होंने अनेक अंग्रेज़ अफसरों को मार डाला। अत: लॉर्ड डल्हौजी ने सिक्खों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध की महत्त्वपूर्ण लड़ाइयां रामनगर (22 नवम्बर, 1848 ई०), मुलतान (दिसम्बर, 1848 ई०), चिलियांवाला (13 जनवरी, 1849 ई०) और गुजरात (पंजाब) (फरवरी, 1849 ई०) में लड़ी गईं। रामनगर की लड़ाई में कोई निर्णय न हो सका। परन्तु मुलतान, चिलियांवाला और गुजरात (पंजाब) नामक स्थानों पर सिक्खों की हार हुई। सिक्खों ने 1849 ई० में पूरी तरह अपनी पराजय स्वीकार कर ली। इस विजय के पश्चात् अंग्रेजों ने पंजाब को अंग्रेज़ी राज्य में मिला लिया।

28969.

भगत सिंह को कब फाँसी दी गयी?(क) 23 मार्च, 1927(ख) 23 मार्च, 1931(ग) 23 मार्च, 1935(घ) 23 मार्च, 1937

Answer»

सही विकल्प है (ख) 23 मार्च, 1931

28970.

वह स्थान जहाँ चन्द्रशेखर आजाद शहीद हुए(क) कानपुर(ख) इलाहाबाद(ग) लखनऊ(घ) झाँसी

Answer»

सही विकल्प है (ख) इलाहाबाद

28971.

प्रथम अंग्रेज़-सिक्ख युद्ध के परिणामस्वरूप लाहौर की संधि हुई(A) मार्च, 1849 ई० में(B) मार्च, 1843 ई० में(C) मार्च, 1846 ई० में(D) मार्च, 1835 ई० में

Answer»

सही विकल्प है (C) मार्च, 1846 ई० में

28972.

दूसरा अंग्रेज़-सिक्ख युद्ध कब हुआ?

Answer»

1848-49 में।

28973.

दूसरे आंग्लो-सिक्ख युद्ध की घटनाएं बताओ।

Answer»

द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध नवम्बर, 1848 ई० में अंग्रेज़ी सेना द्वारा सतलुज नदी को पार करने के पश्चात् आरम्भ हुआ।

इस युद्ध की प्रमुख घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है-

1. रामनगर की लड़ाई- दूसरे आंग्ल-सिक्ख युद्ध में अंग्रेज़ों तथा सिक्खों के बीच पहली लड़ाई रामनगर की थी। अंग्रेज़ सेनापति जनरल गफ (General Gough) ने 16 नवम्बर, 1848 ई० के दिन रावी नदी पार की तथा 22. नवम्बर को रामनगर पहुंचा। वहां पहले से ही शेर सिंह अटारीवाला के नेतृत्व में सिक्ख सेना एकत्रित थी। रामनगर के स्थान पर दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ, परन्तु इसमें हार-जीत का कोई फैसला न हो सका।

2. चिलियांवाला की लड़ाई- 13 जनवरी, 1849 ई० को जनरल गफ के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेनाएं चिलियांवाला गांव में पहुँची जहां सिक्खों की एक शक्तिशाली सेना थी। जनरल गफ ने आते ही अंग्रेज सेनाओं को शत्रु पर आक्रमण करने का आदेश जारी कर दिया। दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ परन्तु हार-जीत का कोई फैसला इस बार भी न हो सका। इस युद्ध में अंग्रेजों के 602 व्यक्ति मारे गए तथा 1651 घायल हुआ। सिक्खों के भी बहुत-से लोग मारे गए और उन्हें 12 तोपों से हाथ धोना पड़ा।

3. मुलतान की लड़ाई- अप्रैल 1848 में दीवान मूलराज ने मुलतान पर दोबारा अधिकार कर लिया था। इस पर अंग्रेजों ने एक सेना भेज कर मुलतान को घेर लिया। मूलराज ने डट कर मुकाबला किया परन्तु एक दिन अचानक एक गोले के फट जाने से उसके सारे बारूद में आग लग गई। परिणामस्वरूप मूलराज और अधिक दिनों तक अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध जारी न रख सका। 22 जनवरी, 1849 ई० को उसने हथियार डाल दिए। मुलतान की विजय से अंग्रेजों का काफ़ी मान बढ़ा।

4. गुजरात की लड़ाई- अंग्रेज़ों और सिक्खों के बीच निर्णायक लड़ाई गुजरात में हुई। इस लड़ाई से पहले शेर सिंह और चतर सिंह आपस में मिल गए। महाराज सिंह तथा अफ़गानिस्तान के अमीर दोस्त मुहम्मद ने भी सिक्खों का साथ दिया। परंतु गोला बारूद समाप्त हो जाने तथा शत्रु की भारी सैनिक संख्या के कारण सिक्ख पराजित हुए।

28974.

प्रथम ऐंग्लो-सिक्ख युद्ध के क्या परिणाम निकले?

Answer»
  1. दोआब बिस्त जालन्धर पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।
  2. दिलीप सिंह को महाराजा बनाया गया और एक कौंसिल स्थापित की गई जिसमें आठ सरदार थे।
  3. सर हैनरी लारेंस को लाहौर का रैजीडेंट नियुक्त कर दिया गया।
  4. सिक्खों को 1 करोड़ रुपया दण्ड के रूप में देना था, लेकिन उनके कोष में केवल 50 लाख रुपया था। बाकी रुपया उन्होंने जम्मू और कश्मीर का प्रान्त गुलाब सिंह को बेच कर पूरा किया।
  5. लाहौर में एक अंग्रेज़ी सेना रखने की व्यवस्था की गई। इस सेना के 22 लाख रुपया वार्षिक खर्चे के लिए खालसा दरबार उत्तरदायी था।
  6. सिक्ख सेना पहले से घटा दी गई। अब उसकी सेना में केवल 20 हज़ार पैदल सैनिक रह गये थे।
28975.

दूसरे आंग्लो-सिक्ख युद्ध के कारण बताओ।

Answer»

दूसरा आंग्ल-सिक्ख युद्ध 1848-49 ई० में हुआ। इसमें भी अंग्रेजों को विजय प्राप्त हुई और पंजाब को अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया गया। इस युद्ध के कारण निम्नलिखित थे —

1. सिक्खों के विचार– पहले आंग्ल-सिक्ख युद्ध में सिक्खों की पराजय अवश्य हुई थी परन्तु उनके साहस में कोई कमी नहीं आई थी। उनको अब भी अपनी शक्ति पर पूरा विश्वास था। उनका विचार था कि वे पहली लड़ाई में अपने साथियों की गद्दारी के कारण हार गए थे। अतः अब वे अपनी शक्ति को एक बार फिर आज़माना चाहते थे।

2. अंग्रेज़ों की सुधार नीति- अंग्रेज़ों के प्रभाव में आकर लाहौर दरबार ने अनेक प्रगतिशील पग (Progressive measures) उठाये। एक घोषणा द्वारा सती प्रथा, कन्या वध, दासता, बेगार तथा ज़मींदारी प्रथा की घोर निन्दा की गई। पंजाब के लोग अपने धार्मिक तथा सामाजिक जीवन में इस प्रकार के हस्तक्षेप को सहन न कर सके। अत: उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिये।

3. रानी जिन्दां तथा लाल सिंह से कठोर व्यवहार- रानी जिंदां का सिक्ख बड़ा आदर करते थे, परन्तु अंग्रेजों ने उसे षड्यन्त्रकारिणी उहराया और उसे निर्वासित करके शेखपुरा भेज दिया। अंग्रेजों के इस कार्य से सिक्खों के क्रोध की सीमा न रही। इसके अतिरिक्त वे अपने प्रधानमन्त्री लाल सिंह के विरुद्ध अंग्रेजों के कठोर व्यवहार को भी सहन न कर सके और उन्होंने अपनी रानी तथा अपने प्रधानमन्त्री के अपमान का बदला लेने का निश्चय कर लिया।

4. अंग्रेज़ अफसरों की उच्च पदों पर नियुक्ति- भैंरोवाल की सन्धि से पंजाब में अंग्रेजों की शक्ति काफ़ी बढ़ गई थी। अब उन्होंने पंजाब को अपने नियन्त्रण में लेने के लिए धीरे-धीरे सभी उच्च पदों पर अंग्रेज़ अफसरों को नियुक्त करना आरम्भ कर दिया था। सिक्खों को यह बात बहुत बुरी लगी और वे पंजाब को अंग्रेजों से मुक्त कराने के विषय में गम्भीरता से सोचने लगे।

5. सिक्ख सैनिकों की संख्या में कमी- लाहौर की सन्धि के अनुसार सिक्ख सैनिकों की संख्या घटा कर 20 हज़ार पैदल तथा 12 हजार घुड़सवार निश्चित कर दी गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि हजारों सैनिक बेकार हो गए। बेकार सैनिक अंग्रेजों के घोर विरोधी हो गए। इसके अतिरिक्त अंग्रेजों ने उन सैनिकों के भी वेतन घटा दिये जो कि सेना में काम कर रहे थे। परिणामस्वरूप उन में भी असन्तोष फैल गया और वे भी अंग्रेज़ों को पंजाब से बाहर निकालने के लिए तैयारी करने लगे।

6. मुलतान के दीवान मूलराज का विद्रोह- मूलराज मुल्तान का गवर्नर था। अंग्रेजों ने उसके स्थान पर काहन सिंह को मुलतान का गवर्नर नियुक्त कर दिया। इस पर मुलतान के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और मूलराज ने फिर मुलतान पर अधिकार कर लिया। धीरे-धीरे इस विद्रोह की आग सारे पंजाब में फैल गई।

7. भाई महाराज सिंह का विद्रोह- भाई महाराज सिंह नौरंगबाद के संत भाई वीर सिंह का शिष्य था। उसने सरकार-ए-खालसा को बचाने के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। अतः ब्रिटिश रैजीडेंट हैनरी.लारेंस ने उसे बंदी बनाने के आदेश जारी किए। परन्तु उसे पकड़ा न जा सका। उसने अपने अधीन सैंकड़ों लोग इकट्ठे कर लिए। मूलराज की प्रार्थना पर वह उसकी सहायता के लिए 400 घुड़सवारों सहित मुलतान भी गया। परन्तु अनबन हो जाने के कारण वह मूलराज को छोड़ कर चतर सिंह अटारीवाला तथा उसके पुत्र शेर सिंह से जा मिला।

8. हज़ारा के चतर सिंह का विद्रोह- चतर सिंह अटारीवाला को हज़ारा का गवर्नर नियुक्त किया गया था। उसकी सहायता के लिए कैप्टन ऐबट को रखा गया था। परन्तु ऐबट के अभिमानपूर्ण व्यवहार के कारण चतर सिंह को अंग्रेजों पर संदेह होने लगा। इसी बीच कैप्टन ऐबट ने चतर सिंह पर यह आरोप लगाया कि उसकी सेनाएं मुलतान के विद्रोहियों से जा मिली हैं। चतर सिंह इसे सहन न कर सका और उसने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

9. शेर सिंह का विद्रोह- जब शेर सिंह को यह पता चला कि उसके पिता चतर सिंह को हज़ारा के नाज़िम (गवर्नर) के पद से हटा दिया गया है, तो उसने भी अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। वह अपने सैनिकों सहित मूलराज के साथ जा मिला। शेर सिंह ने एक घोषणा के अनुसार ‘सब अच्छे सिक्खों’ से अपील की कि वे अत्याचारी और धोखेबाज़ फिरंगियों को पंजाब से बाहर कर दें। अतः अनेक पुराने सैनिक अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह में शामिल हो गए।

10. पंजाब पर अंग्रेजों का हमला- मूलराज, चतर सिंह और शेर सिंह द्वारा विद्रोह कर देने के बाद लॉर्ड डल्हौज़ी ने अपनी पूर्व निश्चित योजना को कार्यकारी रूप देना आरम्भ कर दिया। डल्हौज़ी के आदेश पर ह्यूग गफ (Hugh Gough) के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना नवम्बर, 1848 ई० को लाहौर पहुंच गई। यह सेना आते ही विद्रोहियों का दमन करने में जुट गई।

यह द्वितीय आंग्ल-सिक्ख युद्ध का आरम्भ था।

28976.

भैरोंवाल की सन्धि का क्या महत्त्व है?

Answer»

भैरोंवाल की संधि पंजाब और भारत के इतिहास में बड़ा महत्त्व रखती है-

  1. इस सन्धि द्वारा अंग्रेज़ पंजाब के स्वामी बन गए। लाहौर राज्य के प्रशासनिक मामलों में ब्रिटिश रैजीडेंट को असीमित अधिकार तथा शक्तियाँ प्राप्त हो गईं। हैनरी लारेंस को पंजाब में पहला रैजीडेंट नियुक्त किया गया।
  2. इस सन्धि द्वारा महारानी जिंदां को राज्य प्रबन्ध से अलग कर दिया गया। पहले उसे शेखुपुरा भेज दिया गया। परन्तु बाद में उसे देश निकाला देकर बनारस भेज दिया गया।
28977.

भैरोंवाल की सन्धि के पश्चात् अंग्रेजों ने रानी जिंदां के साथ कैसा व्यवहार किया?

Answer»

भैरोंवाल की सन्धि के अनुसार महारानी जिंदां को सभी राजनीतिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। उसका लाहौर के राज्य प्रबंध से कोई संबंध न रहा। यही नहीं उसे अनुचित ढंग से कैद कर लिया गया और उसे शेखुपुरा के किले में भेज दिया गया। उसकी पेंशन डेढ़ लाख से घटा कर 48 हज़ार रु० कर दी गई। तत्पश्चात् उसे देश निकाला देकर बनारस भेज दिया गया। इस प्रकार महारानी जिंदां से बहुत ही बुरा व्यवहार किया गया। परिणामस्वरूप पंजाब के देशभक्त सरदारों की भावनाएं अंग्रेजों के विरुद्ध भड़क उठीं।

28978.

द्वितीय सिक्ख युद्ध की चार प्रमुख घटनाएं कौन-कौन सी थीं?

Answer»

(i) रामनगर की लड़ाई
(ii) मुलतान की लड़ाई
(iii) चिलियांवाला की लड़ाई
(iv) गुजरात की लड़ाई

28979.

अंग्रेजों ने पंजाब पर कब्जा कैसे किया?

Answer»

1839 ई० में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् सिक्खों का नेतृत्व करने वाला कोई योग्य नेता न रहा। शासन की सारी शक्ति सेना के हाथ में आ गई। अंग्रेजों ने इस अवसर का लाभ उठाया और सिक्खों से दो युद्ध किये। दोनों युद्धों में सिक्ख सैनिक बड़ी वीरता से लड़े, परन्तु अपने अधिकारियों की गद्दारी के कारण वे पराजित हुए। 1849 ई० में दूसरे सिक्ख युद्ध की समाप्ति पर लॉर्ड डल्हौजी ने पूरे पंजाब को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।

अंग्रेज़ों की पंजाब विजय का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

1. पहला आंग्ल-सिक्ख युद्ध- अंग्रेज़ काफ़ी समय से पंजाब को अपने राज्य में मिलाने का प्रयास कर रहे थे। रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् अंग्रेज़ों को अपनी इच्छा पूरी करने का अवसर मिल गया। उन्होंने सतलुज के किनारे अपने किलों को मजबूत करना आरम्भ कर दिया। सिक्ख नेता अंग्रेज़ों की सैनिक तैयारियों को देखकर भड़क उठे। अतः 1845 ई० में सिक्ख सेना सतलुज को पार करके फिरोजपुर के निकट आ डटी। कुछ ही समय पश्चात् अंग्रेज़ों और सिक्खों में लड़ाई आरम्भ हो गई। इसी समय सिक्खों के मुख्य सेनापति तेज सिंह और वज़ीर लाल सिंह अंग्रेजों से मिल गये। उनके इस विश्वासघात के कारण मुदकी तथा फिरोजशाह के स्थान पर सिक्खों की हार हुई।

सिक्खों ने साहस से काम लेते हुए 1846 ई० में सतलुज को पार करके लुधियाना के निकट अंग्रेज़ों पर धावा बोल दिया। यहाँ अंग्रेज़ बुरी तरह से पराजित हुए और उन्हें पीछे हटना पड़ा। परन्तु गुलाब सिंह के विश्वासघात के कारण अलीवाल और सभराओं के स्थान पर सिक्खों को एक बार फिर हार का मुँह देखना पड़ा। मार्च, 1846 ई० में गुलाब सिंह के प्रयत्नों से सिक्खों और अंग्रेजों के बीच एक सन्धि हो गई। सन्धि के अनुसार सिक्खों को अपना काफ़ी सारा प्रदेश और डेढ़ करोड़ रुपया अंग्रेजों को देना पड़ा। दिलीप सिंह के युवा होने तक पंजाब में शान्ति व्यवस्था बनाये रखने के लिए एक अंग्रेज़ी सेना रख दी गई।

2. दूसरा आंग्ल-सिक्ख युद्ध और पंजाब का अंग्रेजी राज्य में विलय- 1848 ई० में अंग्रेजों और सिक्खों में पुनः युद्ध छिड़ गया। अंग्रेजों ने मुलतान के लोकप्रिय गवर्नर दीवान मूलराज को ज़बरदस्ती हटा दिया था। यह बात वहाँ के नागरिक सहन न कर सके और उन्होंने अनेक अंग्रेज अफसरों को मार डाला। अत: लॉर्ड डल्हौजी ने सिक्खों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध की महत्त्वपूर्ण लड़ाइयाँ रामनगर (22 नवम्बर, 1848 ई०), मुलतान (दिसम्बर, 1848 ई०) चिलियांवाला। (13 जनवरी, 1849 ई०) और गुजरात (फरवरी, 1849 ई०) में लड़ी गईं। रामनगर की लड़ाई में कोई निर्णय न हो सका। परन्तु मुलतान, चिलियांवाला और गुजरात के स्थान पर सिक्खों की हार हुई। सिक्खों ने 1849 ई० में पूरी तरह अपनी पराजय स्वीकार कर ली। इस विजय के पश्चात् अंग्रेजों ने पंजाब को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।

28980.

बब्बरों की गतिविधियों का वर्णन करो।

Answer»

बब्बरों का मुख्य उद्देश्य सरकारी पिठुओं तथा मुखबिरों का अंत करना था। इसे वे ‘सुधार करना’ कहते थे। इसके लिए उन्हें शस्त्रों की आवश्यकता थी और शस्त्रों के लिए उन्हें धन चाहिए था। अतः उन्होंने सरकारी पिठ्ठओं से धन तथा हथियार भी छीने। उन्होंने पंजाबी सैनिकों से अपील की कि वे शस्त्रों की सहायता से स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए कार्य करें। अपने कार्यों के विस्तार के लिए उन्होंने ‘बब्बर अकाली दुआबा’ नामक समाचार-पत्र निकाला। उन्होंने अनेक सरकारी पिळुओं को मौत के घाट उतार दिया। उन्होंने अपना बलिदान देकर पंजाबियों को स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए अपनी जान पर खेल जाने का पाठ पढ़ाया।

28981.

अंग्रेजों और सिक्खों की पहली लड़ाई के कारण लिखो।

Answer»

अंग्रेजों तथा सिक्खों के बीच पहली लड़ाई 1845-46 ई० में हुई। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

अंग्रेजों की लाहौर राज्य को घेरने की नीति — अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह के जीवन काल से ही लाहौर राज्य को घेरना आरम्भ कर दिया था। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1835 ई० में फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया। 1838 ई० में उन्होंने वहां एक सैनिक छावनी स्थापित कर दी। लाहौर दरबार के सरदारों ने अंग्रेजों की इस नीति का विरोध किया।

पंजाब में अशांति और अराजकता — महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में अशांति और अराजकता फैल गई। इसका कारण यह था कि उसके उत्तराधिकारी खड़क सिंह, नौनिहाल सिंह, रानी जिंदां कौर, शेर सिंह आदि निर्बल थे। अत: लाहौर दरबार में सरदारों ने एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचने आरम्भ कर दिये। अंग्रेज़ इस स्थिति का लाभ उठाना चाहते थे।

प्रथम अफ़गान युद्ध में अंग्रेजों की कठिनाइयां और असफलताएं — प्रथम ऐंग्लो-अफ़गान युद्ध के समाप्त होते ही अफ़गानों ने दोस्त मुहम्मद खां के पुत्र मुहम्मद अकबर खां के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। अंग्रेज़ विद्रोहियों को दबाने में असफल रहे। अंग्रेज सेनानायक बर्नज़ और मैकनाटन को मौत के घाट उतार दिया गया। वापस जा रहे अंग्रेज सैनिकों में से केवल एक सैनिक ही बच पाया। अंग्रेजों की इस असफलता को देखकर सिक्खों का अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए उत्साह बढ़ गया।

अंग्रेजों द्वारा सिन्ध को अपने राज्य में मिलाना — 1843 ई० में अंग्रेजों ने सिन्ध पर आक्रमण करके उसे अपने राज्य में मिला लिया। इस घटना ने उनकी महत्त्वाकांक्षा को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया। सिक्खों ने यह जान लिया कि साम्राज्यवादी अंग्रेज़ सिन्ध की भान्ति पंजाब के लिए भी काल बन सकते हैं। वैसे भी पंजाब पर अधिकार किए बिना सिन्ध पर अंग्रेजी नियन्त्रण बने रहना असम्भव था। फलतः सिक्ख अंग्रेजों के इरादों के प्रति और भी चौकन्ने हो गए।

ऐलनबरा की पंजाब पर अधिकार करने की योजना — सिन्ध को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लेने के पश्चात् लॉर्ड ऐलनबरा ने पंजाब पर अधिकार करने की योजना बनाई। इस योजना को वास्तविक रूप देने के लिए उसने सैनिक तैयारियां आरम्भ कर दी। इसका पता चलने पर सिक्खों ने भी युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी।

लॉर्ड हार्डिंग की गवर्नर जनरल के पद पर नियुक्ति — जुलाई, 1844 ई० में लॉर्ड ऐलनबरा के स्थान पर लॉर्ड हार्डिंग भारत का गवर्नर जनरल बना। वह एक कुशल सेनानायक था। उसकी नियुक्ति से सिक्खों के मन में यह शंका उत्पन्न हो गई कि हार्डिंग को जान-बूझकर भारत भेजा गया है, ताकि वह सिक्खों से सफलतापूर्वक युद्ध कर सके।

अंग्रेजों की सैनिक तैयारियां — पंजाब में फैली अराजकता ने अंग्रेजों को पंजाब पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने सैनिक तैयारियां करनी आरम्भ कर दीं। शीघ्र ही अंग्रेज़ी सेनाएं सतलुज नदी के आस-पास इकट्ठी होने लगीं। उन्होंने सिन्ध में भी अपनी सेनाओं की वृद्धि कर ली तथा सतलुज को पार करने के लिए एक नावों का पुल बना लिया। अंग्रेजों की ये गतिविधियां प्रथम सिक्ख युद्ध का कारण बनीं।

सुचेत सिंह के खजाने का मामला — डोगरा सरदार सुचेत सिंह लाहौर दरबार की सेवा में था। अपनी मृत्यु से पूर्व वह 15 लाख रुपये की धन राशि छोड़ गया था। परंतु उसका कोई पुत्र नहीं था। इसलिए लाहौर सरकार इस राशि पर अपना अधिकार समझती थी। दूसरी ओर अंग्रेज़ इस मामले को अदालती रूप देना चाहते थे। इससे सिक्खों को अंग्रेजों की नीयत पर संदेह होने लगा।

मौड़ा गांव का मामला — मौड़ा गांव नाभा प्रदेश में था। वहां के भूतपूर्व शासक ने यह गांव महाराजा रणजीत सिंह को दिया था जिसे महाराजा ने धन्ना सिंह को जागीर में दे दिया। परन्तु 1843 ई० के आरम्भ में नाभा के नये शासक तथा धन्ना सिंह में मतभेद हो जाने के कारण नाभा के शासक ने यह गांव वापस ले लिया। जब लाहौर सरकार ने इस पर आपत्ति की तो अंग्रेजों ने नाभा के शासक का समर्थन किया। इस घटना ने अंग्रेजों तथा लाहौर दरबार एवं सिक्ख सेना के आपसी सम्बन्धों को और भी बिगाड़ दिया।

ब्राडफुट की सिक्ख विरोधी गतिविधियां — नवम्बर, 1844 ई० में मेजर ब्राडफुट लुधियाना का रैजीडेंट नियुक्त हुआ। वह सिक्खों के प्रति घृणा-भाव रखता था। उसने सिक्खों के विरुद्ध कुछ ऐसे कार्य किए जिससे सिक्ख अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए।

लाल सिंह और तेज सिंह का सेना को उकसाना — सितम्बर, 1845 ई० में लाल सिंह लाहौर राज्य का प्रधानमन्त्री बना। उसी समय तेज सिंह को प्रधान सेनापति बनाया गया। अब तक सिक्ख सेना की शक्ति काफ़ी बढ़ चुकी थी। अत: लाल सिंह और तेज सिंह सिक्ख सेना से भयभीत थे। अपनी सुरक्षा के लिए ये दोनों गुप्त रूप से अंग्रेज़ी सरकार से मिल गए। सिक्ख सेना को कमजोर करने के लिए उन्होंने सिक्ख सेना को अंग्रेज़ों के विरुद्ध भड़काया।युद्ध का वातावरण तैयार हो चुका था। 13 दिसम्बर, 1845 ई० को लॉर्ड हार्डिंग ने सिक्खों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

28982.

लाहौर की पहली संधि की धाराएं लिखो।

Answer»

प्रथम ऐंग्लो-सिक्ख युद्ध के घातक परिणाम निकले। सभराओं के युद्ध में तो इतना खून बहा कि. संतलुज नदी का पानी भी लाल हो गया। इस विजय के पश्चात् यदि लॉर्ड हार्डिंग चाहता तो पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला सकता था, परन्तु कई कारणों से उसने ऐसा न किया। 9 मार्च, 1846 ई० को अंग्रेज़ों तथा सिक्खों के बीच एक सन्धि हो गई जो लाहौर की पहली सन्धि कहलाती है। इसकी मुख्य धाराएं निम्नलिखित थीं

  1. सतलुज तथा ब्यास नदियों के बीच के सारे मैदानी तथा पर्वतीय प्रदेश पर अंग्रेज़ों का अधिकार मान लिया गया।
  2. युद्ध की क्षति पूर्ति के रूप में लाहौर दरबार ने अंग्रेज़ी सरकार को डेढ़ करोड़ रुपये की धन राशि देना स्वीकार किया।
  3. दरबार की सैनिक संख्या 20,000 पैदल तथा 12,000 घुड़सवार सैनिक निश्चित कर दी गई।
  4. लाहौर दरबार ने युद्ध में अंग्रेजों से छीनी गई सभी तोपें तथा 36 अन्य तोपें अंग्रेजी सरकार को देने का वचन दिया।
  5. सिक्खों ने ब्यास तथा सतलुज के बीच दोआब के समस्त प्रदेश तथा दुर्गों पर से अपना अधिकार छोड़ दिया और उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के हवाले कर दिया।
  6. लाहौर राज्य ने यह वचन दिया कि वह अपनी सेना में किसी भी अंग्रेज़ अथवा अमरीकन को भर्ती नहीं करेगा।
  7. लाहौर राज्य अंग्रेज़ सरकार की पूर्व स्वीकृति लिये बिना अपनी सीमाओं में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं करेगा।
  8. कुछ विशेष प्रकार की परिस्थितियों में अंग्रेज़ सेनाएं लाहौर राज्य के प्रदेशों से बिना रोकथाम के गुज़र सकेंगी।
  9. सतलुज के दक्षिण पूर्व में स्थित लाहौर राज्य के प्रदेश ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिए गए।
  10. अवयस्क दलीप सिंह को महाराजा स्वीकार कर लिया गया। रानी जिन्दां उसकी प्रतिनिधि बनी और लाल सिंह प्रधानमन्त्री बना।
  11. अंग्रेजों ने यह विश्वास दिलाया कि वे लाहौर राज्य के आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। परन्तु अवयस्क महाराजा की रक्षा के लिए लाहौर में एक विशाल ब्रिटिश सेना की व्यवस्था की गई। सर लारेंस हैनरी को लाहौर में ब्रिटिश रैजीडेन्ट नियुक्त किया गया।
28983.

आजाद हिन्द फ़ौज पर विस्तारपूर्वक नोट लिखो।

Answer»

आजाद हिन्द सेना की स्थापना की पृष्ठभूमि- आजाद हिन्द सेना की स्थापना रास बिहारी बोस ने जापान में की थी। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान ब्रिटिश सेना को पराजित करके बहुत-से सैनिकों को कैदी बना कर जापान ले गया था। उनमें अधिकांश सैनिक भारतीय थे। इन सैनिकों को लेकर रास बिहारी बोस ने कैप्टन मोहन सिंह की सहायता से ‘आज़ाद हिन्द सेना’ बनाई।

रास बिहारी बोस आज़ाद हिन्द सेना का नेतृत्व सुभाष चन्द्र बोस को सौंपना चाहते थे। उस समय सुभाष जी जर्मनी में थे। अतः रास बिहारी बोस ने उन्हें जापान आने का आमन्त्रण दिया। जापान पहुंचने पर सुभाष बाबू ने आज़ाद हिन्द सेना का नेतृत्व सम्भाला। तभी से वह नेताजी सुभाषचन्द्र के नाम से लोकप्रिय हुए।

आज़ाद हिन्द सेना का स्वतन्त्रता संघर्ष-

  1. 21 अक्तूबर, 1943 को नेता जी ने सिंगापुर में ‘आज़ाद हिन्द सरकार’ की स्थापना की। उन्होंने भारतीयों का ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ कह कर आह्वान किया। शीघ्र ही उन्होंने अमेरिका तथा इंग्लैंड के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
  2. नवम्बर, 1943 ई० में जापान ने अन्दमान निकोबार नामक भारतीय द्वीपों को जीत कर आजाद हिन्द सरकार को सौंप दिया। नेता जी ने इन द्वीपों के नाम क्रमशः ‘शहीद’ और ‘स्वराज्य’ रखे।
  3. इस सेना ने 1 मार्च, 1944 ई० को असम स्थित मावडॉक चौकी को जीत लिया। इस प्रकार उसने भारत की धरती पर पाँव रखे और वहां आज़ाद हिन्द सरकार का ध्वज फहराया।
  4. तत्पश्चात् असम की कोहिमा चौकी पर भी आज़ाद हिन्द सेना का अधिकार हो गया।
  5. अब आज़ाद हिन्द सेना ने इम्फाल की महत्त्वपूर्ण चौकी जीतने का प्रयास किया, परन्तु वहाँ की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उसे सफलता न मिल सकी।

आजाद हिन्द सेना की असफलता (वापसी)- आजाद हिन्द सेना को जापान से मिलने वाली सहायता बन्द हो गई । सैन्य सामग्री के अभाव के कारण आज़ाद हिन्द सेना को पीछे हटने के लिए बाध्य होना पड़ा। पीछे हटने पर भी आजाद हिन्द सेना का मनोबल कम नहीं हुआ। परन्तु 18 अगस्त, 1945 ई० को फार्मोसा में एक विमान दुर्घटना में नेता जी का निधन हो गया। अगस्त, 1945 ई० में जापान ने भी आत्म-समर्पण कर दिया। इसके साथ ही आज़ाद हिन्द सेना द्वारा प्रारम्भ किया गया स्वतन्त्रता का संघर्ष समाप्त हो गया।

आज़ाद हिन्द सेना के अधिकारियों की गिरफ्तारी एवं मुकद्दमा- ब्रिटिश सेना ने आजाद हिन्द सेना के कुछ अधिकारियों तथा सैनिकों को इम्फाल के मोर्चे पर पकड़ लिया। पकड़े गए तीन अधिकारियों पर दिल्ली के लाल किले में देशद्रोह का मुकद्दमा चलाया गया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि तीनों दोषियों को फांसी के तख्ते पर चढ़ाया जाए, परन्तु जनता के जोश को देख कर सरकार घबरा गई। अतः उन्हें बिना कोई दण्ड दिये रिहा कर दिया गया। यह रिहाई भारतीय राष्ट्रवाद की एक महान् विजय थी।

28984.

गुरुद्वारों से सम्बन्धित सिक्खों तथा अंग्रेज़ों में बढ़ते रोष पर नोट लिखो।

Answer»

अंग्रेज़ गुरुद्वारों के महंतों को प्रोत्साहन देते थे। यह बात सिक्खों को प्रिय नहीं थी। महंत सेवादार के रूप में गुरुद्वारों में प्रविष्ट हुए थे। परन्तु अंग्रेज़ी राज्य में वे यहां के स्थायी अधिकारी बन गए। वे गुरुद्वारों की आय को व्यक्तिगत सम्पत्ति समझने लगे। महंतों को अंग्रेज़ों का आशीर्वाद प्राप्त था। इसलिए उन्हें विश्वास था कि उनकी गद्दी सुरक्षित है। अतः वे ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे। सिक्ख इस बात को सहन नहीं कर सकते थे।

28985.

द्वितीय सिक्ख युद्ध के चार कारण लिखो।

Answer»
  1. लाहौर और भैरोंवाल की सन्धि ने सिक्खों के सम्मान पर एक करारी चोट की। वे अंग्रेजों से इस अपमान का बदला लेना चाहते थे।
  2. 1847 और 1848 ई० में ऐसे सुधार किए गए जो सिक्खों के हितों के विरुद्ध थे। सिक्ख इस बात से बड़े उत्तेजित हुए।
  3. जिन सिक्ख सैनिकों को सेना से निकाल दिया गया वे अपने वेतन तथा अन्य भत्तों से वंचित हो गए थे। अतः वे भी अंग्रेजों से बदला लेने का अवसर खोज रहे थे।
  4. युद्ध का तात्कालिक कारण मुलतान के गवर्नर मूलराज का विद्रोह था।
28986.

दूसरे अंग्रेज़-सिक्ख युद्ध के समय पंजाब का शासक कौन था?

Answer»

महाराजा दलीप सिंह।

28987.

सी०आर० दास की मृत्यु के बाद बंगाल में कांग्रेसी नेतृत्व कितने गुटों में विभक्त हो गया था ?

Answer»

सी०आर० दास की मृत्यु के बाद बंगाल में कांग्रेसी नेतृत्व दो गुटों में विभक्त हो गया था।

28988.

लाला हरदयाल थे एक(क) वैज्ञानिक(ख) समाज सुधारक(ग) शिक्षाविद्(घ) क्रान्तिकारी

Answer»

सही विकल्प है (घ) क्रान्तिकारी

28989.

पहले आंग्लो-सिक्ख युद्ध के बाद अंग्रेजों ने पंजाब को अपने कब्जे में क्यों नहीं किया? कोई दो कारण बताओ।

Answer»

पहले आंग्ल-सिक्ख युद्ध के पश्चात् अंग्रेजों ने निम्नलिखित कारणों से पंजाब पर अपना अधिकार नहीं किया-

  1. सिक्ख मुदकी, फिरोजशाह और सभराओं की लड़ाइयों में अवश्य पराजित हुए थे, परन्तु लाहौर, अमृतसर, पेशावर आदि स्थानों पर अभी भी सिक्ख सैनिक तैनात थे। यदि अंग्रेज़ उस समय पंजाब पर अधिकार करते तो उन्हें इन सैनिकों का सामना भी करना पड़ता।
  2. अंग्रेजों को पंजाब में शान्ति व्यवस्था स्थापित करने के लिए आय से अधिक व्यय करना पड़ता।
  3. सिक्ख राज्य अफ़गानिस्तान तथा ब्रिटिश साम्राज्य के बीच मध्यस्थ राज्य का कार्य करता था। इसलिए अभी पंजाब पर अधिकार करना अंग्रेजों के लिए उचित नहीं था।
  4. लॉर्ड हार्डिंग पंजाबियों के साथ एक ऐसी संधि करना चाहता था, जिससे पंजाब कमजोर हो जाए, ताकि वे जब चाहे पंजाब पर अधिकार कर सकें। इसलिए उन्होंने लाहौर सरकार के साथ केवल ऐसी सन्धि की जिसके कारण लाहौर (पंजाब) राज्य आर्थिक और सैनिक दृष्टि से कमजोर हो गया।
28990.

दूसरे आंग्लो-सिक्ख युद्ध के परिणाम लिखो।

Answer»

दूसरा आंग्ल-सिक्ख युद्ध लाहौर के सिक्ख,राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ। इसके निम्नलिखित परिणाम निकले —

पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय- युद्ध में सिक्खों की पराजय के पश्चात् 29 मार्च, 1849 ई० को गवर्नर जनरल लॉर्ड डल्हौज़ी ने एक आदेश जारी किया। इसके अनुसार पंजाब राज्य को समाप्त कर दिया गया। महाराजा दलीप सिंह को गद्दी से उतार दिया गया और पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया।

मूलराज और महाराज सिंह को दण्ड- मूलराज को ऐग्न्यु और ऐंडरसन नामक अंग्रेज़ अफसरों के वध के अपराध में काले पानी की सज़ा दी गई। 29 दिसम्बर, 1849 ई० में महाराज सिंह को भी बंदी बना लिया गया। उसे आजीवन कारावास का दंड देकर सिंगापुर भेज दिया गया।

खालसा सेना को भंग करना- खालसा सेना को भंग कर दिया गया। उससे सभी शस्त्र छीन लिए गए। नौकरी से हटे सिक्ख सैनिकों को ब्रिटिश सेना में भर्ती कर लिया गया।

प्रमुख सरदारों की शक्ति का दमन- लॉर्ड डल्हौज़ी के आदेश से जॉन लारेंस ने पंजाब में प्रमुख सरदारों की शक्ति को समाप्त कर दिया। फलस्वरूप वे सरदार जो पहले धनी ज़मींदार थे और सरकार में ऊंचे पदों पर थे, अब साधारण लोगों के समान हो गए।

पंजाब में अंग्रेज अफसरों की नियुक्ति- दूसरे ऐंग्लो-सिक्ख युद्ध के परिणामस्वरूप राज्य के उच्च पदों पर सिक्खों, हिन्दुओं या मुसलमानों के स्थान पर अंग्रेजों तथा यूरोपियनों को नियुक्त किया गया। उन्हें भारी वेतन तथा भत्ते भी दिए गए।

उत्तरी-पश्चिमी सीमा को शक्तिशाली बनाना- पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित करने के बाद अंग्रेजों ने उत्तरी-पश्चिमी सीमा को शक्तिशाली बनाने के लिए सड़कों तथा छावनियों का निर्माण किया। सैनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण किलों की मुरम्मत की गई। कई नए किले भी बनाए गए। उत्तरी-पश्चिमी कबीलों को नियंत्रित करने के लिए विशेष सैनिक दस्ते भी बनाए गए।

पंजाब के राज्य प्रबन्ध की पुनर्व्यवस्था- पंजाब पर अंग्रेजों का अधिकार हो जाने के पश्चात् प्रशासन समिति (Board of Administration) की स्थापना की गई। इसका प्रधान हैनरी लारेंस था। पंजाब प्रांत के प्रबन्धकीय ढाँचे को पुनः संगठित किया गया। न्याय प्रणाली, पुलिस प्रबन्ध और भूमि कर प्रणाली में सुधार किए गए। डाक का समुचित प्रबन्ध किया गया।

पंजाब की देशी रियासतों के प्रति नीति में परिवर्तन- दूसरे आंग्ल-सिक्ख युद्ध में पटियाला, जींद, नाभा, कपूरथला तथा फरीदकोट के राजाओं ने अंग्रेजों की सहायता की थी। बहावलपुर तथा मलेरकोटला के नवाबों ने भी अंग्रेज़ों का साथ दिया था। अतः अंग्रेजों ने प्रसन्न होकर इनमें से कई देशी शासको का पुरस्कार दिए। उन्होंने देशी रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित न करने का निर्णय भी किया।

28991.

पहले आंग्लो-सिक्ख युद्ध की घटनाएं लिखो।

Answer»

सिक्ख सेना ने लाहौर से प्रस्थान किया और 11 दिसम्बर, 1845 ई० को सतलुज नदी को पार करना आरम्भ कर दिया। अंग्रेज़ तो पहले ही इसी ताक में थे कि सिक्ख सैनिक कोई ऐसा पग उठाएं जिससे उन्हें सिक्खों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने का अवसर मिल सके। अत: 13 दिसम्बर को लॉर्ड हार्डिंग ने सिक्खों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध की मुख्य घटनाओं का वर्णन इस प्रकार है

1. मुदकी की लड़ाई- अंग्रेज़ी सेना फिरोज़शाह से 15-16 कि० मी० की दूरी पर मुदकी के स्थान पर आ पहुंची। जिसका नेतृत्व सरहयूग गफ्फ कर रहा था। 18 दिसम्बर, 1845 ई० के दिन अंग्रेज़ों व सिक्खों में इसी स्थान पर पहली . लड़ाई हुई। यह एक खूनी युद्ध था। योजना के अनुसार लाल सिंह ने अपनी सेना के साथ विश्वासघात किया और सैनिकों . को अकेला छोड़ कर रणक्षेत्र से भाग निकला। तेज सिंह ने भी ऐसा ही किया। परिणामस्वरूप सिक्ख पराजित हुए।

2. बद्दोवाल की लड़ाई- 21 जनवरी, 1846 ई० को फिरोजशाह की लड़ाई के पश्चात् अंग्रेज सेनापति लॉर्ड गफ… ने अम्बाला तथा देहली से सहायक सेनाएं बुला भेजीं। जब खालसा सेना को अंग्रेज़ सेनाओं के आगमन की सूचना मिली. तो रणजोध सिंह तथा अजीत सिंह लाडवा ने 8000 सैनिकों तथा 70 तोपों सहित सतलुज नदी को पार किया और : लुधियाना से 7 मील की दूरी पर बरां हारा के स्थान पर डेरा डाल दिया। उन्होंने लुधियाना की अंग्रेज़ चौकी में आग लगा दी। सर हैरी स्मिथ (Harry Smith) को फिरोजपुर से लुधियाना की सुरक्षा के लिए भेजा गया। बद्दोवाल के स्थान पर दोनों पक्षों में एक भयंकर युद्ध हुआ। रणजोध सिंह व अजीत सिंह ने अंग्रेजी सेना के पिछले भाग पर धावा बोल कर उनके शस्त्र तथा खाद्य सामग्री लूट ली। फलस्वरूप यहां अंग्रेजों को पराजय का मुंह देखना पड़ा।

3. अलीवाल की लड़ाई- 28 जनवरी, 1846 को बुद्दोवाल की विजय के पश्चात् रणजोध सिंह ने उस गांव को. खाली करा लिया तथा सतलुज के मार्ग से जंगरांव, घुगरांना इत्यादि पर आक्रमण करके अंग्रेज़ों के मार्ग को रोकना चाहा। इसी बीच हैरी स्मिथ ने बुद्दोवाल पर अधिकार कर लिया। इतने में फिरोजपुर से भी एक सहायक सेनाःस्मिथ की सहायता के लिए आ पहुंची। सहायता पाकर उसने सिक्खों पर धावा बोल दिया। 28 जनवरी, 1846 ई० के दिन अलीवाल के स्थान पर एक भीषण लड़ाई हुई जिसमें सिक्खों की पराजय हुई।

4. सभराओं की लड़ाई- अलीवाल की पराजय के कारण लाहौर दरबार की सेनाओं को अपनी सुरक्षा की चिन्ता पड़ गई। आत्म रक्षा के लिए उन्होंने सभराओं के स्थान पर खाइयां खोद लीं। परन्तु यहां उन्हें 10 फरवरी, 1846 ई० के दिन एक बार फिर शत्रु का सामना करना पड़ा। यह खूनी लड़ाई थी। कहते हैं कि यहां वीरगति को प्राप्त होने वाले सिक्ख सैनिकों के रक्त से सतलुज का पानी भी लाल हो गया। अंग्रेजों की सभराओं विजय निर्णायक सिद्ध हुई। डॉ० स्मिथ के अनुसार, इस विजय से अंग्रेज़ सबसे वीर और सबसे सुदृढ़ शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध की गम्भीर स्थिति में अपमानित होने से बच गए। इस विजय के पश्चात् अंग्रेजी सेनाओं ने सतलुज को पार (13 फरवरी, 1846 ई०) किया और 20 फरवरी, 1846 ई० को लाहौर पर अधिकार कर लिया।

28992.

‘जलियांवाला बाग़ की घटना’ कब, क्यों और कैसे हुई? एक संक्षिप्त नोट लिखो।

Answer»

जलियांवाला बाग़ की दुर्घटना अमृतसर में 1919 ई० में बैसाखी वाले दिन हुई। इस दिन अमृतसर की जनता जलियांवाला बाग़ में एक सभा कर रही थी। यह सभा अमृतसर में लागू मार्शल ला के विरुद्ध की जा रही थी। जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के इस शान्तिपूर्ण सभा पर गोली चलाने की आज्ञा दे दी। इससे सैकड़ों निर्दोष व्यक्तियों की जानें गईं और अनेक लोग घायल हुए। परिणामस्वरूप सारे देश में रोष की लहर दौड़ गई और स्वतन्त्रता संग्राम ने एक नया मोड़ ले लिया। अब यह सारे राष्ट्र की जनता का संग्राम बन गया।

28993.

खिलाफ़त लहर पर नोट लिखो।

Answer»

खिलाफ़त आन्दोलन प्रथम विश्व-युद्ध के पश्चात् मुसलमानों ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध चलाया। युद्ध में तुर्की की पराजय हुई और विजयी राष्ट्रों ने तुर्की साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर डाला। इससे मुस्लिम जनता भड़क उठी क्योंकि तुर्की के साथ उसकी धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई थीं। इसी कारण मुसलमानों ने खिलाफ़त आन्दोलन आरम्भ कर दिया। परन्तु यह आन्दोलन भारत के राष्ट्रवादी आन्दोलन का एक अंग बन गया और इसमें कांग्रेस के भी अनेक नेता सम्मिलित हुए। उन्होंने इसे पूरे देश में फैलाने में सहायता दी।

28994.

जलियांवाला बाग़ में गोलियां किसने चलवाईं?

Answer»

जनरल डायर ने।

28995.

ग़दर पार्टी ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्या क्या यत्न किए?

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ग़दर पार्टी की स्थापना 1913 ई० में सान फ्रांसिस्को (अमेरिका) में हुई। इसका प्रधान बाबा सोहन सिंह भकना थे। लाला हरदयाल इसके मुख्य सचिव तथा कांशी राम सचिव एवं खजांची थे।इस संस्था ने सान फ्रांसिस्को से उर्दू में एक साप्ताहिक पत्र ‘ग़दर’ निकालना आरम्भ किया। इसका सम्पादन कार्य करतार सिंह सराभा को सौंपा गया। उसके परिश्रम से यह समाचार-पत्र हिंदी, पंजाबी, पश्तो, नेपाली आदि अनेक भाषाओं में प्रकाशित होने लगा। इस समाचार-पत्र के नाम पर ही इस संस्था का नाम ग़दर पार्टी रखा गया।

उद्देश्य- ग़दर पार्टी का मुख्य उद्देश्य भारत को सशस्त्र क्रांति द्वारा स्वतन्त्र करवाना था। इसलिए इस पार्टी ने अग्रलिखित कार्यों पर बल दिया

  1. सेना में विद्रोह का प्रचार
  2. सरकारी पिट्ठओं की हत्या
  3. जेलें तोड़ना
  4. सरकारी खज़ाने और थाने लूटना
  5. क्रान्तिकारी साहित्य छापना और बांटना
  6. अंग्रेजों के शत्रुओं की सहायता करना
  7. शस्त्र इकट्ठे करना
  8. बम बनाना
  9. डाक-तार व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करना तथा रेल मार्गों की तोड़-फोड़ करना।
  10. क्रान्तिकारियों का झंडा फहराना
  11. क्रान्तिकारी नवयुवकों की सूची तैयार करना।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रयास- कामागाटामारू की घटना के पश्चात् काफ़ी संख्या में भारतीय अपने देश वापिस आ गए। वे ग़दर द्वारा अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना चाहते थे। अंग्रेजी सरकार भी बड़ी सतर्क थी। बाहर से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की छान-बीन होती थी। संदेह होने पर व्यक्ति को नज़रबंद कर दिया जाता था। परन्तु जो व्यक्ति बच निकलता था, वह क्रान्तिकारियों से मिल जाता था। – भारत में ग़दर पार्टी और विदेश से लौटे क्रान्तिकारियों का नेतृत्व रास बिहारी बोस ने किया। अमेरिका से वापिस आए करतार सिंह सराभा ने भी बनारस में श्री रास बिहारी बोस के गुप्त अड्डे का पता लगाकर उनसे सम्पर्क स्थापित किया। ग़दर पार्टी द्वारा आज़ादी के लिए किए गए कार्य-ग़दर पार्टी द्वारा पंजाब में आज़ादी के लिए किए गए कार्यों का वर्णन इस प्रकार है

  1. रास बिहारी बोस ने लाहौर, फिरोज़पुर, मेरठ, अम्बाला, मुलतान, पेशावर तथा कई अन्य छावनियों में अपने प्रचारक भेजे। इन प्रचारकों ने सैनिकों को विद्रोह के लिए तैयार किया।
  2. करतार सिंह सराभा ने कपूरथला के लाला रामसरन दास के साथ मिल कर ‘ग़दर’ नामक साप्ताहिक पत्र को छापने का प्रयास किया परन्तु वह सफल न हो सका। फिर भी वह ‘ग़दर-गूंज’ प्रकाशित करता रहा।
  3. ग़दर पार्टी ने लाहौर तथा कुछ अन्य स्थानों पर बम बनाने का कार्य भी आरम्भ किया।
  4. ग़दर दल ने स्वतन्त्र भारत के लिए एक झंडा तैयार किया। करतार सिंह सराभा ने इस झंडे को स्थान-स्थान पर लोगों में बांटा।
28996.

‘पूर्ण स्वराज्य की माँग कब की गई थी ?(A) 1929 में(B) 1930 में(C) 1928 में(D) 1931 में

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(A) 1929 में

28997.

फारवर्ड ब्लॉक का संबंध है-(क) राम मनोहर लोहिया(ख) जय प्रकाश नारायण(ग) अरूणा आरू अली(घ) सुभाष चन्द्र बोस

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सही विकल्प है (घ) सुभाष चन्द्र बोस

28998.

साइमन कमीशन का विरोध करते समय लाठीचार्ज से किसकी मृत्यु हुई ?(A) पं. जवाहरलाल(B) लाला लाजपत राय(C) गोविंदवल्लभ पंत(D) मोतीलाल नेहरु

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(B) लाला लाजपत राय

28999.

भारतीय स्वाधीनता अधिनियम पारित हुआ(क) 1945 ई० में(ख) 1947 ई० में(ग) 1946 ई० में(घ) 1942 ई० में

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सही विकल्प है (ख) 1947 ई० में

29000.

लाला लाजपत राय के ऊपर लाठी चार्ज किस प्रदर्शन के दौरान किया गया ?

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लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध-प्रदर्शन करते समय लाला लाजपत राय के ऊपर लाठी चार्ज किया गया।