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अंग्रेजों और सिक्खों की पहली लड़ाई के कारण लिखो।

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अंग्रेजों तथा सिक्खों के बीच पहली लड़ाई 1845-46 ई० में हुई। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे-

अंग्रेजों की लाहौर राज्य को घेरने की नीति — अंग्रेजों ने महाराजा रणजीत सिंह के जीवन काल से ही लाहौर राज्य को घेरना आरम्भ कर दिया था। इसी उद्देश्य से उन्होंने 1835 ई० में फिरोजपुर पर अधिकार कर लिया। 1838 ई० में उन्होंने वहां एक सैनिक छावनी स्थापित कर दी। लाहौर दरबार के सरदारों ने अंग्रेजों की इस नीति का विरोध किया।

पंजाब में अशांति और अराजकता — महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में अशांति और अराजकता फैल गई। इसका कारण यह था कि उसके उत्तराधिकारी खड़क सिंह, नौनिहाल सिंह, रानी जिंदां कौर, शेर सिंह आदि निर्बल थे। अत: लाहौर दरबार में सरदारों ने एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचने आरम्भ कर दिये। अंग्रेज़ इस स्थिति का लाभ उठाना चाहते थे।

प्रथम अफ़गान युद्ध में अंग्रेजों की कठिनाइयां और असफलताएं — प्रथम ऐंग्लो-अफ़गान युद्ध के समाप्त होते ही अफ़गानों ने दोस्त मुहम्मद खां के पुत्र मुहम्मद अकबर खां के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। अंग्रेज़ विद्रोहियों को दबाने में असफल रहे। अंग्रेज सेनानायक बर्नज़ और मैकनाटन को मौत के घाट उतार दिया गया। वापस जा रहे अंग्रेज सैनिकों में से केवल एक सैनिक ही बच पाया। अंग्रेजों की इस असफलता को देखकर सिक्खों का अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए उत्साह बढ़ गया।

अंग्रेजों द्वारा सिन्ध को अपने राज्य में मिलाना — 1843 ई० में अंग्रेजों ने सिन्ध पर आक्रमण करके उसे अपने राज्य में मिला लिया। इस घटना ने उनकी महत्त्वाकांक्षा को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया। सिक्खों ने यह जान लिया कि साम्राज्यवादी अंग्रेज़ सिन्ध की भान्ति पंजाब के लिए भी काल बन सकते हैं। वैसे भी पंजाब पर अधिकार किए बिना सिन्ध पर अंग्रेजी नियन्त्रण बने रहना असम्भव था। फलतः सिक्ख अंग्रेजों के इरादों के प्रति और भी चौकन्ने हो गए।

ऐलनबरा की पंजाब पर अधिकार करने की योजना — सिन्ध को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लेने के पश्चात् लॉर्ड ऐलनबरा ने पंजाब पर अधिकार करने की योजना बनाई। इस योजना को वास्तविक रूप देने के लिए उसने सैनिक तैयारियां आरम्भ कर दी। इसका पता चलने पर सिक्खों ने भी युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी।

लॉर्ड हार्डिंग की गवर्नर जनरल के पद पर नियुक्ति — जुलाई, 1844 ई० में लॉर्ड ऐलनबरा के स्थान पर लॉर्ड हार्डिंग भारत का गवर्नर जनरल बना। वह एक कुशल सेनानायक था। उसकी नियुक्ति से सिक्खों के मन में यह शंका उत्पन्न हो गई कि हार्डिंग को जान-बूझकर भारत भेजा गया है, ताकि वह सिक्खों से सफलतापूर्वक युद्ध कर सके।

अंग्रेजों की सैनिक तैयारियां — पंजाब में फैली अराजकता ने अंग्रेजों को पंजाब पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया और उन्होंने सैनिक तैयारियां करनी आरम्भ कर दीं। शीघ्र ही अंग्रेज़ी सेनाएं सतलुज नदी के आस-पास इकट्ठी होने लगीं। उन्होंने सिन्ध में भी अपनी सेनाओं की वृद्धि कर ली तथा सतलुज को पार करने के लिए एक नावों का पुल बना लिया। अंग्रेजों की ये गतिविधियां प्रथम सिक्ख युद्ध का कारण बनीं।

सुचेत सिंह के खजाने का मामला — डोगरा सरदार सुचेत सिंह लाहौर दरबार की सेवा में था। अपनी मृत्यु से पूर्व वह 15 लाख रुपये की धन राशि छोड़ गया था। परंतु उसका कोई पुत्र नहीं था। इसलिए लाहौर सरकार इस राशि पर अपना अधिकार समझती थी। दूसरी ओर अंग्रेज़ इस मामले को अदालती रूप देना चाहते थे। इससे सिक्खों को अंग्रेजों की नीयत पर संदेह होने लगा।

मौड़ा गांव का मामला — मौड़ा गांव नाभा प्रदेश में था। वहां के भूतपूर्व शासक ने यह गांव महाराजा रणजीत सिंह को दिया था जिसे महाराजा ने धन्ना सिंह को जागीर में दे दिया। परन्तु 1843 ई० के आरम्भ में नाभा के नये शासक तथा धन्ना सिंह में मतभेद हो जाने के कारण नाभा के शासक ने यह गांव वापस ले लिया। जब लाहौर सरकार ने इस पर आपत्ति की तो अंग्रेजों ने नाभा के शासक का समर्थन किया। इस घटना ने अंग्रेजों तथा लाहौर दरबार एवं सिक्ख सेना के आपसी सम्बन्धों को और भी बिगाड़ दिया।

ब्राडफुट की सिक्ख विरोधी गतिविधियां — नवम्बर, 1844 ई० में मेजर ब्राडफुट लुधियाना का रैजीडेंट नियुक्त हुआ। वह सिक्खों के प्रति घृणा-भाव रखता था। उसने सिक्खों के विरुद्ध कुछ ऐसे कार्य किए जिससे सिक्ख अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए।

लाल सिंह और तेज सिंह का सेना को उकसाना — सितम्बर, 1845 ई० में लाल सिंह लाहौर राज्य का प्रधानमन्त्री बना। उसी समय तेज सिंह को प्रधान सेनापति बनाया गया। अब तक सिक्ख सेना की शक्ति काफ़ी बढ़ चुकी थी। अत: लाल सिंह और तेज सिंह सिक्ख सेना से भयभीत थे। अपनी सुरक्षा के लिए ये दोनों गुप्त रूप से अंग्रेज़ी सरकार से मिल गए। सिक्ख सेना को कमजोर करने के लिए उन्होंने सिक्ख सेना को अंग्रेज़ों के विरुद्ध भड़काया।युद्ध का वातावरण तैयार हो चुका था। 13 दिसम्बर, 1845 ई० को लॉर्ड हार्डिंग ने सिक्खों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।



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