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दूसरे आंग्लो-सिक्ख युद्ध के परिणाम लिखो।

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दूसरा आंग्ल-सिक्ख युद्ध लाहौर के सिक्ख,राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ। इसके निम्नलिखित परिणाम निकले —

पंजाब का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय- युद्ध में सिक्खों की पराजय के पश्चात् 29 मार्च, 1849 ई० को गवर्नर जनरल लॉर्ड डल्हौज़ी ने एक आदेश जारी किया। इसके अनुसार पंजाब राज्य को समाप्त कर दिया गया। महाराजा दलीप सिंह को गद्दी से उतार दिया गया और पंजाब को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया।

मूलराज और महाराज सिंह को दण्ड- मूलराज को ऐग्न्यु और ऐंडरसन नामक अंग्रेज़ अफसरों के वध के अपराध में काले पानी की सज़ा दी गई। 29 दिसम्बर, 1849 ई० में महाराज सिंह को भी बंदी बना लिया गया। उसे आजीवन कारावास का दंड देकर सिंगापुर भेज दिया गया।

खालसा सेना को भंग करना- खालसा सेना को भंग कर दिया गया। उससे सभी शस्त्र छीन लिए गए। नौकरी से हटे सिक्ख सैनिकों को ब्रिटिश सेना में भर्ती कर लिया गया।

प्रमुख सरदारों की शक्ति का दमन- लॉर्ड डल्हौज़ी के आदेश से जॉन लारेंस ने पंजाब में प्रमुख सरदारों की शक्ति को समाप्त कर दिया। फलस्वरूप वे सरदार जो पहले धनी ज़मींदार थे और सरकार में ऊंचे पदों पर थे, अब साधारण लोगों के समान हो गए।

पंजाब में अंग्रेज अफसरों की नियुक्ति- दूसरे ऐंग्लो-सिक्ख युद्ध के परिणामस्वरूप राज्य के उच्च पदों पर सिक्खों, हिन्दुओं या मुसलमानों के स्थान पर अंग्रेजों तथा यूरोपियनों को नियुक्त किया गया। उन्हें भारी वेतन तथा भत्ते भी दिए गए।

उत्तरी-पश्चिमी सीमा को शक्तिशाली बनाना- पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित करने के बाद अंग्रेजों ने उत्तरी-पश्चिमी सीमा को शक्तिशाली बनाने के लिए सड़कों तथा छावनियों का निर्माण किया। सैनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण किलों की मुरम्मत की गई। कई नए किले भी बनाए गए। उत्तरी-पश्चिमी कबीलों को नियंत्रित करने के लिए विशेष सैनिक दस्ते भी बनाए गए।

पंजाब के राज्य प्रबन्ध की पुनर्व्यवस्था- पंजाब पर अंग्रेजों का अधिकार हो जाने के पश्चात् प्रशासन समिति (Board of Administration) की स्थापना की गई। इसका प्रधान हैनरी लारेंस था। पंजाब प्रांत के प्रबन्धकीय ढाँचे को पुनः संगठित किया गया। न्याय प्रणाली, पुलिस प्रबन्ध और भूमि कर प्रणाली में सुधार किए गए। डाक का समुचित प्रबन्ध किया गया।

पंजाब की देशी रियासतों के प्रति नीति में परिवर्तन- दूसरे आंग्ल-सिक्ख युद्ध में पटियाला, जींद, नाभा, कपूरथला तथा फरीदकोट के राजाओं ने अंग्रेजों की सहायता की थी। बहावलपुर तथा मलेरकोटला के नवाबों ने भी अंग्रेज़ों का साथ दिया था। अतः अंग्रेजों ने प्रसन्न होकर इनमें से कई देशी शासको का पुरस्कार दिए। उन्होंने देशी रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में सम्मिलित न करने का निर्णय भी किया।



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