This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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कवि मनुष्य को क्या पहचानने के लिए कहता है? |
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Answer» कवि मनुष्य को अपनी छिपी शक्तियां पहचानने के लिए कहता है। |
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मनुष्य की आत्मा में किसका वास है?A. भगवान काB. शैतान काC. हनुमान काD. विज्ञान का |
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Answer» सही विकल्प है A. भगवान का |
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मनुष्य के लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है काव्य के आधार पर अपने विचार प्रकट कीजिए । |
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Answer» मनुष्य अत्यंत समर्थं प्राणी है। वह चाहे तो पहाड़ों को फोड़ सकता है। वह चाहे तो नदियों के प्रवाह की दिशा बदल सकता है। वह मिट्टी से अमृत निचोड़ सकता है। वह चाहे तो काल को भी रोक सकता है। इस प्रकार मनुष्य हर असंभव कार्य को संभव बना सकता है। |
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धरती की शान कविता के रचयिता कौन हैं. ? |
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Answer» ‘धरती की शान’ कविता के रचयिता पंडित भरत व्यास हैं। |
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कविता में कवि ने किन प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण किया है. ? कैसे ? |
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Answer» कवि ने कविता में पहाड़, नदियों, धरती, आकाश, हवा जैसे प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण किया है। कवि ने मनुष्य को असीम शक्तियों से संपन्न बताया है। वह कहता है कि मनुष्य चाहे तो पर्वतों को फोड़ सकता है। वह चाहे तो नदियों के प्रवाह को मोड़ सकता है। वह अगर ठान ले तो धरती और आकाश को जोड़ भी सकता है। मनुष्य पवन-सा गतिमान है। इसलिए वह आकाश में ऊंची-से ऊंची उड़ान भरने में समर्थ है। |
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धरती की शान से कवि का क्या तात्पर्य है ? भाव स्पष्ट कीजिए । |
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Answer» ‘धरती की शान’ से कवि का तात्पर्य मनुष्य की गौरवपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। मनुष्य ने अपने बुद्धिबल से ऐसे अनेक कार्य कर दिखाए हैं, जो कभी असंभव माने जाते थे। मनुष्य ने सभ्यता और संस्कृति के ऊँचे आदर्श कायम किए हैं। उसने धरती पर के सभी प्राणियों में अपने को सर्वश्रेष्ठ साबित कर दिया है। इसलिए कवि मनुष्य को ‘धरती की शान’ मानता है। |
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प्रस्तुत कविता में मनुष्य के प्रति किस भाव की अभिव्यक्ति हुई है, और उससे हमें क्या प्रेरणा मिलती है ? |
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Answer» ‘धरती की शान’ कविता में मनुष्य को सर्वशक्तिमान बताया गया है। उसकी आत्मा परमात्मा का रूप है। इस दृष्टि से मनुष्य अजरअमर प्राणी है। इससे हमें यह प्रेरणा मिलती है कि मनुष्य होने के कारण हमें अपने लक्ष्य ऊँचे रखने चाहिए। हमें किसी काम को पहचानकर कठिन-से-कठिन कार्य करने में पीछे नहीं हटना चाहिए। हमें निराशा का शिकार होकर अपनेआप को कभी अशक्त नहीं अनुभव करना चाहिए। |
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| 8. |
“अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।” इस कथन को सिद्ध कीजिए। याअधिकार और कर्तव्यों के बीच सम्बन्ध स्थापित कीजिए।याअधिकार और कर्त्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» अधिकार और कर्तव्यों का सम्बन्ध 1. अधिकारों के अस्तित्व के लिए कर्तव्यों का होना अनिवार्य है- अधिकारों का अस्तित्व कर्तव्यों पर निर्भर होता है। अधिकार वे माँगें हैं, जिन्हें समाज ने कर्तव्य के रूप में स्वीकार कर लिया है। किसी व्यक्ति का अधिकार तब तक अधिकार नहीं कहला सकता जब तक कि समाज उसे कर्तव्य मानकर अपनी स्वीकृति न दे दे। उदाहरणार्थ-एक व्यक्ति को यह अधिकार है कि उसका जीवन सुरक्षित रहे, तो अन्य मनुष्यों का यह कर्तव्य बन जाता है कि वे उसके जीवन पर आघात न करें। इसलिए एक विद्वान् ने कहा है कि “कर्तव्यों के संसारे में ही अधिकारों का जन्म होता है।” |
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अधिकारों के प्रमुख लक्षण लिखिए। |
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Answer» अधिकार के प्रमुख लक्षण 1. सामाजिक स्वरूप – अधिकार का सर्वप्रथम लक्षण यह है कि अधिकार के लिए सामाजिक स्वीकृति आवश्यक है, सामाजिक स्वीकृति के अभाव में व्यक्ति जिन शक्तियों का उपभोग करता है वे उसके अधिकार न होकर प्राकृतिक शक्तियाँ हैं। अधिकार तो राज्य द्वारा नागरिकों को प्रदान की गयी स्वतन्त्रता और सुविधा का नाम है और इस स्वतन्त्रता एवं सुविधा की आवश्यकता तथा उपभोग समाज में ही सम्भव है। इसके अतिरिक्त, राज्य के द्वारा व्यक्ति को जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अधिकार प्रदान किये जाते हैं, उसकी सिद्धि समाज में ही सम्भव है। इस दृष्टि से भी अधिकार समाजगत ही होते हैं। |
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अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्त पर टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» हॉब्स, लॉक तथा रूसो आदि विद्वानों ने अधिकारों के प्राकृतिक सिद्धान्त का समर्थन किया है। यह सिद्धान्त अति प्राचीन है। इस सिद्धान्त की मान्यता है कि अधिकार प्रकृति-प्रदत्त हैं। तथा व्यक्ति को जन्म लेते ही प्राप्त हो जाते हैं। राज्य इन अधिकारों को नहीं छीन सकता, क्योंकि एक तो वह इनका जन्मदाता नहीं है और दूसरे व्यक्ति राज्य के उदय से पूर्व से ही इन अधिकारों का प्रयोग करता आ रहा है। इस सिद्धान्त में निम्नलिखित दोष पाये गये हैं- |
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राज्य के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार पर प्रकाश डालिए। |
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Answer» राज्य के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार ग्रीन, महात्मा गांधी, लॉस्की आदि विद्वानों द्वारा व्यक्त किये गये विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि निम्नलिखित शर्तों के पूरा होने पर ही विद्रोह के अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है- ⦁ स्थिति को सुधारने और वांछित परिवर्तन लाने के लिए विद्रोह के पूर्व सभी संवैधानिक साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए और संवैधानिक साधनों की असफलता के बाद ही विद्रोह के सम्बन्ध में सोचा जाना चाहिए। |
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राज्य की उत्पत्ति के सामाजिक समझौता सिद्धान्त की विवेचना कीजिए। |
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Answer» राज्य की उत्पत्ति का सामाजिक समझौता सिद्धान्त गैटिल के अनुसार, “राजभक्तों द्वारा प्रतिपादित दैवी सिद्धान्त के विरोध में 17वीं तथा 18वीं शताब्दी के क्रान्तिकारी विचारकों ने लोकप्रिय राजसत्ता, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता एवं क्रान्ति के अधिकारों का प्रचार करने के लिए सामाजिक समझौते के सिद्धान्त की शरण ली।” इस सिद्धान्त की इन तीन विद्वानों हॉब्स, लॉक और रूसो ने बड़ी विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याख्या की है, परन्तु अपने-अपने ढंग से। इसीलिए कहीं-कहीं तीनों में पर्याप्त मतभेद भी हैं। किन्तु तीनों ने निष्कर्ष एक ही निकाला है। तीनों का ही मत है कि प्राकृतिक अवस्था के कुछ दोषों तथा असुविधा के कारण ही राज्य का निर्माण हुआ। संक्षेप में कहा जा सकता है कि इस सिद्धान्त के अनुसार राज्य दैवी संस्था न होकर एक मानवीय संस्था है। आलोचना- इस सिद्धान्त की अनेक विद्वानों ने कटु आलोचना की है। इस सिद्धान्त की आलोचना के निम्नलिखित आधार हैं। ⦁ यह सिद्धान्त कल्पना पर आधारित है। इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है। महत्त्व- इस सिद्धान्त का महत्त्व निम्नलिखित दृष्टियों से है- |
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| 13. |
सम्पत्ति के अधिकार पर प्रकाश डालिए। |
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Answer» आधुनिक काल में सम्पत्ति का अधिकार बड़े वाद-विवाद वाला अधिकार बन गया है। अरस्तू तथा लॉक इसे प्राकृतिक अधिकार मानते हैं। इसके विपरीत, प्लेटो सम्पत्ति के अधिकार का विरोध करते हैं। कार्ल मार्क्स ने सम्पत्ति को ‘लूट के माल’ की संज्ञा दी है। इसी कारण समाजवादी राष्ट्र रूस, चीन इत्यादि सम्पत्ति के अधिकार के विरोधी हैं। |
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वयस्क मताधिकार से क्या तात्पर्य है? |
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Answer» सामान्यतया 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके नागरिक को जो मताधिकार प्राप्त होता है, उसे वयस्क मताधिकार कहते हैं। |
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निम्नलिखित में कौन-सा सामाजिक अधिकार नहीं है?(क) शिक्षा का अधिकार(ख) सम्पत्ति रखने का अधिकार(ग) समानता का अधिकार(घ) मताधिकार |
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Answer» सही विकल्प है (घ) मताधिकार |
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निम्नलिखित में से कौन-सा अधिकार का तत्त्व है?(क) सार्वभौमिकता(ख) मानवता(ग) स्वतन्त्रता(घ) निष्पक्षता |
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Answer» सही विकल्प है (क) सार्वभौमिकता |
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नागरिक के दो प्रमुख कर्तव्य बताइए। |
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Answer» ⦁ समाज के प्रति कर्त्तव्य तथा |
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नैतिक और कानूनी अधिकारों में क्या अन्तर है? |
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Answer» नैतिक अधिकारों के पीछे राज्य की कानूनी शक्ति नहीं होती। कानूनी अधिकारों की व्यवस्था राज्य द्वारा कानून के अनुसार की जाती है। |
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निम्नलिखित में से कौन एक राजनीतिक अधिकार की श्रेणी में नहीं आता है? (क) मत देने का अधिकार(ख) काम का अधिकार(ग) निर्वाचित होने का अधिकार(घ) सार्वजनिक पद ग्रहण करने का अधिकार |
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Answer» सही विकल्प है (ख) काम का अधिकार |
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निम्नलिखित में से कौन-सा राजनीतिक अधिकार है?(क) शिक्षा का अधिकार(ख) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार(ग) मतदान का अधिकार(घ) जीवन-रक्षा का अधिकार |
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Answer» सही विकल्प है (ग) मतदान का अधिकार |
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अधिकारों के समाज-कल्याण सम्बन्धी सिद्धान्तों का समर्थक था-(क) लॉस्की(ख) प्लेटो(ग) रूसो(घ) मॉण्टेस्क्यू |
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Answer» सही विकल्प है (घ) मॉण्टेस्क्यू |
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निम्नलिखित में से कौन-सा कानूनी कर्तव्य नहीं है? (क) कानूनों का पालन करना(ख) सत्य बोलना(ग) राज्य के प्रति कर्तव्य(घ) कर अदा करना |
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Answer» सही विकल्प है (ख) सत्य बोलना |
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निम्नांकित में से कौन कानूनी अधिकार का समर्थक है?(क) प्रो० बार्कर(ख) प्रो० लॉस्की(ग) गाँधी जी(घ) ऑस्टिन |
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Answer» सही विकल्प है (घ) ऑस्टिन |
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नागरिक के दो नैतिक कर्तव्य लिखिए। |
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Answer» ⦁ अपने प्रति कर्त्तव्य (चरित्र-निर्माण) तथा |
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कानूनी अधिकार के सिद्धान्त के दो समर्थकों के नाम लिखिए। |
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Answer» ⦁ बेन्थम तथा |
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किन्हीं दो राजनीतिक स्वतन्त्रताओं का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» ⦁ राष्ट्र को स्वतन्त्र होने का अधिकार तथा |
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नागरिकों के दो कानूनी कर्तव्य लिखिए। |
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Answer» ⦁ राज्य के कानूनों का पालन करना तथा |
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सकारात्मक स्वतन्त्रता से क्या अभिप्राय है? |
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Answer» सकारात्मक स्वतन्त्रता एक पूर्ण मानव के रूप में कार्य करने की स्वतन्त्रता है। यह मानव का विकास करने की शक्ति है। |
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प्राकृतिक स्वतन्त्रता से रूसो का क्या अभिप्राय है? |
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Answer» रूसो के शब्दों में, मनुष्य जन्मतः स्वतन्त्र है, परन्तु सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है। |
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स्वतन्त्रता को परिभाषित करें। |
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Answer» “स्वतन्त्रता उस वातावरण को बनाये रखना है जिसमें व्यक्ति को अपने जीवन का सर्वोत्तम विकास करने की सुविधा प्राप्त हो।’ |
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स्वतन्त्रता के नकारात्मक पहलू का विचारक था-(क) ग्रीन(ख) गाँधी जी(ग) लास्की(घ) रूसो |
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Answer» सही विकल्प है (घ) रूसो |
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स्वतन्त्रता मनुष्य के लिए किस प्रकार उपयोगी है? |
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Answer» स्वतन्त्रता मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास में सहायक होती है। |
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यदि किसी व्यक्ति को आवागमन की स्वतन्त्रता नहीं प्राप्त है, तो उसे निम्नांकित में से किस स्वतन्त्रता से वंचित किया जा सकता है? (क) नागरिक स्वतन्त्रता(ख) प्राकृतिक स्वतन्त्रता(ग) आर्थिक स्वतन्त्रता(घ) धार्मिक स्वतन्त्रता |
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Answer» सही विकल्प है (ख) प्राकृतिक स्वतन्त्रता |
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स्वतन्त्रता के सकारात्मक (वास्तविक) पहलू का विचारक था(क) हॉब्स(ख) सीले(ग) कोल(घ) मैकेंजी |
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Answer» सही विकल्प है (घ) मैकेंजी |
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स्वतन्त्रता की परिभाषा दीजिए तथा उसका कानून के साथ सम्बन्ध स्थापित कीजिए। याकानून और स्वतन्त्रता के मध्य सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। |
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Answer» स्वतन्त्रता और कानून का सम्बन्ध स्वतन्त्रता और कानून के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय पर राजनीतिक विचारकों में बहुत अधिक मतभेद है और इस सम्बन्ध में प्रमुख रूप से निम्नलिखित दो विचारधाराओं का प्रतिपादन किया गया है- इन आदर्शवादी विद्वानों का दृष्टिकोण बहुत कुछ सीमा तक सही है और कानून निम्नलिखित तीन प्रकार से व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करते और उसमें वृद्धि करते हैं- 1. कानून व्यक्ति की स्वतन्त्रता की अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप से रक्षा करते हैं- यदि समाज के अन्तर्गत किसी भी प्रकार के कानून न हों तो समाज के शक्तिशाली व्यक्ति निर्बल व्यक्तियों पर अत्याचार करेंगे और संघर्ष की इस अनवरत प्रक्रिया में किसी भी व्यक्ति की स्वतन्त्रता सुरक्षित नहीं रहेगी। यदि राज्य सड़क पर चलने के सम्बन्ध में किसी प्रकार के नियमों का निर्माण करता है, मद्यपान पर रोक लगाता है या टीके की व्यवस्था करता है तो राज्य के इन कार्यों से व्यक्तियों की स्वतन्त्रता सीमित नहीं होती, वरन् उसमें वृद्धि ही होती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि साधारण रूप से राज्य के कानून व्यक्तियों की स्वतन्त्रता की रक्षा और उसमें वृद्धि करते हैं। स्वतन्त्रता और कानून के इस घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण ही रैम्जे म्योर ने लिखा है कि “कानून और स्वतन्त्रता इस प्रकार अन्योन्याश्रित और एक-दूसरे के पूरक हैं।” सभी कानून स्वतन्त्रता के साधक नहीं लेकिन राज्य द्वारा निर्मित सभी कानूनों के सम्बन्ध में इस प्रकार की बात नहीं कही जा सकती है कि वे मानवीय स्वतन्त्रता में वृद्धि करते हैं। यदि शासन अपने ही स्वार्थों को दृष्टि में रखकर कानूनों का निर्माण करता है, जनसाधारण के हितों की अवहेलना करता है और बिना किसी विशेष कारण के नागरिकों की स्वतन्त्रताएँ सीमित करता है। तो राज्य के इन कानूनों से व्यक्तियों की स्वतन्त्रता सीमित ही होती है। उदाहरणार्थ, हिटलर और मुसोलिनी द्वारा निर्मित अनेक कानून स्वतन्त्रता के विरुद्ध थे। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि यदि राज्य का कानून जनता की इच्छा पर आधारित है तो वह स्वतन्त्रता का पोषक होगा और यदि वह निरंकुश शासन की इच्छा का परिणाम है तो स्वतन्त्रता का विरोधी हो सकता है। |
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राष्ट्रीय स्वतन्त्रता से क्या आशय है? |
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Answer» यह स्वतन्त्रता सभी प्रकार की स्वतन्त्रताओं तथा अधिकारों की आधारशिला है। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का तात्पर्य राष्ट्र की स्वतन्त्रता से है। जिस प्रकार व्यक्ति को स्वतन्त्रता प्राप्त होनी चाहिए ठीक उसी प्रकार से एक राष्ट्र को भी अपने पूर्ण विकास के लिए स्वतन्त्र होना आवश्यक है। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता राज्य की आन्तरिक एवं बाह्य स्वाधीनता है। जो राष्ट्र अपने आन्तरिक प्रशासन तथा बाह्य सम्बन्धों के स्थापन में स्वतन्त्र होता है, किसी दूसरे देश के अधीन नहीं होता; वह स्वतन्त्र और सम्प्रभु राष्ट्र होता है। लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों तथा नियमों के अधीन प्रत्येक राष्ट्र की स्वतन्त्रता पर कुछ प्रतिबन्ध रहता है। |
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समानता की विशेषताएँ बताइए। |
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Answer» समानता की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं- ⦁ आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति – समानता की यह विशेषता है कि व्यक्ति कम-से-कम अपनी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके तथा अपने जीवन का निर्वाह कर सके। |
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स्वतन्त्रता तथा समानता परस्पर विरोधी हैं।” इस विचारधारा का समर्थक था-(क) लॉस्की(ख) सी० ई० एम० जोड(ग) क्रोचे(घ) पोलार्ड |
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Answer» सही विकल्प है (ग) क्रोचे |
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आर्थिक स्वतन्त्रता पर टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» आर्थिक स्वतन्त्रता जिस राज्य में भूख, गरीबी, दीनता, नग्नता तथा आर्थिक अन्याय होगा वहाँ व्यक्ति कभी भी स्वतन्त्र नहीं होगा। व्यक्ति को पेट की भूख, अपने बच्चों की भूख तथा भविष्य में दिखाई देने वाली आवश्यकताएँ प्रत्येक पल दु:खी करती रहेंगी। व्यक्ति कभी भी स्वयं को स्वतन्त्र अनुभव नहीं करेगा तथा न ही वह नागरिक एवं राजनीतिक स्वतन्त्रता का भली-भाँति उपभोग कर सकेगा। अतः राजनीतिक एवं नागरिक स्वतन्त्रता को हासिल करने के लिए आर्थिक स्वतन्त्रता का होना परमावश्यक है। लेनिन ने उचित ही कहा है कि “आर्थिक स्वतन्त्रता के अभाव में राजनीतिक अथवा नागरिक स्वतन्त्रता अर्थहीन है।’ |
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धार्मिक स्वतन्त्रता से क्या आशय है? |
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Answer» व्यक्ति धर्म पर किसी प्रकार का बन्धन स्वीकार नहीं करता। यही कारण है कि आज अनेक राज्यों में व्यक्ति को कोई भी धर्म मानने, प्रचार करने तथा धारण करने की स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है। भारतीय संविधान में भी धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार प्रदान किया गया है। धर्मतन्त्र राज्यों में राज्य का एक धर्म होता है तथा उसी धर्म के अनुयायियों को विशेष सुविधाएँ प्राप्त होती हैं; जबकि धर्मनिरपेक्ष राज्य में व्यक्ति को अपनी इच्छा का कोई भी धर्म धारण करने की स्वतन्त्रता होती है तथा सभी धर्म एकसमान होते हैं। |
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स्वतन्त्रता का महत्त्व बताइए। |
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Answer» स्वतन्त्रता का महत्त्व स्वतन्त्रता अमूल्य वस्तु है और उसका मानवीय जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है। यह बात व्यक्तिगत स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय स्वतन्त्रता दोनों के ही सम्बन्ध में सत्य है। स्वतन्त्रता का महत्त्व न होता, तो विभिन्न देशों में लाखों व्यक्तियों द्वारा स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान न दिया जाता। इटली के प्रसिद्ध देशभक्त मैजिनी (Mazzini) का कथन है कि “स्वतन्त्रता के अभाव में आप अपना कोई कर्तव्य पूरा नहीं कर सकते। अतएव आपको स्वतन्त्रता का अधिकार दिया जाता है और जो भी शक्ति आपको इस अधिकार से वंचित रखना चाहती हो, उससे जैसे भी बने, अपनी स्वतन्त्रता छीन लेना आपका कर्तव्य है।” |
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नागरिक स्वतन्त्रता पर टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» नागरिक स्वतन्त्रता |
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स्वतन्त्रता नैतिक गुणों के विकास में कैसे सहायक होती है? |
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Answer» स्वतन्त्रता व्यक्ति में प्रेम, दया, सहानुभूति, त्याग, सहयोग इत्यादि नैतिक गुणों को विकसित करके सामाजिक सभ्यता का विकास करती है जो मानवीय मूल्यों के लिए परमावश्यक है। |
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स्वतन्त्रता एवं समानता का सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए।या“स्वतन्त्रता की समस्या का केवल एक ही हल है और वह हल समानता में निहित है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। यासमानता को परिभाषित कीजिए तथा स्वतन्त्रता के साथ इसके सम्बन्ध की व्याख्या कीजिए।यास्वतन्त्रता और समानता के पारस्परिक सम्बन्धों की विवेचना कीजिए। या“स्वतन्त्रता और समानता एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस कथन की विवेचना कीजिए। |
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Answer» समानता का अर्थ साधारण रूप से समानता का अर्थ यह लगाया जाता है कि सभी व्यक्तियों को ईश्वर ने बनाया है; अतः सभी समान हैं और इसी कारण सभी को समान सुविधाएँ व आय का समान अधिकार होना चाहिए। इस प्रकार का मत व्यक्त करने वाले व्यक्ति प्राकृतिक समानता में विश्वास व्यक्त करते हैं, किन्तु यह विचार भ्रमपूर्ण है, क्योंकि प्रकृति ने ही मनुष्यों को बुद्धि, बल तथा प्रतिभा के आधार पर समान नहीं बनाया है। अप्पादोराय के शब्दों में, “यह स्वीकार करना कि सभी मनुष्य समान हैं, उतना ही भ्रमपूर्ण है जितना कि यह कहना कि भूमण्डल समतल है।” नागरिकशास्त्र की अवधारणा के रूप में समानता से हमारा तात्पर्य समाज द्वारा उत्पन्न इस असमानता का अन्त करने से होता है। दूसरे शब्दों में, समानता का तात्पर्य अवसर की समानता से है। सभी व्यक्तियों को अपने विकास के लिए समान सुविधाएँ व समान अवसर प्राप्त हों, ताकि किसी भी व्यक्ति को यह कहने का अवसर न मिले कि यदि उसे यथेष्ट सुविधाएँ प्राप्त होतीं तो वह अपने जीवन का विकास कर सकता था। इस प्रकार समाज में जाति, धर्म व भाषा के आधार पर व्यक्तियों में किसी प्रकार का भेद न किया जाना अथवा इन आधारों पर उत्पन्न विषमता का अन्त करना ही समानता है। समानता की परिभाषा व्यक्त करते हुए लॉस्की ने लिखा है कि “समानता मूल रूप से समतल करने की प्रक्रिया है। इसीलिए समानता का प्रथम अर्थ विशेषाधिकारों का अभाव और द्वितीय अर्थ अवसरों की समानता से है।” समानता के विविध रूप स्वतन्त्रता और समानता का सम्बन्ध स्वतन्त्रता और समानता के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय पर राजनीतिशास्त्रियों में पर्याप्त मतभेद हैं और इस सम्बन्ध में प्रमुख रूप से दो विचारधाराओं का प्रतिपादन किया गया है, जो इस प्रकार हैं- |
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“आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता एक भ्रम है।” इस कथन की विवेचना कीजिए। |
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Answer» लॉस्की, रूसो, मैकाइवर, सी०ई०एम० जोड आदि विचारक स्वतन्त्रता एवं समानता को एक-दूसरे को पूरक मानते हैं। इन विद्वानों का मत है कि आर्थिक समानता के अभाव में स्वतन्त्रता का अस्तित्व निरर्थक है। प्रो०.पोलार्ड के अनुसार, “स्वतन्त्रता की समस्या का केवल एक हल है और वह हल समानता में निहित है।” सी०ई०एम० जोड के अनुसार, “स्वतन्त्रता का विचार, जो राजनीतिक विचारधारा में बहुत महत्त्वपूर्ण है, जब आर्थिक क्षेत्र में लागू किया गया तो उससे विनाशकारी परिणाम निकले, जिसके फलस्वरूप समाजवादी और साम्यवादी विचारधाराओं का उदय हुआ, जो आर्थिक समानता पर विशेष बल देती है और जिनकी यह निश्चित धारणा है कि आर्थिक समानता के अभाव में वास्तविक राजनीतिक स्वतन्त्रता कदापि प्राप्त नहीं हो सकती।’ वास्तविकता यह है कि आर्थिक समानता सभी प्रकार की स्वतन्त्रताओं का आधार है और आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता केवल एक भ्रम है। प्रो० जोड के अनुसार, “आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता एक भ्रम है।” विद्वानों का मत है कि जब तक प्रत्येक नागरिक को आर्थिक क्षेत्र में समान अवसर प्रदान किये जाते हैं तब तक राजनीतिक स्वतन्त्रता की अवधारणा केवल एक भ्रम है। उनका मानना है कि यदि समाज में आर्थिक समानता नहीं है तो धनिक वर्ग अन्य वर्गों का शोषण करेगा तथा उनकी राजनीतिक स्वतन्त्रता को भी प्रभावित करेगा। ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी कि राजनीतिक सत्ता पूँजीपतियों में निहित हो जाएगी और राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा समानता केवल शब्दों तक ही सीमित रह जाएगी। इस विचारधारा को मानने वाले विद्वान् निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं |
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क्या स्वतन्त्रता तथा समानता परस्पर विरोधी हैं?यासमानता के आवेश ने स्वतन्त्रता की आशा को व्यर्थ कर दिया।” इस कथन का परीक्षण कीजिए। |
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Answer» इस विचारधारा के समर्थकों में डी० टॉकविले, लॉर्ड एक्टन तथा क्रोचे प्रमुख हैं। इनके अनुसार, स्वतन्त्रता एवं समानता एक-दूसरे के विरोधी हैं। स्वतन्त्रता समानता को नष्ट करती है तथा समानता स्वतन्त्रता का विनाश करती है। इस विचारधारा के अनुसार स्वतन्त्रता का अर्थ व्यक्ति की अपनी इच्छानुसार कार्य करने की शक्ति है। व्यक्ति के ऊपर सभी प्रकार के बन्धनों तथा नियन्त्रणों का अभाव ही स्वतन्त्रता है। समानता का आशय सभी क्षेत्रों में बरोबरी से है। अतः स्वतन्त्रता से समानता का हनन होता है तथा समानता से स्वतन्त्रता का अन्त हो जाता है, क्योंकि पूर्ण समानता राज्य के नियन्त्रण से ही सम्भव है तथा राज्य का नियन्त्रण स्वतन्त्रता को समाप्त कर देता है। ऐसी स्थिति में स्वतन्त्रता एवं समानता में से एक की स्थापना ही सम्भव है; अतः ये दोनों परस्पर विरोधी हैं। लॉर्ड एक्टन के अनुसार, समानता की अभिलाषा ने स्वतन्त्रता की आशा को व्यर्थ कर दिया है।” |
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“स्वतन्त्रता व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए आवश्यक है।” विवेचना कीजिए।या“स्वतन्त्रता उचित प्रतिबन्धों की व्यवस्था है।” विवेचना कीजिए। |
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Answer» स्वतन्त्रता अमूल्य वस्तु है और उसका मानवीय जीवन में बहुत अधिक महत्त्व है। स्वतन्त्रता का मूल्य व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर समान है। स्वतन्त्रता का महत्त्व न होता तो विभिन्न देशों में लाखों व्यक्तियों द्वारा स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान न दिया जाता। मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास के लिए अधिकारों का अस्तित्व नितान्त आवश्यक है। ⦁ न्यूनतम प्रतिबन्ध – स्वतन्त्रता का प्रथम तत्त्व यह है कि व्यक्ति के जीवन पर शासन और समाज के दूसरे सदस्यों की ओर से न्यूनतम प्रतिबन्ध होने चाहिए, जिससे व्यक्ति अपने विचार और कार्य-व्यवहार में अधिकाधिक स्वतन्त्रता का उपभोग कर सके तथा अपना विकास सुनिश्चित कर सके। |
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“स्वतन्त्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं।” इस विचार को मान्यता प्रदान करने वालों का वर्णन कीजिए। |
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Answer» कुछ विद्वानों का विचार है कि स्वतन्त्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं, क्योंकि कानून स्वतन्त्रता पर अनेक प्रकार के बन्धन लगाता है। इस विचार को मान्यता देने वालों में व्यक्तिवाद, अराजकतावादी, श्रम संघवादी तथा कुछ अन्य विद्वान् हैं। इस मत के अलग-अलग विचार अग्रलिखित हैं- ⦁ व्यक्तिवादियों के विचार – व्यक्तिवादी विचारधारा राज्य के कार्यों को सीमित करने के पक्ष में है। व्यक्तिवादियों के अनुसार, “वही शासन-प्रणाली श्रेष्ठ है जो सबसे कम शासन करती है। जितने कम कानून होंगे, उतनी ही अधिक स्वतन्त्रता होगी। उपर्युक्त विभिन्न विचारों के अध्ययनोपरान्त हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कानून एवं स्वतन्त्रता में कोई सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् ये परस्पर विरोधी हैं। |
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“स्वतन्त्रता एवं समानता एक-दूसरे के पूरक हैं।” इस विचारधारा का समर्थक है-(क) डी० टॉकविले(ख) लॉर्ड एक्टन(ग) क्रोचे(घ) लॉस्की |
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Answer» सही विकल्प है (घ) लॉस्की |
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“स्वतन्त्रता अति-शासन की विरोधी है।” यह कथन किसका है? (क) कोल(ख) सीले(ग) लॉस्की(घ) ग्रीन |
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Answer» सही विकल्प है (ख) सीले |
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