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Answer» राज्य के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार राज्य के प्रति भक्ति और राज्य की आज्ञाओं का पालन व्यक्ति का कानूनी कर्तव्य होता है। और इसलिए व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का कानूनी अधिकार तो प्राप्त हो ही नहीं सकता, लेकिन व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नैतिक अधिकार अवश्य ही प्राप्त होता है। इसका कारण यह है कि शासन के अस्तित्व का उद्देश्य जन-इच्छा को कार्यरूप में परिणत करते हुए सामान्य कल्याण होता है और यदि शासन सामान्य कल्याण की साधना में असफल हो जाता है। या शासन जन-इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करता तो उस शासन को अस्तित्व में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार शेष नहीं रह जाता है। नागरिकों को इस प्रकार की सरकार को पदच्युत करने का अधिकार होता है और यदि संवैधानिक मार्ग से इच्छित परिवर्तन न किया जा सके तो व्यक्ति को अधिकार है कि वह शक्ति के आधार पर वांछित परिवर्तन करने का प्रयत्न करे। लॉस्की ने कहा है कि “नागरिकता व्यक्ति के विवेकपूर्ण निर्णय का जनकल्याण में प्रयोग है।” ऐसी परिस्थितियों में यदि व्यक्ति को इस बात का विश्वास हो जाए कि विद्यमान शासन-व्यवस्था सामान्य जनता के हित में कार्य नहीं कर सकती तो राज्य के विरुद्ध विद्रोह व्यक्ति का एक नैतिक अधिकार ही नहीं वरन् एक नैतिक कर्तव्य भी हो जाता है। महात्मा गांधी ने कहा है कि व्यक्ति का सर्वोच्च कर्त्तव्य अपनी अन्तरात्मा के प्रति होता है। अतः अन्तरात्मा की पुकार पर सरकार का विरोध किया जा सकता है। ग्रीन, महात्मा गांधी, लॉस्की आदि विद्वानों द्वारा व्यक्त किये गये विचारों के आधार पर कहा जा सकता है कि निम्नलिखित शर्तों के पूरा होने पर ही विद्रोह के अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है- ⦁ स्थिति को सुधारने और वांछित परिवर्तन लाने के लिए विद्रोह के पूर्व सभी संवैधानिक साधनों का प्रयोग किया जाना चाहिए और संवैधानिक साधनों की असफलता के बाद ही विद्रोह के सम्बन्ध में सोचा जाना चाहिए। ⦁ विद्रोह की भावना वैयक्तिक न होकर सामाजिक होनी चाहिए। विद्रोह की बात तभी सोची जा सकती है जबकि सरकार के द्वारा किये जाने वाले अन्याय साधारण प्रकृति के न होकर गम्भीर प्रकृति के हों और विद्रोह करने वाली जनता विद्रोह के उद्देश्यों से पूर्ण परिचित हो।
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