This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
| 16651. |
Outline the principle for the preparation of ammonia by Haber process. How is nitric acid prepared from ammonia? Give equation. |
|
Answer» Ammonia is manufactured industrially by Haber's process. N2 + 3H2 ⇌ 2NH3 +46.4 KJ mol-1 This is a reversible exothermic reaction. High pressure about 200 atm, low temp. 700 K and use of catalyst such as iron oxide with small amounts of Al2O3 and K2O would favour for formation of ammonia according to Le-chatelier's principle. Nitric acid prepared from ammonia: On large scale nitric acid is prepared by Ostwald's process. In this process, Ammonia undergo catalytic oxidation by atmospheric oxygen to give nitric oxide. 4NH3 + 5O2 → 4NO + 6H2O Nitric oxide combines with oxygen to give NO2 2NO + O2 ⇌ 2NO2 Nitrogen dioxide combines with oxygen to give NO2 2NO2 + O2 ⇌ 2NO2 Nitrogen dioxide dissolves in water to give nitric acid 3NO2 + H2O → 2HNO3 + NO In this way 98% HNO3 is obtained. |
|
| 16652. |
Which of the following statement is incorrectA. `H^(+)` is the smallest size cation in the periodic tableB. Van der waals radius of chlorine is more than covelent radiusC. Ionic movility of hydrated `Li^(+)` is greater than that of hydrated `Na^(+)`D. he atom has the highest ionisation ehthalpy in the periodic table. |
|
Answer» Correct Answer - C Ionic mobilities of hydrated alkali metal ions are as: `Cs^(+)gtRb^(+)gtK^(+)gtNa^(+)gtLi^(+)` |
|
| 16653. |
निबन्ध:देश की प्रगति में विद्यार्थियों की भूमिका |
|
Answer» प्रस्तावना–विद्यार्थी राष्ट्र का भावी नेता और शासक है। देश की उन्नति और भावी विकास का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व उसके सबल कन्धों पर आने वाला है। वास्तव में राष्ट्र की उन्नति और प्रगति के लिए । वह मुख्य धुरी का काम कर सकता है। जिस देश का विद्यार्थी सतत जागरूक, सतर्क और सावधान होता है, वह देश प्रगति की दौड़ में कभी पीछे नहीं रह सकता। विद्यार्थी एक नवजीवन का सशक्त संवाहक होता है। उसमें रूढ़ियों और परम्पराओं के अटकाव नहीं होते, पूर्वाग्रह से उसकी दृष्टि धूमिल नहीं होती, वरन् वह नये विचारों एवं योजनाओं को क्रियान्वित करने की भरपूर क्षमता से ओतप्रोत होता है। विद्यार्थी जीवन का महत्त्व-‘विद्यार्थी’ शब्द की संरचना है-‘विद्या +अर्थी’ अर्थात् जो विद्यार्जन में सदा संलग्न रहने वाला हो। विद्या प्राप्त करने के लिए परिश्रम और लगन की आवश्यकता होती है। आचार्य चाणक्य ने ठीक ही कहा है, “सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ और विद्या चाहने वाले को सुख कहाँ ? सुख चाहने वाला विद्या को छोड़ दे और विद्या चाहने वाला सुख को छोड़ दे।’ शास्त्रों में आदर्श विद्यार्थी को एकाग्रचित्त, सजग, चुस्त, कम भोजन करने वाला और चरित्र-सम्पन्न बताया गया है काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च। एक अच्छा विद्यार्थी देशवासियों में देशभक्ति की भावना उजागर कर सकता है। देश की एकता व संगठन की भावना को सवल बनाकर भावात्मक एकता को पुष्ट कर सकता है। कुप्रथाओं का उन्मूलन एवं ग्रामोत्थाने–आज देश में कई अन्धविश्वास, अशिक्षा, अज्ञान, रूढ़ियाँ तथा कुप्रथाएँ प्रचलित हैं। इससे देश की यथोचित प्रगति नहीं हो पा रही है। विद्यार्थियों को इन रूढ़ियों और कुप्रथाओं के उन्मूलन के लिए बीड़ा उठाना होगा। आज भी गाँवों में लोग ऋणग्रस्त और शोषण के शिकार हैं। विद्यार्थियों को गाँवों में जाकर साक्षरता, सहकारिता आदि कार्यक्रमों को चलाने में सहयोग करना चाहिए। गाँवों में लघु और कुटीर उद्योगों के प्रचलन के महत्त्व को समझाकर उनके विकास के लिए उन्हें पर्याप्त प्रशंसा, प्रोत्साहन व सम्मान भी देना चाहिए। भ्रष्टाचार व दुराचार का उन्मूलन–आज देश में सर्वत्र भ्रष्टाचार व्याप्त है। कोई भी कार्य रिश्वत के बिना नहीं चलता। पुलिस व न्यायालय-कर्मचारी खुले रूप से रिश्वत माँगते हैं। रक्षक ही भक्षक बन गये हैं। मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति बढ़ गयी है। इस भ्रष्टाचार से लड़ना कोई सामान्य बात नहीं है। इसके लिए निर्भीक विद्यार्थियों को आगे आकर इस भ्रष्टाचाररूपी दानव से लड़ना होगा। जब तक देश से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा, देश की प्रगति होना मुमकिन नहीं है। देश में दुराचार की विभीषिका भी बढ़ती जा रही है। लूटपाट, हत्याएँ और बलात्कार की घटनाओं से समाचार-पत्रों के पृष्ठ-के-पृष्ठ रँगे रहते हैं। देश में प्रचलित शासन-व्यवस्था भले और ईमानदार आदमियों के हाथों में न रहकर भ्रष्ट, बदमाश, सफेदपोश लोगों के हाथों में चली गयी है। इस अभाव की पूर्ति विद्यार्थी वर्ग ही कर सकता है। उसे इस महामारी से लड़कर इसका उन्मूलन करना होगा। काले धन की समाप्ति हेतु प्रयास-काला धन अथवा कालाबाजार रूपी महादानव भी बड़ा शक्तिशाली, दुर्धर्ष और महा भयंकर है। जनता किसी ऐसे सहयोग व नेतृत्व की आकांक्षा रखती है जो इस विषम स्थिति से देश की रक्षा कर सके। इससे लोहा लेने के लिए भी विद्यार्थी वर्ग ही तत्पर हो सकता है। चरित्र-निर्माण से ही देश की उन्नति सम्भव—बड़े-बड़े कल-कारखाने खोलने से तथा बड़े-बड़े बाँध बनाने से राष्ट्र सच्चे अर्थों में विकास नहीं कर सकता। हमें आने वाली पीढ़ियों के चरित्र-निर्माण की ओर विशेष ध्यान देना है। चरित्र-निर्माण ही शिक्षा का मुख्य व पवित्र उद्देश्य होना चाहिए। जिस देश में चरित्रवान् लोग रहते हैं, उस देश का सिर गौरव से सदा ऊँचा रहता है। उपसंहार–किसी देश की वास्तविक उन्नति उसके परिश्रमी, लगनशील, पुरुषार्थी और चरित्रवान् पुरुषों से ही सम्भव है। भारत के विद्यार्थी भी चरित्रवान् बनकर देश के अन्दर वर्तमान में व्याप्त सभी बुराइयों का उन्मूलन कर देश की प्रगति में सच्चा योगदान कर सकते हैं। आज का विद्यार्थी वर्ग राजनीतिक पार्टियों के चक्कर में उलझकर अपने भविष्य को अन्धकारमय बना रहा है। आज के विद्यार्थी को इन सबसे अलग रहकर अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। उसकी भावना राष्ट्र को उन्नति की ओर अग्रसर करने की होनी चाहिए। |
|
| 16654. |
विनयमोहन शर्मा के निबन्धों की मुख्य विशेषताएँ संक्षेप में लिखिए। |
|
Answer» विनयमोहन शर्मा के निबन्ध आत्मव्यंजक तथा दृश्यों को अंकित करने की क्षमता से युक्त हैं। |
|
| 16655. |
पत्र-साहित्य किसे कहते हैं ? |
|
Answer» पत्रों के द्वारा किसी व्यक्ति से सम्बन्ध बनाकर किसी विषय पर जो लिपिबद्ध वार्तालाप प्रारम्भ किया जाता है, उसका सम्पूर्ण संकलित रूप ‘पत्र-साहित्य’ कहलाता है। इसमें लेखक किसी व्यक्ति को पत्र लिखकर किसी विषय पर उसके विचारों को जानना चाहता है। उसका उत्तर प्राप्त होने पर वह उस उत्तर का विश्लेषण करता है और उत्पन्न शंकाओं के समाधान हेतु पुनः पत्र लिखता है। इस प्रकार एक प्रक्रिया चल पड़ती है जो पत्रों के रूप में लिपिबद्ध होती जाती है। जब यह प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है तो दोनों ओर के पत्रों के उस संकलन को पत्र-साहित्य कहा जाता है। |
|
| 16656. |
निबन्ध:दीपावली |
|
Answer» प्रस्तावना-भारत देश विभिन्न त्योहारों एवं पर्वो का देश है। यहाँ ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ त्योहारों की निराली छटा भी देखने को मिल जाती है। ये त्योहार हमारे देश की संस्कृति एवं सभ्यता के प्रतीक हैं। इन त्योहारों को मनाने से मन स्वस्थ एवं मानव-समाज प्रेम की भावना से युक्त हो जाता है। इन त्योहारों में दीपावली अत्यन्त हर्षोल्लास का त्योहार माना जाता है। यह दीपों का अथवा प्रकाश का त्योहार है। दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनायी जाती है। इसके स्वागत में लोग कहते हैं पावन पर्व दीपमाला का, आओ साथी दीप जलाएँ। अन्य देशों में दीपावली–दीपावली केवल भारत में ही नहीं अपितु संसार के विभिन्न देशों बर्मा (म्यांमार), मलाया, जावा, सुमात्रा, थाईलैण्ड, हिन्द-चीन, मॉरीशस आदि में भी मनायी जाती है। अमेरिका के एक राष्ट्र गुयाना में दीपावली को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। इन देशों में कुछ स्थानों पर इस दिन भारत की ही तरह लक्ष्मी-पूजन भी किया जाता है। ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण—दीपावली मनाने के पीछे अनेक पौराणिक कथाएँ भी प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार इस दिन भगवान् राम रावण का वध करने के पश्चात् अयोध्या लौटे थे और अयोध्यावासियों ने उनके आगमन की प्रसन्नता में दीप जला कर अपनी भावनाओं को व्यक्त किया था। एक अन्य कथा के अनुसार इस दिन भगवान् कृष्ण ने नरकासुर का वध करके उसके चंगुल से सोलह हजार युवतियों को मुक्त कराया था। इस कारण प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए लोगों ने दीप जलाये थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार इस दिन समुद्र मन्थन से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं तथा देवताओं ने उनकी अर्चना की थी। इसीलिए आज भी इस दिन लोग सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य की कामना से लक्ष्मी-पूजन करते हैं। यह भी माना जाता है कि इस दिन भगवान् विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी। जैन तीर्थंकर भगवान् महावीर ने इस दिन जैनत्व की प्राण प्रतिष्ठा करते हुए महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था तथा इसी दिन महर्षि दयानन्द ने भी निर्वाण प्राप्त किया था। सिक्ख सम्प्रदाय के छठे गुरु हरगोविन्द जी को भी इस दिन बन्दीगृह से मुक्ति मिली थी। ये सभी किंवदन्तियाँ यही सिद्ध करती हैं कि दीपावली के त्योहार का भारतवासियों के सामाजिक जीवन में बहुत महत्त्व है। दीपावली का आयोजन–दीपावली स्वच्छता एवं साज-सज्जा का सुन्दर सन्देश लेकर आती है। दशहरे के बाद से ही लोग दीपावली मनाने की तैयारियाँ प्रारम्भ कर देते हैं। समाज के सभी वर्गों के लोग अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने घरों की सफाई करते हैं तथा रंग-रोगन से अपने घरों को चमका देते हैं। इस सफाई से घरों में वर्षा ऋतु में आयी सीलन आदि भी दूर हो जाती है। दीपावली से पूर्व धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन लोग बर्तन आदि खरीदते हैं। दीपावली के दिन बाजार बहुत सजे हुए होते हैं। लोग मिठाई, खील-बताशे आदि खरीदते तथा एक-दूसरे को उपहार देते हैं। इस दिन सभी बच्चे नवीन वस्त्र धारण करते हैं। रात को लक्ष्मी-गणेश की पूजा के पश्चात् बच्चे और बूढ़े मिलकर पटाखे, आतिशबाजी आदि छोड़ते हैं। घरों को दीपकों, बिजली के बल्बों, मोमबत्तियों आदि से सजाया जाता है। समस्त दृश्य अत्यन्त मनोरम एवं हृदयग्राही प्रतीत होता है। सभी लोग पारस्परिक बैर-भाव को त्याग कर प्रेम से एक-दूसरे को दीपावली की शुभ-कामनाएँ देते हैं। उपसंहार-दीपावली के शुभ अवसर पर कुछ लोग जुआ खेलते हैं तथा जुए में पराजित होने पर एक-दूसरे को भला-बुरा भी कहते हैं। इससे उल्लास एवं उमंग का यह त्योहार विषाद में बदल जाता है। मार-पीट होने से अनेक व्यक्ति घायल हो जाते हैं। पटाखे और आतिशबाजी छोड़ने के कारण हुई दुर्घटना में अनेक व्यक्ति अपने प्राणों से भी हाथ धो बैठते हैं। हमें दीपावली के इस त्योहार को उसके सम्पूर्ण वैभव के साथ उस ढंग से मनाना चाहिए जिससे समाज में पारस्परिक सद्भाव उत्पन्न हो सके। |
|
| 16657. |
निबन्ध:परहित सरिस धरम नहिं भाई |
|
Answer» प्रस्तावना–संसार में परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं हैं। सन्त-असन्त और अच्छे-बुरे व्यक्ति का अन्तर परोपकार से प्रकट होता है। जो व्यक्ति परोपकार के लिए अपने शरीर की बलि दे देता है, वह सन्त या अच्छा व्यक्ति है। अपने संकुचित स्वार्थ से ऊपर उठकर मानव-जाति का नि:स्वार्थ उपकार करना ही मनुष्य का प्रधान कर्तव्य है। जो मनुष्य जितना पर-कल्याण के कार्य में लगा रहता है, वह उतना ही महान् बनता है। जिस समाज में दूसरे की सहायता करने की भावना जितनी अधिक होती है, वह समाज उतना ही सुखी और समृद्ध होता है। इसलिए तुलसीदास जी ने कहा है परहित सरिस धरम नहिं भाई ।पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।। परोपकार का अर्थ-परोपकार से तात्पर्य है-दूसरों का हित करना। जब हम स्वार्थ से प्रेरित होकर दूसरे का हित साधन करते हैं, तब वह परोपकार नहीं होता। परोपकार स्वार्थपूर्ण मन से नहीं हो सकता है। उसके लिए हृदय की पवित्रता और शुद्धता आवश्यक है। परोपकार क्षमा, दया, त्याग, बलिदान, प्रेम, ममता आदि गुणों का व्यक्त रूप है। महर्षि व्यास ने परोपकार को पुण्य की संज्ञा दी है; यथा— अष्टादश पुराणेषु, व्यासस्य वचनद्वयम्।। परोपकारः एक स्वाभाविक गुण–परोपकार की भावना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। यह भावना मनुष्य में ही नहीं, पशु-पक्षियों, वृक्ष और नदियों तक में पायी जाती है। प्रकृति भी सदा परोपकारयुक्त दिखाई देती है। मेघ वर्षा का जल स्वयं नहीं पीते, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, नदियाँ दूसरों के उपकार के लिए ही बहती हैं। सूर्य सबके लिए प्रकाश वितरित करता है, चन्द्रमा अपनी शीतल किरणों से सबको शान्ति देता है, सुमन सर्वत्र अपनी सुगन्ध फैलाते हैं, गाय हमारे पीने के लिए ही दूध देती है। कवि रहीम का कथन है– तरुवर फल नहिं खाते हैं, सरवर पियहिं न पान । परोपकार : मानव का धर्म-परोपकार मनुष्य का धर्म है। भूखों को अन्न, प्यासे को पानी, वस्त्रहीन को वस्त्र, पीड़ितों और रोगियों की सेवा-सुश्रुषा मानव का परम धर्म है। संसार में ऐसे ही व्यक्तियों के नाम अमर होते हैं, जो दूसरों के लिए मरते और जीवित रहते हैं। तुलसीदास की ये पंक्तियाँ कितनी महत्त्वपूर्ण परहित बस जिनके मन माहीं । तिन्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥ परोपकार को इतनी महत्ता इसलिए दी गयी है, क्योंकि इससे मनुष्य की पहचान होती है। इस प्रकार सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने को तत्पर रहता है। परोपकार : आत्मोत्थान की मूल-मनुष्य क्षुद्र से महान् और विरल से विराट तभी बनता है जब उसकी परोपकार-वृत्ति विस्तृत होती जाती है। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि उसने प्राणिमात्र के हित को मानव-जीवन का लक्ष्य बताया है। एक धर्मप्रिय व्यक्ति की जीवनचर्या पक्षियों को दाना और पशुओं को चारा देने से प्रारम्भ होती है। यही व्यक्ति का समष्टिमय स्वरूप है। ज्यों-ज्यों आत्मा में उदारता बढ़ती जाती है, उतनी ही अधिक आनन्द की उपलब्धि होती जाती है और अपने समस्त कर्म जीव-मात्र के लिए समर्पित करने की भावना तीव्रतर होती जाती है सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।। अर्थात् सभी लोग सुखी हों, निरोगी हों, कल्याणयुक्त हों। दुःख-कष्ट कोई न भोगे। यही सर्व कल्याणमय भावना सन्तों का मुख्य लक्षण है। परोपकारी महापुरुषों के उदाहरण-महर्षि दधीचि ने राक्षसों के विनाश के लिए अपनी हड्डियाँ देवताओं को दे दी। राजा शिवि ने कबूतर की रक्षा के लिए बाज को अपने शरीर का मांस काट-काटकर दे दिया। गुरु गोविन्द सिंह हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने बच्चों सहित बलिदान हो गये। राजकुमार सिद्धार्थ ने संसार को दु:ख से छुड़ाने के लिए राजसी सुख-वैभव का त्याग कर दिया। लोक-हित के लिए महात्मा ईसा सूली पर चढ़ गये और सुकरात ने विष का प्याला पी लिया। महात्मा गाँधी ने देश की अखण्डता के लिए अपने सीने पर गोलियाँ खायीं। इस प्रकार इतिहास का एक-एक पृष्ठ परोपकारी महापुरुषों की पुण्यगाथाओं से भरा पड़ा है। प्रेम: परोपकार का प्रतिरूप—प्रेम और परोपकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्राणिमात्र के प्रति स्नेह-वात्सल्य की भावना परोपकार से ही जुड़ी हुई है। प्रेम में बलिदान और उत्सर्ग की भावना प्रधान होती है। जो पुरुष परोपकारी होता है, वह दूसरों के हित के लिए अपने सर्वस्व निछावर हेतु तत्पर रहता है। परोपकारी व्यक्ति कष्ट उठाकर, तकलीफ का अनुभव करके भी परोपकार वृत्ति का त्याग नहीं करता। जिस प्रकार मेहदी लगाने वाले के हाथ में भी अपना रंग रचा देती है, उसी प्रकार परोपकारी व्यक्ति की संगति सदा सबको सुख देने वाली होती है। उपसंहार–परोपकार मानव-समाज का आधार है। समाज में व्यक्ति एक-दूसरे की सहायता व सहयोग की सदा आकांक्षी रहता है। परोपकार सामाजिक जीवन की धुरी है, उसके बिना सामाजिक जीवन गति नहीं कर सकता। परोपकार मानव-जाति का आभूषण है। ‘परोपकाराय सतां विभूतयः’ अर्थात् सत्पुरुषों का अलंकार तो परोपकार ही है। हमारा कर्तव्य है कि हम परोपकारी महात्माओं से प्रेरित होकर अपने जीवन-पथ को प्रशस्त करें और कवि मैथिलीशरण गुप्त के इस लोक-कल्याणकारी पावन सन्देश को चारों दिशाओं में प्रसारित करें वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। |
|
| 16658. |
निबन्ध:राष्ट्रभाषा हिन्दी |
|
Answer» प्रस्तावना–स्वतन्त्रता से पूर्व देश अंग्रेजी शासन के अधीन था। अंग्रेजों को अपना राज-काज चलाने के लिए कुछ ऐसे पढ़े-लिखे भारतीय और लिपिकों की आवश्यकता थी, जो स्वयं को भाषा के ज्ञान के कारण अन्य भारतीयों से श्रेष्ठ समझते हों। दुर्भाग्यवश उन्हें ऐसे लोगों का पूरा वर्ग ही मिल गया। देश की परतन्त्रता तक तो दूसरी बात थी, लेकिन देश के स्वतन्त्र होने के बाद भी इस वर्ग का चरित्र नहीं बदला और वह इस प्रयास में लगा रहा कि किसी भी तरह अंग्रेज़ी ही देश की कामकाजी भाषा बनी रहे। उसे अपने प्रयास में सफलता भी मिली, जब हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किये जाने के बावजूद भारतीय संविधान में यह व्यवस्था की गयी कि आगामी 15 वर्ष तक हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा भी सरकारी काम-काज की भाषा बनी रहेगी। तब से अब तक पैंसठ से भी अधिक वर्ष बीत गए, लेकिन सरकारी काम-काज की भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व आज भी बना हुआ है। स्वतन्त्रता से पूर्व हिन्दी-भारत में अंग्रेजों के पैर पसारने और जमाने से पूर्व हिन्दी ही जनभाषा थी। देश में अंग्रेजी भाषा का प्रचार-प्रसार होने से पूर्व शताब्दियों तक हिन्दी देश को भावनात्मक एकता के सूत्र में बाँधे रही। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में हिन्दी भाषी लोगों के अलावा अनेक अहिन्दी भाषी लेखकों, सन्तों और नेताओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, जिनमें महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, बंकिमचन्द्र चटर्जी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी-आज पंजाब से लेकर असोम तक तथा जम्मू-कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र-आन्ध्र प्रदेश तक बोली और समझी जाने वाली एकमात्र भाषा हिन्दी ही है। इसी भाषा के द्वारा , विभिन्न प्रदेशों के निवासी अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। अमृतसर से चलकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल को पार करके अंसोम के गुवाहाटी नगर तक पहुँचने वाला ट्रक ड्राइवर रास्ते भर जिस भाषा का प्रयोग करता है, वह हिन्दी ही है। इस प्रकार हिन्दी भारत के जन-सामान्य की सम्पर्क भाषा बन गयी है। यह वह भाषा है, जो सम्पूर्ण राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधने का काम करती है और हमारी राष्ट्रीय एकता को मजबूत भी करती है। हिन्दी : एक सक्षम भाषा–आज हिन्दी एक सक्षम भाषा बन चुकी है। स्वतन्त्रता के समय हिन्दी पर यह आरोप लगाया जाता था कि इसमें वैज्ञानिक और गम्भीर विवेचनात्मक विषयों के लिए अनुकूल शब्दावली का अभाव है, लेकिन स्वतन्त्रता के बाद इस ओर गम्भीर प्रयास किये गये हैं। तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में नये-नये शब्दों को गढ़ लिया गया है। नये होने के कारण ये शब्द थोड़े कठिन प्रतीत होते हैं। इसी को आधार बनाकर अंग्रेजी प्रेमी हिन्दी पर यह आरोप लगाते हैं कि इसकी शब्दावली कठिन है। लेकिन यह ध्यान रखने की बात है कि कोई भी नई बात शुरू में कठिन ही लगा करती है। भाषा कोई भी हो, उसे सीखने में परिश्रम और समय तो लगता ही है। अतः अपने राष्ट्र और भाषा के गौरव की रक्षा के लिए हमें अपनी भाषा को सीखने में थोड़ा परिश्रम तो करना ही चाहिए। हिन्दी के विकास में बाधाएँ-हिन्दी के विकास में कुछ प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं (i) राजनीतिक कारणों ने अहिन्दी भाषी लोगों के मन में यह बात बैठा दी है कि यदि अंग्रेजी न रही, तो प्रतियोगी परीक्षाओं में हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों का वर्चस्व हो जाएगा और अहिन्दी भाषी दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रह जाएंगे। (ii) सरकार और प्रशासन में कतिपय महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन कुछ स्वार्थी लोग यह समझते हैं कि यदि अंग्रेजी का स्थान हिन्दी ने ले लिया, तो उनका वर्चस्व समाप्त हो जाएगा और एक गरीब मजदूर का बेटा भी उनसे स्पर्धा करने की स्थिति में आ जाएगा। (iii) कुछ स्वार्थी लोग प्रादेशिक भाषाओं के विकास की बात करके हिन्दी को उनका प्रतिद्वन्द्वी बताते हैं, जबकि हिन्दी का प्रादेशिक भाषाओं से कोई बैर नहीं। हिन्दी के विकास-मार्ग में यदि कोई भाषा बाधा है, तो वह अंग्रेजी है। अंग्रेजी ही हिन्दी तथा प्रादेशिक भाषाओं की जीवन-शक्ति को चूसकर स्वयं पोषित होती रही है। उपसंहार–राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी-भरी। वास्तविकता यह है कि हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो भारत की सबसे सम्पन्न भाषा है। यही सम्पूर्ण देश की सम्पर्क भाषा आज भी बनी हुई है। अपनी सरलता, स्पष्टता, समर्थता और बोधगम्यता के कारण यह राष्ट्रभाषा का गौरव पाने की अधिकारिणी है। प्रत्येक भारतवासी का यह कर्तव्य है कि वह अपने दैनिक जीवन में हिन्दी का अधिक-से-अधिक प्रयोग करे और हिन्दी में बोलने में गर्व का अनुभव करे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने भी उचित ही लिखा है– निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। |
|
| 16659. |
विचारात्मक निबन्ध लिखने के अतिरिक्त काका साहब ने हिन्दी साहित्य की किस विधा में कलम चलायी है? |
|
Answer» यात्रा-साहित्य में |
|
| 16660. |
शुक्ल युग को हिन्दी निबन्ध का उत्कर्ष काल क्यों माना जाता है ? |
|
Answer» यद्यपि द्विवेदी युग में हिन्दी निबन्ध-विधा भाषा एवं शैली दोनों ही दृष्टियों से प्रौढ़ हो गयी थी, किन्तु आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने निबन्ध को वैचारिक क्षेत्र में वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रवृत्ति एवं गम्भीरता प्रदान की। अतः भाषा-शैली, गम्भीरता, चिन्तन, मौलिकता आदि प्रत्येक क्षेत्र में निबन्ध-विधा परिष्कार को प्राप्त हुई। इसीलिए शुक्ल युग को हिन्दी निबन्ध का उत्कर्ष काल कहा जाता है। |
|
| 16661. |
प्रसादोत्तर युग के हिन्दी नाटकों की प्रमुख विशेषता बताइए। |
|
Answer» प्रसादोत्तर नाटकों में भारतीय एवं पाश्चात्य शैली के तत्त्वों का एक साथ समावेश पाया जाता है। इन नाटकों में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक समस्याओं का चित्रण हुआ है। इनकी विषय-वस्तु यथार्थवादी धरातल पर संरचित है। |
|
| 16662. |
निबन्ध:भारत के प्रमुख पर्व |
|
Answer» भूमिका-मानव एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने सुख-दुःख का विभाजन अपने समाज के साथ करता है। वह हमेशा अपने कार्य में लीन रहता है तथा अपने बँधे-बँधाये जीवन में परिवर्तन की अपेक्षा रखता है। यह इसीलिए कि वह चाहता है कि दैनिक कार्यों में स्फूर्ति, आनन्द तथा उत्साह का संचार होता रहे। इस परिवर्तन को वह विविध पर्वो के रूप में मनाता है। इन पर्वो पर वह समाज के सभी लोगों के साथ मिलकर समाज के उत्थान के लिए प्रयासरत रहता है। राष्ट्रीय-जातीय पर्व-भारत देश अनेकता में एकता लिये हुए है। विभिन्न जातियों, धर्मों और वर्गों के व्यक्तियों ने इस महान देश का निर्माण किया है। इसलिए यहाँ अनेक पर्व वर्ष भर मनाये जाते हैं। इन पर्वो में देश के सभी सहृदय निवासी सहर्ष भाग लेते हैं और आपस में मित्रता, सद्भाव, एकता आदि का परिचय देते हैं। हमारे पर्व–राष्ट्रीय तथा जातीय-दो तरह के हैं। राष्ट्रीय पर्वो के अन्तर्गत स्वतन्त्रता दिवस, गणतन्त्र दिवस और विभिन्न राष्ट्रीय नेताओं के जन्मदिन आते हैं और जातीय पर्यों में भारत में रहने वाले विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर मनाये जाने वाले पर्वो की गणना होती है। प्रमुख राष्ट्रीय पर्व-राष्ट्रीय पर्वो में सबसे पहला पर्व है-स्वतन्त्रता दिवस। हमारा भारत अनेक वर्षों की परतन्त्रता से 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्र हुआ था। उसी की याद में प्रति वर्ष 15 अगस्त को सारे देश में स्वतन्त्रता दिवस बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। मुख्य समारोह का प्रारम्भ दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमन्त्री द्वारा झण्डा फहराने से होता है। देश के प्रमुख नगरों और गाँवों में भी यह पर्व उत्साह के साथ मनाया जाता है। गणतन्त्र दिवस हमारा दूसरा प्रमुख राष्ट्रीय पर्व है। 26 जनवरी, 1950 को हमारे देश में संविधान लागू किया गया था और इसी दिन भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न गणराज्य घोषित किया गया था। इसी कारण सम्पूर्ण देश में प्रति वर्ष 26 जनवरी को यह राष्ट्रीय पर्व अत्यन्त उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। इस पर्व का मुख्य समारोह दिल्ली में होता है, जहाँ विशाल झाँकियों से जुलूस निकाला जाता है और राष्ट्रपति सलामी लेते हैं। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने हमें स्वाधीनता दिलाने में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। उनकी याद में उनके जन्म दिवस 2 अक्टूबर को प्रति वर्ष यह राष्ट्रीय पर्व मनाया जाता है। इसके मुख्य समारोह दिल्ली स्थित राजघाट पर और उनके जन्म-स्थान पोरबन्दर पर होते हैं। इसी प्रकार हमारे प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन 14 नवम्बर को बाल दिवस के रूप में; डॉ० राधाकृष्णन का जन्मदिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इन पर्वो को छोटे-बड़े सभी भारतवासी मिल-जुलकर धूमधाम से मनाते हैं। प्रमुख जातीय पर्व-भारत के प्रमुख जातीय पर्यों में सभी जातियों के विभिन्न पर्व देश में समयसमय पर मनाये जाते हैं। इन जातियों में हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख और ईसाई मुख्य हैं। हिन्दुओं के प्रमुख पर्व-हिन्दुओं में प्रचलित प्रमुख पर्व हैं-होली, दीपावली, दशहरा, रक्षाबन्धन आदि। रक्षाबन्धन को श्रावणी भी पुकारते हैं। प्राचीन परम्परा के अनुसार इस दिन ब्राह्मण दूसरे वर्ग के लोगों को रक्षा-सूत्र बाँधते थे, जिससे रक्षा-सूत्र बँधवाने वाला, देश तथा जाति की रक्षा करना अपना कर्तव्य समझता था। कालान्तर में बहनें अपने भाइयों को रक्षा-सूत्र बाँधने लगीं। मध्यकाल में हिन्दू बहनों ने मुसलमान भाइयों को रक्षा-सूत्र बाँधकर सांस्कृतिक एकता का परिचय दिया था। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। दशहरा या विजयदशमी हिन्दुओं का राष्ट्रव्यापी पर्व है। इस पर्व से पूर्व रामलीलाओं तथा दुर्गापूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन रावण-वध के द्वारा बुरी प्रवृत्तियों पर सदगुणों की विजय प्रदर्शित की जाती है। यह पर्व वीरता, दया, सहानुभूति, आदर्श मैत्री, भक्ति-भावना आदि उच्च गुणों की प्रेरणा देता है। दीपावली कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाने वाला दीपों का पर्व है। इस दिन लक्ष्मीगणेश जी की पूजा की जाती है और घर-आँगन में दीपों से प्रकाश किया जाता है। सिक्खों के प्रमुख पर्व-सिक्खों का प्रमुख पर्व है-गुरु-पर्व। इसमें गुरु नानक, गुरु गोविन्द सिंह ईसाइयों के प्रमुख पर्व–प्रति वर्ष 25 दिसम्बर को क्रिसमस का पर्व अत्यन्त उत्साह से मनाया जाता है। यह महात्मा ईसा मसीह की पुण्य जयन्ती का पर्व है। ईसाइयों का दूसरा प्रमुख पर्व है-ईस्टर, जो 21 मार्च के बाद जब पहली बार पूरा चाँद दिखाई पड़ता है तो उसके पश्चात् आने वाले रविवार को मनाया जाता है। इनके अतिरिक्त दो प्रमुख पर्व हैं-गुड फ्राइडे तथा प्रथम जनवरी (नववर्ष)। । मुसलमानों के प्रमुख पर्व-मुसलमानों के पर्वो में रमजान, मुहर्रम, ईद, बकरीद आदि प्रमुख हैं। उपसंहार–पर्व हमारी सभ्यता तथा संस्कृति के प्रतीक हैं। सैकड़ों वर्षों से ये हमारे सामाजिक जीवन में नित नवीन प्रेरणा का संचार करते रहे हैं। अत: इन पर्वो का मनाना हमारे लिए उपादेय तथा आवश्यक है। |
|
| 16663. |
निबन्ध:राष्ट्रीय एकता |
|
Answer» प्रस्तावना : राष्ट्रीय एकता से अभिप्राय-‘एकता’ एक भावात्मक शब्द है, जिसका अर्थ है‘एक होने की भाव’। इस प्रकार ‘राष्ट्रीय एकता’ का अभिप्राय है देश का सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भौगोलिक, धार्मिक और साहित्यिक दृष्टि से एक होना। इन दृष्टिकोणों से भारत में अनेकता दृष्टिगोचर होती है, किन्तु बाह्य रूप से दिखाई देने वाली इस अनेकता के मूल में वैचारिक एकता , निहित है। अनेकता में एकता ही भारत की प्रमुख विशेषता है। किसी भी राष्ट्र की एकता उसके राष्ट्रीय गौरव की प्रतीक होती है और जिस व्यक्ति को अपने राष्ट्रीय गौरव पर अभिमान नहीं होता, वह मनुष्य नहीं है जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। भारत में अनेकता के विविध रूप-भारत एक विशाल देश है। उसमें अनेकता होनी स्वाभाविक ही , है। धर्म के क्षेत्र में हिन्दू , मुसलमान, सिक्ख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि विविध धर्मावलम्बी यहाँ निवास करते हैं। इतना ही नहीं, एक-एक धर्म में भी कई अवान्तर भेद हैं। सामाजिक दृष्टि से विभिन्न जातियाँ, उपजातियाँ, गोत्र, प्रवर आदि विविधता के सूचक हैं। सांस्कृतिक दृष्टि से खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा, पूजा-पाठ आदि की भिन्नता ‘अनेकता’ की द्योतक है। राजनीतिक क्षेत्र में समाजवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद, गाँधीवाद आदि अनेक वाद राजनीतिक विचार-भिन्नता का संकेत करते हैं। आर्थिक दृष्टि से पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद आदि विचारधाराएँ भिन्नता दर्शाती हैं। इसी प्रकार भारत की प्राकृतिक शोभा, भौगोलिक स्थिति, ऋतु-परिवर्तन आदि में भी पर्याप्त भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। राष्ट्रीय एकता का आधार हमारे देश की एकता के आधार दर्शन (Philosophy) और साहित्य (Literature) हैं। ये सभी प्रकार की भिन्नताओं और असमानताओं को समाप्त करने वाले हैं। भारतीय दर्शन सर्व-समन्वय की भावना का पोषक है। यह किसी एक भाषा में नहीं लिखा गया है, अपितु यह देश की विभिन्न भाषाओं में लिखा गया है। इसी प्रकार हमारे देश का साहित्य भी विभिन्न क्षेत्र के निवासियों द्वारा लिखे जाने के बावजूद क्षेत्रवादिता या प्रान्तीयता के भावों को उत्पन्न नहीं करता, वरन् सबके लिए भाईचारे, मेल-मिलाप और सद्भाव का सन्देश देता हुआ देशभक्ति के भावों को जगाता है। राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता–राष्ट्र की आन्तरिक शान्ति, सुव्यवस्था और बाह्य सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय एकता की परम आवश्यकता है। भारत के सन्तों ने तो प्रारम्भ से ही मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई अन्तर नहीं माना, वे तो सम्पूर्ण मनुष्य-जाति को एक सूत्र में बाँधने के पक्षधर रहे। (क) साम्प्रदायिकता–साम्प्रदायिकता धर्म का संकुचित दृष्टिकोण है। संसार के विविध धर्मों में जितनी बातें बतायी मयी हैं, उनमें से अधिकांश बातें समान हैं; जैसे–प्रेम, (ख) क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता-अंग्रेज शासकों ने न केवल धर्म, वरन् प्रान्तीयता की अलगाववादी भावना को भी भड़काया है। इसीलिए जब-तब राष्ट्रीय भावना के स्थान पर हमें पृथक् अस्तित्व (राष्ट्र) और पृथक् क्षेत्रीय शासन स्थापित करने की माँगें सुनाई पड़ती हैं। इस प्रकार क्षेत्रीयता अथवा प्रान्तीयता की भावना भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए बहुत बड़ी बाधा है। । (ग) भाषावाद–भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है। यहाँ अनेक भाषाएँ और बोलियाँ प्रचलित हैं। प्रत्येक भाषा-भाषी अपनी मातृभाषा को दूसरों से बढ़कर मानता है। फलत: विद्वेष और घृणा का प्रचार होता है और अन्ततः राष्ट्रीय एकता प्रभावित होती है। (घ) जातिवाद-मध्यकाल में भारत के जातिवादी स्वरूप में जो कट्टरता आयी थी, उसने अन्य जातियों के प्रति घृणा और विद्वेष का भाव विकसित कर दिया। पुराकाल की कर्म पर आधारित वर्णव्यवस्था ने वर्तमान में जन्म पर आधारित कट्टर जाति-प्रथा का रूप ले लिया, जिसने भी भारत की एकता को बुरी तरह प्रभावित किया। राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के उपाय–वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए निम्नलिखित उपाय प्रस्तुत हैं (क) सर्वधर्म समभाव-विभिन्न धर्मों में जितनी भी अच्छी बातें हैं, यदि उनकी तुलना अन्य धर्मों । की बातों से की जाए तो उनमें एक अद्भुत समानता दिखाई देगी; अतः हमें सभी धर्मों का समान आदर करना चाहिए। धार्मिक या साम्प्रदायिक आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा समझना अनुचित है। (ख) समष्टि-हित की भावना–यदि हमें अपनी स्वार्थ-भावना को त्यागकर समष्टि-हित का भाव विकसित कर लें तथा धर्म, क्षेत्र, भाषा और जाति के नाम पर न सोचकर समूचे राष्ट्र के नाम पर सोचे तो अलगाववादी भावना के स्थान पर एकता की भावना सुदृढ़ होगी। (ग) एकता का विश्वास–भारत में जो दृश्यमान अनेकता है, उसके अन्दर ही एकता का भी निवास है–इस बात का प्रचार समुचित ढंग से किया जाए, जिससे सभी नागरिकों को अनेकता में अन्तर्निहित एकता का विश्वास हो सके। वे पारस्परिक प्रेम और सद्भाव द्वारा एक-दूसरे में अपने प्रति विश्वास जगा सकें। (घ) शिक्षा को प्रसार–छोटी-छोटी व्यक्तिगत द्वेष की भावनाएँ राष्ट्र को कमजोर बनाती हैं। शिक्षा का सच्चा अर्थ एक व्यापक अन्तर्दृष्टि व विवेक है। इसलिए शिक्षा का अधिकाधिक प्रसार किया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थी की संकुचित भावनाएँ शिथिल हों। (ङ) राजनीतिक छल-छद्मों का अन्त–आजकल स्वार्थी राजनेता साम्प्रदायिक अथवा जातीय विद्वेष, घृणा और हिंसा भड़काते हैं और सम्प्रदाय विशेष का मसीहा बनकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। इस प्रकार के राजनीतिक छल-छद्मों का अन्त और राजनीतिक वातावरण के स्वच्छ होने से भी एकता का भाव सुदृढ़ होगा। उपसंहार-राष्ट्रीय एकता की भावना एक श्रेष्ठ भावना है और इस भावना को उत्पन्न करने के लिए हमें स्वयं को सबसे पहले मनुष्य समझना होगा, क्योंकि मनुष्य एवं मनुष्य में असमानता की भावना ही संसार में समस्त विद्वेष एवं विवाद का कारण है। इसीलिए जब तक हममें मानवीयता की भावना विकसित नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय एकता का भाव उत्पन्न नहीं हो सकता। यह भाव उपदेशों, भाषणों और राष्ट्रीय गीत के माध्यम से सम्भव नहीं। |
|
| 16664. |
शुक्ल जी के पश्चात् हिन्दी की निबन्ध विधा के विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। |
|
Answer» शुक्लोत्तर युग में साहित्यिक एवं समीक्षात्मक निबन्धों की रचना की गयी। इन निबन्धों में जहाँ भाषा-शैली की प्रौढ़ता मिलती है, वहीं चिन्तन की गम्भीरता भी। इनमें आत्मपरक (वैयक्तिक) भाषा का प्रयोग हुआ है। शुक्ल जी के पश्चात् हिन्दी में आलोचनात्मक निबन्ध साहित्य की भी पर्याप्त श्रीवृद्धि हुई। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ० रामविलास शर्मा, नन्ददुलारे वाजपेयी, शान्तिप्रिय द्विवेदी, शिवदान सिंह चौहान आदि लेखकों ने आलोचनात्मक निबन्ध-साहित्य को नयी दिशा प्रदान कर विकास के पथ पर अग्रसर किया। |
|
| 16665. |
निबन्ध:हमारे राष्ट्रीय पर्व |
|
Answer» प्रस्तावना–भारतवर्ष को यदि विविध प्रकार के त्योहारों का देश कह दिया जाए तो कुछ अनुचित न होगा। इस धरा-धाम पर इतनी जातियाँ, धर्म और सम्प्रदायों के लोग निवास करते हैं कि उनके सभी त्योहारों को एक-एक दिन में दो-दो त्योहार मनाकर भी वर्ष भर में पूरा नहीं किया जा सकता। पर्वो का मानव-जीवन व राष्ट्र के जीवन में विशेष महत्त्व होता है। इनसे नयी प्रेरणा मिलती है, जीवन की नीरसता दूर होती है तथा रोचकता और आनन्द में वृद्धि होती है। जिन पर्वो का सम्बन्ध किसी व्यक्ति, जाति या धर्म के मानने वालों से न होकर सम्पूर्ण राष्ट्र से होता है तथा जो पूरे देश में सभी नागरिकों द्वारा उत्साहपूर्वक मनाये जाते हैं, उन्हें . राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। गणतन्त्र दिवस, स्वतन्त्रता दिवस एवं गाँधी जयन्ती हमारे राष्ट्रीय पर्व हैं। ये उन अमर शहीदों व देशभक्तों का स्मरण कराते हैं, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतन्त्रता, गौरव व इसकी प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए अपने प्राणों को भी सहर्ष निछावर कर दिया। गणतन्त्र दिवस-गणतन्त्र दिवस हमारा एक राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रतिवर्ष 26 जनवरी को समस्त देशवासियों द्वारा मनाया जाता है। इसी दिन सन् 1950 ई० में हमारे देश में अपना संविधान लागू हुआ था। इसी दिन हमारा राष्ट्र पूर्ण स्वायत्त गणतन्त्र राज्य बना; अर्थात् भारत को पूर्ण प्रभुसत्तासम्पन्न गणराज्य घोषित किया गया। यही दिन हमें 26 जनवरी, 1930 का भी स्मरण कराता है, जब जवाहरलाल नेहरू जी की अध्यक्षता में कांग्रेस अधिवेशन में पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पारित किया गया था। गणतन्त्र दिवस का त्योहार बड़ी धूमधाम से यों तो देश के प्रत्येक भाग में मनाया जाता है, पर इसका मुख्य आयोजन देश की राजधानी दिल्ली में ही किया जाता है। इस दिन सबसे पहले देश के प्रधानमन्त्री इण्डिया गेट पर शहीद जवानों की याद में प्रज्वलित की गयी जवान ज्योति पर सारे राष्ट्र की ओर से सलामी देते हैं। उसके बाद अपने मन्त्रिमण्डल के सदस्यों के साथ राष्ट्रपति महोदय की अगवानी करते हैं। राष्ट्रपति भवन के सामने स्थित विजय चौक में राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने के साथ ही मुख्य पर्व मनाया जाना आरम्भ होता है। इस दिन विजय चौक से प्रारम्भ होकर लाल किले तक जाने वाली परेड समारोह का प्रमुख आकर्षण होती है। क्रम से तीनों सेनाओं (जल, थल, वायु), सीमा सुरक्षा बल, अन्य सभी प्रकार के बलों, पुलिस आदि की टुकड़ियाँ राष्ट्रपति को सलामी देती हैं। एन० सी० सी०, एन० एस० एस० तथा स्काउट, स्कूलों के बच्चे सलामी के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए गुजरते हैं। इसके उपरान्त सभी प्रदेशों की झाँकियाँ आदि प्रस्तुत की जाती हैं तथा शस्त्रास्त्रों का भी प्रदर्शन किया जाता है। राष्ट्रपति को तोपों की सलामी दी जाती है तथा परेड, झाँकियों आदि पर हेलीकॉप्टरों-हवाई जहाजों से पुष्प वर्षा की जाती है। ” स्वतन्त्रता दिवस-पन्द्रह अगस्त के दिन मनाया जाने वाला स्वतन्त्रता दिवस का त्योहार दूसरा मुख्य राष्ट्रीय त्योहार माना गया है। इसके आकर्षण और मनाने का मुख्य केन्द्र दिल्ली स्थित लाल किला है। यों सारे नगर और सारे देश में भी अपने-अपने ढंग से इसे मनाने की परम्परा है। स्वतन्त्रता दिवस प्रत्येक वर्ष अगस्त मास की पन्द्रहवीं तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन लगभग दो सौ वर्षों के अंग्रेजी दासत्व के बाद हमारा देश स्वतन्त्र हुआ था। इसी दिन ऐतिहासिक लाल किले पर हमारा तिरंगा झण्डा फहराया गया था। यह स्वतन्त्रता राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के भगीरथ प्रयासों व अनेक महान् नेताओं तथा देशभक्तों के बलिदान की गाथा है। यह स्वतन्त्रता इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इसे बन्दूकों, तोपों जैसे अस्त्र-शस्त्रों से नहीं वरन् सत्य, अहिंसा जैसे शस्त्रास्त्रों से प्राप्त किया गया था। इस दिवस की पूर्व सन्ध्या पर राष्ट्रपति राष्ट्र के नाम अपना सन्देश प्रसारित करते हैं। दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से पहले प्रधानमन्त्री सेना की तीनों टुकड़ियों, अन्य सुरक्षा बलों, स्काउटों आदि का निरीक्षण कर सलामी लेते हैं। फिर लाल किले के मुख्य द्वार पर पहुँचकर राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर उसे सलामी देते हैं तथा राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं। इसे सम्बोधन में पिछले वर्ष सरकार द्वारा किये गये कार्यों का लेखा-जोखा, अनेक नवीन योजनाओं तथा देश-विदेश से सम्बन्ध रखने वाली नीतियों के बारे में उद्घोषणा की जाती है। अन्त में, राष्ट्रीय गान के साथ यह मुख्य समारोह समाप्त हो जाता है। गाँधी जयन्ती-गाँधी जयन्ती भी हमारा एक राष्ट्रीय पर्व है, जो प्रतिवर्ष गाँधीजी के जन्म-दिवस की शुभ स्मृति में 2 अक्टूबर को देश भर में मनाया जाता है। स्वाधीनता आन्दोलन में गाँधीजी ने अहिंसात्मक रूप से देश का नेतृत्व किया और देश को स्वतन्त्र कराने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन, भारत छोड़ो आन्दोलन से शक्तिशाली अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर । विवश कर दिया। गाँधीजी ने राष्ट्र एवं दीन-हीनों की सेवा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। प्रतिवर्ष सारा देश उनके त्याग, तपस्या एवं बलिदान के लिए उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है और उनके बताये गये रास्ते पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करता है। राष्ट्रीय महत्त्व के अन्य पर्व-इन तीन मुख्य पर्वो के अतिरिक्त अन्य कई पर्व भी भारत में मनाये जाते हैं और उनका भी राष्ट्रीय महत्त्व स्वीकारा जाता है। ईद, होली, वसन्त पंचमी, बुद्ध पंचमी, वाल्मीकि प्राकट्योत्सव, विजयादशमी, दीपावली आदि इसी प्रकार के पर्व माने जाते हैं। हमारी राष्ट्रीय अस्मिता किसी-न-किसी रूप में इन सभी पर्वो के साथ जुड़ी हुई है, फिर भी मुख्य महत्त्व उपर्युक्त तीन पर्वो का ही उपसंहार-त्योहार तीन हों या अधिक, सभी का महत्त्व मानवीय एवं राष्ट्रीय अस्मिता को उजागर करना ही होता है। मानव-जीवन में जो एक आनन्दप्रियता, उत्सवप्रियता की भावना और वृत्ति छिपी रहती है, उनका भी इस प्रकार से प्रकटीकरण और स्थापन हो जाया करता है। हमारे राष्ट्रीय पर्व राष्ट्रीय एकता के प्रेरणास्रोत हैं। ये पर्व सभी भारतीयों के मन में हर्ष, उल्लास और नवीन राष्ट्रीय चेतना का संचार करते हैं। साथ ही देशवासियों को यह संकल्प लेने हेतु भी प्रेरित करते हैं कि वे अमर शहीदों के बलिदानों को व्यर्थ नहीं जाने देंगे तथा अपने देश की रक्षा, गौरव व इसके उत्थान के लिए सदैव समर्पित रहेंगे। |
|
| 16666. |
हिन्दी कहानी के विकास में प्रेमचन्द अथवा प्रसाद के योगदान का उल्लेख कीजिए। |
|
Answer» हिन्दी कहानी के क्षेत्र में प्रेमचन्द एवं प्रसाद ने युगान्तरकारी कार्य किया। मुंशी प्रेमचन्द ने सरस, सरल एवं व्यावहारिक भाषा-शैली में जीवन का मार्मिक एवं यथार्थ चित्रण करने वाली आदर्शोन्मुख कहानियाँ लिखीं । ‘कफन’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘पूस की रात’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘मन्त्र’ आदि कहानियाँ उल्लेखनीय हैं। प्रसाद जी ने उत्तम भाषा, भाव एवं कल्पनापूर्ण कौतूहल से युक्त उत्कृष्ट कहानियाँ लिखीं अधिकतर कहानियों में मानव मन के अन्तर्द्वन्द्व का चित्रण किया गया है। ‘पुरस्कार’, ‘आकाशदीप’, ‘मधुआ’, ‘गुण्डा’, ‘ममता’ आदि इनकी श्रेष्ठ कहानियाँ हैं। |
|
| 16667. |
निबन्ध:हमारा राष्ट्रीय पर्व : स्वतन्त्रता दिवस |
|
Answer» प्रस्तावना–भारतवर्ष में जिस प्रकार सामाजिक और धार्मिक पर्व (त्योहार) बहुत धूमधाम से मनाये जाते हैं, उसी प्रकार यहाँ राष्ट्रीय पर्वो को भी विशेष महत्त्व है। स्वतन्त्रता दिवस एक राष्ट्रीय पर्व है, जिसे प्रतिवर्ष 15 अगस्त को सम्पूर्ण भारत में बिना किसी भेदभाव के सभी लोगों के द्वारा बड़ी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह हमारे लिए एक महत्त्वपूर्ण दिन है। इस दिन हमारा देश सैकड़ों वर्षों की विदेशी दासता से मुक्त हुआ था। हम सब इस दिन को एक ऐतिहासिक दिन के रूप में मनाते हैं। स्वतन्त्रता के पुनीत पर्व पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी स्वतन्त्रता को अमर बनाये रखेंगे और स्वतन्त्रतासेनानियों के अधूरे स्वप्नों को साकार कर दिखाएँगे। कृतज्ञ राष्ट्र की उन अमर शहीदों को यही सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि होगी। स्वतन्त्रता दिवस का महत्त्व-स्वतन्त्रता दिवस का हम सबके लिए बहुत महत्त्व है; क्योंकि देश को स्वतन्त्र कराने के लिए हमारे देश के न जाने कितने वीर जवानों ने अपने प्राणों की बलि दी है, कितनी माताओं ने अपने होनहार पुत्रों को खोया है, कितनी बहनों के भाई उनसे बिछुड़ गये, कितनी सुहागिनों की माँगें सूनी हो गयीं। अनेक नेताओं ने स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिए वर्षों जेलों की यातनाएँ भोगी हैं। वे अंग्रेजों द्वारा दी गयी यातनाओं से डिगे नहीं, वरन् जी-जान से अपनी कोशिश में जुटे रहे। उन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए भारतीय जनता को उत्साहित किया। कहने का तात्पर्य यह है कि कड़ी मेहनत और बलिदानों के बाद हमारा देश स्वतन्त्र हो सका है। जो वस्तु जितनी अधिक मेहनत और बलिदानों से प्राप्त की जाती है, उसका महत्त्व उतना ही अधिक बढ़ जाता है। विभिन्न समारोह मनाये जाने के कारण–स्वतन्त्रता दिवस के दिन हम विभिन्न समारोहों का आयोजन करके उन शहीदों की याद को तरोताजा करते हैं, जिन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राणों की बलि दे दी और अमर हो गये। उनकी याद प्रत्येक भारतवासी को देश के लिए निछावर हो जाने की प्रेरणा देती है। इन समारोहों से देश के भावी कर्णधारों के हृदय में राष्ट्रभक्ति के बीज अंकुरित हो जाते हैं तथा जनजन के मन में राष्ट्रभक्ति की भावनाएँ उद्वेलित हो जाती हैं। साथ ही सैकड़ों वर्षों की दासता से मुक्ति मिलने के कारण इस दिन को याद रखना और उत्सव मनाना एक स्वाभाविक बात हो जाती है। राष्ट्रीय, प्रान्तीय और स्थानीय स्तरों पर कार्यक्रमों का आयोजन-खुशी के कारण ही स्वतन्त्रता दिवस सभी स्तरों-राष्ट्रीय, प्रान्तीय और स्थानीय–पर बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिवस की पूर्व सन्ध्या पर राष्ट्रपति राष्ट्र के नाम अपना सन्देश प्रसारित करते हैं। दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से पहले प्रधानमन्त्री सेना की तीनों टुकड़ियों, अन्य सुरक्षा बलों, स्काउटों आदि का निरीक्षण कर सलामी लेते हैं। फिर लाल किले के मुख्य द्वार पर पहुँचकर राष्ट्रीय ध्वज फहराकर उसे सलामी देते हैं तथा राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं। इस सम्बोधन में पिछले वर्ष सरकार द्वारा किये गये कार्यों का लेखाजोखा, अनेक नवीन योजनाओं तथा देश-विदेश से सम्बन्ध रखने वाली नीतियों के बारे में उद्घोषणा की जाती है। अन्त में राष्ट्रीय गान के साथ यह मुख्य समारोह समाप्त हो जाता है। रात्रि में दीपों की जगमगाहट से विशेषकर संसद भवन व राष्ट्रपति भवन की सजावट देखते ही बनती है। राज्यों की राजधानी में भी यह उत्सव बड़े उल्लास के साथ मनाया जाता है। राज्यों के मुख्यमन्त्री प्रदेश की जनता को सम्बोधित कर उसे प्रदेश की प्रगति की योजनाओं से अवगत कराते हैं। छोटे-बड़े सभी नगरों में इस अवसर पर अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, जिनमें ध्वजारोहण, राष्ट्रगान और उत्साहवर्द्धक भाषण होते हैं। सर्वत्र प्रभातफेरी का भी आयोजन किया जाता है। हमारे विद्यालय में स्वतन्त्रता दिवस समारोह हमारे विद्यालय में भी स्वतन्त्रता दिवस प्रत्येक वर्ष बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस वर्ष भी प्रात:काल 8 बजे विद्यालय के प्रांगण में प्रधानाचार्य, अध्यापक और सभी विद्यार्थी उपस्थित हो गये। ध्वजारोहण के साथ उत्सव आरम्भ हुआ। प्रधानाचार्य महोदय ने तिरंगा झण्डा फहराया। एन० सी० सी० कैडेटों ने झण्डे को सलामी दी और स्काउट ने बैण्ड बजाया। सभी ने मिलकर राष्ट्रगान गाया। फिर प्रधानाचार्य, सभी अध्यापक और विद्यार्थी अपने-अपने स्थान पर बैठ गये। सर्वप्रथम कुछ विद्यार्थी बारी-बारी से मंच पर आये और उन्होंने देशभक्ति के गीत सुनाये तथा कविताओं के अलावा ओजपूर्ण भाषण भी दिये। विद्यार्थियों के पश्चात् कुछ अध्यापकों ने भी भाषण दिये। किसी ने स्वतन्त्रता का अर्थ और महत्त्व समझाया तो किसी ने भारतीय संस्कृति और उसके गौरवमय इतिहास पर प्रकाश डाला। अन्त में हमारे प्रधानाचार्य महोदय ने अपना ओजस्वी भाषण दिया तथा विद्यार्थियों को अपने कर्तव्य को ईमानदारी और सच्चाई से पालन करने की शिक्षा दी। उपसंहार-यह उत्सव देश में सभी स्थानों पर बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। यह हमें इस बात की याद दिलाता है कि इस दिन हम अंग्रेजों की परतन्त्रता की यातनामयी बेड़ियों से बड़ी कठिनाई से मुक्त हुए थे। देश की स्वतन्त्रता के लिए हमारे वीरों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी; अतः हमें इसकी तन-मन-धन से रक्षा करनी चाहिए और अवसर पड़ने पर भारत की एकता और अखण्डता के लिए अपना बलिदान देने हेतु तैयार रहना चाहिए। स्वतन्त्रता के पुनीत पर्व पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपनी स्वतन्त्रता को अमर रखेंगे तथा स्वतन्त्रता-सेनानियों के अधूरे सपनों को साकार करेंगे। उन अमर शहीदों के लिए कृतज्ञ राष्ट्र की यही सर्वश्रेष्ठ श्रद्धांजलि होगी। |
|
| 16668. |
हिन्दी के प्रमुख आत्मकथा लेखकों के नाम लिखिए। |
|
Answer» डॉ० श्यामसुन्दर दास, वियोगी हरि, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, बाबू गुलाबराय, पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, डॉ० हरिवंशराय बच्चन आदि श्रेष्ठ आत्मकथा लेखक हैं। |
|
| 16669. |
हिन्दी की नयी कहानी की विशेषताएँ और उद्देश्य बताइए। |
|
Answer» हिन्दी की नयी कहानियों में आज के युग की दिशाहीनता, उत्कण्ठा, उलझन, मानसिक भटकाव और अन्तर्द्वन्द्वों का सजीव चित्रण नये शैली-विधान में किया गया है। नयी कहानियों का मुख्य उद्देश्य जीवन के भोगे हुए यथार्थ को आधुनिक भाव-बोध के धरातल पर प्रस्तुत करना है। |
|
| 16670. |
गद्य-काव्य का अर्थ स्पष्ट कीजिए। यो गद्य-काव्य की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। |
|
Answer» ⦁ गद्य-काव्य, गद्य तथा काव्य के बीच की विधा है। |
|
| 16671. |
हिंदी के प्रमुख संस्मरण लेखकों के नाम बताइए। |
|
Answer» बनारसीदास चतुर्वेदी, पद्मसिंह शर्मा, श्रीनारायण चतुर्वेदी आदि हिन्दी के प्रमुख संस्मरण लेखक हैं। |
|
| 16672. |
निबन्ध:स्वदेश-प्रेम |
|
Answer» प्रस्तावना—ईश्वर द्वारा बनायी गयी सर्वाधिक अद्भुत रचना है ‘जननी’, जो नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतीक है, प्रेम का ही पर्याय है, स्नेह की मधुर बयार है, सुरक्षा का अटूट कवच है, संस्कारों के पौधों को ममता के जल से सींचने वाली चतुर उद्यान-रक्षिका है, जिसका नाम प्रत्येक शीश को नमन के लिए झुक जाने को प्रेरित कर देता है। यही बात जन्मभूमि के विषय में भी सत्य है। इन दोनों का दुलार जिसने पा लिया उसे स्वर्ग का पूरा-पूरा अनुभव धरा पर ही हो गया। इसीलिए जननी और जन्मभूमि की महिमा को स्वर्ग से भी बढ़कर बताया गया हैं। देश-प्रेम की स्वाभाविकता–प्रत्येक देशवासी को अपने देश से अनुपम प्रेम होता है। अपना देश चाहे बर्फ से ढका हुआ हो, चाहे गर्म रेत से भरा हुआ हो, चाहे ऊँची-ऊँची पहाड़ियों से घिरा हुआ हो, वह सबके लिए प्रिय होता है। इस सम्बन्ध में रामनरेश त्रिपाठी की निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं विषुवत रेखा का वासी जो, जीता है नित हाँफ-हाँफ कर।। प्रात:काल के समय पक्षी भोजन-पानी के लिए कलरव करते हुए दूर स्थानों पर चले तो जाते हैं, परन्तु सायंकाल होते ही एक विशेष उमंग और उत्साह के साथ अपने-अपने घोंसलों की ओर लौटने लगते हैं। जब पशु-पक्षियों को अपने घर से, अपनी मातृभूमि से इतना प्यार हो सकता है तो भला मानव को अपनी जन्मभूमि से, अपने देश से क्यों प्यार नहीं होगा? कहा भी गया है कि माता और जन्मभूमि की तुलना में स्वर्ग का सुख भी तुच्छ है जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। देश-प्रेम को अर्थ-देश-प्रेम का तात्पर्य है-देश में रहने वाले जड़-चेतन सभी से प्रेम, देश की सभी संस्थाओं से प्रेम, देश के रहन-सहन, रीति-रिवाज, वेशभूषा से प्रेम, देश के सभी धर्मों, मतों, भूमि, पर्वत, नदी, वन, तृण, लता सभी से प्रेम और अपनत्व रखना, उन सबके प्रति गर्व की अनुभूति करना। सच्चे देश-प्रेमी के लिए देश का कण-कण पावन और पूज्य होता है सच्चा प्रेम वही है, जिसकी तृप्ति आत्मबलि पर हो निर्भर। सच्चा देश-प्रेमी वही होता है, जो देश के लिए नि:स्वार्थ भावना से बड़े-से-बड़ा त्याग कर सकता है। स्वदेशी वस्तुओं का स्वयं उपयोग करता है और दूसरों को उनके उपयोग के लिए प्रेरित करता है। सच्चा देशभक्त उत्साही, सत्यवादी, महत्त्वाकांक्षी और कर्तव्य की भावना से प्रेरित होता है। देश-प्रेम का क्षेत्र-देश-प्रेम का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में काम करने वाला व्यक्ति देशभक्ति की भावना प्रदर्शित कर सकता है। सैनिक युद्ध-भूमि में प्राणों की बाजी लगाकर, राज-नेता राष्ट्र के उत्थान का मार्ग प्रशस्त कर, समाज-सुधारक समाज का नवनिर्माण करके, धार्मिक नेता मानव-धर्म का उच्च आदर्श प्रस्तुत करके, साहित्यकार राष्ट्रीय चेतना और जन-जागरण का स्वर फेंककर, कर्मचारी, श्रमिक एवं किसान निष्ठापूर्वक अपने दायित्व का निर्वाह करके, व्यापारी मुनाफाखोरी व तस्करी का त्याग कर अपनी देशभक्ति की भावना को प्रदर्शित कर सकता है। देश के प्रति हमारे कर्तव्य-जिस देश में हमने जन्म लिया है, जिसका अन्न खाकर और अमृत के समान जल पीकर, सुखद वायु का सेवन कर हम बलवान् हुए हैं, जिसकी मिट्टी में खेल-कूदकर हमने पुष्ट शरीर प्राप्त किया है, उस देश के प्रति हमारे अनन्त कर्तव्य हैं। हमें अपने प्रिय देश के लिए कर्तव्यपालन और त्याग की भावना से श्रद्धा, सेवा एवं प्रेम रखना चाहिए। हमें अपने देश की एक इंच भूमि के लिए तथा उसके सम्मान और गौरव के लिए प्राणों की बाजी लगा देनी चाहिए। यह सब करने पर भी जन्मभूमि या अपने देश के ऋण से हम कभी भी उऋण नहीं हो सकते। भारतीयों का देश-प्रेम-भारत माँ ने ऐसे असंख्य नर-रत्नों को जन्म दिया है, जिन्होंने असीम त्याग-भावना से प्रेरित होकर हँसते-हँसते मातृभूमि पर अपने प्राण अर्पित कर दिये। अनेकानेक वीरों ने अपने अद्भुत शौर्य से शत्रुओं के दाँत खट्टे किये हैं। वन-वन भटकने वाले महाराणा प्रताप ने घास की रोटियाँ खाना स्वीकार किया, परन्तु मातृभूमि के शत्रुओं के सामने कभी मस्तक नहीं झुकाया। शिवाजी ने देश और मातृभूमि की सुरक्षा के लिए गुफाओं में छिपकर शत्रु से टक्कर ली और रानी लक्ष्मीबाई ने महलों के सुखों को त्यागकर शत्रुओं से लोहा लेते हुए वीरगति प्राप्त की। भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु, सुखदेव, अशफाक उल्ला खाँ आदि न जाने कितने देशभक्तों ने विदेशियों की अनेक यातनाएँ सहते हुए, मुख से ‘वन्देमातरम्’ कहते हुए हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे को चूम लिया। उपसंहार-खेद का विषय है कि आज हमारे नागरिकों में देश-प्रेम की भावना अत्यन्त दुर्लभ होती जा रही है। हमारी पुस्तकें भले ही राष्ट्र प्रेम की गाथाएँ पाठ्य-सामग्री में सँजोये रहें, परन्तु वास्तव में नागरिकों के हृदय में गहरा व सच्चा राष्ट्र-प्रेम ढूंढ़ने पर भी उपलब्ध नहीं होता। स्वदेश-प्रेम मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। इसे संकुचित रूप में ग्रहण न कर व्यापक रूप में ग्रहण करना चाहिए। संकुचित रूप में ग्रहण करने से विश्व-शान्ति को खतरा हो सकता है। हमें स्वदेश-प्रेम की । भावना के साथ-साथ समग्र मानवता के कल्याण को भी ध्यान में रखना चाहिए। |
|
| 16673. |
प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी के दो कहानीकारों के नाम लिखिए। |
Answer»
|
|
| 16674. |
प्रमुख रेखाचित्र लेखकों के नाम लिखिए। |
|
Answer» श्रीमती महादेवी वर्मा, बनारसीदास चतुर्वेदी, डॉ० नागेन्द्र, विष्णु प्रभाकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ आदि प्रमुख रेखाचित्र-लेखक हैं। |
|
| 16675. |
छायावादी युग के गद्य की किन्हीं दो विशेषताओं को लिखिए। |
|
Answer» छायावादी युग के गद्य की अनेक विशेषताएँ हैं। प्रेमचन्द, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं जयशंकर प्रसाद ने जो गद्य रचनाएँ कीं, उनका रूप अत्यन्त प्रौढ़, परिष्कृत एवं विकसित है। विषयों, शैलियों, विधाओं की विविधता इस काल के गद्य की एक प्रमुख विशेषता है। इस युग में नाटक, उपन्यास, निबन्ध, कहानी, आलोचना आदि विविध क्षेत्रों में उत्कृष्ट कोटि की गद्य-रचना हुई। |
|
| 16676. |
आत्मकथा की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। |
Answer»
|
|
| 16677. |
रेखाचित्र की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। |
Answer»
|
|
| 16678. |
कबीर किस काल के कवि थे? |
|
Answer» कबीर भक्तिकाल (1375 वि0 से 1700 वि0 ) के ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि थे। |
|
| 16679. |
प्रतिमान की अवधारणा किसने दी है? |
|
Answer» प्रतिमान चरों की अवधारणा फोर्ड मोटर कंपनी ने ली है. |
|
| 16680. |
देश के कितने प्रतिशत भाग में वन पाए जाते हैं? |
|
Answer» देश के 22.7 प्रतिशत भाग में वन पाए जाते हैं। |
|
| 16681. |
How do you define mental health? |
|
Answer» Mental health includes our emotional, psychological, and social well-being. It affects how we think, feel, and act. It also helps determine how we handle stress, relate to others, and make choices. Mental health is important at every stage of life, from childhood and adolescence through adulthood. |
|
| 16682. |
नीचे दिए गए उद्धरणों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धि में पंजाब एवं देश के अन्य भागों में इतनी गिरावट चिन्ता का एक विषय है। ऐसा लगता है कि ‘हरित क्रांति’ की लहर, जिसने देश में गेहूँ व चावल के उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है, दालों के उत्पादन को बढ़ाने में कोई विशेष योगदान नहीं कर पाया है। असल में अगर यह कहा जाये कि नुकसान पहुंचाया है तो कोई गलत नहीं होगा। क्योंकि ‘हरित क्रांति’ के बाद के वर्षों में दालों का क्षेत्रफल काफी मात्रा में गेहूँ एवं चावल जैसी अधिक उत्पादन देने वाली फसलों की ओर मोड़ दिया गया है। ऐसा विशेष तौर पर पंजाब जैसे व्यावसायिक कृषि प्रधान राज्यों में काफी बड़े स्तर पर हुआ है।(a) पंजाब में दाल उत्पादन क्षेत्र में हरित क्रान्ति के बाद किस प्रकार का परिवर्तन आया है?(b) दालों के उत्पादन क्षेत्र में गिरावट के मुख्य कारण क्या हैं? |
|
Answer» (a) हरित क्रान्ति के बाद दाल उत्पादन क्षेत्र 9.3 लाख हेक्टेयर से घटकर मात्रा 95 हजार हेक्टेयर रह गया। (b) पिछले दशकों में दालों के उत्पादन क्षेत्र में कमी आई है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
|
|
| 16683. |
समास की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। |
Answer»
हिंदी में मुख्य रूप से तीन प्रकार के सामासिक शब्द ही प्रयोग में आते हैं-
|
|
| 16684. |
प्रसाद युग के किन्हीं दो नाटककारों के नाम व उनकी एक-एक रचनाओं का नाम लिखिए। |
Answer»
|
|
| 16685. |
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के चार नाटकों के नाम लिखिए। |
Answer»
|
|
| 16686. |
जयशंकर प्रसाद के परवर्ती ( बाद के) नाटककारों के नाम लिखिए। |
Answer»
|
|
| 16687. |
नाटक और एकांकी में दो प्रमुख अन्तर बताइए। |
|
Answer» नाटक और एकांकी में निम्नलिखित दो प्रमुख अन्तर हैं— ⦁ नाटक में एक मुख्य-कथा तथा कुछ अन्तर्कथाएँ होती हैं, जबकि एकांकी एक ही घटना पर आधारित होता है। |
|
| 16688. |
हिन्दी के दो प्रमुख एकांकीकार और उनके द्वारा लिखित एक-एक एकांकी का नाम बताइए।याकिसी एक ‘एकांकी’ लेखक का नाम लिखिए।याडॉ० रामकुमार वर्मा के प्रसिद्ध एकांकी का नाम लिखिए।या‘दीपदान’ एकांकी के लेखक का नाम लिखिए। |
|
Answer» दो प्रमुख एकांकीकार और उनकी एकांकी रचनाएँ हैं। ⦁ डॉ० रामकुमार वर्मा (दीपदान) तथा |
|
| 16689. |
द्विवेदी युग के प्रमुख एकांकीकारों और उनके द्वारा लिखित एक-एक एकांकी का नाम बताइए। |
|
Answer» द्विवेदीयुगीन हिन्दी के प्रमुख एकांकीकार और उनके द्वारा लिखित एक-एक एकांकी के नाम हैं– ⦁ बदरीनारायण भट्ट : चुंगी की उम्मीदवारी |
|
| 16690. |
संज्ञा किसे कहते हैं ? |
|
Answer» संज्ञा का अर्थ है नाम। इस संसार में जितनी भी वस्तुएं, प्राणी, स्थान, भाव आदि हैं, उन्हें किसी-न-किसी नाम से पुकारा जाता है। नाम को ही व्याकरण में संज्ञा कहा जाता है। संज्ञाएं बहुरूपात्मक होती हैं जो वचन एवं कारक से बदल जाती हैं। ये प्रायः उद्देश्य एवं कर्म के रूप में वाक्य में प्रयुक्त होती हैं। |
|
| 16691. |
संकर शब्द किसे कहते हैं? |
|
Answer» हिन्दी में कुछ शब्द ऐसे हैं, जो किसी भी वर्ग में नहीं आते हैं। ये दो या दो से अधिक भाषा के शब्दों से निर्मित होते हैं। ये शब्द संकर शब्द कहलाते हैं। उदाहरण के लिए रेलगाड़ी शब्द। इसमें रेल शब्द अंग्रेजी भाषा का शब्द है और गाड़ी शब्द हिन्दी भाषा का। इसी तरह डाकखाना (हिन्दी + फारसी) तथा दलबंदी (संस्कृत + फारसी) आदि शब्द संकर शब्द हैं। |
|
| 16692. |
विषय की दृष्टि से हिन्दी-एकांकी के भेद बताइए। |
|
Answer» विषय के आधार पर एकांकी के सात भेद हैं— ⦁ पौराणिक |
|
| 16693. |
अष्टछाप के चार प्रमुख कवियों के नाम एवं उनकी रचनाएँ लिखिए। |
Answer»
|
|
| 16694. |
देशज शब्द किसे कहते हैं? |
|
Answer» वे शब्द, जिनकी व्युत्पत्ति का पता नहीं चलता वे देशज शब्द कहलाते हैं। ये शब्द अपने ही देश में बोलचाल से बने होते हैं। |
|
| 16695. |
उद्गम की दृष्टि से शब्दों के भेद बताइए। |
|
Answer» उद्गम की दृष्टि से शब्दों के चार भेद हैं :
|
|
| 16696. |
अष्टछाप से क्या तात्पर्य है? अष्टछाप से सम्बन्धित कवियों का नामोल्लेख कीजिए। |
|
Answer» अष्टछाप कवि समुदाय का तात्पर्य-सन्त गुरु वल्लभाचार्य के आठ शिष्य-कवियों के समुदाय को अष्टछाप कवि-समुदाय कहा जाता है। ये कृष्णभक्ति धारा के कवि थे। इस समुदाय के कवि सूरदास, नन्ददास, परमानन्ददास, कृष्णदास, कुम्भनदास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी एवं गोविन्दस्वामी थे। |
|
| 16697. |
हिन्दी में किन-किन विदेशी भाषाओं के शब्द मिलते हैं? |
|
Answer» हिन्दी में मुख्य रूप से अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेजी, पुर्तगाली तथा फ्रांसीसी भाषाओं के शब्द मिलते हैं। |
|
| 16698. |
भक्तिकाल की विभिन्न धाराओं का नामोल्लेख कीजिए। |
|
Answer» भक्तिकाल की काव्यधारा चार रूपों में प्रवाहित हुई–
|
|
| 16699. |
भक्तिकाल की प्रमुख विशेषताएँ (प्रवृत्तियाँ) लिखिए। |
|
Answer» सन् 1343 ई० से 1643 ई० तक का समय हिन्दी साहित्य में भक्तिकाल के नाम से जाना जाता है। भक्तिकाल के साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
|
|
| 16700. |
वीरगाथा काल के प्रमुख कवियों और उनकी रचनाओं के नाम लिखिए। |
|
Answer» इस काल के प्रमुख कवि और रचनाएँ इस प्रकार हैं-
|
|