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समास की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

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  1. हिंदी में समास प्रायः दो शब्दों से बनते हैं। इसके विपरीत संस्कृत में समास अनेक शब्दों से बनते हैं और काफ़ी लंबे-लंबे होते हैं। हिंदी में संभवत: ‘सुत-बित्त-नारी-भवन-परिवारा’ ही सबसे लंबा समास है।
  2. समास कुछ अपवादों को छोड़कर प्राय: दो सजातीय शब्दों में ही होता है, जैसे-रसोईघर एवं पाठशाला शब्द ही बन सकते हैं। ‘रसोईशाला’ तथा ‘पाठ घर’ नहीं बन सकते।
  3. सामासिक शब्द या तो मिलाकर लिखे जाते हैं या दोनों के बीच योजक चिह्न लगाकर लिखे जाते हैं, जैसेघरबार, दहीबड़ा अथवा घर-बार, दही-बड़ा आदि।
  4. किसी शब्द में समास ज्ञात करने के लिए समस्त पद के खंडों को अलग-अलग करना पड़ता है, जिसे विग्रह कहते हैं; जैसे-माँ-बाप’ का विग्रह माँ और बाप तथा ‘गंगा-तट’ का विग्रह गंगा का तट है।
  5. सामासिक शब्द बनाते समय दोनों शब्दों के बीच की विभक्तियां या योजक आदि अव्यय शब्दों का लोप हो जाता है।
  6. समास बहुधा वहीं होता है जहां परस्पर संबंध रखने वाली दो या अधिक शब्द मिलकर एक तीसरा सार्थक शब्द बनाते हैं।
  7. समास के दोनों शब्दों (पदों) को क्रमशः पूर्व पद अर्थात् पहला पद तथा उत्तर पद अर्थात् दूसरा पद कहते हैं, जैसे-‘राम-लक्ष्मण’ शब्द में ‘राम’ पूर्व पद है और ‘लक्ष्मण’ उत्तर पद है।
  8. सामाजिक शब्दों में पुल्लिग शब्द पहले और स्त्रीलिंग शब्द बाद में आते हैं; जैसे-लोटा-थाली, देखा-देखी, भाई-बहन, दूध-रोटी आदि।
  9. कभी-कभी विग्रह के आधार पर एक ही शब्द कई समासों का उदाहरण हो जाता है; जैसे-‘पीतांबर का विग्रह यदि “पीत है जो अंबर” करें तो कर्मधारय तथा “पीत हैं अंबर (वस्त्र जिसके) अर्थात् कृष्ण” करें तो बहुब्रीहि होगा।

हिंदी में मुख्य रूप से तीन प्रकार के सामासिक शब्द ही प्रयोग में आते हैं-

  • संस्कृत के-यथाशक्ति, पीतांबर, मनसिज, पुरुषोत्तम आदि-
  • हिंदी के-अनबन, नील-कमल, बैल-गाड़ी आदि।
  • उर्दू-फ़ारसी आदि के-खुशबू, सौदागर, बेशक, लाइलाज आदि। ‘इसके अतिरिक्त हिंदी में रेलवे स्टेशन, बुकिंग, ऑफिस, टिकट, चैकर आदि इंग्लिश शब्द तथा कुछ संकर शब्द भी प्रयोग में आते हैं; जैसे
    बस अड्डा, पुलिस चौकी, चकबंदी, गुरुडम, पार्टीबाज आदि।


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