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शुक्ल जी के पश्चात् हिन्दी की निबन्ध विधा के विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

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शुक्लोत्तर युग में साहित्यिक एवं समीक्षात्मक निबन्धों की रचना की गयी। इन निबन्धों में जहाँ भाषा-शैली की प्रौढ़ता मिलती है, वहीं चिन्तन की गम्भीरता भी। इनमें आत्मपरक (वैयक्तिक) भाषा का प्रयोग हुआ है।

शुक्ल जी के पश्चात् हिन्दी में आलोचनात्मक निबन्ध साहित्य की भी पर्याप्त श्रीवृद्धि हुई। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ० रामविलास शर्मा, नन्ददुलारे वाजपेयी, शान्तिप्रिय द्विवेदी, शिवदान सिंह चौहान आदि लेखकों ने आलोचनात्मक निबन्ध-साहित्य को नयी दिशा प्रदान कर विकास के पथ पर अग्रसर किया।



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