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निबन्ध:राष्ट्रभाषा हिन्दी |
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Answer» प्रस्तावना–स्वतन्त्रता से पूर्व देश अंग्रेजी शासन के अधीन था। अंग्रेजों को अपना राज-काज चलाने के लिए कुछ ऐसे पढ़े-लिखे भारतीय और लिपिकों की आवश्यकता थी, जो स्वयं को भाषा के ज्ञान के कारण अन्य भारतीयों से श्रेष्ठ समझते हों। दुर्भाग्यवश उन्हें ऐसे लोगों का पूरा वर्ग ही मिल गया। देश की परतन्त्रता तक तो दूसरी बात थी, लेकिन देश के स्वतन्त्र होने के बाद भी इस वर्ग का चरित्र नहीं बदला और वह इस प्रयास में लगा रहा कि किसी भी तरह अंग्रेज़ी ही देश की कामकाजी भाषा बनी रहे। उसे अपने प्रयास में सफलता भी मिली, जब हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किये जाने के बावजूद भारतीय संविधान में यह व्यवस्था की गयी कि आगामी 15 वर्ष तक हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा भी सरकारी काम-काज की भाषा बनी रहेगी। तब से अब तक पैंसठ से भी अधिक वर्ष बीत गए, लेकिन सरकारी काम-काज की भाषा के रूप में अंग्रेजी का वर्चस्व आज भी बना हुआ है। स्वतन्त्रता से पूर्व हिन्दी-भारत में अंग्रेजों के पैर पसारने और जमाने से पूर्व हिन्दी ही जनभाषा थी। देश में अंग्रेजी भाषा का प्रचार-प्रसार होने से पूर्व शताब्दियों तक हिन्दी देश को भावनात्मक एकता के सूत्र में बाँधे रही। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में हिन्दी भाषी लोगों के अलावा अनेक अहिन्दी भाषी लेखकों, सन्तों और नेताओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा, जिनमें महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द सरस्वती, राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, बंकिमचन्द्र चटर्जी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी-आज पंजाब से लेकर असोम तक तथा जम्मू-कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र-आन्ध्र प्रदेश तक बोली और समझी जाने वाली एकमात्र भाषा हिन्दी ही है। इसी भाषा के द्वारा , विभिन्न प्रदेशों के निवासी अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। अमृतसर से चलकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल को पार करके अंसोम के गुवाहाटी नगर तक पहुँचने वाला ट्रक ड्राइवर रास्ते भर जिस भाषा का प्रयोग करता है, वह हिन्दी ही है। इस प्रकार हिन्दी भारत के जन-सामान्य की सम्पर्क भाषा बन गयी है। यह वह भाषा है, जो सम्पूर्ण राष्ट्र को एकसूत्र में बाँधने का काम करती है और हमारी राष्ट्रीय एकता को मजबूत भी करती है। हिन्दी : एक सक्षम भाषा–आज हिन्दी एक सक्षम भाषा बन चुकी है। स्वतन्त्रता के समय हिन्दी पर यह आरोप लगाया जाता था कि इसमें वैज्ञानिक और गम्भीर विवेचनात्मक विषयों के लिए अनुकूल शब्दावली का अभाव है, लेकिन स्वतन्त्रता के बाद इस ओर गम्भीर प्रयास किये गये हैं। तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में नये-नये शब्दों को गढ़ लिया गया है। नये होने के कारण ये शब्द थोड़े कठिन प्रतीत होते हैं। इसी को आधार बनाकर अंग्रेजी प्रेमी हिन्दी पर यह आरोप लगाते हैं कि इसकी शब्दावली कठिन है। लेकिन यह ध्यान रखने की बात है कि कोई भी नई बात शुरू में कठिन ही लगा करती है। भाषा कोई भी हो, उसे सीखने में परिश्रम और समय तो लगता ही है। अतः अपने राष्ट्र और भाषा के गौरव की रक्षा के लिए हमें अपनी भाषा को सीखने में थोड़ा परिश्रम तो करना ही चाहिए। हिन्दी के विकास में बाधाएँ-हिन्दी के विकास में कुछ प्रमुख बाधाएँ निम्नलिखित हैं (i) राजनीतिक कारणों ने अहिन्दी भाषी लोगों के मन में यह बात बैठा दी है कि यदि अंग्रेजी न रही, तो प्रतियोगी परीक्षाओं में हिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगों का वर्चस्व हो जाएगा और अहिन्दी भाषी दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर रह जाएंगे। (ii) सरकार और प्रशासन में कतिपय महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन कुछ स्वार्थी लोग यह समझते हैं कि यदि अंग्रेजी का स्थान हिन्दी ने ले लिया, तो उनका वर्चस्व समाप्त हो जाएगा और एक गरीब मजदूर का बेटा भी उनसे स्पर्धा करने की स्थिति में आ जाएगा। (iii) कुछ स्वार्थी लोग प्रादेशिक भाषाओं के विकास की बात करके हिन्दी को उनका प्रतिद्वन्द्वी बताते हैं, जबकि हिन्दी का प्रादेशिक भाषाओं से कोई बैर नहीं। हिन्दी के विकास-मार्ग में यदि कोई भाषा बाधा है, तो वह अंग्रेजी है। अंग्रेजी ही हिन्दी तथा प्रादेशिक भाषाओं की जीवन-शक्ति को चूसकर स्वयं पोषित होती रही है। उपसंहार–राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी-भरी। वास्तविकता यह है कि हिन्दी ही एकमात्र ऐसी भाषा है, जो भारत की सबसे सम्पन्न भाषा है। यही सम्पूर्ण देश की सम्पर्क भाषा आज भी बनी हुई है। अपनी सरलता, स्पष्टता, समर्थता और बोधगम्यता के कारण यह राष्ट्रभाषा का गौरव पाने की अधिकारिणी है। प्रत्येक भारतवासी का यह कर्तव्य है कि वह अपने दैनिक जीवन में हिन्दी का अधिक-से-अधिक प्रयोग करे और हिन्दी में बोलने में गर्व का अनुभव करे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने भी उचित ही लिखा है– निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। |
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