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गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-प्रणाली को सफल बनाने के लिए कुछ उपयोगी सुझाव दीजिए।

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बेसिक शिक्षा की सफलता हेतु सुझाव
(Suggestions to Success of Primary Education)

⦁    क्राफ्ट और अन्य विषयों में सह-सम्बन्ध लाने के लिए योग्य एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की खोज की जाए। अध्यापकों में विशेष योग्यता रखने वाले को खोज निकालना शोधकर्ताओं का कार्य है। अत: बेसिक शिक्षा-पद्धति पर विशद् अनुसन्धान किया जाना चाहिए।

⦁    बेसिक विद्यालय द्वारा उत्पादित सामग्री स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से बेची जाए तथा सहकारी .. सहयोग से भी काम लिया जाए।

⦁    विषय-सामग्री उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न स्रोतों की खोज करना आवश्यक है, लेकिन इस कार्य में देश की आर्थिक कठिनाई को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
⦁    पाठ्यक्रम के विषयों का भौतिक और सामाजिक वातावरण के साथ सम्बन्ध रखने के लिए विषय-सामग्री को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप निर्धारित किया जाए। यहाँ भी शोध एवं सर्वेक्षण की आवश्यकता होगी।

⦁    बेसिक विद्यालय के छात्रों और अन्य विद्यालयों के छात्रों की उपलब्धियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए और प्रशिक्षण कॉलेज एवं स्नातकोत्तर छात्रों के लिए ऐसे कार्य दिए जाएँ।
⦁    योग्य अध्यापकों की पूर्ति के लिए अधिक संख्या में प्रशिक्षण महाविद्यालयों को खोलकर तथा प्रशिक्षण की सभी सुविधाएँ उपलब्ध करके अधिक संख्या में अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जाए। इसके साथ अंशकालीन एवं अभिनवे कोर्स की व्यवस्था भी उचित ढंग से की जाए।
⦁    समाज के लोगों को विद्यालय में आमन्त्रित करके उन्हें सहयोग देने के लिए आकर्षित किया जाए और जीवन की क्रियाओं को विद्यालय में ही पूरा कराया जाए।
⦁    बालिकाओं के लिए पृथक् कोर्स की व्यवस्था की जाए, जो बालिका जिस प्रकार की शिक्षा लेना चाहे, उसे उसी प्रकार की शिक्षा दी जाए। सभी को एक ढंग की शिक्षा न दी जाए।
⦁    शिक्षा राज्य सरकार के नियन्त्रण में न होकर शिक्षाशास्त्रियों के अधीन हो। शिक्षकों में दलगत दूषित राजनीति से अपने को दूर रखने का साहस होना चाहिए। दलगत शिक्षकों को अध्यापन सेवा से अलग कर दिया जाए।
⦁    बेसिक विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा के मानदण्ड को ऊँचा उठाने के लिए सुप्रशिक्षित अध्यापक, कुशल कारीगर एवं योग्य प्रबन्धक रखे जाएँ। इसके साथ ही छात्रों को उत्पादन के लाभ में हिस्सा भी दिया जाए।

32302.

1830 के दशक में महिला पत्रिकाओं ने पारंपरिक वस्त्रों के पहनने से किस तरह के नकारात्मक प्रभावके बारे में बतलाया?

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महिला पत्रिकाओं ने बताना शुरू कर दिया कि तंग लिबास व कॉर्सेट पहनने से महिलाओं में विभिन्न तरह की बीमारियाँ और विरूपताएँ आ जाती हैं। ऐसे पहनावे जिस्मानी विकास में बाधा पहुँचाते हैं, इनसे रक्त प्रवाह भी अवरुद्ध होता है। मांसपेशियाँ अविकसित रह जाती हैं और रीढ़ झुक जाती है।

32303.

बेसिक शिक्षा का विचार दिया गया था(क) पेस्टालॉजी द्वारा।(ख) महामना मालवीय द्वारा(ग) महात्मा गाँधी द्वारा(घ) डा० एनीबेसेंट द्वारा

Answer»

सही विकल्प है (ग) महात्मा गाँधी द्वारा

32304.

भारतीय वस्त्रों एवं महात्मा गाँधी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

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पोरबन्दर गुजरात में जन्में महात्मा गांधी बचपन में परंपरागत वस्त्र पहनते थे। लेकिन 19 वर्ष की आयु में जब वे कानून की पढ़ाई करने लंदन गए तो वे पश्चिमी पोशाकों की ओर आकृष्ट हुए। 1890 ई० के दशक में दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने तक वे कोट-पैंट व पगड़ी पहनते थे। 1913 ई० में दक्षिण अफ्रीकी सरकार के विरोध में जब उन्होंने वहाँ भारतीय कोयला खदान मजदूरों का समर्थन किया तो उन्हें पश्चिमी वस्त्र व्यर्थ प्रतीत हुए और उन्होंने लुंगी-कुर्ता पहनने का प्रयोग आरंभ किया। साथ ही विरोध करने के लिए खड़े हो गए।

1915 ई. में भारत वापसी पर उन्होंने काठियावाड़ी किसान का रूप धारण कर लिया। अंततः 1921 में उन्होंने अपने शरीर पर केवल एक छोटी-सी धोती को अपना लिया। गाँधीजी इन पहनावों को जीवन भर नहीं अपनाना चाहते थे। वह तो केवल एक या दो महीने के लिए ही किसी भी पहनावे को प्रयोग के रूप में अपनाते थे। परंतु शीघ्र ही उन्होंने अपने इस पहनावे को गरीबों के पहनावे का रूप दे दिया। इसके बाद उन्होंने अन्य वेशभूषाओं का त्याग कर दिया और जीवन भर एक छोटी सी धोती पहने रखी।

इस वस्त्र के माध्यम से वह भारत के साधारण व्यक्ति की छवि पूरे विश्व में दिखाने में सफल रहे। महात्मा गाँधी ने विदेशी वस्त्रों के स्थान पर खादी पहनने के लिए बल दिया। उन्होंने देशवासियों को प्रेरित किया कि वे चरखा चलाएँ और स्वयं के बनाए हुए वस्त्र पहनें। उनके लिए खादी शुद्धता, सादगी और राष्ट्रभक्ति का पर्याय थी। उनके प्रयासों से शीघ्र ही पूरे देश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने खादी को अपना लिया और खादी वस्त्र राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गए।

32305.

‘सम्प्चुअरी कानूनों के खात्में का यह मतलब कत्तई नहीं था कि यूरोपीय देशों में हर कोई एक जैसी पोशाक पहनने लगा हो।’ इस कथन से क्या अर्थ निकलता है?

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सम्प्चुअरी कानूनों की समाप्ति के बाद भेदभाव मात्र कानूनी रूप से समाप्त किए गए थे। लेकिन इसका यह आशय कदापि नहीं था कि यूरोपीय देशों में प्रत्येक व्यक्ति एक जैसी पोशाक पहनने लगा हो। फ्रांसीसी क्रान्ति ने लोगों के सम्मुख समानता का प्रश्न उपस्थित किया तथा कुलीन विशेषाधिकारों तथा उनका समर्थन करने वाले कानूनों को समाप्त कर दिया। लेकिन सामाजिक वर्गों के बीच अंतर पूर्ववत् जारी रहा। स्पष्ट है कि गरीब न तो अमीरों जैसे कपड़े पहन सकते थे न ही वैसा खाना खा सकते थे। फर्क यह था कि अगर वे ऐसा करना चाहते तो अब कानून बीच में नहीं आने वाला था। इस तरह अमीर-गरीब की परिभाषा, उनकी वेशभूषा सिर्फ उनकी आमदनी पर निर्भर हो गई थी न कि सम्प्चुअरी कानूनों के द्वारा निर्धारित की जाती थी।

32306.

गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-पद्धति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इस शिक्षा-प्रणाली के मुख्य सिद्धान्तों का भी वर्णन कीजिए।याबेसिक शिक्षा को बुनियादी शिक्षा क्यों कहा गया है ?याबेसिक शिक्षा-प्रणाली के मूलभूत सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।

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बेसिक शिक्षा के जन्मदाता महात्मा गाँधी थे। उनका विचार था कि शिक्षा की रूपरेखा ग्रामीण होनी चाहिए, वह जनसाधारण के लिए होनी चाहिए, भारतीय संस्कृति का उसके द्वारा पुनर्जागरण होना चाहिए और उसमें भारतीय जनता की समस्याओं को सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए।

ब्रिटिश शासन काल में भारत में अंग्रेजी शिक्षा का लक्ष्य सरकारी नौकरी के लिए उपयुक्त कर्मचारी तैयार करना था; भारतीयों को शारीरिक, मानसिक तथा चारित्रिक विकास करना नहीं। अत: महात्मा गाँधी ने देश की निर्धन, बेकार, निरक्षर और अस्वस्थ जनता को उन्नति के पथ पर अग्रसर करने के लिए बेसिक शिक्षा योजना का निर्माण किया। गाँधी जी ने हरिजन नामक पत्रिका में राष्ट्रीय शिक्षा की नवीन रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए लिखा है, “शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक और मनुष्य में जो श्रेष्ठतम है, उसका सम्पूर्ण विकास करना अर्थात् शरीर, बुद्धि एवं आत्मा तीनों का विकास करना है। साक्षरता स्वयं में कोई शिक्षा नहीं है, इसलिए मैं बालक की शिक्षा का प्रारम्भ बालक को कुछ हस्तकला सिखाकर उसको प्रशिक्षण के समय से ही उत्पादन करने में समर्थ बनाकर करूंगा। इस प्रकार प्रत्येक स्कूल आत्मनिर्भर हो सकता है, शर्त यह है कि राज्य स्कूल में निर्मित वस्तुओं को खरीद लें।”

बेसिक शिक्षा-पद्धति का प्रारम्भ 1937-38 ई० में हुआ। डॉ० जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी। इस समिति ने एक शिक्षा योजना तैयार की, जिसे वर्धा योजना भी कहा जाता है।

बेसिक शिक्षा का अर्थ (Meaning of Basic Education)

बेसिक शिक्षा वह शिक्षा है जो बालकों को विभिन्न प्रकार की हस्तकलाओं का प्रशिक्षण देते हुए उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास कर सके, जिससे देश में समाजवादी समाज की स्थापना हो और जनता को सुखी तथा समृद्ध बनाया जा सके। गाँधी जी के अनुसार, “यह जीवन की शिक्षा है जो जन्म से मृत्यु तक की प्रक्रिया में चलती है।” बेसिक शब्द का हिन्दी रूपान्तर ‘आधारभूत’ तथा ‘बुनियादी’ शब्द है।
इसके नामकरण के निम्नांकित कारण
⦁    बेसिक शिक्षा को भारत की राष्ट्रीय सम्पत्ति, सभ्यता एवं शैक्षणिक संगठन के आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
⦁    यह शिक्षा सामुदायिक जीवन के आधारभूत व्यवसाय से सम्बन्धित है।
⦁    इसमें हस्तकला के माध्यम से शिक्षा दी जाती है, जिनका प्रयोग व्यक्ति जीवन-निर्वाह के लिए करते
⦁    इसमें बालकों की रुचियों और आवश्यकताओं को सम्बन्धित करके शिक्षा दी जाती है।
⦁    यह शिक्षा भारत के प्रत्येक स्त्री-पुरुष की सामान्य सम्पत्ति समझी जाती है।
⦁    यह शिक्षा व्यक्ति को अपने वातावरण में सामंजस्य करने के योग्य बनाती है।
⦁    प्रत्येक भारतीय बालक के लिए इस शिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था की गई है।

बेसिक शिक्षा के मौलिक सिद्धान्त
(Fundamental Principles of Basic Education)

बेसिक शिक्षा-पद्धति के मौलिक सिद्धान्त निम्नलिखित हैं|
1.निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा- गाँधी जी का विचार था कि प्राइमरी शिक्षा प्रत्येक बालक के लिए सुलभ होनी चाहिए। गुलामी के कारण हमारे देश के बालक इस अधिकार से वंचित थे। लोकतन्त्र उसी देश में सफल होता है जहाँ शिक्षा सार्वजनिक हो। इसी कारण महात्मा गाँधी ने यह निश्चय किया कि 7 से 14 वर्ष तक के बालकों की शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क होनी चाहिए। गाँधी जी ने स्वयं लिखा है, “जिस प्रकार के नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा वायु और जल पर सबका अधिकार है और सभी उसे समान रूप से स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता प्रयोग में ला सकते हैं, उसी प्रकार शिक्षा भी सबके लिए सुलभ हो शिक्षा का माध्यम मातृभाषा और गरीब लोग भी शिक्षा प्राप्त कर सकें, इसलिए इसका अनिवार्य शिक्षा का आधार हस्तकला और नि:शुल्क होना आवश्यक है।”
2. स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता- इस सिद्धान्त का तात्पर्य के जीवनोपयोगी शिक्षा है कि शिक्षकों का वेतन और विद्यालय के अन्य व्यय विद्यालय में बनी। बालक का स्वतन्त्र विकास वस्तुओं को बेचने से आंशिक रूप से निकल आएँ। इस प्रकार से समन्वय समन्वय पर बल शिक्षा संस्थाओं की आर्थिक समस्या का बहुत कुछ हद तक समाधान नागरिकता का आदेश हो जाएगा। इसके अतिरिक्त जब बालक जान जाएँगे कि अपनी शिक्षा के वे स्वयं उत्तरदायी हैं और उसके लिए वे अन्य किसी पर निर्भर नहीं हैं तो उनके अन्तर में आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन के भाव उत्पन्न होंगे और उनमें आत्मविश्वास की भावना का विकास होगा।
3. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा- कमेनियस ने मातृभाषा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है, मातृभाषा को सीखने से पहले विदेशी भाषा की शिक्षा प्रदान करना उतना ही विवेकरहित है, जितना कि बच्चे को चलने से पूर्व चढ़ना सिखाना।” इसीलिए बेसिक शिक्षा-पद्धति में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा रखा गया है। प्रथम पाँच कक्षाओं में अंग्रेजी बिल्कुल हटा दी गई है और सभी विषय मातृभाषा के माध्यम से पढ़ाए जाते
4. शिक्षा का आधार हस्तकला- इस पद्धति में हस्तकला को शिक्षा का केन्द्र बनाया गया है। इस पद्धति में बेसिक स्कूलों में किसी हस्तकला से शिक्षा देने की व्यवस्था की जाती है। पाठ्यक्रम के सभी विषय किसी हस्तकला के चारों ओर केन्द्रित करके पढ़ाए जाते हैं। इस पद्धति में ‘क्रिया द्वारा शिक्षा तथा अनुभवे द्वारा सीखना’ दोनों सिद्धान्त निहित हैं। हस्तकलाओं के सम्बन्ध में गाँधी जी ने लिखा है, “प्रत्येक हस्तकार्य आजकल की भाँति यन्त्रवत् नहीं, वरन् वैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाएगा ताकि बालक प्रत्येक क्रिया के कार्य-कारण सम्बन्ध को अच्छी तरह समझ जाएँ।” श्री ललित ने लिखा है, “बुनियादी हस्तकला सूर्यमण्डल के केन्द्र के रूप में होनी चाहिए एवं अन्य विषयों को ग्रह नक्षत्रों की भाँति चारों ओर घूमने तथा केन्द्रीय सूर्य से अपने उत्ताप या रोशनी को प्राप्त करना चाहिए।” आधुनिक शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि हस्तकला द्वारा दी गई शिक्षा बालक के लिए अधिक मनोवैज्ञानिक होती है, क्योंकि इससे उसके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के अनुभव सन्तुलित होते हैं।
5. अहिंसा पर आधारित-बेसिक शिक्षा का आधार गाँधी जी का सत्य और अहिंसा का विचार है। गाँधी जी का यह विचार था कि पाश्चात्य शिक्षा हिंसात्मक प्रवृत्तियों को जन्म देती है, जिससे प्रेम, सहानुभूति, दया, धर्म, उदारता आदि गुणों का लोप होने लगता है, इसीलिए उनका कहना है कि विद्यालय में दण्ड का अभाव होना चाहिए। विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण रखना चाहिए, जिससे बालकों में पारस्परिक घृणा, साम्प्रदायिक द्वेष तथा कलह की मनोवृत्तियाँ न विकसित हो सकें।
6. जीवनोपयोगी शिक्षा-तत्कालीन शिक्षा बालक के वास्तविक जीवन से सम्बन्धित नहीं थी। इसलिए बालक को अपने वातावरण से समायोजन करने में कठिनाई अनुभव होती थी और इसके अभाव में वह अपना जीवन भली प्रकार व्यतीत नहीं कर पाता था, इसलिए बेसिक शिक्षा-पद्धति में गाँधी जी ने हस्तकला को प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण से सम्बन्धित करके बालक के वास्तविक जीवन से सम्बन्ध स्थापित कर दिया। इस पद्धति में शिक्षा बालक की जीवन की परिस्थितियों से सम्बन्धित रहती है और शिक्षा का कार्य । जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में सम्पन्न होता है।
7. बालक का स्वतन्त्र विकास- अन्य आधुनिक शिक्षा-पद्धतियों की भॉति बेसिक शिक्षा में भी बालकों की रुचि का ध्यान रखा जाता है और उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। बालकों को स्वतन्त्र अभिव्यक्ति प्रदान करने का अवसर मिलता है। गाँधी जी के अनुसार, “जब शिक्षा का उद्देश्य एक स्वच्छन्द तथा रचनात्मक स्वक्रिया के द्वारा बालक की अधिकतम अभिवृद्धि तथा विकास समझा जाता है तो विद्यार्थियों को स्वयं सोचने, अपनी रुचि के अनुसार अपना कार्य नियोजित करने तथा उन आयोजनों को अपनी ही गति के अनुसार आगे बढ़ने की पर्याप्त स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए।’
8. समन्वय पर बल- किसी हस्तकला के आधार पर शिक्षा देने का तात्पर्य शिक्षा को समन्वित करना है। अर्थात् पाठ्यक्रम के सभी विषयों में शरीर के विभिन्न अवयवों की भाँति एक स्वाभाविक सम्बन्ध स्थापित करना है। इस पद्धति में सभी विषयों की शिक्षा किसी हस्तकला को केन्द्र मानकर दी जाती है। बेसिक शिक्षा में बालक के विकास के तीन आधार बताए गए हैं—प्राकृतिक वातावरण, सामाजिक वातावरण और हस्तकला। हस्तकला के द्वारा पहले दो आधारों पर समन्वय सहज ही हो जाता है, क्योंकि हस्तकला की उत्पत्ति और विकास इन्हीं पर निर्भर है। प्राकृतिक शक्तियों और साधनों के उपयोग के द्वारा मनुष्य कई वस्तुएँ तैयार करता है, उद्योग-धन्धे चलाता है, जिनकी समाज को आवश्यकता है। इन तीनों को केन्द्र मानकर बालक की शिक्षा को समन्वित किया जाता है।
9. नागरिकता का आदर्श बेसिक शिक्षा में नागरिकतों का आदर्श निहित है। यदि इस पद्धति में से नागरिकता का सिद्धान्त निकाल दिया जाए तो यह पद्धति अपना निजत्व खो बैठती है। इसका उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है, जो अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों को बुद्धिमानी से समझ सकें और समाज के क्रियाशील सदस्य बनकर समाज के ऋण को किसी सेवा के रूप में चुका सकें। डॉ० जाकिर हुसैन ने लिखा है, “नवीन शिक्षा या बेसिक शिक्षा भारत के भावी नागरिकों में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति एवं सामाजिक सेवा की भावना उत्पन्न करेगी।

32307.

गाँधी जी ने बेसिक शिक्षा-प्रणाली का मुख्य उद्देश्य क्या निर्धारित किया था ?

Answer»

गाँधी जी ने बेसिक शिक्षा-प्रणाली का मुख्य उद्देश्य बालक-बालिकाओं को स्वावलम्बी तथा आत्मनिर्भर बनाना निर्धारित किया था।

32308.

रवीन्द्रनाथ टैगोर किस पोशाक को राष्ट्रीय पोशाक के रूप में डिजाइन करना चाहते थे?

Answer»

वे हिन्दू और मुसलमान दोनों प्रमुख समुदायों के मेल से पोशाक डिजाइन करना चाहते थे, जिसमें बटनदार लंबा कोट पुरुषों के लिए सबसे उपयुक्त पोशाक थी।

32309.

फ्रांस में सम्प्चुअरी कब से कब तक लागू रहे?

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फ्रांस में सम्प्चुअरी कानून 1294 ई0 से 1789 ई0 तक प्रभावी रहा।

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युद्ध के अतिरिक्त मानव सुरक्षा के किन्हीं अन्य चार खतरों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

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युद्ध के अतिरिक्त मानव सुरक्षा के अन्य चार खतरे निम्नवत् हैं-

1. वैश्विक ताप वृद्धि–वर्तमान विश्व में वैश्विक ताप वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) सम्पूर्ण मानव जाति हेतु एक गम्भीर खतरा है।
2. शरणार्थी समस्या दक्षिणी गोलार्द्ध के विभिन्न देशों में सशस्त्र संघर्ष तथा युद्ध की वजह से लाखों लोग शरणार्थी बने और सुरक्षित ठिकानों की तलाश में विभिन्न देशों में आसरा लिया।
3. अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद-आतंकवादी जान-बूझकर निर्दोष लोगों को अपना शिकार बनाते हैं तथा सम्बन्धित देश में आतंक का खतरा उत्पन्न करते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद एक से अधिक देशों में व्याप्त है तथा इसके खूनी निशाने पर विश्व के अनेक देशों के नागरिक हैं। विमान अपहरण अथवा भीड़-भरे स्थानों; जैसे-रेलगाड़ी, बस-स्टैण्ड, होटल, मॉल्स, बाजार अथवा ऐसे ही अन्य स्थानों पर विस्फोटक पदार्थ लगाना इत्यादि आतंकवाद के चिर-परिचित उदाहरण हैं।
4. प्रदूषण अथवा पर्यावरण क्षरण-पर्यावरण में हो रहे क्षरण से विश्व की सुरक्षा के समक्ष एक गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। वनों की बेतहाशा कटाई ने पर्यावरण एवं प्राकृतिक सन्तुलन को गम्भीर क्षति पहुँचाई है। जल, वायु, मृदा तथा ध्वनि प्रदूषण की वजह से मानव के सामान्य जीवन तथा शान्त वातावरण हेतु खतरा उत्पन्न हो गया है।

32311.

सुरक्षा के परम्परागत दृष्टिकोण के हिसाब से बताएं कि यदि किसी राष्ट्र पर खतरा मँडरा रहा हो तो उसके सामने क्या विकल्प होते हैं?

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सुरक्षा की पारम्परिक अवधारणा में सैन्य खतरे को किसी देश के लिए सबसे खतरनाक माना जाता है। परम्परागत धारणा में मुख्य रूप से सैन्य बल के प्रयोग अथवा सैन्य बल के प्रयोग की आशंका पर अंधिक बल दिया जाता है। इस धारणा में माना जाता है कि सैन्य बल से सुरक्षा को खतरा पहुँचता है और सैन्य बल से ही सुरक्षा को बनाए रखा जा सकता है। इसीलिए परम्परागत सुरक्षा में शक्ति-सन्तुलन, सैन्य गठबन्धन तथा अन्य किसी तरीके से सैन्य-शक्ति के विकास आदि पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया जाता है।

मूलत: किसी राष्ट्र के पास युद्ध की स्थिति में तीन विकल्प होते हैं-
⦁    शत्रु देश के सामने आत्मसमर्पण कर देना।
⦁    शत्रु देश को युद्ध से होने वाले खतरे।
⦁    शत्रु देश के साथ युद्ध करके, उसे पराजित करना।
उपर्युक्त विकल्पों के आलोक में सुरक्षा नीति का सम्बन्ध युद्ध की आशंका को रोकने से होता है जिसे ‘अपरोध’ कहते हैं और युद्ध को सीमित रखने तथा उन्हें समाप्त करने से होता है जिसे ‘रक्षा’ कहा जाता है।

संक्षेप में, परम्परागत सुरक्षा रणनीति में मुख्य तत्त्व विरोधी के सैन्य आक्रमण के खतरे को समाप्त करने या सीमित करने से होता है।

32312.

परम्परागत और अपारम्परिक सुरक्षा में क्या अन्तर है? गठबन्धनों का निर्माण करना और इनको बनाए रखना इनमें से किस कोटि में आता है?

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सुरक्षा के दो दृष्टिकोण हैं-
⦁    पारम्परिक सुरक्षा एवं
⦁    अपारम्परिक सुरक्षा।

1. पारम्परिक सुरक्षा-सुरक्षा की पारम्परिक धारणा में बाह्य दृष्टि से सैन्य खतरों पर ध्यान होता है तथा सुरक्षा नीति का सम्बन्ध मुख्यतया युद्ध की आशंका को रोकने से होता है। साथ ही इसमें सुरक्षा नीति में राष्ट्रों के मध्य अपने पक्ष में शक्ति सन्तुलन बनाना तथा सैनिक गठबन्धनों का निर्माण भी शामिल है। पारम्परिक धारणा में माना जाता है कि किसी देश की सुरक्षा को मुख्य खतरा उसकी सीमा के बाहर से होता है। इसका मुख्य कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का स्वरूप है जिसमें राष्ट्रीय व्यवस्था की तरह कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं है, जो सभी राष्ट्रों को नियन्त्रित कर सके। अतः विश्व राजनीति में प्रत्येक राष्ट्र को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ती है।
परम्परागत सुरक्षा का सम्बन्ध आन्तरिक सुरक्षा से भी है। यद्यपि पश्चिमी देश द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले अपनी आन्तरिक सुरक्षा के प्रति आश्वस्त थे, लेकिन सन् 1945 के बाद शीतयुद्धजनित संघर्ष तथा उपनिवेशों में राष्ट्रवादी आन्दोलन ने आन्तरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ उत्पन्न की। जबकि नवोदित राष्ट्रों में आन्तरिक सुरक्षा की मुख्य समस्या पड़ोसी देशों से युद्ध तथा आन्तरिक संघर्ष को लेकर उत्पन्न हुई। सुरक्षा के पारम्परिक तरीकों में निःशस्त्रीकरण, अस्त्र-नियन्त्रण तथा राष्ट्रों के मध्य शान्ति की बहाली प्रमुख थे।
2. अपारम्परिक सुरक्षा-अपारम्परिक सुरक्षा में केवल सैन्य खतरों को ही नहीं बल्कि मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक खतरों व आशंकाओं को शामिल किया जाता है। इस धारणा में सिर्फ राज्य की ही नहीं बल्कि व्यक्तियों और समुदायों या कहें समूची मानवता को सुरक्षा की आवश्यकता है। अपारम्परिक सुरक्षा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व रक्षा कहा जाता है। इस सुरक्षा में सैन्य खतरों के साथ-साथ व्यक्तियों की सुरक्षा से जुड़े गैर-सैन्य खतरों; जैसे—आन्तरिक जातीय संघर्ष, अकाल, महामारी, अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, पर्यावरण सुरक्षा (ग्लोबल वार्मिंग) आर्थिक सुरक्षा तथा मानवीय गरिमा के संकटों को शामिल किया जाता है। इसमें निर्धनता, गरीबी व असमानता जैसी समस्याएँ भी शामिल हैं।

पारम्परिक व अपारम्परिक सुरक्षा में अन्तर
(1) पारम्परिक सुरक्षा की धारणा में जहाँ आन्तरिक व बाह्य सैन्य खतरों को शामिल किया जाता है, वहीं अपारम्परिक सुरक्षा में मानवता की रक्षा व विश्व-रक्षा को शामिल किया जाता है। इसके व्यापक दृष्टिकोण में ‘अभाव से मुक्ति’ तथा ‘भय से मुक्ति’ जैसे तत्त्वों को शामिल किया जाता है।
(2) पारम्परिक सुरक्षा में जहाँ सैन्य खतरों से निपटने के लिए शक्ति-सन्तुलन, सैन्य गठबन्धन, अस्त्रनियन्त्रण, निशस्त्रीकरण तथा आपसी विश्वास जैसे तरीकों पर जोर दिया जाता है, वहीं अपारम्परिक सुरक्षा में खतरों से निबटने के लिए सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की रणनीतियों पर बल दिया जाता है। यह सहयोग द्विपक्षीय, क्षेत्रीय अथवा वैश्विक स्तर पर हो सकता है।
सैन्य गठबन्धनों का निर्माण करना तथा उन्हें बनाए रखना पारम्परिक सुरक्षा की धारणा के अन्तर्गत शामिल किया जाता है। यह सैन्य सुरक्षा का एक साधन है।

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सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व रक्षा क्यों कहा जाता है?

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सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा के विषय में यह कहा जाता है कि केवल राज्यों को ही सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सम्पूर्ण मानवता को सुरक्षा की आवश्यकता होती है। इस कारण सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व रक्षा कहा जाता है।

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सुरक्षा की परम्परागत तथा गैर-परम्परागत अवधारणाओं में क्या अन्तर अथवा भेद होता है?

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सुरक्षा की परम्परागत अवधारणा के अनुसार सिर्फ भूखण्ड तथा उसमें रहने वालों की सम्पदा और जानमाल की रक्षा करना, सशस्त्र सैन्य हमलों को रोकना भी है, जबकि गैर-परम्परागत अवधारणा में भू-भाग, प्राणियों तथा सम्पत्ति की सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण एवं मानवाधिकारों इत्यादि की सुरक्षा भी शामिल है।

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अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते आतंकवाद के पीछे क्या कारण हैं?

Answer»

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ रहे आतंकवाद के पीछे निम्नलिखित कारण हैं-

⦁    तकनीक तथा सूचना प्रौद्योगिकी में तेजी से हुई प्रगति ने आतंकवादियों के दुस्साहस में अभिवृद्धि की है। यह एक प्रमुख कारण है कि जिसकी वजह से आतंकवाद आज सम्पूर्ण विश्व में अपने पैर जमा चुका है।
⦁    तस्करी, जमाखोरी, वायुयानों के अपहरण तथा जहाजों को बन्धक बनाने जैसी घटनाओं के पीछे विश्व अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण है। आतंकवादियों द्वारा किसी भी देश की मुद्रा का अन्तरण करना सरल हो गया है।
⦁    अत्याधुनिक हथियारों को नवीन प्रौद्योगिकी द्वारा निर्मित करके उन्हें बेचने की प्रतिस्पर्धा शीतयुद्ध दौर की शैली है। व्यापक स्तर पर उन्माद जाग्रत करके आतंकवाद की खूनी होली खेलने के हथियारों को बनाने वाली कम्पनियाँ, सरकार तथा व्यापारी समान रूप से उत्तरदायी हैं।
⦁    स्वत:चलित यानों ने भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद को प्रोत्साहन दिया है।

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सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा में खतरों के प्रमुख नए स्रोतों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

Answer»

सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा के सन्दर्भ में खतरों की बदलती प्रकृति पर जोर दिया जाता है। ऐसे खतरों के प्रमुख नए स्रोत निम्नलिखित हैं जिन्हें मानवीय सुरक्षा से सम्बन्धित मुद्दे भी कह सकते हैं-

1. अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद-आतंकवाद से आशय राजनीतिक खून-खराबे से है जो जान-बूझकर और बिना किसी दयाभाव के नागरिकों को अपना निशाना बनाता है। जब आतंकवाद एक से अधिक देशों में व्याप्त हो जाता है तो उसे ‘अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद’ कहते हैं। इसके निशाने पर कई देशों के नागरिक हैं। आतंकवाद के चिरपरिचित उदाहरण हैं-
विमान अपहरण, भीड़ भरी जगहों पर बम लगाना। आतंकवाद की अधिकांश घटनाएँ मध्य पूर्व, यूरोप, लैटिन अमेरिका एवं दक्षिण एशिया में हुई हैं।
2. मानवाधिकारों का हनन-1990 के दशक की कुछ घटनाओं—रवाण्डा में जनसंहार, कुवैत पर इराक का हमला एवं पूर्वी तिमूर में इण्डोनेशियाई सेना के रक्तपात के कारण बहस चल पड़ी कि संयुक्त राष्ट्र संघ को मानवाधिकारों के हनन की स्थिति में हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं। यह अभी तक विवाद का विषय बना हुआ है। क्योंकि कुछ देशों का तर्क है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ताकतवर देशों के हितों के हिसाब से ही यह निर्धारित करेगा कि किस मामले में मानवाधिकार के विरोध में कार्रवाई की जाए और किस मामले में नहीं की जाए।
3. वैश्विक निर्धनता-वैश्विक निर्धनता खतरे का एक प्रमुख स्रोत है। अनुमान है कि आगामी 50 वर्षों के विश्व के सबसे निर्धन देशों में जनसंख्या तीन गुना बढ़ेगी, जबकि इसी अवधि में अनेक धनी देशों की जनसंख्या घटेगी। प्रति व्यक्ति निम्न आय एवं जनसंख्या की तीव्र वृद्धि एक साथ मिलकर निर्धन देशों को और अधिक गरीब बनाती है।
4. आर्थिक असमानता–विश्व स्तर पर आर्थिक असमानता उत्तरी गोलार्द्ध के देशों को दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों से अलग करती है। दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में आर्थिक असमानता में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। अफ्रीका के सहारा मरुस्थल के दक्षिणवर्ती देश विश्व में सबसे ज्यादा निर्धन हैं।
5. अप्रवासी, शरणार्थी एवं आन्तरिक रूप से विस्थापित लोगों की समस्याएँ–दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में मौजूद निर्धनता के कारण अधिकांश लोग अच्छे जीवन की तलाश में उत्तरी गोलार्द्ध के देशों में प्रवास कर रहे हैं। इससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मतभेद उठ खड़ा हुआ है। अनेक लोगों को युद्ध, प्राकृतिक आपदा अथवा राजनीतिक उत्पीड़न के कारण अपना घर-बार छोड़ने को मजबूर होना पड़ा है। ऐसे लोग यदि राष्ट्रीय सीमा के भीतर ही हैं तो उन्हें आन्तरिक रूप से विस्थापित जन कहा जाता है और यदि दूसरे देशों में हैं तो उन्हें शरणार्थी कहा जाता है। इन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
6. महामारियाँ-एचआईवी-एड्स, बर्ड-फ्लू एवं सार्स जैसी महामारियाँ, आप्रवास, व्यवसाय, पर्यटन एवं सैन्य अभियोजनों के माध्यम से तीव्र गति से विश्व के विभिन्न देशों में फैली हैं। इन बीमारियों के फैलाव को रोकने में किसी एक देश की असफलता का प्रभाव दूसरे देशों में होने वाले संक्रमण पर पड़ता है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2003 तक विश्व में 4 करोड़ से अधिक लोग एचआईवी से संक्रमित थे। इसके अलावा आज ऐसी अनेक खतरनाक बीमारियाँ हैं जिनके बारे में कुछ अधिक जानकारी भी नहीं है। इनमें एबोला वायरस, हैन्टावायरस और हेपेटाइटिस-सी हैं।

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1857 के विद्रोह के विषय में चित्रों से क्या पता चलता है? इतिहासकार इन चित्रों को किस तरह विश्लेषण करते हैं?

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विद्रोह की अवधि में तथा उसके बाद भी अंग्रेजों एवं भारतीयों द्वारा विद्रोह से संबंधित अनेक विषयों का चित्रांकन किया गया।

इनमें से अनेक चित्र, पेंसिल निर्मित रेखाचित्र, उत्कीर्ण चित्र, पोस्टर, कार्टून और बाजार प्रिंट आज उपलब्ध हैं। ये चित्रांकन विद्रोह की विभिन्न छवियाँ हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। पाठ्यपुस्तक में दिए गए कुछ महत्त्वपूर्ण चित्रों के आधार पर हम यह जानने का प्रयत्न करेंगे कि इतिहासकार इन चित्रों का विश्लेषण किस प्रकार करते हैं। विद्रोह के संबंध में अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए चित्रों में अंग्रेजों को बचाने वाले एवं विद्रोहियों को कुचलने वाले अंग्रेज़ नायकों का अभिनंदन रक्षकों के रूप में किया गया है। इस संबंध में टॉमस जोन्स बार्कर द्वारा 1859 ई० में निर्मित चित्र ‘द रिलीफ़ ऑफ़ लखनऊ’ (लखनऊ की राहत) विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह सर्वविदित है कि 1857 ई० के विद्रोह का संभवतः सर्वाधिक भयंकर रूप अवध की राजधानी लखनऊ में देखने को मिला था। विद्रोही सैनिकों द्वारा लखनऊ का घेरा डाल दिए जाने पर लखनऊ के कमिश्नर हेनरी लारेन्स ने सभी ईसाइयों को इकट्ठा करके उनके साथ अत्यधिक सुरक्षित रेजीडेंसी में शरण ले ली थी।

रेजीडेंसी पर विद्रोहियों के आक्रमण में हेनरी लारेन्स की तो मृत्यु हो गई, किन्तु कर्नल इंगलिस ने किसी प्रकार से रेजीडेंसी को सुरक्षित रखा। अंत में कॉलिन कैप्पबेल और जेम्स ऑट्रम की संयुक्त सेनाओं ने ब्रिटिश रक्षक सेना को घेरे से छुड़ाया और विद्रोहियों को पराजित करके लखनऊ पर अधिकार स्थापित कर लिया। अंग्रेजों ने अपने विवरणों में लखनऊ पर अपने पुनः अधिकार का उल्लेख ब्रिटिश शक्ति के वीरतापूर्वक प्रतिरोध एवं निर्विवाद विजय के प्रतीक के रूप में किया है। जोन्स बार्कर के इस चित्र में कॉलिन कैम्पबेल के आगमन पर प्रसन्नता के समारोह का अंकन किया गया है। चित्र के मध्य में तीन ब्रिटिश नायकों-कैम्पबेल, ऑट्रम तथा हैवलॉक को दिखाया गया है। उनके आस-पास खड़े लोगों के हाथों के संकेतों से दर्शक का ध्यान बरबस ही चित्र के मध्य भाग की ओर आकर्षित हो जाता है। ये नायक जिस स्थान पर खड़े हैं वहाँ पर्याप्त उजाला है, इसके अगले भाग में परछाइयाँ हैं और पिछले भाग में टूटा-फूटा रेजीडेंसी दृष्टिगोचर होता है।

चित्र के अगले भाग में दिखाए गए शव और घायल इस घेरेबंदी में हुई मार-काट के साक्षी हैं। मध्य भाग में अंकित घोड़ों के विजयी चित्र ब्रिटिश सत्ता एवं नियंत्रण की पुनस्र्थापना के प्रतीक हैं। इन चित्रों का प्रमुख उद्देश्य अंग्रेज जनता में अपनी सरकार की शक्ति के प्रति विश्वास उत्पन्न करना था। इस प्रकार के चित्रों से यह स्पष्ट संकेत मिलता था कि संकट समाप्त हो चुका था, विद्रोह का दमन किया जा चुका था और अंग्रेज अपनी सत्ता की पुनस्र्थापना में सफलता प्राप्त कर चुके थे। 1857 ई० के सैनिक विद्रोह के दो वर्ष बाद जोजेफ़ नोएल पेटन द्वारा बनाए गए चित्र ‘इन मेमोरियम’ (स्मृति में) में चित्रकार का प्रमुख उद्देश्य विद्रोह की अवधि में अंग्रेज़ों, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की असहायता को प्रकट करना था। इस चित्र में अंग्रेज़ महिलाओं और बच्चों को एक घेरे में एक-दूसरे से लिपटा हुआ चित्रित किया गया है।

उन्हें पूर्ण रूप से असहाय एवं मासूम दिखाया गया है। उनके चेहरे के भावों से ऐसा लगता है कि मानो वे किसी भयानक घड़ी की आशंका से ग्रस्त हों। उन्हें देखकर लगता है कि जैसे वे पूरी तरह से आशाविहीन होकर अपने अपमान, हिंसा और मौत की प्रतीक्षा कर रहे हैं। चित्र को ध्यानपूर्वक देखने से पता लगता है कि इसमें भयंकर हिंसा का चित्रण नहीं किया गया है, उसकी तरफ केवल संकेत किया गया है। चित्रकार की यह कल्पना दर्शकों को अन्दर तक झकझोर डालती है। वे गुस्से और बेचैनी के भावों से उबलने लगते हैं और प्रतिशोध लेने के लिए स्वयं को तैयार कर लेते हैं। इस प्रकार के चित्रों में विद्रोहियों को दिखाया नहीं गया है, तथापि उनका प्रमुख उद्देश्य विद्रोहियों की हिंसकता एवं बर्बरता को प्रकट करना है। ‘इन मेमोरियम’ नामक इस चित्र की पृष्ठभूमि में ब्रिटिश सैनिकों को रक्षक के रूप में आगे बढ़ते हुए दिखाया गया है।

कुछ चित्रों में अंग्रेज़ महिलाओं का चित्रांकन वीरता की साकार प्रतिमा के रूप में किया गया है। इन चित्रों में वे वीरतापूर्वक स्वयं अपनी रक्षा करते हुए दृष्टिगोचर होती हैं। उदाहरण के लिए पाठ्यपुस्तक के चित्र 11.3 में मिस व्हीलर को वीरता की साकार प्रतिमा के रूप में भारतीय सिपाहियों से वीरतापूर्वक अपनी रक्षा करते हुए दिखाया गया है। वह दृढ़तापूर्वक विद्रोहियों के मध्य खड़ी दृष्टिगोचर होती हैं और अकेले ही विद्रोहियों को मौत के घाट उतारते हुए अपने सम्मान की रक्षा करती हैं। अन्य ब्रिटिश चित्रों के समान इस चित्र में भी विद्रोहियों को बर्बर दानवों के रूप में चित्रित किया गया है। चित्र में चार हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति हाथों में तलवारें और बंदूकें लिए हुए एक अकेली महिला पर वार करते हुए दिखाये गए हैं। वास्तव में, इस चित्र में अपने सम्मान और जीवन की रक्षा के लिए एक महिला के वीरतापवूक संघर्ष के माध्यम से चित्रकार ने एक गहरे धार्मिक विचार का प्रस्तुतीकरण किया है। इसके अंतर्गत विद्रोहियों के विरुद्ध संघर्ष को ईसाईयत की रक्षा के संघर्ष के रूप में दिखाया गया है। चित्र में बाइबिल को भूमि पर गिरा हुआ दिखाया गया है।

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विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि महात्मा गाँधी ‘राजद्रोही मिडिल टेम्पल वकील से ज्यादा कुछ नहीं हैं और ‘अधनंगे फकीर का दिखावा कर रहे हैं। चर्चिल ने यह वक्तव्य क्यों दिया और इससे महात्मा गाँधी की पोशाक की प्रतीकात्मक शक्ति के बारे में क्या पता चलता है?

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इस समय महात्मा गाँधी की छवि भारतीय जनता में एक ‘महात्मा’ एवं मुक्तिदाता के रूप में उभर रही थी। गाँधी जी की वेशभूषा सादगी, पवित्रता और निर्धनता का प्रतीक थी जो भारतीय जनता के विचारों और स्थिति को प्रतिबिम्बित करती थी। इस कारण महात्मा गाँधी की पोशाक की प्रतीकात्मक शक्ति चर्चिल के साम्राज्यवाद का विरोध करती हुई प्रतीत हुई और उन्होंने महात्मा गाँधी के विषय में प्रश्नगत् टिप्पणी की।

32319.

महात्मा गाँधी ने लुंगी-कुर्ता पहनने का प्रयोग कब शुरू किया?

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1913 ई० में डरबन (दक्षिण अफ्रीका) में महात्मा गाँधी ने पहली बार यह परिधान धारण किया।

32320.

महात्मा गाँधी ने कौन-सी शिक्षण पद्धति बनाई थी ? बेसिक शिक्षा प्रणाली के जन्मदाता कौन थे?

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महात्मा गाँधी ने बेसिक शिक्षा पद्धति का प्रतिपादन किया था।

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“व्हाइट” और “ब्लैक” टाउन शब्दों का क्या महत्त्व था?

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भारत में विभिन्न यूरोपीय कंपनियों में निरंतर प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनी रहती थी। अतः सुरक्षा की दृष्टि से अंग्रेजों ने अपनी प्रमुख बस्तियों की किलेबंदी कर ली। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम तथा बंबई में फोर्ट अंग्रेजों की किलेबंद कोठियाँ थीं। शीघ्र ही ये बस्तियाँ महत्त्वपूर्ण औपनिवेशिक शहरों के रूप में विकसित हो गईं। मद्रास, कलकत्ता एवं बंबई अत्यधि क महत्त्वपूर्ण एवं सुप्रसिद्ध औपनिवेशिक शहर थे। औपनिवेशिक शहर में यूरोपीय जिस किलेबंद क्षेत्र के अंदर रहते थे, उसे “व्हाइट टाउन” कहा जाता था। दीवारों और बुर्जी के द्वारा इसे एक विशेष प्रकार की किलेबंदी के रूप में दिया गया था। भारतीय किलेबंद क्षेत्र के अंदर नहीं रह सकते थे, क्योंकि रंग और धर्म किले के अंदर रहने के प्रमुख आधार थे। डच एवं पुर्तगाली यूरोपीय व ईसाई होने के कारण किलेबंद क्षेत्र में रह सकते थे।

भारतीय किलेबंद क्षेत्र के बाहर जिस भाग में रहते थे उसे “ब्लैक टाउन” के नाम से जाना जाता था। 1857 ई० के विद्रोह के परिणामस्वरूप भारत में औपनिवेशिक अधिकारी इतने अधिक आतंकित हो गए थे कि वे सुरक्षा की दृष्टि से “देशियों” अर्थात् भारतीयों के खतरे से, दूर पृथक् एवं पूर्णरूप से सुरक्षित बस्तियों में रहना चाहते थे। अतः “सिविल लाइंस” नामक नए शहरी क्षेत्र विकसित किए गए। ये क्षेत्र अत्यधिक सुरक्षित थे और इनमें केवल गोरे ही निवास करते थे। निःसंदेह व्हाइट और ब्लैक टाउन नस्ली विभाजन के प्रतीक थे।

32322.

पर्यावरण के तेजी से हो रहे नुकसान से देशों की सुरक्षा को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? उदाहरण देते हुए तर्कों की पुष्टि करें।

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सुरक्षा के अपारम्परिक खतरों में से एक प्रमुख खतरा पर्यावरण में बढ़ रहा प्रदूषण है। पर्यावरण प्रदूषण की प्रकृति वैश्विक है। इसके दुष्परिणामों की सीमा राष्ट्रीय नहीं है। वैश्विक पर्यावरण की समस्याओं से मानव जाति को सुरक्षा का खतरा उत्पन्न हो गया है। वैश्विक पर्यावरण की चुनौती निम्नलिखित कारणों से है-

(1) कृषि योग्य भूमि, जलस्रोत तथा वायुमण्डल के प्रदूषण से खाद्य उत्पादन में कमी आई है तथा यह मानव स्वास्थ्य के लिए घातक है। वर्तमान में विकासशील देशों की लगभग एक अरब बीस करोड़ जनता को स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है।
(2) धरती के ऊपर वायुमण्डल में ओजोन गैस की कमी के कारण मानव-स्वास्थ्य के लिए गम्भीर खतरा मँडरा रहा है।
(3) सर्वाधिक खतरे का प्रमुख कारण ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक ताप वृद्धि) की समस्या है जिसका प्रमुख कारण प्रदूषण है। प्रदूषण के कारण विश्वव्यापी तापमान में निरन्तर वृद्धि हो रही है। उदाहरण के लिए, वैश्विक ताप वृद्धि से ध्रुवों पर जमी बर्फ पिघल जाएगी। यदि समुद्रतल दो मीटर ऊपर उठता है तो बंगलादेश का 20 प्रतिशत हिस्सा डूब जाएगा, कमोबेश पूरा मालदीव समुद्र में समा जाएगा तथा थाईलैण्ड की 20 प्रतिशत जनसंख्या डूब जाएगी।

उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि पर्यावरण के नुकसान से देशों की सुरक्षा को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो गया है। इन खतरों का सामना सैन्य तैयारी से नहीं किया जा सकता। इसके लिए विश्व स्तर पर अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है। ज्ञातव्य है कि पर्यावरण की समस्या के समाधान के लिए वर्ष 1992 में ब्राजील में ‘पृथ्वी सम्मेलन’ आयोजित किया गया था जिसमें 170 देशों ने भाग लिया था।

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परम्परागत सुरक्षा के किन्हीं चार तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।

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परम्परागत सुरक्षा के चार तत्त्व निम्नवत् हैं-

1. परम्परागत खतरे-सुरक्षा की पारम्परिक अवधारणा में सैन्य खतरों को किसी भी देश के लिए सर्वाधिक माना जाता है। इसका स्रोत कोई दूसरा देश होता है जो सैनिक हमले की धमकी देकर किसी देश की सम्प्रभुता, स्वतन्त्रता तथा क्षेत्रीय अखण्डता को प्रभावित करता है।
2. युद्ध-युद्ध में साधारण लोगों के जीवन पर भी खतरा मँडराता है। किसी भी युद्ध में सिर्फ सैनिक ही घायल अथवा मारे नहीं जाते, बल्कि जन-सामान्य को भी इससे भारी नुकसान पहुंचता है।
3. शक्ति सन्तुलन-परम्परागत सुरक्षा नीति का एक अन्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व शक्ति सन्तुलन है। कोई भी देश अपने पड़ोसी देशों की शक्ति का सही-सही आकलन करके भविष्य की नीति तैयार करता है। प्रत्येक सरकार दूसरे देशों से अपने शक्ति सन्तुलन को लेकर अत्यधिक संवेदनशील रहती है।
4. गठबन्धन करना-परम्परागत सुरक्षा नीति का एक तत्त्व गठबन्धन करना भी है। इसमें विभिन्न देश सम्मिलित होते हैं तथा सैन्य हमले को रोकने तथा उससे रक्षा करने के लिए मिल-जुलकर कदम उठाते हैं।

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आतंकवाद असैनिक स्थानों को अपना लक्ष्य क्यों चुनते हैं?

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आतंकवादी निम्नलिखित कारणों से असैनिक स्थानों को अपना लक्ष्य बनाते हैं-

(1) आतंकवाद अपरम्परागत श्रेणी में आता है। आतंकवाद का तात्पर्य राजनीतिक कत्ले आम है, जो जानबूझकर बिना किसी पर दयाभाव रखकर नागरिकों को अपना शिकार बनाता है। एक से अधिक देशों में व्याप्त अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद के निशाने पर कई देशों के निर्दोष नागरिक हैं।
(2) किसी राजनीतिक सन्दर्भ अथवा स्थिति के मनमुताबिक न होने पर आतंकवादी समूह उसे बल प्रयोग से या शक्ति प्रयुक्त किए जाने की धमकी देकर परिवर्तित करना चाहते हैं। जनसाधारण को डराकर आतंकित करने हेतु निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जाता है। आतंकवाद नागरिकों के असन्तोष का प्रयोग राष्ट्रीय सरकारों या संघर्षों में सम्मिलित अन्य पक्ष के विरुद्ध करता है।
(3) आतंकवादियों का मुख्य उद्देश्य आतंक फैलाना है, अत: वे असैनिक स्थानों अर्थात् जन-साधारण को अपनी दहशतगर्दी का निशाना बनाते हैं। इससे जहाँ एक तरफ वे आतंक स्थापित करके लोगों तथा विश्व का ध्यान अपनी तरफ खींचने में सफल होते हैं तो वहीं दूसरी ओर उन्हें प्रतिरोध का सामना भी नहीं करना पड़ता। नागरिक सफलतापूर्वक उनके शिकार बन जाते हैं।

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औपनिवेशिक मद्रास में शहरी और ग्रामीण तत्व किस हद तक घुल-मिल गए थे?

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अंग्रज व्यापारियों ने वस्त्र उत्पादों की खोज में 1639 ई० में पूर्वीतट पर मद्रास पट्टनम में एक व्यापारिक बस्ती की स्थापना की। सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने मद्रास की किलेबंदी करवाई और यह किला फोर्ट सेंट जॉर्ज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 1761 ई० में फ्रांसीसियों की पराजय के परिणामस्वरूप मद्रास और अधिक सुरक्षित हो गया तथा शीघ्र ही एक महत्त्वपूर्ण व्यावसायिक शहर बन गया। यूरोपीय किलेबंद क्षेत्र के अंदर रहते थे, जिसे ‘व्हाइट टाउन’ कहा जाता था। फोर्ट सेंट जॉर्ज ‘व्हाइट टाउन’ का केंद्रक था। भारतीय ब्लैक टाउन, जिसे किलेबंद क्षेत्र के बाहर स्थापित किया गया था, में रहते थे। उल्लेखनीय है कि मद्रास का विकास अनेक ग्रामों को मिलाकर किया गया था। अतः इसमें शहरी और ग्रामीण तत्वों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता था। मद्रास में भिन्न-भिन्न समुदायों के लिए रोजगार के अनेक अवसर उपलब्ध थे।

अतः विविध प्रकार के आर्थिक कार्य करने वाले अनेक समुदाय यहाँ आए और यहीं बस गए। दुबाश, तेलुगू कोमाटी और वेल्लालार इसी प्रकार के समुदाय थे। दुबाश स्थानीय भाषा और अंग्रेज़ी दोनों को बोलने में कुशल थे। अतः वे भारतीयों एवं गोरों के बीच मध्यस्थ का काम करते थे। वेल्लालार नवीन अवसरों का लाभ उठाने वाली एक स्थानीय ग्रामीण जाति थी और तेलुगू कोमाटी अनाज व्यापार में लगा एक प्रभावशाली व्यावसायिक समुदाय था। 18वीं शताब्दी से गुजराती बैंकर भी यहाँ बस गए थे। पेरियार एवं वन्नियार गरीब श्रमिक वर्ग के अंतर्गत आते थे। समीप ही स्थित ट्रिप्लीकेन मुस्लिम जनसंख्या का केंद्र था। अर्काट के नवाब भी यहाँ रहते थे। माइलापुर तथा ट्रिप्लीकेन जाने-माने हिंदू धार्मिक केंद्र थे। अनेक ब्राह्मण अपनी आजीविका यहीं से प्राप्त करते थे। सानथोम तथा वहाँ का बड़ा गिरजाघर रोमन कैथोलिक लोगों का केंद्र था।

ये सभी बस्तियाँ मद्रास शहर का भाग बन गई थीं। इस प्रकार, अनेक ग्रामों को मिला लिए जाने के कारण मद्रास दूर-दूर तक फैली शहर बन गया। भारत में ब्रिटिश सत्ता मजबूत हो जाने पर यूरोपीय किलेबंद क्षेत्र से बाहर, माउंट रोड और पूनामाली रोड पर अपने-अपने रहने के लिए गार्डन हाउसेस अर्थात् बगीचों वाले मकानों का निर्माण करवाने लगे। अंग्रेजों की जीवन-शैली का अनुकरण करते हुए सम्पन्न भारतीय इसी प्रकार के निवास स्थान बनवाने लगे। इस प्रकार, मद्रास के आस-पास स्थित ग्रामों के स्थान पर नए उपशहरी क्षेत्र विकसित होने लगे। गरीब लोग अपने काम के स्थान के निकट स्थित ग्रामों में रहने लगे। इस प्रकार, मद्रास के क्रमिक शहरीकरण के परिणामस्वरूप इन ग्रामों के मध्य स्थित शहर के अंतर्गत आ गए। इस प्रकार मद्रास का स्वरूप एक अर्ध ग्रामीण शहर जैसा हो गया।

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कला, भाषा, दर्शन साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में रोम की क्या देन है?

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कला के क्षेत्र में देन :
⦁     रोम ने कंकरीट को प्रयोग सर्वप्रथम किया।
⦁     वे ईंट-पत्थरों को बड़ी मजबूती से जोड़ सकते थे, इस शिल्पकला को रोम ने ही विश्व को सिखाया।
⦁     डाट का प्रयोग रोम ने सम्भवतः सर्वप्रथम किया। वे मजबूत डाटों के सहारे कई मंजिले मकान बना सकते थे।
⦁     वे मजबूत व सुंदर नहरें बनाना जानते थे।
⦁    उन्होंने अपने सम्राटों की मूर्तियाँ बनाकर महत्त्वपूर्ण स्थानों पर लगाई।

भाषा, दर्शन, साहित्य तथा विज्ञान के क्षेत्र में देन
भाषा : रोम के लोगों ने यूनानियों से वर्णमाला सीखकर अपनी वर्णमाला और भाषा का विकास किया। उनकी लैटिन भाषा सारे पश्चिमी यूरोप के पढ़े-लिखे लोगों की भाषा बन गई। कई आधुनिक यूरोपीय भाषाएँ; जैसे–फ्रांसीसी, स्पेनिश, इतालवी उनकी लैटिन भाषा पर आधारित हैं।
दर्शन : एषीक्यूरिन तथा स्टोक दर्शन रोम में बहुत प्रसिद्ध थे। रोम में ल्यूकीट्स, सिसरो, मार्कस, ओरीलियस आदि प्रसिद्ध दार्शनिक हुए।
साहित्य : रोम ने साहित्य के क्षेत्र में कुछ प्रसिद्ध कवि दिए। होरेश और वर्जिल उनके महानतम कवि थे।
विज्ञान : रोम के प्रसिद्ध वैज्ञानिक सेल्सस ने चिकित्साशास्त्र के क्षेत्र में एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी जिसमें शल्य चिकित्सा का विस्तृत वर्णन किया गया। गैलेन नामक वैज्ञानिक ने चिकित्साशास्त्र को विशेष कोष तैयार किया। उसने रक्त संचालन का पता लगाया। खगोल तथा भूगोल के क्षेत्र में टॉलमी नामक विद्वान् नेविशेष कार्य किया। उसने तारों व ग्रहों की स्थिति का अध्ययन किया।

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1950 व 1960 ई० के दशकों के अन्त में पाकिस्तान की नीतियाँ कैसी थीं?

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1950 व 1960 के दशकों के अन्त में पाकिस्तान ने अनेक प्रकार की नियन्त्रित नीतियों का प्रारूप लागू किया। इनमें से प्रमुख थीं-आयात-प्रतिस्थापन नीति, प्रशुल्क संरक्षण, प्रतिस्पर्धी आयातों पर प्रत्यक्ष नियन्त्रण आदि।

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औपनिवेशिक शहरों में रिकॉडर्स संभाल कर क्यों रखे जाते थे?

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औपनिवेशिक शहरों में रिकॉर्ड्स संभाल कर रखने के निम्नलिखित कारण थे

⦁    इन रिकॉर्डो से शहरों में व्यापारिक गतिविधियाँ, औद्योगिक प्रगति, सफाई, सड़क परिवहन, यातायात और प्रशासनिक कार्याकलापों की आवश्यकताओं को जानने-समझने और उन पर आवश्यकतानुसार कार्य करने में सहायता मिलती थी।
⦁    शहरों की बढ़ती-घटती आबादी के प्रतिशत को जानने के लिए भी यह रिकॉर्ड रखा जाता था।
⦁    शहरों की चारित्रिक विशेषताओं के अन्वेषण के समय उन रिकॉर्डों का प्रयोग सामाजिक और अन्य परिवर्तनों को जानने के लिए किया जाता था।

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नए शहरों में सामाजिक संबंध किस हद तक बदल गए? ।

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नए शहरों के विकास ने सामाजिक संबंधों को अनेक रूपों में प्रभावित किया। नए शहरों का वातावरण अनेक रूपों में पुराने शहरों के वातावरण से भिन्न था। पुराने शहरों में विद्यमान सामंजस्य एवं जान-पहचान का नए शहरों में अभाव था। इन शहरों में लोग अत्यधिक व्यस्त रहते थे और यहाँ जीवन सदैव दौड़ता-भागता-सा प्रतीत होता था। इन शहरों में यदि एक ओर अत्यधि क संपन्नता थी तो दूसरी ओर अत्यधिक दरिद्रता। यहाँ अत्यधिक धनी व्यक्ति भी रहते थे और अत्यधिक दरिद्र व्यक्ति भी। परिणामस्वरूप लोगों का परस्पर मिलना-जुलना सीमित हो गया। किन्तु नए शहरों में टाउन हॉल, सार्वजनिक पार्को और बीसवीं शताब्दी में सिनेमा हॉलों जैसे सार्वजनिक स्थानों के निर्माण से शहरों में भी लोगों को परस्पर मिलने-जुलने के अवसर उपलब्ध होने लगे थे।

शहरों में नवीन सामाजिक समूह विकसित हो जाने के परिणामस्वरूप पुरानी पहचानें अपना महत्त्व खाने लगीं। लगभग सभी वर्गों के सम्पन्न लोग शहरों की तरफ उमड़ने लगे। नए-नए व्यवसायों के विकसित होने के कारण शहरों में क्लर्को, शिक्षकों, वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और अकाउंटेंट्स आदि की माँग में निरन्तर वृद्धि होने लगी। इस प्रकार मध्यवर्ग’ का विस्तार होने लगा। यह वर्ग बौद्धिक एवं आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न वर्ग था। इस वर्ग के लोगों की स्कूलों, कॉलेजों एवं पुस्तकालयों जैसे नए शिक्षा संस्थानों तक पहुँच थी। शिक्षित होने के कारण उनका समाज में महत्त्व बढ़ने लगा। वे अख़बारों, पत्रिकाओं एवं सार्वजनिक सभाओं में अपनी राय व्यक्त करने लगे। इस प्रकार, बहस एवं चर्चा का एक नया सार्वजनिक दायरा विकसित होने लगा। सामान्य जागरूकता का विकास होने लगा और सामाजिक रीति-रिवाजों, कायदे-कानूनों एवं तौर-तरीकों की उपयोगिता पर अनेक प्रश्नचिह्न लगाए जाने लगे।

नवीन शहरों के विकास ने महिलाओं के सामाजिक जीवन को अनेक रूपों में प्रभावित किया। उल्लेखनीय है कि नए शहरों में महिलाओं को अनेक नए अवसर उपलब्ध थे। मध्यवर्ग की महिलाओं ने पत्र-पत्रिकाओं, आत्मकथाओं एवं पुस्तकों के माध्यम से समाज में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के प्रयास प्रारंभ कर दिए थे। किन्तु पितृसत्तात्मक भारतीय समाज ऐसे प्रयासों का स्वागत करने के लिए तैयार नहीं था। परम्परागत भारतीय समाज में महिलाओं का स्थान घर की चारदीवारी के अन्दर था। अतः शिक्षित महिलाओं के ऐसे प्रयासों को अनेक लोगों ने परम्परागत पितृसत्तात्मक कायदे-कानूनों को बदलने के प्रयास समझा। रूढ़िवादियों को भय था कि शिक्षित महिलाएँ सामाजिक रीति-रिवाजों को उलट-पुलट कर रख देंगी जिसके परिणामस्वरूप सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था का आधार ही डावाँडोल हो जाएगा।

उल्लेखनीय है कि महिलाओं की शिक्षा की पुरजोर वकालत करने वाले सुधारक भी महिलाओं को केवल माँ और पत्नी की परम्परागत भूमिकाओं में ही देखना चाहते थे। किन्तु शिक्षा के प्रसार ने महिलाओं में जागरूकता को उत्पन्न किया और धीरे-धीरे सार्वजनिक स्थानों में महिलाओं की उपस्थिति में वृद्धि होने लगी। महिलाएँ सेविकाओं, फैक्ट्री मजदूरों, शिक्षिकाओं, रंगकर्मियों और फिल्म कलाकारों के रूप में शहर के नए व्यवसायों में भाग लेने लगीं। किन्तु घर से बाहर सार्वजनिक स्थानों में जाने वाली महिलाओं को पर्याप्त समय तक सामाजिक दृष्टि से सम्मानित नहीं समझा जाता था। नए-नए व्यवसायों के अस्तित्व में आने के परिणामस्वरूप शहरों में शारीरिक श्रम करने वाले गरीब मजदूरों अथवा कामगारों का एक नया वर्ग अस्तित्व में आने लगा। कुछ लोग रोजगार के नए अवसरों की खोज में शहर की ओर भागने लगे, तो कुछ एक भिन्न जीवन-शैली के आकर्षण से प्रभावित होकर शहर की ओर उमड़ने लगे।

मजदूरों एवं कामगारों के लिए शहर का जीवन अनेक संघर्षों से परिपूर्ण था। वस्तुएँ महँगी होने के कारण यहाँ रहने का खर्च उठाना सरल नहीं था और फिर नौकरी पक्की न होने के कारण सदा काम मिलने की गारंटी भी नहीं होती थी। इसलिए रोजगार की खोज में गाँवों से शहर में आने वाले अधिकांश पुरुष अपने परिवारों को ग्रामों में ही छोड़कर आते थे। उल्लेखनीय है कि शहरों में रहने वाले गरीबों ने वहाँ अपनी एक पृथक् संस्कृति की रचना कर ली थी जो जीवन से परिपूर्ण थी। वे उत्साहपूर्वक धार्मिक उत्सवों, तमाशों और स्वांग आदि में भाग लेते थे। तमाशों और स्वांगों में वे प्रायः अपने भारतीय एवं यूरोपीय स्वामियों का मजाक उड़ाते थे। इस प्रकार निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि नए शहरों में सामाजिक संबंध पर्याप्त सीमा तक परिवर्तित हो गए।

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उन्नीसवीं सदी में नगर-नियोजन को प्रभावित करने वाली चिंताएँ कौन-सी थीं?

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19वीं शताब्दी में नगर-नियोजन को प्रभावित करने वाली चिंताएँ निम्नलिखित थीं

1. नगर को समुद्र के निकट बसाना 19वीं शताब्दी के नगर-नियोजन की एक प्रमुख चिंता थी। औपनिवेशिक सरकार नगरों को समुद्र के निकट विकसित करना चाहती थी ताकि यूरोपीयों के व्यापारिक उद्देश्यों की पूर्ति भली-भाँति की जा सके। भारत का माल सरलतापूर्वक यूरोप में भेजा जा सके और यूरोपीय माल बिना किसी कठिनाई के भारत लाया जा सके।

2. नगर-नियोजन की दूसरी महत्त्वपूर्ण चिंता सुरक्षा से संबंधित थी। वास्तव में 1857 ई० के विद्रोह ने भारत में औपनिवेशिक अधिकारियों को इतना अधिक आतंकित कर दिया था कि उन्हें सदैव विद्रोह की आशंका बनी रहती थी। अतः सुरक्षा की दृष्टि से वे “देशियों” अर्थात् भारतीयों के खतरे से दूर, पृथक् एवं पूर्ण रूप से सुरक्षित बस्तियों में रहना चाहते थे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुराने कस्बों के आस-पास स्थित चरागाहों एवं खेतों को साफ करवा दिया गया। सिविल लाइंस के नाम से नए शहरी क्षेत्र विकसित किए गए जिनमें केवल यूरोपीय ही निवास कर सकते थे।

3. शहरों के नक्शे अथवा मानचित्र तैयार करवाना नगर-नियोजन की एक अन्य महत्त्वपूर्ण चिंता थी। किसी भी स्थान की बनावट अथवा भू-दृश्य को समझने के लिए मानचित्रों का होना नितांत आवश्यक था। विकास की योजना को तैयार करने, व्यवसायों का विकास करने, औपनिवेशिक सत्ता को मजबूती से स्थापित करने तथा रक्षा संबंधी उद्देश्यों के लिए योजना तैयार करने के लिए भी मानचित्रों की आवश्यकता थी।

4. रंग-भेदभाव तथा जाति-भेदभाव के आधार पर शहरों का विभाजन तथा उनमें सार्वजनिक सुविधाओं के अलग-अलग स्तर को बनाए रखना भी नगर-नियोजन की एक चिंता थी। अंग्रेज़ों की दृष्टि में भारतीय असभ्य थे। वे उन्हें अपने क्लबों और सार्वजनिक स्थानों का प्रयोग करने की अनुमति नहीं देना चाहते थे।

5. शहर के भारतीय आबादी वाले भाग की भीड़-भाड़, आवश्यकता से अधिक हरियाली, गंदे तालाबों, बदबू और नालियों की खस्ता हालत आदि भी नगर-नियोजन को प्रभावित करने वाली चिंताएँ थीं। यूरोपीयों का विचार था कि दलदली जमीन एवं ठहरे हुए पानी के तालाबों से विषैली गैसें उत्पन्न होती थीं जो विभिन्न बीमारियों का प्रमुख कारण थीं। यूरोपीय उष्णकटिबंधीय जलवायु को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानते थे। अतः शहर को अधिक स्वास्थ्य कारक बनाने का एक उपाय शहर में खुले स्थान छोड़े जाने के रूप में ढूंढ निकाला गया।

6. नगरों की सुव्यवस्था के लिए विभिन्न कमेटियों का संगठन करना, शहर को साफ-सुथरा बनाने के लिए बाजारों, घाटों, कब्रिस्तानों और चर्म-शोधन इकाइयों को साफ करना आदि नगर-नियोजन की अन्य चिंताएँ थीं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शहरों की सफाई एवं नगर-नियोजन की सभी परियोजनाओं में ‘जन-स्वास्थ्य के लिए विचार पर बार-बार बल दिया जाने लगा।

7. शहरों के रख-रखाव के लिए पर्याप्त धन को जुटाना नगर-नियोजन की एक अन्य चिंता थी। इसके लिए कलकत्ता जैसे महत्त्वपूर्ण नगर के रख-रखाव के लिए 1817 ई० में लॉटरी कमेटी का गठन किया गया। यह कमेटी नगर सुधार के लिए आवश्यक पैसे का प्रबंध जनता में लॉटरी बेचकर करती थी, इसलिए लॉटरी कमेटी के नाम से प्रसिद्ध थी। शहरों में यातायात के अच्छे साधनों की व्यवस्था करना, शिक्षा संस्थानों की स्थापना करना आदि नगर-नियोजन की अन्य चिंताएँ थीं।

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औपनिवेशिक शहर में सामने आने वाले नए तरह के सार्वजनिक स्थान कौन से थे? उनके क्या उद्देश्य थे?

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औपनिवेशिक शहर में सामने आने वाले नए तरह के सार्वजनिक स्थान और उनके उद्देश्य निम्नलिखित थे

⦁    औपनिवेशिक शहर अर्थात् मुम्बई, मद्रास और कलकत्ता में फैक्ट्रियाँ या व्यापारिक केंद्र स्थापित किए गए जहाँ पर व्यापारिक गतिविधियाँ, सामान का लेन-देन और गोदामों में उन्हें रखा जाता था। इन फैक्ट्रियों में कंपनी के कर्मचारी और अधिकारी भी रहते थे।

⦁    इन शहरों को बन्दरगाहों के रूप में इस्तेमाल किया गया। यहाँ जहाजों को लादने और उनसे उतारने का काम होता था।

⦁    शहरों के नक्शे बनवाए गए, आँकड़े इकट्ठे किए गए, सरकारी रिपोर्ट प्रकाशित की गई। ये सभी दस्तावेज प्रशासनिक दफ्तरों में होते थे। शहरों के रख-रखाव के लिए नगरपालिकाएँ बनाई गईं जो शहरों में जलापूर्ति, सड़क निर्माण, स्वास्थ्य जैसी सेवाएँ उपलब्ध करवाती थीं तथा लोगों की मृत्यु और जन्म के रिकॉर्ड भी रखती थीं।।

⦁    1853 के बाद से इन शहरों में रेलवे स्टेशन, रेलवे वर्कशाप और रेलवे कॉलोनियाँ और रेलवे लाइन के नेटवर्क बिछाए गए।
इस प्रकार नए शहर बंदरगाहों, किलों, सेवा केन्द्रों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थानों से भर गए।

⦁    19वीं शताब्दी के मध्य में औपनिवेशिक शहरों को दो हिस्सों में बाँट दिया गया जिन्हें क्रमशः सिविल लाइन या श्वेत लोगों का क्षेत्र और देसियों के क्षेत्र या अश्वेत टाउन कहा गया। इनमें क्रमशः श्वेत रंग के यूरोपीय और दूसरे भाग में अश्वेत रंग के देसी या भारतीय लोग रहते थे।

⦁    भूमिगत पाइप द्वारा जलापूर्ति की व्यवस्था करने के साथ-साथ पक्की नालियाँ भी निर्मित की गईं। इसका उद्देश्य सफाई को । सुनिश्चत करना था।

⦁    कुछ शहरों को औपनिवेशिक हिल स्टेशनों के रूप में विकसित किया गया; जैसे—शिमला, दार्जिलिंग, माउट आबू, मनाली। इनका उद्देश्य गर्मी के दिनों में प्रशासनिक गतिविधियों को चलाना और उच्च अधिकारियों को स्वास्थ्यवर्धक जलवायु और वातावरण वाला आवास प्रदान करना था।

⦁    नए शहरों में घोड़ागाड़ी, ट्राम, बसें, टाउन हाल, सार्वजनिक पार्क, सिनेमा हाल, रंगशालाएँ, प्रत्येक क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विभिन्न सेवक, कर्मचारी, शिक्षक, एकाउंटेंट और शिक्षा से जुड़ी संस्थाएँ; जैसे-स्कूल, कॉलेज, लाइब्रेरी आदि उपलब्ध | थे। कुछ सार्वजनिक केन्द्र या सामुदायिक भवन भी थे यहाँ समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ आदि लोगों को उपलब्ध हो सकती थीं।

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औपनिवेशिक संदर्भ में शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए जनगणना संबंधी आँकड़े किस हद तक उपयोगी | होते हैं?

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औपनिवेशिक शासनकाल में शहरों के विस्तार पर नज़र रखने के उद्देश्य से नियमित रूप से जनगणना की जाती थी। 1872 ई० में अखिल भारतीय जनगणना का प्रथम प्रयास किया गया। तत्पश्चात् 1881 ई० से दशकीय अर्थात् प्रत्येक 10 वर्षों में की जाने वाली जनगणना व्यवस्था को नियमित रूप दे दिया गया। औपनिवेशिक संदर्भ में शहरीकरण के रुझानों को समझने में जनगणना संबंधी आँकड़ों से महत्त्वपूर्ण एवं ठोस जानकारी उपलब्ध होती है

⦁    जनसंख्या संबंधी आँकड़ों से औपनिवेशिक भारत के विभिन्न शहरों में रहने वाले श्वेत और अश्वेत लोगों की कुल संख्या को सरलतापूर्वक पता लगाया जा सकता है।
⦁    जनगणना संबंधी आँकड़ों से श्वेत एवं अश्वेत शहरों, शहरों के निर्माण, विस्तार, उनमें रहने वाले लोगों के जीवन-स्तर, | भयंकर बीमारियों के जनता पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों आदि के विषय में भी महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है।
⦁    जनगणना संबंधी आँकड़ों से शहरों में रहने वाले लोगों की उम्र, लिंग, जाति एवं व्यवसाय आदि के विषय में भी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।
⦁    जनगणना संबंधी आँकड़ों से जनसंख्या के विषय में प्राप्त सामाजिक जानकारियों को सुगम आँकड़ों में परिवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार, जनसंख्या संबंधी आँकड़ों से औपनिवेशिक संदर्भ में शहरीकरण के रुझानों को समझने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है।

जनगणना संबंधी आँकड़ों की भ्रामकता–विद्वान इतिहासकारों के विचारानुसार जनगणना संबंधी आँकड़े अनेक रूपों में भ्रामक सिद्ध हो सकते हैं, इसलिए उनका प्रयोग अत्यधिक सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।

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नमक कानून स्वतंत्रता संघर्ष का महत्त्वपूर्ण मुद्दा क्यों बन गया था?

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नमक एक बहुमूल्य राष्ट्रीय संपदा थी जिस पर औपनिवेशिक सरकार ने अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया था। गाँधी जी की दृष्टि में यह एकाधिकार एक प्रकार से चौतरफा अभिशाप था। यह जनसामान्य को एक महत्त्वपूर्ण सुलभ ग्राम-उद्योग से ही वंचित नहीं कराता था अपितु प्रकृति द्वारा बहुतायत में उत्पादित संपदा का भी विनाश करता था। इसलिए गाँधी जी ने औपनिवेशिक शासन के विरोध के लिए नमक का प्रतीक रूप में चुनाव किया और शीघ्र ही नमक कानून स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन गया।

इसके प्रमुख कारण इस प्रकार थेः

⦁    नमक कानून ब्रिटिश भारत के सर्वाधिक घृणित कानूनों में से एक था। इसके अनुसार नमक के उत्पादन और विक्रय पर राज्य का एकाधिकार स्थापित था।

⦁    जनसामान्य नमक कानून को घृणा की दृष्टि से देखता था। प्रत्येक घर में नमक भोजन का एक अपरिहार्य अंग था। किन्तु भारतीयों द्वारा घरेलू प्रयोग के लिए भी स्वयं नमक बनाए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। नमक कानून
के कारण भारतीयों को विवशतापूर्वक दुकानों से ऊँचे मूल्यों पर नमक खरीदना पड़ता था।

⦁    नमक पर राज्य का एकाधिकार अत्यधिक अलोकप्रिय था। जनसामान्य में इस कानून के प्रति असंतोष व्याप्त था।

⦁    नमक उत्पादन पर सरकार के एकाधिकार ने लोगों को एक महत्त्वपूर्ण किन्तु सरलतापूर्वक उपलब्ध ग्राम-उद्योग से वंचित कर दिया था।

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महात्मा गाँधी ने स्वयं को सामान्य लोगों जैसा दिखाने के लिए क्या किया?

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महात्मा गाँधी ने स्वयं को सामान्य लोगों जैसा दिखाने के लिए अनेक कदम उठाएगाँधी ने भारतीय जनता की दशा को सुधारने के लिए लगभग एक वर्ष तक देश के विभिन्न भागों को भ्रमण किया। गाँधी जी की प्रथम महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक उपस्थिति फरवरी 1916 ई० में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में हुई। गाँधी जी ने समारोह में उपस्थित भद्रजनों एवं अनुपस्थित लाखों गरीबों के मध्य दिन-प्रतिदिन बढ़ती हुई आर्थिक विषमता के प्रति चिंता व्यक्त की। समारोह में बोलते हुए गाँधी जी ने कहा, “हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से ही हो सकती है। न तो वकील, न डॉक्टर और न ही जमींदार इसे सुरक्षित रख सकते हैं।” इस प्रकार गाँधी जी ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में संपूर्ण भारतीय जनता को साथ लेकर चलना चाहते थे। 1922 ई० तक गाँधी जी जन नेता बन चुके थे। सामान्यजन गाँधी जी के प्रशंसक थे और उन्हें सम्मानपूर्वक महात्मा जी’ कहते थे। गाँधी जी अन्य नेताओं के समान न तो सामान्य जनसमूह से अलग रहते थे और न ही उनसे अलग दिखते थे।

गाँधी जी सामान्य लोगों की ही भाषा बोलते थे और उनकी ही तरह के वस्त्र पहनते थे। सामान्यजनों के साथ गाँधी जी की पहचान उनके वस्त्रों से विशेष रूप से झलकती थी। उल्लेखनीय है कि अन्य राष्ट्रवादी नेता पाश्चात्य शैली के सूट अथवा भारतीय बन्दगला जैसे औपचारिक वस्त्रों को धारण करते थे। किन्तु गाँधी जी की वेशभूषा अत्यधिक सीधी-सादी थी। वे जनसामान्य के मध्य में एक साधारण-सी धोती में जाते थे।

1921 ई० में दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान गाँधी जी ने अपना सिर मॅडवा लिया था और गरीबों के साथ तादात्म्य स्थापित करने के लिए वे सूती वस्त्र पहनने लगे थे। वे प्रतिदिन कुछ समय चरखा चलाने में व्यतीत करते थे। उल्लेखनीय है कि पारम्परिक भारतीय समाज में ऊँची जातियाँ सूतकताई के कार्य को अच्छा नहीं समझती थीं। जनसामान्य के प्रति गाँधी जी का दृष्टिकोण अत्यधिक सहानुभूतिपूर्ण था। उनकी सीधी-सादी जीवनशैली एवं हाथों से काम करने के प्रति उनका लगाव उन्हें जनसामान्य के बहुत निकट ले आया था।

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एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों के समक्ष सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोप की चुनौतियों की तुलना में कैसे भिन्न थीं?

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एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों के सामने सुरक्षा की चुनौतियाँ यूरोप की तुलना में निम्न प्रकार भिन्न थीं-

⦁    एशिया तथा अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देशों का संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, जबकि यूरोप के दो देशों को निषेधाधिकार (वीटो) का अधिकार हासिल है। इस तरह से ये देश अधिक सुरक्षित हैं।
⦁    एशिया तथा अफ्रीका के देशों में औद्योगिकीकरण बाल अवस्था में है, जबकि यूरोपीय देशों में उद्योगों का चरम विकास हो चुका है। वे कच्चे माल तथा अन्य उपयोगी सामग्री के लिए एशिया तथा अफ्रीका के देशों का शोषण करने को तैयार रहते हैं।
⦁    एशिया तथा अफ्रीका के देशों को अपने पड़ोसी देशों के हमलों का भय तथा देश के भीतर भी सैन्य संघर्ष और साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ने का खतरा है। इसके विपरीत यूरोपीय देशों में ऐसा नहीं है।
⦁    एशियाई तथा अफ्रीकी देशों में प्रति व्यक्ति निम्न आय है तथा जनसंख्या में तेजी से बढ़ोतरी होती चली जा रही है जबकि यूरोपीय देशों की स्थिति इसके ठीक विपरीत है।

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सातवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में बेदुइओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं?

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बेदुइओं के जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(i) अनेक अरब कबीले बेदूइन या बद्दू या खानाबदोश होते थे।
(ii) ये अपने खाद्य (खजूर) और अपने ऊँटों के लिए चारे की तलाश में रेगिस्तान के सूखे क्षेत्रों से हरे-भरे क्षेत्रों (नखलिस्तान) की ओर जाते रहते थे।
(iii) इनमें से कुछ नगरों में बस गए और व्यापार करने लगे।
(iv) खलीफा के सैनिकों में ज्यादा बदू ही थे। ये रेगिस्तान के किनारे बसे शिविर शहरों; जैसे कुफा तथा बसरा में रहते थे।

32337.

किसान महात्मा गाँधी को किस तरह देखते थे?

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किसान गाँधी जी को अपना मसीहा एवं अनेक लोकोपकारी और चमत्कारिक शक्तियों से संपन्न समझते थे। गाँधी जी की चमत्कारिक शक्तियों के विषय में स्थान-स्थान पर अनेक प्रकार की अफ़वाहों का प्रसार हो रहा था। कुछ स्थानों पर जनसामान्य का यह विश्वास बन गया था कि राजा ने उन्हें किसानों के कष्टों को दूर करने तथा उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए भेजा है और उनके पास इतनी शक्ति थी कि वे सभी अधिकारियों के निर्देशों को अस्वीकृत कर सकते थे। कुछ अन्य स्थानों पर गाँधी जी की शक्ति को अंग्रेज बादशाह से भी अधिक बताया गया और यह दावा किया गया कि उनके आगमन से औपनिवेशिक शासक भयभीत होकर स्वतः ही भाग जाएँगे।

इस प्रकार की अफवाहें भी जोर पकड़ने लगीं कि किसी में भी गाँधी जी का विरोध करने की शक्ति नहीं थी और उनका विरोध करने वालों को भयंकर परिणाम भुगतने पड़ते थे। अनेक ग्रामों में यह अफ़वाह थी कि गाँधी जी की आलोचना करने वाले लोगों के घर रहस्यात्मक ढंग से गिर गए थे अथवा खेतों में खड़ी उनकी हरी-भरी फसल बिना किसी कारण के ही नष्ट हो गई थी। भारतीय जनसंख्या के एक विशाल भाग का निर्माण करने वाले किसान गाँधी जी की सात्विक जीवन-शैली तथा उनके द्वारा ग्रहण किए गए धोती और चरखा जैसे प्रतीकों से अत्यधिक प्रभावित थे। किसानों में गाँधी जी ‘गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराज’ अथवा ‘महात्मा’ जैसे अनेक नामों से प्रसिद्ध थे। वे उन्हें अपना उद्धारक मानते थे और उनका विश्वास था कि गाँधी जी ही उन्हें भू-राजस्व की कठोर दरों तथा ब्रिटिश अधिकारियों की दमनात्मक गतिविधियों से बचा सकते हैं, वे उनकी मान-मर्यादा के रक्षक हैं तथा उनकी स्वायत्तता उन्हें वापस दिलवा सकते हैं।

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अठारहवीं सदी में शहरी केंद्रों का रूपांतरण किस तरह हुआ?

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अठारहवीं सदी में शहरी केन्द्रों का रूपांतरण बड़ी तेजी के साथ हुआ। यूरोपीय मूलत: अपने-अपने देशों के शहरों से आए थे। उन्होंने औपनिवेशिक सरकार के काल में शहरों का विकास किया। पुर्तगालियों ने 1510 में पणजी, डचों ने 1605 में मछलीपटनम, अंग्रेजों ने 1639 में मद्रास (चेन्नई), 1661 में मुम्बई और 1690 में कलकत्ता (कोलकाता) बसाए, तो फ्रांसीसियों ने 1673 में पांडिचेरी नामक शहर बसाया। इनमें से अनेक शहर समुद्र के किनारे थे। व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र होने के साथ-साथ प्रशासनिक कार्यकलापों के भी केन्द्र थे। अनेक व्यापारिक गतिविधियों के साथ इन शहरों का विस्तार हुआ। आसपास के गाँवों में अनेक सस्ते मजदूर, कारीगर, छोटे-बड़े व्यापारी, सौदागर, कामगार, बुनकर, रंगरेज, धातु-कर्म करने वाले लोग रहने लगे। इन शहरों में ईसाई मिशनरियाँ काफी सक्रिय थीं। अनेक स्थानों पर पश्चिमी शैली की इमारतें, चर्च और सार्वजनिक महत्त्व की इमारतें बनाई गईं। स्थापत्य में पत्थरों के साथ ईंट, लकड़ी, प्लास्टर आदि का प्रयोग किया गया।

छोटे गाँव कस्बे और कस्बे छोटे-बड़े शहर बन गए। आस-पास के किसान तीर्थ करने के लिए शहरों में आते थे। अकाल के दिनों में प्रभावित लोग कस्बों और शहरों में इकट्ठे हो जाते थे, लेकिन जब कस्बों पर हमले होते थे तो कस्बों के लोग ग्रामीण क्षेत्रों में शरण लेने के लिए चले जाते थे। व्यापारी और फेरी वाले लोग कस्बों से गाँव में जाकर कृषि उत्पाद और कुछ कुटीर व छोटे पैमाने के उद्योग-धंधों में तैयार माल बिक्री के लिए शहरों और कस्बों में लाते थे। इससे बाज़ार का विस्तार हुआ। भोजन और पहनावे की नयी शैलियाँ विकसित हुईं। अनेक शहरों की चारदीवारियों को 1857 के विद्रोह के बाद तोड़ दिया गया; जैसे-दिल्ली का शाहजहाँनाबाद। दक्षिण भारत में मदुरई, काँचीपुरम् मुख्य धार्मिक केन्द्र थे। धीरे-धीरे वह महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र भी बन गए। 18वीं शताब्दी में शहरी जीवन में अनेक बदलाव आए।

⦁    राजनीतिक तथा व्यापारिक पुनर्गठन के साथ पुराने नगर; जैसे-आगरा, लाहौर, दिल्ली पतनोन्मुख हुए तो नए शहर मद्रास (चेन्नई), मुम्बई, कलकत्ता (कोलकाता) शिक्षा, व्यापार, प्रशासन, वाणिज्य आदि के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गए। विभिन्न समुदायों, जातियों, वर्गों, व्यवसायों के लोग यहाँ रहने लगे।
⦁    नयी क्षेत्रीय ताकतों के विकास से क्षेत्रीय राजधानी; जैसे-अवध की राजधानी लखनऊ, दक्षिण के अनेक राज्यों की राजधानियाँ; जैसे-तंजौर, पूना, श्रीरंगपट्टनम, नागपुर, बड़ौदा के बढ़ते महत्त्व दिखाई दिए।
⦁    व्यापारी, प्रशासक, शिल्पकार तथा अन्य लोग पुराने मुगल केंद्रों से नयी राजधानियों की ओर काम तथा रोजगार की तलाश | में आने लगे।
⦁    नए राज्यों और उदित होने वाली नयी राजनीतिक शक्तियों में प्रायः निरंतर लड़ाइयाँ होती रहती थीं। इसका परिणाम यह हुआ। कि भाड़े के सिपाहियों को भी तैयार रोजगार मिल जाता था।
⦁    कुछ स्थानीय विशिष्ट लोगों तथा उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य से संबंधित अधिकारियों ने भी इस मौके का उपयोग करके ‘पुरम्’ और ‘गंज’ जैसी शहरी बस्तियों में अपना विस्तार किया।
⦁    राजनैतिक विकेन्द्रीयकरण का प्रभाव सर्वत्र एक जैसा नहीं था। कई स्थानों पर नए सिरे से आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं, कुछ अन्य स्थानों पर लूटपाट तथा राजनीतिक अनिश्चितता, आर्थिक पतन में बदल गई।

जो शहर व्यापार तंत्रों से जुड़े हुए थे, उसमें परिवर्तन दिखाई देने लगे। यूरोपीय कम्पनियों ने अनेक स्थानों पर अनेक आर्थिक आधार या फैक्ट्रियाँ स्थापित कर लीं। 18वीं शताब्दी के अंत तक एकल आधारित साम्राज्य का स्थान, शक्तिशाली यूरोपीय साम्राज्यों ने ले लिया। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, वाणिज्यवाद और पूँजीवाद शक्तियाँ अब समाज के स्वरूप को परिभाषित करने लगी थीं। मध्य अठारहवीं शताब्दी से परिवर्तन का नया चरण शुरू हुआ। अब व्यापारिक गतिविधियाँ अन्य स्थानों पर केन्द्रित होने लगीं।

मुगल काल में जो तीन शहर बहुत प्रगति पर थे-सूरत, मछलीपट्नम और ढाका, उनका निरंतर पतन होता चला गया। नए शहरों में नयी-नयी संस्थाएँ विकसित हुईं और शहरी स्थानों को नए ढंग से व्यवस्थित किया गया। अनेक जगहों पर (पश्चिमी शिक्षा केन्द्र, अस्पताल, रेलवे दफ्तर, व्यापारिक गोदाम, सरकारी कार्यालय आदि) नए-नए रोजगार विकसित हुए। दूर-दूर के प्रदेशों और गाँवों से पुरुष, महिलाएँ औपनिवेशिक शहरों की ओर उमड़ने लगे। देखते-ही-देखते 1800 तक जनसंख्या की दृष्टि से औपनिवेशिक शहर देश के सबसे बड़े शहर बन गए।

32339.

प्रमुख भारतीय व्यापारियों ने औपनिवेशिक शहरों में खुद को किस तरह स्थापित किया?

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18वीं शताब्दी में राजनैतिक एवं व्यापारिक पुनर्गठन के परिणामस्वरूप पुराने नगरों का पतन होने लगा और नए-नए नगर विकसित होने लगे। मुग़ल सत्ता के पतनोन्मुख हो जाने के कारण उसके शासन से संबद्ध नगर भी पतन को प्राप्त होने लगे। भारत में राजनैतिक नियंत्रण की प्राप्ति के साथ-साथ कंपनी के व्यापार में वृद्धि होने लगी और मद्रास, कलकत्ता एवं बंबई जैसे औपनिवेशिक बंदरगाह नगर तीव्र गति से नवीन आर्थिक राजधानियों के रूप में विकसित होने लगे। शीघ्र ही ये नगर औपनिवेशिक सत्ता एवं प्रशासन के महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गए। इन औपनिवेशिक शहरों के प्रति भारतीयों विशेष रूप से भारतीय व्यापारियों का आकर्षण बढ़ने लगा और वे स्वयं को इन शहरों में स्थापित करने लगे।

⦁    यूरोपीयों से लेन-देन करने वाले भारतीय व्यापारी, कारीगर एवं कामगार औपनिवेशिक शहरों में बसने लगे। वे किलेबंद क्षेत्र | से बाहर स्थापित अपनी पृथक् बस्तियों में रहते थे।
⦁    भारत में राजनैतिक सत्ता एवं संरक्षण ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में आ जाने पर दुभाषिए, बिचौलिए, व्यापारी तथा माल की आपूर्ति करने वाले भारतीय भी इन शहरों के महत्त्वपूर्ण अंग बन गए।
⦁    19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत में रेलवे नेटवर्क का तीव्र गति से विस्तार होने के कारण औपनिवेशिक नगर शेष भारत से जुड़ गए और कच्चे माल एवं श्रम के स्रोत देहाती एवं दूरवर्ती क्षेत्र भी इन बंदरगाह शहरों से जुड़ने लगे। अतः भारतीय व्यापारी इन नगरों में अपने उद्योग स्थापित करने लगे। उदाहरण के लिए 1850 के दशक के बाद भारतीय व्यापारियों एवं उद्यमियों द्वारा बंबई में सूती कपड़ा मिलों की स्थापना की गई।
⦁    धनी भारतीय एजेंटों एवं बिचौलियों ने बाजारों के आस-पास ब्लैक टाउन में परंपरागत शैली के आधार पर दालानी मकानों | का निर्माण करवाया।
⦁    उन्होंने भविष्य में पैसा लगाने और अधिकांश लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से शहर के अंदर बड़ी-बड़ी जमीनों को भी खरीद लिया।
⦁    शीघ्र ही वे पाश्चात्य जीवन-शैली का अनुकरण करने लगे। अपने अंग्रेज़ स्वामियों को प्रभावित करने के उद्देश्य से उन्होंने त्योहारों के अवसरों पर रंगीन दावतों का आयोजन करना प्रारंभ कर दिया।
⦁    समाज में अपनी हैसियत दिखाने के लिए वे मंदिरों का भी निर्माण करवाने लगे। नए-नए व्यवसायों के विकसित होने के कारण शहरों में क्लर्को, शिक्षकों, वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और अकाउंटेंट्स आदि की माँग में निरन्तर वृद्धि होने लगी। ‘मध्यवर्ग’ का विस्तार होने लगा और औपनिवेशिक शहरों में शिक्षित भारतीयों का महत्त्व बढ़ने लगा।

32340.

निम्नलिखित में से कौन-सा इस्लाम धर्म का पवित्र ग्रन्थ है?(क) कुरान शरीफ(ख) हदीस(ग) एन्जील(घ) ओल्ड टेस्टामेण्ट

Answer»

सही विकल्प है (क) कुरान शरीफ

32341.

फिरदौसी ने कौन-सी पुस्तक लिखी?

Answer»

फिरदौसी ने ‘शाहनामा’ नामक पुस्तक लिखी थी।

32342.

अब्बासी खलीफाओं की राजनधानी कहाँ स्थित थी?

Answer»

मध्यकाल में अब्बासी ख़लीफाओं की राजधानी बगदाद में स्थित थी। यह स्थान वर्तमान इराक की राजधानी है।

32343.

उमर खय्याम क्यों प्रसिद्ध है?

Answer»

उमर खय्याम अपनी रूबाइयों के लिए प्रसिद्ध है।

32344.

इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम लिखिए।

Answer»

इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक ‘कुरान शरीफ’ है।

32345.

रसायनशास्त्र में अरब निवासी क्या-क्या बनाना जानते थे?

Answer»

अरब निवासी रसायनशास्त्र में चॉदी का घोल, पोटाश, शोरे एवं गन्धक का तेजाब तथा इत्र आदि बनाना जानते थे।

32346.

अरब में मुस्लिम साम्राज्य के संस्थापक कौन थे?(क) खलीफा अबू बकर(ख) खलीफा उमर(ग) पैगम्बर मुहम्मद(घ) खलीफा अली

Answer»

सही विकल्प है (ख) खलीफा उमर

32347.

अली के काल में इस्लाम जगत में क्या परिवर्तन आया?

Answer»

इस्लाम के चौथे खलीफा अली के शासनकाल में मुसलमान दो सम्प्रदायों-शिया और सुन्नी में विभाजित हो गया।

32348.

अब्बासी क्रान्ति’ से आपका क्या तात्पर्य है?

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उमय्यदों के विरुद्ध ‘दावा’ नामक एक सुसंगठित आंदोलन हुआ, फलस्वरूप उनका पतन हो गया। सन् 1750 में उनके स्थान पर मक्काई मूल के अन्य परिवार (अब्बासिदों) को स्थापित कर दिया गया। वास्तव में अब्बासिदों ने उमय्यद शासन की जमकर आलोचना की और पैगम्बर द्वारा स्थापित मूल इस्लाम को पुनः बहाल कराने का वादा किया। वे उसमें सफल भी रहे। इसे ही अब्बासी । क्रान्तिं की संज्ञा दी गई है। इस क्रान्ति से राजवंश में परिवर्तन के साथ राजनीतिक संरचना में बहुत परिवर्तन हुआ।

32349.

यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा?

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यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्ध का निम्नलिखित प्रभाव पड़ा

(i) मुस्लिम राज्यों ने अपने ईसाई प्रजाननों के प्रति कठोर रवैया अपनाया। विशेष रूप से यह स्थिति युद्धों में देखी गई।
(ii) मुस्लिम सत्ता की बहाली के पश्चात् भी पूर्व तथा पश्चिम के मध्य इटली के व्यापारिक समुदायों का अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव था।

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निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में क्या पता चलता है? ये स्रोत सरकारी ब्योरों से किस तरह भिन्न होते हैं?

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निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। इनसे संबंधित व्यक्ति की विचारधारा एवं उसके जीवन-चरित्र के विषय में पर्याप्त सीमा तक सही अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए गाँधी जी के पत्रों एवं उनकी आत्मकथा से गाँधी जी एवं उनकी विचारधारा को समझने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। व्यक्तिगत पत्रों से हमें संबंधित व्यक्ति के व्यक्तिगत विचारों का परिचय मिलता है। पत्रों में लेखक अपने क्रोध, पीड़ा, असंतोष, बेचैनी, आशाओं एवं हताशाओं को व्यक्त कर सकता है, किन्तु सार्वजनिक वक्तव्यों में वह ऐसा नहीं कर सकता। उल्लेखनीय है कि गाँधी जी द्वारा अपने पत्र ‘हरिजन’ में लोगों से मिलने वाले पत्रों को प्रकाशित किया जाता था।

जवाहरलाल नेहरू को राष्ट्रीय आंदोलन की अवधि में अनेक लोगों ने पत्र लिखे थे। नेहरू जी ने उन पत्रों को संकलित करके उस संकलन को ‘ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स’ (पुराने पत्रों का पुलिंदा) के नाम से प्रकाशित कराया था। इन पत्रों से पता लगता है कि 1920 के दशक में जवाहरलाल नेहरू समाजवादी विचारों से प्रभावित होने लगे थे। 1928 ई० में जब वे यूरोप से भारत वापस आए, तो उन पर समाजवाद का पर्याप्त प्रभाव था। भारत आने पर जब उन्होंने जयप्रकाश नारायण, नरेन्द्र देव और एन.जी. रंगा जैसे सुप्रसिद्ध समाजवादी नेताओं के साथ मिलकर कार्य करना प्रारम्भ किया, तो कांग्रेस में समाजवादियों एवं रूढ़िवादियों के मध्य एक खाई-सी उत्पन्न हो गई थी। 1936 ई० में कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद नेहरू फासीवाद के कट्टर विरोधी हो गए थे और वे मजदूरों एवं किसानों की माँगों का समर्थन करने लगे थे।

नेहरू के समाजवादी वक्तव्यों से कांग्रेस के रूढ़िवादी नेता इतने अधिक चिन्तित थे कि उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद और सरदार पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस वर्किंग कमेटी से त्यागपत्र दे देने की भी धमकी दे दी थी। इन दोनों समाजवादी विचारों से प्रभावित युवा वर्ग और रूढ़िवादी वर्ग के मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न होने पर प्रायः गाँधी जी को मध्यस्थ का कार्य करना पड़ता था। इन पत्रों से कांग्रेस की आंतरिक कार्य-प्रणाली तथा राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप के विषय में भी महत्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध होती है। इनसे स्पष्ट होता है कि वैचारिक मतभेद होते हुए भी। कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं का उद्देश्य संगठन में एकता को बनाए रखना था। उल्लेखनीय है कि व्यक्ति-विशेष को लिखे जानेवाले पत्र व्यक्तिगत होते हैं, किन्तु कुछ रूपों में वे जनता के लिए भी होते हैं। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि प्रायः लोग व्यक्तिगत पत्रों में भी अपने विचारों को स्वतंत्रतापूर्वक व्यक्त नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें किसी भी पत्र के प्रकाशित हो जाने की आशंका बनी रहती है।

आत्मकथाओं से भी किसी व्यक्ति के जीवन तथा उसके विचारों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। जब कोई व्यक्ति अपनी जीवनकथा लिखता है, तो उसे आत्मकथा कहा जाता है। किन्तु आत्मकथाओं के अध्ययन से किसी निष्कर्ष को निकालते हुए हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि आत्मकथाओं का लेखन प्रायः स्मृति के आधार पर किया जाता है। उनसे स्पष्ट होता है कि लेखक को क्या याद रहा, वह किन चीजों को महत्त्वपूर्ण समझता था, क्या याद रखना चाहता था अथवा अपने जीवन को औरों की दृष्टि में किस प्रकार दिखाना चाहता था। आत्मकथा का लेखन एक प्रकार से अपनी तसवीर को बनाना है। लेखक को आत्मकथा के लेखन में ईमानदार रहना चाहिए, किन्तु हमें वह सब भी देखने का प्रयत्न करना चाहिए, जिसे लेखक दिखाना नहीं चाहता; हमें ऐसे विषयों में उसकी चुप्पी के कारणों को समझने का प्रयास करना चाहिए।

सरकारी ब्योरों में भिन्नता निजी पत्रों एवं आत्मकथाओं तथा सरकारी ब्योरों में पर्याप्त भिन्नता पाई जाती है। निजी पत्रों और आत्मकथाओं में विभिन्न विचारों और घटनाओं को यथार्थ विवरण मिलता है। किन्तु सरकारी ब्योरों में विचारों एवं घटनाओं का निष्पक्ष विवरण उपलब्ध नहीं होता। हमें याद रखना चाहिए कि औपनिवेशिक शासन ऐसे तत्वों, जिन्हें वे अपने विरुद्ध समझते थे, पर सदैव कड़ी दृष्टि रखते थे। ऐसे तत्वों एवं उनकी गतिविधियों का विस्तृत उल्लेख हमें सरकारी रिपोर्टों में मिलता है। किन्तु उसे निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता। इसका प्रमुख कारण यह है कि औपनिवेशिक

अधिकारी ऐसे तत्वों एवं उनकी गतिविधियों को अपने दृष्टिकोण से देखते थे। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत पुलिसकर्मियों एवं अन्य अधिकारियों द्वारा लिखे गए पत्रों एवं रिपोर्टों को गोपनीय रखा जाता था। उल्लेखनीय है कि बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों से गृह-विभाग द्वारा पाक्षिक रिपोर्टे (हर पंद्रह दिन अथवा हर पखवाड़े में तैयार की जानेवाली रिपोर्ट) तैयार की जाने लगी थीं।

इन रिपोर्टों को स्थानीय क्षेत्रों से पुलिस से प्राप्त होनेवाली सूचनाओं के आधार पर तैयार किया जाता था। इन रिपोर्टों से यह भी स्पष्ट होता है कि समकालीन औपनिवेशिक अधिकारी किसी परिस्थिति विशेष को किस प्रकार देखते और समझते थे। राजद्रोह एवं विद्रोह की संभावना स्वीकार करते हुए भी वे इन आशंकाओं को आधारहीन बताकर स्वयं को आश्वस्त करना चाहते थे। नमक सत्याग्रह के काल की पाक्षिक रिपोर्टों का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि गृह-विभाग यह स्वीकार करने को कदापि तैयार नहीं था कि महात्मा गाँधी की गतिविधियों को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हो रहा था। उदाहरण के लिए, पुलिस की पाक्षिक रिपोर्टों में नमक यात्रा का चित्रण एक ऐसे नाटक एवं करतब के रूप में किया जा रहा था, जिसका प्रयोग ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ऐसे लोगों को गोलबंद करने के लिए किया जा रहा था, जो वास्तव में इस शासन के विरुद्ध आवाज उठाने के इच्छुक नहीं थे, क्योंकि वे इस शासन के अंतर्गत सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे। पुलिस की पाक्षिक रिपोर्टों के अनुसार यह भारतीय नेताओं को एक हताश प्रयास था।

इस प्रकार, सरकारी ब्योरों के प्रत्येक विवरण को यथार्थ घटनाक्रम का वास्तविक उल्लेख नहीं माना जा सकता। वास्तव में, इन विवरणों से ऐसे अफसरों की आशंकाओं एवं बेचैनियों का परिचय मिलता है, जो किसी आंदोलन को नियंत्रित कर पाने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहे थे तथा जो उसके प्रसार को लेकर अत्यधिक चिंतित थे। वे यह निर्णय लेने में असमर्थ थे कि गाँधी जी को बंदी बनाया जाना चाहिए अथवा नहीं। वे यह भी नहीं समझ पा रहे थे कि गाँधी जी को बंदी बनाए जाने का परिणाम क्या होगा। इस प्रकार निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि निजी पत्रों और आत्मकथाओं के विवरण सरकारी ब्योरों के विवरणों से अनेक रूपों में भिन्न होते हैं।