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This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

32351.

मक्का और मदीना क्यों प्रसिद्ध हैं?

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मक्का और मदीना सऊदी अरब के प्रमुख नगर हैं। मक्का में इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब का जन्म हुआ था। हजरत मुहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म चलाया था। मदीना में मुहम्मद साहब ने हिजरत की थी। मक्का मुसलमानों का प्रमुख तीर्थस्थल है। प्रतिवर्ष लाखों मुसलमान यहाँ हज करने के लिए आते हैं। ये दोनों नगर इस्लाम धर्म के पवित्र स्थल होने के कारण प्रसिद्ध हैं।

32352.

बगदाद कहाँ है और क्यों प्रसिद्ध है?

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बगदाद, अरब प्रायद्वीप के देश इराक की राजधानी है। मध्यकाल में यह नगर अब्बासी खलीफाओं की राजधानी था। बगदाद; अरब सभ्यता एवं संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र तथा व्यापार का भी प्रमुख केन्द्र होने के कारण प्रसिद्ध है।

32353.

धर्मयुद्ध से आपका क्या अभिप्राय है

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जेरूसलम और फिलिस्तीन के अधिकार के प्रश्न पर मुसलमानों और ईसाइयों में दो शताब्दियों (1096-1291) तक युद्ध हुए थे, उन्हें धर्मयुद्ध कहा जाता है।

32354.

सामाजिक एकता स्थापित करने के लिए मुहम्मद साहब ने कौन-से नियम बनाए थे?

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मुसलमानों में एकता की भावना का विकास करने के उद्देश्य से मुहम्मद साहब द्वारा निम्नलिखित नियम बनाए गए थे

1. इज्मा-सभी मुसलमानों को प्रत्येक क्षण, प्रत्येक स्थान पर, प्रत्येक परिस्थिति में इस्लाम के | सिद्धान्तों पर एकमत रहना चाहिए। 

2. सुन्ना-इस्लाम धर्म में निर्धारित कार्यों को आदर्श मानकर उनका पालन करना चाहिए। 

3. कयास-इस्लाम धर्म पर आधारित मुहम्मद साहब के उपदेशो के अर्थ एवं भाव को समझकर उन उपदेशों का यथावते पालन करना चाहिए।

32355.

अब्द-थल-मलिक के प्रमुख कार्य लिखिए।

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अब्द-थल-मलिक के प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे

⦁    उमय्यदवंशीय अब्द-थल-मलिक ने अरबी को प्रशासन की भाषा के रूप में अपनाया और सिक्के जारी किए।
⦁     सिक्कों पर रोमन और ईरानी की नकल समाप्त करके अरबी भाषा में लेख अंकित कराए।
⦁     उसने जेरूसलम में चट्टान के गुम्बद का निर्माण करवाया और अरब-इस्लामी पहचान में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

32356.

इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धान्त लिखिए।

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इस्लाम धर्म के प्रमुख सिद्धान्त
⦁    अल्लाह एक और निराकार-इस्लाम धर्म एक अल्लाह और उसके निराकार स्वरूप के सिद्धान्त को मानता है। उसके अनुसार अल्लाह सर्वज्ञ, सर्वोच्च और निराकार है।
⦁    कर्मवाद में विश्वास-इस्लाम धर्म, कर्म के सिद्धान्त का पोषक है। उसके अनुसार कर्मों से ही मनुष्य को जन्नत (स्वर्ग) या नरक (दोजख) प्राप्त होता है। न्याय-दिवस (कयामत) पर जीवों के कर्मों के लेखे-जोखे के आधार पर ही प्रत्येक जीव को उसके कर्मों का फल मिलता है।
⦁     पाँच कर्म सिद्धान्त-इस्लाम धर्म के पाँच कर्म-सिद्धान्त अग्र प्रकार हैं
(क) कलमा : ह इस्लाम धर्म का मूल मन्त्र है, जिसके अनुसार अल्लाह एक है, उसके अतिरिक्त कोई नहीं है और मुहम्मद साहब उसके पैगम्बर हैं।
(ख) रोजा-ईस्लाम धर्म मानता है कि रमजान के पवित्र महीनों में प्रत्येक मुसलमान को प्रातः से सूर्यास्त तक रोजा (व्रत) रखना चाहिए।
(ग) नमाज-प्रत्येक सच्चे मुसलमान को प्रतिदिन पाँच बार नमाज पढ़नी चाहिए।
(घ) जकात–प्रत्येक इस्लाम के अनुयायी को अपनी आय में से एक निश्चित राशि स्वेच्छा से गरीबों में दान देनी चाहिए। दान देना पुण्य का काम है।
(ङ) हज–प्रत्येक मुसलमान को अपने जीवनकाल में एक बार मक्का की तीर्थयात्रा (हज) पर अवश्य जाना चाहिए।

32357.

भारत में इस्लाम का प्रसार किस प्रकार हुआ?

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इस्लाम के इतिहास में वालिद प्रथम का शासनकाल खिलाफत के विस्तार के लिए विख्यात है। इसी के शासनकाल में 711 ई० में बसरा के गवर्नर हेज्जाज और उसके दामाद मुहम्मद इब्न-उल कासिम ने दक्षिणी भारत और बलूचिस्तान से सिन्ध पर आक्रमण किया। इसके पूर्व मुहम्मद बिन कासिम ने 710 ई० में 6000 सीरियाई सैनिकों की सेना लेकर मकराने पर कब्जा जमा लिया। यहीं से इसने बलूचिस्तान होते हुए 711-712 ई० में सिन्धु की निचली घाटी और सिन्धु नदी के मुहाने की भूमि पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। वहाँ जिन नगरों को जीता गया, उनमें समुद्री बन्दरगाह अल-देबुल और अल-नीरून थे। अल-देबुल में चालीस घन फुट वाली एक बुद्ध की प्रतिमा स्थापित थी। मुहम्मद बिन कासिम की यह विजय उत्तर में दक्षिणी पंजाब स्थित मुल्तान तक की गई, जहाँ गौतम बुद्ध का पवित्र तीर्थस्थल है। इस विजय से दक्षिणी पाकिस्तान के सिन्ध पर इस्लाम का स्थायी प्रभुत्व स्थापित हो गया तथा शेष भारत दसवीं शताब्दी के अन्त तक, जबकि महमूद गजनवी ने आक्रमण किया, अप्रभावित रहा। इस तरह सेमेटिक इस्लाम और भारतीय बौद्ध धर्म के बीच उसी प्रकार स्थायी रूप से सम्पर्क स्थापित हो गया, जिस प्रकार उत्तर में इस्लाम का तुर्की संस्कृति के साथ सम्पर्क स्थापित हुआ था। इस प्रकार दक्षिण में सिन्ध और उत्तर में काशगर और ताशकन्द खिलाफत की सुदूरपूर्वी सीमा बन गई और आगे भी बनी रही।

32358.

उलेमा कौन थे और उनका क्या कार्य था?

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उमेला धार्मिक विद्वान थे। ये कुरान से प्राप्त ज्ञान (इल्म) पैगम्बर को आदर्श व्यवहार (सुन्ना) का मार्गदर्शन करते थे। मध्यकाल में उलेमा अपना समय कुरान पर टीका (तफसीर) लिखने और मुहम्मद की प्रामाणिक उक्तियों और कार्यों को लेखबद्ध करने में लगाते थे। कुछ उलेमाओं ने कर्मकाण्डों (इबादत) के माध्यम से ईश्वर के साथ मुसलमानों के सम्बन्ध को नियन्त्रित करने और सामाजिक कार्यों (मुआमलात) के लिए शेष इनसानों के साथ मुसलमानों के सम्बन्धों को नियन्त्रित करने के लिए कानून तैयार करने का कार्य किया।

32359.

इस्लामी राज्यों में कृषि की उन्नति हेतु क्या प्रसास किए गए?

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इस्लामी राज्यों में कृषि की उन्नति हेतु निम्नलिखित उपाय किए गए

⦁     अनेक क्षेत्रों में विशेषकर नील घाटी, में राज्य ने सिंचाई प्रणालियों, बाँधों और नहरों के निर्माण, कुओं की खुदाई की व्यवस्था कराई।
⦁    पानी उठाने के लिए पनचक्कियों की व्यवस्था की गई।
⦁    इस्लामी कानून के अन्तर्गत उन लोगों को कर में छूट दी गई जो जमीन को पहली बार खेती के काम में लाते थे।
⦁     अनेक नई फसलों; यथा-कपास, सन्तरा, केला, तरबूज, पालक और बैंगन की खेती की गई और यूरोप को उनका निर्यात किया गया।

32360.

इस्लाम धर्म के प्रवर्तक कौन थे? इस्लाम धर्म की प्रमुख शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।

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इस्लाम धर्म के प्रवर्तक इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मुहम्मद साहब थे। संसार उन्हें पैगम्बर मुहम्मद के नाम से पुकारता है। उनका जन्म 570 ई० में मक्का में हुआ था। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला और माता का नाम अमीना था। 25 वर्ष की आयु में उन्होंने खदीजी नामक एक विधवा से विवाह किया। 619 ई० में जब खदीजा की मृत्यु हो गई तब उन्होंने आयशा नामक स्त्री से विवाह किया। उनकी छोटी पुत्री फातिमा ( अज-जोहरा या खूबसूरत), इस्लाम के चौथे खलीफा हजरत अली की पत्नी थी। मुहम्मद साहब प्रारम्भ से ही चिन्तनशील थे। 610 ई० में उन्हें दिव्य सन्देश की प्राप्ति हुई। 40 की आयु में मुहम्मद साहब ने अपने धर्म का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। अपने विरोधियों से बचने के लिए। मुहम्मद साहब ने ‘मक्का’ छोड़कर ‘मदीना’ की ओर प्रस्थान किया। इस्लाम के इतिहास में इस घटना का बहुत महत्त्व है और इसे “हिजरत’ कहा जाता है। इसी समय (622 ई०) से मुस्लिम पंचांग का पहला वर्ष अर्थात् हिजरी संवत् शुरू होता है। मुहम्मद साहब मदीना के सर्वोच्च शासक बन गए। उन्होंने अपने विरोधियों को परास्त किया और अपने धर्म का सम्पूर्ण अरब में प्रसार किया। 62 वर्ष की आयु में 632 ई० में उनकी मृत्यु हो गई। बाद में उनके अनुयायियों ने सारे संसार में इस्लाम धर्म का प्रचार किया।

इस्लाम धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ।
इस्लाम धर्म की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं

⦁     ईश्वर एक है तथा मुहम्मद साहब उसके पैगम्बर हैं।
⦁     सभी मनुष्य एक ही ईश्वर (अल्लाह) की सन्तानें हैं; उनमें किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
⦁     ईश्वर निराकार है और मूर्तिपूजा एक आडम्बर है।
⦁    आत्मा अजर और अमर है।
⦁    प्रत्येक मुसलमान को अपने धर्म की रक्षा करनी चाहिए।
⦁    मादक वस्तुओं, नृत्य, संगीत तथा चित्र-दर्शन आदि से दूर रहना चाहिए।
⦁     इस्लाम धर्म के अनुसार कयामत के दिन अच्छे काम करने वाले को जन्नत (स्वर्ग) तथा बुरे काम करने वाले को दोजख (नरक) में भेज दिया जाएगा।
⦁     इस धर्म के अनुसार ब्याज लेना, जुआ खेलना, सुअर का मांस खाना पाप है।
⦁     अल्लाह अपने पैगम्बरों को सच्चा ज्ञान (इल्हाम) स्वयं देता है।
⦁     प्रत्येक मुसलमान के पाँच अनिवार्य कर्तव्य हैं 
⦁     कलमा पढ़ना
⦁     प्रतिदिन पाँचों समय नमाज अता करना (पढ़ना)
⦁     रमजान के महीने में रोजे रखना
⦁    अपनी आय का चौथा भाग खैरात (दान) में देना तथा
⦁     जीवन में एक बार हज (मक्का-मदीना की तीर्थयात्रा) रना।

32361.

1940 के प्रस्ताव के जरिए मुस्लिम लीग ने क्या माँग की?

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मुस्लिम लीग की स्थापना 30 दिसम्बर, 1906 ई० को ढाका में की गई। यह भारतीय मुसलमानों की प्रथम राजनैतिक संस्था थी। भारतीय मुसलमानों की ब्रिटिश सरकार के प्रति राजभक्ति की भावनाओं में वृद्धि करना तथा उनके प्रति सरकार के संदेहों को दूर करना, इसका एक प्रमुख उद्देश्य था। शीघ्र ही लीग उत्तर प्रदेश के, विशेष रूप से अलीगढ़ के, संभ्रांत मुस्लिम वर्ग के प्रभाव में आ गई। ब्रिटिश प्रशासकों ने लीग का प्रयोग राष्ट्रीय आंदोलन को दुर्बल बनाने तथा शिक्षित मुस्लिम समुदाय को राष्ट्रीय आंदोलन की ओर आकर्षित होने से रोकने के साधन के रूप में किया।

1937 ई० में कांग्रेस द्वारा संयुक्त प्रान्त में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मंत्रिमण्डल बनाने से इनकार कर दिए जाने पर कांग्रेस और लीग के संबंध बहुत अधिक बिगड़ गए थे। लीग ने ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा लगाया और कांग्रेस को हिन्दुओं की संस्था बताया। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सभी कांग्रेसी मंत्रिमंडलों द्वारा नवम्बर 1939 ई० में त्यागपत्र दे दिए जाने पर मुस्लिम लीग अत्यधिक प्रसन्न हुई। लीग ने ‘द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत’ का प्रचार किया तथा मुस्लिम जनसामान्य एवं ब्रिटिश प्रशासकों को यह विश्वास दिलाने का भरसक प्रयास किया कि मुसलमानों के हित हिन्दू हितों से भिन्न है और अल्पसंख्यक मुसलमानों को बहुसंख्यक हिन्दुओं से भारी खतरा है।

मार्च 1940 ई० में लाहौर अधिवेशन में लीग ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सीमित स्वायत्तता की माँग की गई। प्रस्ताव में कहा गया कि “ भौगोलिक दृष्टि से सटी हुई इकाइयों को क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया जाए, जिन्हें बनाने में आवश्यकतानुसार क्षेत्रों का फिर से ऐसा समायोजन किया जाए कि हिन्दुस्तान के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों जैसे जिन भागों में मुसलमानों की संख्या अधिक है, उन्हें इकट्ठा करके ‘स्वतंत्र राज्य’ बना दिया जाए, जिनमें सम्मिलित इकाइयाँ स्वाधीन और स्वायत्त होंगी।”

32362.

अरबों, ईरानियों व तुर्को द्वारा स्थापित राज्यों की बहुसंस्कृतियों के उदाहरण दीजिए।

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अरबों, ईरानियों और तुर्को द्वारा स्थापित राज्य जातीय पक्षपातरहित थे। ये राज्य किसी एकल राजनीतिक व्यवस्था या किसी संस्कृति की एकल भाषा (अरबी) के बजाय सामान्य अर्थव्यवस्था व संस्कृति के कारण सम्बद्ध रहे। मध्यवर्ती इस्लामी देशों में व्यापारी, विद्वान् तथा कलाकार स्वतन्त्र रूप से आते जाते थे। इस प्रकार विचारों तथा तौर-तरीकों का प्रसार हुआ।

32363.

अरब सभ्यता और संस्कृति का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

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अरब सभ्यता एवं संस्कृति मध्य युग में अरब सभ्यता का विकास पश्चिमी एशिया में अधिक हुआ, जिसका संक्षिप्त विवेचन निम्नवत् है
1. शासन व्यवस्था :
इस्लाम के प्रमुख नेता को ‘खलीफा’ कहा जाता था। पहले तीन खलीफाओं की राजधानी मदीना नगर था। उसके बाद यह कूफा नगर ले जाई गई, जो आधुनिक दमिश्क में स्थित था। अब्बासी खलीफाओं ने बगदाद को अपनी राजधानी बनाया। तुर्की ने 1453 ई० में पूर्वी रोमन साम्राज्य का अन्त करके कुस्तुनतुनिया को अपनी राजधानी बनाया। आटोमान तुर्को के समय में खलीफा की शक्ति बहुत कम हो गई थी। खलीफाओं ने निरंकुश तथा स्वेच्छाचारी शासक के रूप में अरब पर शासन किया। अब्बासी  खलीफाओं ने जनहित के बहुत-से कार्य किए।
2. सामाजिक जीवन :
अरब साम्राज्य में चार प्रमुख वर्ग थे। प्रथम वर्ग में खलीफा, द्वितीय वर्ग में कुलीन, तृतीय वर्ग में विद्वान, लेखक, व्यापारी आदि सम्मिलित थे तथा चौथे निम्न वर्ग में किसान, दस्तकार तथा दास आते थे। इस समय दास-दासियों की संख्या बहुत अधिक थी। वे खुले बाजार में बेचे और खरीदे जाते थे। अरब समाज में स्त्रियों की दशा शोचनीय थी और उन्हें पर्दे में रहना पड़ता था। इस समय बहुविवाह, तलाक प्रथा और उपपत्नी प्रथा का प्रचलन था। अरब में पुरुष चौड़े पायजामें, कमीज, बड़ी जाकेट, काली पगड़ी, अंगरखा आदि वस्त्र पहनते थे। स्त्रियाँ रंग-बिरंगे सुन्दर वस्त्र धारण करती थीं। निम्न वर्ग में बुर्का (पूरे शरीर को ढकने वाला चोगा) पहनने की प्रथा थी। अरब लोग विभिन्न प्रकार के भोजन तथा पेयोंः जैसे—बनफशा, फालूदा, अंगूर की बेटी अर्थात् शराब आदि का उपयोग करते थे। शतरंज, चौपड़, पासे, चौगाने, पत्तेबाजी, घुड़दौड़, शिकार आदि उनके मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।
3. आर्थिक जीवन :
अरबों का प्रमुख व्यवसाय कृषि और युद्ध करना था। अरब के लोग गेहूँ, चावल, खजूर, कपास, पटुआ, मूंगफली, नारंगी, ईख, गुलाब, तरबूज आदि की खेती करते थे। अरब में कम्बल, कढ़े वस्त्र, सिल्क, सूती व ऊनी वस्त्र, किमखाब, फर्नीचर, काँच के बर्तन, कागज आदि निर्माण के उद्योग-धन्धे प्रचलित थे। अरब कारीगर सोने-चाँदी व कीमती पत्थरों, जवाहरातों से जड़े सुन्दर व कलात्मक आभूषण बनाने में दक्ष थे। इस काल में अरब के भारत, चीन तथा अफ्रीका के देशों से व्यापारिक सम्बन्ध थे। बगदाद, बसरा, काहिरा,  सिकन्दरिया मध्य युग के प्रमुख बन्दरगाह और व्यापारिक केन्द्र थे। मध्य युग में अरब के गलीचे, चमड़े की वस्तुएँ, सुन्दर तलवारें, धातु व काँच के बर्तन सारे संसार में विख्यात थे।
4. सांस्कृतिक जीवन :
इस्लामी अरब में शिक्षा का भी पर्याप्त विकास हुआ। अरब में पहला विद्यालय अबू हातिम ने 860 ई० में स्थापित किया। उस समय शिक्षा मस्जिदों और मदरसों में दी जाती थी। अद्द-अल-दौला ने शिराजी नगर में पहला पुस्तकालय बनवाया। उस समय बगदाद शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था। वहाँ एक सौ से अधिक पुस्तक-विक्रेता थे। खलीफा मामून | ने बगदाद में एक उच्च शिक्षा का केन्द्र ‘बैत-अल-हिकमत’ स्थापित करवाया था। 1065-1067 ई० की अवधि में निजाम-उल-मुल्क ने अरब में ‘निजामिया मदरसे’ की स्थापना की थी। इससमय कुरान, हदीस, कानून, धर्मतन्त्र (कलाम), अरबी भाषा और साहित्य, ललित, साहित्य (अदब), गणित आदि की शिक्षा दी जाती थी। अरबों ने लिखने की एक अलंकृत शैली ‘खुशवती’ का आविष्कार किया था।
5. साहित्य :
उस समय के अरब साहित्यकारों में हमदानी (976-1008 ई०, ‘मकाना’ नाटक का लेखक), थालिवी (961-967 ई०), अगानी (गीतिकार), जहशियारी (‘आलिफ-लैला’ का पहला लेखक, 942 ई०), नवास (व्यंग्यकार, गजलों का लेखक), अबू हम्माम, अल बहुतरी (820-897 ई०), उमर खय्याम (रूबाइयों का रचयिता) जैसे महान् कवि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मध्यकालीन अरब साहित्य में ‘खलीफा हारून-अल-रशीद की कहानियाँ’, ‘उमर खय्याम की रूबाइयाँ’, ‘आलिफ-लैला’ की कहानी और ‘फिरादौसी का शाहनामा’ आज भी सारे संसार में प्रसिद्ध हैं।
6. चिकित्सा :
अरबों ने कई महान् चिकित्सक उत्पन्न किए, जिनमें जिबरील (नेत्र विज्ञान की पुस्तक ‘अल-लाइन’ का लेखक), अलराजी (865-925 ई०, तेहरान निवासी, ‘किताब-उल- असरार’ का लेखक), यूरोप में रहैजेस नाम से विख्यात, चेचक के इलाज का आविष्कारक), अली-अब्बास (‘अल-किताब अल मालिकी’ का लेखक, रोगियों के आहार व मलेरिया की चिकित्सा का अन्वेषक), इब्नसिना (950-1037 ई०, यूरोप में एविसेन्ना नाम से प्रसिद्ध, ‘अलशेख अल-रईस’ की उपाधि, 33 गंन्थों का रचयिता, महान चिकित्सक, क्षय रोग का अन्वेषक, दार्शनिक, भाषाशास्त्री, कवि, प्रमुख पुस्तक ‘किताब-उल-शिफा’) तथा याकूब (पशु चिकित्सक) आज भी सम्पूर्ण-जगत में विख्यात
7. खगोल विद्या और गणित :
अरब ने खगोल विद्या और गणित के क्षेत्र में भी विशेष उन्नति की। अरब खगोलशास्त्रियों ने अबू अहमद, अलबरूनी (973-1048 ई०, ‘हयाहब-अल-न जूम’ का लेखक) तथा उमर खय्याम (1048-1124 ई०, पंचांग का निर्माता) विशेष प्रसिद्ध हैं। मध्यकालीन अरब का विख्यात ज्योतिषी बल्ख का मूल निवासी अबू माशार था, जिसने ज्योतिष सम्बन्धी अनेक पुस्तकें लिखी थीं।
8. कलाओं में प्रगति :
अरब लोगों ने अनेक मस्जिदों व मदरसों का निर्माण करवाया। गजबान ने 838 ई० में बसरा में पहली बार मस्जिद बनवाई। जेरूसलम ने चट्टान का गुम्बद, अक्सा मस्जिद (निर्माता अल-मलिक), दमिश्क में उमय्यद मीनार मस्जिद (705 ई० निर्माता अल वालिद), हरा गुम्बद (निर्माता खलीफा मंसूर) आदि अरब स्थापत्य कला के सुन्दर नमूने हैं। अब्बासी खलीफाओं ने अनेक राजमहलों और भवनों का निर्माण करवाया। बगदाद में बने शाही महल उस समय के अरब वैभव की जानकारी देते हैं। अरब में चित्रकला का भी विकास हुआ। उम्मैद तथा अब्बासी खलीफाओं द्वारा शहरी महलों की दीवारों पर कराई गई चित्रकारी दर्शनीय है। शाही गुम्बद पर घुड़सवार की आकृति (खलीफा मंसूर), शेरों, गरुड़ पक्षियों और समुद्री मछलियों के चित्र (खलीफा अमीन), कैसर आमरा के महल की दीवारों पर महिलाओं तथा शिकार के दृश्यों के चित्र आदि अरब चित्रकला के उत्कृष्ट नमूने हैं। इस युग में प्रमुख चित्रकार अल हरीरी और अल-अल-अगानी थे। अल रेहानी इस समय का विख्यात सुलेखनकार था, जिसने ‘मुकलाह’ की रचना की थी। अरब संगीतकारों में इब्राहीम (खलीफा हारून-अल-रशीद का भाई), गजाली (‘अहिया-अल-उलम’ गजलों का संग्रह), खलीफा अल महदी (सियास या संगीत की पुस्तक), खलीफा अल बाथिक (वीणावादक) के नाम प्रमुख हैं। इस काल में सितार या गिटार तथा उरुयान (आर्गन) प्रमुख वाद्य यन्त्र थे। अल फराबी ने किताब उल मुसीफी अल कबीर’ तथा अल गजाली ने ‘अल समां’ नामक संगीत की पुस्तकें लिखी थीं।

32364.

इस्लाम धर्म से पूर्व अरब सभ्यता एवं संस्कृति का वर्णन कीजिए।

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इस्लाम धर्म से पूर्व अरब सभ्यता एवं संस्कृति :
इस्लाम धर्म से पूर्व अरब सभ्यता एवं संस्कृति का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के आधार पर किया जा सकता है

प्राचीन अरब के निवासी :
सर्वप्रथम, अरब में बसने वाले कैल्डियन जाति के लोग थे। उनकी सभ्यता उच्चकोटि की थी। बाद में सेमेटिक जनजातियों ने इनकी सभ्यता के अवशेषों को नष्ट कर दिया। सेमेटिक जाति के लोग स्वयं को कहतान (जोकतन) का वंश मानते थे। उन्हीं का आदिपुरुष यारब था, जिसके नाम पर इस देश का नाम ‘अरब’ पड़ा। यारब कहतानी शासक; महान् विजेता और नगरों के निर्माता थे। उन्होंने यमन व अरब के अन्य क्षेत्रों पर सातवीं शताब्दी तक अपनी प्रभुत्व जमाए रखा। अरब के अन्तिम निवासी ‘इस्माइली’ थे।  इस्माइल महान् यहूदी ‘अब्राहम के अनुयायी थे। इन्हें अरब की महानता का संस्थापक और काबा का निर्माता माना जाता है। इस्लामी युग से पूर्व अरब मेंबसने वाले यही लोग थे।

प्राचीन अरबों का राजनीतिक जीवन  :
प्राचीन अरब के निवासी बद्दू कहलाते थे। उनका प्रत्येक तम्बू ‘एक परिवार’ माना जाता था। अनेक तम्बू एक वंश या ‘कौम’ का प्रतिनिधित्व करते थे। एक सौ । वंश मिलकर एक जनजाति’ या ‘कबीले’ का निर्माण करते थे। अरब का यह युग जाहिलिया युग (अज्ञानता और बर्बरता का काल) कहलाता है।

प्राचीन अरबों का सामाजिक एवं आर्थिक जीवन :
प्राचीन अरबवासी खानाबदोश थे। वे तम्बुओं में रहते थे और भेड़, बकरी तथा ऊँट आदि पशुओं को पालते थे। उनका जीवन संघर्षपूर्ण था। प्रत्येक कबीले का एक सरदार होता था, जिसकी आज्ञा कबीले के सभी लोगों को माननी पड़ती थी। अरबवासियों को आर्थिक जीवन व्यापार और लूटमार पर निर्भर था। दक्षिण अरब के लोग विदेशों से व्यापार करते थे।

प्राचीन अरबों का सांस्कृतिक जीवन :
प्राचीन अरब में शिक्षा की कमी थी, लेकिन अरबवासी अपनी भाषा और कविता के लिए विख्यात थे। इस्लाम-पूर्व अरब के साहित्य का पर्याप्त विकास हो चुका था।  इस्लाम-पूर्व अरब के प्रसिद्ध लेखकों में हकीम लुकमान, अख्तम-इब्न-सैफी, हाजी-इब्न-जर्राह, हिद (अलखस की पुत्री, विदुषी), अल मयदानी (‘मजमा-अल-अमथल का लेखक), अल-मुफद्दाल-अल-दब्बी ( ‘अमथल-अल-अरब’ का लेखक) आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इस युग के प्रमुख कवियों में इमारुल केज, तराफा, हरिथ तथा अन्तारा आदि के नाम प्रसिद्ध हैं।

धार्मिक जीवन : इस्लाम पूर्व अरब और जाहिलिया युग  : मुसलमान-विरोधी बद्दुओं की किसी भी धर्म में आस्था नहीं थी। यहूदियों और ईसाइयों को छोड़कर शेष अरब मूर्तिपूजक थे। अरबवासी अनेक देवी-देवताओं की पूजा किया करते थे। अकेले मक्का में ही 360 मूर्तियाँ थीं। बद्द् अधिकतर मूर्तियों और नक्षत्रों की पूजा करते थे। मक्का में ऊँटों और भेड़ों की बलि दी जाती थी। अरबवासी वृक्षों, कुओं, गुफाओं, पत्थर और वायु आदि प्राकृतिक वस्तुओं को पवित्र मानते और उनकी पूजा भी करते थे। प्राचीन अरबों के प्रमुख देवता अल मानहु (सर्वशक्तिमाने शुक्र), देवी अल-लात, अर-राबा और अल-मानह (भाग्य की देवी), यागुस (गिद्ध), ओफ (एक बड़ी चिड़िया) आदि थे। मक्का के कुरैशियों (प्राचीन अरब का प्रसिद्ध वंश) का देवता ‘अल-हुनल’ था।

32365.

विज्ञान के क्षेत्र में अरबों की उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।

Answer»

विज्ञान के क्षेत्र में अरबों की उपलब्धियाँ निम्नलिखित थीं

⦁     अरबों के द्वारा गोलाकार त्रिकोणमिति और अंक प्रणाली की खोज की गई थी। यूरोपवासियों ने अरबों से ही अंक प्रणाली को सीखा था।
⦁     अरब वैज्ञानिकों ने ही सर्वप्रथम यह खोज की थी कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती हुई स्वयं की परिक्रमा करती है।
⦁     अरबों द्वारा अनुसन्धान हेतु अनेक प्रयोगशालाओं की स्थापना की गई थी।
⦁     खगोलशास्त्र के क्षेत्र में उन्होंने अनेक वेधशालाओं का निर्माण किया और नए नक्षत्रों का पता लगाया।
⦁    भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में पेण्डुलम की खोज उनके द्वारा ही की गई थी। उन्होंने प्रकाश विज्ञान पर अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की थी।
⦁     वे चिकित्सा के क्षेत्र में भी बहुत पारंगत थे और शिल्प-क्रिया से भली-भाँति परिचित थे।

32366.

अरबों ने लेखन-कला की किस शैली का आविष्कार किया?

Answer»

अरबों ने लेखन-कला की ‘खुशवती’ शैली का आविष्कार किया।

32367.

कागज की उपलब्धता ने इस्लामिक इतिहास को किस प्रकार संजोया? संक्षेप में लिखिए।

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कागज के आविष्कार के पश्चात् मध्य इस्लामिक भूमि में लिखित रचनाओं को बड़े पैमाने पर प्रसार होने लगा। कागज जो लिनन से बनता था, चीन में कागज बनाने की प्रक्रिया को अत्यन्त गुप्त रखा गया था। समरकन्द के मुस्लिम शासकों ने सन् 750 में 20,000 चीनी हमलावरों को बन्दी बना लिया। इनमें से कुछ कागज बनाने में बहुत कुशल थे। अगली एक सदी के लिए, समरकन्द का कागज निर्यात की एक महत्त्वपूर्ण वस्तु बन गया। इस्लाम एकाधिकार का निषेध करता है; अतः कागज इस्लामी दुनिया के शेष भागों में बनाया जाने लगा। दसवीं सदी के मध्य तक इसने पैपाइरस का स्थान ले लिया। कागज की माँग बढ़ गई। बगदाद का एक डॉक्टर अब्द-अल-लतीफ जो 1193 से 1207 तक मिस्र का निवासी था, लिखता है कि मिस्र के किसानों ने ममियों के ऊपर लपेटे गए लिनन से बने हुए आवरण प्राप्त करने के लिए किस तरह कब्रों को लूटा था जिससे वे यह लिनन कागज के कारखानों को बेच सकें। कागज की उपलब्धता के कारण सभी प्रकार के वाणिज्यिक एवं वैयक्तिक दस्तावेजों को लिखना भी सरल हो गया। सन् 1896 में फुस्ताल में बेन एजरा के यहुदी प्रार्थना भवन के एक सीलबन्द कमरे गेनिजा में मध्यकाल के यहूदी दस्तावेजों का एक विशाल भण्डार प्राप्त हुआ। ये सभी दस्तावेज इस यहूदी प्रथा के कारण सुरक्षित रख गए थे कि ऐसी किसी भी लिखित रचना को नष्ट नहीं किया जाना चाहिए जिसमें ईश्वर का नाम लिखा हुआ हो। गेनिजा में लगभग ढाई लाख पांडुलिपियाँ और उनके टुकड़े थे जिसमें कई आठवीं शताब्दी के मध्यकाल के भी थे। अधिकांश सामग्री दसवीं से तेरहवीं सदी तक की थी अर्थात् फातिमी, अयूबी और प्रारम्भिक मामलुक काल की थी। इनमें व्यापारियों, परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच लिखे गए पत्र, संविदा, दहेज से जुड़े वादे, बिक्री दस्तावेज, धुलाई के कपड़ों की सूचियाँ और अन्य साधारण वस्तुएँ शामिल थीं।। अधिकांश दस्तावेज यहूदी-अरबी भाषा में लिखे गए थे, जो हिब्रू अक्षरों में लिखी जाने वाली अरबी भाषा का ही रूप था, जिसका उपयोग समूचे मध्यकालीन भूमध्य सागरीय क्षेत्र में यहूदी समुदायों द्वारा साधारण रूप से किया जाता था। गेनिजा दस्तावेज निजी और आर्थिक अनुभवों से भरे हुए हैं और वे भूमध्य सागरीय और इस्लामी संस्कृति की अन्दरूनी जानकारी प्रस्तुत करते हैं। इन दस्तावेजों से यह भी ज्ञात होता है कि मध्यकालीन इस्लामी जगत के व्यापारियों के व्यापारिक कौशल और वाणिज्यिक तकनीक उनके यूरोपीय प्रतिपक्षियों की तुलना में बहुत अधिक उन्नत थीं।

32368.

कुछ लोगों को ऐसा क्यों लगता था कि बँटवारा बहुत अचानक हुआ?

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कुछ विद्वानों के विचारानुसार देश का विभाजन बहुत अचानक हुआ। हमें याद रखना चाहिए कि भारत विभाजन की आधार-भूमि में प्रारंभ से ही ब्रिटिश कूटनीति कार्य कर रही थी। ब्रिटिश प्रशासकों ने प्रारंभ में ही ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का अनुसरण किया। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को दुर्बल बनाने के लिए वे मुसलमानों की सांप्रदायिक भावनाओं को उत्तेजित करते रहे। 1942 ई० के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की व्यापकता से यह स्पष्ट हो गया था कि अंग्रेज़ अधिक समय तक भारत को अपने अधीन नहीं रख सकेंगे। और उन्हें भारत को स्वतंत्र करना ही होगा। इस आंदोलन के कारण इंग्लैंड के विभिन्न राजनैतिक दल भारतीय समस्या पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगे और अंग्रेजों का भारत छोड़ना निश्चित हो गया। किन्तु कूटनीति के कुशल खिलाड़ी अंग्रेज़ भारत को एक शक्तिशाली नहीं अपितु दुर्बल और विखंडित देश के रूप में छोड़ना चाहते थे।

अतः वे अचानक विभाजन के लिए तैयार हो गए। हमें याद रखना चाहिए कि उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुलता वाले क्षेत्रों के लिए सीमित स्वायत्तता की माँग से विभाजन होने के बीच का काल केवल 7 वर्ष का था। सम्भवतः किसी को भी यह ठीक से पता नहीं था कि पाकिस्तान के निर्माण का क्या अभिप्राय होगा और उसका भविष्य में जनसामान्य के जीवन पर क्या प्रभाव होगा? । उल्लेखनीय है कि 1947 ई० में अपने मूल स्थान को छोड़कर नए स्थान पर जाने वाले अधिकांश लोगों को विश्वास था कि शान्ति स्थापित होते ही वे अपने मूल स्थान में लौट आएँगे। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि प्रारंभ में मुस्लिम नेता भी एक सम्प्रभु राज्य के रूप में पाकिस्तान की माँग के प्रति गंभीर नहीं थे। सम्भवतः स्वयं जिन्नाह भी सौदेबाजी में पाकिस्तान की सोच का प्रयोग एक पैंतरे के रूप में करना चाहते थे। इसके द्वारा वे एक ओर, सरकार द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को दी जाने वाली रियायतों पर रोक लगा सकते थे और दूसरी ओर, मुसलमानों के लिए अधिकाधिक रियायतें प्राप्त कर सकते थे।

उल्लेखनीय है कि मार्च 1940 ई० में लाहौर अधिवेशन में लीग ने जो प्रस्ताव प्रस्तुत किया, उसमें उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में केवल सीमित स्वायतत्ता की माँग की गई थी। इस अस्पष्ट से प्रस्ताव में विभाजन अथवा पाकिस्तान का उल्लेख कहीं भी नहीं किया गया था। इस प्रस्ताव के लेखक पंजाब के प्रीमियर (Premier) और यूनियनिस्ट पार्टी के नेता सिंकदर हयात खान ने 1 मार्च, 1941 ई० को पंजाब असेम्बली में यह स्पष्ट किया था कि वह ऐसे पाकिस्तान की अवधारणा के विरोधी हैं, जिसमें “यहाँ मुस्लिम राज और शेष स्थानों पर हिन्दू राज होगा…..” इस प्रस्ताव के केवल सात वर्ष बाद ही देश का विभाजन हो गयी। इसलिए कुछ लोगों को लगा कि देश का विभाजन बहुत अचानक हुआ।

32369.

अरब में दर्शन और इतिहास विषय पर कौन-सी रचनाएँ की गईं? अरबों की विश्व सभ्यता को क्या देन है?

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अरब दार्शनिकों में अल किन्दी, अल फराबी, इब्नसिना, गजाली, अल-मारी, अलतौहिन्दी के नाम प्रमुख हैं। अरब दर्शन यूनानी दर्शन से प्रभावित था। अरब व यूनान की फिलॉसफी को ‘फलसफा’ कहते थे। अरब में इतिहास-लेखन का भी पर्याप्त विकास हुआ। इस युग के अरब इतिहासकारों में इब्न इशाक (मदीना निवासी, पैगम्बर की जीवनी का पहला लेखक), कृति ‘सिरात रसूल अल्लाह’, अल मुकफा (‘खुदायनामा’ का लेखक), कुतवाह (पहला अरब इतिहासकार, बगदाद निवासी, मृत्यु 889 ई०) कृति ‘किताब उल मारिफ’, अल याकूबी (भूगोलवेत्ता इतिहासकार), अल बालादुरी (‘अल बुल्दान’ तथा ‘अनसाब अल अशरफ’ पुस्तकों का लेखक), अल हकाम (‘फुतुह मित्र’ का लेखक), अल तबरी (838-923 ई०, ‘तारीख अल रसूल’ व अल मुलुक’ का लेखक), अल मसूदी (अरबों का हेरोडोट्स, कृति ‘अल तनवीह’ व ‘अल इशरफ’), अलबरूनी (‘किताब उल हिन्द’ या ‘तहकीके हिन्द’ का लेखक) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अरब के भूगोलवेत्ताओं में फाह्यान(‘मजम अल बुल्दान’ या ‘भौगोलिक कोष’ का रचयिता), ख्वारिज्मी (‘सूरत अल गर्द’ या ‘पृथ्वी की शक्ल’ का लेखक), अल हमदानी (‘जजीरात अल अरब’ का लेखक) आदि के नाम सारे संसार में प्रसिद्ध हैं। अरबों की देन-अरबों की विश्व सभ्यता को अनेक महत्त्वपूर्ण देन हैं। अरबों ने सर्वप्रथम प्रबुद्ध राजतन्त्र और राष्ट्रीयता की भावना का विकास किया। इस्लाम धर्म का प्रचार तथा प्रसार किया, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करने की प्रेरणा दी। संगठित सामाजिक जीवन की नींव डाली। भारत, चीन और अफ्रीका से व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किए। चीनी, इत्र टिन्चर, कागज, काँच के बर्तन, गलीचे, चमड़े की कलात्मक वस्तुएँ, सुन्दर तलवारें व अन्य हथियार आदि संसार को प्रदान किए। इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरान शरीफ’ की रचना की। उन्होंने संसार को अरेबियन नाइट्स (आलिफ लैला की कहानियाँ), गुलिस्तां व बोस्तां (शेख सादी), शाहनामा (फिरदौसी) जैसे ग्रन्थ उपलब्ध कराए और चिकित्सा, दर्शन, खगोलविद्या, ज्योतिष, गणित, बीजगणित, गोलाकार ज्यामिति तथा कीमियागिरी में अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त की और उनका ज्ञान संसार को दिया। अरबों ने बगदाद, दमिश्क, काहिरा, जेरूसलम, मक्का व मदीना में अनेक मस्जिदों का निर्माण कराया और चित्रकला तथा संगीत कला का भी पर्याप्त विकास किया।

32370.

Write a note on the conflict between the British and the Sikhs on the issue of control over the Sikh Gurudwaras.

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The English were the supporters of Mahants of Gurudwaras. This attitude of the British was disliked by the Sikhs. The Mahants had entered the Gurudwaras as servants (Sewadars). But during the British rule, they became their permanent owners. They considered Gurudwaras as their personal property. The Mahants received the support of the British government. So they believed that their position was safe. They, therefore, started living a life of luxury. The Sikhs could not tolerate this.

32371.

ब्रिटिश भारत का बँटवारा क्यों किया गया?

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निम्नलिखित कारणों ने ब्रिटिश भारत के विभाजन में योगदान दिया

1. ब्रिटिश कूटनीति-

अधिकांश विद्वान इतिहासकारों के विचारानुसार भारत विभाजन का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण था- ब्रिटिश कूटनीति। ब्रिटिश प्रशासकों ने प्रारंभ से ही ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का अनुसरण किया। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए वे मुसलमानों की सांप्रदायिक भावनाओं को उत्तेजित करते रहे। 1905 ई० में बंगाल का विभाजन, 1906 ई० में मुस्लिम लीग की स्थापना और 1909 ई० में सांप्रदायिक चुनाव प्रणाली का प्रारंभ और विस्तार अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के ज्वलंत उदाहरण थे। ब्रिटिश प्रशासकों की इस नीति से मुसलमानों में सांप्रदायिक भावनाओं का विकास होने लगा। वे अपने हितों की रक्षा के लिए अपने लिए एक पृथक् राष्ट्र की माँग करने लगे, जिसकी चरम परिणति पाकिस्तान के निर्माण में हुई।

2. मुस्लिम लीग का सांप्रदायिक दृष्टिकोण-

मुस्लिम लीग के संकीर्ण सांप्रदायिक दृष्टिकोण ने हिन्दू-मुसलमानों में मतभेद उत्पन्न करने और अन्ततः पाकिस्तान के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। लीग ने ‘द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत’ का प्रचार किया और मुस्लिम जनसामान्य को यह विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया कि अल्पसंख्यक मुसलमानों को बहुसंख्यक हिन्दुओं से भारी खतरा है। 1937 ई० में कांग्रेस द्वारा संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मंत्रिमण्डल बनाने से इनकार कर दिए जाने पर लीग ने इस्लाम खतरे में है’ का नारा लगाया और कांग्रेस को हिन्दुओं की संस्था बताया। 1937 ई० में लीग के लखनऊ अधिवेशन में सांप्रदायिकता की अग्नि को और अधिक हवा देते हुए जिन्नाह ने कहा था-“अब हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा होगी और वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत होगा। कांग्रेस के झंडे को प्रत्येक व्यक्ति को स्वीकार करना पड़ेगा और उसका आदर करना पड़ेगा।”
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेसी मंत्रिमण्डल द्वारा नवम्बर, 1939 ई० में त्यागपत्र दे दिए जाने पर मुस्लिम लीग अत्यधिक प्रसन्न हुई। 22 दिसम्बर, 1939 ई० को लीग ने संपूर्ण भारत में ‘मुक्ति दिवस’ मनाया। मार्च 1940 ई० में लाहौर अधिवेशन में लीग ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें उपमहाद्वीप के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सीमित स्वायत्तता की माँग की गई। लीग ने कांग्रेस के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का विरोध किया और 1946 ई० के चुनावों के पश्चात् ‘पाकिस्तान की स्थापना के लिए जोरदार आंदोलन प्रारंभ कर दिया। 16 अगस्त, 1946 ई० को लीग ने ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ मनाया जिसके परिणामस्वरूप देश के विभिन्न भागों में भयंकर सांप्रदायिक दंगे हो गए। अतः देश को अनावश्यक रक्तपात से बचाने के लिए विभाजन अनिवार्य हो गया।

3. कांग्रेस की लीग के प्रति तुष्टिकरण की नीति-

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लीग के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपनाई जो देश की अखंडता के लिए घातक सिद्ध हुई। कांग्रेस ने बार-बार लीग को संतुष्ट करने का प्रयत्न किया जिसके परिणामस्वरूप लीग की अनुचित माँगें दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगीं। मुस्लिम लीग के प्रति कांग्रेस की शिथिल एवं त्रुटिपूर्ण नीति से जिन्नाह को विश्वास हो गया था कि परिस्थितियों से विवश होकर कांग्रेस विभाजन के लिए तैयार हो जाएगी और अन्ततः ऐसा ही हुआ भी।

4. सांप्रदायिक दंगे-1946 ई० के चुनावों के पश्चात् लीग ने पाकिस्तान की स्थापना के लिए प्रबल आंदोलन प्रारंभ कर दिया था। 16 अगस्त, 1946 ई० को लीग ने प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ मनाया जिसके परिणामस्वरूप बंगाल, बिहार और पंजाब में भयंकर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो गए। संपूर्ण देश गृहयुद्ध की आग में जलने लगा। जैसे-जैसे सांप्रदायिक तनाव बढ़ता गया, भारतीय सिपाही और पुलिस वाले भी अपने पेशेवर प्रतिबद्धता को भूलकर हिन्दू, मुसलमान अथवा सिक्ख के रूप में आचरण करने लगे। अतः देश को भयंकर विनाश से बचाने के लिए कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार कर लेना ही श्रेयस्कर समझा।

5. कांग्रेस की भारत को शक्तिशाली बनाने की इच्छा-

मुस्लिम लीग की गतिविधियों से यह स्पष्ट हो चुका था कि लीग कांग्रेस से किसी भी रूप में समझौता अथवा सहयोग करने के लिए तैयार नहीं थी। कांग्रेस के प्रमुख नेता यह भली-भाँति समझ चुके थे कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी लीग कांग्रेस के प्रत्येक कार्य में रुकावट डालेगी तथा तोड़-फोड़ की नीति अपनाएगी, जिसके परिणामस्वरूप देश निरन्तर दुर्बल होता जाएगा। अतः देश को विनाश से बचाने के लिए उन्होंने विभाजन को स्वीकार कर लेना अधिक उचित समझा।

6. लॉड माउंटबेटन के प्रयास-

मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान के निर्माण के लिए प्रत्यक्ष कार्यवाही प्रारंभ कर दिए जाने के कारण सम्पूर्ण देश में हिंसा की ज्वाला धधकने लगी थी। अत: लॉर्ड माउंटबेटन ने पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल को विश्वास दिला दिया कि मुस्लिम लीग के बिना शेष भारत को शक्तिशाली और संगठित बनाना अधिक उचित होगा। कांग्रेसी नेताओं को गृहयुद्ध अथवा पाकिस्तान इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करना था। उन्होंने गृहयुद्ध से बचने के लिए पाकिस्तान के निर्माण को स्वीकार कर लिया। इस प्रकार, अनेक कारणों के संयोजन ने देश के विभाजन को अपरिहार्य बना दिया था।

32372.

बँटवारे के समय औरतों के क्या अनुभव रहे?

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विभाजन के सर्वाधिक दूषित प्रभाव संभवतः महिलाओं पर हुए। विभाजन के दौरान उन्हें दर्दनाक अनुभवों से गुजरना पड़ा। उन्हें बलात्कार की निर्मम पीड़ा को सहन करना पड़ा। उन्हें अगवा किया गया, बार-बार बेचा और खरीदा गया तथा अंजान हालात में अजनबियों के साथ एक नई ज़िदगी जीने के लिए विवश किया गया। महिलाएँ मूक, निरीह प्राणियों के समान इन सभी प्रक्रियाओं से गुजरती रहीं। गहरे सदमे से गुजरने के बावजूद कुछ महिलाएँ बदले हुए हालात में नए पारिवारिक बंधनों में बँध गईं। किन्तु भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने ऐसे मानवीय संबंधों की जटिलता के विषय में किसी संवेदनशील दृष्टिकोण को नहीं अपनाया। यह मानते हुए कि इस प्रकार की अनेक महिलाओं को बलपूर्वक घर बैठा लिया गया था, उन्हें उनके नए परिवारों से छीनकर पुराने परिवारों के पास अथवा पुराने स्थानों पर भेज दिया गया। इस संबंध में सम्बद्ध महिलाओं की इच्छा जानने का प्रयास ही नहीं किया गया।

इस प्रकार, विभाजन की मार झेल वाली उन महिलाओं को अपनी जिदगी के विषय में फैसला लेने के अधिकार से एक बार फिर वंचित कर दिया गया। एक अनुमान के अनुसार महिलाओं की बरामदगी’ के अभियान में कुल मिलाकर लगभग 30,000 महिलाओं को बरामद किया गया। इनमें से 8,000 हिन्दू व सिक्ख महिलाओं को पाकिस्तान से और 22,000 मुस्लिम महिलाओं को भारत से निकाला गया। बरामदगी की यह प्रक्रिया 1954 ई० तक चलती रही। उल्लेखनीय है कि विभाजन की प्रक्रिया के दौरान अनेक ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जब परिवार के पुरुषों ने इस भय से कि शत्रु द्वारा उनकी औरतों -माँ, बहन, बीवी, बेटी को नापाक किया जा सकता था, परिवार की इज्ज़त अर्थात मान-मर्यादा की रक्षा के लिए स्वयं ही उनको मार डाला। उर्वशी बुटालिया की पुस्तक ‘दि अदर साइड ऑफ साइलेंस’ में रावलपिंडी जिले के थुआ खालसा गाँव की एक ऐसी ही दिल दहला देने वाली घटना का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि विभाजन के समय सिक्खों के इस गाँव की 90 महिलाओं ने ‘शत्रुओं के हाथों पड़ने की अपेक्षा स्वेच्छापूर्वक कुएँ में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे। इस प्रकार विभाजन के दौरान महिलाओं को अनेक दर्दनाक अनुभवों से गुजरना पड़ा।

32373.

उद्देश्य प्रस्ताव’ में किन आदर्शों पर जोर दिया गया था?

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उद्देश्य प्रस्ताव’ में आजाद भारत के संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा पेश की गई थी। इस प्रस्ताव के माध्यम से उस फ्रेमवर्क को प्रस्तुत किया गया था, जिसके अनुसार संविधान निर्माण के कार्य को आगे बढ़ाना था। यह उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसम्बर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा के सामने प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव में भारत को एक स्वतंत्र, सम्प्रभु गणराज्य घोषित किया गया था। नागरिकों को न्याय, समानता एवं स्वतंत्रता का आश्वासन दिया गया था और यह वचन दिया गया था कि अल्पसंख्यकों, पिछड़े एवं जनजातीय क्षेत्रों और दमित एवं अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षात्मक प्रबंध किए जाएँगे।

32374.

दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए।

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दमित (दलित) समूहों की सुरक्षा के पक्ष में अनेक दावे प्रस्तुत किए गए। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय आंदोलन के काल में ।

बी०आर० अम्बेडर ने दलित जातियों के लिए पृथक् निर्वाचिकाओं की माँग की थी। किन्तु गाँधी जी ने इसका विरोध किया था, क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसा करने से ये समुदाय सदा के लिए शेष समाज से पृथक् हो जाएँगे। दलित जात्रियों के कुछ सदस्यों का विचार था कि संरक्षण और बचाव के द्वारा ‘अस्पृश्यों’ (अछूतों) की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता था। जाति-आधारित समाज के कायदे-कानून एवं नैतिक मूल्य उनकी अपंगताओं के प्रमुख कारण थे। तथाकथित सवर्ण समाज उनकी सेवाओं एवं श्रम का तो प्रयोग करता है, किन्तु उनके साथ सामाजिक संबंध स्थापित करने से कतराता है।

मद्रास की दक्षायणी वेलायुधान ने दलितों पर थोपी गई सामाजिक अक्षमताओं को हटाने पर जोर दिया। उनके शब्दों में, “हमें सब प्रकार की सुरक्षाएँ नहीं चाहिए…. मैं यह नहीं मान सकती कि सात करोड़ हरिजनों को अल्पसंख्यक माना जा सकता है… जो हम चाहते हैं वह यह है…. हमारी सामाजिक अपंगताओं का फौरन खात्मा।” मद्रास के सदस्य जे० नागप्पा का विचार था कि दलितों की समस्याओं का मूल कारण उन्हें समाज एवं राजनीति के हाशिए पर रखा जाना था। परिणामस्वरूप वे न तो शिक्षा प्राप्त कर सके और न ही शासन में भागीदारी। स्थिति को स्पष्ट करते हुए नागप्पा ने कहा, “हम सदा कष्ट उठाते रहे हैं, किन्तु अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं हैं। हम अपनी जिम्मेदारियों को समझने लगे हैं। हमें मालूम है कि अपनी बात कैसे मनवानी है।” मध्य प्रांत के श्री के०जे० खांडेलकर ने भी लगभग इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए। सवर्ण बहुमतवाली सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “हमें हजारों वर्षों तक दबाया गया है। दबाया गया…. इस हद तक दबाया गया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करती।

और अब हमारा हृदय भी भाव-शून्य हो चुका है। न ही हम आगे बढ़ने के लायक रह गए हैं। यही हमारी स्थिति है।” विभाजन के परिणामस्वरूप होने वाली हिंसा और रक्तपात के कारण अंबेडकर ने पृथक् निर्वाचिका की माँग को छोड़ दिया था। अंत में संविधान सभा द्वारा ये सुझाव दिए गए कि 

(1) अस्पृश्यता को उन्मूलित कर दिया जाए; 

(2) हिन्दू मंदिरों के द्वार बिना किसी भेदभाव के सभी जातियों के लिए खोल दिए जाए तथा 

(3) विधायिकाओं एवं सरकारी नौकरियों में निचली जातियों को आरक्षण प्रदान किया जाए। लोकतांत्रिक जनता ने इन प्रावधानों का स्वागत किया। यद्यपि अधिकांश लोग इसे समस्याओं का हल नहीं समझते थे। उनका विचार था कि सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए संवैधानिक कानून पास करने के साथ-साथ समाज की सोच को परिवर्तित करना भी नितांत आवश्यक है।

32375.

सतनामियों ने किसके समय में विद्रोह किया(क) अकबर(ख) औरंगज़ेब (ग) शाहजहाँ(घ) जहाँगीर

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सही विकल्प है (ख) औरंगज़ेब

32376.

वे कौन-सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया?

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संविधान सभा का स्वरूप निर्धारित करने में अनेक ऐतिहासिक शक्तियों ने योगदान दिया

1. संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार अक्टूबर 1946 ई० को किया गया था। इसके सदस्यों का चुनाव 1946 ई० के प्रांतीय चुनावों के आधार पर किया गया था। संविधान सभा में ब्रिटिश भारतीय प्रांतों द्वारा भेजे गए सदस्यों के साथ-साथ रियासतों के प्रतिनिधियों को भी सम्मिलित किया गया था। मुस्लिम लीग ने संविधान सभा की प्रारंभिक बैठकों में (अर्थात् 15 अगस्त, 1947 ई० से पहले) भाग नहीं लिया। इस प्रकार संविधान सभा पर विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्यों का प्रभाव था। इसके 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस के भी सदस्य थे।

2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य भिन्न-भिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे। यदि उनमें से कुछ ‘निरीश्वरवादी’ एवं ‘धर्मनिरपेक्ष’ थे, तो कुछ, जैसा कि ऐ एंग्लो-इंडियन सदस्य फ्रेंक एंथनी का विचार था, “तकनीकी रूप से कांग्रेस के, किन्तु आध्यात्मिक स्तर पर आर०एस०एस० तथा हिन्दू महासभा के सदस्य थे। इन सबकी विचारधाराओं ने संविधान के स्वरूप निर्धारण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

3. संविधान सभा में आर्थिक विचारों के विषय पर कुछ सदस्य समाजवादी थे और कुछ ज़मींदारों का समर्थन करने वाले थे। विभिन्न धर्मों एवं जातियों को प्रतिनिधित्व देने के उद्देश्य से संविधान सभा में कुछ स्वतंत्र सदस्य एवं महिलाओं को भी नामांकित किया गया था। इन सभी ने संविधान के स्वरूप निर्धारण को अनेक रूपों में प्रभावित किया।

4. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा विधि-विशेषज्ञों को संविधान सभा में स्थान दिए जाने पर विशेष ध्यान दिया गया था। सुप्रसिद्ध विधिवेत्ता एवं अर्थशास्त्री बी०आर० अम्बेडकर संविधान सभा के सर्वाधिक प्रभावशाली सदस्यों में से एक थे। उन्होंने संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में सराहनीय कार्य किया। गुजरात के वकील के०के०एम० तथा मद्रास के वकील अल्लादि कृष्ण स्वामी अय्यर बी०आर० अम्बेडकर के प्रमुख सहयोगी थे। इन दोनों के द्वारा संविधान के प्रारूप पर महत्त्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए गए।

5. संविधान का स्वरूप निर्धारित करने में जनमत का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में होने वाली चर्चाओं पर जनमत को भी पर्याप्त प्रभाव होता था। जनसामान्य के सुझावों को भी आमंत्रित किया जाता था, जिसके परिणामस्वरूप सामूहिक सहभागिता का भाव उत्पन्न होता था। जनमत के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “सरकारें कागजों से नहीं बनतीं। सरकार जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है। हम यहाँ इसलिए जुटे हैं, क्योंकि हमारे पास जनता की ताकत है और हम उतनी दूर तक ही जाएँगे, जितनी दूर तक लोग हमें ले जाना चाहेंगे, फिर चाहे वे किसी भी समूह अथवा पार्टी से संबंधित क्यों न हों। इसलिए हमें भारतीय जनता की आकांक्षाओं एवं भावनाओं को हमेशा अपने जेहन में रखना चाहिए और उन्हें पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।”

6. प्रेस में होने वाली आलोचना एवं प्रत्यालोचना ने भी संविधान के स्वरूप निर्धारण में योगदान दिया। हमें याद रखना चाहिए कि सभी प्रस्तावों पर सार्वजनिक रूप से बहस की जाती थी। किसी भी विषय पर होने वाली बहस में विभिन्न पक्षों की दलीलों को समाचारपत्रों द्वारा छापा जाता था। इस प्रकार, प्रेस में होने वाली आलोचना एवं प्रत्यालोचना किसी भी विषय पर बनने वाली सहमति अथवा असहमति को व्यापक रूप से प्रभावित करती थी।

7. संविधान सभा को मिलने वाले सैकड़ों सुझावों में से कुछ नमूनों को देखने से ही यह भली-भाँति स्पष्ट हो जाता है। कि हमारे विधिनिर्माता परस्पर विरोधी हितों पर गहन विचार-विमर्श करने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे। उदाहरण के लिए, ऑल इंडिया वर्णाश्रम स्वराज्य संघ (कलकत्ता) का आग्रह था कि संविधान का आधार ‘प्राचीन हिन्दू कृतियों में उल्लिखित सिद्धांत’ होने चाहिए। विशेष रूप से यह माँग की गई कि गौ-हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया जाए तथा सभी बूचड़खानों को बंद कर दिया जाए। तथाकथित निचली जातियों के समूहों ने “सवर्णों द्वारा दुर्व्यवहार” पर रोक लगाने तथा विधायिका, सरकारी विभागों एवं स्थानीय निकायों आदि में जनसंख्या के आधार पर सीटों के आरक्षण की व्यवस्था” की माँग की।

8. भाषायी अल्पसंख्यकों की माँग थी कि “मातृभाषा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” प्रदान की जाए तथा “भाषायी आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन किया जाए।” इसी प्रकार धार्मिक अल्पसंख्यकों का आग्रह था कि उन्हें विशेष सुरक्षाएँ प्रदान की जाएँ। विजयानगरम् के जिला शिक्षा संघ एवं बम्बई के सेंट्रल ज्यूइश बोर्ड जैसे अनेक संगठनों द्वारा “विधायिका इत्यादि सहित सभी सार्वजनिक संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व” की माँग की गई। इस प्रकार संविधान के स्वरूप निर्धारण में अनेक ऐतिहासिक ताकतों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वास्तव में, संविधान सभा को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेनेवाले लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का साधन माना जा रहा था।

32377.

महात्मा गाँधी को ऐसा क्यों लगता था कि हिंदुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए?

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महात्मा गाँधी को ऐसा इसलिए लगता था, क्योंकि उनका मानना था कि हिंदुस्तानी भाषा में हिंदी के साथ-साथ उर्दू भी शामिल है और ये दो भाषाएँ मिलकर हिंदुस्तानी भाषा बनी है तथा यह हिंदू और मुसलमान दोनों के द्वारा प्रयोग में लाई जाती है। दोनों को बोलने वालों की संख्या अन्य सभी भाषाओं की तुलना में बहुत अधिक है। यह हिंदू और मुसलमानों के साथ-साथ उत्तर और दक्षिण में भी खूब प्रयोग में लाई जाती है। गाँधी जी यह जानते थे कि हिंदी में संस्कृत और उर्दू में संस्कृत के साथ-साथ अरबी और फ़ारसी के शब्द मध्यकाल से प्रयोग हो रहे हैं।

राष्ट्रीय आंदोलन (1930) के दौरान कांग्रेस ने भी यह मान लिया था कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदुस्तानी ही बन सकती है। गाँधी जी साम्प्रदायिकता के खिलाफ थे। वह हिंदुस्तानी भाषा को देश में हिंदू और मुसलमानों में सद्भावना और प्रेम बढ़ाने वाली भाषा मानते थे। वह मानते थे-“इससे दोनों सम्प्रदायों के लोगों में परस्पर मेल-मिलाप, प्रेम, सद्भावना, ज्ञान का आदान-प्रदान बढ़ेगा और यही भाषा देश की एकता को मजबूत करने में अधिक आसानी से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा
सकती है।”

32378.

संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय की राजनीतिक परिस्थिति और एक मज़बूत केंद्र सरकार की ज़रूरत के बीच क्या संबंध देखा?

Answer»

संविधान सभा के कुछ सदस्य केन्द्र सरकार को अधिकाधिक शक्तिशाली देखना चाहते थे। ऐसे सदस्यों के विचारानुसार तत्कालीन राजनैतिक परिस्थिति में एक शक्तिशाली केंद्र सरकार की नितांत आवश्यकता थी। बी०आर० अम्बेडकर के मतानुसार एक मज़बूत केंद्र ही देश में शान्ति और सुव्यवस्था की स्थापना करने में समर्थ हो सकता था। उन्होंने घोषणा की कि वह “एक शक्तिशाली और एकीकृत केंद्र (सुनिए, सुनिए); 1935 के गवर्नमेंट एक्ट में हमने जो केंद्र बनाया था, उससे भी अधिक शक्तिशाली केंद्र” चाहते हैं। केंद्र की शक्तियों में वृद्धि किए जाने के समर्थक सदस्यों का विचार था कि एक शक्तिशाली केंद्र ही सांप्रदायिक हिंसा को रोकने में समर्थ हो सकता था। गोपालस्वामी अय्यर प्रांतों की शक्तियों में वृद्धि किए जाने के स्थान पर केंद्र को अधिक शक्तिशाली देखना चाहते थे। उनका विचार था कि केंद्र अधिक-से-अधिक मज़बूत होना चाहिए।” संयुक्त प्रांत (आधुनिक उत्तर प्रदेश) के एक सदस्य बालकृष्ण शर्मा ने भी एक शक्तिशाली केन्द्र की आवश्यकता पर बल दिया।

उनकी दलील थी कि

(1) देश के हित में योजना बनाने के लिए; 

(2) उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को जुटाने के लिए; 

(3) उचित शासन व्यवस्था की स्थापना करने के लिए एवं

(4) विदेशी आक्रमण से देश की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली केन्द्र नितांत आवश्यक है

उल्लेखनीय है कि देश के विभाजन से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रांतों को पर्याप्त स्वायत्तता दिए जाने के पक्ष में थी। हमें याद रखना चाहिए कि कांग्रेस ने कुछ सीमा तक मुस्लिम लीग को भी यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया था कि लीग की सरकार वाले प्रांतों में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। किंतु विभाजन के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई परिस्थितियों के कारण अधिकांश राष्ट्रवादियों की राय परिवर्तित हो चुकी थी।

उनकी दलील थी कि विद्यमान परिस्थितियों में विकेंद्रीकृत संरचना के लिए पहले जैसे राजनैतिक दबाव न होने के कारण प्रांतों को अधिक शक्तियाँ दिए जाने की आवश्यकता नहीं थी। हमें यह याद रखना चाहिए कि औपनिवेशिक प्रशासकों द्वारा थोपी गई एकल व्यवस्था देश में पहले से ही अस्तित्व में थी। उस काल में घटित होनेवाली घटनाओं ने केंद्रीकरण को और अधिक प्रोत्साहित किया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के तत्काल पश्चात् देश में व्याप्त अराजकता एवं अव्यवस्था पर अंकुश लगाने के लिए तथा देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के लिए शक्तिशाली केंद्र की आवश्यकता और अधिक महत्त्वपूर्ण बन गई थी। अतः संविधान सभा के अनेक सदस्य शक्तिशाली केंद्र की आवश्यकता पर बल दे रहे थे। यही कारण है कि भारतीय संविधान में एक शक्तिशाली केन्द्र की व्यवस्था की ओर स्पष्ट झुकाव दृष्टिगोचर होता है।

32379.

औरंगजेब ने मुहतस्सिब की नियुक्ति क्यों की थी?

Answer»

औरंगजेब ने मदिरा, भांग आदि के सार्वजनिक सेवन पर प्रतिबंध लगाया तथा अनैतिकता को रोकने एवं जन आचरण पर नजर रखने हेतु मुहतस्सिब नियुक्त किया।

32380.

मुगलों के पतन के कारण के रूप में आर्थिक संकट का वर्णन कीजिए।

Answer»

मुगलों के शासन के अन्त में सामाजिक पतन के साथ-साथ आर्थिक पतन हुआ। इसके अन्त तक राजकोष में न तो अधिक धन बचा था न ही जागीरें। अधिकारियों को वेतन देना कठिन हो गया। कर का बोझ अधिक होने के कारण जमींदार एवं किसान असन्तुष्ट हो गए, जिससे आर्थिक संकट बढ़ गया।

32381.

राजपूतों के प्रति औरंगजेब की नीति के विषय में लिखिए।

Answer»

राजपूतों के प्रति औरंगजेब की नीति- औरंगजेब एक कट्टर मुसलमान था। उसने शासक बनने के बाद राजपूतों के प्रति परम्परागत नीतियों में परिवर्तन किया। कई प्रांतों में राजपूत राजाओं की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने उसे अपने अधीन बना लिया, इससे राजपूत राजाओं में असन्तोष फैल गया और वे बादशाह के विरुद्ध हो गए।

32382.

संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकला?

Answer»

संविधान सभा के सामने एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न राष्ट्र की भाषा को लेकर था। भारत में प्रारंभ से ही अनेक भाषाएँ प्रचलन में रही हैं। देश के भिन्न-भिन्न भागों एवं प्रांतों में भिन्न-भिन्न भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। अतः जब संविधान सभा के सामने राष्ट्र की भाषा का मुद्दा आया, तो इस पर कई महीनों तक बहस होती रही और कई बार तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हुई। 1930 के दशक तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह स्वीकार कर लिया था कि हिंदुस्तानी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए। हिन्दुस्तानी की उत्पत्ति हिंदी और उर्दू के मेल से हुई थी। यह भारतीय जनता के एक विशाल भाग की भाषा थी। विभिन्न संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई यह एक साझी भाषा बन गई थी। समय के साथ-साथ इसमें अनेक स्रोतों से नए-नए शब्दों और अर्थों का समावेश होता गया, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों के अनेक लोग इसे समझने में समर्थ हो गए। गाँधी जी भी हिंदुस्तानी को राष्ट्र भाषा बनाए जाने के पक्ष में थे। उनका विचार था कि हरेक को एक ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए, जिसे सभी लोग सरलतापूर्वक समझ सकें।

राष्ट्रभाषा की विशेषताओं पर अपने विचार व्यक्त करते हुए गाँधी जी ने कहा था, “यह हिंदुस्तानी न तो संस्कृतनिष्ठ हिंदी होनी चाहिए और न ही फ़ारसीनिष्ठ उर्दू। इसे दोनों का सुन्दर मिश्रण होना चाहिए। उसे विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं से खुलकर शब्द उधार लेने चाहिए।” गाँधी जी का विचार था कि हिंदुस्तानी ही हिंदुओं और मुसलमानों को तथा उत्तर और दक्षिण के लोगों को समान रूप से एकजुट करने में समर्थ हो सकती थी। किंतु हमें याद रखना चाहिए कि 19वीं शताब्दी के अंत से एक भाषा के रूप में हिंदुस्तानी के स्वरूप में धीरे-धीरे परिवर्तन होने लगा था। सांप्रदायिक भावनाओं के प्रसार के साथ-साथ हिंदी और उर्दू एक-दूसरे से दूर होने लगी थीं और इस प्रकार भाषा भी धार्मिक पहचान की रणनीति का एक भाग बन गई थी। संविधान सभा के अनेक सदस्य हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलवाना चाहते थे। संयुक्त प्रांत के एक कांग्रेसी सदस्य आर०वी० धुलेकर ने संविधान सभा के एक प्रारंभिक सत्र में ही हिन्दी को संविधान निर्माण की भाषा के रूप में प्रयोग किए जाने की माँग. की थी। धुलेकर की इस माँग का कुछ अन्य सदस्यों द्वारा विरोध किया गया। उनका तर्क था कि क्योंकि सभा के सभी सदस्य हिन्दी नहीं समझते, इसलिए हिंदी संविधान निर्माण की भाषा नहीं हो सकती थी।

इस प्रकार भाषा का मुद्दा तनाव का कारण बन गया और यह आगामी तीन वर्षों तक सदस्यों को उत्तेजित करता रहा। 12 सितम्बर, 1947 ई० को राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर धुलेकर के भाषण से एक बार फिर तूफान उत्पन्न हो गया। इस बीच संविधान सभा की भाषा समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जा चुकी थी। समिति ने राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर हिन्दी । समर्थकों तथा हिंदी विरोधियों के मध्य उत्पन्न हुए गतिरोध को समाप्त करने के लिए एक फार्मूला ढूंढ निकाला था। समिति का सुझाव था कि देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को भारत की राजकीय भाषा का दर्जा दिया जाए, किन्तु समिति द्वारा इस फार्मूले की घोषणा नहीं की गई, क्योंकि उसका विचार था कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए क्रमशः आगे बढ़ना चाहिए। फार्मूले के अनुसार (1) यह निश्चित किया गया कि पहले 15 वर्षों तक सरकारी कार्यों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग जारी रखा जाएगा। (2) प्रत्येक प्रांत को अपने सरकारी कार्यों के लिए किसी एक क्षेत्रीय भाषा के चुनाव का अधिकार होगा। इस प्रकार, संविधान सभा की भाषा समिति ने विभिन्न पक्षों की भावनाओं को संतुष्ट करने तथा एक । सर्वस्वीकृत समाधान प्रस्तुत करने के उद्देश्य से हिंदी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर राजभाषा घोषित किया।

32383.

मुगल साम्राज्य के पतन में किस सीमा तक औरंगजेब उत्तरदायी था?

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मुगल साम्राज्य के पतन में औरंगजेब सबसे अधिक उत्तरदायी था। उसके शासन काल में मुगल साम्राज्य की कमजोरी सबको मालूम हो गई। मुगल सरदारों की विलासिता अधिक बढ़ गई। प्रशासनिक स्तर पर व्यापक भेदभाव एवं असन्तोष फैल गया। इससे उसके जागीरदारी व्यवस्था में गम्भीर संकट पैदा हो गया। उसने अपने राजनीतिक क्षेत्र में कई गलतियाँ की। उसने राजपूतों एवं मराठों को मित्र बनाने के बजाय शत्रु बनाया, जो उसके पतन का कारण बने।

32384.

पानीपत के युद्ध का क्या परिणाम हुआ?

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पानीपत के युद्ध से भारत में लोदी वंश के साम्राज्य और प्रभुत्व का अंत हुआ साथ ही भारत में एक नए वंश- मुगल वंश कीस्थापना हुई, जिसका भारत के इतिहास में गौरव पूर्ण स्थान है।

32385.

बाबर के समय पंजाब व गुजरात की क्या स्थिति थी?

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बाबर के समय पंजाब की स्थिति – बाबर के आक्रमण के समय पंजाब का सूबेदार दौलत खाँ था। यद्यपि वह दिल्ली साम्राज्य के अधीन था, लेकिन अपने आपको स्वतंत्र शासक के रूप में देखना चाहता था। इसलिए दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी को समाप्त करने के लिए उसने काबुल के शासक बाबर को पत्र-व्यवहार कर भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया था।  बाबर के समय गुजरात की स्थिति- बाबर के आक्रमण के समय सुदूर पश्चिम में स्थित गुजरात का शासक मुजफ्फरशाहथा। अपने शासनकाल में वह मालवा और मेवाड़ के पड़ोसी राज्यों के साथ युद्ध लड़ता रहता था।

32386.

बाबर के प्रारम्भिक आक्रमणों का विवरण कीजिए।

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बाबर ने भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना से पहले भारत पर कई आक्रमण किए। इन आक्रमणों से मिली सफलताओं ने बाबर के दिल में यह विश्वास भर कि वह भारत में स्थायी तौर पर अपने राज्य की स्थापना कर सकता है। बाबर के इन प्रारम्भिक आक्रमणों का विवरण निम्न प्रकार है

पहला आक्रमण – बाबर ने भारत पर सर्वप्रथम 1519 ई० में आक्रमण किया। उसने बाजौर और भेरा में कत्ल-ए-आम करके उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। भेरा को हिन्दू बेग को सौंपकर उसने काबुल प्रस्थान किया। परन्तु बाद में वहाँ के निवासियों ने हिन्दू बेग को भगा दिया।

दूसरा आक्रमण – सन् 1519 ई० में ही बाबर ने पेशावर पर आक्रमण किया। परन्तु बदख्शाँ के उपद्रवों की वजह से उसे वापस लौटना पड़ा।

तीसरा आक्रमण – सन् 1520 ई० में बाबर ने भारत पर आक्रमण कर पुनः बाजौर और भेरा को अपने कब्जे में ले लिया। फिर स्यालकोट और सैयदपुर जीतने के बाद बाबर ने कन्धार पर कब्जा करके अपने पुत्र कामरान को वहाँ का सूबेदार नियुक्त कर दिया।

चौथा आक्रमण – बाबर के चौथे आक्रमण ने भारत पर उसके साम्राज्य स्थापित करने का रास्ता साफ कर दिया। सन् 1524 ई० में उसने भारत पर आक्रमण करके पंजाब को अपने अधिकार में ले लिया। इस युद्ध में इब्राहीम लोदी की पराजय ने बाबर के लिए दिल्ली विजय का रास्ता खोल दिया।

32387.

बाबर के चरित्र का वर्णन कीजिए।

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बाबर के चरित्र में निम्नलिखित विशेषताएँ थीं

(i) व्यक्ति के रूप में – बाबर का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था। वह अदम्य शारीरिक और आत्मिक शक्ति का स्वामी था। विभिन्न समकालीन एवं आधुनिक विद्वानों ने उसके विभिन्न गुणों की प्रशंसा की है। बाबर के चरित्र की व्याख्या करते हुए एक विद्वान ने लिखा है- “बाबर का चरित्र नारी-दोष से निष्कलंक था, इस सन्दर्भ में तो उसे एक सूफी कहा जा सकता है। वह एक सच्चा मुसलमान था क्योंकि अल्लाह में उसे बड़ा विश्वास था। वह उच्चकोटि का साहित्यकार भी था। उसकी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ विश्व के महान ग्रन्थों में गिनी जाती है। बाबर प्रकृति-प्रेमी भी था। मुगल साम्राज्य का संस्थापक सम्राट बाबर अपने मनोरम और सुन्दर व्यक्तित्व, कलात्मक स्वभाव तथा अद्भुत चरित्र के कारण इस्लाम के इतिहास में सदा अमर रहेगा।

(ii) विद्वान शासक के रूप में – बाबर एक जन्मजात सैनिक था और उसे विजेता के रूप में याद किया जाता है, किन्तु यदि बाबर ने भारत ने जीता होता तो भी विद्वान् के रूप में उसे सर्वदा याद किया जाता। उसे पर्शियन और अरबी भाषा का ज्ञान था और वह तुर्की भाषा का विद्वान था। तुर्की भाषा में लिखी हुई उसकी आत्मकथा’ साहित्य और इतिहास दोनों ही दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ मानी गई है, इसमें सभी कुछ इतना सत्य, स्पष्ट, बुद्धिमत्तापूर्ण और रोचक है कि ‘तुजुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) संसार की श्रेष्ठतम आत्मकथाओं में स्थान रखती है। पद्य की रचनाओं में उसके द्वारा किया गया संकलन ‘दीवारन’ था, जो तुर्की पद्य में श्रेष्ठ स्थान रखता है। न्याय पर भी उसने एक पुस्तक लिखी थी, जिसे सभी ने श्रेष्ठ स्वीकार किया था।

(iii) सेनापति के रूप में – बाबर एक साहसी और कुशल सैनिक था। वह एक प्रशंसनीय घुड़सवार, अच्छा निशानची, कुशल तलवारबाज और जबर्दस्त शिकारी था। सेनापति की योग्यता को बाबर ने अपने संघर्षमय जीवन के अनुभव से प्राप्त किया। वास्तव में बाबर में तुर्को की शक्ति, मंगोलों की कट्टरता और ईरानियों का उद्वेग एवं साहस सम्मिलित था। उसमें नेतृत्व करने का स्वाभाविक गुण था। वह अपनी सेना से बड़ी सेनाओं का मुकाबला करने में डरता न था। अनुशासनहीनता उसे पसन्द न थी और उसकी अवहेलना होने पर वह अपने सैनिकों को कठोर दण्ड देता था। इस प्रकार बाबर एक योग्य सैनिक और सफल सेनापति था।

(iv) राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ के रूप में – एक राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ के रूप में बाबर पर्याप्त सफल था। अपनी दुर्बल स्थिति को देखकर उसने अपने मामाओं से समझौते के प्रस्ताव किए थे, परन्तु एक राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ की दृष्टि से उसका प्रमुख कार्य भारत में शुरू हुआ। जिस प्रकार उसने भारतीय और अफगान अमीरों में सन्तुलन बनाकर रखा और जिस प्रकार उसने बिहार और बंगाल के शासकों से व्यवहार किया उससे कूटनीतिज्ञ प्रतिभा झलकती है। कम-से-कम छ: हिन्दू राजाओं ने भी स्वेच्छा से उसके आधिपत्य को स्वीकार किया था।

(v) शासन-प्रबन्धक के रूप में – बाबर एक अच्छा शासन-प्रबन्धक नहीं था। यह केवल इसी से स्पष्ट नहीं होता कि उसने भारत के शासन-प्रबन्ध में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं किए बल्कि काबुल के शासक के रूप में भी वह सफल नहीं हुआ था। बाबर ने अपने प्रदेशों में समान शासन-व्यवस्था, लगान-व्यवस्था, कर-व्यवस्था और समुचित न्याय व्यवस्था लागू करने का प्रयत्न नहीं किया। धन सम्बन्धी मामलों में भी बाबर लापरवाह था।

32388.

हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाइयों का वर्णन कीजिए।

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हुमायूँ की प्रारम्भिक कठिनाईयाँ – हुमायूं जिस समय गद्दी पर बैठा, वह चारों ओर से कठिनाइयों और समस्याओं से घिरा हुआ था। ऐसी परिस्थितियों में एक सैनिक प्रतिभा से युक्त, कूटनीतिक चातुर्य और राजनीतिक सूझबूझ से सम्पन्न शासक की आवश्यकता थी, परन्तु हुमायूं में इन सबका अभाव था। अत: वह स्वयं अपना सबसे बड़ा शत्रु सिद्ध हुआ। हुमायूँ के चरित्र में अनेक दुर्बलताओं का सम्मिश्रण था। अत: कुछ विद्वानों का मत है कि हुमायूँ के चरित्र में अनेक दोष थे, जिनके कारण वह असफल रहा। किन्तु यह भी सत्य है कि हुमायूं को अनेक कठिनाइयाँ विरासत में भी मिली थी। अत: हुमायूँ की प्रमुख कठिनाइयों और समस्याओं का वर्णन करना आवश्यक है ।

(i) हिन्दुओं व मुसलमानों का विरोध – बाबर ने पानीपत के युद्ध में मुसलमानों को अपना शत्रु बना लिया था, साथ ही खानवा के युद्ध में हिन्दुओं का क्रूरता से हत्याकाण्ड करके उसने हिन्दुओं को भी अपना विरोधी बना लिया था। अत: उसका पुत्र हुमायूँ जब सिंहासन पर बैठा तब उसे हिन्दुओं व मुसलमानों दोनों का सहयोग न मिल सका।।

(ii) आर्थिक संकट – बाबर का अधिकतम जीवन युद्धों में व्यतीत हुआ था। हालाँकि पानीपत के युद्ध में उसे एक विशाल धनराशि प्राप्त हुई थी, किन्तु उसने वह धनराशि विजय की खुशी में अपने सरदारों, सम्बन्धियों आदि के बीच वितरित कर दी थी। इस प्रकार धन के वितरण तथा युद्धों में धन के अपव्यय के कारण उसका राजकोष खाली हो गया था। अत: जिस समय हुमायूं सिंहासन पर बैठा, उस समय खाली राजकोष उसे विरासत में मिला था।

(iii) उत्तराधिकार के नियमों का अभाव – मुगल वंश में भी उत्तराधिकार के नियमों का अभाव था, अत: बाबर की मृत्यु के बाद उसके अन्य तीन लड़के- कामरान, अस्करी व हिन्दाल तथा बाबर के अन्य सम्बन्धी भी अपने को सम्राट घोषित करने का प्रयास कर रहे थे। इसके साथ-साथ स्वयं बाबर का यह उपदेश था कि मेरी अन्तिम इच्छा का सार यही है कि अपने भाइयों के विरुद्ध कभी कोई कार्य न करना, चाहे वे उसके योग्य ही क्यों न हों। इस उपदेश के कारण हुमायूँ ने अपने भाइयों के साथ उदारता का व्यवहार करके अपनी कठिनाइयों को और अधिक बढ़ा लिया।

(iv) सम्बन्धियों की समस्या – सम्बन्धियों की समस्या भी हुमायूं के सम्मुख एक प्रमुख कठिनाई थी। इन सम्बन्धियों में उसकी सौतेली बहन मासूमा बेगम का पति मुहम्मद जमान मिर्जा, बाबर का बहनोई मीर मुहम्मद मेहँदी ख्वाजा तथा हुमायूं के भाई कामरान, अस्करी और हिन्दाल मुख्य थे। अस्करी और हिन्दाल दुर्बल व अस्थिर-बुद्धि के थे और वे इसलिए खतरनाक थे कि महत्वाकांक्षी लोग इन्हें अपने हाथों की कठपुतली बना सकते थे।

(v) असंगठित साम्राज्य – बाबर ने हालाँकि अपने सैनिक-बल पर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी, किन्तु न तो उसने उसे संगठित किया तथा न ही शासन-व्यवस्था में कोई सुधार ही किया। अत: विरासत में हुमायूँ को एक असंगठित साम्राज्य मिला था, जो अराजकता से पूर्ण था और ऐसी स्थिति में हुमायूं के लिए कार्य करना कठिन था।

(vi) दोषपूर्ण सैनिक संगठन – बाबर की सेना मुगल, पठान, चगताई आदि अनेक भिन्न-भिन्न जातियों के सैनिकों का सम्मिश्रण थी, जिनमें एकता का अभाव था। अतएव सेना को संगठित रखना भी हुमायूं के लिए बड़ी समस्या थी।

(vii) अफगानों की समस्या – यद्यपि बाबर ने अफगानों को पानीपत के युद्ध में परास्त कर दिया था तथा मुगल साम्राज्य की स्थापना कर दी थी, परन्तु अफगान अभी भी शान्त नहीं बैठे थे। वे बदला लेने के लिए आतुर थे। जिस दौरान हुमायूँ ने सिंहासनारोहण किया, उस समय महमूद लोदी, शेर खाँ जैसे शक्तिशाली किन्तु अत्यन्त महत्वाकांक्षी अफगानों ने उसके | विरुद्ध विद्रोह कर दिया। उसे उनके विरुद्ध लड़ना पड़ा। अतः अफगानों की समस्या हुमायूं को विरासत में प्राप्त हुई थी।

32389.

बाबर की विजय के कारणों की व्याख्या कीजिए।

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भारत में बाबर की विजय के प्रमुख कारणों का विश्लेषण निम्नवत् है

(i) इब्राहीम लोदी की सैनिक कमजोरियाँ – इब्राहीम लोदी अनुभवहीन और अयोग्य सेनापति था। उसे रणक्षेत्र में सेनाओं के कुशल संचालन और संगठन का विशेष ज्ञान नहीं था। इब्राहीम के अन्य सेनापति और सरदार भी विलासी, दम्भी और अनुभवहीन थे। बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में लिखा है- “वह (इब्राहीम) अनुभवहीन युवक अपनी गतिविधियों में लापरवाह था, बिना किसी नियम-कायदे के वह आगे बढ़ जाता था, बिना किसी ढंग के रुक जाता अथवा पीछे मुड़ जाता और बिना सोचे-समझे शत्रु से भिड़ जाता।” इब्राहीम लोदी की सैनिक दुर्बलता बाबर जैसे सैनिक
के लिए वरदान सिद्ध हुई।

(ii) इब्राहीम लोदी की अयोग्यता – इब्राहीम लोदी एक अयोग्य निर्दयी और जिद्दी सुल्तान था। उसमें राजनीतिज्ञता, कूटनीति और दूरदर्शिता नहीं थी। इन गुणों के अभाव के कारण वह दौलत खाँ, आलम खाँ, मुहम्मदशाह और राणा साँगा को बाबर के विरुद्ध अपने पक्ष में नहीं मिला सका।

(iii) बाबर द्वारा तोपों का प्रयोग – पानीपत के युद्ध में इब्राहीम के पास तोपखाना और कुशल अश्वारोही सेना नहीं थी, जबकि बाबर के पास सुदृढ़ तोपखाना था, जिसका संचालन उस्ताद अली और मुस्तफा जैसे अनुभवी सेनानायकों ने किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आग उगलने वाली तोपों के सम्मुख साधारण शस्त्रों से युद्ध करने वाले सैनिक नहीं टिक पाए। पानीपत में बाबर की विजय में उसके कुशल अश्वारोही और भारी तोपखाना अत्यन्त सहायक हुए।

(iv) बाबर की रणकुशलता और सैन्य संचालन – बाल्यकाल से ही निरंतर संकटों, संघर्षों और युद्ध में भाग लेते रहने से बाबर एक वीर, साहसी, कुशल योद्धा और अनुभवी सैनिक बन गया था। इस प्रकार बाबर एक जन्मजात वीर एवं महान् सेनापति था, इसीलिए उसे पानीपत और खानवा के युद्धों में निर्णायक विजय प्राप्त करने में अधिक कठिनाई नहीं हुई।

(v) राणा साँगा की गलतियाँ – खानवा के युद्ध में राणा साँगा की सबसे बड़ी भूल यह थी कि उन्होंने बाबर पर एकदम आक्रमण नहीं किया, अपितु उसे संगठित और तैयार होने के लिए अवसर दिया। खानवा के समीप की पहली मुठभेड़ में बाबर का सेनापति परास्त हो चुका था और बयाना से उसकी सेना पहले ही हारकर भाग चुकी थी और वह राजपूतों की वीरता व रणकौशल से आतंकित हो गई थी। यदि उसी समय राणा साँगा बाबर पर अपनी पूरी शक्ति से आक्रमण कर देते तो विजय उन्हें ही प्राप्त होती और बाबर भारत से भाग गया होता। राणा साँगा के युद्ध में हारने का एक कारण युद्ध में हाथियों का प्रयोग भी था।

(vi) बाबर की सैनिक तैयारी तथा तुलगमा रणनीति का प्रयोग – बाबर ने पानीपत और खानवा दोनों ही युद्धों में पूर्ण सैनिक तैयारी की थी। उसने अपनी सेना के सबसे आगे बिना बैल की बैलगाड़ियों की पंक्ति लगाई और इन गाड़ियों को परस्पर जोड़कर एक-दूसरे से लगभग 18 फुट लम्बी लोहे की जंजीरों से बाँध दिया। सेना के जिस भाग में बैलगाड़ियाँ नहीं थीं, उस ओर सुरक्षा के लिए खाइयाँ खुदवा दीं। इनके पीछे बन्दूकची और तोपखाने के गोलन्दाज खड़े किए गए। खानवा के युद्ध में निजामुद्दीन अली खलीफा ने तोपों का नेतृत्व किया। बन्दूकों की व्यवस्था मुस्तफा के अधीन थी और तोपों से गोलाबारी उस्ताद अली ने करवाई। इसके अतिरिक्त बाबर ने पानीपत और खानवा के युद्धों में तुलगमा रणनीति अपनाकर विजय प्राप्त की।

32390.

हुमायूँ की शेर खाँ के विरुद्ध हार के किन्हीं तीन कारणों का वर्णन कीजिए।

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शेर खाँ के विरुद्ध हुमायूँ की हार के तीन कारण निम्नवत् हैं

(i) दोषपूर्ण युद्ध प्रणाली – हुमायूँ की युद्ध प्रणाली दोषपूर्ण थी। वह अपने शत्रुओं को परास्त करने के उपरान्त क्षमा कर दिया करता था, जिससे उन्हें अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल जाता था। अपने महत्वाकांक्षी शत्रुओं को पूरी तरह कुचले बिना छोड़कर हुमायूं ने अपने पतन का मार्ग स्वयं प्रशस्त किया। हुमायूं का यह चारित्रिक दोष था कि वह अपनी विजय पर शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता था।

(ii) धन का अपव्यय – बाबर ने युद्धों व खैरात के रूप में धन का अपव्यय करके शाही खजाने को खाली कर दिया था। इसी प्रकार हुमायूँ भी अपनी विजयों के उपलक्ष्य में बड़ी-बड़ी दावतें आयोजित करता था और अपने सरदारों तथा परिवार के सदस्यों को भेंट दिया करता था, अत: हुमायूँ को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा और अन्तत: उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा।

(iii) चारित्रिक अयोग्यता – हुमायूं अपनी असफलता का कारण स्वयं ही था। वह मदिरा-प्रेमी, अयोग्य एवं सैनिक गुणों से रहित एक असफल शासक था। हुमायूँ को अफीम सेवन का भी बहुत शौक था, जिससे वह आलसी हो गया था।

32391.

बाबर की विजय( सन् 1526 ई० ) में किन्हीं तीन कारणों का उल्लेख कीजिए।

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बाबर की विजय के प्रमुख तीन कारणों का उल्लेख निम्नवत् है

(i) इब्राहीम लोदी की सैनिक कमजोरियाँ – इब्राहीम लोदी अनुभवहीन और अयोग्य सेनापति था। उसे रणक्षेत्र में सेनाओं के कुशल संचालन और संगठन का विशेष ज्ञान नहीं था। इब्राहीम के अन्य सेनापति और सरदार भी विलासी, दम्भी और अनुभवहीन थे। बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में लिखा है- “वह (इब्राहीम) अनुभवहीन युवक अपनी गतिविधियों में लापरवाह था, बिना किसी नियम-कायदे के वह आगे बढ़ जाता था, बिना किसी ढंग के रुक जाता अथवा पीछे मुड़ जाता और बिना सोचे-समझे शत्रु से भिड़ जाता।” इब्राहीम लोदी की सैनिक दुर्बलता बाबर जैसे सैनिक
के लिए वरदान सिद्ध हुई।।

(ii) इब्राहीम लोदी की अयोग्यता – इब्राहीम लोदी एक अयोग्य निर्दयी और जिद्दी सुल्तान था। उसमें राजनीतिज्ञता, कूटनीतिऔर दूरदर्शिता नहीं थी। इन गुणों के अभाव के कारण वह दौलत खाँ, आलम खाँ, मुहम्मदशाह और राणा साँगा को बाबर के विरुद्ध अपने पक्ष में नहीं मिला सका।

(iii) बाबर द्वारा तोपों का प्रयोग – पानीपत के युद्ध में इब्राहीम के पास तोपखाना और कुशल अश्वारोही सेना नहीं थी, जबकि बाबर के पास सुदृढ़ तोपखाना था, जिसका संचालन उस्ताद अली और मुस्तफा जैसे अनुभवी सेनानायकों ने किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आग उगलने वाली तोपों के सम्मुख साधारण शस्त्रों से युद्ध करने वाले सैनिक नहीं टिक पाए। पानीपत में बाबर की विजय में उसके कुशल अश्वारोही और भारी तोपखाना अत्यन्त सहायक हुए।

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हुमायूँ की असफलताओं के कारणों की विवेचना कीजिए।

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हुमायूँ को शेरशाह के विरुद्ध कई पराजय झेलनी पड़ी। जब तक शेरशाह जीवित रहा, हुमायूँ को दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी। विभिन्न भूलें जो हुमायूँ ने अपने शासन के आरम्भ में कीं, वे अन्त में हुमायूँ की पराजय और असफलता के लिए उत्तरदायी हुईं। जिन परिस्थितियों में हुमायूँ को सिंहासन त्यागना पड़ा, उनमें से अधिकांश उसकी मूर्खता और कमजोरियों का परिणाम था, जिसका वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है

(i) असंगठित शासन-व्यवस्था – यह सही है कि हुमायूं को विरासत में अस्त-व्यस्त प्रशासन-व्यवस्था प्राप्त हुई थी, जिसका कारण बाबर को पर्याप्त समय नहीं मिल पाना था, लेकिन हुमायूँ को तो पर्याप्त समय मिला था। सिंहासन पर आसीन होने के बाद हुमायूँ ने शासन-व्यवस्था पर जरा भी ध्यान नहीं दिया। बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ के लिए ऐसी शासन-व्यवस्था छोड़ी थी, जो केवल युद्धकालीन स्थिति में ही स्थिर रह सकती थी, शांति के समय वह शिथिल और निराधार थी। हुमायूँ इतना योग्य नहीं था कि असंगठित शासन-व्यवस्था को सुसंगठित कर पाता।

(ii) बहादुरशाह के प्रति हुमायूँ की नीति – बहादुरशाह के प्रति अपनाई गई हुमायूं की नीति उसकी असफलता का प्रमुख कारण बनी। हुमायूं को बहादुरशाह पर उसी समय आक्रमण कर देना चाहिए था, जब वह चित्तौड़ में राजपूतों से युद्ध कर रहा था। ऐसा करने पर उसे विजय और राजपूतों की सहानुभूति मिलने की अधिक सम्भावना थी। माण्डु में कई सप्ताह तक विलासिता में डूबे रहने के कारण वह गुजरात और मालवा विजय को स्थिर न रख सका। अवसर मिलते ही बहादुरशाह ने मालवा और गुजरात पर पुन: अधिकार कर लिया।

(iii) हुमायूँ के चारित्रिक दोष – हुमायूं में संकल्प-शक्ति और चारित्रिक बल का अभाव था। डटकर प्रयत्न करना उसकी शक्ति के बाहर था। विजय प्राप्ति के थोड़े समय बाद ही वह अपने हरम में जाकर आनन्द से पड़ा रहता था और अपने समय को अफीमची के सपनों की दुनिया में नष्ट करता था। उसने गुजरात और मालवा विजयों के पश्चात् कई सप्ताह तक रंगरेलियाँ मनाईं। इसी प्रकार गौड़ पर अधिकार करने के पश्चात् वहाँ भोग-विलास में आठ माह से अधिक का समय नष्ट किया। शत्रु की शक्ति का अनुमान न लगा पाना और कठिन परिस्थितियों में तत्काल निर्णय न कर पाना उसकी अन्य कमजोरियाँ थीं। जैसा कि एलफिंस्टन ने लिखा है कि वह वीर अवश्य था, किन्तु स्थिति की गम्भीरता को समझने की योग्यता उसमें नहीं थी। डॉ० ए०एल० श्रीवास्तव ने लिखा है कि “ऐसे अवसर पर जबकि उसे सजग-सचेष्ट होकर सैन्य संचालन में संलग्न रहना चाहिए था तब अपने हरम में रंगरेलियाँ मनाना और आराम करने का हुमायूँ का यह स्वभाव उसकी असफलता का एक प्रमुख कारण बना।”

(iv) हुमायूँ की भूलें – जिन विषम परिस्थितियों में हुमायूँ ने राज्य सम्भाला, अपनी गलतियों से उसने उसे और कठिन बना दिया। हुमायूँ ने अपने भाइयों में साम्राज्य का बँटवारा कर पहली भूल की। काबुल, कंधार और पंजाब कामरान को दे देने से उसकी शक्ति का आधार ही खत्म हो गया तथा अस्करी और हिन्दाल को छोटी जागीरें देने से उनमें असन्तोष बना रहा। द्वितीय, हुमायूं ने कालिंजर का अभियान कर दूसरी भूल की, क्योंकि न तो राजा को पराजित किया जा सका और न उसे मित्र बनाकर अपनी तरफ मिलाया जा सका।
चुनार का दुर्ग शेर खाँ के ही आधिपत्य में रख देना उसकी तीसरी भूल थी, इससे शेरखाँ को अपनी शक्ति बढ़ाने का मौका मिल गया। गुजरात में बहादुरशाह के विरुद्ध चित्तौड़ की मदद न करना उसकी चौथी भूल थी, जिससे उसने राजपूतों की सहानुभूति और सहयोग प्राप्त करने का अवसर खो दिया। जिस प्रकार राजपूतों ने बाद में अकबर का साथ देकर मुगल साम्राज्य को दृढ़ता प्रदान की, उसी प्रकार हुमायूँ भी उनका साथ लेकर अपने साम्राज्य की रक्षा कर सकता था।
पाँचवाँ, गुजरात के शासक बहादुरशाह के विरुद्ध आक्रमण की योजना में अनेक भूलें रह गई थीं, जिनके कारण मालवा और गुजरात से ही उसे हाथ नहीं धोने पड़े, बल्कि इससे उसकी भावी असफलता, अवनति और प्रतिष्ठा के अन्त का संकेत भी प्राप्त हो गया। छठा, कन्नौज की लड़ाई में तो उसने भारी भूल की, जैसे कि सैनिक-शिविर के लिए नीचा स्थान चुना, डेढ़ महीने तक अकर्मण्य बने रहना, शिविर को दूसरे स्थान पर हटाते समय अच्छा प्रबन्ध न करना, तोपखाने का युद्ध में उपयोग न कर पाना आदि बातें उसकी असफलता, पराजय और अन्त में युद्ध क्षेत्र से उसके भागने के लिए भी उत्तरदायी बनी।।

(v) भाइयों के प्रति उदारता – यह सत्य है कि बाबर ने हुमायूँ को अपने भाइयों के प्रति उदार रहने का निर्देश दिया था। लेकिन जब उसे मालूम हो गया था कि उसके भाई उसके प्रति वफादार नहीं है, तब उसे अपने व्यवहार में परिवर्तन लाना चाहिए था। लेकिन इसके बावजूद वह अपने भाइयों के प्रति उदार बना रहा। इसका परिणाम यह हुआ कि हिसार-फिरोजा और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र उसके हाथ से निकल गए और इन क्षेत्रों पर कामरान का अधिकार स्वीकार कर लिया। फिर भी कामरान के विरोधी रुख में कोई परिवर्तन नहीं आया। अस्करी और हिन्दाल भी उसके प्रति वफादार नहीं रहे। उन्हें जब भी अवसर मिला उन्होंने हुमायूं के विरुद्ध विद्रोह कर स्वयं को सम्राट घोषित कर दिया। लेकिन हुमायूं बार-बार अपने भाइयों को माफ करता रहा। अपने भाइयों के प्रति अत्यधिक उदारता हुमायूँ की असफलता में सहायक सिद्ध हुई।।

(vi) शेर खाँ के प्रति नीति – हुमायूँ कभी भी शेर खाँ की शक्ति और योजना का सही आकलन नहीं कर पाया। वह उसको सदैव अक्षम एवं दुर्बल समझता रहा और शेर खाँ अपनी शक्ति को बढ़ाने में जुटा रहा। शेर खाँ की शक्ति का सही आकलन न कर पाने की हुमायूँ को भारी कीमत चुकानी पड़ी।

(vii) हुमायूँ की अपव्ययता – हुमायूँ को विरासत में रिक्त राजकोष मिला था, उस समय एक ऐसे अर्थ-विशेषज्ञ शासक की जरूरत थी, जो साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को ठीक करता। लेकिन हुमायूं ने इस पक्ष की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। बाद में हुमायूँ को कालिंजर से युद्ध-क्षति के रूप में बहुत बड़ी धनराशि और चम्पानेर में गुजरात के शासकों का विशाल कोष मिला था, लेकिन उसने इस धन को बड़ी-बड़ी दावतें देने, आनन्द उत्सव मनाने, अपने अनुयायियों को पुरस्कार बाँटने और इमारतें बनाने में खर्च कर दिया। चम्पानेर से प्राप्त कोष को तो उसने खुले हाथों से खर्च किया। इससे साम्राज्य की
आर्थिक स्थिति और खराब हो गई।

(viii) भारतीय जनता का असहयोग – हुमायूँ को भारतीय जनता एक आक्रमणकारी मानती थी। हुमायूँ ने न तो कभी जनकल्याण की ओर ध्यान दिया और न ही जनता को अपनी ओर आकर्षित किया। रचनात्मक कार्यों के स्थान पर उसने साम्राज्यवादी नीति अपनाई जो जनता के असहयोग के कारण सफल न हो सकी।

(ix) हुमायूँ का दुर्भाग्य – हुमायूँ का अर्थ होता है- भाग्यशाली, लेकिन वास्तव में हुमायूँ अत्यन्त ही दुर्भाग्यशाली था। कदम कदम पर उसके भाग्य ने उसे धोखा दिया। यदि भाग्य ने उसका साथ दिया होता तो वह कभी पराजित न होता। कन्नौज के युद्ध में उसकी पराजय के विषय में डॉ० कानूनगो लिखते हैं कि ‘‘बादशाह का दुर्भाग्य था, जो असामयिक वर्षा के रूप में प्रकट हुआ और जिससे गर्मी के दिनों में उस शिविर में पानी घुस आया, यदि यह दुर्घटना न होती तो हुमायूँ अपने दुर्गम्य शिविर से नहीं हटता।”

(x) उचित नेतृत्व की योग्यता का अभाव – हुमायूँ में कुशल नेतृत्व का अभाव था। जहाँ तक सम्भव होता, वह कठिनाइयों को टालता जाता था। अपने दस वर्षों के राज्यकाल में उसने नेतृत्व शक्ति और अपने सैनिकों एवं अधिकारियों को नियन्त्रण में रखने की योग्यता का नितान्त अभाव प्रदर्शित किया। उसे न तो सैन्य संगठन का ज्ञान था और न ही सैन्य संचालन का। चौसा और कन्नौज के युद्ध में वह अपनी सेना पर कुशल नियन्त्रण न रख सका। उसे इस बात का भी ज्ञान नहीं था कि शत्रु पर कब और किस प्रकार आक्रमण करना चाहिए। शेर खाँ की दिन-प्रतिदिन बढ़ती शक्ति का ठीक अनुमान न लगा पाना और उसके खिलाफ कुशल नेतृत्व के साथ संघर्ष न करना उसकी असफलता के कारण थे। इस प्रकार हुमायूँ की असफलता के विभिन्न कारण बताए जाते हैं। इनसे स्पष्ट होता है कि हुमायूँ की विभिन्न दुर्बलताएँ और भूलें तथा इनके विपरीत शेर खाँ की योग्यता और उसका व्यक्तित्व हुमायूँ की असफलता के मुख्य कारण थे।

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संचयी बारम्बारता वक्र क्या है? यासंचयी आवृत्ति वक्र क्या है? 

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संचयी बारम्बारता वक्र संचयी बारम्बारता बण्टन का एक आलेख होता है। यदि वर्ग अन्तरालों की ऊपरी सीमाओं को x-अक्ष पर और उनकी संगत संचयी बारम्बारताओं को y-अक्ष पर लेते हुए बिन्दुओं को अंकित किया जाए और फिर उन्हें क्रमशः सरल रेखाओं से मिला दिया जाए तो जो आकृति बनेगी, वह संचयी बारम्बारता बहुभुज होगी। परन्तु यदि अंकित बिन्दुओं को मिलाते हुए एक मुक्त हस्त निष्कोण वक्र खींचा जाता है तो इसे संचयी बारम्बारता वक्र या तोरण या ओजाइव (संचयी आवृत्ति) वक्र कहते हैं।

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निम्नलिखित में से कौन-सा द्विविमीय चित्र है?(क) आयत चित्र(ख) दण्ड चित्र(ग) रेखा चित्र(घ) प्रतीक चित्र

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सही विकल्प है  (क) आयत चित्र।

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राजपूतों पर तुर्को की विजय के क्या कारण थे ?

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राजपूतों पर तुर्की की विजय का कारण इतिहासकार अलग-अलग बताते हैं। इतिहासकारों के बीच इस बात को लेकर सहमति नहीं है फिर भी मुख्य रूप से तुर्की की जीत के निम्नलिखित कारण हैं

  • राजपूत राजाओं में एकता का अभाव।
  • राजपूतों द्वारा पुरानी युद्ध प्रणाली व शस्त्रों का प्रयोग करना।
  • तुर्क सेना के पास अच्छी नस्ल के घोड़े और फुर्तीले घुड़सवारों का होना। .
  • तुर्क सैनिकों का कुशल तीरंदाज होना।
  • भारतीय समाज का ऊँच-नीच एवं जात-पाँत में बँटा होना।
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अरबों तथा भारतीयों ने एक दूसरे से क्या-क्या सीखा? सूची बनाइए।

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भारतीयों ने अरबों से सीखा- कागज बनाना, चरखे से सूत कातना, सिले हुए कपड़े-सलवार, कमीज; खान-पान- कचौड़ी, समोसे बनाना।

अरबों ने भारतीयों से सीखा- हिंदी संख्या से अरबी संख्या बनाना, संख्याओं की गणना करना, ज्योतिष, गणित, शतरंज का खेल, भारतीय संगीत, चिकित्सा शास्त्र (आयुर्वेद का ज्ञान)।

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हजरत मोहम्मद के जन्म के समय अरब देश का जनजीवन कैसा था?

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हजरत मोहम्मद के जन्म के समय अरब में अनेक छोटे-छोटे कबीले थे जो लगातार एक दूसरे से लड़ते रहते थे। ये लोग बहुत सारे देवी-देवताओं की पूजा करते थे।

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इस्लाम धर्म के संस्थापक कौन थे?

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इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मोहम्मद थे।

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तुर्क आक्रमण के समय भारत की राजनैतिक दशा कैसी थी?

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गजनवी एवं गौरी के आक्रमण के समय भारत में कोई शक्तिशाली शासक नहीं था। कई छोटे-बड़े राजा और सामन्त राज्य करते थे। उत्तर भारत में चौहान, तोमर, गहड़वाल, चन्देल और चालुक्य जैसे वंशों के राज्य थे। ये राष्ट्रीय भावना की कमी एवं आपसी फूट होने के कारण एक-दूसरे से लड़ते थे। इनमें व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा और संकीर्ण राजनैतिक दृष्टिकोण था।

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महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण का क्या उद्देश्य था?

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महमूद गजनवी एक महत्त्वाकांक्षी शासक था, वह गजनी को एक समृद्ध एवं शक्तिशाली साम्राज्य बनाना चाहता था। उसने धन एकत्र करने के लिए भारत पर 17 बार आक्रमण किया और सारा धन लूटकर गजनी ले गया।

मुहम्मद गौरी का उद्देश्य भारत से धन लूटना नहीं था। वह अपना राज्य बढ़ाना चाहता था क्योंकि गौर में रहकर अपने राज्य का विकास नहीं कर सकता था।