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बाबर की विजय के कारणों की व्याख्या कीजिए।

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भारत में बाबर की विजय के प्रमुख कारणों का विश्लेषण निम्नवत् है

(i) इब्राहीम लोदी की सैनिक कमजोरियाँ – इब्राहीम लोदी अनुभवहीन और अयोग्य सेनापति था। उसे रणक्षेत्र में सेनाओं के कुशल संचालन और संगठन का विशेष ज्ञान नहीं था। इब्राहीम के अन्य सेनापति और सरदार भी विलासी, दम्भी और अनुभवहीन थे। बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में लिखा है- “वह (इब्राहीम) अनुभवहीन युवक अपनी गतिविधियों में लापरवाह था, बिना किसी नियम-कायदे के वह आगे बढ़ जाता था, बिना किसी ढंग के रुक जाता अथवा पीछे मुड़ जाता और बिना सोचे-समझे शत्रु से भिड़ जाता।” इब्राहीम लोदी की सैनिक दुर्बलता बाबर जैसे सैनिक
के लिए वरदान सिद्ध हुई।

(ii) इब्राहीम लोदी की अयोग्यता – इब्राहीम लोदी एक अयोग्य निर्दयी और जिद्दी सुल्तान था। उसमें राजनीतिज्ञता, कूटनीति और दूरदर्शिता नहीं थी। इन गुणों के अभाव के कारण वह दौलत खाँ, आलम खाँ, मुहम्मदशाह और राणा साँगा को बाबर के विरुद्ध अपने पक्ष में नहीं मिला सका।

(iii) बाबर द्वारा तोपों का प्रयोग – पानीपत के युद्ध में इब्राहीम के पास तोपखाना और कुशल अश्वारोही सेना नहीं थी, जबकि बाबर के पास सुदृढ़ तोपखाना था, जिसका संचालन उस्ताद अली और मुस्तफा जैसे अनुभवी सेनानायकों ने किया। इसका परिणाम यह हुआ कि आग उगलने वाली तोपों के सम्मुख साधारण शस्त्रों से युद्ध करने वाले सैनिक नहीं टिक पाए। पानीपत में बाबर की विजय में उसके कुशल अश्वारोही और भारी तोपखाना अत्यन्त सहायक हुए।

(iv) बाबर की रणकुशलता और सैन्य संचालन – बाल्यकाल से ही निरंतर संकटों, संघर्षों और युद्ध में भाग लेते रहने से बाबर एक वीर, साहसी, कुशल योद्धा और अनुभवी सैनिक बन गया था। इस प्रकार बाबर एक जन्मजात वीर एवं महान् सेनापति था, इसीलिए उसे पानीपत और खानवा के युद्धों में निर्णायक विजय प्राप्त करने में अधिक कठिनाई नहीं हुई।

(v) राणा साँगा की गलतियाँ – खानवा के युद्ध में राणा साँगा की सबसे बड़ी भूल यह थी कि उन्होंने बाबर पर एकदम आक्रमण नहीं किया, अपितु उसे संगठित और तैयार होने के लिए अवसर दिया। खानवा के समीप की पहली मुठभेड़ में बाबर का सेनापति परास्त हो चुका था और बयाना से उसकी सेना पहले ही हारकर भाग चुकी थी और वह राजपूतों की वीरता व रणकौशल से आतंकित हो गई थी। यदि उसी समय राणा साँगा बाबर पर अपनी पूरी शक्ति से आक्रमण कर देते तो विजय उन्हें ही प्राप्त होती और बाबर भारत से भाग गया होता। राणा साँगा के युद्ध में हारने का एक कारण युद्ध में हाथियों का प्रयोग भी था।

(vi) बाबर की सैनिक तैयारी तथा तुलगमा रणनीति का प्रयोग – बाबर ने पानीपत और खानवा दोनों ही युद्धों में पूर्ण सैनिक तैयारी की थी। उसने अपनी सेना के सबसे आगे बिना बैल की बैलगाड़ियों की पंक्ति लगाई और इन गाड़ियों को परस्पर जोड़कर एक-दूसरे से लगभग 18 फुट लम्बी लोहे की जंजीरों से बाँध दिया। सेना के जिस भाग में बैलगाड़ियाँ नहीं थीं, उस ओर सुरक्षा के लिए खाइयाँ खुदवा दीं। इनके पीछे बन्दूकची और तोपखाने के गोलन्दाज खड़े किए गए। खानवा के युद्ध में निजामुद्दीन अली खलीफा ने तोपों का नेतृत्व किया। बन्दूकों की व्यवस्था मुस्तफा के अधीन थी और तोपों से गोलाबारी उस्ताद अली ने करवाई। इसके अतिरिक्त बाबर ने पानीपत और खानवा के युद्धों में तुलगमा रणनीति अपनाकर विजय प्राप्त की।



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