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Answer» बेसिक शिक्षा के जन्मदाता महात्मा गाँधी थे। उनका विचार था कि शिक्षा की रूपरेखा ग्रामीण होनी चाहिए, वह जनसाधारण के लिए होनी चाहिए, भारतीय संस्कृति का उसके द्वारा पुनर्जागरण होना चाहिए और उसमें भारतीय जनता की समस्याओं को सुलझाने की क्षमता होनी चाहिए। ब्रिटिश शासन काल में भारत में अंग्रेजी शिक्षा का लक्ष्य सरकारी नौकरी के लिए उपयुक्त कर्मचारी तैयार करना था; भारतीयों को शारीरिक, मानसिक तथा चारित्रिक विकास करना नहीं। अत: महात्मा गाँधी ने देश की निर्धन, बेकार, निरक्षर और अस्वस्थ जनता को उन्नति के पथ पर अग्रसर करने के लिए बेसिक शिक्षा योजना का निर्माण किया। गाँधी जी ने हरिजन नामक पत्रिका में राष्ट्रीय शिक्षा की नवीन रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए लिखा है, “शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक और मनुष्य में जो श्रेष्ठतम है, उसका सम्पूर्ण विकास करना अर्थात् शरीर, बुद्धि एवं आत्मा तीनों का विकास करना है। साक्षरता स्वयं में कोई शिक्षा नहीं है, इसलिए मैं बालक की शिक्षा का प्रारम्भ बालक को कुछ हस्तकला सिखाकर उसको प्रशिक्षण के समय से ही उत्पादन करने में समर्थ बनाकर करूंगा। इस प्रकार प्रत्येक स्कूल आत्मनिर्भर हो सकता है, शर्त यह है कि राज्य स्कूल में निर्मित वस्तुओं को खरीद लें।” बेसिक शिक्षा-पद्धति का प्रारम्भ 1937-38 ई० में हुआ। डॉ० जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी। इस समिति ने एक शिक्षा योजना तैयार की, जिसे वर्धा योजना भी कहा जाता है। बेसिक शिक्षा का अर्थ (Meaning of Basic Education) बेसिक शिक्षा वह शिक्षा है जो बालकों को विभिन्न प्रकार की हस्तकलाओं का प्रशिक्षण देते हुए उनका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक विकास कर सके, जिससे देश में समाजवादी समाज की स्थापना हो और जनता को सुखी तथा समृद्ध बनाया जा सके। गाँधी जी के अनुसार, “यह जीवन की शिक्षा है जो जन्म से मृत्यु तक की प्रक्रिया में चलती है।” बेसिक शब्द का हिन्दी रूपान्तर ‘आधारभूत’ तथा ‘बुनियादी’ शब्द है। इसके नामकरण के निम्नांकित कारण ⦁ बेसिक शिक्षा को भारत की राष्ट्रीय सम्पत्ति, सभ्यता एवं शैक्षणिक संगठन के आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ⦁ यह शिक्षा सामुदायिक जीवन के आधारभूत व्यवसाय से सम्बन्धित है। ⦁ इसमें हस्तकला के माध्यम से शिक्षा दी जाती है, जिनका प्रयोग व्यक्ति जीवन-निर्वाह के लिए करते ⦁ इसमें बालकों की रुचियों और आवश्यकताओं को सम्बन्धित करके शिक्षा दी जाती है। ⦁ यह शिक्षा भारत के प्रत्येक स्त्री-पुरुष की सामान्य सम्पत्ति समझी जाती है। ⦁ यह शिक्षा व्यक्ति को अपने वातावरण में सामंजस्य करने के योग्य बनाती है। ⦁ प्रत्येक भारतीय बालक के लिए इस शिक्षा की अनिवार्य व्यवस्था की गई है। बेसिक शिक्षा के मौलिक सिद्धान्त (Fundamental Principles of Basic Education) बेसिक शिक्षा-पद्धति के मौलिक सिद्धान्त निम्नलिखित हैं| 1.निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा- गाँधी जी का विचार था कि प्राइमरी शिक्षा प्रत्येक बालक के लिए सुलभ होनी चाहिए। गुलामी के कारण हमारे देश के बालक इस अधिकार से वंचित थे। लोकतन्त्र उसी देश में सफल होता है जहाँ शिक्षा सार्वजनिक हो। इसी कारण महात्मा गाँधी ने यह निश्चय किया कि 7 से 14 वर्ष तक के बालकों की शिक्षा अनिवार्य और नि:शुल्क होनी चाहिए। गाँधी जी ने स्वयं लिखा है, “जिस प्रकार के नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा वायु और जल पर सबका अधिकार है और सभी उसे समान रूप से स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता प्रयोग में ला सकते हैं, उसी प्रकार शिक्षा भी सबके लिए सुलभ हो शिक्षा का माध्यम मातृभाषा और गरीब लोग भी शिक्षा प्राप्त कर सकें, इसलिए इसका अनिवार्य शिक्षा का आधार हस्तकला और नि:शुल्क होना आवश्यक है।” 2. स्वावलम्बन तथा आत्मनिर्भरता- इस सिद्धान्त का तात्पर्य के जीवनोपयोगी शिक्षा है कि शिक्षकों का वेतन और विद्यालय के अन्य व्यय विद्यालय में बनी। बालक का स्वतन्त्र विकास वस्तुओं को बेचने से आंशिक रूप से निकल आएँ। इस प्रकार से समन्वय समन्वय पर बल शिक्षा संस्थाओं की आर्थिक समस्या का बहुत कुछ हद तक समाधान नागरिकता का आदेश हो जाएगा। इसके अतिरिक्त जब बालक जान जाएँगे कि अपनी शिक्षा के वे स्वयं उत्तरदायी हैं और उसके लिए वे अन्य किसी पर निर्भर नहीं हैं तो उनके अन्तर में आत्मनिर्भरता और स्वावलम्बन के भाव उत्पन्न होंगे और उनमें आत्मविश्वास की भावना का विकास होगा। 3. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा- कमेनियस ने मातृभाषा के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है, मातृभाषा को सीखने से पहले विदेशी भाषा की शिक्षा प्रदान करना उतना ही विवेकरहित है, जितना कि बच्चे को चलने से पूर्व चढ़ना सिखाना।” इसीलिए बेसिक शिक्षा-पद्धति में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा रखा गया है। प्रथम पाँच कक्षाओं में अंग्रेजी बिल्कुल हटा दी गई है और सभी विषय मातृभाषा के माध्यम से पढ़ाए जाते 4. शिक्षा का आधार हस्तकला- इस पद्धति में हस्तकला को शिक्षा का केन्द्र बनाया गया है। इस पद्धति में बेसिक स्कूलों में किसी हस्तकला से शिक्षा देने की व्यवस्था की जाती है। पाठ्यक्रम के सभी विषय किसी हस्तकला के चारों ओर केन्द्रित करके पढ़ाए जाते हैं। इस पद्धति में ‘क्रिया द्वारा शिक्षा तथा अनुभवे द्वारा सीखना’ दोनों सिद्धान्त निहित हैं। हस्तकलाओं के सम्बन्ध में गाँधी जी ने लिखा है, “प्रत्येक हस्तकार्य आजकल की भाँति यन्त्रवत् नहीं, वरन् वैज्ञानिक ढंग से सिखाया जाएगा ताकि बालक प्रत्येक क्रिया के कार्य-कारण सम्बन्ध को अच्छी तरह समझ जाएँ।” श्री ललित ने लिखा है, “बुनियादी हस्तकला सूर्यमण्डल के केन्द्र के रूप में होनी चाहिए एवं अन्य विषयों को ग्रह नक्षत्रों की भाँति चारों ओर घूमने तथा केन्द्रीय सूर्य से अपने उत्ताप या रोशनी को प्राप्त करना चाहिए।” आधुनिक शिक्षाशास्त्रियों का मत है कि हस्तकला द्वारा दी गई शिक्षा बालक के लिए अधिक मनोवैज्ञानिक होती है, क्योंकि इससे उसके मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के अनुभव सन्तुलित होते हैं। 5. अहिंसा पर आधारित-बेसिक शिक्षा का आधार गाँधी जी का सत्य और अहिंसा का विचार है। गाँधी जी का यह विचार था कि पाश्चात्य शिक्षा हिंसात्मक प्रवृत्तियों को जन्म देती है, जिससे प्रेम, सहानुभूति, दया, धर्म, उदारता आदि गुणों का लोप होने लगता है, इसीलिए उनका कहना है कि विद्यालय में दण्ड का अभाव होना चाहिए। विद्यालय में इस प्रकार का वातावरण रखना चाहिए, जिससे बालकों में पारस्परिक घृणा, साम्प्रदायिक द्वेष तथा कलह की मनोवृत्तियाँ न विकसित हो सकें। 6. जीवनोपयोगी शिक्षा-तत्कालीन शिक्षा बालक के वास्तविक जीवन से सम्बन्धित नहीं थी। इसलिए बालक को अपने वातावरण से समायोजन करने में कठिनाई अनुभव होती थी और इसके अभाव में वह अपना जीवन भली प्रकार व्यतीत नहीं कर पाता था, इसलिए बेसिक शिक्षा-पद्धति में गाँधी जी ने हस्तकला को प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण से सम्बन्धित करके बालक के वास्तविक जीवन से सम्बन्ध स्थापित कर दिया। इस पद्धति में शिक्षा बालक की जीवन की परिस्थितियों से सम्बन्धित रहती है और शिक्षा का कार्य । जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में सम्पन्न होता है। 7. बालक का स्वतन्त्र विकास- अन्य आधुनिक शिक्षा-पद्धतियों की भॉति बेसिक शिक्षा में भी बालकों की रुचि का ध्यान रखा जाता है और उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। बालकों को स्वतन्त्र अभिव्यक्ति प्रदान करने का अवसर मिलता है। गाँधी जी के अनुसार, “जब शिक्षा का उद्देश्य एक स्वच्छन्द तथा रचनात्मक स्वक्रिया के द्वारा बालक की अधिकतम अभिवृद्धि तथा विकास समझा जाता है तो विद्यार्थियों को स्वयं सोचने, अपनी रुचि के अनुसार अपना कार्य नियोजित करने तथा उन आयोजनों को अपनी ही गति के अनुसार आगे बढ़ने की पर्याप्त स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए।’ 8. समन्वय पर बल- किसी हस्तकला के आधार पर शिक्षा देने का तात्पर्य शिक्षा को समन्वित करना है। अर्थात् पाठ्यक्रम के सभी विषयों में शरीर के विभिन्न अवयवों की भाँति एक स्वाभाविक सम्बन्ध स्थापित करना है। इस पद्धति में सभी विषयों की शिक्षा किसी हस्तकला को केन्द्र मानकर दी जाती है। बेसिक शिक्षा में बालक के विकास के तीन आधार बताए गए हैं—प्राकृतिक वातावरण, सामाजिक वातावरण और हस्तकला। हस्तकला के द्वारा पहले दो आधारों पर समन्वय सहज ही हो जाता है, क्योंकि हस्तकला की उत्पत्ति और विकास इन्हीं पर निर्भर है। प्राकृतिक शक्तियों और साधनों के उपयोग के द्वारा मनुष्य कई वस्तुएँ तैयार करता है, उद्योग-धन्धे चलाता है, जिनकी समाज को आवश्यकता है। इन तीनों को केन्द्र मानकर बालक की शिक्षा को समन्वित किया जाता है। 9. नागरिकता का आदर्श बेसिक शिक्षा में नागरिकतों का आदर्श निहित है। यदि इस पद्धति में से नागरिकता का सिद्धान्त निकाल दिया जाए तो यह पद्धति अपना निजत्व खो बैठती है। इसका उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना है, जो अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों को बुद्धिमानी से समझ सकें और समाज के क्रियाशील सदस्य बनकर समाज के ऋण को किसी सेवा के रूप में चुका सकें। डॉ० जाकिर हुसैन ने लिखा है, “नवीन शिक्षा या बेसिक शिक्षा भारत के भावी नागरिकों में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, आत्मशक्ति एवं सामाजिक सेवा की भावना उत्पन्न करेगी।
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