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परम्परागत और अपारम्परिक सुरक्षा में क्या अन्तर है? गठबन्धनों का निर्माण करना और इनको बनाए रखना इनमें से किस कोटि में आता है?

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सुरक्षा के दो दृष्टिकोण हैं-
⦁    पारम्परिक सुरक्षा एवं
⦁    अपारम्परिक सुरक्षा।

1. पारम्परिक सुरक्षा-सुरक्षा की पारम्परिक धारणा में बाह्य दृष्टि से सैन्य खतरों पर ध्यान होता है तथा सुरक्षा नीति का सम्बन्ध मुख्यतया युद्ध की आशंका को रोकने से होता है। साथ ही इसमें सुरक्षा नीति में राष्ट्रों के मध्य अपने पक्ष में शक्ति सन्तुलन बनाना तथा सैनिक गठबन्धनों का निर्माण भी शामिल है। पारम्परिक धारणा में माना जाता है कि किसी देश की सुरक्षा को मुख्य खतरा उसकी सीमा के बाहर से होता है। इसका मुख्य कारण अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था का स्वरूप है जिसमें राष्ट्रीय व्यवस्था की तरह कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं है, जो सभी राष्ट्रों को नियन्त्रित कर सके। अतः विश्व राजनीति में प्रत्येक राष्ट्र को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ती है।
परम्परागत सुरक्षा का सम्बन्ध आन्तरिक सुरक्षा से भी है। यद्यपि पश्चिमी देश द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले अपनी आन्तरिक सुरक्षा के प्रति आश्वस्त थे, लेकिन सन् 1945 के बाद शीतयुद्धजनित संघर्ष तथा उपनिवेशों में राष्ट्रवादी आन्दोलन ने आन्तरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ उत्पन्न की। जबकि नवोदित राष्ट्रों में आन्तरिक सुरक्षा की मुख्य समस्या पड़ोसी देशों से युद्ध तथा आन्तरिक संघर्ष को लेकर उत्पन्न हुई। सुरक्षा के पारम्परिक तरीकों में निःशस्त्रीकरण, अस्त्र-नियन्त्रण तथा राष्ट्रों के मध्य शान्ति की बहाली प्रमुख थे।
2. अपारम्परिक सुरक्षा-अपारम्परिक सुरक्षा में केवल सैन्य खतरों को ही नहीं बल्कि मानवीय अस्तित्व पर चोट करने वाले व्यापक खतरों व आशंकाओं को शामिल किया जाता है। इस धारणा में सिर्फ राज्य की ही नहीं बल्कि व्यक्तियों और समुदायों या कहें समूची मानवता को सुरक्षा की आवश्यकता है। अपारम्परिक सुरक्षा को मानवता की सुरक्षा अथवा विश्व रक्षा कहा जाता है। इस सुरक्षा में सैन्य खतरों के साथ-साथ व्यक्तियों की सुरक्षा से जुड़े गैर-सैन्य खतरों; जैसे—आन्तरिक जातीय संघर्ष, अकाल, महामारी, अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, पर्यावरण सुरक्षा (ग्लोबल वार्मिंग) आर्थिक सुरक्षा तथा मानवीय गरिमा के संकटों को शामिल किया जाता है। इसमें निर्धनता, गरीबी व असमानता जैसी समस्याएँ भी शामिल हैं।

पारम्परिक व अपारम्परिक सुरक्षा में अन्तर
(1) पारम्परिक सुरक्षा की धारणा में जहाँ आन्तरिक व बाह्य सैन्य खतरों को शामिल किया जाता है, वहीं अपारम्परिक सुरक्षा में मानवता की रक्षा व विश्व-रक्षा को शामिल किया जाता है। इसके व्यापक दृष्टिकोण में ‘अभाव से मुक्ति’ तथा ‘भय से मुक्ति’ जैसे तत्त्वों को शामिल किया जाता है।
(2) पारम्परिक सुरक्षा में जहाँ सैन्य खतरों से निपटने के लिए शक्ति-सन्तुलन, सैन्य गठबन्धन, अस्त्रनियन्त्रण, निशस्त्रीकरण तथा आपसी विश्वास जैसे तरीकों पर जोर दिया जाता है, वहीं अपारम्परिक सुरक्षा में खतरों से निबटने के लिए सैन्य संघर्ष नहीं बल्कि, अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की रणनीतियों पर बल दिया जाता है। यह सहयोग द्विपक्षीय, क्षेत्रीय अथवा वैश्विक स्तर पर हो सकता है।
सैन्य गठबन्धनों का निर्माण करना तथा उन्हें बनाए रखना पारम्परिक सुरक्षा की धारणा के अन्तर्गत शामिल किया जाता है। यह सैन्य सुरक्षा का एक साधन है।



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