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“व्हाइट” और “ब्लैक” टाउन शब्दों का क्या महत्त्व था? |
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Answer» भारत में विभिन्न यूरोपीय कंपनियों में निरंतर प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनी रहती थी। अतः सुरक्षा की दृष्टि से अंग्रेजों ने अपनी प्रमुख बस्तियों की किलेबंदी कर ली। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम तथा बंबई में फोर्ट अंग्रेजों की किलेबंद कोठियाँ थीं। शीघ्र ही ये बस्तियाँ महत्त्वपूर्ण औपनिवेशिक शहरों के रूप में विकसित हो गईं। मद्रास, कलकत्ता एवं बंबई अत्यधि क महत्त्वपूर्ण एवं सुप्रसिद्ध औपनिवेशिक शहर थे। औपनिवेशिक शहर में यूरोपीय जिस किलेबंद क्षेत्र के अंदर रहते थे, उसे “व्हाइट टाउन” कहा जाता था। दीवारों और बुर्जी के द्वारा इसे एक विशेष प्रकार की किलेबंदी के रूप में दिया गया था। भारतीय किलेबंद क्षेत्र के अंदर नहीं रह सकते थे, क्योंकि रंग और धर्म किले के अंदर रहने के प्रमुख आधार थे। डच एवं पुर्तगाली यूरोपीय व ईसाई होने के कारण किलेबंद क्षेत्र में रह सकते थे। भारतीय किलेबंद क्षेत्र के बाहर जिस भाग में रहते थे उसे “ब्लैक टाउन” के नाम से जाना जाता था। 1857 ई० के विद्रोह के परिणामस्वरूप भारत में औपनिवेशिक अधिकारी इतने अधिक आतंकित हो गए थे कि वे सुरक्षा की दृष्टि से “देशियों” अर्थात् भारतीयों के खतरे से, दूर पृथक् एवं पूर्णरूप से सुरक्षित बस्तियों में रहना चाहते थे। अतः “सिविल लाइंस” नामक नए शहरी क्षेत्र विकसित किए गए। ये क्षेत्र अत्यधिक सुरक्षित थे और इनमें केवल गोरे ही निवास करते थे। निःसंदेह व्हाइट और ब्लैक टाउन नस्ली विभाजन के प्रतीक थे। |
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