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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

नव्यकरणीय एवं अनव्यकरणीय ऊर्जा के स्रोत क्या हैं ? उदाहरण देकर बताएँ।

Answer»

ऊर्जा के वे स्रोत जिनकी आपूर्ति प्राकृतिक क्रियाकलापों द्वारा प्रकृति में निरंतर बनी रहती हैं तथा जो समाप्त नहीं होती है, नव्यकरणीय ऊर्जा स्रोत कहलाते हैं। जैसे-जल, पवन, सूर्य आदि। ऊर्जा के जिन स्रोतों का उपयोग करने के पश्चात पुनः प्राप्त करना संभव नहीं होता, अनव्यकरणीय ऊर्जा स्रोत कहलाते हैं। जैसे-कोयला, पेट्रोल, डीज़ल, मिट्टी का तेल, प्राकृतिक गैस आदि।

2.

इसके दो उदाहरण दें(क) पर्यावरणीय संसाधनों का अति प्रयोग(ख) पर्यावरणीय संसाधनों का दुरुपयोग।

Answer»

(क) पर्यावरणीय संसाधनों का अति प्रयोग 
⦁    भूमि जल का पुमैः पूर्ण क्षमता से अधिक निष्कर्षण,

⦁    आधारणीय जलाऊ लकड़ी और चारे का निष्कर्षण।

(ख) पर्यावरणीय संसाधनों का दुरुपयोग
⦁    नगरीकरण
⦁    औद्योगीकरण।

3.

पर्यावरणीय संसाधनों की पूर्ति माँग के उत्क्रमण की व्याख्या कीजिए।

Answer»

प्राचीनकाल में जब सभ्यता शुरू हुई थी, पर्यावरण संसाधनों की माँग और सेवाएँ उनकी पूर्ति से बहुत कम थीं। उस समय आधुनिकीकरण, नगरीकरण एवं औद्योगीकरण की दर भी कम थी। अवशिष्ट पदार्थों का उत्पादन भी पर्यावरण की अवशोषी क्षमता के भीतर था। इसलिए पर्यावरण समस्याएँ उत्पन्न नहीं लेकिन आधुनिक युग में तीव्र जनसंख्या वृद्धि नगरीकरण, आधुनिकीकरण एवं औद्योगीकरण के फलस्वरूप उत्पादन और उपभोग के लिए संसाधनों की माँग संसाधनों के पुन: सृजन की दर से बहुत अधिक हो गई एवं अपशिष्ट पदार्थों का उत्पादन पर्यावरण की अवशोषण क्षमता के बाहर हो गया है। तरह से, पर्यावरण की गुणवत्ता के मामले में माँग-पूर्ति सम्बन्ध पूरी तरह उल्टे हो गए हैं। अब हमारे सामने पर्यावरण संसाधनों और सेवाओं की माँग अधिक है, लेकिन उनकी पूर्ति सीमित है।

4.

सुन्दरवन उगते हैं(क) गंगा के डेल्टा में(ख) दक्कन के पठार पर(ग) गोदावरी के डेल्टा में(घ) महानदी के डेल्टा में

Answer»

सही विकल्प है (क) गंगा के डेल्टा में

5.

‘वन महोत्सव’ से आप क्या समझते हैं?

Answer»

वन महोत्सव–राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनजागरण के लिए सरकार ने प्रतिवर्ष 5 दिसम्बर को वन महोत्सव मनाये जाने का निर्णय लिया। यह दिन प्रत्येक राज्य में पेड़ लगाने के, रूप में मनाया जाता है। इस दिन लाखों की संख्या में वृक्षारोपण किया जाता है। इस योजना का सही क्रियान्वयन न होने से भी इसके विकास में सही गति नहीं पकड़ी जिसकी अपेक्षा की गयी है।

6.

पारिस्थितिकीय तन्त्र को परिभाषित कीजिए।

Answer»

समस्त वनस्पति जगत, जन्तु जगत एवं भौतिक पर्यावरण का सम्मिलन पारिस्थितिकीय तन्त्र कहलाता है।

7.

वनों की हानि से क्या आशय है?

Answer»

वनों की हानि से आशय वनों को तेजी से काटे जाने से है, जिससे वन क्षेत्र कम होता जा रहा है। और वनों का ह्रास होता जा रहा है।

8.

वनों पर आधारित किन्हीं दो उद्योगों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

वनों पर आधारित दो उद्योग हैं-कागज-उद्योग तथा बीड़ी उद्योग।

9.

बाघ परियोजना कब से लागू की गई है?

Answer»

बाघ परियोजना 1973 ई० से लागू की गई है।

10.

निम्नलिखित पदार्थों में से किसमें कार्बन नहीं पाया जाता है-(अ) कोयला में(ब) चीनी में(स) रोटी में(द) नमक में

Answer»

सही विकल्प है (द) नमक में

11.

भारतीय कृषि का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों में कीजिए(क) कृषि निविष्टियाँ और उनका महत्त्व तथा (ख) भावी सम्भावनाएँ।

Answer»

(क) कृषि निविष्टियाँ और उनका महत्त्व – कृषि भारत का प्रधान व्यवसाय है। अत: भारतीय कृषकों को कृषि उत्पादन को सम्पन्न क़रने में जिन वस्तुओं तथा सेवाओं की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें कृषि निविष्टियाँ (Inputs) कहा जाता है। प्रमुख कृषि निविष्टियों का विवरण इस प्रकार है –

1. तकनीकी जानकारी – कृषि-कार्य की यह महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। कृषि करने की सही तकनीकी की जानकारी शिक्षा के अनौपचारिक तरीकों से ही प्राप्त की जा सकती है। तकनीकी जानकारी के अन्तर्गत बीजों के प्रकार, उर्वरक, फसल-प्रबन्ध, भण्डारण, फसल बीमा, विपणन आदि की जानकारी आती है। खेती की आधुनिक विधियों का प्रयोग करने के लिए किसान को इन सभी की पर्याप्त जानकारी होनी आवश्यक है।

2. स्वयं का श्रम – किसान का निजी एवं उसके परिवार के सदस्यों का श्रम भी कृषि की महत्त्वपूर्ण निविष्टि है। कभी-कभी इनकी संख्या कार्य की आवश्यकता से भी अधिक हो जाती है।

3. भाड़े का श्रम – मजदूरी पर रखे गये श्रम को भाड़े का श्रम कहते हैं। कृषि-कार्य में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। ऐसे श्रमिकों का भारत में कोई संगठित बाजार नहीं है। फलत: भाड़े के श्रमिकों को उनके श्रम के लिए मजदूरी कम दी जाती है तथा अधिकांशतः मुद्रा के रूप में नहीं दी जाती।

4. पशुधन – बैल, गाय, भैंस आदि पशुधन हैं। पशुधन खेती के लिए बहुत ही मूल्यवान समझा जाता है। ये भी कृषि की एक महत्त्वपूर्ण निविष्टि हैं। जिस कृषक-परिवार के पास जितना अधिक पशुधन होता है, वह उतना ही अधिक सम्पन्न परिवार माना जाता है।

(ख) भावी सम्भावनाएँ – कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कृषि की भावी सम्भावनाएँ पर्याप्त उज्ज्वल हैं, क्योंकि भारतीय कृषि में सुधार आरम्भ हो चुके हैं और कई दिशाओं में उनके विस्तार की सम्भावनाएँ हैं। ये दिशाएँ निम्नलिखित हैं –

  1. उर्वरक उपभोग की खपत लगभग 50 किग्रा प्रति हेक्टेयर है। इसका अर्थ है कि किसान उन्नत बीजों और विकसित उत्पादन तकनीकी का प्रयोग कर रहे हैं। यह इस बात का सूचक है कि नयी प्रौद्योगिकी के विस्तार से कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता में पर्याप्त वृद्धि होगी। इसी अधिक उपज देने वाली तकनीकी का विस्तार करके अन्य फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि करना सम्भव है।
  2. लघु, मध्यम एवं विशाल स्तरीय सिंचाई परियोजनाओं का विस्तार करके दूर-दराज के क्षेत्रों में सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराकर कृषि उत्पादकता में वृद्धि करना सम्भव है।
  3. ऐसे क्षेत्रों में, जहाँ सिंचाई के लिए जल पहुँचाना सम्भव नहीं है, शुष्क कृषि-भूमि में उचित प्रकार के प्रौद्योगिकीय सुधारों को लागू करने की भी सम्भावनाएँ हैं।
  4. देश में भूमि-सुधार कार्यक्रमों को कठोरता से लागू करके कृषि के दोषों से छुटकारा पाना सम्भव है। भारत में परती भूमि तथा अन्य भूमियाँ पर्याप्त मात्रा में ऐसी हैं, जिनमें सुधार करके कृषि भूमि में वृद्धि की जा सकती है और कृषि उत्पादकता बढ़ायी जा सकती है।
12.

हीरा तथा ग्रेफाइट के गुणों की तुलना कीजिए।

Answer»

ग्रेफाइट तथा हीरे के निम्न गुण स्पष्ट रूप से भिन्न हैं –

1. रंग

2. कार्य

3. पारदर्शिता

4. कठोरता

ग्रेफाइट तथा हीरा दोनों ही अपने गुणों में अधिकांशतः भिन्न हैं। ग्रेफाइट धूसर रंग का काला पदार्थ है। यह स्पर्श करने पर चिकना तथा फिसलने वाला पदार्थ है। जबकि, हीरा पारदर्शक तथा कठोर है। अब तक ज्ञात सबसे अधिक कठोर पदार्थ होने के बावजूद हीरा सरलता से टूट जाता है। बहुत से फलकों वाला क्रिस्टल बनाने के लिए इसे विभिन्न तलों के साथ-साथ काफी सफाई से तोड़ा जाता है। इस पर पड़ने वाली प्रकाश की किरण-पुंज तेजी से बिखर कर अर्थात् परिशोषित होकर एक सजीव इन्द्रधनुष बनाती है। अतः इसको इसके स्थान से थोड़ा-सा हटाने पर यह चमकता है और सुन्दर रंगों के रूप में चिंगारी निकालता हुआ प्रतीत होता है।

ग्रेफाइट तथा हीरों में कार्बन परमाणु विभिन्न तरीकों (पैटर्नो) में परस्पर जुड़े अथवा आबन्धित होते हैं। परमाणुओं के इन्हीं विभिन्न पैट्रनें के कारण ही ये दोनों गुणों में भिन्न-भिन्न होते हैं। ग्रेफाइट में प्रत्येक कार्बन परमाणु एक ही तल में अपने पास के अन्य तीन कार्बन परमाणुओं के साथ जुड़ा रहता है। और षट्कोणीय जाल बनाता है। अनेक ऐसे तल एक-दूसरे के ऊपर ढीले-ढाले अथवा आबद्ध रूप में रखे होते हैं। इसी कारण ये तल सरलता से फिसल जाते हैं। इसी गुण के कारण ग्रेफाइट स्पर्श करने पर चिकना और फिसलने वाला पदार्थ लगता है और एक उत्तम स्नेहक के रूप में उपयोग होता है।

हीरे में कार्बन परमाणुओं की व्यवस्था पूर्णतया भिन्न है। प्रत्येक कार्बन परमाणु, अन्य चार कार्बन परमाणुओं के साथ जुड़कर त्रिविमीय (Three dimensions) दृढ़ क्रिस्टल की संरचना बनाता है।इसी अत्यधिक स्थायी संरचना के कारण ही हीरा अब तक ज्ञात पदार्थों में सबसे अधिक कठोर पदार्थ है।

13.

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (पूर्ति करके)-(क) ___ सभी सजीव तथा कुछ निर्जीवों में उपस्थित है।(ख) ____ सरलतम हाड्रोकार्बन है।(ग) ____ सबसे कठोर ‘पदार्थ है।(घ) पेट्रोल ____ धन है।(ङ) पेंसिल में उपस्थित ला पदार्थ ____ है।

Answer»

(क) कार्बन सभी सजीव तथा कुछ निर्जीवों में उपस्थित है।
(ख) मेथेन सरलतम हाड्रोकार्बन है।
(ग) हीरा सबसे कठोर ‘दार्थ है।
(घ) पेट्रोल ज्वलनशील धन है।
(ङ) पेंसिल में उपस्थित ला पदार्थ ग्रेफाइट है।

14.

कार्बन का क्रिस्टलीय रूप है-(अ) जन्तु चारकोल(ब) ग्रेफाइट(स) कोयला(द) लकड़ी का चारकोल

Answer»

सही विकल्प है (अ) ग्रेफाइट

15.

कुकिंग गैस (L.P.G.) में किसकी मात्रा अधिक है-(अ) मेथेन(ब) एथेन(स) एथिलीन(द) ब्यूटेन

Answer»

सही विकल्प है (द) ब्यूटेन

16.

प्रकृति में कार्बन पाया जाता है।(अ) केवल मुक्त अवस्था में(ब) केवल यौगिकों में(स) मुक्त एवं यौगिक दोनों अवस्थाओं में(द) केवल अपने अपररूपों में

Answer»

सही विकल्प है (स) मुक्त एवं यौगिक दोनों अवस्थाओं में

17.

लैम्प ब्लैक क्या होता है?

Answer»

लैम्प ब्लैक मोम अथवा तेल को वायु की सीमित मात्रा में जलाने पर प्राप्त कालिख को कहते हैं।

18.

अपररूप क्या होते हैं? कार्बन के अपररूपों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

अपररूप- वे पदार्थ जो विभिन्न भौतिक गुण परन्तु समान रासायनिक गुण रखते हैं, अपरलैंप कहलाते हैं।

कार्बन विभिन्न अपररूपों में मिलता है, जिन्हें निम्न दो भागों में बाँटा गया है-

1. क्रिस्टलीय –

1. हीरा

2. ग्रेफाइट।

2. अक्रिस्टलीय-

1. लकड़ी का कोयला

2. हड्डी का कोयला

3. कोक

4. काजल तथा

5. गैस कार्बन।

19.

हाइड्रोकार्बन यौगिक कितने प्रकार के होते हैं?

Answer»

हाइड्रोकार्बन यौगिक दो प्रकार के होते हैं –

1. संतृप्त हाइड्रोकार्बन

2. असंतृप्त हाइड्रोकार्बन

20.

मेथेन को “मार्श” गैस क्यों कहते हैं?

Answer»

मेथेन गैस (CH,) वायु की अनुपस्थिति में दलदली स्थानों पर, पेड़-पौधों और कार्बनिक पदार्थों (मार्श) के गलने-सड़ने से बनती है, इसलिए इसे मार्श गैस कहते हैं।

21.

पर्यावरणीय संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।

Answer»

पर्यावरण का जिसमें मानव रह रहा है, अपने सभी जैवीय तथा अजैवीय घटकों के साथ समन्वित, समरस तथा सन्तुलित रहना आवश्यक है। वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता तथा महत्त्व को अग्रलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

⦁    इसके द्वारा पर्यावरणीय असन्तुलन की विनाशकारी प्रभावों से बचा जा सकता है।
⦁    पर्यावरण का हमारी शारीरिक संरचना, स्वास्थ्य तथा मन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक संसाधन जितने स्वच्छ व निर्मल होंगे, हमारा शरीर और मन उतना ही स्वच्छ एवं निर्मल होगा, इसलिए गुरु चरक से कहा था—‘स्वस्थ जीवन के लिए शुद्ध वायु, जल और मिट्टी आवश्यक कारक हैं।”

⦁    राज्य की स्थिरता पर्यावरण की स्वच्छता पर निर्भर करती है।

⦁    जैवीय विकास में पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण घटक है।

⦁    देश के आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण की सुरक्षा आवश्यक है।

⦁    औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग ने प्रदूषण की गम्भीर समस्या को उत्पन्न कियाहै। जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, वायु प्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण की समस्याओं ने मानव के अस्तित्व को ही चुनौती दे दी है।

⦁    रासायनिक एवं आणविक अपघटकों ने ओजोन की परत में छेद करके सम्पूर्ण विश्व को ही त्रस्त कर दिया है।
संक्षेप में, वर्तमान शताब्दी की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है-पर्यावरण की सुरक्षा तथा साथ ही मनुष्य को शुद्ध जल, वायु और भोजन प्रदान करना।

22.

नव्यकरणीय और अनव्यकरणीय संसाधनों से क्यो आशय है?

Answer»

(1) नव्यकरणीय संसाधन– इसमें वे संसाधन सम्मिलित हैं जिनमें प्रकृति में अल्प समय में ही पुन: चक्रण द्वारा स्थापित होने का गुण होता है। इनके उदाहरण जल, काष्ठ, मृदा, खाद्यान्न फसलें आदि हैं।

(2) अनव्यकरणीय संसाधन– ये संसाधन समाप्त हो जाने पर पुनः स्थापित नहीं किए जा सकते हैं। इनका प्रमुख उदाहरण जीवाश्मीय ईंधन व खनिज पदार्थ हैं। परन्तु आजकल विश्व में अत्यधिक उपयोग तथा अव्यवस्थित प्रबन्धन के कारण वन्य-जीव (पादप तथा जन्तु) भी अनव्यकरणीय संसाधन बनते जा रहे हैं।

23.

वनों के ह्रास को रोकने के उपायों पर प्रकाश डालिए।

Answer»

वनों के ह्रास को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं
⦁    ईंधन की लकड़ी के स्थान पर रसोईघरों में वैकल्पिक ऊर्जा का प्रबन्ध हो।
⦁    इमारती लकड़ी व फर्नीचर आदि बनाने के लिए वनों की लकड़ी के बजाय कोई अन्य विकल्प प्रयोग में लाया जाए।

⦁    पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से दुर्लभ किस्म के पेड़ों की कटाई निषिद्ध हो।

⦁    वनों पर आधारित उद्योग-धन्धों में कच्चे मालों की पूर्ति के लिए सामाजिकी-वानिकी की योजनाएँ चलाई जाएँ।
⦁    सामाजिक-वानिकी, कृषि वानिकी तथा वन खेती से वनों के क्षेत्रफल की पूर्ति की जाएगी।

⦁    स्थानान्तरणशील कृषि पर रोक।

⦁    चरागाहों के क्षेत्र का संकुचन रोका जाए।

⦁    शवों के दाह-संस्कार में प्रयोग की जाने वाली लकड़ी के विकल्प के रूप में विद्युत शवदाह गृहों | का निर्माण किया जाए। इससे वन संरक्षण में मदद मिलेगी।

⦁    होली, लोहड़ी तथा अन्य त्योहारों के समय लकड़ी को व्यर्थ न जलाया जाए। इनके लिए लोगों की धार्मिक भावनाओं तथा सांस्कृतिक मान्यताओं को बदलने का प्रयास किया जाना चाहिए।

⦁    पशु संख्या नियन्त्रित की जानी चाहिए और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए अभयारण्यों का विकास किया जाना चाहिए। इससे दोहरा लाभ होगा।

⦁    ढालू भूमि पर वृक्षों की कटाई नहीं की जानी चाहिए।

⦁    कृषि योग्य भूमि के विस्तार के लिए वनों का ह्रास नहीं होने देना चाहिए। इसके लिए कड़े कानूनी प्रावधान किए जाने चाहिए।

⦁    ऐसी नदी घाटी परियोजनाओं तथा बाँधों को स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए, जिससे वन क्षेत्र डूब जाने की सम्भावना हो।

⦁    वनों के महत्त्व को बताने के लिए जन-साधारण में विज्ञापनों तथा प्रसार माध्यमों द्वारा जागरूकता | पैदा की जानी चाहिए।

⦁    वृक्षों की चयनात्मक कटाई तथा बचे हुए जंगलों की रक्षा करके वनों के ह्रास को रोका जा सकता

⦁    प्राकृतिक वन क्षेत्रों के स्थान पर वृक्ष तथा फलोद्यान लगाने से भी वन विनाश रुकता है और फल भी प्राप्त होते हैं।

⦁    वनों की रक्षा के लिए सामाजिक आन्दोलन चलाए जाने चाहिए।

24.

वन्य-जीव संरक्षण के उपाय बताइए।

Answer»

वन्यजीव संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय आवश्यक हैं-
⦁    राष्ट्रीय उद्यानों का विकास तथा रख-रखाव।।

⦁    गैर-कानूनी तरीके से वन्य-जीवों के शिकार और वन्य जीव उत्पादों के अवैध व्यापार पर प्रतिबन्ध लगाना।

⦁    राष्ट्रीय उद्यानों तथा अभयारण्यों के आस-पास के क्षेत्रों में पारिस्थितिकी का विकास।

⦁    वन-विनाश पर रोक।

⦁    वन क्षेत्र में वृद्धि।

⦁    वन्य-जीवों के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता लाना।

⦁    वन्य-जीव संरक्षण हेतु विभिन्न प्रकार की परियोजनाओं का अधिक-से-अधिक क्रियान्वयन करना भी आवश्यक है; जैसे-टाइगर प्रोजेक्ट, क्रोकोडाइल ब्रीडिंग एण्ड मैनेजमेण्ट प्रोजेक्ट तथा डिअर प्लानिंग प्रोजेक्ट इत्यादि।
⦁    संकटापन्न वन्य-जीवों के विकास के लिए विशेष प्रयास।
भारत में प्राणि-उद्यानों के प्रबन्ध की देखभाल के लिए एक केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण स्थापित किया गया है। यह संस्था 200 चिड़ियाघरों के कार्यों में तालमेल करती है और जानवरों के विनिमय की वैज्ञानिक ढंग से देख-रेख करती है। इस समय में 23 बाघ परियोजनाएँ चल रही हैं तथा इसके अन्तर्गत 26,000 वर्ग किमी से भी अधिक क्षेत्र वनाच्छादित है।

25.

पर्यावरण का अर्थ, प्रकार बताइए। पर्यावरण संरक्षण के क्या उद्देश्य हैं?

Answer»

पर्यावरण का अर्थ व प्रकार
सोरोकिन के अनुसार-“पर्यावरण उन समस्त दशाओं को इंगित करता है, जो मानव के क्रियाकलापों से स्वतन्त्र हैं तथा जिनकी रचना मानव ने नहीं की है और जो मानव एवं उसके कार्यों से प्रभावित हुए बिना स्वतः परिवर्तित होती हैं।” पर्यावरण दो प्रकार का होता है—
(1) प्राकृतिक पर्यावरण,
(2) सांस्कृतिक पर्यावरण।

पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य 
(1) पर्यावरणीय संसाधनों के अपव्यय को रोकना।
(2) भावी उपयोग के लिए संसाधनों की बचत करना।
(3) संसाधनों का योजनाबद्ध एवं विवेकपूर्ण रीति से उपयोग करना।

26.

धारणीय विकास की अवधारणा को परिभाषित कीजिए।

Answer»

धारणीय विकास ऐसा विकास है जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता से समझौता किए बिना पूरी करे।

27.

मृदा अपरदन के दुष्प्रभाव बताइए।

Answer»

मृदा अपरदन के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं

(1) मृदा उर्वरता में कमी- मृदा अपरदन के कारण भूमि की ऊपरी परत (Top soil) अपने स्थान से | हट जाती है, जिससे भूमि की उर्वरता प्रभावित होती है; क्योंकि यह परत जीवांशों (humus) के रखने के कारण अधिक उर्वर होती है।
(2) सिल्टीकरण मिट्टी के बड़े– बड़े कण नदियों के जल के साथ बहकर जलाशयों में एकत्रित होने लगते हैं। इससे कृषि योग्य भूमि की उर्वरता नष्ट हो जाती है।
(3) अकाल- मृदा अपरदन के कारण भूमि की उत्पादकता कम हो जाती है तथा सूखे के समय जल की कमी हो जाने पर सिंचाई की समस्या हो जाती है, जिससे अकाल की स्थिति उत्पन्न हो जाती
(4) मरुस्थलीकरण- मृदा अपरदन के कारण भूमि शुष्क व बंजर हो जाती है। इससे मरुस्थल जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
(5) जलवायु में परिवर्तन– मृदा अपरदन के कारण भूमि पर किसी प्रकार की वनस्पति उग नहीं पाती जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव जलवायु पर पड़ता है। वनस्पति के न होने से वर्षा की सम्भावना कम हो जाती है।

28.

धारणीय विकास का अर्थ एवं इसकी आवश्यकताएँ बताइए। भारत में धारणीय विकास की रणनीति भी समझाइए।

Answer»

धारणीय विकास का अर्थ धारणीय विकास वह प्रक्रिया है जो आर्थिक विकास के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले दीर्घकालीन शुद्ध लाभों को वर्तमान तथा भावी पीढ़ी दोनों के लिए अधिकतम करती है। यह भावी पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता को बिना कोई हानि पहुँचाए वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

यू०एन०सी०ई०डी० के अनुसार-“धारणीय विकास से आशय ऐसे विकास से है जो वर्तमान पीढ़ी। की आवश्यकताओं को भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं की पूर्ति क्षमता के समझौता किए बिना पूरी करें।”
यू०एन०सी०ई०डी० की रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ्यूचर’ के अनुसार-“धारणीय विकास विकासको वह प्रक्रिया है जो सभी की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति और एक अच्छे जीवन की आकांक्षाओं की सन्तुष्टि के लिए सभी को अवसर प्रदान करती है।” एडवई बारबियर के अनुसार-“धारणीय विकास से आशय बुनियादी स्तर पर गरीबों के जीवन के भौतिक मानकों को ऊँचा उठाना है जिसे आय, वास्तविक आय, शैक्षिक सेवाएँ, स्वास्थ्य देखभाल, सफाई, जलापूर्ति इत्यादि के रूप में परिमाणात्मक रूप से मापा जा सकता है।”
रॉबर्ट रेपीट के अनुसार- “धारणीय विकास का अर्थ विकास की वह रणनीति है जो सभी प्राकृतिक, मानवीय, वित्तीय तथा भौतिक साधनों का सम्पत्ति तथा आर्थिक कल्याण में वृद्धि करने के लिए प्रबन्ध करती है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर धारणीय विकास की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
⦁    आर्थिक संवृद्धि एवं प्रति व्यक्ति आय में दीर्घकालीन वृद्धि होनी चाहिए।

⦁    प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण एवं कुशलतापूर्वक शोषण किया जाना चाहिए।

⦁    उपलब्ध संसाधनों का उपयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि भावी पीढ़ी अपनी आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने की योग्यता में कमी न हो।

⦁    ऐसे कार्य न किए जाएँ जो पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ाते हैं तथा भावी पीढ़ी की गुणवत्ता को कम करते हैं। 

धारणीय विकास की आवश्यकताएँ

धारणीय विकास की प्राप्ति के लिए निम्नलिखित आवश्यकताएँ हैं
⦁    मानव जनसंख्या की पर्यावरण की धारण क्षमता के स्तर तक स्थिर करना होगा।

⦁    प्रौद्योगिक प्रगति आगत-निपुण हो, न कि आगत उपभोगी।

⦁    किसी भी स्थिर्सि में नव्यकरणीय संसाधनों की निष्कर्षण की दर पुनर्सेजन की दर से अधिक नहीं होनी चाहिए।

⦁    गैर-नवीकरणीय संसाधनों की अपक्षय दर नवीनीकृत प्रतिस्थापकों से अधिक नहीं होनी चाहिए।

⦁    प्रदूषण के कारण उत्पन्न अक्षमताओं को सुधार किया जाना चाहिए।

भारत में धारणीय विकास की रणनीतियाँ

धारणीय विकास रणनीति के मुख्य बिन्दु निम्न प्रकार हैं
⦁    अपनी विद्युत आवश्यकताओं के लिए ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों का अधिकाधिक उपयोग | करना। थर्मल पावर संयन्त्र और जलविद्युत परियोजनाएँ पर्यावरण को हानि पहँचाते हैं जबकि ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों का पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

⦁    ग्रामीण क्षेत्रों में तरल पेट्रोलियम गैस (LPG) के प्रयोग को प्रोत्साहन देना। इसके अतिरिक्त गोबर गैस संयन्त्रको प्रोत्साहन दिया जाए।

⦁    शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में उच्च दाब प्राकृतिक गैस (CNG) को बढ़ावा देना। इससे वायु प्रदूषण कम होगा।

⦁    पवनचक्की से ऊर्जा प्राप्त करना। इसमें लागत कम आती है।

⦁    सूर्य किरणों से सौर-ऊर्जा प्राप्त करना यह ऊर्जा का अक्षय स्रोत है।

⦁    पहाड़ी क्षेत्रों में झरनों की सहायता से लघु जलीय प्लाण्ट स्थापित करना।

⦁    विभिन्न आर्थिक क्रियाओं में पारम्परिक ज्ञान का प्रयोग करना।

⦁    जैविक कम्पोस्ट खाद के प्रयोग को प्रोत्साहन देना।

⦁    बेहतर कीट नियन्त्रक तरीकों को अपनाना कीट नियन्त्रण में सहायक विभिन्न कीटों व पक्षियों को संरक्षण देना।

29.

पर्यावरण सुरक्षा से क्या अभिप्राय है? यह क्यों आवश्यक है? भारत सरकार ने इसके लिए क्या उपाय किए हैं? अथवापर्यावरण प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।

Answer»

पर्यावरण संरक्षण (सुरक्षा) का अर्थ

प्राकृतिक आपदाओं से बचने का एकमात्र उपाय पर्यावरणीय संरक्षण है। पर्यावरणीय संरक्षण से आशय है-पर्यावरणीय संसाधनों; यथा-भूमि, जल, खनिज, वन, ऊर्जा व जीव-जन्तुओं आदि; का न्यूनतम उपयोग करके अधिकतम लाभ प्राप्त करना अर्थात् उन्हें कम-से-कम हानि पहुँचाना। एली के शब्दों में, “पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण वर्तमान पीढ़ी का भावी पीढ़ी के लिए त्याग है।” मैकनाल के शब्दों में-“पर्यावरणीय संरक्षण से आशय प्राकृतिक संसाधनों का इस प्रकार उपयोग करने से है, जिससे मानव जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वोत्तम रीति से कर सके और ऐसा तब ही हो सकता है, जबकि वर्तमान एवं भविष्य की सम्भावित आवश्यकताओं में सन्तुलन रखा जाए। संक्षेप में, पर्यावरणीय संरक्षण से आशय पर्यावरणीय संसाधनों को ऐसे विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग करना है, ताकि अधिकतम समय तक, अधिकतम लोगों के, अधिकतम हित में उनका उपयोग किया जा सके।

पर्यावरणीय संरक्षण के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं|
⦁    पर्यावणीय संसाधनों की आवश्यकता अपव्ययता को रोकना।

⦁    भावी उपयोग के लिए संसाधनों की बचत करना।।

⦁    संसाधनों को योजनाबद्ध एवं विवेकपूर्ण रीति से उपयोग करना।

पर्यावरणीय संरक्षण की आवश्यकता- पर्यावरण का, जिसमें मानव रह रहा है, अपने सभी जैवीय तथा अजैवीय घटकों के साथ समन्वित, समरस तथा सन्तुलित रहना आवश्यक है। वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता तथा महत्त्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है
⦁    इसके द्वारा पर्यावरणीय असन्तुलन के विनाशकारी प्रभावों से बचा जा सकता है। ,

⦁    पर्यावस्ण को हमारी शारीरिक संरचना, स्वास्थ्य तथा मन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक संसाधन जितने स्वच्छ व निर्मल होंगे, हमारा शरीर और मन भी उतना ही स्वच्छ एवं निर्मल होगा, इसलिए गुरु चरक ने कहा था-“स्वस्थ जीवन के लिए शुद्ध वायु, जल और मिट्टी आवश्यक कारक हैं।”

⦁    राज्य की स्थिरता पर्यावरण की स्वच्छता पर निर्भर करती है।

⦁    जैवीय विकास के पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण घटक है।

⦁    देश के आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण की सुरक्षा आवश्यक है।

⦁    औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग ने प्रदूषण की गम्भीर समस्या को उत्पन्न किया है। जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, एवं ध्वनि प्रदूषण की समस्याओं ने तो मानव के अस्तित्व को ही चुनौती दे दी है।

⦁    रासायनिक एवं आणविक अपघटकों ने ओजोन की परत में छेद करके सम्पूर्ण विश्व को ही त्रस्त कर दिया है।
संक्षेप में, वर्तमान शताब्दी की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है-पर्यावरण की सुरक्षा साथ ही मनुष्य को शुद्ध जल, वायु और भोजन प्रदान करना।

पर्यावरण संरक्षण हेतु सरकारी प्रयास

पर्यावरण संरक्षण के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने लगभग 30 कानून बनाए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कानून हैं-जल (प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण) अधिनियम 1974 ई० वायु (प्रदूषण और निवारण) अधिनियम, 1981 ई०; फैक्ट्री अधिनियम, कीटनाशक अधिनियम आदि। इन अधिनियमों के क्रियान्वयन का दायित्व केन्द्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड कारखानों के मुख्य निरीक्षक और कृषि विभागों के कीटनाशक निरीक्षकों पर है। पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में सरकारी प्रयासों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

(1) पर्यावरण संगठनों का गठन- चौथी योजना के प्रारम्भ में सरकार का ध्यान पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं की ओर आकर्षित हुआ। इस दृष्टि से सरकार ने सर्वप्रथम सन् 1972 ई० में एक पर्यावरण समन्वय समिति का गठन किया। जनवरी 1980 ई० में एक अन्य समिति का गठन किया गया, जिसे विभिन्न कानूनों तथा पर्यावरण को बढ़ावा देने वाले प्रशासनिक तन्त्र की विवेचना करने और उन्हें सुदृढ़ करने हेतु संस्तुतियाँ देने का कार्य सौंपा गया। इस समिति की ही संस्तुति पर सन् । 1980 ई० में पर्यावरण विभाग की स्थापना की गई। परिणामस्वरूप पर्यावरण के कार्यक्रमों के आयोजन, प्रोत्साहन और समन्वयन के लिए सन् 1985 ई० में पर्यावरण वन्य और वन्य-जीवन मन्त्रालय की स्थापना की गई।

(2) जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण – केन्द्रीय जल प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण बोर्ड; जल और वायु प्रदूषण के मूल्यांकन, निगरानी और नियन्त्रण की शीर्षस्थ संस्था है। जल (1974 ई०) और वायु (1981 ई०) प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण कानूनों तथा जल उपकर अधिनियम (1977 ई०) को लागू करने को उत्तरदायित्व केन्द्रीय बोर्ड पर और राज्यों में गठित बोडों पर है।

(3) केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण– सरकार ने सन् 1985 ई० में केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण की स्थापना की थी। गंगा सफाई कार्ययोजना का लक्ष्य नदी में बहने वाली मौजूदा गन्दगी की निकासी करके उसे किसी अन्य स्थान पर एकत्र करना और उपयोगी ऊर्जा स्रोत में परिवर्तित करने का है। इस योजना में निम्नलिखित कार्य शामिल है-
⦁    दूषित पदार्थों की निकासी हेतु बने नालों और नालियों को नवीनीकरण।

⦁    अनुपयोगी पदार्थों तथा अन्य दूषित द्रव्यों को गंगा में जाने से रोकने के लिए नए रोधक नालों का निर्माण तथा वर्तमान पम्पिंग स्टेशनों और जल-मल संयन्त्रों का नवीनीकरण।

⦁    सामूहिक शौचालय बनाना, पुराने शौचालयों को फ्लश में बदलना, विद्युत शवदाह गृह बनवाना तथा गंगा के घाटों का विकास करना।

⦁     जल-मल प्रबन्ध योजना का आधुनिकीकरण।

(4) अर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 ई०— यह अधिनियम 19 नवम्बर, 1986 ई० से लागू हो गया है। इस अधिनियम की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं
(अ) केन्द्र सरकार को प्राप्त अधिकार
⦁    पर्यावरण की गुणवत्ता के संरक्षण के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना।

⦁    पर्यावरण सुरक्षा से सम्बन्धित अधिनियमों के अन्तर्गत राज्य सरकारों, अधिकारियों और प्राधिकारियों के काम में समन्वय स्थापित करना।।

⦁    पर्यावरण प्रदूषण के निवारण, नियन्त्रण और उपशमन के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना बनाना और उसे क्रियान्वित करना।

⦁    पर्यावरण प्रदूषण के नि:सरण के लिए मानक निर्धारित करना।

⦁    किसी भी अधिकारी का प्रवेश, निरीक्षण, नमूना लेने और जाँच करने की शक्ति प्रदान ।करना।

⦁    पर्यावरण प्रयोगशालाओं की स्थापना करना या उन्हें मान्यता प्रदान करना।
⦁    सरकारी विश्लेषकों को नियुक्त करना या उन्हें मान्यता प्रदान करना।।
⦁    पर्यावरण की गुणवत्ता के मानक निर्धारित करना।
⦁    दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए रक्षोपाय निर्धारित करना और दुर्घटनाएँ लेने पर उपचारात्मक कदम उठाना।
⦁    खतरनाक पदार्थों के रख-रखाव/सँभालने आदि की प्रक्रियाएँ और रक्षोपाय निर्धारित करना। कुछ ऐसे क्षेत्रों का परिसीमन करना, जहाँ किसी भी उद्योग की स्थापना अथवा औद्योगिक गतिविधियाँ संचालित न की जा सकें।
(ब) किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि निर्धारित प्राधिकरणों को 60 दिन की सूचना देने के बाद इस अधिनियम के उपबन्धों का उल्लघंन करने वालों के विरुद्ध न्यायालय में शिकायत कर दे।
(स) अधिनियम के अन्तर्गत किसी भी स्थान को प्रभारी व्यक्ति किसी दुर्घटना आदि के फलस्वरूप प्रदूषणों का रिसाव निर्धारित मानक से अधिक होने या अधिक रिसाव होने की आशंका पर उसकी सूचना निर्धारित प्राधिकरण को देने के लिए बाध्य होगा।
(द) अधिनियम का उल्लंघन करने वालों के लिए अधिनियम में कठोर दण्ड देने की व्यवस्था
(य) इस अधिनियम के अन्तर्गत आने वाले मामले दीवानी अदालतों के कार्य-क्षेत्र में नहीं आते।

(5) अन्य योजनाएँ- उपर्युक्त के अतिरिक्त शासकीय स्तर से किए गए कुछ अन्य प्रयास निम्नलिखित हैं|
⦁    राष्ट्रीय पारिस्थितिकी बोर्ड (1981 ई०) की स्थापना।
⦁    विभिन्न राज्यों में जीवमण्डल भण्डारों की स्थापना।

⦁    सिंचाई भूमि स्थलों के लिए राज्यवार नोडल एकेडेमिक रिसर्च इन्स्टीट्यूट की स्थापना।

⦁    राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड (1985 ई०) की स्थापना।

⦁    वन नीति में संशोधन।

⦁    राष्ट्रीय वन्य-जीवन कार्ययोजनाओं का आरम्भ।

⦁    अनुसन्धान कार्यों के लिए निरन्तर प्रोत्साहन।

⦁    अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना।

⦁    प्रदूषण निवारण पुरस्कारों की घोषणा।

⦁    5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

30.

आर्थिक विकास पर पर्यावरण प्रदूषण के दुष्प्रभाव बताइए।

Answer»

पर्यावरणीय समस्याएँ आज हम सभी के लिए चिन्ता का विषय हैं। मनुष्य को अच्छे स्वास्थ्य एवं सुखे जीवन के लिए इनकी ओर आवश्यक ध्यान देना चाहिए। पर्यावरणीय संरक्षण का मूलभूत लक्षणे प्राकृतिक संसाधनों के मानवीय उपयोग के प्रबन्ध से है, ताकि वे वर्तमान पीढ़ी के लिए दीर्घकालीन लाभ प्रदान कर सकें और साथ ही भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए तैयार रहें।

विकासे हमारे लिए अति आवश्यक है। विकास न केवल देश को आर्थिक समृद्धि की ओर ले जाएगा। अपितु विकास के कारण देश का सन्तुलित आर्थिक विकास सम्भव होगा और देश में आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ कम होंगी। अतः पर्यावरणीय समस्याओं के कारण विकास कार्यों को धीमा करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। वास्तव में, विकास कार्यों में पर्यावरणीय समस्याओं का अध्ययन एवं उम्बित समय पर उनका निदान करके ही प्रत्येक क्षेत्र में बहुमुखी प्रगति सम्भव है।

पर्यावरणीय सुरक्षा एवं पारिस्थितिक सन्तुलन यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि विकास कार्यक्रम लम्बे समय तक अनवरत गति से चलते रहें। भारी, मध्यम एवं लघु उद्योगों के संयोजन पर आधारित विविधतापूर्ण औद्योगिक ढाँचे की स्थापना तथा देश में बढ़ती हुई शहरी एवं ग्रामीण जनसंख्या के परिणामस्वरूप वायु, जल एवं भू-संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, जिसके कारण वायु तथा जल प्रदूषण में वृद्धि हुई है। चिमनी से उड़ती राख, फॉस्फोजिप्सम तथा झोंका भट्ठी के धातु अपशिष्ट जैसे ठोस कचरे को भण्डारण, कचरे का ढेर लगाना एवं उसका निपटान करना; औद्योगिक क्षेत्र में प्रमुख समस्या बन गए हैं। रसायन एवं पेट्रो-रसान उद्योगों के विकास के पीछे जहरीले, ज्वलनशील एवं विस्फोटक रसायनों को विनियमित करने की समस्या भी जटिल होती जा रही है। अधिकांश उद्योग दूषित जल को नदियों एवं जलमार्गों में पर्याप्त शोधन के बिना ही छोड़ देते हैं। औद्योगिक अवशिष्टों का स्राव आसानी से घुलनशील नहीं होता है और नदियाँ भी इसे प्राकृतिक रूप से आत्मसात नहीं कर पाती हैं। इसके परिणामस्वरूप जल तत्त्व प्रदूषित ही रह जाते हैं और जनस्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। 17 राज्यों में द्वितीय श्रेणी के 241 नगरों में केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, आपूर्ति किया गया 90% जल गन्दा होता है। अपर्याप्त सफाई की समस्या भी गम्भीर है। औद्योगिक प्रदूषण को प्रमुख भाग अवशिष्ट पदार्थों के रूप में है।

उद्योगों और सड़क पर चलने वाले मोटर वाहनों द्वारा प्रतिदिन हजारों टन प्रदूषक पदार्थों का वायु में उत्सर्जन किया जाता है। वाहनों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण पदार्थ अधिक घातक सिद्ध होते हैं, क्योंकि उनसे जनता का नजदीकी सम्पर्क रहता है और शहरों में ऊँचे-ऊँचे भवनों के कारण उनका प्रकीर्णन नहीं हो पाता है। पुराने इंजन, पुराने वाहन, भीड़-भाड़ वाला यातायात, खराब दशा वाली सड़कें तथा घटिया किस्म का ईंधन वायु प्रदूषण को और भी बढ़ा देते हैं। कोयले पर आधारित तापीय संयन्त्र सल्फर डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि गैंसे उत्सर्जित करके वातावरण को प्रदूषित करते हैं।, जिसके कारण तेजाबी वर्षा होती है, जो क्षेत्र की मिट्टी, वनस्पति एवं जल-जीवों के जीवन को नष्ट करती है, जिससे बड़ी मात्रा में समाज का अहित होता है। इसके अतिरिक्त, खनन उद्योग भी आस-पास के क्षेत्र में वायु और जल को प्रदूषित कर रही है। खननों के वास्तविक प्रचलनों के अलावा खानों से निकला अपशिष्ट पदार्थ और इनके ढेर, खेतों एवं सम्पत्ति को नष्ट करते हैं। खुदाई से भूमिगत जल के स्रोत भी दूषित हो जाते हैं। खानों से बन्दरगाहों और रेलवे स्टेशनों के लिए लौह-अयस्कों की ढुलाई से प्रत्येक स्थान; यथा-वायु में, घरों में तथा खाना पकाने के बर्तनों; पर धूल की एक परत जम जाती है।
मुख्य रूप से बड़े शहरों में ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। वहाँ यातायात तथा वायुयानों का शोर मानव स्वास्थ्य एवं श्रवण शक्ति के लिए खतरा उत्पन्न करता है और शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के तनाव उत्पन्न करता है। व्यापक स्तर पर गरीबी के साथ-साथ बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, जिससे पर्यावरण का स्तर विकृत हुआ है। वन संसाधनों की चराई, व्यापारिक एवं घरेलू आवश्यकताओं हेतु अधिक उपयोग के दूसरे तरीकों, अतिक्रमणों, कृषि जैसी अस्थायी पद्धतियों और विकासात्मक क्रिया-कलापों के कारण खतरा बढ़ गया है। देश की नाजुक पारिस्थितिक प्रणालियों को भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। मूंगे की चट्टानें, जो समुद्रीय पारिस्थितिक प्रणालियों की बहुत ही उत्पादनकारी प्रणाली है, पर भी चूने के उत्पादन, मनोरंजक वस्तुओं के उपयोग और आभूषण सम्बन्धी व्यापार के कारण हुए अन्धाधुन्ध दोहन से प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। 6,700 वर्ग किमी कच्छ वनस्पति क्षेत्र, मछली पकड़ने, भूमि तथा समुद्र के बीच के स्थान के उपयोग में परिवर्तन और जल प्रदूषण, जोकि समुद्री जहाजों एवं तटीय तेलशोधक कारखानों से तेल के रिसाव, घरेलू गन्दगी तथा औद्योगिक बहि:स्राव के गलत दिशा परिवर्तन से होता है, के कारण जैविक दबाव क्षेत्र बन गया है। संक्षेप में, आर्थिक विकास कार्यक्रमों के अन्तर्गत कृषि एवं औद्योगिक विकास, परिवहन के साधनों के विकास, विद्युत एवं परमाणु शक्ति के विकास आदि के कारणों ने पर्यावरणीय प्रदूषण को बढ़ाया है, जिससे मानव जीवन का अस्तित्व (आर्थिक विकास का मुख्य लक्ष्य है–मानव-कल्याण में वृद्धि) ही खतरे में पड़ गया है। अतः आर्थिक विकास के लाभ तभी तक उपादेय हैं, जब तक पर्यावरण संरक्षित है, इसलिए आर्थिक विकास कार्यक्रमों में पर्यावरण संरक्षण को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। वास्तव में,आर्थिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे से परस्पर सम्बद्ध हैं।

31.

वह राज्य जहाँ सर्वाधिक शेर पाये जाते हैं(क) उत्तर प्रदेश(ख) गुजरात(ग) मध्य प्रदेश(घ) आन्ध्र प्रदेश

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सही विकल्प है (ख) गुजरात

32.

किस राज्य में सुन्दरवन स्थित है?(क) ओडिशा(ख) मेघालय(ग) पश्चिम बंगाल(घ) अरुणाचल प्रदेश

Answer»

सही विकल्प है (ग) पश्चिम बंगाल

33.

मृदीय (मृदा) प्रदूषण का अर्थ, स्रोत एवं प्रभाव बताइए। मृदीय प्रदूषण की रोकथाम के| लिए क्या उपाय अपनाए जाने चाहिए?

Answer»

मृदीय प्रदूषण

अर्थ- प्रदूषित जल तथा वायु के कारण मृदा भी प्रदूषित हो जाती है। वर्षा आदि जल के साथ ये प्रदूषक पदार्थ मृदा में आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त, जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ अधिक फसल उगाने के लिए भूमि की उर्वरता बढ़ाने या बनाए रखने के लिए उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न प्रकार के कीटाणुनाशक पदार्थ, अपतृणनाशी पदार्थ आदि फसलों पर छिड़के जाते हैं। ये सब पदार्थ मृदा के साथ मिलकर उसमें हानिकारक प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। इसी को ‘मृदीय प्रदूषण’ कहते हैं। स्रोत–काफी मात्रा में ठोस अपशिष्ट पदार्थ (wastes) घरों से बाहर फेंक दिए जाते हैं। सब्जियों के शेष भाग, पैकिंग का व्यर्थ समान, डिब्बे, कागज के टुकड़े, कोयले की राख, धातु, प्लास्टिक, चीनी व मिट्टी के बर्तन आदि कूड़े के ढेर बनते हैं। 

प्रभाव–राष्ट्रीय प्रदूषण के निम्नलिखित प्रभाव हो सकते हैं
⦁    गन्दे स्थान अनेक जीव-जन्तुओं; चूहे, मक्खियों, मच्छरों आदि रोगवाहकों; के रहने तथा बढ़ने के | स्थान बन जाते हैं तथा मनुष्यों व पशुओं में रोग उत्पन्न करते हैं।

⦁    खानों-दानों आदि की मृदा में अनेक प्रदूषक पदार्थ पाए जाते हैं। ये पदार्थ विषैले होते हैं, जो पौधों के प्ररीर में एकत्रित होकर बाद में मनुष्य तथा पशुओं के शरीर में पहुँचकर रोग उत्पन्न कर देते हैं।

⦁    अनेक उद्योग; जैसे–लुगदी व कागज मिल, तेलशोधक कारखाने, रासायनिक खाद के कारखाने, लोहा व इस्पात कारखाने, प्लास्टिक व रबड़ संयन्त्र आदि मृदा प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।

⦁    रेडियोधर्मी पदार्थ मृदा में पहुँचकर अनेक प्रकार से हानियाँ पहुँचाते हैं। इनसे पौधे नष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त पौधों द्वारा अनेक हानिकारक पदार्थ मनुष्यों तथा जीवों में पहुँचते हैं और भयंकर रोग उत्पन्न करते हैं।

रोकथाम के उपाय-मृदीय प्रदूषण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जाने चाहिए
⦁    घरेलू अपशिष्टों, वाहित मल आदि का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। इस कार्य का प्रबन्ध समितियों द्वारा होना चाहिए।

⦁    परमाणु विस्फोटों पर रोक लगाई जानी चाहिए। परमाणु संस्थानों से होने वाले रिसाव को रोकने के | लिए समुचित उपाय किए जाने चाहिए।

⦁    कृषि के अपशिष्ट, गोबर आदि कार्बनिक पदार्थों का विसर्जन हानिकारक विधियों द्वारा नहीं कियाजाना चाहिए। इनका प्रयोग अधिक ऊर्जा उत्पादन तथा उचित खाद के उत्पादन के लिए किया जा सकता है।

⦁    उद्योगों के लिए निश्चित किया जाए कि वे अपने अपशिष्टों के निष्कासन के लिए ऐसी योजनाएँ बनाएँ कि वे जल, वायु तथा मृदा को हानि न्यूनतम स्तर पर ही पहुंचा सकें।

34.

पेट्रोल को तरल सोना क्यों कहते हैं?

Answer»

वर्तमान युग में पेट्रोलियम किसी राष्ट्र के लिए सोने से भी अधिक कीमती है, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की उन्नति पेट्रोलियम की मात्रा पर निर्भर करती है। कृषि, उद्योग, यातायात एवं संचार आदि विभिन्न कार्यों में इसका उपयोग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, इसलिए पेट्रोलियम को तरल सोना कहा जाता है।

35.

राष्ट्रीय आय का प्रवाह संतुलन में होता है जब(क) भरण = क्षरण होते हैं।(ख) भरण > क्षरण होते हैं।(ग) भरण < क्षरण होते हैं। (घ) भरण ≠ क्षरण होते हैं।

Answer»

सही विकल्प है (क) भरण = क्षरण होते हैं।

36.

वास्तविक प्रवाह से अर्थ है।(क) परिवारों से फर्मों को कारक साधनों का प्रवाह(ख) फर्मों से परिवारों को वस्तुओं और सेवाओं का प्रवाह(ग) के और ख दोनों(घ) उपयुक्त कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है  (ग) के और ख दोनों

37.

मौद्रिक प्रवाह और वास्तविक प्रवाह(क) बराबर होते हैं।(ख) बराबर भी हो सकते हैं और असमान भी(ग) असमान होते हैं।(घ) बराबर हो तो आय का चक्रीय प्रवाह संतुलन में होता है।

Answer»

सही विकल्प है  (क) बराबर होते हैं।

38.

यदि अर्थव्यवस्था में हस्तांतरण आय है तो?(क) वास्तविक प्रवाह मौद्रिक प्रवाह से अधिक होगा।(ख) वास्तविक प्रवाह और मौद्रिक प्रवाह बराबर होंगे(ग) वास्तविक प्रवाह मौद्रिक प्रवाह से कम होगा(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है  (ग) वास्तविक प्रवाह मौद्रिक प्रवाह से कम होगा

39.

निम्नलिखित में से कौन सी मद सकल घरेलू उत्पाद में शामिल की जाती है?(क) हस्तांतरण भुगतान(ख) कारक भुगतान(ग) विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय(घ) उपरोक्त सभी

Answer»

सही विकल्प है  (ख) कारक भुगतान

40.

बाजार कीमत पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद – शुद्ध अप्रत्यक्ष कर मूल्यह्रास किसके बराबर होगा?(क) GDPMP(ख) NNPFC(ग) GNPFC(घ) NDPFC

Answer»

सही विकल्प है  (ख) NNPFC

41.

उत्पादन के चार कारक कौन-कौन से हैं और इनमें से प्रत्येक के पारिश्रमिक को क्या कहते हैं?

Answer»

उत्पादन के चार कारण निम्नलिखित हैं

1. श्रम-किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक कार्य जो धन उपार्जन के लिए किया जाता है श्रम कहलाता है।
2. भूमि–अर्थशास्त्र में उत्पादन में प्रयोग होने वाले सभी प्राकृतिक साधनों को भूमि में शामिल किया जाता है।
3. पूँजी-उत्पादन में प्रयोग होने वाले मनुष्य उत्पादित साधनों को पूँजी में शामिल किया जाता है।
4. उद्यमी-उद्यमी ऐसे लोग हैं जो बड़े निर्णयों के नियंत्रण का कार्य करते हैं और उद्यम के साथ जुड़े बड़े जोखिम का वहन करते हैं।
श्रम के पारिश्रमिक को वेतन कहते हैं।
भूमि के पारिश्रमिक को किराया लगान कहते हैं।
पूँजी के पारिश्रमिक को ब्याज कहते हैं।
उद्यमी के पारिश्रमिक को लाभ कहते हैं।

42.

निम्नलिखित नदियों में से, देश में किस नदी में सबसे ज्यादा पुनः पूर्तियोग्य भौम जल संसाधन है?(क) सिंधु(ख) ब्रह्मपुत्र(ग) गंगा(घ) गोदावरी

Answer»

सही विकल्प है (ग) गंगा।

43.

उत्तर नीचे दी गई जानकारी के आधार पर देंसकल घरेलू उत्पाद बाजार कीमत पर = ₹ 4200 करोड़मूल्यह्रास = ₹ 200 करोड़अप्रत्यक्ष कर = ₹ 50 करोड़आर्थिक सहायता = ₹ 30 करोड़विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय = ₹ (-) 10 करोड़बाजार कीमत पर निवल राष्ट्रीय उत्पाद बराबर(क) 4010(ख) 4020(ग) 3990(घ) 4180

Answer»

सही विकल्प है (ग) 3990

44.

निम्नलिखित में से कौन सी हस्तांतरण आय नहीं है?(क) बच्चे को दिया गया जेब खर्च(ख) वृद्धावस्था पेंशन(ग) सेवानिवृत्ति पेंशन(घ) बेरोजगारी भत्ता

Answer»

सही विकल्प है (ग) सेवानिवृत्ति पेंशन

45.

निम्नलिखित में से किसे घरेलू आय में शामिल किया जाएगा?(क) विदेश में एक भारतीय बैंक द्वारा अर्जित लाभ ।(ख) अमेरिका में भारतीय दूतावास में कार्यरत अमेरिकी कर्मचारियों को वेतन(ग) भारतीय सरकार द्वारा दी गई छात्रवृत्तियाँ(घ) उपरोक्त सभी

Answer»

(ख) अमेरिका में भारतीय दूतावास में कार्यरत अमेरिकी कर्मचारियों को वेतन

46.

उत्तर नीचे दी गई जानकारी के आधार पर देंसकल घरेलू उत्पाद बाजार कीमत पर = ₹ 4200 करोड़मूल्यह्रास = ₹ 200 करोड़अप्रत्यक्ष कर = ₹ 50 करोड़आर्थिक सहायता = ₹ 30 करोड़विदेशों से प्राप्त शुद्ध साधन आय = ₹ (-) 10 करोड़कारक आय पर सकल राष्ट्रीय उत्पाद बराबर(क) 3990(ख) 4020(ग) 4180(घ) 4170

Answer»

सही विकल्प है (घ) 4170

47.

निम्नलिखित में से किसे भारत की घरेलू सीमा में शामिल किया जाएगा?(क) विदेशों में स्थित भारत के दूतावास(ख) भारत में स्थित विदेशी दूतावास(ग) अन्तराष्ट्रीय संस्थाएँ जो भारत में कार्यरत हैं(घ) उपरोक्त सभी

Answer»

सही विकल्प है (क) विदेशों में स्थित भारत के दूतावास

48.

निम्नलिखित में से कौन सा भारत का सामान्य निवासी माना जाएगा?(क) विश्व बैंक(ख) इलाज के लिए भारत आया विदेशी(ग) अमेरिका के दूतावास में कार्यरत भारतीय(घ) पढ़ाई के लिए कोरिया से आया विद्यार्थी

Answer»

सही विकल्प है (ग) अमेरिका के दूतावास में कार्यरत भारतीय

49.

दो हरी गणना से बचने के लिए कौन सी विधि अपनाई जाती है?(क) आय विधि(ख) व्यय विधि(ग) मूल्यवृद्धि विधि(घ) इनमें से कोई नहीं

Answer»

सही विकल्प है (ग) मूल्यवृद्धि विधि

50.

कर्मचारियों के पारिश्रमिक में किसे शामिल नहीं किया जाता?(क) किस्म में मजदूरी/वेतन(ख) बोनस और कमीशन(ग) नियोजकों द्वारा सामाजिक सुरक्षा योजना में योगदान(घ) कर्मचारी द्वारा सामाजिक सुरक्षा योजना में योगदान

Answer»

(घ) कर्मचारी द्वारा सामाजिक सुरक्षा योजना में योगदान