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आर्थिक विकास पर पर्यावरण प्रदूषण के दुष्प्रभाव बताइए।

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पर्यावरणीय समस्याएँ आज हम सभी के लिए चिन्ता का विषय हैं। मनुष्य को अच्छे स्वास्थ्य एवं सुखे जीवन के लिए इनकी ओर आवश्यक ध्यान देना चाहिए। पर्यावरणीय संरक्षण का मूलभूत लक्षणे प्राकृतिक संसाधनों के मानवीय उपयोग के प्रबन्ध से है, ताकि वे वर्तमान पीढ़ी के लिए दीर्घकालीन लाभ प्रदान कर सकें और साथ ही भावी पीढ़ियों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए तैयार रहें।

विकासे हमारे लिए अति आवश्यक है। विकास न केवल देश को आर्थिक समृद्धि की ओर ले जाएगा। अपितु विकास के कारण देश का सन्तुलित आर्थिक विकास सम्भव होगा और देश में आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ कम होंगी। अतः पर्यावरणीय समस्याओं के कारण विकास कार्यों को धीमा करना बिल्कुल भी उचित नहीं है। वास्तव में, विकास कार्यों में पर्यावरणीय समस्याओं का अध्ययन एवं उम्बित समय पर उनका निदान करके ही प्रत्येक क्षेत्र में बहुमुखी प्रगति सम्भव है।

पर्यावरणीय सुरक्षा एवं पारिस्थितिक सन्तुलन यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि विकास कार्यक्रम लम्बे समय तक अनवरत गति से चलते रहें। भारी, मध्यम एवं लघु उद्योगों के संयोजन पर आधारित विविधतापूर्ण औद्योगिक ढाँचे की स्थापना तथा देश में बढ़ती हुई शहरी एवं ग्रामीण जनसंख्या के परिणामस्वरूप वायु, जल एवं भू-संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, जिसके कारण वायु तथा जल प्रदूषण में वृद्धि हुई है। चिमनी से उड़ती राख, फॉस्फोजिप्सम तथा झोंका भट्ठी के धातु अपशिष्ट जैसे ठोस कचरे को भण्डारण, कचरे का ढेर लगाना एवं उसका निपटान करना; औद्योगिक क्षेत्र में प्रमुख समस्या बन गए हैं। रसायन एवं पेट्रो-रसान उद्योगों के विकास के पीछे जहरीले, ज्वलनशील एवं विस्फोटक रसायनों को विनियमित करने की समस्या भी जटिल होती जा रही है। अधिकांश उद्योग दूषित जल को नदियों एवं जलमार्गों में पर्याप्त शोधन के बिना ही छोड़ देते हैं। औद्योगिक अवशिष्टों का स्राव आसानी से घुलनशील नहीं होता है और नदियाँ भी इसे प्राकृतिक रूप से आत्मसात नहीं कर पाती हैं। इसके परिणामस्वरूप जल तत्त्व प्रदूषित ही रह जाते हैं और जनस्वास्थ्य पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। 17 राज्यों में द्वितीय श्रेणी के 241 नगरों में केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, आपूर्ति किया गया 90% जल गन्दा होता है। अपर्याप्त सफाई की समस्या भी गम्भीर है। औद्योगिक प्रदूषण को प्रमुख भाग अवशिष्ट पदार्थों के रूप में है।

उद्योगों और सड़क पर चलने वाले मोटर वाहनों द्वारा प्रतिदिन हजारों टन प्रदूषक पदार्थों का वायु में उत्सर्जन किया जाता है। वाहनों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण पदार्थ अधिक घातक सिद्ध होते हैं, क्योंकि उनसे जनता का नजदीकी सम्पर्क रहता है और शहरों में ऊँचे-ऊँचे भवनों के कारण उनका प्रकीर्णन नहीं हो पाता है। पुराने इंजन, पुराने वाहन, भीड़-भाड़ वाला यातायात, खराब दशा वाली सड़कें तथा घटिया किस्म का ईंधन वायु प्रदूषण को और भी बढ़ा देते हैं। कोयले पर आधारित तापीय संयन्त्र सल्फर डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि गैंसे उत्सर्जित करके वातावरण को प्रदूषित करते हैं।, जिसके कारण तेजाबी वर्षा होती है, जो क्षेत्र की मिट्टी, वनस्पति एवं जल-जीवों के जीवन को नष्ट करती है, जिससे बड़ी मात्रा में समाज का अहित होता है। इसके अतिरिक्त, खनन उद्योग भी आस-पास के क्षेत्र में वायु और जल को प्रदूषित कर रही है। खननों के वास्तविक प्रचलनों के अलावा खानों से निकला अपशिष्ट पदार्थ और इनके ढेर, खेतों एवं सम्पत्ति को नष्ट करते हैं। खुदाई से भूमिगत जल के स्रोत भी दूषित हो जाते हैं। खानों से बन्दरगाहों और रेलवे स्टेशनों के लिए लौह-अयस्कों की ढुलाई से प्रत्येक स्थान; यथा-वायु में, घरों में तथा खाना पकाने के बर्तनों; पर धूल की एक परत जम जाती है।
मुख्य रूप से बड़े शहरों में ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। वहाँ यातायात तथा वायुयानों का शोर मानव स्वास्थ्य एवं श्रवण शक्ति के लिए खतरा उत्पन्न करता है और शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार के तनाव उत्पन्न करता है। व्यापक स्तर पर गरीबी के साथ-साथ बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, जिससे पर्यावरण का स्तर विकृत हुआ है। वन संसाधनों की चराई, व्यापारिक एवं घरेलू आवश्यकताओं हेतु अधिक उपयोग के दूसरे तरीकों, अतिक्रमणों, कृषि जैसी अस्थायी पद्धतियों और विकासात्मक क्रिया-कलापों के कारण खतरा बढ़ गया है। देश की नाजुक पारिस्थितिक प्रणालियों को भी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। मूंगे की चट्टानें, जो समुद्रीय पारिस्थितिक प्रणालियों की बहुत ही उत्पादनकारी प्रणाली है, पर भी चूने के उत्पादन, मनोरंजक वस्तुओं के उपयोग और आभूषण सम्बन्धी व्यापार के कारण हुए अन्धाधुन्ध दोहन से प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। 6,700 वर्ग किमी कच्छ वनस्पति क्षेत्र, मछली पकड़ने, भूमि तथा समुद्र के बीच के स्थान के उपयोग में परिवर्तन और जल प्रदूषण, जोकि समुद्री जहाजों एवं तटीय तेलशोधक कारखानों से तेल के रिसाव, घरेलू गन्दगी तथा औद्योगिक बहि:स्राव के गलत दिशा परिवर्तन से होता है, के कारण जैविक दबाव क्षेत्र बन गया है। संक्षेप में, आर्थिक विकास कार्यक्रमों के अन्तर्गत कृषि एवं औद्योगिक विकास, परिवहन के साधनों के विकास, विद्युत एवं परमाणु शक्ति के विकास आदि के कारणों ने पर्यावरणीय प्रदूषण को बढ़ाया है, जिससे मानव जीवन का अस्तित्व (आर्थिक विकास का मुख्य लक्ष्य है–मानव-कल्याण में वृद्धि) ही खतरे में पड़ गया है। अतः आर्थिक विकास के लाभ तभी तक उपादेय हैं, जब तक पर्यावरण संरक्षित है, इसलिए आर्थिक विकास कार्यक्रमों में पर्यावरण संरक्षण को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है। वास्तव में,आर्थिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे से परस्पर सम्बद्ध हैं।



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