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पर्यावरण सुरक्षा से क्या अभिप्राय है? यह क्यों आवश्यक है? भारत सरकार ने इसके लिए क्या उपाय किए हैं? अथवापर्यावरण प्रदूषण को नियन्त्रित करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।

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पर्यावरण संरक्षण (सुरक्षा) का अर्थ

प्राकृतिक आपदाओं से बचने का एकमात्र उपाय पर्यावरणीय संरक्षण है। पर्यावरणीय संरक्षण से आशय है-पर्यावरणीय संसाधनों; यथा-भूमि, जल, खनिज, वन, ऊर्जा व जीव-जन्तुओं आदि; का न्यूनतम उपयोग करके अधिकतम लाभ प्राप्त करना अर्थात् उन्हें कम-से-कम हानि पहुँचाना। एली के शब्दों में, “पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण वर्तमान पीढ़ी का भावी पीढ़ी के लिए त्याग है।” मैकनाल के शब्दों में-“पर्यावरणीय संरक्षण से आशय प्राकृतिक संसाधनों का इस प्रकार उपयोग करने से है, जिससे मानव जाति की आवश्यकताओं की पूर्ति सर्वोत्तम रीति से कर सके और ऐसा तब ही हो सकता है, जबकि वर्तमान एवं भविष्य की सम्भावित आवश्यकताओं में सन्तुलन रखा जाए। संक्षेप में, पर्यावरणीय संरक्षण से आशय पर्यावरणीय संसाधनों को ऐसे विवेकपूर्ण ढंग से उपयोग करना है, ताकि अधिकतम समय तक, अधिकतम लोगों के, अधिकतम हित में उनका उपयोग किया जा सके।

पर्यावरणीय संरक्षण के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं|
⦁    पर्यावणीय संसाधनों की आवश्यकता अपव्ययता को रोकना।

⦁    भावी उपयोग के लिए संसाधनों की बचत करना।।

⦁    संसाधनों को योजनाबद्ध एवं विवेकपूर्ण रीति से उपयोग करना।

पर्यावरणीय संरक्षण की आवश्यकता- पर्यावरण का, जिसमें मानव रह रहा है, अपने सभी जैवीय तथा अजैवीय घटकों के साथ समन्वित, समरस तथा सन्तुलित रहना आवश्यक है। वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता तथा महत्त्व को निम्न प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है
⦁    इसके द्वारा पर्यावरणीय असन्तुलन के विनाशकारी प्रभावों से बचा जा सकता है। ,

⦁    पर्यावस्ण को हमारी शारीरिक संरचना, स्वास्थ्य तथा मन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। प्राकृतिक संसाधन जितने स्वच्छ व निर्मल होंगे, हमारा शरीर और मन भी उतना ही स्वच्छ एवं निर्मल होगा, इसलिए गुरु चरक ने कहा था-“स्वस्थ जीवन के लिए शुद्ध वायु, जल और मिट्टी आवश्यक कारक हैं।”

⦁    राज्य की स्थिरता पर्यावरण की स्वच्छता पर निर्भर करती है।

⦁    जैवीय विकास के पर्यावरण एक महत्त्वपूर्ण घटक है।

⦁    देश के आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण की सुरक्षा आवश्यक है।

⦁    औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग ने प्रदूषण की गम्भीर समस्या को उत्पन्न किया है। जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, एवं ध्वनि प्रदूषण की समस्याओं ने तो मानव के अस्तित्व को ही चुनौती दे दी है।

⦁    रासायनिक एवं आणविक अपघटकों ने ओजोन की परत में छेद करके सम्पूर्ण विश्व को ही त्रस्त कर दिया है।
संक्षेप में, वर्तमान शताब्दी की सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है-पर्यावरण की सुरक्षा साथ ही मनुष्य को शुद्ध जल, वायु और भोजन प्रदान करना।

पर्यावरण संरक्षण हेतु सरकारी प्रयास

पर्यावरण संरक्षण के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने लगभग 30 कानून बनाए हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कानून हैं-जल (प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण) अधिनियम 1974 ई० वायु (प्रदूषण और निवारण) अधिनियम, 1981 ई०; फैक्ट्री अधिनियम, कीटनाशक अधिनियम आदि। इन अधिनियमों के क्रियान्वयन का दायित्व केन्द्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड कारखानों के मुख्य निरीक्षक और कृषि विभागों के कीटनाशक निरीक्षकों पर है। पर्यावरण संरक्षण के सम्बन्ध में सरकारी प्रयासों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

(1) पर्यावरण संगठनों का गठन- चौथी योजना के प्रारम्भ में सरकार का ध्यान पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं की ओर आकर्षित हुआ। इस दृष्टि से सरकार ने सर्वप्रथम सन् 1972 ई० में एक पर्यावरण समन्वय समिति का गठन किया। जनवरी 1980 ई० में एक अन्य समिति का गठन किया गया, जिसे विभिन्न कानूनों तथा पर्यावरण को बढ़ावा देने वाले प्रशासनिक तन्त्र की विवेचना करने और उन्हें सुदृढ़ करने हेतु संस्तुतियाँ देने का कार्य सौंपा गया। इस समिति की ही संस्तुति पर सन् । 1980 ई० में पर्यावरण विभाग की स्थापना की गई। परिणामस्वरूप पर्यावरण के कार्यक्रमों के आयोजन, प्रोत्साहन और समन्वयन के लिए सन् 1985 ई० में पर्यावरण वन्य और वन्य-जीवन मन्त्रालय की स्थापना की गई।

(2) जल प्रदूषण निवारण एवं नियन्त्रण – केन्द्रीय जल प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण बोर्ड; जल और वायु प्रदूषण के मूल्यांकन, निगरानी और नियन्त्रण की शीर्षस्थ संस्था है। जल (1974 ई०) और वायु (1981 ई०) प्रदूषण निवारण और नियन्त्रण कानूनों तथा जल उपकर अधिनियम (1977 ई०) को लागू करने को उत्तरदायित्व केन्द्रीय बोर्ड पर और राज्यों में गठित बोडों पर है।

(3) केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण– सरकार ने सन् 1985 ई० में केन्द्रीय गंगा प्राधिकरण की स्थापना की थी। गंगा सफाई कार्ययोजना का लक्ष्य नदी में बहने वाली मौजूदा गन्दगी की निकासी करके उसे किसी अन्य स्थान पर एकत्र करना और उपयोगी ऊर्जा स्रोत में परिवर्तित करने का है। इस योजना में निम्नलिखित कार्य शामिल है-
⦁    दूषित पदार्थों की निकासी हेतु बने नालों और नालियों को नवीनीकरण।

⦁    अनुपयोगी पदार्थों तथा अन्य दूषित द्रव्यों को गंगा में जाने से रोकने के लिए नए रोधक नालों का निर्माण तथा वर्तमान पम्पिंग स्टेशनों और जल-मल संयन्त्रों का नवीनीकरण।

⦁    सामूहिक शौचालय बनाना, पुराने शौचालयों को फ्लश में बदलना, विद्युत शवदाह गृह बनवाना तथा गंगा के घाटों का विकास करना।

⦁     जल-मल प्रबन्ध योजना का आधुनिकीकरण।

(4) अर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 ई०— यह अधिनियम 19 नवम्बर, 1986 ई० से लागू हो गया है। इस अधिनियम की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं
(अ) केन्द्र सरकार को प्राप्त अधिकार
⦁    पर्यावरण की गुणवत्ता के संरक्षण के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना।

⦁    पर्यावरण सुरक्षा से सम्बन्धित अधिनियमों के अन्तर्गत राज्य सरकारों, अधिकारियों और प्राधिकारियों के काम में समन्वय स्थापित करना।।

⦁    पर्यावरण प्रदूषण के निवारण, नियन्त्रण और उपशमन के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना बनाना और उसे क्रियान्वित करना।

⦁    पर्यावरण प्रदूषण के नि:सरण के लिए मानक निर्धारित करना।

⦁    किसी भी अधिकारी का प्रवेश, निरीक्षण, नमूना लेने और जाँच करने की शक्ति प्रदान ।करना।

⦁    पर्यावरण प्रयोगशालाओं की स्थापना करना या उन्हें मान्यता प्रदान करना।
⦁    सरकारी विश्लेषकों को नियुक्त करना या उन्हें मान्यता प्रदान करना।।
⦁    पर्यावरण की गुणवत्ता के मानक निर्धारित करना।
⦁    दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए रक्षोपाय निर्धारित करना और दुर्घटनाएँ लेने पर उपचारात्मक कदम उठाना।
⦁    खतरनाक पदार्थों के रख-रखाव/सँभालने आदि की प्रक्रियाएँ और रक्षोपाय निर्धारित करना। कुछ ऐसे क्षेत्रों का परिसीमन करना, जहाँ किसी भी उद्योग की स्थापना अथवा औद्योगिक गतिविधियाँ संचालित न की जा सकें।
(ब) किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि निर्धारित प्राधिकरणों को 60 दिन की सूचना देने के बाद इस अधिनियम के उपबन्धों का उल्लघंन करने वालों के विरुद्ध न्यायालय में शिकायत कर दे।
(स) अधिनियम के अन्तर्गत किसी भी स्थान को प्रभारी व्यक्ति किसी दुर्घटना आदि के फलस्वरूप प्रदूषणों का रिसाव निर्धारित मानक से अधिक होने या अधिक रिसाव होने की आशंका पर उसकी सूचना निर्धारित प्राधिकरण को देने के लिए बाध्य होगा।
(द) अधिनियम का उल्लंघन करने वालों के लिए अधिनियम में कठोर दण्ड देने की व्यवस्था
(य) इस अधिनियम के अन्तर्गत आने वाले मामले दीवानी अदालतों के कार्य-क्षेत्र में नहीं आते।

(5) अन्य योजनाएँ- उपर्युक्त के अतिरिक्त शासकीय स्तर से किए गए कुछ अन्य प्रयास निम्नलिखित हैं|
⦁    राष्ट्रीय पारिस्थितिकी बोर्ड (1981 ई०) की स्थापना।
⦁    विभिन्न राज्यों में जीवमण्डल भण्डारों की स्थापना।

⦁    सिंचाई भूमि स्थलों के लिए राज्यवार नोडल एकेडेमिक रिसर्च इन्स्टीट्यूट की स्थापना।

⦁    राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड (1985 ई०) की स्थापना।

⦁    वन नीति में संशोधन।

⦁    राष्ट्रीय वन्य-जीवन कार्ययोजनाओं का आरम्भ।

⦁    अनुसन्धान कार्यों के लिए निरन्तर प्रोत्साहन।

⦁    अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना।

⦁    प्रदूषण निवारण पुरस्कारों की घोषणा।

⦁    5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।



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