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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

रुचियों के आधार पर किये गये व्यवसायों के वर्गीकरण का उल्लेख कीजिए।

Answer»

व्यवसायों को एक वर्गीकरण व्यक्तियों की रुचियों के आधार पर भी किया गया है। इस वर्गीकरण के अन्तर्गत किया गया व्यवसायों का वर्गीकरण इस प्रकार है-

⦁    यान्त्रिक व्यवसाय
⦁    गणनात्मक व्यवसाय
⦁    बाह्य जीवन से सम्बन्धी व्यवसाय
⦁    वैज्ञानिक व्यवसाय
⦁    कलात्मक व्यवसाय
⦁    प्रभावात्मक व्यवसाय
⦁    साहित्यिक व्यवसाय
⦁    संगीतात्मक व्यवसाय
⦁    समाज सेवी सम्बन्धी व्यवसाय तथा
⦁    लिपिक सम्बन्धी व्यवसाय।

2.

सांख्यिकी की मुख्य सीमाओं का उल्लेख कीजिए।

Answer»

यह सत्य है कि सांख्यिकी की अत्यधिक उपयोगिता एवं महत्त्व है, परन्तु इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं। सर्वप्रथम हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी के माध्यम से केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन किया जा सकता है, इसके माध्यम से गुणात्मक तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार सांख्यिकी के माध्यम से विजातीय तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता है। यही नहीं, इसके माध्यम से केवल समूह का अध्ययन किया जा सकता है, व्यक्ति का नहीं। बिना सन्दर्भ से सांख्यिकी के माध्यम से प्राप्त होने वाले परिणाम असत्य तथा भ्रामक होते हैं। सांख्यिकी के माध्यम से प्राप्त होने वाले परिणाम केवल औसत रूप में ही सही हैं। वास्तव में, सांख्यिकी एक साधन है, साध्य नहीं। इन्हीं सीमाओं को ध्यान में रखते हुए यूल तथा केण्डाल ने कहा है, “सांख्यिकीय राीतियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकती हैं।”

3.

सांख्यिकी के सन्दर्भ में समंकों की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Answer»

⦁    समंक तथ्यों के समूह होते हैं तथा
⦁    समंक संख्याओं के रूप में व्यक्त किये जाते हैं।

4.

आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण के महत्व को स्पष्ट कीजिए।

Answer»

आँकड़ों के व्यवस्थापन यो आवृत्ति वितरण का महत्त्व
आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण का महत्त्व निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत प्रतिपादित किया जा सकता है –

(1) संगृहीत किन्तु अव्यवस्थित आँकड़ों से तत्सम्बन्धी समस्या या अध्ययन विषय के परिणाम के सम्बन्ध में उचित निर्णय लेने में कठिनाई होती है। आँकड़ों को व्यवस्थित करने अर्थात् आवृत्ति वितरण बनाने पर ये ही आँकड़े संक्षिप्त, स्पष्ट तथा बोधगम्य महसूस होते हैं और इनके द्वारा परिणामों के बारे में सरलतापूर्वक उचित निर्णय दिया जा सकता है।

(2) व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण द्वारा सांख्यिकीय आँकड़ों का संक्षिप्त प्रदर्शन सम्भव है। अर्थात् आवृत्ति वितरण आँकड़ों को अर्थपूर्ण बनाने का एक सरल उपाय है। वस्तुतः अव्यवस्थित आँकड़े अर्थहीन होते हैं जिनके गुण-दोषों को सामान्यतः व्यक्ति ग्रहण नहीं कर पाता है। आवृत्ति वितरण तालिका में प्रदर्शित होकर ये ही आँकड़े अर्थपूर्ण बन जाते हैं जिन्हें व्यक्ति सरलता से ग्रहण कर लेता है।

(3) सारणीयन में आवृत्ति वितरण तालिका बनाने के उपरान्त तालिका (Table) का सिर्फ अवलोकन करके ही आँकड़ों का अर्थ ज्ञात किया जा सकता है।

(4) आवृत्ति वितरण तालिका के माध्यम से समान या सजातीय गुण (Homogeneous Characters) पूरी तरह स्पष्ट हो जाते हैं।

(5) आवृत्ति वितरण से आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन एकदम सरल हो जाता है।

आँकड़ों के व्यवस्थापन या आवृत्ति वितरण के महत्त्व को हम एक उदाहरण के माध्यम से अच्छी प्रकार समझ सकते हैं। मान लीजिए, हमें कक्षा XI के छात्रों की अंक-सूची (Marks-list) प्राप्त है। क्योंकि ये अंक अव्यवस्थित हैं; अतः इनसे परीक्षण के परिणाम के बारे में उचित निर्णय देना दुष्कर होगा। इन प्राप्तांकों को सुव्यवस्थित करैने पर अर्थात् इनका आवृत्ति वितरण तैयार करने पर यही अंक-सूची एक संक्षिप्त, स्पष्ट तथा बोधगम्य स्वरूप में हमारे सामने आ जाएगी। अब हम इसके माध्यम से आसानी से बता पाएँगे कि कितने छात्रों ने प्रथम श्रेणी, कितनों ने द्वितीय और तृतीय श्रेणी प्राप्त की है तथा कितने छात्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुए हैं।

5.

व्यक्तिगत निर्देशन के लिए तथ्य-संग्रह के साधनों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

व्यक्तिगत निर्देशन के लिए सम्बन्धित व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी आवश्यक है। इसके लिए तथ्यों को विभिन्न साधनों से एकत्र किया जाता है। इस प्रकार के मुख्य साधन हैं –

⦁    निरीक्षण
⦁    प्रश्नावली
⦁    साक्षात्कार
⦁    डॉक्टरी जाँच
⦁    जीवन-वृत्त
⦁    सामूहिक अभिलेख
⦁    बुद्धि, मानसिक योग्यताओं, अभिरुचि तथा रुचि सम्बन्धी परीक्षण
⦁    विद्यालय का संचित आलेख
⦁    सामान्य सेवाओं के औपचारिक आलेख; जैसे-जन्म-मृत्यु लेखा, अस्पतालों के आलेख, न्यायालय व सामाजिक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ।

6.

व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता क्यों पड़ती है ?

Answer»

निर्देशन के दो स्वरूप सम्भव हैं – सामूहिक निर्देशन तथा व्यक्तिगत निर्देशन। किसी व्यक्ति की गम्भीर, जटिल एवं विशिष्ट प्रकार की समस्या के उपयुक्त समाधान प्राप्त करने के लिए या निवारण के लिए व्यक्तिगत निर्देशन की आवश्यकता है। व्यक्तिगत निर्देशन में गहनता पर बल दिया जाता है। निर्देशन के इस स्वरूप के अन्तर्गत सम्बन्धित समस्या का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है। तथा समस्या का सर्वोत्तम हल खोजा जाता है।

7.

मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता प्रतिपादित कीजिए।

Answer»

आधुनिक समय में मानव-जीवन की सभी समस्याओं के अध्ययन तथा समाधान में सांख्यिकी की उपयोगिता है और जीवन के प्रत्येक मोड़ पर यह पथ-प्रदर्शक की तरह कार्य करती है। यही कारण है कि विद्वान् सांख्यिकी को ‘मानव-कल्याण का अंकगणित’ कहते हैं। वर्तमान में मानवजीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसमें सांख्यिकी का उपयोग एवं महत्त्व न हो। सांख्यिकी के बढ़ते हुए महत्त्व एवं उपयोगिता के कारण टिप्पट (Tippet) ने कहा है, “सांख्यिकी प्रत्येक व्यक्ति को ‘प्रभावित करती है तथा जीवन को अनेक बिन्दुओं पर स्पर्श करती है।”

सामाजिक विज्ञानों की भाँति, मनोविज्ञान में भी सांख्यिकी का उपयोग दिन-प्रतिदिन विस्तार ले। रहा है। मनोविज्ञान की समस्याओं को समझने तथा उनके समाधान के लिए और मनोविज्ञान से सम्बन्धित शोध-कार्यों में सांख्यिकी का उपयोग अपरिहार्य हो गया है। मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता की निम्नलिखित प्रकार विवेचना कर सकते हैं

मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता (Utility of Statistics in Psychology)
मनोविज्ञान में सांख्यिकी की उपयोगिता निर्विवाद, सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक है। प्रायः सभी मनोवैज्ञानिक अध्ययनों, प्रयोग एवं शोध कार्यों में सांख्यिकी की भारी माँग है। सच तो यह है कि सांख्यिकीय विधियों के अभाव में ये कार्य हो ही नहीं सकते। मनोविज्ञान के क्षेत्र में सांख्यिकी की उपयोगिता के निम्नलिखित कारण हैं –

(1) आँकड़ों को सरल एवं बोधगम्य बनाना – मनोवैज्ञानिक प्रयोग अक्सर एक विशाल समूह पर लागू किये जाते हैं जिनसे प्रदत्त या समंक आँकड़े प्राप्त होते हैं। इन आँकड़ों को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है कि इन्हें सुव्यवस्थित किया जाए आँकड़ों को सुव्यवस्थित बनाने में सांख्यिकी विधियाँ उपयोगी हैं। उदाहरण के लिए–आँकड़ों का आवृत्ति वितरण बनाकर उन्हें विभिन्न रेखाचित्रों द्वारा प्रदर्शित करने में सांख्यिकी का बहुत महत्त्व है। केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापन की विधियों द्वारा आँकड़ों का वर्णन करने में भी सांख्यिकी उपयोगी है। इस भॉति, सांख्यिकी अव्यवस्थित एवं अर्थहीन आँकड़ों को सरल तथा बोधगम्य बनाती है।
(2) ऑकड़ों की सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण – सांख्यिकी की मदद से मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से सम्बद्ध आंकड़ों का सरल, सुस्पष्ट एवं संक्षिप्त प्रस्तुतीकरण किया जाता है। वृत्तचित्र, स्तम्भ रेखाचित्र, आवृत्ति बहुभुज, स्तम्भाकृति, संचित प्रतिशत वक्र तथा संचित आवृत्ति वक्र आदि विधियों के द्वारा आँकड़ों की मुख्य विशेषताओं को स्पष्टता मिलती है। एक मनोवैज्ञानिक बालकों के एक बड़े समूह पर बुद्धि परीक्षण का प्रयोग करके मध्यमान तथा प्रामाणिक विचलन की गणना द्वारा सभी इकाइयों में सामूहिक रूप से मिलने वाले लक्षणों को खोज निकालता है। वह बालकों की औसत बुद्धि ज्ञात कर सकता है और यह पता भी लगा सकता है कि समूह सजातीय है अथवा विषमजातीय। पढ़ने वाले बालकों की योग्यताओं में विषमता अधिक होने पर कक्षा को कई हिस्सों में विभाजित कर बालकों की योग्यताओं के अनुसार पढ़ाया जा सकता है। इसी प्रकार आँकड़ों के वर्णन में सामान्य सम्भावना वक्र के प्रारम्भिक सिद्धान्तों का उपयोग भी किया जाता है।
(3) आँकड़ों को मात्रात्मक स्वरूप प्रदान करना – अन्य सामाजिक विज्ञानों की तरह से मनोविज्ञान में शोध कार्य के अन्तर्गत प्राप्त आँकड़े प्रायः गुणात्मक प्रकृति के होते हैं जिन्हें मात्रात्मक स्वरूप प्रदान करना होता है। यह कार्य सांख्यिकीय विधियों की सहायता से ही सम्भव है। बुद्धि, समायोजन, अन्तर्मुखता, बहिर्मुखता आदि से सम्बन्धित गुणात्मक आँकड़ों को मात्रात्मक रूप में परिवर्तित करने के लिए सांख्यिकी अत्यन्त उपयोगी है।
(4) घटना की यथार्थ व्याख्या – सांख्यिकीय विधियाँ किसी घटना की यथार्थ व्याख्या (Exact descriptions) करने में सक्षम हैं। इस व्याख्या को कोई भी प्रशिक्षित व्यक्ति बिना किसी सन्देह के ठीक-ठीक समझ सकता है। यदि कहा जाए कि कक्षा 12 के छात्र श्याम ने मनोविज्ञान में बहुत अच्छे अंक प्राप्त किये हैं तो इससे श्याम की मनोविज्ञान में योग्यता का सुनिश्चित ज्ञान नहीं होता; किन्तु यदि यह कहा जाए कि श्याम के मनोविज्ञान में प्राप्तांकों का प्रतिशत 95 है तो इससे स्पष्टतया ज्ञात होता है। कि 95% छात्रों के मनोविज्ञान में प्राप्तांक, श्याम के प्राप्तांकों से कम हैं। इस भाँति सांख्यिकी की सहायता से घटना की सही-सही व्याख्या की जा सकती है।
(5) आँकड़ों के सहसम्बन्ध का वर्णन – मनोविज्ञान से जुड़े अध्ययन एवं अनुसन्धान कार्यों में सांख्यिकीय विधियों की सहायता से दो या दो से अधिक चरों (variables) में सहसम्बन्ध ज्ञात किया जा सकता है। यदि कोई मनोवैज्ञानिक किसी कक्षा के बालकों की आयु और उनकी स्मरण-शविन के मध्य सम्बन्ध ज्ञात करना चाहे तो वह सहसम्बन्ध गुणांक को प्रयोग करता है। सहसम्बन्ध की विधियाँ आंशिक तथा बहुगुणी सहसम्बन्ध की गणना भी कर सकती हैं।
(6) तुलनात्मक अध्ययन – बॉडिंगटन का कथन है, “सांख्यिकी का निचोड़ गणना करना ही नहीं है अपितु तुलना करना भी है।’ मनोवैज्ञानिक दो या दो से अधिक समूहों की तुलना के लिए सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि यह ज्ञात करना हो कि कक्षा 11 के छात्रों को मनोविज्ञान पढ़ाने के लिए शिक्षण की पुस्तक-पाठन तथा व्याख्यान विधि में से कौन-सी विधि अच्छी है तो इसके लिए प्रयोग किया जा सकता है। समान योग्यता वाले छात्रों के दो समूह बनाकर एक समूह को पुस्तक-पाठन विधि द्वारा तथा दूसरे समूह को व्याख्यान विधि द्वारा पढ़ाया जाएगा। फिर दोनों समूहों की प्रामाणिक परीक्षा लेकर उनके प्राप्तांकों पर सांख्यिकीय विधियाँ लागू कर तुलनात्मक अध्ययन द्वारा यह बताना सम्भव है कि मनोविज्ञान शिक्षण की प्रभावशाली विधि कौन-सी
(7) कार्यकारण सम्बन्ध – सांख्यिकीय विधियों की सहायता से कोई भी मनोवैज्ञानिक किसी घटना को उत्पन्न करने वाले कारणों को ज्ञात कर सकता है। इसके लिए स्वतन्त्र चर का परतन्त्र चर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना होगा। यदि यह ज्ञात करना हो कि अमुक छात्र किसी विषय में क्यों फेल हो जाता है तो तत्सम्बन्धी कारणों को प्रयोगात्मक विधि (Experimental Method) द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। उदाहरणार्थ- प्रयोग में सभी कारणों को स्थिर (Constant) करने के उपरान्त यह पाया जाए कि नियमित अध्ययन न करने वाले छात्र फेल हो जाते हैं तो सम्भवतया छात्र के उस विषय में फेल होने का कारण, नियमित अध्ययन का अभाव ही हो।
(8) मापन तथा मनोवैज्ञानिक परीक्षणों में सांख्यिकी का उपयोग – सांख्यिकीय विधियों के अभाव में मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का निर्माण, उनकी व्याख्या तथा विश्वसनीयता व वैधता की जाँच नहीं की जा सकती। बुद्धि-परीक्षण, निष्पत्ति परीक्षण, अभिवृत्ति परीक्षण तथा प्रवणता परीक्षण आदि के निर्माण में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यधिक उपयोगी हैं। इसी प्रकार मनोवैज्ञानिक मापन में भी सांख्यिकी बहुत उपयोगी है।
(9) भविष्यकथन में सांख्यिकी का उपयोग – जब कोई मनोवैज्ञानिक मानव-व्यवहार से सम्बन्धित किसी घटना के सम्बन्ध में पूर्वानुमान लगाना चाहता है या भविष्यकथन करना चाहता है तो वह सांख्यिकी की प्रतीपगमन तथा भविष्यकथन से सम्बन्धित विधियों का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए यदि कक्षा बारह के किसी छात्र की बुद्धि-लब्धि (I.Q.), हाईस्कूल में उसके प्राप्तांक तथा अध्ययन के घण्टों के आधार पर उसकी बोर्ड की परीक्षा में सफलता का पूर्वानुमान/भविष्यकथन करना हो तो प्रतीपगमन रेखाओं की मदद से ऐसा किया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक सांख्यिकीय विधियों की सहायता से यह भी ज्ञात किया जा सकता है कि उसका भविष्यकथन कितना त्रुटिपूर्ण है।
(10) शैक्षिक समस्याओं का निदान – सांख्यिकीय विधियाँ शैक्षिक समस्याओं के निराकरण में भी विशिष्ट भूमिका निभाती हैं। छात्रों के चयन (Selection), उनकी पदोन्नति (Promotion) तथा शैक्षिक उपलब्धियों (Educational Achievements) के विषय में भविष्यकथन करने में भी सांख्यिकीय विधियाँ उपयोगी हैं। छात्रों के लिए परीक्षण तैयार करने व उनके मूल्यांकन में सांख्यिकी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसी प्रकार छात्रों के मार्गदर्शन में सांख्यिकीय विधियाँ अत्यन्त उपयोगी सिद्ध उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि मनोविज्ञान में सांख्यिकी की महती उपयोगिता है। मनोवैज्ञानिक समस्याओं से सम्बन्धित आकंड़ों के संकलन, वर्गीकरण व्याख्या तथा तुलना में ही नहीं बल्कि उनसे सम्बद्ध पूर्वानुमान व भविष्यकथन में भी सांख्यिकी का बहुत उपयोग है।

8.

मानवीय सम्बन्धों पर औद्यौगीकरण के कारण पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिएयाभारतीय समाज पर औद्योगीकरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।

Answer»

औद्योगिक गतिविधियों की गति एवं दर के बढ़ने की प्रक्रिया को औद्योगीकरण कहा जाता है। प्रत्यक्ष रूप से औद्योगीकरण एक आर्थिक-व्यावसायिक प्रक्रिया है, परन्तु इसके विभिन्न प्रभाव मानवीय/सामाजिक सम्बन्धों पर भी पड़ते हैं। औद्योगीकरण के परिणाम स्वरूप मानवीय सम्बन्धों एवं समाज पर पड़ने वाले मुख्य प्रभाव निम्नलिखित हैं –

⦁    मानवीय सम्बन्ध औपचारिक हो जाते हैं।
⦁    आपसी सम्बन्ध वर्ग-भेद के आधार पर निर्धारित होते हैं।
⦁    उच्च वर्ग के लिए निम्न आर्थिक वर्ग के लोगों से एक प्रकार की सामाजिक दूरी बनाये रखते
⦁    समाज में वर्ग-संघर्षों में वृद्धि होती है तथा मानवीय सम्बन्ध तनावपूर्ण हो जाते हैं।
⦁    पारिवारिक एवं वैवाहिक सम्बन्ध भी परिवर्तित होते हैं। संयुक्त परिवार विघटित होते हैं तथा वैवाहिक सम्बन्धों में स्थायित्व घटता है।
⦁    औद्योगीकरण के प्रभाव से समाज में गतिशीलता में वृद्धि होती है।
⦁    औद्योगीकरण ने सामाजिक स्तरीकरण के नये प्रतिमान निर्धारित किये हैं।
⦁    सामाजिक नियन्त्रण के लिए औपचारिक अभिकरणों को प्राथमिकता दी जाने लगती है।
⦁    धार्मिक एवं शैक्षिक क्षेत्र में परिवर्तन होता है।
⦁    भारतीय समाज में प्रचलित जाति-व्यवस्था के नियमों में शिथिलता आयी है।

9.

व्यक्तिगत निर्देशन से क्या अभिप्राय है?

Answer»

व्यक्तिगत निर्देशन से अभिप्राय किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सहायता देने वाली उस विशिष्ट प्रक्रिया से है जिसके माध्यम से वह अपनी व्यक्तित्व सम्बन्धी समस्याओं के मौलिक कारणों को समझता है तथा उनके निराकरण का प्रयत्न करता है।

10.

व्यक्तिगत निर्देशन की प्रक्रिया के प्रमुख चरणों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

⦁    तथ्यों का संग्रह
⦁    समस्या का निदान
⦁    फलानुमान
⦁    समस्या का उपचार तथा
⦁    अनुवर्ती अनुशीलन।

11.

शैक्षिक निर्देशन की किन्हीं दो आवश्यकताओं के बारे में लिखिए।

Answer»

⦁    विद्यालय के वातावरण में समायोजित होने के लिए शैक्षिक निर्देशन की आवश्यकता होती है।
⦁    पाठ्य-विषयों के चुनाव तथा भावी जीवन के विषय में निर्णय लेने के लिए निर्देशन की आवश्यकता है।

12.

मनोविज्ञान में सांख्यिकी के महत्त्व को स्पष्ट कीजिए।यामनोविज्ञान में सांख्यिकीय अध्ययन की कोई चारे उपयोगिताएँ बताइए।

Answer»

मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्व
आधुनिक युग में मनोविज्ञान के अध्ययनों में सांख्यिकी का अपना एक विशिष्ट स्थान है। विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं के अध्ययन में सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। सच तो यह है कि मनोवैज्ञानिक सांख्यिकी का प्रयोग अपनी पसन्द या नापसन्द के आधार पर नहीं करता बल्कि आँकड़ों की प्रकृति के कारण सांख्यिकी का प्रयोग उसे अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। सांख्यिकीय विधियाँ उपकल्पना की जाँच, व्यक्तिगत विभिन्नताओं के मापन तथा जटिल मानव-व्यवहार को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सांख्यिकी के प्रयोग से मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के परिणाम निष्पक्ष, विश्वसनीय तथा वैध बन जाते हैं और उनके आधार पर भविष्यवाणियाँ करना सम्भव होता है। मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्व इस प्रकार है

(1) मनोविज्ञान की समस्याओं के अध्ययन में एकत्र किये गये आँकड़े जटिल, अतुलनीय एवं अस्पष्ट होते हैं। सांख्यिकीय विधियों से अव्यवस्थित समंकों को व्यवस्थित रूप में वर्गीकृत करके सारणी, चित्रों व रेखाचित्रों के माध्यम से सरल व बोधगम्य रूप से प्रदर्शित किया जाता है।

(2) मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के सम्बन्ध में सांख्यिकी की मदद से वस्तुगत (Objective) तथा शुद्ध (Accurate) परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

(3) सांख्यिकीय अध्ययनों से कुछ निष्कर्ष प्राप्त होते हैं जो तथ्यों की वैधानिक व्याख्या कर सकते हैं। सामान्य निष्कर्षों के निर्धारण में भी सांख्यिकी का महत्त्व है; क्योंकि ये निष्कर्ष सांख्यिकीय सूत्रों व नियमों के आधार पर निकाले जाते हैं।

(4) मनोविज्ञान से सम्बन्धित तुलनात्मक अध्ययनों में शुद्ध विश्वसनीय परिणाम निकाले जा सकते हैं। साथ ही तुलना ज्यादा सरल हो जाती है। उदाहरणार्थ-बालकों की बुद्धि की तुलना बुद्धि-लब्धि (1.2.) द्वारा सम्भव है।

(5) सांख्यिकीय अध्ययनों के आधार पर व्यवहार से सम्बन्धित निष्कर्षों के आधार मनोवैज्ञानिक पूर्वकथन या भविष्यवाणी कर सकते हैं।

(6) मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्राय: अध्ययन प्रतिदर्श (Sample) पर आधारित होते हैं। प्रतिदर्श समष्टि (Universe) का प्रतिनिधि होता है। सांख्यिकी विधियाँ प्रतिनिधित्वपूर्ण प्रतिदर्श का चयन करने में सहायक हैं।

(7) मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के निर्माण में सांख्यिकी का अत्यधिक महत्त्व है। मानसिक व शारीरिक योग्यताओं के मापन हेतु बहुत-से मनोवैज्ञानिक परीक्षण निर्मित होते हैं; उदाहरणार्थ-बुद्धि परीक्षण, व्यक्तित्व परीक्षण तथा रुचि परीक्षण आदि।

स्पष्टत: मेनोविज्ञान के क्षेत्र में सांख्यिकी का विशेष महत्त्व है।

13.

उद्योग में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित करने से क्या लाभ होते हैं?

Answer»

उद्योग में अच्छे मानवीय सम्बन्ध स्थापित होने से कार्य उत्तम होते हैं, उत्पादन की दर में वृद्धि होती है तथा औद्योगिक शान्ति में वृद्धि होती है। इससे कर्मचारियों, उद्योगपतियों तथा राज्य सभी का हित होता है।

14.

शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है –(क) अभिरुचि परीक्षण(ख) व्यक्तित्व परीक्षण(ग) बौद्धिक परीक्षण(घ) ये सभी परीक्षण

Answer»

सही विकल्प है (ग) बौद्धिक परीक्षण

15.

क्रो एवं क्रो द्वारा प्रतिपादित व्यक्तिगत निर्देशन की परिभाषा लिखिए।

Answer»

क्रों एवं क्रो के अनुसार, “व्यक्तिगत निर्देशन वह सहायता है जो किसी व्यक्ति के जीवन के समस्त क्षेत्रों में, रवैयों और व्यवहार के विकास में ठीक तालमेल बैठाने हेतु दी जाती है।”

16.

शैक्षिक निर्देशन की रुथ स्ट्रांग द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।

Answer»

रुथ स्ट्रांग के अनुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करता है।”

17.

सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत निर्देशन के कौन-कौन से प्रकार सम्मिलित किये जाते हैं?

Answer»

सामान्य वर्गीकरण के अन्तर्गत

⦁    शैक्षिक निर्देशन
⦁    व्यावसायिक निर्देशन तथा
⦁    व्यक्तिगत निर्देशन को सम्मिलित किया जाता है।

18.

टिप्पणी लिखिए-हड़ताल का स्वरूप।

Answer»

हड़ताल का स्वरूप श्रमिकों की माँग के विषय तथा उद्योगपतियों की मनोवृत्ति द्वारा निर्धारित होता है। हड़ताल के विभिन्न स्वरूप हैं; यह शान्त प्रकृति की भी हो सकती है और उग्र प्रवृत्ति की भी। कभी-कभी हड़ताल में कर्मचारी चुपचाप एक ओर खड़े होकर इकट्ठा होते रहते हैं तथा अपनी माँगों के समर्थन में प्रबन्धकों एवं सेवायोजक का शान्तिपूर्वक विरोध करते हैं। ‘कलम-बन्दी’ (Pen-Strike) भी हड़ताल का एक रूप है जिसके अन्तर्गत कर्मचारी काम पर तो जाते हैं, उपस्थिति भी भरते हैं किन्तु काम बिल्कुल नहीं करते। प्रायः लोग अपनी माँगों और समस्याओं को लेकर चिल्लाते हैं, जोर-जोर से नारे लगाते हैं या अपनी माँगों को गीतों के रूप में उच्चारित करते हैं। कहीं-कहीं कर्मचारियों को भूख-हड़ताल के माध्यम से स्वयं को यन्त्रणा देते हुए देखा जाता है, इससे उनके पक्ष में जनसमर्थन जुटता है। कभी-कभी तो भूख-हड़ताल का सुखद परिणाम निकलता है क्योंकि उद्योगपति उनकी न्यूनाधिक माँगों को स्वीकार कर उन्हें जल्दी ही हड़ताल खत्म करने के लिए राजी कर लेते हैं।

किन्तु कभी-कभी भूख-हड़ताल लम्बी खिंच जाने से श्रमिक नेता की मृत्यु तक हो जाती है, ऐसा होने पर हड़ताल अधिक उग्र रूप धारण कर लेती है तथा हिंसात्मक हो जाती है। इन दशाओं में, आन्दोलनकारी श्रमिकों में अराजक तत्त्व मिल जाते हैं जो तोड़-फोड़, आगजनी तथा लूटमार कर उद्योग की करोड़ों की सम्पत्ति को हानि पहुँचाते हैं। धीरे-धीरे हड़ताल अनियन्त्रित होती जाती है और उसका नेतृत्व अकुशल वे अवसरवादी नेताओं के हाथ में पहुँच जाता है। इसके विपरीत, सुलझे हुए तथा कुशल नेता हड़ताल को तब तक शान्तिपूर्वक चलाते हैं जब तक कि श्रमिकों की माँगे नहीं मान ली जातीं। हड़ताल की प्रक्रिया को तीव्र एवं प्रभावी बनाने के लिए सरकार, राजनीतिक दलों तथा समाजसेवी संगठनों की ओर से उद्योगपतियों से श्रमिकों की माँगें स्वीकार कर हड़ताल समाप्त करवाने की अपील की जाती है।

19.

सांख्यिकी का अर्थ स्पष्ट कीजिए। सांख्यिकी को परिभाषित कीजिए।यासांख्यिकी से आप क्या समझते हैं? इसे परिभाषित करते हुए बताइए कि आप किस परिभाषा को उपयुक्त समझते हैं और क्यों?या“सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।’ इस कथन की व्याख्या करते हुए समझाइए कि आपकी दृष्टि में सांख्यिकी की सही परिभाषा क्या होनी चाहिए?

Answer»

सांख्यिकी का अर्थ एवं परिभाषा (Meaning and Definition of Statistics)
‘सांख्यिकी अंग्रेजी शब्द ‘स्टैटिस्टिक्स (Statistics) का हिन्दी रूपान्तर है। अंग्रेजी भाषा का स्टैटिस्टिक्स (Statistics) शब्द लैटिन भाषा के ‘स्टेटस (Status), इटैलियन भाषा के ‘स्टैटिस्टा (Statista) या जर्मन भाषा के स्टैटिस्टिक’ (Statistik) शब्द से उत्पन्न हुआ है। इन सभी शब्दों का अर्थ राज्य (State) होता है। इस प्रकार प्रारम्भ में सांख्यिकी का प्रयोग राज्य विज्ञान के रूप में किया जता था। वास्तविक रूप में सांख्यिकी’ शब्द का प्रयोग करने का श्रेय जर्मन विद्वान् गॉटफ्रायड एकेनॉल (Gottfried Achenwall) को जाता है। उन्होंने 1749 ई० में सांख्यिकी को मानव ज्ञान की एक विशिष्ट शाखा के रूप में प्रयोग किया।

सांख्यिकी’ (Statistics) शब्द का दो अर्थों में प्रयोग होता है—एक ‘एकवचन’ में तथा दूसरा ‘बहुवचन’ में। एकवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी’ का प्रयोग एक विज्ञान के रूप में किया जाता है। बहुवचन के अर्थ में ‘सांख्यिकी का प्रयोग आँकड़ों, संख्याओं या समंकों के रूप में लिया जाता है।

अब हम ‘सांख्यिकी’ (Statistics) शब्द की परिभाषा का उपर्युक्त दोनों ही अर्थों में अध्ययन करेंगे।

बहुवचन के रूप में सांख्यिकी का अर्थ एवं परिभाषाएँ
बहुवचन के रूप में ‘साख्यिकी’ शब्द का अर्थ समंकों या आँकड़ों से है जो किसी विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्धित संख्यात्मक तथ्य होते हैं। जनसंख्या, शिक्षा, कृषि, स्त्री-शिक्षा, प्रौढ़-शिक्षा आदि से सम्बन्धित आँकड़े बहुवचन के रूप में होते हैं।

(1) गॉटफ्रायड एकेनवाल के अनुसार, “राज्य से सम्बन्धित ऐतिहासिक और विवरणात्मक महत्त्वपूर्ण तथ्यों का संग्रह ‘समंक’ है।”
(2) डॉ० ए० एल० बाउले के अनुसार, “किसी अनुसन्धान से सम्बन्धित तथ्यों का अंकात्मक विवरण ‘समंक’ होते हैं, जिन्हें एक-दूसरे के सम्बन्ध में रखा जा सकता है।”
(3) होरेस सेक्राइस्ट के अनुसार, “सांख्यिकी से हमारा तात्पर्य तथ्यों के उन समूहों से है जो अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं, जो संख्यात्मक रूप से व्यक्त किये जाते हैं, जिनकी गणना या अनुमान शुद्धता के एक उचित स्तर तक की जाती है तथा जिन्हें किसी पूर्व निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए क्रमबद्ध ढंग से संगृहीत किया जाता है तथा जिन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित करके रखा जाता है।”
उपर्युक्त परिभाषाओं में होरेस सेक्राइस्ट की परिभाषा ही सर्वश्रेष्ठ है। इस परिभाषा में समंकों की सभी विशेषताओं पर पूर्ण प्रकाश डाला गया है।

एकवचन अर्थात् विज्ञान के रूप में सांख्यिकी की परिभाषाएँ
एकवचन के रूप में ‘सांख्यिकी’ शब्द का प्रयोग एक विज्ञान की दृष्टि से किया जाता है। सांख्यिकी विज्ञान की परिभाषाओं को तीन भागों में विभक्त किया गया है –

(क) संकुचित परिभाषाएँ
प्रारम्भ में सांख्यिकी को एक राज्य-विषय के रूप में जाना जाता था; अतः प्राचीन परिभाषाएँ सांख्यिकी के केवल कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालती है जो कि निम्नलिखित हैं

(1) बॉडिंगटन (Boddington) के अनुसार, “सांख्यिकी अनुमानों और सम्भावनाओं का विज्ञान है।” बॉडिंगटन की परिभाषा में सांख्यिकी के क्षेत्र को संकुचित कर दिया गया है। इन्होंने इसे केवल विज्ञान माना है, न कि विज्ञान और कला दोनों।
(2) डॉ० बाउले ने सांख्यिकी की तीन परिभाषाएँ दी हैं –
(i) “सांख्यिकी गणना का विज्ञान है।”
उपर्युक्त परिभाषा में सांख्यिकीय अनुसन्धान की अनेक विधियों में से केवल गणना विधि को महत्त्व दिया गया है, किन्तु केवल गणना ही सांख्यिकीय नहीं है। विशाल संख्याओं का तो मात्र अनुमान लगाया जाता है, उनकी गणना नहीं की जाती; अतः यह परिभाषा अधूरी है।
(ii) “सांख्यिकी को सही रूप में औसतों को विज्ञान कहा जा सकता है।”
प्रस्तुत परिभाषा में औसत पर बल दिया गया है। सांख्यिकीय विश्लेषण में न केवल औसत (मध्य) का प्रयोग होता है अपितु अपकिरण, विषमता, सह-सम्बन्धन आदि का भी प्रयोग किया जाता है; अतः यह परिभाषा भी अधूरी है।
(iii) “सांख्यिकी, सामाजिक व्यवस्था को सम्पूर्ण मानकर माप का विज्ञान है।”
डॉ० बाउले ने इस परिभाषा में सांख्यिकी को केवल सामाजिक संस्थाओं एवं उनके क्रिया-व्यवहार के मापन का विज्ञान कहा है। इस प्रकार गैर सामाजिक क्रियाएँ सांख्यिकी के क्षेत्र से बाहर कर सांख्यिकी का क्षेत्र अति संकुचित बना दिया गया है।
(3) पर्सन और हार्लोज के शब्दों में, “सांख्यिकी तथ्यों के समूह को प्रयोग में लाने का विज्ञान और कला है।”
प्रस्तुत परिभाषा में विश्लेषण की विधियों को स्पष्ट नहीं किया गया है।

(ख) विस्तृत परिभाषाएँ
(1) क्रॉक्स्टन और काउडेन के अनुसार, “सांख्यिकी को संख्यात्मक, समंकों के एकत्रीकरण, प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण तथा निर्वचन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”
(2) प्रो० सैलिगमैन के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी भी अनुसन्धान (जाँच) के क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आँकड़ों के संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, तुलना तथा निर्वचन की रीतियों का प्रयोग करता है।”
(3) लाविट के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्यात्मक तथ्यों के संग्रह, वर्गीकरण तथा सारणीयन से सम्बन्ध रखता है जिसे घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए प्रयुक्त किया जा सके।

उपर्युक्त परिभाषाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –
⦁    सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करें
⦁    सांख्यिकी के उद्देश्य को स्पष्ट करें
⦁    सांख्यिकी के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करें तथा
⦁    सांख्यिकी, विज्ञान और कला दोनों है।

(ग) उपयुक्त परिभाषा
सांख्यिकी की उपयुक्त परिभाषा वही हो सकती है जिसमें निम्नलिखित विशेषताएँ हों –
⦁    सांख्यिकी की प्रकृति को स्पष्ट करे
⦁    सांख्यिकी के उद्देश्य को स्ट करे
⦁    सांख्यिकी के विषय-क्षेत्र को स्पष्ट करे तथा
⦁    सांख्यिकी की विभिन्न रीतियों को स्पष्ट करे।
अन्त में हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी, विज्ञान एवं कला दोनों ही है जिसमें पूर्व-निश्चित उद्देश्यों के अनुसार सर्वेक्षणों, अध्ययनों एवं प्रयोगों आदि के आधार पर प्राप्त आँकड़ों का संकलन, वर्गीकरण, विवरण, विश्लेषण, तुलना एवं विवेचन किया जाता है। आँकड़ों के विश्लेषण को उद्देश्यों, तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्ध को ज्ञात करना, तथ्यों की विशेषताओं को वर्णन करना, तथ्यों के सम्बन्ध में अनुमान लगाना, निष्कर्ष निकालना और भविष्य कथन करना है।

20.

हड़ताल’ एवं ‘तालाबन्दी के अर्थ एवं कारणों का उल्लेख करते हुए इनकी रोकथाम के उपायों को भी स्पष्ट कीजिए।याहड़ताल एवं तालाबन्दी को रोकने में मनोविज्ञान किस प्रकार सहायक है?

Answer»

भूमिका (Introduction)
मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र समस्याओं तथा अशान्ति से परिपूर्ण है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रों की समस्याओं के अनुरूप ही औद्योगिक क्षेत्र भी विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त है। इन समस्याओं में से कुछ उत्पादन सम्बन्धी समस्याएँ होती हैं अथवा तकनीकी बातों को लेकर उत्पन्न होती हैं; और कुछ समस्याएँ मानव व्यवहार से सम्बन्धित होती हैं। अधिकांश उद्योगपति श्रमिकों और कर्मचारियों को-कम-से कम वेतन देकर अधिक-से-अधिक लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। इसके विपरीत श्रमिकों और कर्मचारियों का यह प्रयास रहता है कि वे अपने कड़े परिश्रम के बदले जीने के लिए पर्याप्त वेतन तथा जीवन सम्बन्धी सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—काम करने के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना व बीमारी के लिए उचित चिकित्सा की व्यवस्था तथा भत्ता आदि उद्योगपतियों से प्राप्त करें जब औद्योगिक व व्यावसायिक संस्थानों में कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता और श्रमिक हितों की अनदेखी की जाती है तो उससे दोनों वर्गों-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग के बीच तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के बीच का तनाव प्रायः ‘हड़ताल’ और ‘तालाबन्दी’ के रूप में प्रकट होता है।

हड़ताल (Strike)
हड़ताल का अर्थ (Meaning of Strike)

हड़ताल औद्योगिक’ अशान्ति का एक प्रमुख एवं प्रचलित रूप है। उद्योगपति एवं श्रमिकों के सम्बन्धों का इतिहास बहुत पुराना है। प्रारम्भिक काल में श्रमिक उद्योगपतियों को ईश्वर या देवता का प्रतिरूप मानते हुए उनकी सभी आज्ञाओं का पालन करते थे और उद्योगपति इस भावना का लाभ उठाते हुए उनका जबरदस्त शोषण करते थे, किन्तु औद्योगिक क्रान्ति के आगमन ने पासा ही पलट दिया, श्रमिकों में जागरूकता आयी और वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गये। आवश्यकताओं, कठिनाईयों तथा समस्याओं में समानता के आधार पर श्रमिकों में एकता तथा सहयोग की भावना विकसित हो जाना स्वाभाविक है। श्रमिक एक हुए और उनके संगठन बने। इस प्रकार सामूहिक एकता ने श्रमिक संघों (Labour Unions) की विचारधारा को व्यवहार में बदल दिया। श्रमिक संघों ने उद्योगपतियों से अपने अधिकारों तथा सुविधाओं की माँगें प्रारम्भ कीं जिन्हें अधिकतम लाभ की लालसा से प्रेरित उद्योगपतियों द्वारा ठुकरा दिया गया। जब उद्योग में श्रमिकों पर काम का दबाव अधिक पड़ता है लेकिन उनकी न्यायोचित माँगों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता तो वे विरोधस्वरूप काम पर जाना बन्द कर देते हैं। वे सभी या अधिकांश लोग, जो काम पर नहीं जाते, उद्योगपति एवं उसकी नीतियों के विरुद्ध तथा अपनी माँगों व समस्याओं के समर्थन में प्रदर्शन करते हैं, नारे लगाते हैं, जुलूस आदि निकालते हैं तथा भूख-हड़ताल पर बैठ जाते हैं। श्रमिकों की इन समस्त क्रियाओं को हड़ताल (Strike) कहा जाता है।

हड़ताल के कारण (Causes of Strike)
हड़ताल के मूल में उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के परस्पर विरोधी लक्ष्यों एवं हितों पर आधारित वर्ग-संघर्ष की एक लम्बी दास्तान निहित है। इस वर्ग-संघर्ष के अनेक कारण हो सकते हैं; यथा-अधिक वेतन व भत्तों की माँग, कम के घण्टे कम करने की माँग, बोनस तथा दूसरी सुविधाओं को लेकर मजदूर-मालिक में संघर्ष आदि। वास्तविकता यह है कि श्रमिक जानता है कि उद्योगपति के भोग-विलास के सभी साधन उसकी खून-पसीने की कमाई से आये हैं, जबकि वह जीवन-पर्यन्त झोंपड़पट्टी में पशुओं की तरहू जीवन जीता है। श्रमिक स्वयं को शोषित तथा उद्योगपति को शोषक समझता है। अपने शोषण को लेकर श्रमिकों के मन में असन्तोष की यह आग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तात्कालिक कारणों से हड़ताल के रूप में भड़क उठती है। हड़ताल के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) इतिहासजनित अविश्वास की प्रवृत्ति – औद्योगिक क्रान्ति से लेकर वर्तमान क्षणों तक करीब-करीब तीन शताब्दियाँ बीत चुकी हैं। औद्योगिक संघर्षों के इस लम्बे इतिहास में उद्योगपति और श्रमिकों के बीच छत्तीस (36) का आँकड़ा रहा है यानि दोनों एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। विरोध के उग्र होते स्वरों ने दोनों वर्गों के बीच अविश्वास की खाई को इतना चौड़ा कर दिया है कि हर पल विश्व के किसी-न-किसी कोने में हड़ताल देखी जा सकती है।
(2) सामाजिक दूरी – उद्योगपति और श्रमिक समाज की सीमाओं के दो छोर हैं जिनके बीच कोई सामाजिक सम्बन्ध, सम्पर्क, प्रेम एवं सहानुभूति नहीं पायी जाती। इससे भी निकटता समाप्त होती है तथा अविश्वास बढ़ता है। दोनों वर्ग अपने हितों में जरा से भी आघात से तिलमिला उठते हैं। श्रमिक उद्योगपतियों के अन्याय से उत्तेजित होकर हड़ताल का निर्णय ले लेते हैं। सामाजिक दूरी के कारण उनमें आपसी सूझ-बूझ होने का अवसर और समझौते का रास्ता नहीं मिलता।।
(3) दुर्व्यवहार – कभी-कभी किसी उद्योग के अधिकारी श्रमिकों को मार बैठते हैं या उनके साथ दुर्व्यवहार, कर बैठते हैं जिससे सामूहिक असन्तोष पैदा होता है और उस अधिकारी को दण्डित कराने के लिए हड़ताल होती है।
(4) कार्य की दशाएँ – कार्य की प्रतिकूल दशाएँ हड़ताल को जन्म देती हैं। कुछ उद्योगों में श्रमिकों से अमानवीय तरीके से काम लिया जाता है और उन्हें आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। उदाहरणार्थ-श्रमिकों के काम के घण्टे अधिक होते हैं, उन्हें विश्राम नहीं करने दिया जाता, उन्हें अधिक ताप याघातक मशीनों का सामना करना पड़ता है तथा उनसे बचाव का कोई उचित प्रबन्ध भी नहीं किया जाता ईत्यादि। इससे न केवल श्रमिकों की कार्य-क्षमता पर बुरा असर पड़ता है बल्कि उनका स्वास्थ्य भी गिरता जाता है। इन कारणों से कभी-कभी किसी श्रमिक की मृत्यु भी हो सकती है। इन विभिन्न कारणों से श्रमिकों में रोष उत्पन्न हो जाता है और वे हड़ताल के माध्यम से अपनी माँगे मनवाते हैं।
(5) ओवरटाइम – काम के निर्धारित घण्टों के अतिरिक्त काम करने पर जब श्रमिकों को इस अतिरिक्त समय को पारिश्रमिक नहीं दिया जाता तो उन्हें हड़ताल का सहारा लेना पड़ता है।
(6) वेतन-वृद्धि, भत्ता और बोनस – बढ़ती हुई महँगाई के विरुद्ध उद्योगों के श्रमिक अपने मालिकों से वेतन बढ़ाने की माँग करते हैं। महँगाई बढ़ने के साथ-साथ भत्तों का बढ़ना भी आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उद्योगों में लाभ का पूरा अंश मालिकों के पेट में क्ला जाता है। अतः वेतन-वृद्धि, भत्ता तथा बोनस को लेकर जब श्रमिकों की माँगें पूरी नहीं होतीं तो वे हड़ताल करने पर उतारू हो जाते
(7) राजनीतिक कारण – कुछ स्वार्थी नेता लोग अपनी नेतागिरि चमकाने के इरादे से श्रमिकों को बहला-फुसलाकर हड़ताल करवाते हैं और उद्योगपति से साँठ-गाँठ कर पैसा खा जाते हैं। इससे श्रमिकों को भारी हानि होती है।
(8) मजदूर-संगठनों की बहुलता – आजकल दुनिया में इतने सच्चे-झूठे मजदूर-संगठन किसी-न-किसी लक्ष्य को लेकर पैदा हो गये हैं कि उनमें से अधिकांश अपने अस्तित्व या स्वार्थपूर्ति में श्रमिकों को मोहरा बनाकर हड़ताल कराने में सफल हो ही जाते हैं। श्रमिक इनके बहकावे में आकर हड़ताल कर देते हैं।

तालाबन्दी (Lockout)
तालाबन्दी का अर्थ (Meaning of Lockout)

तालाबन्दी औद्योगिक अशान्ति का एक दूसरा किन्तु प्रमुख पक्ष है। इसके लिए विशेष रूप से उद्योगपतियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। कभी-कभी जब उद्योगपति श्रमिकों की माँग पूरी नहीं कर पाते या पूरी करना नहीं चाहते तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे औद्योगिक इकाई बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। ऐसी अवस्था में श्रमिकों या कर्मचारियों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है। इस भाँति ‘तालाबन्दी’ (Lockout) हड़ताल का एक विरोधी रूप है।

तालाबन्दी के कारण (Causes of Lockout)
तालाबन्दी के बहुत से कारण हो सकते हैं। इनमें से प्रमुख कारणों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है –

(1) प्रथमतः उद्योगपति श्रमिकों की अतिशय, औचित्य की सीमा से बाहर तथा राजनीति से प्रेरित माँगों से परेशान होकर तालाबन्दी का आश्रय लेते हैं। उद्योगपति सोचते हैं कि लम्बे समय तक भूख और जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं से तड़प-तड़पकर श्रमिक सबक सीख जाएँगे और ताला खोलने की खुशामद करेंगे। इस प्रकार, भारी नुकसान सहते हुए भी श्रमिकों पर अंकुश लगाने का उद्योगपतियों की दृष्टि में यह एक उपाय है।
(2) दुसरे, किन्हीं कारणों से कभी-कभी कोई औद्योगिक इकाई लगातार नुकसान उठाती है और इस भाँति घाटे में चलती है। उद्योगपति कुछ समय तक तो घाटा सहते रहते हैं लेकिन फिर वे मिल में ताला लगा देते हैं।
(3) तीसरे, यदा-कदा लम्बे समय तक पावर सप्लाई, ईंधन या कच्चे माल की आपूर्ति न होने के कारण भी उद्योगपति को नुकसान होता है। उत्पादन घटने या समाप्त होने से तैयार माल का उठान नहीं हो पाता; अत: चे विवश होकर तालाबन्दी कर देते हैं।
हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के उपाय (Measures to Remove Strikes and Lockouts)
‘हड़ताल और तालाबन्दी’ दोनों ही औद्योगिक अशान्ति के परिचायक हैं। हड़ताल में श्रमिक काम बन्द कर देते हैं और तालाबन्दी में उद्योगपति कारखाने का ताला बन्द कर देते हैं। दोनों में ही औद्योगिक संघर्ष का वीभत्स रूप देखने को मिलता है जिससे उत्पादन कार्य ठप हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय स्तर पर हानि उठानी पड़ती है; अतः हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम व निवारण के तत्काल उपाय करने चाहिए। इसके प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

(1) श्रमिकों का सहयोग (Co-operation of Labourers) – उद्योगपतियों को श्रमिकों का विश्वास अर्जित कर उनसे प्रशासनिक कार्यों में सहयोग प्राप्त करना चाहिए। इससे औद्योगिक अशान्ति एवं संघर्ष स्वतः ही दूर हो जाएगा।
(2) उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस (Sufficient wages, Allowance and Bonus) – श्रमिकों को उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस आदि समय पर तथा नियमानुसार प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वे अपनी आवश्यकताओं की भली प्रकार पूर्ति कर सकें। बढ़ती हुई महँगाई के साथ वेतन-दरों में वृद्धि न्यायोचित तथा मानवीय दृष्टि से वांछित है।
(3) तात्कालिक कारणों का निराकरण (Removing of Immediate Causes) – हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के लिए तात्कालिक असन्तोष के कारणों को जल्दी ही निराकरण कर लिया जाए। ऐसी परिस्थितियों की जाँच-पड़ताल किन्हीं सर्वमान्य एवं उपयुक्त व्यक्तियों के माध्यम से करायी जाए और उनका शीघ्र समाधान प्रस्तुत कर उसे क्रियान्वित किया जाए।
(4) श्रम-कल्याण कार्यों का प्रबन्ध (Managing Labour-welfare Activities) – उद्योग की तरफ से श्रमिकों के लिए कुछ सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। इन सुविधाओं की प्राप्ति से उन्हें सुख और सन्तोष मिलता है जिससे वे अधिक समायोजन के साथ कार्य कर सकते हैं। इन सुविधाओं में चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, आवास, भोजन आदि का प्रबन्ध मुख्य है।
(5) विशिष्ट समिति (Specific Association) – औद्योगिक प्रशासन के लिए एक विशेष समिति का निर्माण किया जाना चाहिए, जिसमें श्रमिकों, कर्मचारियों तथा मालिकों के प्रतिनिधियों को स्थान दिया जाए। यह समिति किसी भी समस्या या अवरोध की परिस्थिति में सभी मामलों में विचार-विमर्श करते हुए पारस्परिक मतभेदों का निवारण करेगी। इससे सहयोगपूर्ण वातावरण की वृद्धि होगी और औद्योगिक तनाव व अशान्ति कम होगी।
निष्कर्षतः हड़ताल और तालाबन्दी इन दोनों में से किसी एक का भी विचार व्यक्तिगत एवं राष्ट्रहित में नहीं है। इनसे उत्पादन में कमी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी तथा अन्ततः भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। ये दोनों ही आन्दोलन, तनाव और संघर्ष के परिचायक हैं जिनके परिणामतः अशान्ति व अव्यवस्था का जन्म होता है। कुल मिलाकर उद्योग की मुख्य जिम्मेदारी उद्योगपति या सेवायोजक की होती है। यदि वे अपने लाभांश की एक छोटी-सी मात्रा का त्याग करना सीखें तथा श्रमिकों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें सहानुभूति का पात्र बनायें तो इससे न केवल उत्पादन-वृद्धि होगी अपितु उद्योग की सम्पूर्ण व्यवस्था अभीष्ट रूप से संचालित भी हो सकेगी।

21.

तालाबन्दी के क्या परिणाम होते हैं?

Answer»

तालाबन्दी में उद्योगपति उद्योग को बन्द रखता है जिससे श्रमिक व कर्मचारी काम पर नहीं जा पाते हैं। इससे श्रमिकों को वेतन नहीं मिल पाता और वे बेरोजगार हो जाते हैं। उनके पास अपना कोई संचित धन तो होता है नहीं, वे तो शाम तक श्रम करते हैं और प्राप्त पारिश्रमिक से दो जून की रोटी खाते हैं; अतः उनकी दशा खराब होती जाती है और वे भूखों मरने लगते हैं। इसके विरोध-स्वरूप वे प्रदर्शन, जुलूस तथा अनशन आदि का सहारा लेते हैं। कभी-कभी यह विरोध उग रूप धारण कर तोड़फोड़, आगजनी तथा हिंसात्मक घटनाओं में बदल जाता है। इसमें प्रशासन, पुलिस तथा राजनेताओं को भी हस्तक्षेप करमा पड़ता है। इसके अलावा तालाबन्दी के परिणामस्वरूप उत्पादित वस्तुओं की बाजार में कमी हो जाती है जिससे मुनाफाखोरी व जमाखोरी जैसी आर्थिक दुष्प्रवृत्तियों का जन्म होता है। इससे सम्बन्धित अन्य उद्योग, कारखाने या व्यावसायिक संस्थान भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं। जिससे अन्ततः राष्ट्र की आर्थिक हानि होती है।

22.

उत्तम शैक्षिक निर्देशन के लिए बालक के सम्बन्ध में कौन-कौन सी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक होता है?

Answer»

⦁    बौद्धिक स्तर
⦁    शैक्षिक सम्प्राप्ति
⦁    मानसिक योग्यताएँ
⦁    विशिष्ट मानसिक योग्यता एवं अभिरुचियाँ
⦁    रुचियाँ
⦁    व्यक्तित्व की विशेषताएँ
⦁    शारीरिक दशा तथा
⦁    पारिवारिक स्थिति।

23.

शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं ? शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

Answer»

शैक्षिक निर्देशन का अर्थ
शैक्षिक निर्देशन बालक की अपने कार्यक्रम को बुद्धिमत्तापूर्वक नियोजित कर पाने में सहायता करता है। यह बालकों को ऐसे पाठ्य विषयों का चुनाव करने में सहायता देता है जो उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रुचियों, योग्यताओं तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हों। यह उन्हें इस योग्य बना देता है। कि वे शिक्षा सम्बन्धी कुछ विशेष समस्याओं तथा विद्यालय की विभिन्न परिस्थिति से भली प्रकार समायोजन स्थापित कर अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शैक्षिक पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याओं के समाधान तथा शैक्षिक परिस्थितियों में समायोजित होने के लिए दिये जाने वाले विशिष्ट निर्देशन को शैक्षिक निर्देशन कहते हैं।

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषाएँ
विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन की अग्रलिखित परिभाषाएँ दी हैं
⦁    आर्थर जे० जोन्स के अनुसार, “शैक्षिक निर्देशन का तात्पर्य उस व्यक्तिगत सहायता से है जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती हैं कि वे अपने लिए उपयुक्त विद्यालय, पाठ्यक्रम, पाठ्य विषय एवं विद्यालय जीवन का चयन कर सकें तथा उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।”
⦁    रूथ स्ट्रांग के कथनानुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति में सहायता प्रदान करना है।”
⦁    एलिस के शब्दों में, “शैक्षिक निर्देशन से तीन विशेष क्षेत्रों में सहायता मिलती है
⦁    कार्यक्रम और पाठ्य-विषयों का चयन
⦁    चालू पाठ्यक्रम में कठिनाइयों का मुकाबला करना तथा
⦁    अगले प्रशिक्षण हेतु विद्यार्थियों का चुनाव।
शैक्षिक निर्देशन सम्बन्धी उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया बालकों के पाठ्यक्रम चयन की सर्वोत्तम विधि है। उसमें बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, प्राप्तांकों, अभिभावकों की आशाओं, महत्त्वाकांक्षाओं तथा मनोवैज्ञानिकों के परामर्श को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। इसके अन्तर्गत एक निर्देशक द्वारा प्राप्त किये गये निर्देशन की जाँच भी सम्भव है, इसलिए यह विधि वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक भी है।

शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया
पाठ्य विषयों के चयन सम्बन्धी शैक्षिक निर्देशन के निम्नलिखित तीन मुख्य पहलू हैं।
(अ) बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना
(ब) पाठ्य विषयों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना और
(स) पाठ्य विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना।
(अ)
बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना।

जिस बालक/व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन देना है, उसके सम्बन्ध में निर्देशक को निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त कर लेनी चाहिए।

1. बौद्धिक स्तर :
शैक्षिक निर्देशन में बालक में बौद्धिक स्तर का पता लगाना अति आवश्यक है। तीव्र बुद्धि वाला बालक कठिन विषयों का अध्ययन करने के योग्य होता है और इसीलिए विज्ञान एवं गणित जैसे विषयों का चुनाव कर सकता है। वह उच्च कक्षाओं तक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के साथ सुगमतापूर्वक पहुँच जाता है। कला-कौशल और रचनात्मक कार्यों में अपेक्षाकृत कम बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इस भाँति बालक के लिए पाठ्य विषयों का चुनाव करने में उसके बौद्धिक-स्तर का ज्ञान बहुत आवश्यक है।
2. शैक्षिक सम्प्राप्ति :
शैक्षिक सम्प्राप्ति अथवा शैक्षिक उपलब्धि की सूचना, अक्सर पिछली कक्षाओं के प्राप्तांकों द्वारा मिलती है, लेकिन निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत सम्प्राप्ति परीक्षणों तथा सम्बन्धित अध्यापकों द्वारा भी शैक्षिक उपलब्धियों का ज्ञान कर लिया जाता है। किसी खास विषय में अधिक प्राप्तांकों की प्रवृत्ति बालक की उस विषय में रुचि एवं योग्यता का संकेत करती है। माना एक विद्यार्थी आठवीं कक्षा तक विज्ञान में सर्वाधिक अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ है तो कहा जा सकता है कि भविष्य में भी विज्ञान में अधिक अंक प्राप्त करेगा। इन प्राप्तांकों या उपलब्धियों को आधार मानकर माध्यमिक स्तर पर विषय चुनने का परामर्श दिया जाना चाहिए।
3. मानसिक योग्यताएँ :
शिक्षा-निर्देशक को बालक की मानसिक योग्यताओं को भी समुचित ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि विभिन्न प्रकार के पाठ्य विषयों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मानसिक योग्यताएँ उपयोगी सिद्ध होती हैं। उदाहरण के लिए-साहित्यकार, अधिवक्ता, व्याख्याता, नेता तथा शिक्षक बनने में ‘शाब्दिक योग्यता’; गणितज्ञ में, वैज्ञानिक तथा इन्जीनियर बनने में ‘सांख्यिकी योग्यता’, दार्शनिक, विचारक, गणितज्ञ, अधिवक्ता बनने में ‘तार्किक योग्यता’ सहायक होती है। मानसिक योग्यताओं का ज्ञान तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा शिक्षकों की सूचना द्वारा लगाया जा सकता है।
4. विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ एवं अभिरुचियाँ :
बालक के लिए पाठ्य विषय का चयन करते . समय बालक की विशिष्ट मानसिक योग्यताओं तथा अभिरुचियों का ज्ञान परमावश्यक है। विभिन्न पाठ्य विषयों की सफलता अलग-अलग प्रकार की विशिष्ट योग्यताओं या अभिरुचियों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए संगीत एवं कला की विशिष्ट तथा अभियोग्यता वाले बालक-बालिकाओं को प्रारम्भ से ही संगीत एवं कला विषयों का चुनाव कर लेना चाहिए।
5. रुचियाँ :
बालक की जिस विषय में अधिक रुचि होगी, उस विषय के अध्ययन में वह अधिक ध्यान लगाएगा। अत: निर्देशक को बालक की रुचि का ज्ञान अवश्य लेना चाहिए। रुचियों का ज्ञान रुचि परीक्षणों तथा रुचि परिसूचियों के अतिरिक्त अभिभावकों, शिक्षकों तथा दैनिक निरीक्षण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।
6. व्यक्तित्व की विशेषताएँ :
माध्यमिक स्तर पर किसी बालक को विषयों के चयन सम्बन्धित परामर्श देने के लिए उसके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का ज्ञान आवश्यक है। व्यक्तित्व विभिन्न प्रकार की विशेषताओं और गुणों; जैसे – आत्मविश्वास, धैर्य, लगन, मनन, अध्यवसाय आदि का संगठन है। साहित्यिक विषयों का चयन भावुक व्यक्ति को, विज्ञान और गणित का चयन तर्कयुक्त एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को तथा रचनात्मक विषयों का चयन उद्योगी एवं क्रिया-प्रधान व्यक्तियों को करना चाहिए। व्यक्तित्व के गुणों का ज्ञान जिन व्यक्तित्व परीक्षणों से किया जाता है। उनमें साक्षात्कार, व्यक्तित्व परिसूचियाँ, प्रश्नसूची, व्यक्ति-इतिहास और निर्धारण मान अदि प्रमुख हैं।
7. शारीरिक दशा :
कुछ विषयों का चयन करते समय निर्देशक को बालक की शारीरिक रचना तथा स्वास्थ्य की दशाओं का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। कृषि विज्ञान एवं प्राविधिक विषय इन्हीं के अन्तर्गत आते हैं। कृषि सम्बन्धी अध्ययन जमीन के साथ कठोर श्रम पर निर्भर हैं, जिसके लिए हुष्ट-पुष्ट शरीर होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राविधिक विषयों का प्रयोगात्मक ज्ञान कार्यशाला में कई घण्टे काम करके ही उपलब्ध किया जा सकता है। अतः पाव्य विषय के चयन से पूर्व चिकित्सक से शारीरिक विकास की जाँच करा लेनी
चाहिए तथा रुग्ण या दुर्बल शरीर वाले बालकों को ऐसे विषय का चुनाव नहीं करना चाहिए।
8. पारिवारिक स्थिति :
पारिवारिक परिस्थितियों, विशेषकर आर्थिक स्थिति, को ध्यान में रखकर शिक्षा-निर्देशक उन्हीं विषयों के चयन को परामर्श देता है जिन्हें निजी परिस्थितियों के अन्तर्गत आसानी से पढ़ा जा सके। माध्यमिक स्तर पर कुछ ऐसे विषय निर्धारित हैं जिनमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिभावकों को अत्यधिक धन खर्च करना पड़ता है; जैसे—विज्ञान पढ़ने के बाद योग्य बनाता है मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश।
बालक की योग्यताओं, उच्च बौद्धिक स्तर तथा अभिरुचि के बावजूद भी इन कॉलेजों में अपने बच्चों को भेजना हर एक माता-पिता के बस में नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में विद्यार्थियों के लिए पाठ्य विषयों के चयन में उसके परिवार की आर्थिक दशा को ध्यान में रखना आवश्यक है।

(ब)
पाठ्य विषयों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना

निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने वाले विशेषज्ञ को बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त पाठ्य विषयों से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में अग्रलिखित दो प्रकार की जानकारियाँ आवश्यक हैं

1. पाठ्य विषयों के विभिन्न वर्ग :
जूनियर स्तर से निकलकर माध्यमिक स्तर में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम को कई वर्गों में विभक्त किया गया है; जैसे।
⦁    साहित्यिक
⦁    वैज्ञानिक
⦁    वाणिज्य
⦁    कृषि सम्बन्धी
⦁    प्रौद्यौगिक
⦁    रचनात्मक तथा
⦁    कलात्मक।
इन वर्गों के विकास में ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त यह जानना आवश्यक है कि सम्बन्धित विद्यालय में कौन-कौन-से वर्ग के पाठ्य विषय पढ़ाये जाते हैं और विद्यार्थी की रुचि के विषय भी वहाँ उपलब्ध हो सकेंगे या नहीं।

2. विविध पाठ्य विषयों के अध्ययन हेतु आवश्यक मानसिक योग्यताएँ :
किन विषयों के लिए कौन-सी योग्यताएँ आवश्यक हैं और उस विद्यार्थी में कौन-कौन-सी योग्यताएँ विद्यमान हैं ? इन सभी बातों की विस्तृत जानकारी शिक्षा निर्देशक को होनी चाहिए, तभी वह उपयुक्त पाठ्य विषयों के चयन में विद्यार्थियों की सहायता कर सकता है।

(स)
पाठ्य विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना

प्रत्येक विद्यार्थी अपनी शिक्षा से निवृत्त होकर जीवन-यापन के लिए किसी-न-किसी व्यवसाय का चयन करता है। आजकल ज्यादातर व्यवसायों में विशेषीकरण होने से तत्सम्बन्धी प्रशिक्षण पहले से ही प्राप्त करना पड़ता है। अत: निर्देशक को पाठ्य विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के बारे में ये निम्नलिखित दो सूचनाएँ प्राप्त करना बहुत आवश्यक है-

1. व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किन पाठ्य विषयों का अध्ययन आवश्यक है :
सबसे पहले निर्देशक को यह जानना चाहिए कि किसी खास व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश पाने के लिए अध्ययन की शुरुआत के लिए किन विषयों का ज्ञान आवश्यक है। उदाहरणार्थ-डॉक्टर बनने के लिए 9वीं कक्षा से जीव विज्ञान पढ़ना चाहिए, जब कि इन्जीनियर बनने के . लिए विज्ञान वर्ग में गणित पढ़ना चाहिए।

2. विभिन्न वर्गों के पाठ्य विषयों का अध्ययन किन व्यवसायों के योग्य बनाता है :
पाठ्य विषयों के चयन में व्यवसाय सम्बन्धी जानकारी आवश्यक है। निर्देशक को पहले ही यह ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए कि किसी व्यवसाय-विशेष का सीधा सम्बन्ध किन-किन विषयों से है ताकि व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त न करके भी उन विषयों का ज्ञान उसके कार्य में मदद दे सके। उदाहरण के लिए-कॉमर्स लेकर कोई विद्यार्थी वाणिज्य या व्यापार के क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है, किन्तु डॉक्टरी या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नहीं।
बालक को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने से पूर्व उपर्युक्त समस्त बातों की विस्तृत एवं वास्तविक जानकारी एक सफल शिक्षा निर्देशक (Educational Guide) को होनी चाहिए।

24.

व्यावसायिक निर्देशन की क्रो एवं क्रो द्वारा प्रतिपादित परिभाषा लिखिए।

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क्रो एवं क्रो के अनुसार, “व्यावसायिक निर्देशन की व्याख्या सामान्यतः उस सहायता के रूप में की जाती है, जो विद्यार्थियों को किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने तथा उसमें उन्नति प्राप्त करने के लिए दी जाती है।”

25.

हड़ताल एवं तालाबन्दी में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

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हड़ताल एवं तालाबन्दी दोनों ही औद्योगिक क्षेत्र की मुख्य समस्याएँ हैं। हड़ताल एवं तालाबन्दी दोनों ही दशाओं में कार्य ठप हो जाता है। हड़ताल श्रमिकों एवं कर्मचारियों द्वारा उचित-अनुचित माँगों को मनवाने के लिए की जाती है। यह प्रायः आन्दोलन के रूप में होती है तथा इसके हिंसक रूप धारण करने की भी आशंका रहती है। इससे भिन्न तालाबन्दी मालिकों एवं प्रबन्धकों द्वारा घोषित की जाती है। इस दशा में श्रमिकों को कार्य से वंचित कर दिया जाता है तथा मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया जाता है। यह कार्य प्रायः मजबूरी में या अपनी सत्ता को दर्शाने के लिए किया जाता है। श्रमिक तालाबन्दी का विरोध करते हैं।

26.

उद्योगपतियों एवं प्रबन्धकों द्वारा अपनी मर्जी से उत्पादन कार्य बन्द कर देना कहलाता है –(क) हड़ताल(ख) बँटनी(ग) तालाबन्दी(घ) गम्भीर समस्या

Answer»

सही विकल्प है (ग) तालाबन्दी

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व्यावसायिक निर्देशन के लाभ एवं उपयोगिता का उल्लेख कीजिए।

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व्यावसायिक निर्देशन के लाभ एवं उपयोगिता (Advantages and Utility of Vocational Guidance)
व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति एवं समुदाय के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं लाभकारी सिद्ध होता है। इसकी उपयोगिता को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है

(1) व्यक्तिगत भेद एवं व्यावसायिक निर्देशन – मनोविज्ञान एवं सर्वमान्य रूप से कोई भी दो व्यक्ति एकसमान नहीं हो सकते और हर मामले में आनुवंशिक और परिवेशजन्य भेद पाये जाते हैं। इन्हीं भेदों के कारण हर व्यक्ति पृथक् एवं दूसरों की अपेक्षा बेहतर कार्य कर सकता है तथा इन्हीं के आधार पर व्यक्ति को सही और उपयुक्त व्यवसाय चुनने होते हैं। व्यावसायिक निर्देशन के माध्यम से व्यक्तिगत गुणों एवं क्षमताओं के आधार पर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति को सफलता मिलती है।
(2) व्यावसायिक बहुलता एवं निर्देशन – आजकल व्यवसाय अपनाने का आधार सामाजिक परम्पराएँ व जाति-व्यवस्था नहीं रहा। समय के साथ-साथ व्यावसायिक बहुलता ने व्यवसाय के चुनाव की समस्या को जन्म दिया है। व्यावसायिक निर्देशन में विविध व्यवसायों व कार्यों का विश्लेषण करके उनके लिए आवश्यक गुणों वाले व्यक्ति को चुना जाता है।
(3) सफल एवं सुखी जीवन के लिए सोच – समझकर व्यवसाय चुनने से व्यक्ति के जीवन में स्थायित्व एवं उन्नति आती है। व्यवसाय का उपयुक्त चुनाव सफलता को जन्म देता है जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।
(4) आर्थिक लाभ – व्यवसाय में योग्य, सक्षम, बुद्धिमान एवं रुचि रखने वाले कर्मियों को नियुक्त करने से न केवल उत्पादन की मात्रा बढ़ती है, बल्कि उत्पादित वस्तुओं में गुणात्मक वृद्धि भी होती है जिससे व्यवसाय को अधिक लाभ होता है। इस लाभ का अंश कर्मचारियों में भी विभाजित होता है और वे आर्थिक लाभ अर्जित करते हैं।
(5) शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य – विवशतावश किसी व्यवसाय को अपनाने से रुचिहीनता, निराशा, उत्साहविहीनता, कुण्ठाओं एवं तनावों का जन्म होता है; अत: शारीरिक-मानसिक क्षमताओं व शक्तियों का भरपूर लाभ उठाने के लिए तथा दुर्बलताओं से बचने के लिए व्यावसायिक निर्देशन महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी है।
(6) अवांछित प्रतिस्पर्धा की समाप्ति एवं सहयोग में वृद्धि – अच्छे व्यवसाय में पद बहुत कम हैं, जबकि उनके पीछे बेतहाशा दौड़ रहे अभ्यर्थियों की भीड़ अधिक है। इससे अवांछित एवं गला-काट प्रतिस्पर्धा का जन्म हुआ है। व्यावसायिक निर्देशन का सहारा लेकर यदि व्यक्ति अपनी योग्यता, क्षमता वे, शक्ति को आँककर सही व्यवसाय चुन लेगा तो समाज में अवांछित प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न भग्नाशा समाप्त हो जाएगी। इससे पारस्परिक सहयोग में वृद्धि होगी।
(7) मानवीय संसाधनों का सुनियोजित एवं अधिकतम उपयोग – मानव-शक्ति को समझना, आँकना और उसके लिए उपयुक्त व्यवसाय की तलाश करना व्यावसायिक निर्देशन का कार्य है। यह निर्देशन राष्ट्रीय नियोजन कार्यक्रम का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसके अन्तर्गत मानवीय संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग सम्भव होता है, जिससे व्यक्तिगत एवं समष्टिगत कल्याण में अभिवृद्धि की जा सकेगी।
(8) समाज की गत्यात्मकता एवं प्रगति – समाज की प्रकृति गत्यात्मक है। हर पल नयी-नयी परिस्थितियाँ जन्म ले रही हैं। बढ़ती हुई मानवीय आवश्यकताओं, उपलब्ध किन्तु सीमित साधनों एवं प्रगति की परिवर्तनशील अवधारणाओं ने मानव व उसके समाज के मध्य समायोजन की दशाओं को विकृत कर डाला है। इस विकृत दशा में सुधार लाने की दृष्टि से तथा व्यावसायिक सन्तुष्टि के विचार को पुष्ट करने हेतु व्यक्ति को उचित कार्य देना होगा। इसके लिए व्यावसायिक निर्देशन ही एकमात्र उपाय दीख पड़ता है।

28.

शैक्षिक निर्देशन से आप क्या समझते हैं? शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।याशैक्षिक निर्देशन का अर्थ समझाइए।

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शैक्षिक निर्देशन का अर्थ (Meaning of Educational Guidance)
निर्देशन का एक मुख्य स्वरूप शैक्षिक निर्देशन (Educational Guidance) है। शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध मुख्य रूप से शैक्षिक परिस्थितियों से होता है।

शैक्षिक निर्देशन बालक को अपने शैक्षिक कार्यक्रम को बुद्धिमत्तापूर्वक नियोजित कर पाने में सहायता करता है। यह बालकों को ऐसे पाठ्य-विषयों का चुनाव करने में सहायता देता है जो उनकी बौद्धिक क्षमताओं, रुचियों, योग्यताओं तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं के अनुकूल हों। यह उन्हें इस योग्य बना देता है ताकि वे शिक्षा सम्बन्धी कुछ विशेष समस्याओं तथा विद्यालय की विभिन्न परिस्थितियों से भली प्रकार समायोजन कर अपने शैक्षिक लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें।

शैक्षिक निर्देशन की परिभाषा (Definition of Educational Guidance)
विभिन्न मनोवैज्ञानिकों एवं विद्वानों ने शैक्षिक निर्देशन को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनमें से कुछ का उल्लेख अग्रलिखित है –

(1) ऑर्थर जे० जोन्स के अनुसार,“शैक्षिक निर्देशन का तात्पर्य उस व्यक्तिगत सहायता से है। जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने उपयुक्त विद्यालय,,पाठ्यक्रम, पाठ्य-विषय एवं विद्यालय-जीवन का चयन कर सकें तथा उनसे समायोजन स्थापित कर सकें।”
(2) रूथ स्ट्राँग के कथनानुसार, “व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने का मुख्य लक्ष्य उसे समुचित कार्यक्रम के चुनाव तथा उसमें प्रगति करने में सहायता प्रदान करना है।”
(3) एलिस के शब्दों में, “शैक्षिक निर्देशन से तीन विशेष क्षेत्रों में सहायता मिलती है- (अ) कार्यक्रम और पाठ्य-विषयों का चयन, (ब) चालू पाठ्यक्रम में कठिनाइयों का मुकाबला करना तथा (स) अगले प्रशिक्षण हेतु विद्यार्थियों का चुनाव।”
शैक्षिक निर्देशन सम्बन्धी उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि यह प्रक्रिया बालकों के पाठ्यक्रम चयन की सर्वोत्तम विधि है। उसमें बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं, शैक्षिक उपलब्धियों, प्राप्तांकों, अभिभावकों की आशाओं-महत्त्वाकांक्षाओं तथा मनोवैज्ञानिकों के परामर्श को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है, क्योंकि इसके अन्तर्गत एक निर्देशक द्वारा प्रदान किये गये निर्देशन की जाँच भी सम्भव है, इसलिए यह विधि वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक भी है।

शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया (Process of Educational Guidance)
पाठ्य-विषयों के चयन में निर्देशक के जानने योग्य बातें
हमारे देश में प्राथमिक शिक्षा और जूनियर हाईस्कूल स्तर तक शिक्षा में अधिक विविधता नहीं है। और समस्त विद्यार्थी लगभग एक समान विषयों का ही अध्ययन करते हैं, किन्तु जब बालक माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल में प्रवेश करते हैं तब उन्हें पाठ्य-विषयों के चयन सम्बन्धी समस्या का सामना करना पड़ता है। शिक्षा के मार्ग पर बढ़ने का यह वह स्थल है जहाँ पाठ्यक्रम अनेक भागों में बँट जाता है और बालक को उनमें से किसी एक का चयन करना होता है। पाठ्य-विषयों के चयन सम्बन्धी शैक्षिक निर्देशन के निम्नलिखित तीन मुख्य पहलू हैं –

(अ) बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना।
जिसे बालक/व्यक्ति को शैक्षिक निर्देशन देना है, उसके सम्बन्ध में निर्देशक को निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त कर लेनी चाहिए –

(1) बौद्धिक स्तर – शैक्षिक निर्देशन में बालक के बौद्धिक स्तर का पता लगाना अति आवश्यक है। तीव्र बुद्धि वाला बालक कठिन विषयों का अध्ययन करने के योग्य होता है और इसीलिए विज्ञान एवं गणित जैसे विषयों का चुनाव कर सकता है। वह उच्च कक्षाओं तक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों के साथ सुगमतापूर्वक पहुँच जाता है। कला-कौशल और रचनात्मक कार्यों में अपेक्षाकृत कम बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। इस प्रकार, बालक के लिए पाठ्य-विषयों का चुनाव करने में उसके बौद्धिक स्तर का ज्ञान आवश्यक है।
(2) शैक्षिक सम्प्राप्ति – शैक्षिक सम्प्राप्ति अथवा शैक्षिक उपलब्धि (Scholastic Attainment) की मुँचना अक्सर पिछली कक्षाओं के प्राप्तांकों द्वारा मिलती है, लेकिन निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत ‘सम्प्राप्ति परीक्षणों तथा सम्बन्धित अध्यापकों द्वारा भी शैक्षिक उपलब्धियों का ज्ञान कर लिया जाता है। किसी विशेष विषय में अधिक प्राप्तांकों की प्रवृत्ति, बालक की उस विषय में रुचि का संकेत करती है। मान लीजिए, एक विद्यार्थी आठवीं कक्षा तक विज्ञान में सर्वाधिक अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ है तो कहा जा सकता है कि भविष्य में भी वह विज्ञान में अधिक अंक प्राप्त करेगा। इन प्राप्तांकों या उपलब्धियों को आधार मानकर माध्यमिक स्तर पर विषय चुनने का परामर्श दिया जाना चाहिए।
(3) मानसिक योग्यताएँ – शिक्षा-निर्देशक को बालक की मानसिक योग्यताओं का भी समुचित ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि विभिन्न प्रकार के पाठ्य-विषयों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मानसिक योग्यताएँ उपयोगी सिद्ध होती हैं। उदाहरण के लिए-साहित्यकार, अधिवक्ता, व्याख्याता, नेता तथा शिक्षक बनाने में शाब्दिक योग्यता’; गणितज्ञ, वैज्ञानिक तथा इन्जीनियर बनाने में सांख्यिक योग्यता’; दार्शनिक, विचारक, गणितज्ञ अधिवक्ता बनाने में ‘तार्किक योग्यता’ सहायक होती है। मानसिक योग्यताओं को ज्ञान तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा शिक्षकों की सूचना द्वारा लगाया जा सकता है।
(4) विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ एवं अभिरुचियाँ – बालक के लिए पाठ्य-विषय का चयन करते समय बालक की विशिष्ट मानसिक योग्यताओं तथा अभिरुचियों का ज्ञान परमावश्यक है। विभिन्न पाठ्य-विषयों की सफलता अलग-अलग प्रकार की विशिष्ट योग्यताओं तथा अभिरुचियों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए-संगीत एवं कला की विशिष्ट योग्यता तथा अभियोग्यता वाले बालक-बालिकाओं को प्रारम्भ से ही संगीत एवं कला विषयों का चुनाव कर लेना चाहिए।
(5) रुचियाँ – बालक की जिस विषय में अधिक रुचि होगी उस विषय के अध्ययन में वह अधिक ध्यान लगाएगा। अत: निर्देशक को बालक की रुचि का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। रुचियों का ज्ञान रुचि परीक्षणों तथा रुचि परिसूचियों के अतिरिक्त अभिभावकों, शिक्षकों तथा दैनिक निरीक्षण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।
(6) व्यक्तित्व की विशेषताएँ – माध्यमिक स्तर पर किसी बालक को विषयों के चयन से सम्बन्धित परामर्श देने के लिए उसके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं का ज्ञान आवश्यक है। व्यक्तित्व विभिन्न प्रकार की विशेषताओं और गुणों; यथा-आत्मविश्वास, धैर्य, लगन, मनन, अध्यवसाय आदि का संगठन है। साहित्यिक विषयों का चयन भावुक व्यक्ति को, विज्ञान और गणित का चयन तर्कयुक्त एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति को तथा रचनात्मक विषयों का चयन उद्योगी एवं क्रिया-प्रधान व्यक्तियों को करना चाहिए। व्यक्तित्व के गुणों का ज्ञान जिन व्यक्तित्व परीक्षणों से किया जाता है उनमें साक्षात्कार, व्यक्तित्व परिसूचियाँ, प्रश्नसूची, व्यक्ति-इतिहास, निर्धारण-मान आदि प्रमुख हैं।
(7) शारीरिक दशा – कुछ विषयों को चयन करते समय निर्देशक को बालक की शारीरिक रचना तथा स्वास्थ्य की दशाओं का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। कृषि विज्ञान एवं प्राविधिक विषय इन्हीं के अन्तर्गत आते हैं। कृषि सम्बन्धी अध्ययन जमीन के साथ कठोर श्रम पर निर्भर है जिसके लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर होना आवश्यक है। इसी प्रकार प्राविधिक विषयों का प्रयोगात्मक ज्ञान कार्यशाला में कई घण्टे काम करके ही उपलब्ध किया जा सकता है। अतः पाठ्य-विषय के चयन से पूर्व चिकित्सक से शारीरिक विकास की जाँच करा लेनी चाहिए तथा रुग्ण या दुर्बल शरीर वाले बालकों को ऐसे विषय का चुनाव नहीं करना चाहिए।
(8) पारिवारिक स्थिति – पारिवारिक परिस्थितियों; विशेषकर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर शिक्षा-निर्देशक उन्हीं विषयों के चयन का परामर्श देता है जिन्हें निजी परिस्थितियों के अन्तर्गत आसानी से पढ़ा जा सके। माध्यमिक स्तर पर कुछ ऐसे विषय निर्धारित हैं जिनमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अभिभावकों को अत्यधिक धन खर्च करना पड़ता है; यथा-विज्ञान पढ़ने के बाद मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश। बालक की योग्यताओं, उच्च बौद्धिक स्तर तथा अभिरुचि के होते हुए भी इन कॉलेजों में अपने बच्चों को भेजना प्रत्येक माता-पिता के वश की बात नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में विद्यार्थी के लिए पाठ्य-विषयों के चयन में उसके परिवार की आर्थिक दशा को ध्यान में रखना अपरिहार्य है।

(ब) पाठ्य-विषयों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करना
निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करने वाले विशेषज्ञ को बालक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के उपरान्त पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित दो प्रकार की जानकारियाँ आवश्यक हैं –

(1) पाठ्य-विषयों के विभिन्न वर्ग – जूनियर स्तर से निकलकर माध्यमिक स्तर में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थियों के लिए पाठ्यक्रम को कई वर्गों में विभक्त किया गया है; यथा –
⦁    साहित्यिक
⦁    वैज्ञानिक
⦁    वाणिज्य
⦁    कृषि सम्बन्धी
⦁    प्रौद्योगिक
⦁    रचनात्मक तथा
⦁    कलात्मक।
इन वर्गों के विषय में ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त यह जानना आवश्यक है कि सम्बन्धित विद्यालय में कौन-कौन-से वर्स के पाठ्य-विषय पढ़ाये जाते हैं और विद्यार्थी की रुचि के विषय भी वहाँ उपलब्ध हो सकेंगे या नहीं।

(2) विविध पाठ्य-विषयों के अध्ययन हेतु आवश्यक मानसिक योग्यताएँ – किन विषयों के लिए कौन-सी योग्यताएँ ज़रूरी हैं और उस विद्यार्थी में कौन-कौन-सी योग्यताएँ विद्यमान हैं, इन सभी बातों की विस्तृत जानकारी, शिक्षा-निर्देशक को होनी चाहिए, तभी वह उपयुक्त पाठ्य-विषयों के चयन में विद्यार्थियों की सहायता कर सकता है।
(स) पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों की जानकारी प्राप्त करना
प्रत्येक विद्यार्थी अपनी शिक्षा से निवृत्त होकर जीवन-यापन के लिए किसी-न-किसी व्यवसाय का चयन करता है। आजकल अधिकांश व्यवसायों में विशेषीकरण होने से तत्सम्बन्धी प्रशिक्षण पहले से ही प्राप्त करना पड़ता है। अत: निर्देशक को पाठ्य-विषयों से सम्बन्धित व्यवसायों के विषय में ये सूचनाएँ प्राप्त करना अति आवश्यक है –
(1) व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए किन पाठ्य-विषयों का अध्ययन आवश्यक है – सबसे पहले निर्देशक को यह जानना चाहिए कि किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण कोर्स में प्रवेश पाने के लिए और अध्ययन की शुरुआत के लिए किन विषयों का ज्ञान आवश्यक है। उदाहरणार्थ-डॉक्टर बनने के लिए 9वीं कक्षा से जीवविज्ञान पढ़ना चाहिए, जबकि इंजीनियर बनने के लिए विज्ञान वर्ग में गणित पढ़ना चाहिए।
(2) विभिन्न वर्गों के पाठ्य-विषयों का अध्ययन किन व्यवसायों के योग्य बनाता है – पाठ्य-विषयों के चयन में व्यवसाय सम्बन्धी जानकारी आवश्यक है। निर्देशक को पहले ही यह ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए कि किसी व्यवसाय-विशेष का सीधा सम्बन्ध किन-किन विषयों से है ताकि व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त न करके भी उन विषयों का ज्ञान व्यवसाय के कार्य में मदद दे सके। उदाहरण के लिए-कॉमर्स लेकर कोई विद्यार्थी वाणिज्य या व्यापार के क्षेत्र में तो प्रवेश कर सकता है, किन्तु डॉक्टरी या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नहीं। बालक को शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने से पूर्व उपर्युक्त समस्त बातों की विस्तृत एवं वास्तविक जानकारी एक सफल शिक्षा-निर्देशक (Educational Guide) को होनी चाहिए।

29.

व्यावसायिक निर्देशन के दृष्टिकोण से बैकमैन द्वारा प्रतिपादित व्यवसायों का वर्गीकरण प्रस्तुत कीजिए।

Answer»

बैकमैन ने व्यक्ति की शिक्षा, बौद्धिक स्तर, प्रशिक्षण तथा सामाजिक सम्मान आदि कारकों को ध्यान में रखते हुए व्यवसायों के निम्नलिखित पाँच वर्गों का उल्लेख किया है –

(i) प्रशासकीय एवं उच्च स्तरीय व्यवसाय – इसके तीन उपवर्ग हैं -(क) भाषा सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे—विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, लेखक, वकील, सम्पादक, जज आदि। (ख) विज्ञान, सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, ऑडिटर, एकाउण्टेन्ट आदि। (ग) प्रशासकीय व्यवसाय; जैसे—प्रशासक तथा मैनेजर आदि के व्यवसाय।।
(ii) व्यापार एवं मध्यम स्तरीय व्यवसाय-इसके दो उपवर्ग हैं – (क) व्यापार सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-व्यापारी, विज्ञान के एजेण्ट, दुकानदार आदि। (ख) मध्यम स्तर के व्यवसाय; जैसे-डिजाइनर, अभिनेता, फोटोग्राफर आदि।।
(iii) कुशलतापूर्ण व्यवसाय – इनमें किसी-न-किसी कौशल की आवश्यकता होती है। इसके अन्तर्गत दो प्रकार के कौशल उपवर्ग हैं–(क) शारीरिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-हँगाई, छपाई, बढ़ईगीरी, दर्जीगिरि, मिस्त्री आदि। (ख) बौद्धिक कौशल सम्बन्धी व्यवसाय; जैसे-लिपिक, स्टेनोग्राफर, खजांची आदि।
(iv) अर्द्ध-कुशलतापूर्ण व्यवसाय – इनमें कुछ कौशल और कुछ यन्त्रवत् कार्य सम्मिलित हैं; जैसे-गार्ड, कण्डक्टर, पुलिस और ट्रैफिक का सिपाही, कार या ट्रक का ड्राइवर आदि।
(v) निम्न स्तरीय व्यवसाय – इन व्यवसायों में बुद्धि का सबसे कम प्रयोग किया जाता है; जैसे-चपरासी, चौकीदार, कृषि कार्य, रिक्शा-चालक, बोझा ढोना, मिल-मजदूर आदि।

30.

व्यावसायिक निर्देशन और व्यावसायिक चयन में क्या अन्तर है?

Answer»

किसी व्यक्ति को व्यवसाय के चुनाव के लिए आवश्यक जानकारी एवं सहायता प्रदान करना व्यावसायिक निर्देशन है। वास्तव में व्यावसायिक निर्देशने व्यक्ति को ऐसी व्यक्तिगत सहायता प्रदान करने का प्रयास है जिसके द्वारा स्वयं अपने लिए उचित व्यवसाय का चुनाव, उसके लिए तैयारी तथा उसमें प्रवेश करके उन्नति कर सके। इससे भिन्न व्यावसायिक चयन का अर्थ है-किसी कार्य के लिए उपयुक्त कर्मचारी का चुनाव करना। इसके लिए कार्य की प्रकृति तथा सम्बन्धित व्यक्ति की योग्यता एवं क्षमता को मुख्य रूप से ध्यान में रखा जाता है। व्यावसायिक निर्देशन का कार्य निर्देशन द्वारा प्रदान किया जाता है, जबकि व्यावसायिक चयन का कार्य सम्बन्धित कार्यालय या संस्थान के प्रबन्धकों या अधिकारियों द्वारा किया जाता है।

31.

औद्योगिक क्षेत्र में उपयुक्त कर्मचारियों के चयन का क्या महत्त्व है?

Answer»

उत्पादन में वांछित वृद्धि के अतिरिक्त कर्मचारियों के मानसिक सुख के लिए उपयुक्त कार्य हेतु उपयुक्त व्यक्तियों का चयन आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण समझा जाता है। इस चयन का महत्त्व निम्न प्रकार प्रतिपादित है –

(1) कर्मचारी का सुख एवं सन्तोष – जब कोई कर्मचारी अपनी रुचि, अभिरुचि, योग्यताओं एवं क्षमताओं के अनुकूल कार्य या व्यवसाय प्राप्त करता है तो उसे वह अत्यन्त दक्षता और कुशलतापूर्वक सम्पन्न करता है। यह दक्षता और कुशलता उसे पदोन्नति की ओर अग्रसर करती है। उच्च पद पर आसीन होकर कर्मचारी और अधिक सुख व सन्तोष प्राप्त करता है।
(2) उत्पादन-वृद्धि – योग्यताओं एवं रुचि के अनुसार कार्य पाने पर कर्मचारी खूब मन लगाकर उसमें जुट जाता है, जिससे उत्पादन में गुणात्मक एवं मात्रात्मक अभिवृद्धि होती है। अतः उपयुक्त कर्मचारी का चयन उत्पादन वृद्धि के विचार से सम्बद्ध है।
(3) समय एवं धन की बचत – उपयुक्त कर्मचारियों के चयन से समय एवं धन की बचत होती है। हम जानते हैं कि अनुपयुक्त कार्य या व्यवसाय को व्यक्ति कुछ दिन करके छोड़ देता है। वह नये सिरे से पुनः नया कार्य पकड़ता है जिसके लिए चयन एवं प्रशिक्षण की प्रक्रिया दोहरायी जाती है। इससे समय और धन की हानि होती है।
(4) दुर्घटनाओं का अभाव – मनवांछित तथा उपयुक्त कार्य पाकर कर्मचारी पूरे मन और ध्यान से कार्य करता है। ध्यान उचटने से मशीनों के साथ दुर्घटनाएँ घटती हैं, किन्तु ध्यानपूर्वक कार्य करने से दुर्घटनाओं के होने की बहुत कम सम्भावना रहती है। इससे उद्योग में टूट-फूट भी कम होती है।
(5) परिस्थितियों से उचित समायोजन – उपयुक्त व्यवसाय मिलने पर कर्मचारी का व्यवसाय से उचित एवं स्वस्थ समायोजन स्थापित हो जाती हैं। वह चुने गये कार्य एवं परिस्थितियों के साथ आसानी से तालमेल बना लेता है।
(6) स्थायित्व – मनोनुकूल व्यवसाय या कार्य मिलने पर कर्मचारी अपने कार्य को छोड़कर अन्य स्थान पर नहीं जाते, वरन् वे उसी उद्योग में स्थिर रहना चाहते हैं और उनकी गतिशीलता कम हो जाती है।
(7) औद्योगिक शान्ति – व्यवसाय से सन्तुष्ट, सुखी एवं समायोजित कर्मचारी मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है। वह तनावों से मुक्त रहता है और प्रतिकूल परिस्थितियों से भी मधुर सामंजस्य बनाने में सफल रहता है। इन दशाओं में औद्योगिक शान्ति कायम रहती है, उत्पादन कार्य प्रगति पर रहता है और किसी प्रकार का कोई अवरोध उत्पन्न नहीं होता।

32.

व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण की उपयोगिता या महत्त्व का उल्लेख कीजिए।

Answer»

व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण की उपयोगिता या महत्त्व के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं –

⦁    व्यवसाय-विलेषणे से व्यवसायों का वर्गीकरण आसानी से किया जा सकता है;
⦁    इसके माध्यम से कर्मचारियों के कार्य-सम्बन्धी कर्तव्यों का निर्धारण हो जाता है;
⦁    कर्मचारियों के उत्तरदायित्व को निश्चित किया जा सकता है;
⦁    पूर्ण व्यवसाय-विश्लेषण से कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है;
⦁    व्यवसाय के लिए आवश्यक क्षमताएँ तथा योग्यताएँ सुनिश्चित होती हैं;
⦁    नयी भर्ती द्वारा आये कर्मचारियों के प्रशिक्षण की अवधि और उसके स्वरूप को निश्चित किया जा सकता है;
⦁    इसके कर्मचारियों में आपसी सद्भावना उत्पन्न होने में मदद मिलती है;
⦁    कर्मचारियों के कार्य के अनुसार उनके वेतन का निर्धारण हो सकता है;
⦁    आवश्यक कच्चे माल के विषय में जानकारी मिलती है;
⦁    कार्य में आने वाले तथा उपयोगी, यन्त्रों, उपकरणों, मशीनों व औजारों के बारे में विस्तृत सूचना मिलती है;
⦁    कार्य में लगने वाले समय का अनुमान हो जाता है तथा
⦁    कार्य के लाभकारी एवं हानिकारक, शारीरिक और मानसिक पहलुओं का सम्यक् बोध हो जाता है।

33.

औद्योगिक मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Answer»

औद्योगिक मनोविज्ञान की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

⦁    औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की व्यावहारिक शाखा है
⦁    यह औद्योगिक जगत् से सम्बन्धित मनुष्यों के व्यवहारों का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन है
⦁    मनोविज्ञान की यह अध्ययन शाखा उत्पादक व उत्पादक तत्त्वों के मध्य कड़ी का काम करती है
⦁    औद्योगिक मनोविज्ञान जहाँ एक ओर निरीक्षक तथा उसके अधीनस्थ कर्मचारियों के सम्बन्धों के विषय में अध्ययन करता है वहीं दूसरी ओर श्रम एवं प्रबन्ध का भी समुचित ज्ञान कराता है
⦁    इसके अन्तर्गत उद्योग में ‘उपयुक्त कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जाता है
⦁    यह मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों को उद्योगों में लागू करता है जिससे उद्योगों से सम्बन्धित सभी व्यक्तियों का हित एवं कल्याण होता है तथा
⦁    औद्योगिक मनोविज्ञान, औद्योगिक क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक अनुसन्धान तथा उपलब्धियों से सम्बन्ध रखता है।

34.

औद्योगिक मनोविज्ञान के क्षेत्र का उल्लेख कीजिए।

Answer»

औद्योगिक मनोविज्ञान का क्षेत्र उद्योग-धन्धों के अतिरिक्त व्यापार एवं व्यवसाय तक विस्तृत है, तथापि यह उनमें निहित मानवीय तत्त्वों का ही अध्ययन करता है। इसका विषय-क्षेत्र इस प्रकार है –

⦁    कर्मचारियों का चयन, प्रशिक्षण एवं दक्षता सम्बन्धी नयी-नयी विधियों की खोज;
⦁    उपयुक्त कार्यों के लिए उपयुक्त व्यक्तियों का चयन तथा व्यवसाय परामर्श;
⦁    कर्मचारियों के पदोन्नति के अवसर;
⦁    कार्य की दशाएँ;
⦁    उत्पादन व उत्पादन से सम्बन्धित मानवीय समस्याएँ;
⦁    विज्ञापन एवं विक्रय;
⦁    कर्मचारियों को मनोबल तथा प्रेरणा बनाये रखना;
⦁    श्रम कल्याण;
⦁    औद्योगिक असन्तोष, तनाव व संघर्ष के निराकरण के उपायों की खोज तथा
⦁    हड़ताल व तालाबन्दी की समस्याएँ।

35.

औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) से आप क्या समझते हैं? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान के महत्त्व एवं उपयोगिता को भी स्पष्ट कीजिए।

Answer»

भूमिका (Introduction)
आधुनिक विश्व तेजी से औद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में मनुष्यों के व्यवहार की जटिलताओं ने मनोविज्ञान का अध्ययन अपनी ओर आकर्षित किया। उद्योग-धन्धों से। सम्बन्धित तथा इन क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्तियों का व्यवहार समाज के अन्य क्षेत्रों के निवासियों के व्यवहार से कुछ भिन्न पाया जाता है तथा उनकी समस्याएँ भी कुछ अलग प्रकार की हो जाती हैं। उद्योग से जुड़े लोगों की समस्याओं का अध्ययन करने एवं उनका उचित समाधान ढूंढ़ने के प्रयास ने ‘औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) को जन्म दिया। कालान्तर में मनोविज्ञान ने उद्योग के क्षेत्र में एक विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है।

औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ (Meaning of Industrial Psychology)
‘औद्योगिक मनोविज्ञान’ एक संयुक्त शब्द है जो दो शब्दों से मिलकर बना है : ‘उद्योग + मनोविज्ञान’ अर्थात् उद्योग जगत से सम्बन्धित मनोविज्ञान। दूसरे शब्दों में, औद्योगिक मनोविज्ञान, व्यावहारिक मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें उद्योग सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए मनोविज्ञान की सहायता ली जाती है। श्रमिकों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना, उनके आवास, स्वास्थ्य व उनके बच्चों की शिक्षा का समुचित प्रबन्ध करना आदि बातों को लेकर मनोविज्ञान ने उद्योग में कदम रखा। मनोविज्ञान में विभिन्न श्रमिक समस्याओं; यथा-कार्य विश्लेषण, कार्य और विश्राम का समय निर्धारण, थकान का प्रभाव, कुशल कार्य और गति तथा मालिक-मजदूर सम्बन्ध आदि से सम्बन्धित अनुसन्धान कार्य भी हुए। स्पष्टत: उद्योग, उसके कर्मचारियों तथा मालिकों के मानवीय व्यवहार व सम्बन्धों को लेकर जो भी समस्याएँ और तनावपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं, उनका निदान तथा समाधान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में असम्भव था। मनोवैज्ञानिकों के सत्प्रयासों से लघु और बड़े सभी उद्योगों में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हुआ। यह सम्पूर्ण विवेचन औद्योगिक मनोविज्ञान के अर्थ को अभिप्रकाशित एवं स्पष्ट करता है।

औद्योगिक मनोविज्ञान की परिभाषा (Definition of Industrial Psychology)
विभिन्न विद्वानों ने औद्योगिक मनोविज्ञान की अनेक परिभाषाएँ दी हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) हैरल के अनसार, “औद्योगिक मनोविज्ञान उद्योग और व्यवसाय में लगे लोगों का अध्ययन हैं,
(2) ब्लम के मतानुसार, “मानवीय औद्योगिक समस्याओं से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक तथ्यों और सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान है।’
(3) स्मिथ के शब्दों में, “व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए औद्योगिक मनोविज्ञान को उन लोगों के व्यवहार का अध्ययन केहकर परिभाषित किया जा सकता है जो अपने मस्तिष्क तथा हाथ के कार्य को जीविका कमाने के लिए अनिवार्य वस्तुओं में बदल लेते हैं।”

उपर्युक्त विवरण के आधार पर औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ‘औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है।” औद्योगिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से औद्योगिक एवं व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। औद्योगिक मनोविज्ञान सम्बन्धित क्षेत्र की समस्याओं के लक्षणों, कारणों एवं समाधान के उपायों का भी अध्ययन करता है।

औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व (Need and Importance of Psychology in the Field of Industry)
मानव-व्यवहार और स्वभाव से प्रभावित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता महसूस की गयी है और इसके महत्त्व में वृद्धि हुई है। औद्योगिक जगत की समस्याएँ न्यूनाधिक रूप से मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ हैं, जिसे मनोविज्ञान के अन्तर्गत मानवीय अध्ययन द्वारा ही सुलझाया जा सकता है। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व एवं प्रकार वर्णित है –

(1) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता – आधुनिक समय में नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के फलस्वरूप उद्योग-धन्धों का अत्यधिक विकास हुआ है। बड़ी-बड़ी मिलों, कारखानों तथा फैक्ट्रियों में, जहाँ सैकड़ों-हजारों कर्मचारी श्रम में जुटे हों, नाना प्रकार की समस्याओं का प्रादुर्भाव निश्चित है। इन समस्याओं में भौतिक दशाओं से सम्बन्धित समस्याओं के अतिरिक्त बहुत सारी मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ भी होती हैं। ये समस्याएँ मानवीय अध्ययन द्वारा ही हल की जा सकती है; अत: उद्योग के क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने के लिए मनोविज्ञान की आवश्यकवा अनुभव की जाती है।
(2) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व – वर्तमान औद्योगिक युग ने घरेलू उद्योगों को गौण बना दिया है। बड़ी मात्रा में मशीनों तथा मजदूरों ने मिलकर राष्ट्रीय एवं व्यापक स्तर पर उत्पादन कार्य शुरू किया तथा दूर-दूर से भारी मात्रा में कच्चा सामान’ मँगाया जाने लगा। कर्मचारियों पर वरयता क्रम में अधिकारी नियुक्त हुए। उनके निरीक्षण में श्रमिकों की कार्यशक्ति और उत्पादन शक्ति बढ़ाकर उत्पादित वस्तुओं को दूर-दूर भेजने का प्रयास किया गया। श्रमिकों की कार्यशक्ति एवं उत्पादन शक्ति बढ़ाने की नयी-नयी युक्तियों की खोज होने के अतिरिक्त मिल-मालिकों तथा श्रमिकों के सम्बन्धों की ओर भी ध्यान दिया गया। इस प्रकार उद्योग का क्षेत्र जटिल से जटिलतम हुआ, समस्याएँ उलझती गईं, जिनके विश्लेषण एवं निराकरण हेतु मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा प्रविधियों का उपयोग किया गया। कालान्तर में उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व स्थायी रूप से अंकित हो गया। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व निम्नांकित कारणों से है –
(1) कर्मचारियों के चयन की समस्या (Problem of the Personnel Selection)-उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान ने जो सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण कार्य किया, वह कर्मचारियों के चुनाव में सहायता पहुँचाना है। वर्तमान समय में उद्योग के क्षेत्र में विशेषीकरण (Specialization) का बोलबाला है। कार्य का विभाजन और कार्य की हर शाखा में विशेषीकरण आधुनिक उद्योगों का प्रमुख लक्षण है। प्रत्येक कार्य के लिए विशिष्ट निपुणता तथा योग्यता की आवश्यकता है। इस आवश्यकता ने हमारे सामने उपयुक्त कर्मचारियों के चयन की समस्या खड़ी कर दी है। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से यह ज्ञात हो जाता है कि किस व्यक्ति में कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में है? उसी के अनुसार कर्मचारियों का चयन किया जाता है और तद्नुसार ही उन्हें कार्य भी प्रदान किया जाता है।
(2) कार्य की परिस्थितियों की समस्या (Problem of working Condition)–वर्तमान समय में उद्योग सम्बन्धी कार्य की परिस्थितियों के निर्धारण में मनोविज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कर्मचारियों की कार्य करने की दशाओं का उत्पादन और कार्यक्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोविज्ञान कार्य की परिस्थितियों को समझने में सहायता प्रदान करता है। उत्पादन की वृद्धि हेतु इस बात का अनुभव किया गया कि कार्य करने की विभिन्न परिस्थितियों; जैसे—प्रकाश, तापमान, वायु संचार, विश्राम आदि को अनुकूल बनाया जाए। मनोविज्ञान की सहायता से श्रमिकों के कार्य की परिस्थितियों में उचित सुधार लाने का प्रयास किया जाता है।
(3) पदोन्नति की समस्या (Problem of the Promotion)-उद्योगों में कार्य की विभिन्न श्रेणियों के अनुसार कर्मचारियों व अधिकारियों के पद निर्धारित हैं। कुछ समय तक कार्यानुभव प्राप्त करने के उपरान्त व्यक्ति को उच्च पद पर भेजने की आवश्यकता महसूस की जाती है। किसी विशेष पद के लिए कर्मचारी की बुद्धि, मानसिक योग्यता, कार्य के प्रति रुचि, कार्य को सीखने की क्षमता आदि की जाँच मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा विधियों की सहायता से की जाती है। जाँच के परिणामों व निष्कर्षों के आधार पर ही किसी कर्मचारी की उपयुक्तता निश्चित की जा सकती है। स्पष्टत: पदोन्नति की समस्या का उचित समाधान मनोविज्ञान पर ही आधारित है।
(4) मानवीय सम्बन्धों की समस्या (Problem of Human Relations)-औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् उद्योगों में मानवीय सम्बन्धों को महत्त्व प्रदान किया जाने लगा। इससे पूर्व पिछली शताब्दी में श्रमिकों के साथ पशुओं जैसा अमानवीय व्यवहार किया जाता था। उनसे प्रति दिवस बारह घण्टे से ऊपर कार्य कराया जाता था। इन दशाओं ने उद्योग में मनोविज्ञान का प्रवेश करा दिया जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों के कल्याण पर ध्यान दिया गया। श्रमिकों के आवास, चिकित्सा, प्रशिक्षण, स्त्रियों के लिए कल्याण-केन्द्र तथा उनके बच्चों के लिए समुचित शिक्षा की व्यवस्था को आवश्यक समझा गया। मनोविज्ञान ने लोगों को परस्पर मानवीय दृष्टि से देखने में सहायता दी, मजदूरी यूनियनों ने भी श्रमिक हितों के लिए अथक संघर्ष किया और शनैः-शनैः उद्योगपति श्रमिकों के प्रति उदारता दिखाने लगे। उद्योग में मानवीय सम्बन्धों की समस्या के निराकरण एवं श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को करने में मनोविज्ञान ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
(5) औद्योगिक संघर्ष की समस्या (Problem of Industrial Conflicts)-कभी-कभी स्वहितों की रक्षार्थ श्रमिकों और मिल-मालिकों के मध्य तनाव एवं संषर्घ की,दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। या तो श्रमिक अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं अथवा मालिकों पर अनुचित दबाव डालकर अधिक लाभ प्राप्त करने चाहते हैं-दोनों ही स्थितियों में औद्योगिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप हड़ताल और तालाबन्दी की स्थितियाँ जन्म लेती हैं तथा समूचे औद्योगिक क्षेत्र में अशान्ति पैदा हो जाती है। मनोविज्ञान ही श्रमिक वर्ग एवं मिल मालिकों दोनों की मानसिक स्थिति को ठीक-ठीक समझ सकता है। मनुष्यों के दो वर्गों के बीच उत्पन्न इस तनाव की स्थिति को समझकर हल करने का प्रयास मनोविज्ञान की विधियों द्वारा सम्भव है। इस प्रकार औद्योगिक संघर्ष से बचने का उपाय भी मनोविज्ञान के ही पास है।

36.

उपयुक्त कर्मचारी के चुनाव से होने वाले मुख्य लाभों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

⦁    कर्मचारी सुखी एवं सन्तुष्ट रहते हैं
⦁    उत्पादन वृद्धि
⦁    समय एवं धन की बचत
⦁    दुर्घटनाओं की आशंका घटती है
⦁    स्थायित्व रहता है तथा
⦁    औद्योगिक शान्ति बनी रहती है।

37.

कर्मचारी चयन (Personnel Selection) से क्या आशय है? कर्मचारी-चयन की सम्पूर्ण प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत कीजिए।याकर्मचारी चयन के उद्देश्य से कार्य-विश्लेषण तथा कर्मचारी-विश्लेषण की प्रक्रियाओं का विवरण प्रस्तुत कीजिए।

Answer»

कर्मचारियों के चयन की समस्या (Problem of Personnel Selection)
आधुनिक काल के मिल, कारखानों या फैक्ट्रियों में कार्य-विशेषीकरण के आधार पर कार्य का विभाजन हुआ। इस श्रम-विभाजन के कारण उत्पादन कार्य को पूरी गति मिली; अत: हर विभाग के विशेष कार्य हेतु निपुणतम व्यक्ति की खोज हुई। विज्ञापन छापे गये, सैकड़ों अभ्यर्थियों ने नियोक्ताओं (मालिकों) के पास अपने प्रार्थना-पत्र भेजे। अब नियोक्ता अथवा मालिकों के सामने उनमें से सर्वाधिक योग्य व्यक्ति के चुनाव की समस्या उत्पन्न हुई।

विभिन्न प्रकार के व्यवसायों अथवा कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं की आवश्यकता होती है। अनुभव द्वारा पता चलता है कि एक व्यक्ति विभिन्न प्रकार के व्यवसायों या कार्यों को एक समान कुशलता से नहीं कर सकता; इसी प्रकार से अनेक व्यक्ति एक व्यवसाय या कार्य के लिए एक समान कुशलता भी नहीं अपना सकते। यहाँ यह समस्या उठ खड़ी होती है कि किस भाँति व्यक्ति को उपयुक्त व्यवसाय तथा व्यवसाय को उपयुक्त व्यक्ति उपलब्ध हो? व्यक्ति के लाभ और सुख की दृष्टि से आवश्यक है कि उसे अपनी सर्वोत्तम योग्यता के अनुकूल कार्य मिले। स्पष्ट रूप से कर्मचारियों के चयन की समस्या के दो पहलू हैं-एक, व्यक्ति को उसकी सर्वोत्तम योग्यताओं के अनुसार उद्योग में कार्य मिलना, तथा दो, उद्योगों के विभिन्न कार्यों हेतु अभ्यर्थियों में से सर्वोत्तम व्यक्ति का चयन करना। कर्मचारी चयन के नकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों को छाँटकर अलग कर देते हैं तथा ‘स्वीकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों का चयन कर लेते हैं।

कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया (Process of the Personnel Selection)
कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं – (1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण तथा (2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण। व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण के अन्तर्गत यह ज्ञात किया जाता है कि किसी व्यवसाय के लिए किस तरह के कार्य, किस तरह की कार्य की परिस्थितियों, किस स्तर की शिक्षा, बौद्धिक स्तर तथा मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता है। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत यह पता लगाया जाता है कि कर्मचारी में किस स्तर की बुद्धि है, उसकी कौन-कौन सी मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ हैं। अब हम इन दोनों पक्षों का अलग-अलग विवेचन प्रस्तुत करेंगे।

(1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण (Job-Analysis)
व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण का अर्थ है कि किसी व्यवसाय से सम्बन्धित पूरी जानकारी प्राप्त करना। उद्योग-धन्धों तथा विभिन्न व्यवसायों के सन्दर्भ में व्यवसाय-विश्लेषण का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। वस्तुतः इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कार्य के विभिन्न तत्त्वों को फैलाकर उनका सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। कर्मचारी के कर्तव्य तथा कार्य की दशा, के साथ-साथ कर्मचारी की व्यक्तिगत विशेषताओं का अध्ययन भी किया जाता है। व्यवसाय-विश्लेषण के माध्यम से कार्य के आधारभूत या मूल तत्त्वों का निर्धारण एवं स्पष्टीकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त कर्मचारी में अपेक्षित गुण और विशेषताओं का ज्ञान भी हो जाता है।

ब्लम ने व्यवसाय-विश्लेषण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण किसी व्यवसाय के विभिन्न तत्त्वों का सूक्ष्म अध्ययन है। इसका सम्बन्ध न केवल कार्य से सम्बन्धित कर्तव्य और दशाओं से है, वरन् कार्य के लिए अपेक्षित वैयक्तिक योग्यताओं से भी है।”
इस भाँति, व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण का तात्पर्य किसी व्यवसाय या कार्य के अन्तर्गत सम्मिलित समस्त बातों के सूक्ष्म एवं व्यापक अध्ययन से है जिससे कार्य से सम्बन्धित बातों का सही-सही ज्ञान हो सके।

व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित प्राप्त की जाने वाली सूचनाएँ – व्यवसाय-विश्लेषण करते समय किसी कार्य से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं। वाइटलीज (Viteles) ने व्यवसाय-विश्लेषण के अन्तर्गत एकत्र की जाने वाली सूचनाओं की एक सूची जारी की है, जिसे प्रस्तुत किया जा रहा है –

⦁    कार्य का नाम
⦁    कर्मचारियों की संख्या
⦁    कर्तव्यों का विवरण
⦁    कार्य में प्रयुक्त होने वाले यन्त्र
⦁    क्रियाओं का विश्लेषण
⦁    कार्य की दशाएँ या परिस्थितियाँ
⦁    वेतन एवं अन्य सुविधाएँ (जैसे- मुफ्त आवास एवं चिकित्सा सुविधाएँ)
⦁    अन्य समान व्यवसायों से सम्बन्ध
⦁    स्थानान्तरण तथा पदोन्नति के अवसर
⦁    प्रशिक्षण-काल तथा उसकी प्रकृति
⦁    व्यक्तिगत

योग्यताएँ –
⦁    अवस्था, लिंग, राष्ट्रीयता तथा वैवाहिक स्तर
⦁    शारीरिक योग्यताएँ
⦁    मानसिक योग्यताएँ
⦁    शैक्षिक योग्यताएँ
⦁    पूर्व अनुभव
⦁    सामान्य एवं विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ तथा
⦁    स्वभाव एवं चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ।
कार्य से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्रित करने की विधियाँ-किसी भी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित विभिन्न सूचनाएँ एकत्र करने में अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं –

(1) प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method) – इस विधि में किसी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित, व्यक्तित्व की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर, कुछ प्रश्नों की एक तालिका बना ली जाती है। इस तालिका को सम्बन्धित कर्मचारियों व अधिकारियों में बाँट दिया जाता है। उनसे जो उत्तर प्राप्त होते हैं, उनसे कार्य सम्बन्धी सूचनाएँ एकत्र कर ली जाती हैं और कर्मचारियों का चयन कर लिया जाता है।
(2) निरीक्षण विधि (Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत सूचना एकत्र करने वाला व्यक्ति स्वयं कार्य-स्थल पर जाकर कर्मचारियों को काम करते हुए देखता है। वह उनके कार्यों को भली प्रकार निरीक्षण करता है तथा तत्सम्बन्धी निष्कर्ष निकालता है।
(3) परीक्षण विधि (Test Method) – इस विधि में किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित आवश्यक योग्यताओं को लेकर कुछ विश्वसनीय व प्रामाणिक परीक्षाएँ तैयार की जाती हैं। उस आधार पर यह ज्ञात किया जाता है कि उस कार्य की सफलता हेतु कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में होनी चाहिए।
(4) वैयक्तिक मनोरेखा विधि (Individual Psychographic Method) – इस विधि द्वारा किसी विशेष व्यवसाय या कार्य में सफल किसी कर्मचारी की मानसिक एवं अन्य विशेषताओं का पता लगाया जाता है। उन्हें ज्ञात करने के बाद एक ग्राफ पर प्रदर्शित किया जाता है तथा ग्राफों के प्रदर्शनों के आधार पर कर्मचारियों की मानसिक विशेषताओं से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं।
(5) व्यवसाय मनोरेखांकित विधि (Job Psychographic Method) – इस विधि के द्वारा भी रेखाचित्रों के माध्यम से कार्य में लगे हुए लोगों की विशेषताओं को ग्राफ पर प्रदर्शित करके व्यवसाय का मनोरेखांकन किया जाता है। वाइटलीज द्वारा वर्णित इस विधि में तीन आवश्यक बातें इस प्रकार हैं – (अ) मानसिक गुणों का सुगम वर्गीकरण, (ब) प्रशिक्षित निरीक्षकों द्वारा प्रत्यक्ष पर्यावलोकन एवं (स) प्रामाणिक मूल्यांकन विधि। यहाँ कुछ विशेषज्ञों द्वारा व्यवसाय या कार्य का विश्लेषण करके एक ऐसी तालिका निर्मित की जाती है जिसमें कार्य के लिए आवश्यक समस्त गुणों का सुगम वर्गीकरण सम्भव हो सके। इन समस्त गुणों के आधार पर एक ग्राफ तैयार करके भविष्य में उससे सहायता ली जाती है।
(6) गति अध्ययन विधि (Motion Study Method) – इस विधि के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय में लगे कर्मचारी के काम की गति तथा काम में लगा हुआ समय ज्ञात किया जाता है। इस भाँति, भिन्न-भिन्न कर्मचारियों की गति नोट कर ली जाती है तथा उसकी आपस में तुलना कर ली जाती है जिसे भविष्य में गति अध्ययन (Time and Motion Study) है जिसके अन्तर्गत आजकल सम्पूर्ण कार्य का विस्तृत चित्रांकन मूवी कैमरे द्वारा कर लिया जाता है। इसके बाद, फिल्म को धीमी गति से चलाकर पूरी प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाता है।

उपर्युक्त वर्णित विधियों में से किसी भी एक विधि का आवश्यकता व परिस्थिति के अनुसार चयन करके कार्य के विषय में सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं।

(2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण (Individual Analysis)
कर्मचारियों के चयन में जहाँ एक ओर कार्य की विशेषताओं की विस्तृत जानकारी आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर अभ्यर्थी (काम पाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति) के विषय में भी पूरी जानकारी प्राप्त होनी चाहिए। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण, व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्तिगत गुणों का होता है जिसके माध्यम से यह निश्चित किया जाता है कि अमुक व्यक्ति किस प्रकार के कार्य के योग्य या अयोग्य है। इसके द्वारा व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण के विषय में ज्ञान मिलता है तथा कर्मचारी की योग्यतानुसार वेतन निर्धारित करने में सहायता प्राप्त होती है। कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत व्यक्ति के घिषय में निम्नलिखित जानकारियाँ हासिल करनी होती हैं –

⦁    नाम
⦁    आयु
⦁    लिंग
⦁    जाति
⦁    धर्म
⦁    राष्ट्रीयता
⦁    शारीरिक स्वास्थ्य एवं विशेषताएँ; जैसे – भार ऊँचाई, दृष्टि, सीने की माप, दाँतों की अवस्था, हृदय एवं फेफड़ों की दशा, नाक-कान की दशा, कोई कमी (यदि हो तो) इत्यादि
⦁    मानसिक सूचनाएँ; जैसे – बुद्धि का स्तर, मानसिक योग्यताएँ व उनका स्तर, रुचियाँ-अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व की विशेषताएँ
⦁    शैक्षिक योग्यताएँ
⦁    कार्य का अनुभव
⦁    प्रशिक्षण का विवरण तथा
⦁    चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ।

कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण की विधियाँ – कर्मचारी विश्लेषण की प्रक्रिया में कर्मचारी से सम्बन्धित उपर्युक्त सूचनाएँ एकत्र करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ काम में लायी जाती हैं –

(1) आवेदन-पत्र (Application Form) – उद्योग के कार्यालय में कार्य पाने के इच्छुक अभ्यर्थियों को सादे छपे हुए आवेदन-पत्र प्रदान किये जाते हैं। इन आवेदन-पत्रों में कुछ शीर्षकों के अन्तर्गत सूचनाएँ माँगी जाती हैं। अभ्यर्थी द्वारा भरकर दिये गये आवेदन-पत्र के माध्यम से उस व्यक्ति के सम्बन्ध में शिक्षा, अनुभव, प्रशिक्षण तथा व्यक्तिगत इतिहास का पता चल जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी शक्तियों, महत्त्वाकांक्षाओं तथा पाठान्तर क्रियाओं का भी ज्ञान हो जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से उपयोगी सूचनाएँ मँगाने के लिए उन्हें विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाना आवश्यक समझा जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से वे समस्त सूचनाएँ उपलब्ध हो जाती हैं जिनका उत्तर अभ्यर्थी से मिल सकता है। आजकल कुछ विशिष्ट कम्पनियाँ विज्ञापनों में ही आवेदन-पत्र का नमूना भी छाप देती हैं और आशा करती हैं कि आवेदक उसी नमूने के अनुसार आवेदन करें।
(2) संस्तुति-पत्र (Letters of Recommendation) – प्रत्येक अभ्यर्थी के पास उसके शिक्षाकाल में मिले कुछ संस्तुति-पत्र और प्रमाण-पत्र होते हैं जो उसकी विशेषताओं पर पर्याप्त रूप से प्रकाश डालते हैं। बहुत-से व्यावसायिक संस्थान आवेदन-पत्रों के साथ कम-से-कम दो महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के संस्तुति-पत्र भी मँगवाते हैं। इससे अभ्यर्थियों के बारे में आवश्यक व महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलने की सम्भावनाएँ रहती हैं। इससे उसकी कमियों व दोषों की जानकारी तो, नहीं, किन्तु विशिष्टताएँ अवश्य प्रकाश में आ जाती हैं। संस्तुति-पत्रों का सबसे बड़ा दोष यह है कि इनमें व्यक्ति के विषय में अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण कर दिया जाता है। इससे इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है, किन्तु, व्यावसायिक संस्थान संस्तुति (सिफारिश) करने वाले व्यक्तियों से संम्पर्क स्थापित करके प्रश्नावलियों (Questionnaire) व निर्धारण-मान (Rating-scale) की सहायता से अभ्यर्थी के विषय में आवश्यक एवं वास्तविक सूचनाएँ प्राप्त कर लेते हैं।
(3) शैक्षिक आलेख (Academic Records) – शैक्षिक आलेख के माध्यम से अभ्यर्थी की शिक्षा सम्बन्धी योग्यता का पता चल जाता है। विभिन्न व्यावसायिक संस्थान अभ्यर्थियों से आवेदन-पत्रों के साथ उनका शैक्षिक आलेख प्रमाणित प्रतिलिपियों के रूप में मॅगा लेते हैं। इनके साथ ही उन संस्थानों के नाम भी पूछे जाते हैं जहाँ से अभ्यर्थी ने शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त शिक्षा संस्थाओं में अभ्यर्थी से सम्बन्धित सामूहिक अभिलेख (Cumulative Records) होते हैं जिनके अवलोकनों से अभ्यर्थी के विषय में काफी जानकारी प्राप्त हो जाती है।
(4) समूह निरीक्षण विधि (Group Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत किसी पद के लिए उपस्थित हुए अभ्यर्थियों के समूह में विभिन्न व्यक्तियों के व्यवहार का निरीक्षण किया जाता है। निरीक्षण के दौरान ध्यान दिया जाता है कि कोई व्यक्ति समूह में किस प्रकार का व्यवहार कर रहा है। इस विधि द्वारा अभ्यर्थियों के नेतृत्व, सामाजिकता, कर्तव्यपरायणता, हास्यप्रियता, ईमानदारी तथा तात्कालिक बुद्धि आदि गुणों का पता करने हेतु सामूहिक निरीक्षण किया जाता है।
(5) शारीरिक परीक्षण (Physical Tests) – अनेक व्यवसायों में कुछ विशेष प्रकार की शारीरिक विशेषताओं व योग्यताओं की जरूरत पड़ती है। जिसके लिए शारीरिक परीक्षण अनिवार्य है। इसके लिए भार ज्ञात करने की मशीन, स्टेथोस्कोप, फीता तथा अन्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। पुलिस विभाग के कर्मचारियों के लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर व रेलवे गार्ड के लिए उत्तम नेत्र-शक्ति आवश्यक है। खदान उद्योग में काम करने वालों की भी शारीरिक जाँच विस्तार से की जाती है, क्योंकि उन्हें अस्वास्थ्यप्रद दर्शाओं में रहकर काम करना होता है।
(6) प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ (Try-out) – इसके अन्तर्गत, यदि अधिकारीगण आवश्यकता महसूस करे तो, अभ्यर्थियों को उस पद या उन मशीनों के साथ काम करने का अवसर दिया जाता है जिन पर उन्हें काम करना है। उनसे आवश्यक पूछताछ व कार्य कराकर भी देखा जा सकता है। इस प्रकार की प्रयोगात्मक वे अन्वेषणात्मक क्रियाओं से अभ्यर्थियों की योग्यता का वास्तविक बोध हो जाता है।
(7) मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Tests) – कर्मचारी की योग्यताओं का मूल्यांकन करने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण हैं। अभ्यर्थियों का बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं को जानने के लिए तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाना चाहिए।
(8) साक्षात्कार (Interview) – कार्य-विश्लेषण की प्रक्रिया में अभ्यर्थियों से सम्बन्धित सूचनाएँ प्राप्त करने के उपरान्त साक्षात्कार द्वारा उनके व्यक्तित्व का पता लगाना चाहिए। अभ्यर्थी को सामने बैठाकर उससे बातचीत करना या प्रश्न पूछना साक्षात्कार कहलाता है। साक्षात्कार के माध्यम से अन्य सूचनाओं के साथ-साथ अभ्यर्थियों का आत्म-विश्वास, तत्परता, आचार-विचार, अनुशासनप्रियता, आत्म-नियन्त्रण, महत्त्वाकांक्षाएँ तथा वेशभूषा आदि का सम्यक् ज्ञान होता है। विद्वानों के मतानुसार साक्षात्कार विधि जितनी ही अधिक विश्वसनीय, वैध तथा वस्तुनिष्ठ होगी, कर्मचारियों का चयन उतना ही अधिक उपयुक्त व प्रामाणिक होगा।

निष्कर्षत: कर्मचारियों के चयन सम्बन्धी प्रक्रिया में व्यवसाय-विश्लेषण तथा कर्मचारी विश्लेषण के माध्यम से जो सूचनाएँ प्राप्त होती हैं उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। जो अभ्यर्थी रिक्त पद के लिए वांछित योग्यताएँ देखते हैं उनका चयन कर लिया जाता है। कर्मचारियों का उपयुक्त चयन किसी भी उद्योग या व्यावसायिक संस्थान की सफलता हेतु एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण कार्य है।

38.

कर्मचारी-विश्लेषण से आप क्या समझते हैं?

Answer»

किसी श्रमिक अथर्वा कर्मचारी की व्यक्तिगत योग्यताओं, क्षमताओं, रुचियों, अभिरुचियों तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी गुणों को जानने की प्रक्रिया को कर्मचारी-विश्लेषण कहते हैं।

39.

What is meant by lifestyle?

Answer»

Whatever a man does from morning to evening, and then, evening till morning-his way of living, his way of working, his actions and behaviour-all constitutes his lifestyle. The work a man does daily, the behaviour and attitude he adopts while doing his works, it becomes his habit, and thus, a mode of leading his life, i.e., lifestyle.

40.

What is the effect of fast/junk food on human health.

Answer»

Impact of Fast/Junk Food on Man’s Health: Today, fast food has become almost a part of man’s daily routine. It has a direct impact on the overall health. Highly processed fast foods contain large amounts of carbohydrates, added sugar, unhealthy fats, and salt. People consume this fast food and get devoid of all essential elements necessary for human development. Fast foods replace healthy eating habits. They also lead to obesity, heart disease, diabetes and other chronic diseases.

41.

What is the effect of Western Culture on Indian Society?

Answer»

Western Culture and Health: Western culture has eroded the Indian values and traditions. Because of which, the families are getting broken. Children are doing their own way. They are not obeying their elders and getting themselves involved in false / unethical activities.

Western culture has also given positive benefits. Those traditions and blind beliefs based on religion and castes have been broken. People have become more progressive in their outlook and modern in their thinking and outlook. It has helped them to pursue a more independent lifestyle.

42.

How far has the use of mobile phones affected man’s life?

Answer»

Effect of mobile phones on health: Mobile phones have become a very important part of our daily lives. Research studies have claimed that mobile phones have a negative impact on the health of an individual. Though mobile phones have made communication very easy but the radiations emitted from these phones are very harmful for man, and the society, as a whole.

43.

औद्योगिक मनोविज्ञान की दो मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Answer»

(i) औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की व्यावहारिक शाखा है।
(ii) यह औद्योगिक जगत से सम्बन्धित मनुष्य के व्यवहार का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन है।

44.

What is meant by traditional lifestyle?

Answer»

Traditional lifestyle, also called as vedic, or mythological lifestyle is one in which man grew and extended himself under the shed of nature’s lap. His eating habits were pure and his desires/needs were less. He studied/worked under nature’s lap and lead his life in spiritualism. He followed traditional rituals and customs and lead a simple, active life.

45.

व्यावहारिक मनोविज्ञान की एक शाखा के रूप में औद्योगिक मनोविज्ञान का महत्त्व है –(क) इसके अध्ययन से औद्योगिक समस्याओं के समाधान में सहायता मिलती है।(ख) कर्मचारियों के उचित चुनाव में सहायता मिलती है।(ग) औद्योगिक क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों को प्रोत्साहन देता है।(घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व

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सही विकल्प है (घ) उपर्युक्त सभी महत्त्व

46.

What are the bad effects of modern lifestyle on health?

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Bad Impact of Modem Lifestyle on Health : Where the man has prospered a lot by adopting the modern lifestyle, many bad impacts have also surrounded him/his health. Now, we shall have a look on the bad effects of modern lifestyle on a man.

Impact of Fast/Junk Food on Man’s Health : Today, fast food has become almost a part of man’s daily routine. It has a direct impact on the overall health. Highly processed fast foods contain large amounts of carbohydrates, added sugar, unhealthy fats, and salt. People consume this fast food and get devoid of all essential elements necessary for human development. Fast foods replace healthy eating habits. They also lead to obesity, heart disease, diabetes and other chronic diseases.

The effects of drug may be poisonous to the human body and can lead to severe health problems. The habit of drug addiction has increased in the recent past in the society which has lead to many physical and mental disorders in man. Besides, it also leads to impotency in males, and infertility (in females).

Effect of mobile phones on health : Mobile phones have become a very important part of our daily lives. Research studies have claimed that mobile phones have a negative impact on the health of an individual. Though mobile phones have made communication very easy but the radiations emitted from these phones are very harmful for man, and the society, as a whole.

47.

औद्योगिक मनोविज्ञान सहायक होता है –(क) उपर्युक्त यन्त्र एवं मशीनें खरीदने में(ख) आर्थिक नियोजन में(ग) अधिक लाभ कमाने में(घ) कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव में

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 (घ) कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव में

48.

विज्ञापन के मुख्य कार्यों का उल्लेख कीजिए।

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⦁    ध्यान आकृष्ट करना
⦁    रुचि उत्पन्न करना
⦁    विश्वास पैदा करना
⦁    स्मृति पर प्रभाव डालना तथा
⦁    क्रय के लिए प्रेरणा।

49.

Describe the factors that have affected modern lifestyle.

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Factors that have affected modern lifestyle :

(i) New discoveries by man : We live in the age of science. People live, move and think in terms of science. Science has entered our life so powerfully. That, it has all together changed our outlook towards life. It has helped man to lead a better life than ever before.

(ii) World globalisation : Today, globalisation of the world has taken a tremendous pace. Political, economic, social and cultural relations are established across international boundaries.

(iii) Means of communication : Means of communication are the necessary part of present life. Use of mobile phones has made communication easier. 

(iv) Education and literature : The importance of literature and education is immense in a person’s life.

(v) Government administration : The government administration has become more effective, in the recent years. New policies, rules have been framed. This have had a direct impact on the lifestyle of an individual, and the society, as a whole.

(vi) Foreign tours and travels : People travel abroad for leisure, recreation, or business purpose. People travel abroad, see new things there, learn new culture, come across different kinds of people. Some of what they learn, they inculcate in their own lives also. So, their lifestyle gets affected.

(vii) Man deviating from a spiritual life : The man, of today, has deviated from a spiritual life. Earlier, in olden times, spirituality was one of the base of human character. But now, he has no time, behind making money. Due to this, he has deviated from a spiritual life.

(viii) More needs and desires of a man : The needs and desires of a man have increased To fulfil those needs, he is running after money.

50.

मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान का संस्थापक कौन था?

Answer»

मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान का संस्थापक फ्रॉयड था।