Explore topic-wise InterviewSolutions in Current Affairs.

This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

श्रमिकों तथा उनके परिवारों की दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाओं को कहा जाता है –(क) श्रमिक संघ के कार्य(ख) आवश्यक कार्य(ग) श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्य(घ) पारिवारिक सहायता

Answer»

सही विकल्प है (ग) श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्य

2.

कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाओं का उल्लेख कीजिए।

Answer»

कार्य-स्थल की मुख्य भौतिक दशाएँ हैं-स्वच्छता, ऊष्मा या ताप, प्रकाश व्यवस्था, वायु का प्रबन्ध, पानी, शौचालय आदि की सुविधा, कार्य के घण्टे तथा यन्त्रों से सुरक्षा।

3.

निम्नलिखित में से कौन निर्देशन प्रक्रिया की विशेषता नहीं है?(क) निर्देशन एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है(ख) निर्देशन समायोजन स्थापित करने की प्रक्रिया है(ग) निर्देशन समस्या समाधान की प्रक्रिया है।(घ) निर्देशन केवल बच्चों को सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया है।

Answer»

(घ) निर्देशन केवल बच्चों को सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया है

4.

निर्देशन से क्या आशय है?

Answer»

किसी भी व्यक्ति को किसी भी समस्या के समाधान के लिए किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दी जाने वाली सहायता को निर्देशन कहते हैं।

5.

निर्देशन की एक सरल एवं स्पष्ट परिभाषा लिखिए।

Answer»

जोन्स के अनुसार, “निर्देशन एक ऐसी व्यक्तिगत सहायता है जो एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को, जीवन के लक्ष्यों को विकसित करने व समायोजन करने और लक्ष्यों की प्राप्ति में आयी हुई समस्याओं को हल करने के लिए प्रदान की जाती है।”

6.

स्कूल अथवा कॉलेज में छात्र-छात्राओं की समस्याओं के समाधान के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है –(क) आवश्यक निर्देशन(ख) अनावश्यक निर्देशन(ग) व्यावसायिक निर्देशन(घ) शैक्षिक निर्देशन

Answer»

सही विकल्प है (घ) शैक्षिक निर्देशन

7.

उद्योग की आन्तरिक व्यवस्था से सम्बन्धित मुख्य श्रम-कल्याण कार्य कौन-कौन से हैं?

Answer»

⦁    वैज्ञानिक भर्ती
⦁    औद्योगिक प्रशिक्षण
⦁    दुर्घटनाओं से रोकथाम
⦁    स्वच्छता, प्रकाश और वायु का प्रबन्ध तथा
⦁    अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना।

8.

टिप्पणी लिखिए-औद्योगिक संघर्ष।

Answer»

औद्योगिकसंघर्ष’ वर्तमान युग में औद्योगिक जगत् की प्रमुख समस्या है। उद्योग की दुनिया में दो वर्ग हैं-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग। यदा-कदा उत्पादन सम्बन्धी तकनीकी या मानव-व्यवहार से सम्बन्धित किन्हीं समस्याओं को लेकर उद्योगपति (मिल मालिक)तथा श्रमिकों (मजदूरों) के बीच संघर्ष की स्थिति आ जाती है। उद्योगपतियों की मनोवृत्ति अपने मजदूरों तथा कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन प्रदान कर अधिकाधिक लाभ अर्जित करने की होती है। इसके विपरीत मजदूरों तथा कर्मचारियों का प्रयास रहता है कि वे अपने कठोर श्रम के बदले जीवन निर्वाह हेतु पर्याप्त वेतन तथा सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—-कार्य के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना तथा बीमारी के लिए। उचित चिकित्सा की व्यवस्था और भत्ता आदि मिल मालिकों से प्राप्त करें। जब उद्योगों तथा व्यावसायिक संस्थानों में मजदूरों के हितों की अनदेखी होती है और कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता तो उद्योगपति एवं श्रमिक वर्ग आमने-सामने आ जाते हैं, जिसके परिणामतः तनाव और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। यह तनाव अक्सर हड़ताल व तालाबन्दी के रूप में प्रकट होता है तथा औद्योगिक क्षेत्र को भीषण समस्याओं व अशान्ति से भर देता है।

इस भाँति, औद्योगिक क्षेत्र से सम्बन्धित श्रमिक एवं उद्योगपति जब अपने-अपने हितों की पूर्ति हेतु संघर्ष के लिए तत्पर होते हैं तो यह स्थिति औद्योगिक संघर्ष कहलाती है। आजकल श्रमिकों में एकता व सहयोग की भावना जाग्रत होने के फलस्वरूप शक्तिशाली श्रमिक-संघ बन गये हैं। श्रमिक-संर्यों का नेतृत्व उद्योगपतियों से अपने अधिकारों व सुविधाओं की माँग करता है। जब उद्योग में मजदूरों की न्यायोचित माँगों की उपेक्षा हो और उन पर काम का दबाव अधिक हो तो समस्त या अधिकांश मजदूर विरोध प्रकट करते हुए काम पर जाना छोड़ देते हैं। वे मिल-मालिकों की नीतियों के विरोध में तथा अपनी माँगों के समर्थन में प्रदर्शन, नारेबाजी, जूलूस, भूख-हड़ताल व आमरण अनशन का सहारा लेते हैं। मजदूर वर्ग की ये सभी गतिविधियाँ ‘हड़ताल के अन्तर्गत आती हैं।

कभी-कभी मिल-मालिक मजदूरों की माँग पूरी नहीं कर पाते (अथवा पूरी करना नहीं चाहते) तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे मिल बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। यह तालाबन्दी है। तालाबन्दी की दशा में मजदूरों या कर्मचारीगणों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है, जिसका वे विरोध करते हैं। हड़ताल और तालाबन्दी औद्योगिक संघर्ष के परिचायक हैं।

9.

निर्देशन-विधि के आधार पर निर्देशन के प्रकारों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

निर्देशन-विधि के आधार पर निर्देशन के दो प्रकार होते हैं –
⦁    वैयक्तिक निर्देशन तथा
⦁    सामूहिक निर्देशन।

10.

निर्देशन की आवश्यकता किस व्यक्ति को होती है?

Answer»

प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में कभी-न-कभी अनिवार्य रूप से निर्देशन की आवश्यकता होती है।

11.

निर्देशन का कार्य सामान्य रूप से किस क्षेत्र के विद्वानों को सौंपा जाता है?

Answer»

निर्देशन का कार्य सामान्य रूप से मनोविज्ञान के क्षेत्र के विद्वानों को सौंपा जाता है।

12.

अनुकूल व्यवसाय के वरण के लिए दिया जाने वाला निर्देशन कहलाता है(क) महत्त्वपूर्ण निर्देशन(ख) अनावश्यक निर्देशन(ग) शैक्षिक निर्देशन(घ) व्यावसायिक निर्देशन

Answer»

सही विकल्प है  (घ) व्यावसायिक निर्देशन

13.

उद्योग में मानवीय सम्बन्धों से क्या आशय है?

Answer»

श्रमिकों अथवा कर्मचारियों के साथ सद्व्यवहार करते हुए उनकी शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक आवश्यकताओं को पूरा करने की दृष्टि से विभिन्न कल्याणकारी कार्यों को लेकर श्रमिकों तथा उद्योगपतियों के मध्य प्रेम तथा श्रद्धा का सम्बन्ध स्थापित होना ही उद्योग में मानवीय सम्बन्ध कहलाता है।

14.

श्रम-कल्याण-कार्यों से क्या आशय है?

Answer»

श्रम-कल्याण से अभिप्राय कर्मचारियों या श्रमिकों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए उद्योग के भीतर और बाहर उद्योगपतियों, शासन तथा श्रम-संगठनों द्वारा किये जाने वाले समस्त प्रयासों अथवा कार्यों से है।

15.

समंकों (Data) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Answer»

समंकों की मुख्य विशेषताएँ सांख्यिकी का सम्बन्ध समंकों से होता है। समंकों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

(1) समंक तथ्यों के समूह होते हैं – इसका अभिप्राय यह है कि किसी एक तथ्य से सम्बन्धित संख्या समंक नहीं कही जा सकती है, क्योंकि एक संख्या से कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिए-यदि किसी विद्यार्थी के हिन्दी में प्राप्तांक 40 हैं तो ये प्राप्तांक समंक नहीं कहे जाएँगे, परन्तु यदि उस कक्षा के समस्त विद्यार्थियों के प्राप्तांक दिये हुए हैं तो इन प्राप्तांकों को समंक कहा जाएगा।
(2) समंक संख्याओं के रूप में व्यक्त किये जाते हैं – सांख्यिकी में संख्याओं के रूप में व्यक्त किये गये तथ्य ही समंक कहलाते हैं, न कि गुणात्मक रूप में व्यक्त किये गये तथ्य उदाहरणार्थ–तथ्यों का गुणात्मक रूप; जैसे तीव्र बुद्धि, सामान्य, मन्द बुद्धि समंक नहीं कहलाएँगे; परन्तु यदि इन तथ्यों को हम संख्यात्मक रूप में व्यक्त कर दें तो वे संख्याएँ समंक कही जाएँगी; जैसे-बुद्धि को संख्यात्मक रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जाता है –
(3) समंकों के संकलन में उचित शुद्धता होनी चाहिए – समंकों के संकलन में उनकी शुद्धता पर काफी ध्यान देना चाहिए। समंकों की शुद्धता की मात्रा अनुसन्धान के क्षेत्र, उद्देश्य, साधन, समय आदि पर निर्भर करती है।
(4) समंकों को एक-दूसरे से सम्बन्धित रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए – इसका तात्पर्य यह है कि समंक सजातीय तथा समरूप होने चाहिए, तभी उनकी आपस में तुलना की जा सकती है। जैसे-यदि हम किसी कक्षा के एक विद्यार्थी के गणित में प्राप्तांक लिख लें और दूसरे विद्यार्थी की आयु लिख लें तो इन संख्याओं को हम समंक नहीं कह सकते; क्योंकि इन्हें एक-दूसरे से सम्बन्धित नहीं किया जा सकता। परन्तु यदि दोनों विद्यार्थियों के गणित में प्राप्तांक या दोनों की आयु ही लिखें तो वे समंक कहलाये जा सकते हैं।
(5) समंकों के संकलन का पूर्व-निश्चित उद्देश्य होता है – वे संख्यात्मक तथ्य ही समंक कहे जाएँगे जिनके संकलन का पूर्व-निश्चित उद्देश्य होता है। बिना उद्देश्य के एकत्रित किये गये आँकड़े समंक नहीं बल्कि केवल संख्याएँ ही कहलाते हैं।
(6) समंक अनेक कारणों से पर्याप्त सीमा तक प्रभावित होते हैं – समंकों पर अनेक कारणों को सामूहिक रूप से प्रभाव पड़ता है। कोई एक घटना किसी एक कारण का परिणाम नहीं होती, अपितु अनेक कारणों से प्रभावित होती है। जैसे-यदि हाईस्कूल की परीक्षा में अधिक विद्यार्थियों की प्रथम श्रेणी है तो प्रथम श्रेणी के अनेक कारण हो सकते हैं। हो सकता है विद्यार्थी अधिक संख्या में प्रतिभावान हों, अधिक परिश्रम से पढ़ते हों, निरीक्षक उदार हों आदि।
(7) सर्मक व्यवस्थित रूप से संकलित होते हैं – समंक एकत्रित करने के लिए एक निश्चित योजना तैयार की जाती है तथा उन आँकड़ों का विश्लेषण करके समुचित तथा तर्कसंगत निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। संगणकों को आँकड़े एकत्रित करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। समंक प्रश्नावली तथा अनुसूची के अनुसार एकत्र किये जाते हैं।
(8) समंकों को गणना या अनुमान द्वारा संकलित किया जाता है – संमकों को गणना अथवा अनुमान द्वारा एकत्रित किया जाता है। यदि अनुसन्धान का क्षेत्र सीमित है तो गणना द्वारा समंकों का संकलन,किया जा सकता है और यदि क्षेत्र विस्तृत है तो अनुमान द्वारा ही समंकों का संकलन सम्भव है।

16.

प्रदत्त (Data) से क्या आशय है?

Answer»

प्रदत्त (Datum) वह तथ्य या सूचना है जिसके आधार पर हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं। किसी परीक्षा में प्राप्तांकों को प्रदत्त कहा जा सकता है। यह परीक्षा उनके व्यवहार के किसी भी पहलू से सम्बन्धित हो सकती है। उदाहरण के लिए-यदि कक्षा बारह के छात्रों की मनोविज्ञान विषय में परीक्षा ली जाये तो परीक्षा में छात्रों को जो प्राप्तांक प्राप्त होंगे उन्हें प्रदत्त कहा जाएगा। प्रयोगों, शोध कार्य या सर्वेक्षणों में जो आँकड़े सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं, उन्हें भी प्रदत्त कहा जाता है। अंग्रेजी में Data शब्द बहुवचन है जबकि Datum शब्द एकवचन।

17.

सांख्यिकी की प्रकृति क्या है?

Answer»

सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों है। इसमें किसी अनुसन्धान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है।

18.

सांख्यिकी की परिभाषा दीजिए।

Answer»

प्रो० सेलिगमैन ने सांख्यिकी की एक स्पष्ट परिभाषा इन शब्दों में प्रतिपादित की है, सांख्यिकी वह विज्ञान है जो किसी भी अनुसन्धान (जाँच) के क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए संख्यात्मक आंकड़ों का संग्रहण, प्रस्तुतीकरण, वर्गीकरण, तुलना तथा निर्वचन की रीतियों का प्रयोग करता है।”

19.

मध्यांक (Median) के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

मध्यांक के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

⦁    सरलता – मध्यांक को ज्ञात करना तथा इसे समझना दोनों ही बहुत आसान हैं।
⦁    चरम मूल्यों से अप्रभावित – मध्यांक के मूल्य पर श्रेणी के सबसे बड़े या छोटे मूल्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
⦁    गुणात्मक विशेषताओं के अध्ययन में उपयोगी – गुणात्मक तथ्य; जैसे-बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, ईमानदारी, गरीबी आदि के निर्धारण में यह अति उपयोगी होता है।
⦁    निश्चितता – मध्यांक का मूल्य बहुलांक की भाँति अस्पष्ट और अनिश्चित नहीं होता है।
⦁    अधूरे समंक से मध्यांक निर्धारण सम्भव है। केवल मध्यांक वर्ग तथा कुछ दूसरी सूचनाएँ मिल जाने पर ही इसको ज्ञात कर सकते हैं। सम्पूर्ण पदमाला की जानकारी जरूरी नहीं।
⦁    इसको बिन्दुरेख विधि से भी ज्ञात कर सकते हैं। निरीक्षण से भी मध्यांक का निर्धारण किया जा सकता है।

20.

मध्यांक के उचित प्रयोग सम्बन्धी कुछ निर्देश दीजिए।

Answer»

मध्यांक के उचित प्रयोग हेतु निम्नलिखित निर्देश दिये जा सकते हैं –

⦁    मध्यांक की गणना असामान्य वितरण की स्थिति में करनी चाहिए जबकि अंक सामग्री का वास्तविक मध्य-बिन्दु पता लगाना हो।
⦁    श्रेणी के शुरू तथा अन्तर के अंक जब मध्यमान को प्रभावित करते हों तब भी मध्यांक की गणना की जाती है। उदाहरणार्थ – 2, 3, 4, 5, 6 का मध्यमान (M) तथा मध्यांक (Md) 4 है। यदि 6 के स्थान पर 11 हो तो मध्यांक 4 ही रहेगा लेकिन मध्यमान 5 हो जाएगा।
⦁    इसकी गणना उस समय की जानी उचित है जबकि अपेक्षाकृत कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की आवश्यकता हो।
⦁    बहुलांक (Mode) की गणना के समय भी मध्यांक ज्ञात किया जाता है।

21.

मध्यसान के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

मध्यमान के मुख्य गुण निम्नलिखित हैं –

⦁    केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों में सर्वाधिक शुद्ध माप मध्यमान है।
⦁    यह सबसे अधिक विश्वसनीय सांख्यिकी है।
⦁    इसकी गणना शीघ्र तथा सरलता से हो जाती है।
⦁    मध्यमान वितरण के प्राप्तांकों का विशुद्ध प्रतिनिधित्व करता है।
⦁    केन्द्रीय प्रवृत्ति की अन्य मापों की अपेक्षा मध्यमान की मदद से तुलना करना अधिक सरल
⦁    प्रामाणिक विचलन तथा सहसम्बन्ध गुणांक जैसी सांख्यिकी गणनाओं में मध्यमान की गणना जरूरी है।

22.

मध्यमान (Mean) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Answer»

मध्यमान में निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं –

⦁    मध्यमान दिये गये वितरण का केन्द्र या सन्तुलन बिन्दु होता है।
⦁    मध्यमान की स्थिति वितरण के प्रत्येक प्राप्तांक से प्रभावित होती है। उदाहरणार्थ—प्राप्तांकों में से किसी प्राप्तांक को घटाने या बढ़ाने पर वितरण का मध्यमान भी घट या बढ़ जाएगा।
⦁    वितरण के सभी प्राप्तांकों को एक निश्चित संख्या से गुणा करने पर मध्यमान का मान उस संख्या के गुणनफल के बराबर हो जाएगा।
⦁    केन्द्रीय प्रवृत्ति के मापों में मध्यमान एक निष्पक्ष (Unbiased) सांख्यिकी है जिसमें मानक त्रुटि (Standard Error) कम होती है।

23.

बहुलांक (Mode) के मुख्य गुणों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

बहुलांक के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं –
⦁    निर्धारण में सरलता—इसको निरीक्षण अर्थात् देखकर भी तय किया जा सकता है।
⦁    बिन्दुरेखीय विधि से भी इसका निर्धारण कर सकते हैं।
⦁    प्रतिनिधित्व-बहुलांक मूल्य श्रेणी का सबसे श्रेष्ठ प्रतिनिधि माना जाता है।
⦁    सीमान्त पदों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
⦁    उद्योग, व्यापार एवं वाणिज्य में इसका बहुत उपयोग होता है। विशेषकर जूते निर्माताओं, सिले-सिलाये वस्त्र तैयार करने वालों आदि के लिए यह बहुत उपयोगी है।

24.

मध्यमान के मुख्य दोषों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कीजिए कि इसका प्रयोग कब उचित होता है?

Answer»

मध्यमान के कुछ दोष ये हैं –
⦁    मुक्त सिरों वाले या अपूर्ण प्राप्तांक वितरण के अन्तर्गत मध्यमान प्रयोग नहीं किया जा सकता।
⦁    इसी प्रकार असामान्य अंक-वितरण के अन्तर्गत भी मध्यमान की जगह मध्यांक का प्रयोग उचित समझा जाता है।

मध्यमान का प्रयोग कब और कहाँ करना उचित है, इसके लिए कुछ निर्देश नीचे दिये जा रहे
⦁    सबसे अधिक शुद्ध एवं विश्वसनीय केन्द्रीय प्रवृत्ति ज्ञात करने हेतु मध्यमान का प्रयोग किया जाता है।
⦁    जब बहुलांक, प्रामाणिक विचलन तथा सहसम्बन्ध आदि की गणना करनी हो, तब भी मध्यमान की गणना आवश्यक होती है।
⦁    सामान्य वितरण (अर्थात् जब दिये गये प्राप्तांकों के सभी अंक समान रूप से वितरित हों) के अन्तर्गत भी मध्यमान प्रयुक्त होती है।
⦁    मध्यमान की गणना तुलनात्मक अध्ययन के समय भी आवश्यक होती है।

25.

बहुलांक (Mode) का प्रयोग किन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए?

Answer»

बहुलांक का प्रयोग निम्नलिखित परिस्थितियों में करना वांछित है –

⦁    सबसे कम शुद्ध केन्द्रीय प्रवृत्ति के मान की गणना के समय बहुलांक का प्रयोग उचित है।
⦁    यदि निरीक्षण-मात्र से ही केन्द्रीय प्रवृत्ति की गणना करनी हो तो बहुलक उपयोगी है।
⦁    वितरण के कुछ वर्ग या अंक छूटे होने पर भी बहुलांक का प्रयोग उचित है।
⦁    व्यापार में अधिक प्रचलित वस्तु या लोकप्रिय फैशन से जुड़ी समस्या के अध्ययन में बहुलांक का सर्वाधिक प्रयोग होता है।

26.

सारणीयन की परिभाषा लिखिए।

Answer»

कॉनर के अनुसार, “सारणीयन किसी विचाराधीन समस्या को स्पष्ट करने के उद्देश्य से किया जाने वाला सांख्यिकी तथ्यों का क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित प्रस्तुतीकरण है।’

27.

सांख्यिकी के विषय में वॉलिस और “रॉबर्टस का दृष्टिकोण क्या है?

Answer»

बॉलिस और रॉबर्ट्स के अनुसार, “सांख्यिकी स्वतन्त्र और मूलभूत ज्ञान का समूह नहीं है अपितु ज्ञान-प्राप्ति की रीतियों का समूह है।”

28.

बहुलांक (Mode) के मुख्य दोषों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

बहुलांक के मुख्य दोष निम्नलिखित हैं –

⦁    समान आवृत्तियाँ होने पर इसका निर्धारण कठिन हो जाता है।
⦁    सीमान्त मूल्यों की अवहेलना होती है।
⦁    बीजगणितीय विश्लेषण सम्भव नहीं है।
⦁    श्रेणी के सभी पदों पर आधारित नहीं होता है।
⦁    श्रेणी में कभी-कभी बहुलांक भ्रमात्मक होता है।

29.

सांख्यिकी में प्रसार क्या है?-एक उदाहरण दीजिए।

Answer»

सांख्यिकी में प्राप्तांकों में परिवर्तनशीलता की मापों को ज्ञात किया जाता है। परिवर्तनशीलता की एक माप को प्रसार (Range) कहा जाता है। यह परिवर्तनशीलता की एक स्थल माप है। जब किसी अध्ययन के दौरान अध्ययनकर्ता के पास कम समय होता है तथा वह प्राप्तांकों के विवरण की परिवर्तनशीलता को जानना चाहता है तो उस स्थिति में विवरण के प्रसार को ज्ञात करने का प्रयास किया जाता है। नियमानुसार प्रसार को निम्नलिखित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है –
प्रसार (Range)= (उच्चतम प्राप्तांक-न्यूनतम प्राप्तांक) +1
उदाहरण-उच्चतम प्राप्तांक 80, न्यूनतम प्राप्तांक 5
प्रसार = (80 – 5) + 1 = 76

30.

विद्यार्थियों को निर्देशन और परामर्श देने हेतु इलाहाबाद में मनोविज्ञानशाला की स्थापना की गई थी(क) सन् 1935 में(ख) सन् 1947 में(ग) सन् 1953 में(घ) सन् 1966 में

Answer»

सही विकल्प है (ख) 1947 में

31.

सांख्यिकीय श्रेणी की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।

Answer»

कॉनर के अनुसार, “जब दो चल-राशियों के मूल्यों को साथ-साथ इस भाँति व्यवस्थित किया जाये कि एक मापनीय अन्तर दूसरे के मापनीय अन्तर का सहगामी हो तो इस प्रकार से प्राप्त पदमाला को सांख्यिकीय श्रेणी कहते हैं।”

32.

प्राप्तांकों को समूहबद्ध करने की विधियाँ कौन-कौन सी हैं?

Answer»

(क) समावेशी विधि
(ख) शुद्ध वर्गीकृत श्रृंखला विधि तथा
(ग) अपवर्जी विधि।

33.

वर्गीकरण की एक व्यवस्थित परिभाषा लिखिए।

Answer»

कॉनर के अनुसार, “वर्गीकरण तथ्यों को उनकी विशेषताओं अथवा गुणों के आधार पर समूह एवं वर्गों में क्रमबद्ध करने की एक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य विभिन्नताओं के बीच समान तथ्यों को खोजकर एक साथ रखना है।”

34.

क्या निर्देशक सम्बन्धित व्यक्ति की समस्या को स्वयं सुलझाता है तथा उसका आवश्यक कार्य करता है?

Answer»

नहीं, निर्देशक न तो सम्बन्धित व्यक्ति की समस्या को स्वयं सुलझाता है और न ही उसका कोई आवश्यक कार्य करता है।

35.

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप लिखिए।

Answer»

⦁    मध्यमान, (Mean)
⦁    मध्यांक (Median) तथा
⦁    बहुलांक (Mode)

36.

सांख्यिकीय श्रेणियों के मुख्य प्रकारों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

(क) व्यक्तिगत श्रेणी
(ख) असतत या खण्डित या, विच्छिन्न श्रेणी तंथा
(ग) सतत या अखण्डित या अविच्छिन श्रेणी।

37.

उत्तर प्रदेश में गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा होने वाले निर्देशन कार्य का उल्लेख कीजिए।

Answer»

उत्तर प्रदेश में सरकारी संस्थाओं के अतिरिक्त अन्य विभागों, गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा भी निर्देशन किया जाता है। प्रदेश में श्रम विभाग की तरफ से लखनऊ, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ तथा कानपुर में रोजगार कार्यालयों के अन्तर्गत व्यावसायिक निर्देशन विभाग स्थापित किये गये हैं जिनके द्वारा प्रतिवर्ष हजारों बालक-बालिकाओं को व्यावसायिक परामर्श प्रदान किया जाता है। राज्य के समाज कल्याण विभाग की ओर से आगरा व बनारस में शिशु निर्देशन केन्द्र कार्य कर रहे हैं जिनमें शिशुओं को निर्देशन दिया जाता है। व्यावसायिक निर्देशन कार्य में समन्वय स्थापित करने की दृष्टि से प्रान्तीय समन्वय समिति तथा युवक सेवायोजन सलाहकार समिति का निर्माण किया गया है। इसके अतिरिक्त, लखनऊ विश्वविद्यालय तथा बी० आर० कॉलेज, आगरा में भी मनोवैज्ञानिक निर्देशन एवं परामर्श के साथ मनोवैज्ञानिक परीक्षा तथा अनुसन्धान सम्बन्धी कार्य किया जाता है। इस भाँति, उत्तर प्रदेश में शैक्षिक व्यावसायिक निर्देशन का कार्य राज्य, मण्डल तथा विद्यालयी स्तर से लेकर केन्द्र तक विस्तृत है।

38.

विद्यालय स्तर पर निर्देशक के कार्य हैं –(क) निर्देशन कार्य(ख) शिक्षण कार्य(ग) अनुसन्धान में सहायता(घ) ये सभी कार्य

Answer»

सही विकल्प है  (घ) ये सभी कार्य

39.

मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश निर्मित/संशोधित मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

मनोविज्ञानशाला उत्तर प्रदेश द्वारा निर्मित/संशोधित मुख्य मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का विवरण निम्नलिखित है –

⦁    शाब्दिक सामूहिक परीक्षण (वर्ष 12 +, 13+, 14 +, तथा वयस्कों के लिए-चार)।
⦁    अशाब्दिक सामूहिक परीक्षण–पाँच।
⦁    व्यक्तित्व परीक्षण (WAT, TAT’ एवं Rorscharch)-तीन।
⦁    व्यक्तित्व पत्री।
⦁    स्टैनफोर्ड बुद्धि परीक्षण का भारतीयकरण।
⦁    उपलब्धि परीक्षण हिन्दी में (कक्षा 8 व कक्षा 10 के लिए)।
⦁    व्यावसायिक रुचि प्रपत्र।
⦁    यान्त्रिक अभिरुचि परीक्षण–एक।
⦁    ट्वीजर यथार्थता व स्थिर परीक्षण–एक।
⦁    डेटरॉय शारीरिक सामर्थ्य परीक्षण–तीन (अनुकूलित)
नवीन परीक्षण ये हैं – (1) सोहनलाल बुद्धि परीक्षण (11 + के लिए), (2) भाटिया बैट्री क्रियात्मक बुद्धि परीक्षण, (3) शाब्दिक सामूहिक बुद्धि परीक्षण (कक्षा 8 के लिए) तथा (4) गणित व अंग्रेजी में सामूहिक उपलब्धि परीक्षण।

40.

सांख्यिकीय माध्य या औसत से क्या आशय है?

Answer»

वह संख्या, जो किसी समूह-विशेष के सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती है, उस समूह का सांख्यिकी माध्य या औसत कहलाती है।

41.

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप से क्या आशय है। केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप के मुख्य उद्देश्य का भी उल्लेख कीजिए।याकेन्द्रीय प्रवृत्ति की माप से आप क्या समझते हैं?

Answer»

समंकों की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को स्पष्ट करने के लिए सांख्यिकीय विश्लेषण में केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) की माप का महत्त्वपूर्ण स्थान है। समंकों के वर्गीकरण तथा सारणीयन से समंक सरल, सुबोध, व्यवस्थित तथा तुलनीय तो बन जाते हैं किन्तु इससे उनकी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ प्रकट नहीं होतीं; अत: एक ऐसी विधि की आवश्यकता है जिसके द्वारा एक ही संख्या से सभी संगृहीत आँकड़ों को प्रतिनिधित्व कराया जा सके। इसके लिए केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्यमों का अध्ययन आवश्यक है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप : अर्थ (Definitions of Measures of Central Tendency or Average)
संगृहीत आँकड़ों के मध्य ऐसी संख्या, जो सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती हो, तो न तो समूह की न्यूनतम मान वाली संख्या होगी और न ही अधिकतम मान वाली। अवश्य ही, वह संख्या समूह के मध्य या उसके आस-पास की संख्या होगी। अत; आँकड़ों में से किस एक आँकड़े के पास पाये जाने की उनकी प्रवृत्ति को केन्द्रीय प्रवृत्ति (Central Tendency) कहा जाता है तथा इस माध्य या औसत को केन्द्रीय माप या केन्द्रीय प्रवृत्ति की मान कहते हैं।

इस भाँति केन्द्रीय प्रवृत्ति से तात्पर्य उस मान से है जो प्राप्त आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करता है। अर्थात् वह मान जो प्राप्त आँकड़ों में सबसे अधिक बार आया हो। साधारणत: केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों से हमारा अर्थ ‘सांख्यिकीय माध्य’ या ‘औसत (Average) से होता है; क्योंकि सांख्यिकी माध्यम के आस-पास सभी आँकड़े वितरित होते हैं।

वह संख्या, जो किसी समूह-विशेष के सभी आँकड़ों का प्रतिनिधित्व करती है, उस समूह का सांख्यिकीय माध्य से औसत कहलाती है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य की परिभाषाएँ (Definitions of Measures of Central Tendency or Average)
सांख्यिकीय माध्य या केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप की प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) सिम्पसन और काक्का के अनुसार, “केन्द्रीय प्रवृत्ति का माप एक ऐसा प्रतिरूपी मूल्य है। जिसकी ओर अन्य संख्याएँ केन्द्रित होती हैं।”

(2) क्लार्क और शकाडे के मत में, “माध्ये सम्पूर्ण समंक समूह का विवरण देने वाली एकमात्र संख्या प्राप्त करने का प्रयत्न है।”

(3) क्रॉक्सटन और काउडेन के मतानुसार, “माध्य समंकों के विस्तार के अन्तर्गत स्थित एक ऐसा पद है। जिसका प्रयोग श्रेणी के सभी पदों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किया जाता है। समंक माला के विस्तार के अन्तर्गत स्थित होने के कारण माध्य को कभी-कभी केन्द्रीय मूल्य का माप भी कहा जाता है।

समंक माला के कुछ पद (मूल्य) माध्य से छोटे तथा कुछ मूल्य बड़े होते हैं; अत: माध्य समंक श्रेणी की केन्द्रीय प्रवृत्ति को प्रदर्शित करता है। अन्त में कह सकते हैं कि माध्य समंक श्रेणी का मध्य मूल्य होता है जो श्रेणी की बनावट वे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं को बतलाता है।

केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य के उद्देश्य (Objectives of Averages)
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या औसत या सांख्यिकीय माध्य के महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निम्नलिखित है।

(1) जटिल तथ्यों को सरल रूप में प्रस्तुत करना – जिससे वे आसानी से समझ में आ सकें।
(2) विस्तृत तथ्यों को संक्षिप्तता प्रदान करना – माध्य तथ्यों के विशाल समूह को एक संख्या के रूप में प्रस्तुत कर देता है। इससे विशाल समूह की जानकारी प्राप्त हो जाती हैं। मोरेनो के अनुसार, माध्य का उद्देश्य व्यक्तिगत मूल्यों के समूह का सरल और संक्षिप्त रूप में प्रतिनिधित्व करना है। जिससे मस्तिष्क समूह की इकाइयों के सामान्य आकार को असानी से समझ सके।”
(3) समग्र की रचना तथा विशेषताओं की जानकारी प्रदान करना – माध्य के द्वारा सारे समूह की सामान्य बनावट (रचना) की जानकारी मिल जाती है। सम्पूर्ण समूह की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं तथा गुणों की जानकारी भी मिलती है।
(4) तुलना में सहायता – माध्यों के द्वारा दो या दो से अधिक समूहों, प्रदेशों के कुछ खास लक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन कर सकते हैं। दो कक्षा के छात्रों के माध्य से उनके भार या ऊँचाई की जानकारी मिल जाती है।
(5) मार्गदर्शक के रूप में कार्य करना – सांख्यिकीय माध्यम मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। माध्य की जानकारी से समूह के विकास सम्बन्धी नीतियों के निर्धारण में सहायता मिलती है।
(6) सांख्यिकीय विश्लेषण का आधार – माध्यम विभिन्न वर्गों में गणितीय सम्बन्ध स्थापित करता है। माध्य से विभिन्न समूहों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है।
(7) माध्य बहुत बड़े समूह या वार्ड के प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया करता है।
अन्त में कह सकते हैं कि माध्यों का विश्लेषण में महत्त्वपूर्ण स्थान है। डॉ० बाउले के शब्दों में, “माध्य का उद्देश्य जटिल समूहों तथा विशाल क्रियाओं को कुछ महत्त्वपूर्ण शब्दों में या संख्याओं में प्रस्तुत करना है।”

42.

अनुवर्ती अनुशीलन की विधियों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

निर्देशन की प्रक्रिया में अनुवर्ती अनुशीलन का विशेष महत्त्व होता है। अनुवर्ती अनुशीलन द्वारा ही निर्देशन की सफलता/असफलता की जानकारी प्राप्त होती है। अनुवर्ती अनुशीलन के लिए अपनायी जाने वाली मुख्य विधियाँ हैं –

⦁    परामर्श प्राप्त करने वाले व्यक्ति से पत्रों द्वारा सम्पर्क स्थापित करना
⦁    व्यक्ति को सरल एवं स्पष्ट भाषा में तैयार की गयी प्रश्नावली भेजना
⦁    व्यक्ति के सम्बन्ध में एक कार्ड-फाइल बनाना तथा
⦁    टेलीफोन के माध्यम से विचार-विनिमय करना।

43.

मनोविज्ञानशाला द्वारा किये जाने वाले कार्य हैं –(क) निर्देशने कार्य(ख) प्रशिक्षण कार्य(ग) अनुसन्धान एवं प्रकाशन कार्य(घ) ये सभी कार्य

Answer»

सही विकल्प है (घ) ये सभी कार्य

44.

मध्यांक (Median) के मुख्य दोषों या सीमाओं का उल्लेख कीजिए।

Answer»

मध्यांक के मुख्य दोष या सीमाएँ निम्नलिखित हैं –

⦁    सीमान्त मूल्यों की उपेक्षा – सामान्यत: मध्यांक निर्धारण में श्रेणी के सीमान्त पदों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस तरह मध्यांक में सभी पदों को समान महत्त्व नहीं देते हैं।
⦁    आवश्यक क्रियाएँ – श्रेणी को आरोही या अवरोही आधार पर व्यवस्थित करने का कार्य अनिवार्य रूप से करमा पड़ता है।
⦁    निर्धारण में कठिनाई – यदि मध्य पद दो मूल्यों के बीच आता है, तब मध्यांक मूल्य बिल्कुल ठीक नहीं होता है। केन्द्रीय मूल्यों के औसत को मध्यांक लिया जाता है। इसी तरह सतत श्रेणी में भी यह इस मान्यता पर आधारित है कि प्रत्येक वर्ग में आवृत्तियाँ समान हैं।
⦁    कभी-कभी मध्यांक एक प्रतिनिधि माप नहीं होता है विशेषकर पदों की संख्या कम होने पर।
⦁    मध्यांक बीजगणितीय विवेचन में अनुपयोगी रहता है। मध्यांक मूल्य को पदों की संख्या से गुणा करने पर पदों के मूल्यों का योग मालूम नहीं कर सकते हैं।

45.

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की सीमाओं या दोषों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की सीमाएँ या दोष
केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप या सांख्यिकीय माध्य की प्रमुख सीमाएँ या दोष निम्नलिखित हैं –

⦁    सांख्यिकीय माध्य से सिर्फ समूह के गुणों, कार्यों तथा विशेषताओं को ही समझा जा सकता है, ये व्यक्तिगत विशेषताओं का वर्णन नहीं करते।
⦁    यदि समूह के गुणों, कार्यों तथा विशेषताओं में विषमता पायी जाये तो उस दशा में सांख्यिकी माध्य समूह की प्रतिनिधित्व नहीं करते, जिसका परिणाम यह होता है कि उच्च सांख्यिकीय विश्लेषण के दौरन दूषित और भ्रामक निष्कर्ष निकलते हैं।
⦁    अलग-अलग तरह के सांख्यिकी विश्लेषण में सांख्यिकीय माध्य के अलग-अलग मापक भिन्न परिणाम प्रस्तुत करते हैं।

46.

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकी माध्य की प्रमुख विशेषताओं एवं गुणों का उल्लेख कीजिए।

Answer»

केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों या सांख्यिकीय माध्य की प्रमुख विशेषताएँ एवं गुण
‘केन्द्रीय प्रवृत्ति की मापों का आदर्श माध्य में निम्नलिखित विशेषताएँ तथा गुण अनिवार्य रूप से होने चाहिए –

(1) सरल – एक अच्छी माध्य वही हो सकता है जो समझने तथा गणना करने में सरल हो। इससे उसका उपयोग व्यापक रूप में किया जा सकती है।
(2) स्पष्टता और निश्चितता – माध्य की परिभाषा स्पष्ट होनी चाहिए। उसकी कितनी ही बार गणना की जाये, उसका मान हमेशा ही समान आना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता के अनुमान की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए। परिभाषा में भिन्न-भिन्न अर्थ न निकले।।
(3) प्रतिनिधित्व – माध्य ऐसा होना चाहिए कि समंक माला अर्थात् समूह के प्रमुख-प्रमुख लक्षण उसमें दिखाई दें। समग्र के प्रत्येक पद में उसके निकट रहने की प्रवृत्ति दिखलाई दे।
(4) बीजगणितीय क्रियाओं के योग्य – माध्य ऐसा हो कि उससे बीजगणितीय क्रियाएँ अर्थात् । जोड़, बाकी, गुणा एवं भाग आसानी से की जा सकें।
(5) माध्ये एक निरपेक्ष संख्या होनी चाहिए – माध्यम समंक माला की संख्याओं में हो,.न कि प्रतिशत या दूसरे सापेक्ष रूप में।
(6) न्यादर्श में परिवर्तन से माध्य बहुत कम प्रभावित हो। न्यादर्श के बदल जाने से माध्य में परिवर्तन न हो या क-से-कम हो। समग्र में से एक तरीके से अनेक न्यादर्श चुने जाये जिनके माध्य लगभग समान हों।
(7) समंक माला के सभी पदों पर आधारित होना चाहिए – माध्य किसी एक पद पर आधारित न हो, तभी माध्य समग्र का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
(8) माध्ये सीमान्त पदों से अधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए, वह सभी पदों पर आधारित हो।

47.

सांख्यिकी की किन्हीं दो विशेषताओं के बारे में लिखिए।

Answer»

⦁    सांख्यिकी विज्ञान तथा कला दोनों है।
⦁    सांख्यिकी में किसी अनुसंधान क्षेत्र से सम्बन्धित सामूहिक संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, प्रदर्शन, विश्लेषण तथा निर्वचन की रीतियों का विधिवत् अध्ययन किया जाता है।

48.

एक विज्ञान के रूप में सांख्यिकी की उचित परिभाषा लिखिए।

Answer»

लाविट के अनुसार, “सांख्यिकी वह विज्ञान है जो संख्यात्मक तथ्यों के संग्रह, वर्गीकरण तथा सारणीयन से सम्बन्ध रखता है, जिससे उन्हें घटनाओं की व्याख्या, विवरण और तुलना के लिए प्रयुक्त किया जा सके।

49.

सांख्यिकी की सीमाओं की विवेचना कीजिए।या“सांख्यिकीय विधियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकती है।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।

Answer»

सांख्यिकी की सीमाएँ (Limitations of Statistics)
सांख्यिकी एक लाभप्रद विज्ञान है। यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को स्पर्श करता है। सामाजिक विज्ञान शिक्षा तथा मनोविज्ञान में सांख्यिकी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। कृषि, नियोजन, अर्थशास्त्र, राजस्व, राजनीतिशास्त्र आदि में भी इसका भरपूर प्रयोग होता है, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि सांख्यिकी की कोई सीमाएँ (कमियाँ) ही नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि सांख्यिकी जितना लाभदायक विज्ञान है, उतना ही यह ख़तरनाक भी है। इसका प्रयोग बहुत ही सोच-विचारकर, सावधानीपूर्वक तथा विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि सांख्यिकी का प्रयोग अकुशल व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तो यह बहुत हानिप्रद सिद्ध हो सकता है। इसकी सीमाओं पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। सांख्यिकी की प्रमुख सीमाएँ इस प्रकार हैं –

(1) सांख्यिकी केवल संख्यात्मक तथ्यों का अध्ययन करती है, न कि गुणात्मक तथ्यों का – सांख्यिकी की यह महत्त्वपूर्ण कमजोरी है। यह मानव-जीवन के केवल उसी पहलू का अध्ययन करती है जिसे संख्याओं द्वारा प्रस्तुत किया जा सके; जैसे-ऊँचाई, आयु, भार तथा आय आदि। जीवन के गुणात्मक पक्ष; जैसे—सुन्दरता, भावना, दुष्टता, बुद्धिमत्ता, कुटिलता आदि का अध्ययन सांख्यिकी द्वारा नहीं कर सकते हैं। गुणात्मक पहलू को संख्याओं में व्यक्त करके अप्रत्यक्ष रूप में अध्ययन कर सकते हैं। बुद्धिमत्ता का माप अनुमानित संख्याओं द्वारा व्यक्त कर सकते हैं, प्रत्यक्ष रूप में नहीं।
(2) सांख्यिकीय समंक सजातीय और एकरूप होने चाहिए – सांख्यिकी में विजातीय तथ्यों का अध्ययन नहीं किया जा सकता, सांख्यिकीय विधियों द्वारा समंकों की तुलना तभी सम्भव है जबकि वे सजातीय हों तथा उनमें एकरूपता पायी जाये।
(3) सांख्यिकी समूह का अध्ययन करती है, न कि व्यक्ति को प्रो० नीजवैगर के अनुसार, सांख्यिकी के निष्कर्ष समूह के सामूहिक व्यवहार का अनुमान करने में सहायक होते हैं, उस समूह की व्यक्तिगत इकाइयों फ़ा नहीं।” सांख्यिकी व्यक्तिगत इकाई की विशेषता पर ध्यान न देकर सामूहिक विशेषता या औसत पर ध्यान देती है। सांख्यिकी के परिणाम समूह से जुड़े होते हैं, न कि व्यक्ति से। किसी कक्षा के प्राप्तांकों का औसत यह नहीं बताता कि अमुक विद्यार्थी के प्राप्तांक उतने ही होंगे।
(4) बिना सन्दर्भ के सांख्यिकी के परिणाम असत्य और भ्रामक होते हैं – समस्या के बिना सन्दर्भ और पूर्ण जानकारी के सांख्यिकीय परिणाम भ्रामक और असत्य मालूम होते हैं। कुछ समंकों से प्राप्त निष्कर्ष किसी भी विषय पर तब तक लागू नहीं किये जा सकते जब तक कि परिस्थिति, सन्दर्भ व समस्या की पूर्ण जानकारी न हो।
(5) सांख्यिकी के प्रयोग के लिए सांख्यिकीय विधियों की जानकारी आवश्यक – सांख्यिकी विज्ञान की यह एक गम्भीर सीमा है कि इसके सही उपयोग करने के लिए सांख्यिकीय विधियों की पूर्ण व सही जानकारी अति आवश्यक है। जो व्यक्ति सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग की पूर्ण जानकारी नहीं रखते हैं, उनके द्वारा इनके प्रयोग से लाभ के स्थान पर नुकसान ही होता है। यूल और केण्डाल ने तो यहाँ तक कहा है, “अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में सांख्यिकीय विधियाँ खतरनाक औजार हैं।”
(6) सांख्यिकी के परिणाम दीर्घकाल में तथा औसत रूप में सही होते हैं – प्राकृतिक विज्ञानों; जैसे-रसायनशास्त्र, भौतिकशास्त्र आदि के नियम और परिणाम सार्वभौमिक तथा सार्वकालिक होते हैं। ये अल्पकाल तथा दीर्घकाल सभी कालों में लागू होते हैं, परन्तु सांख्यिकी के परिणाम केवले दीर्घकाल में ही सही निकलते हैं तथा वे एक औसत प्रवृत्ति के परिचायक होते हैं। उनमें छोटे-छोटे उच्चावचन एवं कमियाँ विद्यमान रहती हैं। सांखियकी के नियम सम्भावना सिद्धान्त पर आधारित होते हैं। जिसके अनुसार यदि किसी सिक्के को 20 बार उछालें तो सम्भावना यह है कि 10 बार चित (Head) तथा 10 बार पट (Tail) आएगा; किन्तु ‘यथार्थ में हो सकता है 14 बार चित व 6 बार पट आये।
(7) सांख्यिकी एक साधन है, साध्य नहीं – सांख्यिकी का प्रमुख कार्य समस्या से सम्बन्धित आँकड़े एकत्रित कर उन्हें वर्गीकृत करके सारणीयन तथा रेखाचित्रों द्वारा प्रस्तुत करना है। बाउले के मत में सांख्यिकी का काम परिणाम या निष्कर्ष निकालना नहीं है। यदि सांख्यिकी परिणाम निकालेगी। भी, तो वे निष्पक्ष नहीं होंगे। परन्तु कुछ दूसरे सांख्यिकीवेत्ता यह मानते हैं कि बिना परिणाम के सांख्यिकी अनुपयोगी होगी; अतः निष्कर्ष रूप में यह कह सकते हैं कि समंकों के एकत्रीकरण में पूर्ण सावधानी रखकर तटस्थ रूप में उनका प्रयोग करना चाहिए। अनुसन्धानकर्ता के तटस्थ न रहने पर। परिणाम गलत और हानिकारक हो सकते हैं; अतः सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग साधन के रूप में बुद्धिमानीपूर्वक करना चाहिए।
(8) सांख्यिकीय विधि अनुसन्धान की एकमात्र विधि नहीं है – समस्याओं के अनुसन्धान की अनेक विधियाँ हैं, सांख्यिकीय विधि उन अनेक विधियों में से एक हैं। अत: सांख्यिकी से प्राप्त परिणामों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि अनुसन्धान की दूसरी विधियों से परिणामों की पुनः जाँच न कर ली जाए।

अंत में यह कह सकते हैं कि सांख्यिकीय विधियों के प्रयोग में पूर्ण सावधानी रखनी चाहिए। उपर्युक्त सीमाओं को ध्यान में रखकर निष्कर्ष निकालने चाहिए, अन्यथा इसके परिणाम भ्रामक और हानिकारक हो सकते हैं। यही कारण है कि यूल और केण्डाल यह कहने पर मजबूर हुए हैं कि सांख्यिकीय गीतियाँ अयोग्य व्यक्तियों के हाथों में खतरनाक औजार हो सकते हैं।

50.

निर्देश की प्रक्रिया के अन्तर्गत तैयार किये गये परिपाश्र्व-चित्र की रूपरेखा का उल्लेख कीजिए।

Answer»

निर्देशन की प्रक्रिया के अन्तर्गत विभिन्न स्रोतों एवं उपायों द्वारा आवश्यक तथ्यों को अर्जित किया जाता है तथा निर्देशन को अधिक उपयोग बनाने के लिए परिपार्श्व-चित्र तैयार किया जाता है। इस प्रकार परिपार्श्व-चित्र की रूपरेखा के अन्तर्गत अपनाये गये तथ्य इस प्रकार होते हैं-

⦁    शारीरिक विवरण
⦁    पारिवारिक विवरण
⦁    पात्र के सामाजिक विकास का इतिहास
⦁    विद्यालयी जीवन का इतिहास
⦁    मानसिक योग्यताएँ तथा
⦁    व्यक्तित्व के गुण।