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औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) से आप क्या समझते हैं? अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा परिभाषा निर्धारित कीजिए। औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान के महत्त्व एवं उपयोगिता को भी स्पष्ट कीजिए।

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भूमिका (Introduction)
आधुनिक विश्व तेजी से औद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में मनुष्यों के व्यवहार की जटिलताओं ने मनोविज्ञान का अध्ययन अपनी ओर आकर्षित किया। उद्योग-धन्धों से। सम्बन्धित तथा इन क्षेत्रों में निवास करने वाले व्यक्तियों का व्यवहार समाज के अन्य क्षेत्रों के निवासियों के व्यवहार से कुछ भिन्न पाया जाता है तथा उनकी समस्याएँ भी कुछ अलग प्रकार की हो जाती हैं। उद्योग से जुड़े लोगों की समस्याओं का अध्ययन करने एवं उनका उचित समाधान ढूंढ़ने के प्रयास ने ‘औद्योगिक मनोविज्ञान (Industrial Psychology) को जन्म दिया। कालान्तर में मनोविज्ञान ने उद्योग के क्षेत्र में एक विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया है।

औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ (Meaning of Industrial Psychology)
‘औद्योगिक मनोविज्ञान’ एक संयुक्त शब्द है जो दो शब्दों से मिलकर बना है : ‘उद्योग + मनोविज्ञान’ अर्थात् उद्योग जगत से सम्बन्धित मनोविज्ञान। दूसरे शब्दों में, औद्योगिक मनोविज्ञान, व्यावहारिक मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें उद्योग सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए मनोविज्ञान की सहायता ली जाती है। श्रमिकों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना, उनके आवास, स्वास्थ्य व उनके बच्चों की शिक्षा का समुचित प्रबन्ध करना आदि बातों को लेकर मनोविज्ञान ने उद्योग में कदम रखा। मनोविज्ञान में विभिन्न श्रमिक समस्याओं; यथा-कार्य विश्लेषण, कार्य और विश्राम का समय निर्धारण, थकान का प्रभाव, कुशल कार्य और गति तथा मालिक-मजदूर सम्बन्ध आदि से सम्बन्धित अनुसन्धान कार्य भी हुए। स्पष्टत: उद्योग, उसके कर्मचारियों तथा मालिकों के मानवीय व्यवहार व सम्बन्धों को लेकर जो भी समस्याएँ और तनावपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न हुईं, उनका निदान तथा समाधान मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में असम्भव था। मनोवैज्ञानिकों के सत्प्रयासों से लघु और बड़े सभी उद्योगों में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हुआ। यह सम्पूर्ण विवेचन औद्योगिक मनोविज्ञान के अर्थ को अभिप्रकाशित एवं स्पष्ट करता है।

औद्योगिक मनोविज्ञान की परिभाषा (Definition of Industrial Psychology)
विभिन्न विद्वानों ने औद्योगिक मनोविज्ञान की अनेक परिभाषाएँ दी हैं। प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं –

(1) हैरल के अनसार, “औद्योगिक मनोविज्ञान उद्योग और व्यवसाय में लगे लोगों का अध्ययन हैं,
(2) ब्लम के मतानुसार, “मानवीय औद्योगिक समस्याओं से सम्बन्धित मनोवैज्ञानिक तथ्यों और सिद्धान्तों का विस्तारपूर्वक अध्ययन ही औद्योगिक मनोविज्ञान है।’
(3) स्मिथ के शब्दों में, “व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए औद्योगिक मनोविज्ञान को उन लोगों के व्यवहार का अध्ययन केहकर परिभाषित किया जा सकता है जो अपने मस्तिष्क तथा हाथ के कार्य को जीविका कमाने के लिए अनिवार्य वस्तुओं में बदल लेते हैं।”

उपर्युक्त विवरण के आधार पर औद्योगिक मनोविज्ञान का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि ‘औद्योगिक मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध मनोविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष से है।” औद्योगिक मनोविज्ञान के अन्तर्गत मुख्य रूप से औद्योगिक एवं व्यावसायिक पर्यावरण में होने वाले मानवीय व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। औद्योगिक मनोविज्ञान सम्बन्धित क्षेत्र की समस्याओं के लक्षणों, कारणों एवं समाधान के उपायों का भी अध्ययन करता है।

औद्योगिक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व (Need and Importance of Psychology in the Field of Industry)
मानव-व्यवहार और स्वभाव से प्रभावित जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता महसूस की गयी है और इसके महत्त्व में वृद्धि हुई है। औद्योगिक जगत की समस्याएँ न्यूनाधिक रूप से मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ हैं, जिसे मनोविज्ञान के अन्तर्गत मानवीय अध्ययन द्वारा ही सुलझाया जा सकता है। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्त्व एवं प्रकार वर्णित है –

(1) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान की आवश्यकता – आधुनिक समय में नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के फलस्वरूप उद्योग-धन्धों का अत्यधिक विकास हुआ है। बड़ी-बड़ी मिलों, कारखानों तथा फैक्ट्रियों में, जहाँ सैकड़ों-हजारों कर्मचारी श्रम में जुटे हों, नाना प्रकार की समस्याओं का प्रादुर्भाव निश्चित है। इन समस्याओं में भौतिक दशाओं से सम्बन्धित समस्याओं के अतिरिक्त बहुत सारी मानवीय सम्बन्धों की समस्याएँ भी होती हैं। ये समस्याएँ मानवीय अध्ययन द्वारा ही हल की जा सकती है; अत: उद्योग के क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने के लिए मनोविज्ञान की आवश्यकवा अनुभव की जाती है।
(2) उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व – वर्तमान औद्योगिक युग ने घरेलू उद्योगों को गौण बना दिया है। बड़ी मात्रा में मशीनों तथा मजदूरों ने मिलकर राष्ट्रीय एवं व्यापक स्तर पर उत्पादन कार्य शुरू किया तथा दूर-दूर से भारी मात्रा में कच्चा सामान’ मँगाया जाने लगा। कर्मचारियों पर वरयता क्रम में अधिकारी नियुक्त हुए। उनके निरीक्षण में श्रमिकों की कार्यशक्ति और उत्पादन शक्ति बढ़ाकर उत्पादित वस्तुओं को दूर-दूर भेजने का प्रयास किया गया। श्रमिकों की कार्यशक्ति एवं उत्पादन शक्ति बढ़ाने की नयी-नयी युक्तियों की खोज होने के अतिरिक्त मिल-मालिकों तथा श्रमिकों के सम्बन्धों की ओर भी ध्यान दिया गया। इस प्रकार उद्योग का क्षेत्र जटिल से जटिलतम हुआ, समस्याएँ उलझती गईं, जिनके विश्लेषण एवं निराकरण हेतु मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों तथा प्रविधियों का उपयोग किया गया। कालान्तर में उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व स्थायी रूप से अंकित हो गया। उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान का महत्त्व निम्नांकित कारणों से है –
(1) कर्मचारियों के चयन की समस्या (Problem of the Personnel Selection)-उद्योग के क्षेत्र में मनोविज्ञान ने जो सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण कार्य किया, वह कर्मचारियों के चुनाव में सहायता पहुँचाना है। वर्तमान समय में उद्योग के क्षेत्र में विशेषीकरण (Specialization) का बोलबाला है। कार्य का विभाजन और कार्य की हर शाखा में विशेषीकरण आधुनिक उद्योगों का प्रमुख लक्षण है। प्रत्येक कार्य के लिए विशिष्ट निपुणता तथा योग्यता की आवश्यकता है। इस आवश्यकता ने हमारे सामने उपयुक्त कर्मचारियों के चयन की समस्या खड़ी कर दी है। मनोवैज्ञानिक परीक्षणों से यह ज्ञात हो जाता है कि किस व्यक्ति में कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में है? उसी के अनुसार कर्मचारियों का चयन किया जाता है और तद्नुसार ही उन्हें कार्य भी प्रदान किया जाता है।
(2) कार्य की परिस्थितियों की समस्या (Problem of working Condition)–वर्तमान समय में उद्योग सम्बन्धी कार्य की परिस्थितियों के निर्धारण में मनोविज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कर्मचारियों की कार्य करने की दशाओं का उत्पादन और कार्यक्षमता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। मनोविज्ञान कार्य की परिस्थितियों को समझने में सहायता प्रदान करता है। उत्पादन की वृद्धि हेतु इस बात का अनुभव किया गया कि कार्य करने की विभिन्न परिस्थितियों; जैसे—प्रकाश, तापमान, वायु संचार, विश्राम आदि को अनुकूल बनाया जाए। मनोविज्ञान की सहायता से श्रमिकों के कार्य की परिस्थितियों में उचित सुधार लाने का प्रयास किया जाता है।
(3) पदोन्नति की समस्या (Problem of the Promotion)-उद्योगों में कार्य की विभिन्न श्रेणियों के अनुसार कर्मचारियों व अधिकारियों के पद निर्धारित हैं। कुछ समय तक कार्यानुभव प्राप्त करने के उपरान्त व्यक्ति को उच्च पद पर भेजने की आवश्यकता महसूस की जाती है। किसी विशेष पद के लिए कर्मचारी की बुद्धि, मानसिक योग्यता, कार्य के प्रति रुचि, कार्य को सीखने की क्षमता आदि की जाँच मनोवैज्ञानिक परीक्षणों तथा विधियों की सहायता से की जाती है। जाँच के परिणामों व निष्कर्षों के आधार पर ही किसी कर्मचारी की उपयुक्तता निश्चित की जा सकती है। स्पष्टत: पदोन्नति की समस्या का उचित समाधान मनोविज्ञान पर ही आधारित है।
(4) मानवीय सम्बन्धों की समस्या (Problem of Human Relations)-औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् उद्योगों में मानवीय सम्बन्धों को महत्त्व प्रदान किया जाने लगा। इससे पूर्व पिछली शताब्दी में श्रमिकों के साथ पशुओं जैसा अमानवीय व्यवहार किया जाता था। उनसे प्रति दिवस बारह घण्टे से ऊपर कार्य कराया जाता था। इन दशाओं ने उद्योग में मनोविज्ञान का प्रवेश करा दिया जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों के कल्याण पर ध्यान दिया गया। श्रमिकों के आवास, चिकित्सा, प्रशिक्षण, स्त्रियों के लिए कल्याण-केन्द्र तथा उनके बच्चों के लिए समुचित शिक्षा की व्यवस्था को आवश्यक समझा गया। मनोविज्ञान ने लोगों को परस्पर मानवीय दृष्टि से देखने में सहायता दी, मजदूरी यूनियनों ने भी श्रमिक हितों के लिए अथक संघर्ष किया और शनैः-शनैः उद्योगपति श्रमिकों के प्रति उदारता दिखाने लगे। उद्योग में मानवीय सम्बन्धों की समस्या के निराकरण एवं श्रम-कल्याण सम्बन्धी कार्यों को करने में मनोविज्ञान ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
(5) औद्योगिक संघर्ष की समस्या (Problem of Industrial Conflicts)-कभी-कभी स्वहितों की रक्षार्थ श्रमिकों और मिल-मालिकों के मध्य तनाव एवं संषर्घ की,दशाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। या तो श्रमिक अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं अथवा मालिकों पर अनुचित दबाव डालकर अधिक लाभ प्राप्त करने चाहते हैं-दोनों ही स्थितियों में औद्योगिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप हड़ताल और तालाबन्दी की स्थितियाँ जन्म लेती हैं तथा समूचे औद्योगिक क्षेत्र में अशान्ति पैदा हो जाती है। मनोविज्ञान ही श्रमिक वर्ग एवं मिल मालिकों दोनों की मानसिक स्थिति को ठीक-ठीक समझ सकता है। मनुष्यों के दो वर्गों के बीच उत्पन्न इस तनाव की स्थिति को समझकर हल करने का प्रयास मनोविज्ञान की विधियों द्वारा सम्भव है। इस प्रकार औद्योगिक संघर्ष से बचने का उपाय भी मनोविज्ञान के ही पास है।



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