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हड़ताल’ एवं ‘तालाबन्दी के अर्थ एवं कारणों का उल्लेख करते हुए इनकी रोकथाम के उपायों को भी स्पष्ट कीजिए।याहड़ताल एवं तालाबन्दी को रोकने में मनोविज्ञान किस प्रकार सहायक है?

Answer»

भूमिका (Introduction)
मानव जीवन का प्रत्येक क्षेत्र समस्याओं तथा अशान्ति से परिपूर्ण है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्रों की समस्याओं के अनुरूप ही औद्योगिक क्षेत्र भी विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त है। इन समस्याओं में से कुछ उत्पादन सम्बन्धी समस्याएँ होती हैं अथवा तकनीकी बातों को लेकर उत्पन्न होती हैं; और कुछ समस्याएँ मानव व्यवहार से सम्बन्धित होती हैं। अधिकांश उद्योगपति श्रमिकों और कर्मचारियों को-कम-से कम वेतन देकर अधिक-से-अधिक लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। इसके विपरीत श्रमिकों और कर्मचारियों का यह प्रयास रहता है कि वे अपने कड़े परिश्रम के बदले जीने के लिए पर्याप्त वेतन तथा जीवन सम्बन्धी सभी आवश्यक सुविधाएँ; जैसे—काम करने के घण्टे, विश्राम, दुर्घटना व बीमारी के लिए उचित चिकित्सा की व्यवस्था तथा भत्ता आदि उद्योगपतियों से प्राप्त करें जब औद्योगिक व व्यावसायिक संस्थानों में कल्याणकारी योजनाओं को लागू नहीं किया जाता और श्रमिक हितों की अनदेखी की जाती है तो उससे दोनों वर्गों-उद्योगपति वर्ग एवं श्रमिक वर्ग के बीच तनाव एवं संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के बीच का तनाव प्रायः ‘हड़ताल’ और ‘तालाबन्दी’ के रूप में प्रकट होता है।

हड़ताल (Strike)
हड़ताल का अर्थ (Meaning of Strike)

हड़ताल औद्योगिक’ अशान्ति का एक प्रमुख एवं प्रचलित रूप है। उद्योगपति एवं श्रमिकों के सम्बन्धों का इतिहास बहुत पुराना है। प्रारम्भिक काल में श्रमिक उद्योगपतियों को ईश्वर या देवता का प्रतिरूप मानते हुए उनकी सभी आज्ञाओं का पालन करते थे और उद्योगपति इस भावना का लाभ उठाते हुए उनका जबरदस्त शोषण करते थे, किन्तु औद्योगिक क्रान्ति के आगमन ने पासा ही पलट दिया, श्रमिकों में जागरूकता आयी और वे अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गये। आवश्यकताओं, कठिनाईयों तथा समस्याओं में समानता के आधार पर श्रमिकों में एकता तथा सहयोग की भावना विकसित हो जाना स्वाभाविक है। श्रमिक एक हुए और उनके संगठन बने। इस प्रकार सामूहिक एकता ने श्रमिक संघों (Labour Unions) की विचारधारा को व्यवहार में बदल दिया। श्रमिक संघों ने उद्योगपतियों से अपने अधिकारों तथा सुविधाओं की माँगें प्रारम्भ कीं जिन्हें अधिकतम लाभ की लालसा से प्रेरित उद्योगपतियों द्वारा ठुकरा दिया गया। जब उद्योग में श्रमिकों पर काम का दबाव अधिक पड़ता है लेकिन उनकी न्यायोचित माँगों की ओर ध्यान नहीं दिया जाता तो वे विरोधस्वरूप काम पर जाना बन्द कर देते हैं। वे सभी या अधिकांश लोग, जो काम पर नहीं जाते, उद्योगपति एवं उसकी नीतियों के विरुद्ध तथा अपनी माँगों व समस्याओं के समर्थन में प्रदर्शन करते हैं, नारे लगाते हैं, जुलूस आदि निकालते हैं तथा भूख-हड़ताल पर बैठ जाते हैं। श्रमिकों की इन समस्त क्रियाओं को हड़ताल (Strike) कहा जाता है।

हड़ताल के कारण (Causes of Strike)
हड़ताल के मूल में उद्योगपतियों तथा श्रमिकों के परस्पर विरोधी लक्ष्यों एवं हितों पर आधारित वर्ग-संघर्ष की एक लम्बी दास्तान निहित है। इस वर्ग-संघर्ष के अनेक कारण हो सकते हैं; यथा-अधिक वेतन व भत्तों की माँग, कम के घण्टे कम करने की माँग, बोनस तथा दूसरी सुविधाओं को लेकर मजदूर-मालिक में संघर्ष आदि। वास्तविकता यह है कि श्रमिक जानता है कि उद्योगपति के भोग-विलास के सभी साधन उसकी खून-पसीने की कमाई से आये हैं, जबकि वह जीवन-पर्यन्त झोंपड़पट्टी में पशुओं की तरहू जीवन जीता है। श्रमिक स्वयं को शोषित तथा उद्योगपति को शोषक समझता है। अपने शोषण को लेकर श्रमिकों के मन में असन्तोष की यह आग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तात्कालिक कारणों से हड़ताल के रूप में भड़क उठती है। हड़ताल के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

(1) इतिहासजनित अविश्वास की प्रवृत्ति – औद्योगिक क्रान्ति से लेकर वर्तमान क्षणों तक करीब-करीब तीन शताब्दियाँ बीत चुकी हैं। औद्योगिक संघर्षों के इस लम्बे इतिहास में उद्योगपति और श्रमिकों के बीच छत्तीस (36) का आँकड़ा रहा है यानि दोनों एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। विरोध के उग्र होते स्वरों ने दोनों वर्गों के बीच अविश्वास की खाई को इतना चौड़ा कर दिया है कि हर पल विश्व के किसी-न-किसी कोने में हड़ताल देखी जा सकती है।
(2) सामाजिक दूरी – उद्योगपति और श्रमिक समाज की सीमाओं के दो छोर हैं जिनके बीच कोई सामाजिक सम्बन्ध, सम्पर्क, प्रेम एवं सहानुभूति नहीं पायी जाती। इससे भी निकटता समाप्त होती है तथा अविश्वास बढ़ता है। दोनों वर्ग अपने हितों में जरा से भी आघात से तिलमिला उठते हैं। श्रमिक उद्योगपतियों के अन्याय से उत्तेजित होकर हड़ताल का निर्णय ले लेते हैं। सामाजिक दूरी के कारण उनमें आपसी सूझ-बूझ होने का अवसर और समझौते का रास्ता नहीं मिलता।।
(3) दुर्व्यवहार – कभी-कभी किसी उद्योग के अधिकारी श्रमिकों को मार बैठते हैं या उनके साथ दुर्व्यवहार, कर बैठते हैं जिससे सामूहिक असन्तोष पैदा होता है और उस अधिकारी को दण्डित कराने के लिए हड़ताल होती है।
(4) कार्य की दशाएँ – कार्य की प्रतिकूल दशाएँ हड़ताल को जन्म देती हैं। कुछ उद्योगों में श्रमिकों से अमानवीय तरीके से काम लिया जाता है और उन्हें आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। उदाहरणार्थ-श्रमिकों के काम के घण्टे अधिक होते हैं, उन्हें विश्राम नहीं करने दिया जाता, उन्हें अधिक ताप याघातक मशीनों का सामना करना पड़ता है तथा उनसे बचाव का कोई उचित प्रबन्ध भी नहीं किया जाता ईत्यादि। इससे न केवल श्रमिकों की कार्य-क्षमता पर बुरा असर पड़ता है बल्कि उनका स्वास्थ्य भी गिरता जाता है। इन कारणों से कभी-कभी किसी श्रमिक की मृत्यु भी हो सकती है। इन विभिन्न कारणों से श्रमिकों में रोष उत्पन्न हो जाता है और वे हड़ताल के माध्यम से अपनी माँगे मनवाते हैं।
(5) ओवरटाइम – काम के निर्धारित घण्टों के अतिरिक्त काम करने पर जब श्रमिकों को इस अतिरिक्त समय को पारिश्रमिक नहीं दिया जाता तो उन्हें हड़ताल का सहारा लेना पड़ता है।
(6) वेतन-वृद्धि, भत्ता और बोनस – बढ़ती हुई महँगाई के विरुद्ध उद्योगों के श्रमिक अपने मालिकों से वेतन बढ़ाने की माँग करते हैं। महँगाई बढ़ने के साथ-साथ भत्तों का बढ़ना भी आवश्यक है। इसके अतिरिक्त उद्योगों में लाभ का पूरा अंश मालिकों के पेट में क्ला जाता है। अतः वेतन-वृद्धि, भत्ता तथा बोनस को लेकर जब श्रमिकों की माँगें पूरी नहीं होतीं तो वे हड़ताल करने पर उतारू हो जाते
(7) राजनीतिक कारण – कुछ स्वार्थी नेता लोग अपनी नेतागिरि चमकाने के इरादे से श्रमिकों को बहला-फुसलाकर हड़ताल करवाते हैं और उद्योगपति से साँठ-गाँठ कर पैसा खा जाते हैं। इससे श्रमिकों को भारी हानि होती है।
(8) मजदूर-संगठनों की बहुलता – आजकल दुनिया में इतने सच्चे-झूठे मजदूर-संगठन किसी-न-किसी लक्ष्य को लेकर पैदा हो गये हैं कि उनमें से अधिकांश अपने अस्तित्व या स्वार्थपूर्ति में श्रमिकों को मोहरा बनाकर हड़ताल कराने में सफल हो ही जाते हैं। श्रमिक इनके बहकावे में आकर हड़ताल कर देते हैं।

तालाबन्दी (Lockout)
तालाबन्दी का अर्थ (Meaning of Lockout)

तालाबन्दी औद्योगिक अशान्ति का एक दूसरा किन्तु प्रमुख पक्ष है। इसके लिए विशेष रूप से उद्योगपतियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। कभी-कभी जब उद्योगपति श्रमिकों की माँग पूरी नहीं कर पाते या पूरी करना नहीं चाहते तो वे उद्योग या मिल में ताला डाल देते हैं। इससे औद्योगिक इकाई बन्द हो जाती है और उत्पादन कार्य रुक जाता है। ऐसी अवस्था में श्रमिकों या कर्मचारियों को उद्योग में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है। इस भाँति ‘तालाबन्दी’ (Lockout) हड़ताल का एक विरोधी रूप है।

तालाबन्दी के कारण (Causes of Lockout)
तालाबन्दी के बहुत से कारण हो सकते हैं। इनमें से प्रमुख कारणों का संक्षिप्त विवेचन निम्नलिखित है –

(1) प्रथमतः उद्योगपति श्रमिकों की अतिशय, औचित्य की सीमा से बाहर तथा राजनीति से प्रेरित माँगों से परेशान होकर तालाबन्दी का आश्रय लेते हैं। उद्योगपति सोचते हैं कि लम्बे समय तक भूख और जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं से तड़प-तड़पकर श्रमिक सबक सीख जाएँगे और ताला खोलने की खुशामद करेंगे। इस प्रकार, भारी नुकसान सहते हुए भी श्रमिकों पर अंकुश लगाने का उद्योगपतियों की दृष्टि में यह एक उपाय है।
(2) दुसरे, किन्हीं कारणों से कभी-कभी कोई औद्योगिक इकाई लगातार नुकसान उठाती है और इस भाँति घाटे में चलती है। उद्योगपति कुछ समय तक तो घाटा सहते रहते हैं लेकिन फिर वे मिल में ताला लगा देते हैं।
(3) तीसरे, यदा-कदा लम्बे समय तक पावर सप्लाई, ईंधन या कच्चे माल की आपूर्ति न होने के कारण भी उद्योगपति को नुकसान होता है। उत्पादन घटने या समाप्त होने से तैयार माल का उठान नहीं हो पाता; अत: चे विवश होकर तालाबन्दी कर देते हैं।
हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के उपाय (Measures to Remove Strikes and Lockouts)
‘हड़ताल और तालाबन्दी’ दोनों ही औद्योगिक अशान्ति के परिचायक हैं। हड़ताल में श्रमिक काम बन्द कर देते हैं और तालाबन्दी में उद्योगपति कारखाने का ताला बन्द कर देते हैं। दोनों में ही औद्योगिक संघर्ष का वीभत्स रूप देखने को मिलता है जिससे उत्पादन कार्य ठप हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय स्तर पर हानि उठानी पड़ती है; अतः हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम व निवारण के तत्काल उपाय करने चाहिए। इसके प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं

(1) श्रमिकों का सहयोग (Co-operation of Labourers) – उद्योगपतियों को श्रमिकों का विश्वास अर्जित कर उनसे प्रशासनिक कार्यों में सहयोग प्राप्त करना चाहिए। इससे औद्योगिक अशान्ति एवं संघर्ष स्वतः ही दूर हो जाएगा।
(2) उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस (Sufficient wages, Allowance and Bonus) – श्रमिकों को उचित वेतन, भत्ता तथा बोनस आदि समय पर तथा नियमानुसार प्रदान किया जाना चाहिए ताकि वे अपनी आवश्यकताओं की भली प्रकार पूर्ति कर सकें। बढ़ती हुई महँगाई के साथ वेतन-दरों में वृद्धि न्यायोचित तथा मानवीय दृष्टि से वांछित है।
(3) तात्कालिक कारणों का निराकरण (Removing of Immediate Causes) – हड़ताल और तालाबन्दी की रोकथाम के लिए तात्कालिक असन्तोष के कारणों को जल्दी ही निराकरण कर लिया जाए। ऐसी परिस्थितियों की जाँच-पड़ताल किन्हीं सर्वमान्य एवं उपयुक्त व्यक्तियों के माध्यम से करायी जाए और उनका शीघ्र समाधान प्रस्तुत कर उसे क्रियान्वित किया जाए।
(4) श्रम-कल्याण कार्यों का प्रबन्ध (Managing Labour-welfare Activities) – उद्योग की तरफ से श्रमिकों के लिए कुछ सुविधाओं का प्रबन्ध किया जाना चाहिए। इन सुविधाओं की प्राप्ति से उन्हें सुख और सन्तोष मिलता है जिससे वे अधिक समायोजन के साथ कार्य कर सकते हैं। इन सुविधाओं में चिकित्सा, स्वास्थ्य, शिक्षा, मनोरंजन, आवास, भोजन आदि का प्रबन्ध मुख्य है।
(5) विशिष्ट समिति (Specific Association) – औद्योगिक प्रशासन के लिए एक विशेष समिति का निर्माण किया जाना चाहिए, जिसमें श्रमिकों, कर्मचारियों तथा मालिकों के प्रतिनिधियों को स्थान दिया जाए। यह समिति किसी भी समस्या या अवरोध की परिस्थिति में सभी मामलों में विचार-विमर्श करते हुए पारस्परिक मतभेदों का निवारण करेगी। इससे सहयोगपूर्ण वातावरण की वृद्धि होगी और औद्योगिक तनाव व अशान्ति कम होगी।
निष्कर्षतः हड़ताल और तालाबन्दी इन दोनों में से किसी एक का भी विचार व्यक्तिगत एवं राष्ट्रहित में नहीं है। इनसे उत्पादन में कमी, जमाखोरी, मुनाफाखोरी तथा अन्ततः भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। ये दोनों ही आन्दोलन, तनाव और संघर्ष के परिचायक हैं जिनके परिणामतः अशान्ति व अव्यवस्था का जन्म होता है। कुल मिलाकर उद्योग की मुख्य जिम्मेदारी उद्योगपति या सेवायोजक की होती है। यदि वे अपने लाभांश की एक छोटी-सी मात्रा का त्याग करना सीखें तथा श्रमिकों के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें सहानुभूति का पात्र बनायें तो इससे न केवल उत्पादन-वृद्धि होगी अपितु उद्योग की सम्पूर्ण व्यवस्था अभीष्ट रूप से संचालित भी हो सकेगी।



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