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Answer» कर्मचारियों के चयन की समस्या (Problem of Personnel Selection) आधुनिक काल के मिल, कारखानों या फैक्ट्रियों में कार्य-विशेषीकरण के आधार पर कार्य का विभाजन हुआ। इस श्रम-विभाजन के कारण उत्पादन कार्य को पूरी गति मिली; अत: हर विभाग के विशेष कार्य हेतु निपुणतम व्यक्ति की खोज हुई। विज्ञापन छापे गये, सैकड़ों अभ्यर्थियों ने नियोक्ताओं (मालिकों) के पास अपने प्रार्थना-पत्र भेजे। अब नियोक्ता अथवा मालिकों के सामने उनमें से सर्वाधिक योग्य व्यक्ति के चुनाव की समस्या उत्पन्न हुई। विभिन्न प्रकार के व्यवसायों अथवा कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं की आवश्यकता होती है। अनुभव द्वारा पता चलता है कि एक व्यक्ति विभिन्न प्रकार के व्यवसायों या कार्यों को एक समान कुशलता से नहीं कर सकता; इसी प्रकार से अनेक व्यक्ति एक व्यवसाय या कार्य के लिए एक समान कुशलता भी नहीं अपना सकते। यहाँ यह समस्या उठ खड़ी होती है कि किस भाँति व्यक्ति को उपयुक्त व्यवसाय तथा व्यवसाय को उपयुक्त व्यक्ति उपलब्ध हो? व्यक्ति के लाभ और सुख की दृष्टि से आवश्यक है कि उसे अपनी सर्वोत्तम योग्यता के अनुकूल कार्य मिले। स्पष्ट रूप से कर्मचारियों के चयन की समस्या के दो पहलू हैं-एक, व्यक्ति को उसकी सर्वोत्तम योग्यताओं के अनुसार उद्योग में कार्य मिलना, तथा दो, उद्योगों के विभिन्न कार्यों हेतु अभ्यर्थियों में से सर्वोत्तम व्यक्ति का चयन करना। कर्मचारी चयन के नकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों को छाँटकर अलग कर देते हैं तथा ‘स्वीकारात्मक पक्ष में उपयुक्त व्यक्तियों का चयन कर लेते हैं। कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया (Process of the Personnel Selection) कर्मचारियों के चयन की प्रक्रिया के दो महत्त्वपूर्ण पहलू हैं – (1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण तथा (2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण। व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण के अन्तर्गत यह ज्ञात किया जाता है कि किसी व्यवसाय के लिए किस तरह के कार्य, किस तरह की कार्य की परिस्थितियों, किस स्तर की शिक्षा, बौद्धिक स्तर तथा मानसिक योग्यताओं की आवश्यकता है। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत यह पता लगाया जाता है कि कर्मचारी में किस स्तर की बुद्धि है, उसकी कौन-कौन सी मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताएँ हैं। अब हम इन दोनों पक्षों का अलग-अलग विवेचन प्रस्तुत करेंगे। (1) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण (Job-Analysis) व्यवसाय-विश्लेषण या कार्य-विश्लेषण का अर्थ है कि किसी व्यवसाय से सम्बन्धित पूरी जानकारी प्राप्त करना। उद्योग-धन्धों तथा विभिन्न व्यवसायों के सन्दर्भ में व्यवसाय-विश्लेषण का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। वस्तुतः इस प्रक्रिया के अन्तर्गत कार्य के विभिन्न तत्त्वों को फैलाकर उनका सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है। कर्मचारी के कर्तव्य तथा कार्य की दशा, के साथ-साथ कर्मचारी की व्यक्तिगत विशेषताओं का अध्ययन भी किया जाता है। व्यवसाय-विश्लेषण के माध्यम से कार्य के आधारभूत या मूल तत्त्वों का निर्धारण एवं स्पष्टीकरण हो जाता है। इसके अतिरिक्त कर्मचारी में अपेक्षित गुण और विशेषताओं का ज्ञान भी हो जाता है। ब्लम ने व्यवसाय-विश्लेषण को इस प्रकार परिभाषित किया है, “व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण किसी व्यवसाय के विभिन्न तत्त्वों का सूक्ष्म अध्ययन है। इसका सम्बन्ध न केवल कार्य से सम्बन्धित कर्तव्य और दशाओं से है, वरन् कार्य के लिए अपेक्षित वैयक्तिक योग्यताओं से भी है।” इस भाँति, व्यवसाय या कार्य-विश्लेषण का तात्पर्य किसी व्यवसाय या कार्य के अन्तर्गत सम्मिलित समस्त बातों के सूक्ष्म एवं व्यापक अध्ययन से है जिससे कार्य से सम्बन्धित बातों का सही-सही ज्ञान हो सके। व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित प्राप्त की जाने वाली सूचनाएँ – व्यवसाय-विश्लेषण करते समय किसी कार्य से सम्बन्धित अनेक सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं। वाइटलीज (Viteles) ने व्यवसाय-विश्लेषण के अन्तर्गत एकत्र की जाने वाली सूचनाओं की एक सूची जारी की है, जिसे प्रस्तुत किया जा रहा है – ⦁ कार्य का नाम ⦁ कर्मचारियों की संख्या ⦁ कर्तव्यों का विवरण ⦁ कार्य में प्रयुक्त होने वाले यन्त्र ⦁ क्रियाओं का विश्लेषण ⦁ कार्य की दशाएँ या परिस्थितियाँ ⦁ वेतन एवं अन्य सुविधाएँ (जैसे- मुफ्त आवास एवं चिकित्सा सुविधाएँ) ⦁ अन्य समान व्यवसायों से सम्बन्ध ⦁ स्थानान्तरण तथा पदोन्नति के अवसर ⦁ प्रशिक्षण-काल तथा उसकी प्रकृति ⦁ व्यक्तिगत योग्यताएँ – ⦁ अवस्था, लिंग, राष्ट्रीयता तथा वैवाहिक स्तर ⦁ शारीरिक योग्यताएँ ⦁ मानसिक योग्यताएँ ⦁ शैक्षिक योग्यताएँ ⦁ पूर्व अनुभव ⦁ सामान्य एवं विशिष्ट मानसिक योग्यताएँ तथा ⦁ स्वभाव एवं चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ। कार्य से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्रित करने की विधियाँ-किसी भी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित विभिन्न सूचनाएँ एकत्र करने में अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है। प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं – (1) प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method) – इस विधि में किसी व्यवसाय या कार्य से सम्बन्धित, व्यक्तित्व की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर, कुछ प्रश्नों की एक तालिका बना ली जाती है। इस तालिका को सम्बन्धित कर्मचारियों व अधिकारियों में बाँट दिया जाता है। उनसे जो उत्तर प्राप्त होते हैं, उनसे कार्य सम्बन्धी सूचनाएँ एकत्र कर ली जाती हैं और कर्मचारियों का चयन कर लिया जाता है। (2) निरीक्षण विधि (Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत सूचना एकत्र करने वाला व्यक्ति स्वयं कार्य-स्थल पर जाकर कर्मचारियों को काम करते हुए देखता है। वह उनके कार्यों को भली प्रकार निरीक्षण करता है तथा तत्सम्बन्धी निष्कर्ष निकालता है। (3) परीक्षण विधि (Test Method) – इस विधि में किसी विशेष व्यवसाय से सम्बन्धित आवश्यक योग्यताओं को लेकर कुछ विश्वसनीय व प्रामाणिक परीक्षाएँ तैयार की जाती हैं। उस आधार पर यह ज्ञात किया जाता है कि उस कार्य की सफलता हेतु कौन-सी योग्यता कितनी मात्रा में होनी चाहिए। (4) वैयक्तिक मनोरेखा विधि (Individual Psychographic Method) – इस विधि द्वारा किसी विशेष व्यवसाय या कार्य में सफल किसी कर्मचारी की मानसिक एवं अन्य विशेषताओं का पता लगाया जाता है। उन्हें ज्ञात करने के बाद एक ग्राफ पर प्रदर्शित किया जाता है तथा ग्राफों के प्रदर्शनों के आधार पर कर्मचारियों की मानसिक विशेषताओं से सम्बन्धित सूचनाएँ एकत्र की जाती हैं। (5) व्यवसाय मनोरेखांकित विधि (Job Psychographic Method) – इस विधि के द्वारा भी रेखाचित्रों के माध्यम से कार्य में लगे हुए लोगों की विशेषताओं को ग्राफ पर प्रदर्शित करके व्यवसाय का मनोरेखांकन किया जाता है। वाइटलीज द्वारा वर्णित इस विधि में तीन आवश्यक बातें इस प्रकार हैं – (अ) मानसिक गुणों का सुगम वर्गीकरण, (ब) प्रशिक्षित निरीक्षकों द्वारा प्रत्यक्ष पर्यावलोकन एवं (स) प्रामाणिक मूल्यांकन विधि। यहाँ कुछ विशेषज्ञों द्वारा व्यवसाय या कार्य का विश्लेषण करके एक ऐसी तालिका निर्मित की जाती है जिसमें कार्य के लिए आवश्यक समस्त गुणों का सुगम वर्गीकरण सम्भव हो सके। इन समस्त गुणों के आधार पर एक ग्राफ तैयार करके भविष्य में उससे सहायता ली जाती है। (6) गति अध्ययन विधि (Motion Study Method) – इस विधि के माध्यम से किसी विशेष व्यवसाय में लगे कर्मचारी के काम की गति तथा काम में लगा हुआ समय ज्ञात किया जाता है। इस भाँति, भिन्न-भिन्न कर्मचारियों की गति नोट कर ली जाती है तथा उसकी आपस में तुलना कर ली जाती है जिसे भविष्य में गति अध्ययन (Time and Motion Study) है जिसके अन्तर्गत आजकल सम्पूर्ण कार्य का विस्तृत चित्रांकन मूवी कैमरे द्वारा कर लिया जाता है। इसके बाद, फिल्म को धीमी गति से चलाकर पूरी प्रक्रिया का विश्लेषण किया जाता है। उपर्युक्त वर्णित विधियों में से किसी भी एक विधि का आवश्यकता व परिस्थिति के अनुसार चयन करके कार्य के विषय में सूचनाएँ प्राप्त की जा सकती हैं। (2) कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण (Individual Analysis) कर्मचारियों के चयन में जहाँ एक ओर कार्य की विशेषताओं की विस्तृत जानकारी आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर अभ्यर्थी (काम पाने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति) के विषय में भी पूरी जानकारी प्राप्त होनी चाहिए। कर्मचारी-विश्लेषण या व्यक्ति-विश्लेषण, व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्तिगत गुणों का होता है जिसके माध्यम से यह निश्चित किया जाता है कि अमुक व्यक्ति किस प्रकार के कार्य के योग्य या अयोग्य है। इसके द्वारा व्यवसाय से सम्बन्धित प्रशिक्षण के विषय में ज्ञान मिलता है तथा कर्मचारी की योग्यतानुसार वेतन निर्धारित करने में सहायता प्राप्त होती है। कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण के अन्तर्गत व्यक्ति के घिषय में निम्नलिखित जानकारियाँ हासिल करनी होती हैं – ⦁ नाम ⦁ आयु ⦁ लिंग ⦁ जाति ⦁ धर्म ⦁ राष्ट्रीयता ⦁ शारीरिक स्वास्थ्य एवं विशेषताएँ; जैसे – भार ऊँचाई, दृष्टि, सीने की माप, दाँतों की अवस्था, हृदय एवं फेफड़ों की दशा, नाक-कान की दशा, कोई कमी (यदि हो तो) इत्यादि ⦁ मानसिक सूचनाएँ; जैसे – बुद्धि का स्तर, मानसिक योग्यताएँ व उनका स्तर, रुचियाँ-अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व की विशेषताएँ ⦁ शैक्षिक योग्यताएँ ⦁ कार्य का अनुभव ⦁ प्रशिक्षण का विवरण तथा ⦁ चरित्र सम्बन्धी विशेषताएँ। कर्मचारी या व्यक्ति-विश्लेषण की विधियाँ – कर्मचारी विश्लेषण की प्रक्रिया में कर्मचारी से सम्बन्धित उपर्युक्त सूचनाएँ एकत्र करने के लिए निम्नलिखित विधियाँ काम में लायी जाती हैं – (1) आवेदन-पत्र (Application Form) – उद्योग के कार्यालय में कार्य पाने के इच्छुक अभ्यर्थियों को सादे छपे हुए आवेदन-पत्र प्रदान किये जाते हैं। इन आवेदन-पत्रों में कुछ शीर्षकों के अन्तर्गत सूचनाएँ माँगी जाती हैं। अभ्यर्थी द्वारा भरकर दिये गये आवेदन-पत्र के माध्यम से उस व्यक्ति के सम्बन्ध में शिक्षा, अनुभव, प्रशिक्षण तथा व्यक्तिगत इतिहास का पता चल जाता है। इसके अतिरिक्त उसकी शक्तियों, महत्त्वाकांक्षाओं तथा पाठान्तर क्रियाओं का भी ज्ञान हो जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से उपयोगी सूचनाएँ मँगाने के लिए उन्हें विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाना आवश्यक समझा जाता है। आवेदन-पत्रों के माध्यम से वे समस्त सूचनाएँ उपलब्ध हो जाती हैं जिनका उत्तर अभ्यर्थी से मिल सकता है। आजकल कुछ विशिष्ट कम्पनियाँ विज्ञापनों में ही आवेदन-पत्र का नमूना भी छाप देती हैं और आशा करती हैं कि आवेदक उसी नमूने के अनुसार आवेदन करें। (2) संस्तुति-पत्र (Letters of Recommendation) – प्रत्येक अभ्यर्थी के पास उसके शिक्षाकाल में मिले कुछ संस्तुति-पत्र और प्रमाण-पत्र होते हैं जो उसकी विशेषताओं पर पर्याप्त रूप से प्रकाश डालते हैं। बहुत-से व्यावसायिक संस्थान आवेदन-पत्रों के साथ कम-से-कम दो महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के संस्तुति-पत्र भी मँगवाते हैं। इससे अभ्यर्थियों के बारे में आवश्यक व महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलने की सम्भावनाएँ रहती हैं। इससे उसकी कमियों व दोषों की जानकारी तो, नहीं, किन्तु विशिष्टताएँ अवश्य प्रकाश में आ जाती हैं। संस्तुति-पत्रों का सबसे बड़ा दोष यह है कि इनमें व्यक्ति के विषय में अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण कर दिया जाता है। इससे इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है, किन्तु, व्यावसायिक संस्थान संस्तुति (सिफारिश) करने वाले व्यक्तियों से संम्पर्क स्थापित करके प्रश्नावलियों (Questionnaire) व निर्धारण-मान (Rating-scale) की सहायता से अभ्यर्थी के विषय में आवश्यक एवं वास्तविक सूचनाएँ प्राप्त कर लेते हैं। (3) शैक्षिक आलेख (Academic Records) – शैक्षिक आलेख के माध्यम से अभ्यर्थी की शिक्षा सम्बन्धी योग्यता का पता चल जाता है। विभिन्न व्यावसायिक संस्थान अभ्यर्थियों से आवेदन-पत्रों के साथ उनका शैक्षिक आलेख प्रमाणित प्रतिलिपियों के रूप में मॅगा लेते हैं। इनके साथ ही उन संस्थानों के नाम भी पूछे जाते हैं जहाँ से अभ्यर्थी ने शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त शिक्षा संस्थाओं में अभ्यर्थी से सम्बन्धित सामूहिक अभिलेख (Cumulative Records) होते हैं जिनके अवलोकनों से अभ्यर्थी के विषय में काफी जानकारी प्राप्त हो जाती है। (4) समूह निरीक्षण विधि (Group Observation Method) – इस विधि के अन्तर्गत किसी पद के लिए उपस्थित हुए अभ्यर्थियों के समूह में विभिन्न व्यक्तियों के व्यवहार का निरीक्षण किया जाता है। निरीक्षण के दौरान ध्यान दिया जाता है कि कोई व्यक्ति समूह में किस प्रकार का व्यवहार कर रहा है। इस विधि द्वारा अभ्यर्थियों के नेतृत्व, सामाजिकता, कर्तव्यपरायणता, हास्यप्रियता, ईमानदारी तथा तात्कालिक बुद्धि आदि गुणों का पता करने हेतु सामूहिक निरीक्षण किया जाता है। (5) शारीरिक परीक्षण (Physical Tests) – अनेक व्यवसायों में कुछ विशेष प्रकार की शारीरिक विशेषताओं व योग्यताओं की जरूरत पड़ती है। जिसके लिए शारीरिक परीक्षण अनिवार्य है। इसके लिए भार ज्ञात करने की मशीन, स्टेथोस्कोप, फीता तथा अन्य यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है। पुलिस विभाग के कर्मचारियों के लिए हृष्ट-पुष्ट शरीर व रेलवे गार्ड के लिए उत्तम नेत्र-शक्ति आवश्यक है। खदान उद्योग में काम करने वालों की भी शारीरिक जाँच विस्तार से की जाती है, क्योंकि उन्हें अस्वास्थ्यप्रद दर्शाओं में रहकर काम करना होता है। (6) प्रयोगात्मक एवं अन्वेषणात्मक क्रियाएँ (Try-out) – इसके अन्तर्गत, यदि अधिकारीगण आवश्यकता महसूस करे तो, अभ्यर्थियों को उस पद या उन मशीनों के साथ काम करने का अवसर दिया जाता है जिन पर उन्हें काम करना है। उनसे आवश्यक पूछताछ व कार्य कराकर भी देखा जा सकता है। इस प्रकार की प्रयोगात्मक वे अन्वेषणात्मक क्रियाओं से अभ्यर्थियों की योग्यता का वास्तविक बोध हो जाता है। (7) मनोवैज्ञानिक परीक्षण (Psychological Tests) – कर्मचारी की योग्यताओं का मूल्यांकन करने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक परीक्षण हैं। अभ्यर्थियों का बौद्धिक स्तर, मानसिक योग्यताएँ, रुचियाँ, अभिरुचियाँ तथा व्यक्तित्व सम्बन्धी विशेषताओं को जानने के लिए तत्सम्बन्धी मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रयोग किया जाना चाहिए। (8) साक्षात्कार (Interview) – कार्य-विश्लेषण की प्रक्रिया में अभ्यर्थियों से सम्बन्धित सूचनाएँ प्राप्त करने के उपरान्त साक्षात्कार द्वारा उनके व्यक्तित्व का पता लगाना चाहिए। अभ्यर्थी को सामने बैठाकर उससे बातचीत करना या प्रश्न पूछना साक्षात्कार कहलाता है। साक्षात्कार के माध्यम से अन्य सूचनाओं के साथ-साथ अभ्यर्थियों का आत्म-विश्वास, तत्परता, आचार-विचार, अनुशासनप्रियता, आत्म-नियन्त्रण, महत्त्वाकांक्षाएँ तथा वेशभूषा आदि का सम्यक् ज्ञान होता है। विद्वानों के मतानुसार साक्षात्कार विधि जितनी ही अधिक विश्वसनीय, वैध तथा वस्तुनिष्ठ होगी, कर्मचारियों का चयन उतना ही अधिक उपयुक्त व प्रामाणिक होगा। निष्कर्षत: कर्मचारियों के चयन सम्बन्धी प्रक्रिया में व्यवसाय-विश्लेषण तथा कर्मचारी विश्लेषण के माध्यम से जो सूचनाएँ प्राप्त होती हैं उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। जो अभ्यर्थी रिक्त पद के लिए वांछित योग्यताएँ देखते हैं उनका चयन कर लिया जाता है। कर्मचारियों का उपयुक्त चयन किसी भी उद्योग या व्यावसायिक संस्थान की सफलता हेतु एक आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण कार्य है।
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