This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
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नौकरी (रोजगार) के कोई भी दो लक्षण समझाइये । |
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Answer» नौकरी अर्थात् बौद्धिक या शारीरिक श्रम के द्वारा आय प्राप्त करने के उद्देश्य से की जानेवाली प्रवृत्ति । नौकरी में पारिश्रमिक निश्चित रहता है । जो प्रतिदिन भुगतान किया जाता है लेकिन प्रायः मासिक दर से पारिश्रमिक दिया जाता है, जिसे हम वेतन कहते हैं । नौकरी में काम का समय निश्चित रहता है । जैसे सरकारी विभाग में काम करनेवाला क्लर्क । लक्षण : नौकरी के लक्षण निम्नलिखित होते हैं ।
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पेशा (Profession)/पेशेवर धन्धार्थी का अर्थ बताइए । |
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Answer» पेशा अर्थात् किसी क्षेत्र में विशिष्ट गुण, डिग्री, ज्ञान के द्वारा सेवा देकर फीस प्राप्त करना । जैसे डॉक्टर (चिकित्सक), वकील, सोलिसीटर, चार्टर्ड एकाउन्टन्ट आदि पेशेवर व्यक्ति कहलाते है । |
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पेशा (Profession) / पेशेवर धन्धार्थी का अर्थ एवं इसके लक्षण समझाइये । |
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Answer» पेशा (Profession) या पेशेवर धन्धार्थी : पेशा अर्थात् किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट ज्ञान प्राप्त करके, उस ज्ञान का लाभ समाज के लोगों को सेवा के रूप में दिया जाता है । बदले में लोगों से फीस ली जाती है । कुछ पेशेवर व्यक्तियों द्वारा सदस्य बनना स्वैच्छिक होता हैं । जैसे डॉक्टर, वकील, चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट जो सेवा आर्थिक वस्तु के उत्पादन के साथ या उसके वितरण के साथ सम्बन्धित नहीं हैं, परन्तु मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक हैं उसे पेशेवर व्यक्ति या पेशा कहते हैं । यह स्वतंत्र आय प्राप्त करने की प्रवृत्ति है । प्रत्येक पेशेवर व्यक्ति को अपने पेशे में स्थापित मण्डल के नीति-नियमों (आचारसंहिता) का पालन करना पड़ता है । अगर कोई व्यक्ति अन्य किसी स्थान पर वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में नौकरी स्वीकार करे तो उसे पेशेवर व्यक्ति नहीं परन्तु नौकरी के रूप माना जाता है। लक्षण : पेशे के निम्नलिखित लक्षण होते हैं :
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वाणिज्य का अर्थ व्यापार की अपेक्षा विशाल अर्थ में है । |
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Answer» वाणिज्य का अर्थ व्यापार की अपेक्षा विशाल अर्थ में है, उपरोक्त विधान सत्य है, क्योंकि व्यापार का अर्थ होता है वस्तुओं का क्रयविक्रय करके आय कमाना । जबकि वाणिज्य का अर्थ होता है, व्यापार एवं व्यापार की आनुषंगिक सेवाएँ जैसे बैंक, बीमा, वाहन व्यापार में वाणिज्य का समावेश नहीं होता है । जबकि वाणिज्य में व्यापार का समावेश होता है, क्योंकि व्यापार वाणिज्य का एक अंग है । इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वाणिज्य का अर्थ व्यापार की अपेक्षाकृत विशाल होता है । |
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आनुषंगिक सेवा के बिना व्यापार अधूरा है । |
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Answer» व्यापार अर्थात् चीज-वस्तुओं का विनिमय । चीज़-वस्तुओं के विनिमय करने की प्रवृत्ति में व्यापारी प्रवृत्ति वाणिज्य के धड़कते हृदय के समान है । इस प्रवृत्ति में सहायक होने के लिए आनुषंगिक सेवाएँ बैंक, बीमा, वाहन-व्यवहार, संदेशा-व्यवहार, गोदाम एवं प्रतिनिधि जैसे व्यापार की सहायता प्रदान करनेवाली प्रवृत्ति भी वाणिज्य के कार्यक्षेत्र के एक भाग की तरह है । आनुषंगिक सेवाओं के बिना व्यापार की कल्पना नहीं की जा सकती है । |
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लाभ कमाने के उद्देश्य से चीजवस्तुओं का क्रयविक्रय करने की प्रक्रिया अर्थात् ……………………………… ।(A) धन्धा(B) उद्योग(C) वाणिज्य(D) व्यापार |
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Answer» सही विकल्प है (D) व्यापार |
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व्यापार और वाणिज्य का अर्थ समझाकर दोनों के मध्य अन्तर स्पष्ट कीजिए । |
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Answer» व्यापार (Trade) का अर्थ : व्यापार अर्थात् लाभ के उद्देश्य से दो व्यक्तियों के मध्य वस्तु अथवा सेवा के बदले में वस्तु या सेवा का अथवा वित्त के बदले में वस्तु या सेवा का विनिमय । यदि आप विक्रेता के पास से पुस्तक क्रय करें अर्थात् पुस्तक के क्रय के दौरान रुपया भुगतान करों तो वस्तु के बदले में वित्त का विनिमय हुआ कहलाता है । यदि आप बस या रेलवे की टिकिट खरीद करके बस या रेलवे में मुसाफरी करो अर्थात् वित्त के बदले में सेवा का विनिमय हुआ कहलाता है । वाणिज्य (Commerce) का अर्थ : वाणिज्य अर्थात् व्यापार और व्यापार की सहायक सेवाएँ । इन सेवाओं में बैंक, बीमा, परिवहन सेवाएँ, संदेशा व्यवहार, गोदाम और आढ़तिया, प्रतिनिधि, विज्ञापन व पैकिंग की सेवाएँ इत्यादि सेवाओं का समावेश होता है ।
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वाणिज्य अर्थात् ……………………………….(A) उद्योग और सेवा(B) व्यापार और सहायक सेवाएँ(C) थोकबंद व्यापार(D) आन्तरिक व्यापार और विदेश व्यापार |
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Answer» सही विकल्प है (B) व्यापार और सहायक सेवाएँ |
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प्राकृतिक सम्पत्ति में तुष्टिगुण शामिल करके उत्पादन करना अर्थात् क्या ?(A) व्यापार(B) सहायक सेवाएँ(C) वाणिज्य(D) उद्योग |
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Answer» सही विकल्प है (D) उद्योग |
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गोदाम की सेवा किस प्रकार उपयोगी होती है ? |
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Answer» गोदाम की सेवा के अंतर्गत मौसमी तथा तैयार माल का संग्रह किया जाता है और जब मांग उत्पन्न हो तब उसकी बिक्री की जा सकती है । इसके अलावा माल की सुरक्षा, पैकिंग हेतु गोदाम की सेवा उपयोगी होती है । |
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उद्योग का अर्थ एवं इसके प्रकार समझाइये ।। |
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Answer» उद्योग (Industry) का अर्थ : मानवीय आवश्यकताओं को सन्तुष्ट करने के लिए कच्चे माल पर विविध प्रक्रियाएँ करके उत्पादन करके तुष्टिगुण प्रदान करने की प्रक्रिया अर्थात् उद्योग । जैसे लकड़ी में से फर्निचर का निर्माण, कच्चे माल रूई में से कपड़े का उत्पादन । उद्योगों का वर्गीकरण/प्रकार : (1) प्राथमिक उद्योग (1) प्राथमिक उद्योग (Primary Industry) : ऐसे उद्योग मूलभूत उद्योग कहलाते है । ये समुद्र, जमीन और हवा के साथ सम्बन्धित है । प्रकृति पर आधारित रहकर उत्पादन प्रवृत्ति होती है । जैसे कृषि, पशुपालन, मुर्गा व बतख पालन व मत्स्य पालन आदि । (2) गौण उद्योग/सहायक उद्योग (Secondary Industry) : ऐसे उद्योगों में विविध प्रकार के यंत्र और टेक्नोलॉजी की सहायता – ली जाती है । प्राकृतिक सम्पत्ति को उपभोग योग्य बनाकर ग्राहकों तक पहुँच सके इस हेतु की जानेवाली प्रक्रिया अर्थात् गौण उद्योग जैसे रासायनिक खाद, रंग और रसायण उद्योग और स्टील उद्योग इत्यादि । (3) तृतियक उद्योग : (Tartiary Industry) : प्राथमिक और गौण उद्योगों को सहायता और सेवा प्रदान करने के अलावा ग्राहकों के अधिक निकट होते हैं, प्राथमिक उद्योग व गौण उद्योग द्वारा जो उत्पादन किया जाता है, उन पर विविध प्रक्रियाएँ करके ग्राहकों के लिए वस्तुओं को अधिक उपयोगी बनाते है । जैसे डेरी उद्योग, पेय-पदार्थ के उद्योग, बेकरी उद्योग । तृतियक उद्योगों में परिवहन (वाहनव्यवहार), बैंक, बीमा, गोदाम, आढतिया, सूचनासंचार इत्यादि सेवाओं का भी समावेश होता है । कृषि द्वारा धान्य, उदाहरण – गेहूँ का उत्पादन किया जाए तो प्राथमिक उद्योग । गेहूँ में से मेंदा (आटा) तैयार करनेवाला उद्योग वह गौण उद्योग । मेंदे में से ब्रेड, पांऊ व बिस्किट का उत्पादन अर्थात् तृतियक उद्योग । |
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धन्धा (Business) का मुख्य उद्देश्य कौन-सा है ?(A) लाभ का(B) सामाजिक दायित्व(C) प्रतिष्ठा का(D) सेवा का |
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Answer» सही विकल्प है (A) लाभ का |
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उद्योग के लक्षण बताइए । |
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Answer» उद्योग के लक्षण निम्न है :
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विदेश व्यापार अर्थात् क्या ? |
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Answer» देश की सीमाओं के बाहर से माल क्रय किया जाये अथवा बेचा जाये तो उन्हें विदेश व्यापार कहते हैं । |
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प्राथमिक उद्योग के दो उदाहरण बताइये । |
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Answer» जमीन पर कृषि, पशुपालन, मुर्गीपालन व बतखपालन |
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उद्योग किसे कहते हैं ? |
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Answer» उद्योग अर्थात् प्रकृति से प्राप्त चीज़-वस्तुओं पर मानव-श्रम अथवा यांत्रिक श्रम द्वारा योग्य प्रक्रिया करके मानव-उपयोगी वस्तुओं का निर्माण करना । |
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सामाजिक दायित्व का उद्देश्य वर्तमान समय में क्यों अनिवार्य बन गया है ? |
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Answer» सामाजिक जिम्मेदारी का ख्याल बड़ी औद्योगिक इकाई के संदर्भ में प्रचलित बना है । बड़ी इकाइयाँ यदि केवल लाभ के उद्देश्य से चलाई जायँ तो वह समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है । ऐसी इकाइयों द्वारा समाज के विविध हितों को ध्यान में रखकर कार्य किया जाना चाहिए । इसलिए वर्तमान समय में सामाजिक दायित्व का उद्देश्य समाज के हितों की रक्षा करना भी अनिवार्य बन गया है । |
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समाज के विभिन्न समूहों के पृथक पृथक हितों के प्रति इकाई का दायित्व अर्थात् …(A) कानूनी दायित्व(B) सामाजिक दायित्व(C) नैतिक दायित्व(D) अनार्थिक दायित्व |
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Answer» सही विकल्प है (B) सामाजिक दायित्व |
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व्यापार (Trade) का अर्थ, परिभाषाएँ एवं लक्षण समझाइए । |
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Answer» व्यापार का अर्थ : Meaning of Trade : मनुष्य जब जंगली अवस्था में था तब वह अपनी मूलभूत आवश्यकताएँ सीमित होने से वह अपनी आवश्यकताओं को स्वयं संतुष्ट कर सकता था । उस समय विनिमय या व्यापार का कोई अस्तित्व नहीं था । कृषि की खोज के कारण श्रम-विभाजन संभव हुआ, तथा मनुष्य अपनी आवश्यकताएँ संतुष्ट करने के लिए एक-दूसरे पर आश्रित बना । जिससे विनिमय का उद्भव हुआ । प्रारम्भ के समय में वस्तु तथा सेवा के बदले में वस्तु एवं सेवा का विनिमय होता था । लेकिन मुद्रा की खोज होने से वस्तु तथा सेवा के बदले मुद्रा का विनिमय होने लगा है । व्यापार का अर्थ होता है, लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से चीज़-वस्तुओं का क्रय एवं विक्रय । व्यापार में दो पक्षकार होते हैं : (1) वस्तु या सेवा देनेवाला (विक्रेता) व्यापार की परिभाषाएँ (Definitions of Trade) :
व्यापार के लक्षण : व्यापार के लक्षण निम्नलिखित हैं : 1. विनिमय : व्यापार में विनिमय आवश्यक है । इसमें वस्तु एवं सेवा के बदले में वस्तु या सेवा अथवा वस्तु एवं सेवा के बदले में मुद्रा का विनिमय होता है । जैसे किसान द्वारा अनाज के बदले में जूते प्राप्त करना । दरजी कपड़ा सिलने के बदले में कुंभार से मिट्टी के बर्तन प्राप्त करे, मुद्रा के बदले में फ्रीज खरीदना इत्यादि । 2. मालिकी परिवर्तन : व्यापार से वस्तु या सेवा की मालिकी (स्वामित्व – ownership) में परिवर्तन होता हैं । वस्तु का विक्रय होने से बेचनेवाले से वस्तु की मालिकी का अधिकार खरीदनेवाला प्राप्त करता है । 3. दो पक्षकार : व्यापार में दो पक्षकारों का होना अनिवार्य होता है । दो पक्षकार नहीं तो व्यापार संभव नहीं बन सकता । कभी कोई एक व्यक्ति अकेला व्यापार नहीं कर सकता । इसलिए व्यापार में क्रेता एवं विक्रेता दो पक्षकार होने अनिवार्य हैं । 4. आर्थिक प्रवृत्ति : व्यापार भी एक आर्थिक प्रवृत्ति है । आर्थिक प्रवृत्ति में जैसे मुआवजा प्राप्त किया जाता है, ठीक इसी तरह व्यापार में मुआवजे के रूप में लाभ प्राप्त किया जाता है । 5. विकल्प : व्यापार के अन्तर्गत विकल्प होते हैं । व्यापार में वस्तु के विकल्प में वस्तु या सेवा ली जा सकती है तथा वस्तु या सेवा के विकल्प में मुद्रा ली जाती है । 6. सातत्य : व्यापार की प्रवृत्ति में सातत्य होना अनिवार्य है । केवल एक या दो बार क्रय या विक्रय होने से व्यापार नहीं कहलाता । अर्थात् क्रय-विक्रय सतत होना चाहिए । |
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धन्धे (Business) को आर्थिक प्रवृत्ति किस तरह कहा जा सकता है ? |
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Answer» धन्धे को आर्थिक प्रवृत्ति इसलिए कहा जा सकता है कि धन्धा यह आर्थिक प्रवृत्ति का भाग कहलाता है । आर्थिक प्रवृत्ति में आय कमाई जाती है, धन्धे में आय के रूप में लाभ कमाया जाता है, जो कि अनिश्चित होता है, धन्धे में कई बार हानि भी हो सकती है, फिर भी वह आर्थिक प्रवृत्ति ही कहलाती है । धन्धे का ख्याल लाभ के साथ संलग्न है । इस सन्दर्भ में एक परिभाषा निम्नानुसार है । – “धन्धा अर्थात् लाभ के उद्देश्य से की जानेवाली कोई भी विधिवत् की जानेवाली आर्थिक प्रवृत्ति ।” |
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बिन आर्थिक प्रवृत्ति के प्रेरक बल कौन-से हैं ? |
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Answer» बिन आर्थिक प्रवृत्ति के प्रेरक बल देश सेवा, समाज सेवा, प्रतिष्ठा प्राप्त करना, इच्छा, निजी विचारधारा, रिवाज़, धर्म, शौक (रुचि) इत्यादि बिन आर्थिक प्रवृत्ति के प्रेरक बल माने जाते हैं । |
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आर्थिक प्रवृत्ति के प्रेरक बल कौन-से हैं ? |
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Answer» आर्थिक प्रवृत्ति के प्रेरक बल निम्नलिखित हैं । जीवन-निर्वाह आवश्यकताओं को पूरा करना, सम्पत्ति का संग्रह, सुखी सम्पन्न जीवन, आराम एवं सुविधाएँ प्राप्त करना इत्यादि आर्थिक प्रवृत्ति के प्रेरक बल माने जाते हैं । |
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बिन-आर्थिक प्रवृत्ति का अर्थ उदाहरण द्वारा समझाइए । |
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Answer» वित्तीय मुआवजे की अपेक्षा बिन सेवा, ममता, प्रतिष्ठा से प्रेरित होकर कार्य, बिना मुआवजे के करना बिन-आर्थिक प्रवृत्ति कहलाती है । जैसे बिना मूल्य रोगी का उपचार, भूकंप व अकाल के समय में सेवा की भावना से किए गए राहत-कार्य, ब्लड डोनेशन कैम्प, देश की सेवा का कार्य इत्यादि । |
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कच्चे माल में से तैयार माल का उत्पादन हो अर्थात् कौन-से तुष्टिगुण का सर्जन होता है ?(A) स्थान(B) समय(C) आर्थिक(D) स्वरूप |
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Answer» सही विकल्प है (D) स्वरूप |
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धन्धे (Business) में नुकसान कब होता है ? |
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Answer» क्रय मूल्य अथवा लागत मूल्य से कम मूल्य पर वस्तु का विक्रय करने से धन्धे में नुकसान अथवा हानि होती है । |
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आर्थिक प्रवृत्ति के कितने प्रकार है ? .(A) दो(B) तीन(C) चार(D) पाँच |
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Answer» सही विकल्प है (B) तीन |
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धन्धे में महत्तम सम्पत्ति के सर्जन का उद्देश्य कौन-से आर्थिक लाभ के साथ सम्बन्धित है ?(A) संचालक(B) कर्मचारी(C) मालिक(D) ग्राहक |
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Answer» सही विकल्प है (C) मालिक |
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धन्धे (Business) का अस्तित्व चालू रखने के लिए क्या अनिवार्य है ?(A) अनार्थिक प्रवृत्ति(B) देशसेवा(C) लाभ(D) पुनः निर्यात |
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Answer» सही विकल्प है (C) लाभ |
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व्यापार की सहायक सेवाओं का मुख्य कार्य क्या है ? |
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Answer» व्यापार में आनेवाली कठिनाइयों को दूर करके व्यापार को सरल बनाने का कार्य करती है । |
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व्यापार की सहायक सेवाओं के नाम बताइए । |
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Answer» बैंक, बीमा, परिवहन सेवाएँ, गोदाम, आढ़तिया एवं संदेशाव्यवहार आदि सभी व्यापार की सहायक सेवाएँ कहलाती है । |
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किसी भी कार्य में से गलत दिशा में होनेवाले अनावश्यक हलनचलन में से उत्पन्न होनेवाले नुकसान को दूर करने की पद्धति अर्थात् क्या ?(A) समय निरीक्षण(B) गति निरीक्षण(C) भिन्न वेतन दर(D) कर्मचारी निरीक्षण |
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Answer» सही विकल्प है (B) गति निरीक्षण |
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किसी भी कार्य का भाग पूर्ण करने के लिए जितना समय लगेगा, इसके बारे में वैज्ञानिक रूप से किया जानेवाला अध्ययन अर्थात्(A) थकान निरीक्षण(B) समय निरीक्षण(C) गति निरीक्षण(D) उपरोक्त सभी |
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Answer» सही विकल्प है (B) समय निरीक्षण |
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टेलर की भिन्न वेतन दर की पद्धति के बारे में समझाइए । |
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Answer» कर्मचारियों को उनके काम के समय के आधार पर वेतन सम्बन्धी उत्तेजना देने की पद्धति अर्थात् भिन्न वेतनदर की पद्धति । उत्पादन बढ़ाने के लिए कर्मचारियों को उत्तेजन देने के लिए टेलर ने उत्तेजक वेतन प्रथा की सिफारिश की थी । कारखाने में काम करनेवाले प्रत्येक कर्मचारी की कार्य करने की क्षमता अलग-अलग होती है । उपरोक्त वास्तविकता को ध्यान में रखकर कार्यक्षम कर्मचारियों को अधिक उत्पादन के सन्दर्भ में अधिक वेतन मिलना चाहिए तथा कम कार्यक्षमतावाले कर्मचारियों को कम वेतन मिलना चाहिए । इस बात को ध्यान में रखकर टेलर ने भिन्न वेतन दर की पद्धति दी है । |
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कर्मचारियों की उनके काम के समय के आधार पर वेतन सम्बन्धी उत्तेजना देने की पद्धति अर्थात् ……………………….(A) भिन्न वेतन दर की पद्धति(B) समय वेतन की पद्धति(C) गति निरीक्षण की पद्धति(D) प्रमाणीकरण की पद्धति |
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Answer» सही विकल्प है (A) भिन्न वेतन दर की पद्धति |
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संचालन के सिद्धान्त अर्थात् क्या ?(A) अनुभव का निचोड़ है ।(B) संचालक निश्चित करते हैं ।(C) प्रयोग से निश्चित होते है ।(D) मैनेजर निश्चित करते है । |
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Answer» सही विकल्प है (A) अनुभव का निचोड़ है । |
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‘संचालन के सिद्धान्तों की सूची अन्तिम सूची नहीं है ।’ यह कथन संचालन के सिद्धान्त दर्शाते समय किसने दिया था ?(A) जॉर्ज टेरी(B) फ्रेडरिक टेलर(C) हेनरी फेयोल(D) ओडोनेल |
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Answer» सही विकल्प है (C) हेनरी फेयोल |
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नवीन पारंपरिक विचारधारा के प्रणेता कौन थे ?(A) हर्जबर्ग(B) हेनरी फेयोल(C) फ्रेडरिक टेलर(D) एल्टन मेयो |
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Answer» सही विकल्प है (D) एल्टन मेयो |
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मानसिक क्रान्ति का सिद्धान्त प्रस्तुत कर्ता कौन थे ?(A) फ्रेडरिक टेलर(B) हेनरी फेयोल(C) मार्शल(D) पीगू |
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Answer» सही विकल्प है (A) फ्रेडरिक टेलर |
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ध्येयलक्षी संचालन के बारे में पीटर ड्रकर ने कौन-सी बात बताई है ? |
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Answer» ध्येयलक्षी संचालन के बारे में पीटर ड्रकर ने बताया हैं कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए कर्मचारियों और संचालकों के उद्देश्य में एकसूत्रता होनी चाहिए । |
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19वीं शताब्दी के अन्त तक में जो विचारधाराएँ प्रस्तुत हुई हैं उन्हें कौनसी विचारधाराएँ कहते हैं ?(A) नवीन पारंपरिक(B) पूर्व पारंपरिक(C) पारंपरिक(D) आधुनिक |
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Answer» सही विकल्प है (C) पारंपरिक |
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फ्रेडरिक टेलर ने वैज्ञानिक संचालन के बारे में कितने सिद्धान्त दिये है ?(A) 05(B) 14(C) 08(D) 03 |
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Answer» सही विकल्प है (C) 08 |
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हेनरी फेयोल ने अपनी पुस्तक ‘औद्योगिक व सामान्य संचालन’ कब प्रस्तुत की थी ?(A) सन् 1916 में(B) सन् 1926 में(C) सन् 1947 में(D) सन् 1950 में |
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Answer» सही विकल्प है (A) सन् 1916 में |
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वर्तन व्यवहार सम्बन्धित विचाराधाराओं में कौन-कौन से ख्यालों का समावेश होता है ? |
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Answer» वर्तन व्यवहार सम्बन्धित विचारधारा में आन्तरमानवीय सम्बन्धों, अभिप्रेरण, नेतृत्व, औद्योगिक, झगड़ो का निराकरण, सूचना संचार की प्रक्रिया इत्यादि बातों का समावेश होता है । |
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‘Rule of Thumb’ किसे कहते हैं ? |
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Answer» श्रमिक अब तक आज्ञा के अनुसार कार्य करने के आदि थे । जिसे Rule of Thumb कहते हैं । क्योंकि मालिकों का वर्चस्व व जबरदस्ती. थी । |
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संचालन के सिद्धांतों का महत्त्व समझाइए । |
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Answer» संचालन के सिद्धांतों का महत्त्व निम्न है : (1) कार्यक्षमता में वृद्धि : संचालन के सिद्धांत संचालकों को विविध प्रकार की परिस्थितियों में किस तरह कार्य करना इस हेतु मार्गदर्शन प्रदान करता है । जिसके द्वारा धन्धाकीय इकाई की कार्य पद्धति में सुधार आता है तथा इससे संचालकीय कार्यक्षमता में वृद्धि दिखाई देती है । (2) संसाधनों का महत्तम उपयोग तथा प्रभावशाली प्रशासन : संचालन के सिद्धान्तो के माध्यम से संसाधनों का महत्तम उपयोग करना अनिवार्य है । संसाधनों का संचालन के सिद्धान्तों द्वारा इस तरह उपयोग करना कि जिससे कम से कम खर्च पर अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं । संचालन के सिद्धान्त संचालकों को उनके द्वारा लिये जानेवाले निर्णय, कार्यों का कारण और असर देखने के लिए अवसर देते है, जिससे प्रयत्न तथा भूल से होनेवाले नुकसान को रोका जा सकता है । (3) वैज्ञानिक तथा तार्किक निर्णयों के लिए उपयोगी : संचालन के सिद्धान्त संचालकों को योग्य निर्णय लेने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका. (4) बदलती हुई परिस्थितियों के अनुरूप धन्धाकीय पर्यावरण का सामना करने में उपयोगी : संचालन के सिद्धान्त सामान्यत: मार्गदर्शिका ही है, परन्तु बदलती हुई परिस्थिति में बदलता हुआ धन्धाकीय पर्यावरण का सामना करने के लिए संचालन के सिद्धांतों की आवश्यकता रहती है । (5) सामाजिक जिम्मेदारी निभाना : धंधा यह समाज का अभिन्न अंग है । लाभ को धंधे का एक उद्देश्य माना जाता है, परन्तु एक मात्र उद्देश्य नहीं, समाज का विकास तथा उन्नती यह भी धन्धाकीय इकाई का उद्देश्य है । संचालन के सिद्धांतो के प्रभावशाली अमल से धन्धाकीय इकाई सरलता से सामाजिक दायित्व का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं । (6) संशोधन, प्रशिक्षण तथा विकास में सहायक : संचालन के सिद्धांतो के उपयोग द्वारा ही प्रशिक्षण, शिक्षण तथा विकास का कार्य सफल होता है । जैसे कि, अब विभिन्न धन्धाकीय इकाइयों में भर्ती के लिए अभिरूचि कसौटी ली जाती है । इन अभिचि कसौटी को संशोधन से तैयार किया जाता है तथा संचालन के सिद्धांतो के अमल द्वारा इनका उपयोग करके योग्य कर्मचारी की नियुक्ति की जाती है । |
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‘संचालन के सिद्धान्त यह मानव व्यवहार पर आधारित है’ विधान समझाइए । |
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Answer» संचालन के सिद्धांत यह मानव व्यवहार पर आधारित है, यह विधान सत्य है । क्योंकि संचालन में मानव केन्द्रस्थान पर होने से संचालन के सिद्धान्त यह मानव व्यवहार पर अधिक प्रभावित करती है । संचालन के सिद्धांतो का मानवीय व्यवहार के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध जुड़ा हुआ है तथा मानवीय व्यवहार मनोवैज्ञानिक बात है, जो कि संचालन के सिद्धांतो के अमल के समय ध्यान में लिया जाना अनिवार्य कहलाता है । |
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वैज्ञानिक संचालन की विचारधारा के प्रणेता कौन हैं ?(A) ल्युथर ग्युलिक(B) फ्रेडरिक टेलर(C) हेनरी फेयोल(D) पीटर एफ. ड्रकर |
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Answer» सही विकल्प है (B) फ्रेडरिक टेलर |
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पारंपरिक विचारधाराओं के बारे में विस्तार से समझाइए । |
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Answer» पारंपरिक विचारधाराएँ Thought of Classical Theory : संचालन की विचारधाराओं में 19वी शताब्दी के अन्त तक में जो विचारधाराएँ प्रस्तुत हुई वह विचारधाराएँ पारंपरिक विचारधारा के रूप में पहचानी जाती है । इस विचारधारा के मुख्य प्रणेता संचालनशास्त्री फ्रेडरिक टेलर, मेक्स वेबर, गील बर्थ, हेनरी गेन्ट और हेनरी फेयोल है । पारंपरिक विचारधारा में टेलर का बहुत बड़ा योगदान है । फेडरिक टेलर द्वारा प्रस्तुत वैज्ञानिक संचालन के सिद्धांत संचालन विचारधारा में आज भी प्रस्तुत है । वैज्ञानिक संचालन का अभिगम रूढ़िगत पद्धतियों के बदले में समय निरीक्षण और गति निरीक्षण द्वारा वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत हुए सिद्धांतो को अपनाने की सिफारिश करते है । वैज्ञानिक संचालन के सिद्धांत का मुख्य योगदान व्यवस्थातंत्र में विशिष्टीकरण, उत्तेजित वेतन प्रथा, जिम्मेदारी तथा कार्य की वैज्ञानिक ढंग से वितरण होता है । पारंपरिक विचारधारा में हेनरी फेयोल का योगदान भी महत्त्वपूर्ण रहा है । उन्होंने संचालन के सामान्य सिद्धांत देकर संचालन विचारधारा में महत्त्व का योगदान दिया । उसने धन्धाकीय इकाई में विविध कार्यों के स्तर निश्चित करके, कार्यों की मर्यादा निश्चित करने का प्रयत्न किया । विभिन्न स्तर पर संचालकीय जिम्मेदारी निभाने के लिए संचालन के सार्वत्रिक सिद्धांत मार्गदर्शक के रूप में दिये है । इसके अलावा पारंपरिक विचारधारा में मेक्स वेबर के अमलदारशाही के विचार का भी योगदान रहा है । 19वीं शताब्दी के अन्त तक औद्योगिक क्रान्ति के परिणाम स्वरूप धन्धाकीय इकाईयों का स्वरूप और कद बदलने लगे । जिसके परिणामस्वरूप पारंपरिक विचारधारा की अनेक मर्यादाओं के कारण उसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता उत्पन्न हुई । इनकी मर्यादाओं में मुख्यरूप से वित्तीय उत्तेजन को अधिक स्थान, मानवीय अभिगम को कम महत्त्व तथा अनौपचारिक सम्बन्धों की अवगणना मुख्य हैं । |
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हेनरी फेयोल के संचालन के सिद्धांत समझाइए । |
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Answer» हेनरी फेयोल के संचालन सिद्धांत : हेनरी फेयोल ने अपने अनुभव एवं ज्ञान के आधार पर संचालन के सिद्धांतो को निम्नानुसार दर्शाया है । इनके सिद्धांत इतने आवश्यक एवं सहायक रूप बने कि इकाई के हेतु सिद्ध किया जा सकें । (1) कार्य – विभाजन का सिद्धांत : इकाईयों में कार्य विशाल मानवीय समूह द्वारा किया जाता है । विशाल मानवीय समूह के बीच कार्य का विभाजन आवश्यक है । बड़ी इकाईयों में सफलता का मुख्य आधार ही कार्य विभाजन है । कार्य विभाजन से कार्य में सरलता, संतोष एवं उत्साह होता है । कार्य विभाजन से विशिष्टीकरण का लाभ प्राप्त हो सकता है । आपसी सहकार एवं संकलन सरल बनता है । (2) सत्ता एवं जिम्मेदारी का सिद्धांत : संचालन के घटकों में सत्ता एवं जिम्मेदारी महत्त्वपूर्ण घटक है । सत्ता एवं जिम्मेदारी एक सिक्के के दो पहेलू के समान है । सत्ता अर्थात् कार्य करवाने का अधिकार परन्तु कार्य समयानुसार हो इसकी जिम्मेदारी के लिए सत्ता आवश्यक है । सत्ता एवं जिम्मेदारी सौंपते समय अधिकारी के व्यवहार, योग्यता कार्य का अनुभव, नेतृत्व की कला उम्र इत्यादि को ध्यान में रखना चाहिए इससे कर्मचारियों में उत्साह एवं निर्धारित उद्देश्य की सफलता अनिवार्य बनती है । (3) शिस्त के संदर्भ का सिद्धांत : शिस्त इकाई में एक अलग वातावरण तैयार करती है । बड़ी इकाईयों में शिस्त का पालन हो इसके लिए आधार संहिता बनाई जाती है । शिस्त के पालन से नियमितता आती है । अनुशासन स्थापित होता है । शिस्त में कर्मचारीगणों में शक्ति आती है । संकलन सरल बनता है । कर्मचारियों को कार्य के प्रति आनंद एवं उत्साह बढ़ेगा शिस्त की सफलता का आधार नेतृत्व पर है । अत: शिस्त सफल नेतृत्व की चाबी है । (4) आदेश की एकरूपता का सिद्धांत : संचालन अर्थात् मानवीय समूह से काम लेने की कला । इसके लिए कर्मचारियों को आदेश देना पड़ता है । आदेश वैधिक या अवैधिक भी हो सकता है । आदेश देकर संचालक अपना कार्य शांतिपूर्वक करता है कारण कि विश्वास होता है । कि कर्मचारी द्वारा आदेश का पालन होगा ही आदेश की एकरूपता अर्थात् आदेश या सत्ता एक ही व्यक्ति या अधिकारी के पास होनी चाहिए । अनेको व्यक्तियों के आदेश का पालन करने में कर्मचारी गण उलझन में आ जाते है । अत: आदेश का एकाधिकार अनिवार्य है । आदेश के पालन के विचलन आने से दिशा-निर्देश एवं अंकुश अनिवार्य बनता है । आदेश की एकरुपता से शिष्य बना रहता है । एक व्यक्ति के आदेश देने से जिम्मेदार व्यक्ति निश्चित होता है । अत: आदेश की एकरूपता से परस्पर सहकार एवं कार्य करने में विलंब नहीं होता । (5) सामान्य हित को मुख्य एवं व्यक्तिगत हित को गौण स्थान : संचालन यह समूह प्रवृत्ति है । जिससे व्यक्तियों-व्यक्तियों के बीच, विभागो-विभागो के बीच आपसी सहकार से इकाई का निर्धारित उद्देश्य सरलता से सफल हो सकता है । इकाई के उद्देश्य की सफलता यह सामान्य हित की बात है । इकाई में सभी के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रवृत्ति की जानी चाहिए न कि किसी व्यक्ति के हित को ध्यान में रखकर प्रवृत्ति या निर्णय लेना चाहिए । (6) कर्मचारी वेतन का सिद्धांत : कर्मचारी एवं कारीगर मानसिक एवं शारीरिक श्रम करते हैं । इसके बदले प्रतिफल के तौर पर वेतन प्राप्त होता है । मात्र वेतन ही देना आवश्यक नहीं परंतु वेतन नियमानुसार करके देना चाहिए वेतन में विसमता कर्मचारी एवं कारीगरों में निरसता का भाव पैदा कर सकती है । जो कर्मचारी एवं कारीगर कार्यक्षम ढंग से कार्य करता है । उसे अधिक बोनस एवं अतिरिक्त वेतन प्राप्त होनी चाहिए इस प्रकार का न हो तो कारीगर परिवर्तन का प्रश्न देखने को मिलता है । इसके साथ-साथ इकाई को अधिक लाभ में भी हिस्सा प्राप्त होना चाहिए । यह इकाई के विकास का आभारी है । (7) मार्गदर्शन की एकरूपता का सिद्धांत : आयोजन भविष्य की रूपरेखा है जो कार्य विभाजन और विशिष्टीकरण के द्वारा पूरी की जाती है । आयोजन के अमल के द्वारा यदि विचलन दिखाई दें तो मार्गदर्शन द्वारा दिये जाते है । यह मार्गदर्शन किसी निश्चित उच्च अधिकारी द्वारा ही दिया जाना चाहिए । ऐसा करने से एक समान कार्य तथा प्रयत्नों का संकलन सरलता से हो सकता है । इस सिद्धांत के अनुसार कर्मचारी समूह के उपर एक ही अधिकारी होना चाहिए तथा यह समूह एक ही उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सामुहिक कार्य करनेवाला होना चाहिए । (8) केन्द्रीयकरण का सिद्धांत : केन्द्रीयकरण के सिद्धांत से कर्मचारियों की शक्ति का श्रेष्ठ उपयोग होता है । कारण कि एक ही व्यक्ति पर सम्पूर्ण सत्ता होती है । परन्तु इकाई का कद विशाल हो तब केन्द्रीयकरण का सिद्धांत अपना कठिन बनता है । तब विकेन्द्रीयकरण को अपनाया जाता है । जिससे आदेश अनेक व्यक्तियों द्वारा दिए जाते है । (9) समान रेखीय श्रृंखला का सिद्धांत : आदेश की एकरुपता में आदेशकर्ता अनेक व्यक्ति नहीं परंतु निश्चित कर्मचारीगण होते हैं । आदेश उच्च स्तर से निम्न स्तर के लोगों को दिया जाता है । निम्न स्तर से उच्च स्तर की और कार्य में विलंब के विषय में माहिती प्रेषण होता है । परन्तु कौन आदेश देनेवाला व्यक्ति है । आदेश का पालन करनेवाला कौन है । यह निश्चित होना चाहिए इसके आधार पर एक श्रृंखला बनती है । जो उच्च स्तर से निम्नस्तर की तरफ जाती है । (10) व्यवस्था का सिद्धांत : व्यवस्था का सिद्धांत दो वस्तुओं पर आधारित है । मालसामान की व्यवस्था एवं सामाजिक व्यवस्था मालसामान की प्रत्येक सामग्री यथा योग्य स्थान पर होनी चाहिए तथा प्रत्येक स्थान के लिए योग्य वस्तु होनी चाहिए इसी प्रकार प्रत्येक कर्मचारी को योग्य स्थान पर नियुक्ति करना चाहिए तथा योग्य स्थान पर योग्य कर्मचारी को नियुक्ति होनी चाहिए । (11) समानता का सिद्धांत : कर्मचारी उत्पादन का एक हिस्सा है । कर्मचारियों से काम लेते समय व्यवहारात्मक अभिगम अपनाया जाता है । अत: प्रत्येक कर्मचारी के प्रति एक समान व्यवहार रखा जाता है । इसके लिए वैधिक नहीं परंतु अवैधिक माहिती प्रेषण अनिवार्य बनता है । जिससे मालिक एवं कर्मचारियों के प्रति आत्मियता एवं परस्पर सहकार की भावना बढ़ती है । (12) नौकरी की स्थिरता का सिद्धांत : स्थायी कर्मचारी गण इकाई के लिए पूँजी के समान है । स्थायी कर्मचारी इकाई के लिए मददरुप बनता है । एवं मजूर परिवर्तन का प्रमाण घटता है । स्थायी कर्मचारी हेतु इकाई में प्रशिक्षण, इत्यादि की सुविधा देना अनिवार्य है । (13) नवीन कार्य की सूत्रपात्र या सिद्धांत : कर्मचारियों को हमेशा नवीन-नवीन करने की इच्छा होती है । कर्मचारी को जो कार्य सौंपा गया है । इसी कार्य को नवीन-नवीन पद्धतियों से करने का प्रयास करता है । अत: ऐसे कर्मचारी को इकाई की तरफ से समय-समय प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए जिससे कर्मचारी की इकाई के प्रति समर्पण की भावना बढ़े । (14) समूह भावना (संकलन) का सिद्धांत : धंधाकीय इकाई की सफलता का आधार मालिक एवं कर्मचारियों के परस्पर संबंधो पर आधारित है । अत: दोनो वर्गों के बीच मधुर संबंध होना चाहिए । इससे अधिक उत्पादन एवं लाभ में वृद्धि दोनों में ही वृन्द्रि होती है । इस पर इकाई में समूह की भावना बनी रहे । तथा इसमें विकास हो इसलिए संचालकों को समूह भावना बनाए रखने में अपना व्यक्तिगत सहयोग देना चाहिए । |
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संचालन के सिद्धान्तों की सफलता का आधार किस पर होता है ? |
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Answer» संचालन के सिद्धान्तों की सफलता का आधार संचालक के मानवीय सम्बन्ध पर आधारित है । अर्थात् संचालक की कुशाग्र बुद्धि पर रहता है । |
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