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17101.

मेरा कर्नाटक महान / कर्नाटक का वैभव पर निबन्ध लिखें।

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कर्नाटक भारत का आठवां सबसे बड़ा राज्य है। इसकी जनसंख्या करीब छः करोड़ है। कर्नाटक की प्राकृतिक सुषमा नयन मनोहर है। कर्नाटक राज्य में तीन प्रधान मंडल हैं: तटीय क्षेत्र करावली, पहाड़ी क्षेत्र मलेनाडु जिसमें पश्चिमी घाट आते हैं, तथा तीसरा बयलुसीमी क्षेत्र जहां दक्खिन पठार का क्षेत्र है। राज्य का अधिकांश क्षेत्र बयलुसीमी में आता है और इसका उत्तरी क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा शुष्क क्षेत्र हैं।

कर्नाटक की आधिकारिक और सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा कन्नड़ है और इसकी राजधानी बेंगलूरु है। बेंगलूरु शिक्षा, उद्योग तथा विज्ञान का केन्द्र माना जाता है। इसे ‘सिलिकॉन सिटी’ भी कहते हैं। यह भारत में हो रही त्वरित आर्थिक एवं प्रौद्योगिकी का अग्रणी योगदानकर्ता है। भारत में कर्नाटक जैवप्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अग्रणी है।

सर सी.वी. रामन, सर एम. विश्वेश्वरय्या, डॉ. सी.एन.आर. राव, डॉ. शकुंतला देवी जैसे दिग्गजों ने वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नारायण मूर्ति ने कर्नाटक का नाम रोशन किया है। सन् 2013 में डॉ. सी.एन.आर. राव को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया है।

कर्नाटक में सोना, ताँबा, लोहा आदि कई प्रकार की उपयोगी धातुएँ मिलती हैं। कागज, लोहे. और इस्पात के कारखाने हैं। चीनी, सिमेंट, रेशम के भी कारखाने हैं। कर्नाटक को ‘चंदन का आगार’ भी कहते हैं। भारत के अग्रणी बैंकों में से सात बैंकों का उद्गम इसी राज्य से हुआ था। भारत के. करोड़ों रेशम उद्योग से अधिकांश भाग कर्नाटक राज्य में आधारित है। यहाँ की बेंगलोर सिल्क और मैसूर सिल्क विश्वप्रसिद्ध हैं।

अपने विस्तृत भूगोल, प्राकृतिक सौन्दर्य एवं लम्बे इतिहास के कारण कर्नाटक राज्य बड़ी संख्या में पर्यटन आकर्षणों से परिपूर्ण है। राज्य के मैसूर में स्थित महागाजा पैले” इतना आलीशान एवं खूबसूरत बना है, कि उसे विश्व के दस कुछ सुंदर महलों में गिना जाता है। कर्नाटक के पश्चिमी घाट में आनेवाले तथा दक्षिणी जिलों में प्रसिद्ध पारिस्थितिकी पर्यटन स्थल हैं जिनमें कुद्रेमुख, मडिकेरी तथा आगुम्बे आते हैं। राज्य में 25 वन्य जीवन अभयारण्य एवं 5 राष्ट्रीय उद्यान हैं। इनमें से कुछ प्रसिद्ध हैं बंडीपुर राष्ट्रीय उद्यान, बनेरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान एवं नागरहोले राष्ट्रीय उद्यान।

हम्पी में विजयनगर साम्राज्य के अवशेष तथा पत्तदकल में प्राचीन पुरातात्विक अवशेष युनेस्को विश्व धरोहर चुने जा चुके हैं। इनके साथ ही बादामी के गुफा मंदिर तथा ऐहोले के पाषाण मंदिर बादामी चालुक्य स्थापत्य के अद्भुत नमूने हैं तथा प्रमुख पर्यटक आकर्षण बने हुए हैं। यहाँ बने गोलगुम्बज तथा इब्राहिम रौजा दक्खन सल्तनत स्थापत्य शैली के अद्भुत उदाहरण हैं। श्रवणबेलगोला में स्थित गोमटेश्वर की 18 मीटर ऊंची मूर्ति विश्व की सर्वोच्च एकाश्म प्रतिमा है। हाल के कुछ वर्षों में कर्नाटक स्वास्थ्य रक्षा पर्यटन हेतु एक सक्रिय केन्द्र के रूप में भी उभरा है। राज्य में देश के सर्वाधिक स्वीकृत स्वास्थ्य प्रणालियाँ और वैकल्पिक चिकित्सा उपलब्ध हैं।

कर्नाटक का विश्वस्तरीय शास्त्रीय संगीत में विशिष्ट स्थान है, जहां संगीत की कर्नाटिक और हिन्दुस्तानी शैलियाँ स्थान पाती है। राज्य में दोनों ही शैलियाँ के पारंगत कलाकार हुए हैं। वैसे कर्नाटिक संगीत में कर्नाटिक नाम कर्नाटक राज्य विशेष का ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत को दिया गया है।

कर्नाटिक संगीत के कई प्रसिद्ध कलाकार जैसे गंगूबाई हंगल, मल्लिकार्जुन मंसूर, भीमसेन जोशी, बसवराज राजगुरु, सवाई गंधर्व और कई अन्य कर्नाटक राज्य से हैं और इनमें से कुछ को कालिदास सम्मान, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी भारत सरकार ने सम्मानित किया हुआ है।

राज्य में भारत के कुछ प्रतिष्ठित शैक्षिक और अनुसंधान संस्थान भी स्थित हैं, जैसे भारतीय विज्ञान संस्थान, भारतीय प्रबंधन संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, आई.आई.टी., कर्नाटक और भारतीय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय आदी।

बसवण्णा, अक्कमहादेवी, अल्लमप्रभु, सर्वज्ञ जैसे संतों ने अपने अनमोल वचनों से मार्गदर्शन किया है, तो पुरंदरदास, कनकदास आदि भक्त कवियों ने नीति और भक्ति की सरिता का प्रवाह किया है। इतना ही नहीं, पंपा, रन्ना, पोन्ना, कुमारव्यास, हरिहर, राघवांक जैसे कवियों ने कन्नड़ साहित्य को समृद्ध किया है।

वर्तमान में कुवेंपु, बेंद्रे, शिवराम कारंत, मास्ति वेंकटेश अय्यंगार, गोकाक, अनन्तमूर्ति, कार्नाड तथा कंबार दिग्गज साहित्यकारों को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ है। यह हमारे कर्नाटक राज्य के लिए गौरव का विषय है। इन्ही कारणों से मेरा कर्नाटक महान है और मुझे अपने कर्नाटक राज्य पर बहुत गर्व है।

17102.

स्वच्छ भारत अभियान / स्वच्छता का महत्व पर निबन्ध लिखें।

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स्वस्थ जीवन जीने के लिए स्वच्छता का विशेष महत्व है। आरोग्य को नष्ट करने के जितने भी कारण हैं, उनमें गन्दगी प्रमुख है। बीमारियाँ गन्दगी में ही पलती हैं। जहाँ कूड़े-कचरे के ढेर जमा रहते हैं, मल-मूत्र सड़ता है, नालियों में कीचड़ भरी रहती है, सीलन और साड़न बनी रहती है, वहीं मक्खी, पिस्सू, खटमल जैसे बीमारियाँ उत्पन्न करने वाले कीड़े उत्पन्न होते हैं। कहना न होगा कि हैजा, मलेरिया, दस्त, पेट के कीड़े, चेचक, खुजली, रक्त-विकार जैसे कितने ही रोग इन मक्खी, मच्छर जैसे कीड़ों से ही फैलते हैं।

महात्मा गांधी ने अपने आसपास के लोगों को स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था। उन्होंने ‘स्वच्छ भारत’ का सपना देखा था। वे चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एक साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिए कार्य करें। महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के स्वप्न को पूरा करने के लिए, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया है। इस अभियान का उद्देश्य अगले पांच वर्ष में स्वच्छ भारत का लक्ष्य प्राप्त करना है ताकि बापू की 150 वीं जयंती को इस लक्ष्य की प्राप्ति के रूप में मनाया जा सके।

शहरी क्षेत्रों के लिए स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य 1.04 करोड़ परिवारों को लक्षित करते हुए 2.5 लाख समुदायिक शौचालय, 2.6 लाख सार्वजनिक शौचालय, और प्रत्येक शहर में एक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा प्रदान करना है। ग्रामीण क्षेत्रों के लिए स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य पांच वर्षों में भारत को खुला शौच से मुक्त बनाना है। अभियान के तहत देश में लगभग 11 करोड़ 11 लाख शौचालयों के निर्माण के लिए एक लाख चौंतीस हजार करोड़ रुपए खर्च किये जाएंगे।

स्वच्छ भारत अभियान का उद्देश्य केवल आसपास की सफाई करना ही नहीं है अपितु नागरिकों की सहभागिता से अधिक-से-अधिक पेड़ लगाना, कचरा मुक्त वातावरण बनाना, शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराकर एक स्वच्छ भारत का निर्माण करना है। देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए स्वच्छ भारत का निर्माण करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

सरकार जन समुदाय की सक्रिय भागीदारी के बिना किसी भी अभियान में सफलता प्राप्त नहीं कर सकती। इसके लिए व्यापक जन चेतन कार्यक्रम चलाना होगा। स्कूली विद्यार्थीयों को अपने घर तथा पड़ोस के सभी घरों में शौचालय का होना तथा इसका उपयोग सुनिश्चित करना चाहिए। उनको अपने घर तथा आस पड़ोस में अच्छी आदतों को फैलाना चाहिए। घर, गली, स्कूल तथा अन्य सभी सार्वजनिक स्थानों पर गन्दगी नहीं फैलाना चाहिए तथा कचरा पात्र में ही कचरा डालना चाहिए। खुले में शौच नहीं जाना चाहिए।

अस्वच्छ भारत की तस्वीरें भारतीयों के लिए अक्सर शर्मिंदगी की वजह बन जाती है। इसलिए स्वच्छ भारत के निर्माण एवं देश की छवि सुधारने का यह समय और अवसर है। यह अभियान न केवल नागरिकों को स्वच्छता संबंधी आढ़तें अपनाने बल्कि हमारे देश की छवि स्वच्छता के लिए तत्परता से काम कर रहे देश के रूप में बनाने में भी मदद करेगा।

17103.

मेरा प्रिय खेल पर 250 शब्दो का निबंध।

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खेल कई प्रकार के होते हैं । कक्ष के भीतर खेले जाने वाले खैलों को इनडोर गेम्स कहा जाता है, जबकि मैदान पर खेले जाने वाले खेल आउटडोर गम्स कहलाते हैं । अलग-अलग प्रकार के खेल व्यायाम के महत्त्वपूर्ण अंग है । अत: अपनी रुचि एवं शारीरिक क्षमता के अनुकूल ही खेलों का चयन करना चाहिए । खेलकूद आज विभिन्न राष्ट्रों के मध्य सांस्कृतिक मेल-जोल बढ़ाने का एक उत्तम माध्यम बन गया है ।

मेरा प्रिय खेल क्रिकेट है । आधुनिक युग मैं इस खेल को अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व प्राप्त है । भारत में यह खेल सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है । इस खेल से लोगों को अद्‌भुत लगाव है । क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या नवयुवक, सभी इसके दीवाने हैं ।

क्रिकेट का जन्म इंग्लैण्ड में हुआ था । इंग्लैण्ड से ही यह खेल रुलिया पहुँचा, फिर अन्य देशों में भी इसका प्रसार हुआ । यह खेल नियमानुसार सर्वप्रथम 1850 ई. में गिलफोर्ड नामक विद्‌यालय में खेला गया था । क्रिकेट का पहला टैस्ट मैच 1877 ई. में ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न शहर में खेला गया था । भारत ने अपना पहला टेस्ट मैच इंग्लैण्ड के विरुद्ध सन् 1932 में खेला था । टेस्ट मैच पाँच दिनों का होता है जो दो पारियों में खेला जाता है । टेस्ट मैच के अलावा यह खेल चार दिवसीय, तीन दिवसीय, एक दिवसीय भी होता है । आजकल एक दिवसीय क्रिकेट मैच तथा ट्‌वेंटी-20 मैच अधिक लोकप्रिय हो गया है । ट्‌वेंटी-20 मैच तीन-चार घंटे में ही समाप्त हो जाता है ।

क्रिकेट का खेल बड़े-से अंडाकार मैदान में खेला जाता है । मैदान के मध्य में स्थित पिच या विकेट-स्थल इस खेल का केन्द्र-बिन्दु होता है । पिच के दोनों तरफ बराबर दूरी पर तीन डंडे गाड़ दिए जाते हैं, जिन्हें ‘ विकेट ‘ कहते हैं । इस खेल में दो टीमें होती हैं । प्रत्येक टीम में 11 – 11 खिलाड़ी होते हैं । खेल आरंभ होने पर एक टीम के खिलाड़ी बल्लेबाजी करते हैं तथा दूसरी टीम के खिलाड़ी क्षेत्ररक्षण करते हैं । जीत-हार का फैसला रनों के आधार पर होता है । खेल के निर्णायक को अंपायर कहा जाता है जो खेल के दौरान विकटों के पीछे खड़ा होता है ।

आरंभ में क्रिकेट को राजा-महाराजाओं या धनाढ्य लोगों का खेल कहा जाता था । वे अपने मन-बहलाव के लिए यह खेल खेला करते थे । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हॉकी को राष्ट्रीय खेल का दर्जा दिया गया, परंतु हाँकी के साथ-साथ क्रिकेट भी लोकप्रिय होता चला गया । इस खेल में समय और धन अधिक लगता है फिर भी आज यह शहरों से लेकर गाँवों तक प्रसिद्धि पा चुका है । इसकी लोकप्रियता इस बात से सिद्ध होती है कि जहाँ-जहाँ भी यह खेल होता है, जनसमूह मैदान की ओर उमड़ पड़ता है ।

क्रिकेट का खेल यद्‌यपि लोकप्रिय है, तथापि इस खल में कुछ खामियाँ भी हैं । क्रिकेट मैचों के दौरान प्राय: सारे काम ठप्प पड़ जाते हैं । लोग काम करना छोड़ रनों और विकटों की चर्चा करने लगते हैं । कोइ रेडियो से कान चिपकाए है तो कोई टेलीविजन पर नजरें गड़ाए है । इससे राष्ट्रीय उत्पादन पर असर पड़ता है ।

क्रिकेट का बुखार थमने का नाम नहीं ले रहा । यह खेल भारत की पहचान से जुड़ गया है । क्रिकेट को लेकर लोग मानसिक तौर पर ‘ जुनून ‘ की हद पार करने लगे हैं । क्रिकेट लोगों का धर्म बन गया है । क्रिकेट में मिली हार से लोग मायूस हो जाते हैं । क्रिकेट में मिली जीत से लोग खुश होकर सड़कों पर नाचने लगते हैं । इस खेल में धन, शोहरत और आनंद का संगम है । यह केवल मेरा ही नहीं, मेरी तरह करोड़ों भारतवासियों का सबसे पसंदीता खेल है ।

17104.

मेरा प्रिय खेल पर निबंध लिखिए।

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मुझे हॉकी का खेल सभी खेलों से अच्छा लगता है। हॉकी रोचक एवं उपयोगी खेल है। हॉकी खेल में सबसे पहली आवश्यकता है – तीव्र वेग से दौड़ना यदि खिलाडी तेज नहीं दौड़ सकता, तो वह विपक्षी खिलाड़ी से पिछड जाएगा। दूसरी आवश्यकता है – हस्तलाघव या हाथ की चतुराई। तीसरी आवश्यकता है – परस्पर सहयोग।

अच्छे खिलाड़ी कभी आपस में लड़ते नहीं और न कभी जान-बूझकर एक-दूसरे को चोट पहुंचाने का यत्न करते हैं। सभी खिलाड़ी भले नहीं होते। कुछ खिलाड़ी हार से बचने के लिए विपक्षी खिलाड़ियों को चोट पहुँचाने की कोशिश करते हैं जो बुरी बात है। खेल को खेल ही रखना चाहिए।
हॉकी की इन सब विशेषताओं के कारण यह खेल मुझे सबसे अधिक प्रिय है।

17105.

निबन्ध:मेरा प्रिय खेल : क्रिकेट

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प्रस्तावना व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए शिक्षा और भोजन ही पर्याप्त नहीं हैं, वरन् इनके लिए खेलकूद भी परमावश्यक है। खेल जहाँ एक ओर मनोरंजन करते हैं, वहीं दूसरी ओर इनसे खिलाड़ियों में अनुशासन और परस्पर सद्भाव भी जाग्रत होता है। मानव के विकास में खेलों के महत्त्व को समझते हुए उनको प्रोत्साहित करने की दृष्टि से अनेक क्रीड़ा प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। आज का व्यक्ति गम्भीर और जटिल होता चला जा रहा है। उसे पुन: बालकों की भाँति उत्साही, साहसी व खुशमिजाज बनने के लिए खेलों की ओर मुड़ना चाहिए। आज सभी वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि जो स्फूर्ति खेलों से प्राप्त हो सकती है, वह किसी ओषधि से नहीं।

हमारे विद्यालय का क्रिकेट मैच–प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी नवम्बर मास में हमारे विद्यालय में अन्य खेलों के साथ-साथ क्रिकेट का आयोजन हुआ। इसमें हमारे विद्यालय की क्रिकेट टीम का मुकाबला स्थानीय एस० एस० डी० कॉलेज की क्रिकेट टीम से हुआ। हमारे विद्यालय  एस०डी० इण्टर कॉलेज की क्रिकेट टीम नगर की अन्य टीमों की तुलना में बहुत सुदृढ़ है। हमारे बल्लेबाज और गेंदबाज दोनों ही कुशल हैं तथा उनका क्षेत्ररक्षण बहुत चुस्त है। दूसरी टीम भी बहुत सुदृढ़ थी। खेल का आयोजन हमारे ही विद्यालय के मैदान में हुआ, जो नगर के मध्य में स्थित है। दोनों टीमों का मुकाबला बहुत रोमांचक रहा, जिसकी याद मन-मस्तिष्क में सदा ताजा रहेगी।

खेल के मैदान की व्यवस्था—यह मैच 50-50 ओवरों का था। खेल 9 बजे शुरू होना था। दोनों विद्यालय के छात्र और बहुत बड़ी संख्या में स्थानीय दर्शक वहाँ पर एकत्रित हो चुके थे। मैं तो समय से पहले ही वहाँ पहुँच गया था। खेल के आयोजन की सुन्दर व्यवस्था थी। जिला विद्यालय निरीक्षक इस मैच के मुख्य अतिथि थे। मैदान में सफेद चूने से रेखाएँ खींची हुई थीं। मैदान के चारों ओर दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी। कुछ ही देर में दोनों टीमों के कप्तान भी आये। सिक्का उछालकर टॉस हुआ। हमारे विद्यालय के कप्तान ने टॉस जीता और पहले दूसरी टीम को बल्लेबाजी करने के लिए आमन्त्रित किया।

मैच का आरम्भ-खेल शुरू हुआ। हमारी टीम के तेज गेंदबाज ने खेल की पहली गेंद फेंकी। बल्लेबाज जल्दबाजी कर बैठा और गेंद उसके बल्ले का बाहरी कोना लेते हुए विकेट-कीपर के हाथों में जा । पहुँची। इस तरह हमारी टीम को पहली सफलता मिली। अगला खिलाड़ी बल्लेबाजी के लिए आया। दोनों ने बहुत तालमेल के साथ दूसरे विकेट की साझेदारी में 120 रन बनाये, जिनमें दस चौके और चार शानदार छक्के सम्मिलित थे। हमारे कप्तान के पसीने छुट रहे थे। कप्तान ने अब गेंद फिरकी गेंदबाजों को सौंपी। उन्होंने इतनी सटीक गेंदबाजी की कि बल्लेबाजों के साथ ‘तू चल मैं आता हूँ की कहावत चरितार्थ हो गयी। एक के बाद एक बल्लेबाज आउट होते चले गए। अभी बयालिस ओवर ही फेंके गये थे कि सारी टीम मात्र 204 रनों पर सिमट गयी।।

भोजनावकाश के बाद का खेल–भोजन से निवृत्त होते ही एस० एस० डी० कॉलेज के खिलाड़ी मैदान में पहुँच गये। हमारी टीम के प्रारम्भिक बल्लेबाज मैदान पर पहुँचे और खेल आरम्भ हो गया। हमारे दोनों प्रारम्भिक बल्लेबाजों ने बहुत सूझ-बूझ और गति के साथ स्कोर को 80 तक पहुँचा दिया। पन्द्रह ओवर का खेल हो चुका था। दूसरी टीम के कप्तान ने अब स्वयं गेंद सँभाली और अपने क्षेत्ररक्षक चारों ओर फैला दिये। उसने बल्लेबाजों को खुलकर खेलने के लिए ललचाया। पहली ही गेंद पर चौका लगा। अगली गेंद बल्लेबाज को चकमा दे गयी। आरम्भिक जोड़ी टूट गयी। गेंदबाजों के हौसले बढ़े और उन्होंने जल्दी-जल्दी चार विकेट ले  लिये। शेष 25 ओवरों में 90 रन बनाने थे और छह विकेट हाथ में.थे। कोई मुश्किल लक्ष्य नहीं था, लेकिन कहते हैं कि क्रिकेट की हर गेंद निर्णायक हो सकती है। अब दो ओवर का खेल शेष था और जीत के लिए दस रन बनाये जाने थे। दोनों बल्लेबाजों ने आपसी तालमेल से विकेट के बीच दौड़ते हुए .1-1 रन लेना शुरू किया और पाँच रन बना लिये। क्षेत्ररक्षकों को करीब बुलाकर विपक्षी टीम के कप्तान ने उन्हें इस तरह रन बनाने से रोकना चाहा, लेकिन तभी बल्लेबाज ने स्थिति को समझते हुए गेंद को ऊपर हवा में उछाल दिया। गेंद सीमा-रेखा से बाहर हो गयी और हमारी टीम ने मैच में रोमांचक विजय प्राप्त की।

पुरस्कार-वितरण-खेल की समाप्ति पर मुख्य अतिथि ने पुरस्कार-वितरण किये। हमारी टीम के प्रारम्भिक बल्लेबाज को ‘मैन ऑफ द मैच’ घोषित किया गया और टीम के कप्तान को विजेता शील्ड प्रदान की गयी। इस प्रकार यह क्रिकेट प्रतियोगिता सम्पन्न हुई, जिसके रोमांचक क्षण आज भी मेरी स्मृति में ताजा बने हुए हैं।

उपसंहार–हम देख रहे हैं कि एशियन एवं ओलम्पिक खेलों की पदक तालिका में भारतवर्ष पिछड़ता जा रहा है। यह दयनीय स्थिति है। जनसंख्या में चीन के पश्चात् दूसरा स्थान रखने वाला, कभी हॉकी में स्वर्ण पदक विजेता रहा भारत आज कहीं नहीं जम पा रहा है और आजादी के छः दशक बाद भी खेलों के क्षेत्र में उसे निराशा ही हाथ लग रही है।

दुःख की बात है कि हम हर क्षेत्र में पिछड़े होने के प्रभाव से अभी तक मुक्त नहीं हो पाये हैं।  इस स्थिति से उबरने के लिए हमें खिलाड़ियों के उचित प्रशिक्षण, निष्पक्ष चयन व ईमानदार चयनकर्ताओं की अति आवश्यकता है।

17106.

निबन्ध:देशाटन

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प्रस्तावना–परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मानव का मन भी परिवर्तन चाहता है। जब मनुष्य एक स्थान पर रहता-रहता ऊब जाता है, तब उसकी इच्छा भ्रमण करने की होती है। भ्रमण का जीवन में बहुत महत्त्व है। भ्रमण से पारस्परिक सम्पर्क बढ़ता है, जिससे सद्भाव और मैत्री उत्पन्न होती है। यह ज्ञान-वृद्धि, मनोरंजन, स्वास्थ्य, व्यापार और विश्व-बन्धुत्व की दृष्टि से बहुत उपयोगी है।

देशाटन का अर्थ-‘देशाटन’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘देश’ + ‘अटन’। इसमें देश का अर्थ है–स्थान और ‘अटन’ का अर्थ है-भ्रमण। इस प्रकार देश-विदेश के विभिन्न स्थानों का भ्रमण करना ‘देशाटन’ कहलाता है। जीवन का वास्तविक आनन्द भ्रमण करने में ही निहित है। भ्रमण करने से मनुष्य का ज्ञान और अनुभव भी बढ़ता है। वैसे विज्ञान के आविष्कारों और पुस्तकों के माध्यम से देश-विदेश की बातें ज्ञात हो जाती हैं, लेकिन सच्चा आनन्द और वास्तविक सुख तो प्रत्यक्ष देखने से ही मिलता है।

देशाटन के साधनों का विकास–मानव प्राचीन काल से ही पर्यटन-प्रेमी रहा है। सभ्यता के विकास के मूल में उसकी पर्यटन-प्रियता छिपी है। मनुष्य कभी तीर्थयात्रा के बहाने, कभी व्यापार के लिए तो कभी ज्ञानार्जन के लिए विदेशों की यात्रा पर निकल पड़ता था। ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि भारतीय विदेशों में गये और विदेशी यात्री भारत आये। विदेशी यात्रियों में ह्वेनसांग, फाह्यान, वास्कोडिगामा आदि के नाम उल्लेखनीय रहे हैं। पहले पर्यटन के सुगम साधन  उपलब्ध नहीं थे, परन्तु आजकल विज्ञान की उन्नति से देशाटन के विभिन्न साधनों का विकास हो गया है, जिससे मानव थोड़े ही समय में सुदूर देशों की सुविधापूर्वक यात्रा कर सकता है। आज पर्यटन के शौकीन लोगों के लिए दूरस्थ तीर्थस्थलों, ऐतिहासिक इमारतों, गर्जन करते हुए समुद्रों और कल-कल करती हुई नदियों तक पहुँच बनाना यातायात के साधनों के माध्यम से अत्यधिक सरल हो गया है।

देशाटन : एक स्वाभाविक प्रवृत्ति-वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति थोड़ा-बहुत घूमना व देश-विदेश का भ्रमण करना चाहता है, परन्तु कुछ लोगों को देशाटन का विशेष शौक होता है। वे साधनों की परवाह न करके उत्साहपूर्वक भ्रमण करते हैं। घुमक्कड़ों का विचार है कि पैदल देशाटन करने में जो आनन्द प्राप्त होता है, वह किसी वाहन से पर्यटन करने में प्राप्त नहीं होता। परिणामस्वरूप आजकल भी लोग पैदल या साइकिल से देश-भ्रमण के लिए निकलते हैं। देशाटन के कारण मनुष्य की जिज्ञासा, खोज-प्रवृत्ति, मनोरंजन एवं अनुभववृत्ति की पूर्ति होती है।

देशाटन का महत्त्व-मनुष्य के जीवन में विभिन्न देशों के भ्रमण का बड़ा महत्त्व है। घूमना-फिरना। मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। देश-विदेश में घूमकर मनुष्य अपनी जानकारी बढ़ाता है और मनोविनोद करता है। नये-नये स्थान और वस्तुएँ देखने से उसकी कौतूहल-वृत्ति शान्त होती है तथा उसका पर्याप्त मनोरंजन भी होता है। भ्रमण करने से भौगोलिक, ऐतिहासिक, पुरातत्त्व सम्बन्धी, सामाजिक और राजनीतिक ज्ञान तथा अनुभव में वृद्धि होती है।

देशाटन से लाभ-देशाटन के अनेक लाभ हैं, जो निम्नवत् हैं।

(अ) प्रकृति का सान्निध्य-सर्वप्रथम मनुष्य को प्रकृति से निकटता प्राप्त होती है। प्राकृतिक दृश्यों को देखने से हृदय आनन्दित और शरीर स्वस्थ हो जाता है। उन्मुक्त पशु-पक्षियों की भाँति जीवन आनन्दमय प्रतीत होने लगता है। प्रकृति के सान्निध्य से सादगी एवं सद्गुणों का विकास भी होता है।

(ब) ज्ञान-वृद्धि-पर्यटन से ज्ञान-वृद्धि में सहायता मिलती है। किसी वस्तु का विस्तृत एवं यथार्थ ज्ञान भ्रमण से ही प्राप्त होता है। अजन्ता की गुफाओं, ताजमहल, कुतुबमीनार और ऐतिहासिक चित्तौड़ दुर्ग को देखकर व उन स्थानों से सम्बन्धित तथ्यों और गौरव-गाथाओं को सुनकर जितनी जानकारी होती है, उतनी पुस्तकों को पढ़ने या सुनने से नहीं हो सकती।

(स) मनोरंजन–मनोरंजन का सर्वाधिक उत्तम साधन पर्यटन है। भ्रमण करने से विविध प्रकार की वस्तुएँ देखने को मिलती हैं। हिमाच्छादित पर्वतमालाओं, कल-कल नाद करती हुई नदियों की धाराओं, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थानों को देखने से मन का अवसाद दूर हो जाता है।

(द) विश्व-बन्धुत्व की भावना-देशाटन करने से मैत्रीभाव की वृद्धि होती है। देश-विदेश में भ्रमण करने  से लोगों का सम्पर्क बढ़ता है, भाईचारे की भावना बढ़ती है तथा राष्ट्रीय एकता में वृद्धि होती है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, अर्थात् सारी वसुधा हमारा कुटुम्ब है, इस विराट भावे की अनुभूति होती है।

(य) व्यापार में वृद्धि–एक स्थान से दूसरे स्थान का भ्रमण करने से वहाँ की कृषि-उपज, खनिज सम्पदा, कलाकृतियों आदि की विशेष जानकारी मिलती है, जिससे व्यापारी लोग व्यापार की सम्भावनाओं का पता लगाकर अपना व्यापार बढ़ाते हैं।
उपर्युक्त लाभों के अतिरिक्त देशाटन से अन्य कई लाभ भी हैं। देशाटन से दृष्टिकोण विस्तृत होता है, अनुभवों का विकास होता है, उदारता और सद्विचारों का उदय होता है, महान् लोगों से सम्पर्क होता है। देशाटन से सहनशीलता, सहानुभूति, सहयोग, मधुर भाषण आदि गुणों का विकास होता है, जो मनुष्य के जीवन में अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होते हैं।

देशाटन से हानियाँ-देशाटन की आदत पड़ने से, धन के व्यय की आदत पड़ जाती है। घुमक्कड़ लोग घूमने में ही जीवन बिता देते हैं और भौतिक जीवन की प्रगति करने के प्रति उदासीन हो जाते हैं। जलवायु की भिन्नता, मार्ग की कठिनाइयों और सांस्कृतिक मूल्यों की भिन्नता के कारण कभी-कभी जान-माल से भी हाथ धोना पड़ता है।

उपसंहार-देशाटने हमारे जीवन के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। फलतः प्रत्येक देश में पर्यटन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। पर्यटकों के लिए सुख-सुविधाओं के साधन बढ़ गये हैं। लाखों पर्यटक एक देश से दूसरे देश में पहुँचते रहते हैं। सर्वश्रेष्ठ मानव-जीवन को प्राप्त करके  हमें विश्व की अनेक प्रकार की वस्तुओं को देखकर जीवन सफल करना चाहिए। यदि हमें ईश्वर की इस अनुपम सृष्टि का निरीक्षण किये बिना संसार से विदा हो गये तो मन पछताता ही रह जाएगा—

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिन्दगानी फिर कहाँ ?
जिन्दगानी गर रही तो, नौजवानी फिर कहाँ ?

17107.

निबन्ध:योग शिक्षा : आवश्यकता और उपयोगिता

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प्रस्तावना-योगासन शरीर और मन को स्वस्थ रखने की प्राचीन भारतीय प्रणाली है। शरीर को किसी ऐसे आसन या स्थिति में रखना जिससे स्थिरता और सुख का अनुभव हो, योगासन कहलाता है।
अंग में शुद्ध वायु का संचार होता है जिससे उनमें स्फूर्ति आती है। परिणामत: व्यक्ति में उत्साह और कार्य-क्षमता का विकास होता है तथा एकाग्रता आती है।

योग का अर्थ-योग, संस्कृत के यज् धातु से बना है, जिसका अर्थ है, संचालित करना, सम्बद्ध करना, सम्मिलित करना अथवा जोड़ना। अर्थ के अनुसार विवेचन किया जाए तो शरीर एवं आत्मा का मिलन ही योग कहलाता है। यह भारत के छ: दर्शनों, जिन्हें षड्दर्शन कहा जाता है, में से एक है। अन्य दर्शन हैं-न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त एवं मीमांसा। इसकी उत्पत्ति भारत में लगभग 5000 ई०पू० में हुई थी। पहले यह विद्या गुरु-शिष्य परम्परा के तहत पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी को हस्तांतरित होती थी। लगभग 200 ई०पू० में महर्षि पतञ्जलि ने योग-दर्शन को योग-सूत्र नामक ग्रन्थ के रूप में लिखित रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए महर्षि पतञ्जलि को ‘योग का प्रणेता’ कहा जाता है। आज बाबा रामदेव ‘योग’ नामक इस अचूक विद्या का देश-विदेश में प्रचार कर रहे हैं।

योग की आवश्यकता–शरीर के स्वस्थ रहने पर ही मस्तिष्क स्वस्थ रहता है। मस्तिष्क से ही शरीर की समस्त क्रियाओं का संचालन होता है। इसके स्वस्थ और तनावमुक्त होने पर ही शरीर की सारी क्रियाएँ भली प्रकार से सम्पन्न होती हैं। इस प्रकार हमारे शारीरिक,  मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक विकास के लिए योगासन अति आवश्यक है।

हमारा हृदय निरन्तर कार्य करता है। हमारे थककर आराम करने या रात को सोने के समय भी हृदय गतिशील रहता है। हृदय प्रतिदिन लगभग 8000 लीटर रक्त को पम्प करता है। उसकी यह क्रिया जीवन भर चलती रहती है। यदि हमारी रक्त-नलिकाएँ साफ होंगी तो हृदय को अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। इससे हृदय स्वस्थ रहेगा और शरीर के अन्य भागों को शुद्ध रक्त मिल पाएगा, जिससे नीरोग व सबल हो जाएँगे। फलत: व्यक्ति की कार्य-क्षमता भी बढ़ जाएगी।

योग की उपयोगिता-मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए हमारे जीवन में योग अत्यन्त उपयोगी है। शरीर, मन एवं आत्मा के बीच सन्तुलन अर्थात् योग स्थापित करना होता है। योग की प्रक्रियाओं में जब तन, मन और आत्मा के बीच सन्तुलन एवं योग (जुड़ाव) स्थापित होता है, तब आत्मिक सन्तुष्टि, शान्ति एवं चेतना का अनुभव होता है। योग शरीर को शक्तिशाली एवं लचीला बनाए रखता है, साथ ही तनाव से भी छुटकारा दिलाता है। यह शरीर के जोड़ों एवं मांसपेशियों में लचीलापन लाता है, मांसपेशियों को मजबूत बनाता है, शारीरिक विकृतियों को काफी हद तक ठीक करता है, शरीर में रक्त प्रवाह को सुचारु करता है तथा पाचन-तन्त्र को मजबूत बनाता है। इन सबके अतिरिक्त यह शरीर की रोग-प्रतिरोधक शक्तियाँ बढ़ाता है, कई प्रकार की बीमारियों जैसे अनिद्रा, तनाव, थकान, उच्च रक्तचाप, चिन्ता इत्यादि को दूर करता है तथा शरीर को ऊर्जावान बनाता है। आज की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में स्वस्थ रह पाना किसी चुनौती से कम नहीं है। अत: हर आयु-वर्ग के स्त्री-पुरुष के लिए योग उपयोगी है।

योग के सामान्य नियम-योगासन उचित विधि से ही करना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि की सम्भावना रहती है। योगासन के अभ्यास से पूर्व उसके औचित्य पर भी विचार कर लेना चाहिए। बुखार से ग्रस्त तथा गम्भीर रोगियों को योगासन नहीं करना चाहिए। योगासन करने  से पहले नीचे दिए सामान्य नियमों की जानकारी होनी आवश्यक है

⦁     प्रातः काल शौचादि से निवृत्त होकर ही योगासन का अभ्यास करना चाहिए। स्नान के बाद योगासन करना और भी उत्तम रहता है।
⦁    सायंकाल खाली पेट पर ही योगासन करना चाहिए।
⦁    योगासन के लिए शान्त, स्वच्छ तथा खुले स्थान का चयन करना चाहिए। बगीचे अथवा पार्क में योगासन करना अधिक अच्छा रहता है।
⦁    आसन करते समय कम, हलके तथा ढीले–ढाले वस्त्र पहनने चाहिए।
⦁    योगासन करते समय मन को प्रसन्न,  एकाग्र और स्थिर रखना चाहिए। कोई बातचीत नहीं करनी चाहिए।
⦁    योगासन के अभ्यास को धीरे-धीरे ही बढ़ाएँ।
⦁    योगासन का अभ्यास करने वाले व्यक्ति को हलका, शीघ्र पाचक, सात्विक और पौष्टिक भोजन करना चाहिए।
⦁    अभ्यास के आरम्भ में सरल योगासन करने चाहिए।
⦁    योगासन के अन्त में शिथिलासन अथवा शवासन करना चाहिए। इससे शरीर को विश्राम मिल जाता है तथा मन शान्त हो जाता है।
⦁    योगासन करने के बाद आधे घण्टे तक न तो स्नान करना चाहिए और न ही कुछ खाना चाहिए।

योग से लाभ–छात्रों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों के लिए योग  विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होता है, क्योंकि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने के साथ-साथ उनकी एकाग्रता भी बढ़ाता है जिससे उनके लिए अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया सरल हो जाती है।

पतञ्जलि के योग–सूत्र के अनुसार आसनों की संख्या 84 है। जिनमें भुजंगासन, कोणासन, पद्मासन, मयूरासन, शलभासन, धनुरासन, गोमुखासन, सिंहासन, वज्रासन, स्वस्तिकासन, पवर्तासन, शवासन, हलासन, शीर्षासन, धनुरासन, ताड़ासन, सर्वांगासन, पश्चिमोत्तानासन, चतुष्कोणासन, त्रिकोणासन, मत्स्यासन, गरुड़ासन इत्यादि कुछ प्रसिद्ध आसन हैं। योग के द्वारा शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि और तेज बढ़ता है, अंग-प्रत्यंग में उष्ण रक्त प्रवाहित होने से स्फूर्ति आती है, मांसपेशियाँ सुदृढ़ होती हैं, पाचन-शक्ति ठीक रहती है तथा शरीर स्वस्थ और हल्का प्रतीत होता है। योग के साथ मनोरंजन का समावेश होने से लाभ द्विगुणित होता है। इससे मन प्रफुल्लित रहता है और योग की थकावट भी अनुभव नहीं होती। शरीर स्वस्थ होने से सभी इन्द्रियाँ सुचारु रूप से काम करती हैं। योग से शरीर नीरोग, मन प्रसन्न और जीवन सरस हो जाता है।

उपसंहार–आज की आवश्यकता को देखते हुए योग शिक्षा की बेहद आवश्यकता है, क्योंकि सबसे बड़ा सुख शरीर का स्वस्थ होना है। यदि आपका शरीर स्वस्थ है तो आपके पास दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है। स्वस्थ व्यक्ति ही देश और समाज का हित कर सकता है। अत: आज की भाग-दौड़ की जिन्दगी में खुद को स्वस्थ एवं ऊर्जावान बनाए रखने के लिए योग बेहद आवश्यक है। वर्तमान परिवेश में योग न सिर्फ हमारे लिए लाभकारी है, बल्कि विश्व के बढ़ते प्रदूषण एवं मानवीय व्यस्तताओं से उपजी समस्याओं के निवारण के सदर्भ में इसकी सार्थकता और बढ़ गई है।

17108.

निबन्ध:जनतन्त्र और शिक्षा

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प्रस्तावना–शिक्षा जनतन्त्र के लिए संजीवनी और अमृत तुल्य है। जनतन्त्र में शिक्षा की समुचित व्यवस्था जनतन्त्र को प्रभावी और प्रोन्नत बनाती है। जनतन्त्र जीवन की एक पद्धति है, जिसमें व्यक्ति के अस्तित्व को महत्त्व प्रदान किया जाता है। शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व की विधायक है।

जनतन्त्र का अर्थ–जनतन्त्र एक व्यापक व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत व्यक्ति से सम्बन्धित राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक सभी क्षेत्र आते हैं। जनतन्त्र शासन का वह रूप है, जिसमें शासन की शक्ति सम्पूर्ण जन-समाज के सदस्यों में निहित होती है। राजनीतिक दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति इसमें भाग लेने का अधिकारी है। यह जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता के प्रतिनिधियों का शासन है। केण्डेल के अनुसार, “जनतन्त्र एक आदर्श के रूप में जीवन की एक विधि है, जो व्यक्ति की स्वतन्त्रता एवं उसके उत्तरदायित्व पर आधारित है।” शिक्षा के क्षेत्र में जनतन्त्र के अनुसार व्यक्ति को समान सुविधा, स्वतन्त्रता एवं व्यक्तित्व-विकास के समान अवसर प्राप्त होते हैं।

जनतन्त्र का उद्देश्य-जनतन्त्र एक जीवन-दर्शन है। मानव के विकास एवं समाज के कल्याण में जनतन्त्र की सफलता निहित है। जनतन्त्र का लक्ष्य समाज की सभी क्रियाओं में व्यक्ति को समान रूप से अधिकार दिलाना है। उत्तम नागरिक का निर्माण जनतन्त्र का मुख्य कर्तव्य है। शिक्षा के आधार पर ही जनतन्त्र के व्यवहार एवं आदर्श निश्चित होते हैं।

जनतन्त्र के आधार–शिक्षा के क्षेत्र में जनतन्त्र की भावना को सफल बनाने के लिए  कुछ उपाय बताये गये हैं, जो निम्नलिखित हैं

⦁    मानव व्यक्तित्व की सुरक्षा तथा आदर
⦁    प्रत्येक व्यक्ति को स्वतन्त्रता, समानता तथा सामाजिक न्याय की प्राप्ति
⦁    व्यक्ति की जनतन्त्र में आस्था, जागरूकता, क्षमता तथा योग्यता
⦁    अधिकार के साथ उत्तरदायित्व का निर्वाह
⦁    शान्तिपूर्ण विचार-विनिमय द्वारा समस्या का समाधान
⦁    अल्पसंख्यकों की सुरक्षा तथा धर्मनिरपेक्षता
⦁    सहयोग, सहिष्णुता तथा बन्धुत्व की भावना
⦁    विरोधी-विचारों तथा मत प्रकाशन के अधिकार तथा
⦁    स्वस्थ एवं स्वतन्त्र जीवन-दर्शन।

जनतन्त्र व्यक्ति के आचरण द्वारा ही जीवित रहता है। शिक्षा द्वारा ही मनुष्य में वे सभी गुण आ सकते हैं, जिनकी जनतन्त्र में अपेक्षा की जाती है। अतः जनतन्त्र की सफलता हेतु अच्छी शिक्षा-व्यवस्था आवश्यक है। जनतन्त्र में अनिवार्य नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान होना चाहिए।

जनतन्त्र और शिक्षा–सुयोग्य नागरिकों के ऊपर ही जनतन्त्र की सफलता आधारित होती है। शिक्षा द्वारा नागरिकों में विवेक का प्रादुर्भाव होता है। शिक्षा द्वारा ही मानव की भावनाओं को परिष्कृत कर मानवीय गुणों का विकास किया जाता है। जनतन्त्र में शिक्षा वह साधन है, जिससे व्यक्ति समाज के क्रिया-कलापों में सक्रिय भाग लेने में समर्थ होता है। समाज का निर्माण व्यक्ति करता है और व्यक्ति का निर्माण शिक्षा। शिक्षा जीवन की समस्याओं का समाधान करने के लिए साधन है। जनतन्त्र में जन-शिक्षा को प्रोत्साहन मिलता है।

शिक्षा का आदर्श स्वस्थ समाज का निर्माण करना है। जनतान्त्रिक शिक्षा व्यक्ति और समाज  में सन्तुलन स्थापित करती है। जनतन्त्र में शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति का शारीरिक, बौद्धिक तथा नैतिक विकास करना है। समाज का यह दायित्व है कि वह व्यक्ति को प्रगति का वातावरण प्रदान करे, जिससे वह स्वहित साधन के साथ सामाजिक हित का भी संवर्द्धन करे। इस प्रकार जनतन्त्र और शिक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं।।

जनतन्त्र में शिक्षा—

(क) उद्देश्य-जनतन्त्र की शिक्षा एक सन्तुलित शिक्षा है, जिसमें बौद्धिक विकास के साथ-साथ सामाजिक गुणों तथा व्यावहारिक कुशलता का विकास भी होता है। शिक्षा समाज में तथा विद्यालय में सम्पर्क स्थापित करने का कार्य करती है। जनतन्त्र में शिक्षा का उद्देश्य होता है-व्यक्ति को योग्य (आदर्श) नागरिक बनाना।

(ख) पाठ्यक्रम-जनतन्त्र में शैक्षिक पाठ्यक्रम व्यापक होता है। एच० के० हेनरी के अनुसार, पाठ्यक्रम के अन्तर्गत सम्पूर्ण विद्यालय का वातावरण आता है, जिनका सम्बन्ध बालकों से होता है।” वास्तव में पाठ्यक्रम के अन्तर्गत विद्यालय की वे सभी बहुमुखी क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं, जिनका अनुभव छात्र को विद्यालये, कक्षा, पुस्तकालय, प्रयोगशाला, खेल आदि के द्वारा उपलब्ध होता है। पाठ्यक्रम का निर्धारण करते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि बालकों में स्वतन्त्र चिन्तन तथा विचारशक्ति उत्पन्न हो और उनकी निर्णयात्मक शक्ति का विकास हो।।

(ग) विद्यालय का उत्तरदायित्व–समाज में जनतन्त्रीय आदर्शों की स्थापना में विद्यालय का महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। एच० जी० वेल्स के अनुसार, “विद्यालय संसार के लघु प्रतिरूप होने चाहिए, जिन्हें ग्रहण करने के हम इच्छुक हों।” विद्यालय छात्रों तथा समाज के जीवन में एकता लाता है तथा सामाजिक भावना का विकास करता है। विद्यालय के प्रशासन में राज्य का हस्तक्षेप जनतन्त्र के लिए बाधक होता है तथा विद्यालय को राजनीतिक व्यक्तियों की  दुर्भावना का शिकार होना पड़ता है, जिससे विद्यालयों की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है।

(घ) अनुशासन–जनतन्त्र में अनुशासन का तात्पर्य बालक-बालिकाओं को जनतन्त्र के सामाजिक जीवन के लिए तैयार करना है। जनतन्त्र का सामाजिक जीवन स्वच्छन्दता का नहीं होता, अपितु उसमें एक व्यवस्था होती है, अच्छा आचरण और अनुशासन होता है। अनुशासन की परीक्षा बालकों के व्यवहार से होती है। अच्छे आचरण और अच्छे व्यवहार से तात्पर्य अच्छे चरित्र से होता है। इस कार्य में विद्यालय, समाज, अध्यापक तथा अभिभावक सबको प्रयास करना चाहिए।

उपसंहार-इस प्रकार जनतन्त्र और शिक्षा की मूलभूत बातों पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इनका मानव-जीवन में विशिष्ट महत्त्व है। टैगोर के अनुसार, “सफल शिक्षा समग्र जीवन को पूर्ण रूप से प्रभावित करती है।” जनतन्त्र और शिक्षा दोनों एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। शिक्षा जनतन्त्र की अनुजा है तथा शिक्षा और जनतन्त्र समान रूप से इस युग में पूजित तथा प्रतिष्ठित हैं।

17109.

निबन्ध:मेरे प्रिय साहित्यकार (जयशंकर प्रसाद)

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प्रस्तावना–संसार में सबकी अपनी-अपनी रुचि होती है। किसी व्यक्ति की रुचि चित्रकारी में है तो किसी की संगीत में। किसी की रुचि खेलकूद में है तो किसी की साहित्य में। मेरी अपनी रुचि भी साहित्य में रही है। साहित्य प्रत्येक देश और प्रत्येक काल में इतना अधिक रचा गया है कि उन सबका पारायण तो एक जन्म में सम्भव ही नहीं है। फिर साहित्य में भी अनेक विधाएँ हैं–कविता, उपन्यास, नाटक, कहानी, निबन्ध आदि। अतः मैंने सर्वप्रथम हिन्दी-साहित्य  को यथाशक्ति अधिकाधिक अध्ययन करने का निश्चय किया और अब तक जितना अध्ययन हो पाया है, उसके आधार पर मेरे सर्वाधिक प्रिय साहित्यकार हैं-जयशंकर प्रसाद प्रसाद जी केवल कवि ही नहीं, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार और निबन्धकार भी हैं। प्रसाद जी ने हिन्दी-साहित्य में युगान्तरकारी परिवर्तन किये हैं। उन्होंने हिन्दी भाषा को एक नवीन अभिव्यंजनाशक्ति प्रदान की है। इन सबने मुझे उनका प्रशंसक बना दिया है और वे मेरे प्रिय साहित्यकार बन गये हैं।

साहित्यकार का परिचय–श्री जयशंकर प्रसाद जी का जन्म सन् 1889 ई० में काशी के प्रसिद्ध सुँघनी साहु परिवार में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री बाबू देवी प्रसाद था। लगभग 11 वर्ष की अवस्था में ही जयशंकर प्रसाद ने काव्य-रचना आरम्भ कर दी थी। सत्रह वर्ष की अवस्था तक इनके ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। इनके पिता, माता के बड़े भाई का देहान्त हो गया और परिवार का समस्त उत्तरदायित्व इनके सुकुमार कन्धों पर आ गया। गुरुतर उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए एवं अनेकानेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना करने के उपरान्त 15 नवम्बर, 1937 ई० को आपका देहावसान हुआ। अड़तालीस वर्ष के छोटे-से जीवन में इन्होंने जो बड़े-बड़े काम किये, उनकी कथा सचमुच अकथनीय है।

साहित्यकार की साहित्य-सम्पदा–प्रसाद जी की रचनाएँ सन् 1907-08 ई० में सामयिक पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। ये रचनाएँ ब्रजभाषा की पुरानी शैली में थीं, जिनका संग्रह ‘चित्राधार’ में हुआ। सन् 1913 ई० में ये खड़ी बोली में लिखने लगे। प्रसाद जी ने पद्य और गद्य दोनों में साधिकार रचनाएँ कीं। इनकी रचनाओं का वर्गीकरण अग्रवत् है

(क) काव्य-कानन-कुसुम, प्रेम पथिक, महाराणा का महत्त्व, झरना, आँसू, लहर और कामायनी (नामाव्य)।

(ख) नाटक इन्होंने कुल मिलाकर 13 नाटक लिखे। इनके प्रसिद्ध नाटक हैं–चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, जनमेजय का नागयज्ञ, कामना और ध्रुवस्वामिनी।।

(ग) उपन्यास–कंकाल, तितली और इरावती।।

(घ) कहानी–प्रसाद जी की विविध कहानियों के पाँच संग्रह हैं—छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी और इन्द्रजाल।

(ङ) निबन्ध–प्रसाद जी ने साहित्य के विविध विषयों से सम्बन्धित निबन्ध लिखे, जिनका संग्रह है-काव्य और कली तथा अन्य निबन्ध।

छायावाद के श्रेष्ठ कवि–छायावाद हिन्दी कविता के क्षेत्र का एक आन्दोलन है, जिसकी अवधि सन् 1920-36 ई० तक मानी जाती है। ‘प्रसाद’ जी छायावाद के जन्मदाता माने जाते हैं। छायावाद एक आदर्शवादी काव्यधारा है, जिसमें वैयक्तिकता, रहस्यात्मकता, प्रेम, सौन्दर्य तथा स्वच्छन्दतावाद की सबल अभिव्यक्ति हुई है। प्रसाद की ‘आँसू’ नाम की कृति के साथ हिन्दी में छायावाद का जन्म हुआ। आँसू का प्रतिपाद्य है–विप्रलम्भ श्रृंगार। प्रियतम के वियोग की  पीड़ा वियोग के समय आँसू बनकर वर्षा की भाँति उमड़ पड़ती है

जो घनीभूत पीड़ा थी, स्मृति सी नभ में छायी।
दुर्दिन में आँसू बनकर, वह आज बरसने आयी।

प्रसाद जी के काव्य में छायावाद अपने पूर्ण उत्कर्ष पर दिखाई देता है। इनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण . रचना है-‘कामायनी’ महाकाव्य, जिसमें प्रतीकात्मक शैली पर मानव-चेतना के विकास का काव्यात्मक निरूपण किया गया है।

श्रेष्ठ गद्यकार-प्रसाद जी की सर्वाधिक ख्याति नाटककार के रूप में है। इन्होंने गुप्तकालीन भारत को आधुनिक परिवेश में प्रस्तुत करके गाँधीवादी अहिंसामूलक देशभक्ति का सन्देश दिया है। साथ ही अपने समय के सामाजिक आन्दोलनों को सफल चित्रण किया है। नारी की स्वतन्त्रता एवं महिमा पर उन्होंने सर्वाधिक बल दिया है। इनके प्रत्येक नाटक का संचालन सूत्र किसी नारी पात्र के हाथ में ही रहता है। इनके उपन्यास और कहानियों में भी सामाजिक भावना का प्राधान्य है, जिनमें दाम्पत्य-प्रेम के आदर्श रूप का चित्रण किया गया है। इनके निबन्ध विचारात्मक एवं चिन्तनप्रधान हैं।

उपसंहार-पद्य और गद्य की सभी रचनाओं में इनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ एवं परिमार्जित हिन्दी है। इनकी शैली आलंकारिक एवं साहित्यिक है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इनकी गद्य-रचनाओं में भी इनका छायावादी कवि हृदय झाँकता हुआ दिखाई देता है। मानवीय भावों और आदर्शों में उदारवृत्ति का सृजन विश्व-कल्याण के प्रति इनकी विशाल-हृदयता का सूचक है। हिन्दी-साहित्य के लिए प्रसाद जी की यह बहुत बड़ी देन है। अपनी विशिष्ट कल्पना-शक्ति, मौलिक अनुभूति एवं नूतन अभिव्यक्ति के फलस्वरूप प्रसाद जी हिन्दी-साहित्य में मूर्धन्य स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। समग्रत: यह कहा जा सकता है कि प्रसाद जी का साहित्यिक व्यक्तित्व बहुत महान् है, जिस कारण वे मेरे सर्वाधिक प्रिय साहित्यकार रहे हैं।

17110.

निबन्ध:शिक्षा में क्रीड़ा का महत्त्व

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प्रस्तावना-मानव ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है। इसलिए समग्र मानवता को स्वस्थ, सबल और कर्म-निरत रखने के लिए खेलों को महत्त्व देना अत्यावश्यक है। महर्षि चरक का कथन है-‘ धर्मार्थकाम-मोक्षाणां आरोग्यं मूलकारणम्’; अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों  सिद्धियाँ तभी प्राप्त होती हैं जब शरीर स्वस्थ रहे और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए खेल आवश्यक हैं। खेलों की उपेक्षा करके जीवन के सन्तुलित विकास की कल्पना करना व्यर्थ है। यही कारण है कि प्रत्येक देश में स्वाभाविक रूप से खेलकूद (क्रीड़ा) और व्यायाम का महत्त्व होता है।

जीवन में खेलों का महत्त्व–महाकवि कालिदास ने कहा है कि ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्। तात्पर्य यह है कि किसी धर्म-साधना के लिए अथवा कर्तव्य-निर्वाह के लिए स्वस्थ और पुष्ट शरीर का होना अति आवश्यक है और शरीर को पुष्ट करने में खेलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। खिलाड़ी का शरीर स्वस्थ होता है और जब शरीर स्वस्थ रहेगा तो मन और मस्तिष्क भी स्वस्थ रहेंगे। एक कहावत हैं— ‘A healthy mind is in a healthybody’; अर्थात् स्वस्थ मस्तिष्क स्वस्थ शरीर में ही सम्भव है। अतः स्पष्ट है कि जीवन में खेलों का अत्यधिक महत्त्व है। खेलों से भाईचारा तथा आत्मविश्वास बढ़ता है, सहिष्णुता आती है और मिलकर रहने की या जीवन जीने की भावना उत्पन्न होती है।

शिक्षा में खेलों का महत्त्व-शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास करना है। सर्वांगीण विकास के अन्तर्गत शरीर, मन और मस्तिष्क भी आते हैं। खेलों से शरीर के सभी महत्त्वपूर्ण अंगों का विकास होता है। विद्यार्थी ही नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति एक ही जैसी दिनचर्या व काम से ऊब जाता है। इसलिए ऐसी स्थिति में उसे परिवर्तन की जरूरत महसूस होती है। छात्रों की मन भी पुस्तकीय शिक्षा से अवश्य ही ऊबता है; अत: छात्रों की मानसिक स्थिति में परिवर्तन के लिए छात्रों को खेल खिलाना आवश्यक हो जाता है। इससे उनका मनोरंजन हो जाता है और एकरसता भी टूट जाती है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उनका शरीर पुष्ट और स्वस्थ हो जाता है।

खेलकूद अप्रत्यक्ष रूप से आध्यात्मिक विकास में भी सहायक होते हैं। खेलकूद से प्राप्त प्रफुल्लता और उत्साह से जीवन-संग्राम में जूझने की शक्ति प्राप्त होती है। इतना ही नहीं, सच्चा खिलाड़ी तो हानिलाभ, यश-अपयश, सफलता-असफलता को समान भाव से ग्रहण करने का भी अभ्यस्त हो जाता है।

राष्ट्रीय जीवन में खेलों का महत्त्व—किसी भी राष्ट्र का निर्माण भूमि, मनुष्य तथा उसकी संस्कृति के समन्वित रूप से होता है। इन सभी तत्त्वों में संस्कृति का विशेष महत्त्व है और खेल हमारी सांस्कृतिक विरासत भी हैं। सहयोग, प्रेम, अहिंसा, सहिष्णुता और एकता का इसमें विशेष महत्त्व है। ये सभी गुण खेलों के माध्यम से ही उत्पन्न होते हैं। खेल खेलते समय हमारी संकीर्ण मनोवृत्तियाँ; यथा-अस्पृश्यता, जातिवाद, धार्मिक विभेद, क्षेत्रवाद, भाषावाद आदि  अलगाववादी भावनाएँ समाप्त हो जाती हैं और शुद्ध एकता की अनुभूति होती है। खेलों से राष्ट्रीयता की जड़े मजबूत होती हैं।

भारत में खेलों की स्थिति—हमें यह देखकर बहुत दु:ख होता है कि हमारे देश में खेलों की स्थिति बहुत दयनीय है। अन्तर्राष्ट्रीय खेलों में जब कभी अपने देश का नाम देखने का मन करता है तो दुर्भाग्यवश हमें अन्त से प्रारम्भ की ओर देखना पड़ता है। कभी हॉकी में सिरमौर रहा हमारा देश आज वहाँ भी शून्यांक पर दिखाई देता है। जसपाल राणा, पी० टी० उषा, लिएण्डर पेस के बाद कुछ ही आशा की किरणें हैं, जो कभी-कभी अन्धकार में प्रकाश बिखेरती हैं। खेलों में राजनीति के प्रवेश ने उनका स्तर घटिया कर दिया है।

कैसी विडम्बना है कि विश्व की सर्वाधिक आबादी रखने वाले देशों में द्वितीय स्थान वाला भारत, ओलम्पिक खेलों में मात्र कुछ-एक काँस्य और रजत पदक ही प्राप्त कर पाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में एक से बढ़कर एक एथलीट्स मिल सकते हैं और यदि उन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाए तो वे अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में बहुत-सा सोना बटोर सकते हैं, पर ऐसा नहीं होता। पहुँच वालों के चहेते ही सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बनकर देश को अपमान का पूँट पीने को विवश करते हैं।

कुछ सुझाव-शरीर में स्फूर्ति और मन में उल्लास भरकर सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता की भावना जगाने वाले खेलों की उपेक्षा करना उचित नहीं है। खेल मनुष्य में सहिष्णुता, साहस, धैर्य और सरसता उत्पन्न करते हैं; अतः विद्यालय समय में ही कक्षावार खेल खिलाने तथा प्रतिस्पर्धात्मक मैच खिलाने की अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में ब्लॉक स्तर पर जो क्रीड़ा प्रतियोगिताएँ होती हैं, उनमें छात्रों के अलावा अन्य ग्रामीण युवक-युवतियों की प्रतिभागिता भी सुनिश्चित होनी चाहिए। हमारी सरकार ऐसी खेल नीति बनाये, जिसमें सभी प्रकार के खेलों के गिरते स्तर को सुधारने के लिए केवल नगरों में ही नहीं, अपितु ग्रामीण क्षेत्रों  में भी अच्छे कोच तथा खेल के मैदान उपलब्ध कराये जाएँ।

उपसंहार—जीवन के प्रत्येक भाग में खेलों का अपना विशेष महत्त्व है, चाहे विद्यार्थी जीवन हो या सामाजिक। इन खेलों से स्फूर्ति, आनन्द, उल्लास, एकता, सद्भाव, सहयोग और सहिष्णुता जैसे मानवीय गुणों का विकास होता है, बन्धुत्व की भावना बढ़ती है और शरीर स्वस्थ रहता है। इसलिए खेलों के प्रति रुचि जगाने तथा खेलों के गिरते स्तर को उन्नत बनाने के लिए क्रीड़ा प्रतियोगिताओं का समय-समय पर आयोजन होना ही चाहिए। यदि सच्चे मन से और निष्पक्ष भाव से खेलों के विकास की ओर ध्यान दिया जाएगा तो ओलम्पिक के साथ-साथ अन्य राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भी देश को मान-सम्मान अवश्य मिलेगा।

17111.

निबन्ध:जीवन में शिक्षा का महत्त्व

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प्रस्तावना-शिक्षा-विहीन व्यक्ति सींग और पूँछरहित जानवर के समान होता है। शिक्षा मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाती है। मनुष्य के भीतर विकास की जो सम्भावनाएँ होती हैं, उन्हें विकसित करना ही शिक्षा का मुख्य कार्य है। शिक्षा के अभाव में मनुष्य ने अपने लिए और न ही समाज के लिए उपयोगी हो पाता है। मानव सभ्यता का विकास, शिक्षा का ही विकास है। प्राचीन काल की शिक्षा में गुरु का अधिक महत्त्व रहता था। गुरुजनों ने जो सत्य उपलब्ध किया, उसे शिष्यों तक पहुँचाना वे अपना कर्तव्य समझते थे। पुस्तकीय ज्ञान को विद्यार्थियों के मस्तिष्क में ढूंस देना ही शिक्षा का मुख्य लक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शिक्षा का उद्देश्य–शिक्षा का उद्देश्य है-संस्कार देना। मनुष्य के शारीरिक, मानसिक तथा भावात्मक विकास में योगदान देना शिक्षा का मुख्य कार्य है। शिक्षित व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहता है, स्वच्छता को जीवन में महत्त्व देता है और उन सभी बुराइयों से दूर रहता है, जिनसे स्वास्थ्य को हानि पहुँचती है। रुग्ण शरीर के कारण शिक्षा में बाधा पड़ती है। शिक्षा हमारे ज्ञान का विस्तार करती है। ज्ञान का प्रकाश जिन खिड़कियों से प्रवेश करता है,  उन्हीं से अज्ञान और रूढ़िवादिता का अन्धकार निकल भागता है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य अपने परिवेश को पहचानने और समझने में सक्षम होता है। विश्व में ज्ञान का जो विशाल भण्डार है, उसे हम शिक्षा के माध्यम से ही प्राप्त कर सकते हैं। सृष्टि के रहस्यों को खोलने की कुंजी शिक्षा ही है। अशिक्षित व्यक्ति रूढ़ियों, अन्धविश्वासों एवं कुरीतियों का शिकार हो सकता है। शिक्षा हमारी भावनाओं का संस्कार करती है और हमारे दृष्टिकोण को उदार बनाती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य मानव का सर्वांगीण विकास करना है।

शिक्षा की आवश्यकता–समाजे मानवीय सम्बन्धों का ताना-बाना है। व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है। व्यक्ति के अभाव में समाज का अस्तित्व और समाज के अभाव में सभ्य मनुष्य की कल्पना कर सकना भी असम्भव है। समाज का स्वास्थ्य, व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। यदि समाज में रहने वाले व्यक्ति स्वस्थ, सुशिक्षित, उदार, संवेदनशील एवं परोपकारी होंगे, तो समाज अवश्य उन्नति करेगा। प्रत्येक सभ्य समाज की प्रमुख चिन्ता यही होती है कि वह किसी प्रकारे अपने नागरिकों की क्षमता को बढ़ा सके। समाज का प्रत्येक व्यक्ति समाज से जितना लेता है उससे अधिक देने में सक्षम हो सके तभी समाज का विकास सम्भव है। शिक्षित व्यक्ति में ही यह क्षमता विकसित हो सकती है। शिक्षित व्यक्ति ही एक अच्छा व्यापारी, कर्मचारी, डॉक्टर, अध्यापक, इंजीनियर अथवा नेता हो सकता है। शिक्षित व्यक्ति समाज में रहने के लिए बेहतर स्थान बना सकता है।

शिक्षा से ही समाज का उत्थान सम्भव–शिक्षा के प्रसार द्वारा ही समाज में समता, सहयोग एवं शोषणरहित व्यवस्था का निर्माण सम्भव है। आज भारत में साक्षरता अभियान पर बल दिया जा रहा है; क्योंकि साक्षर और शिक्षित नागरिक ही सामाजिक कुरीतियों से लड़ सकते हैं। रूढ़िबद्ध समाज में परिवर्तन लाने का साधन शिक्षा ही हो सकती है। शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझ सकता है। वह आसानी से शोषण का शिकार नहीं हो सकता; क्योंकि प्राय: अज्ञानता ही मनुष्य को असहाय बनाती है।

शिक्षित व्यक्ति ही प्रजातन्त्र की सफलता में सहयोग दे सकते हैं। प्रजातन्त्र का आधार प्रबुद्ध जनमत है।  शिक्षित व्यक्ति ही राष्ट्रीय समस्याओं को ठीक प्रकार से समझ सकता है। इस प्रकार शिक्षा प्रजातन्त्र की सफलता के लिए अत्यधिक आवश्यक है।

नारी मुक्ति आन्दोलन में भी शिक्षा का अत्यधिक महत्त्व है। शिक्षित नारी अपने परिवार तथा समाज के लिए उपयोगी भूमिका निभा सकती है। वह बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकती है, घर को सजा-सँवार सकती है, आत्म-निर्भर हो सकती है, अपने अधिकारों के लिए लड़ सकती है और शोषण का विरोध कर सकती है।

उपसंहार-निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सामाजिक परिवर्तन में शिक्षित नागरिकों की भूमिका ही महत्त्वपूर्ण हो सकती है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास है। व्यक्ति के विकास में ही समाज का विकास निहित है।

17112.

निबन्ध : विद्यार्थी जीवन

Answer»

भारतवर्ष में मानव-जीवन को चार भागों में बाँटा गया है-

  • ब्रह्मचर्य
  • गृहस्थ
  • वानप्रस्थ
  • संन्यास।

इनमें 5 वर्ष से 25 वर्ष तक की आयु का समय ब्रह्मचर्य कहलाता है। यह काले विद्या अध्ययन का काल होता है। इस काल में जो जितना परिश्रम कर लेता है, उसका जीवन आगे चलकर उतना ही सुखी रहता है। अतः मानव जीवन में विद्यार्थी जीवन का बहुत महत्त्व है।

विद्यार्थी को अपने जीवन को मुख्य उद्देश्य विद्या अध्ययन बनाना चाहिए। जो विद्यार्थी पढ़ने के स्थान पर इधर-उधर घूमते हैं; वे जीवन में दुख उठाते हैं। उन्हें सब बातों को छोड़कर केवल पढ़ने में मन लगाना चाहिए। प्रत्येक विद्यार्थी को अपने स्वास्थ्य को भी पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए। यदि इस आयु में स्वास्थ्य बिगड़ जाता है तो फिर जीवनभर पछताना पड़ता है। उसे बुरी बातें नहीं अपनानी चाहिए। इस प्रकार जो विद्यार्थी चरित्र-निर्माण, अध्ययन और शारीरिक स्वास्थ्य को अपना उद्देश्य बना लेते हैं, वे जीवन में सफलता प्राप्त कर लेते हैं।

विद्यार्थी जीवन मानव-जीवन का स्वर्णकाल माना जाता है। इस काल में उसे न कमाने की चिन्ता होती है. और न घर-गृहस्थी की। उसके माता-पिता उसकी प्रत्येक बात को पूरा करने को तैयार रहते हैं। उसे अच्छे से अच्छा भोजन और वस्त्र दिए जाते हैं। जितना आनन्द व्यक्ति को विद्यार्थी जीवन में मिल जाता है, उतना फिर आगे कभी नहीं मिल पाता। भारत सरकार भी उसकी उन्नति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है। विद्यार्थियों के भविष्य को अधिक उज्ज्वल बनाने के उद्देश्य से सन् 1985 में राजीव गांधी ने नई शिक्षा नीति की घोषणा की जिससे भारतीय विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य का निर्माण हो सकेगा।

विद्यार्थी जीवन में अनेक कष्ट भी होते हैं। जो विद्यार्थी समझदार हैं वे अपना समय सैर-सपाटों या खेल-तमाशों में बरबाद नहीं करते हैं, अपितु वे रात-दिन पढ़ने में ही लगे रहते हैं। जाड़ों की ठण्डी रातों में जब सारा घर आराम से सोता है तो उसे पढ़ना पड़ता है। वह रात को देर से सोता है और प्रातः जल्दी उठ जाता है। पढ़ने की चिन्ता में उसे खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता। परीक्षा के दिनों में तो छात्रों को घोर परिश्रम करना पड़ता है। इस प्रकार विद्यार्थी जीवन बड़ा ही कष्टमय है।

अधिकांश विद्यार्थी अपने जीवन के उद्देश्य को भूल चुके हैं; वे सैर-सपाटे, फैशन और सिनेमा देखने में ही समय नष्ट कर देते हैं। आज का विद्यार्थी विद्यालय से भागने की कोशिश करता है; वह पढ़ाई को तो बिल्कुल छोड़ बैठा है और किसी-न-किसी तरह परीक्षा पास करने की युक्ति सोचता रहता है। आज विद्यार्थी अनुशासन में रहना पसन्द नहीं करता। इन सब बातों के कारण ही आज का विद्यार्थी उन्नति नहीं कर रहा है।

आज छात्रों को विद्याध्ययन का महत्त्व समझाना आवश्यक है। विद्यार्थी के माता-पिता को भी उनकी चाल-ढाल पर हर समये दृष्टि रखनी चाहिए, उनको अध्यापकों से मिलते रहना चाहिए। दूसरी ओर विद्यार्थी को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जो उसके जीवन को सफल बना सके। वास्तव में आज के छात्र ही कल के नागरिक हैं। उनकी उन्नति पर ही राष्ट्र की उन्नति आधारित है।

17113.

पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा सौंदर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए।

Answer»

तुलसीदास द्वारा लिखित रामचरितमानस अवधी भाषा में लिखी गई है। यह काव्यांश रामचरितमानस के बालकांड से ली गई है। इसमें अवधी भाषा का शुद्ध रुप में प्रयोग देखने को मिलता है। तुलसीदास ने इसमें दोहा, छंद, चौपाई का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है। जिसके कारण काव्य के सौंदर्य तथा आनंद में वृद्धि हुई है और भाषा में लयबद्धता बनी रही है। तुलसीदास जी ने अलंकारो के सटीक प्रयोग से इसकी भाषा को और भी सुंदर व संगीतात्मक बना दिया है। इसकी भाषा में अनुप्रास अलंकार, रुपक अलंकार, उत्प्रेक्षा अलंकार, व पुनरुक्ति अलंकार की अधिकता मिलती है। इस काव्याँश की भाषा में व्यंग्यात्मकता का सुंदर संयोजन हुआ है।

17114.

कभी-कभी दृढ़ संकल्प के साथ तैयार की गई योजना भी प्रभावी नहीं हो पाती है। कुएँ से चिट्ठी निकालने के लिए लेखक द्वारा बनाई गई योजना क्यों सफल नहीं हुई? स्मृति पाठ के आधार पर बताइए।

Answer»

चिट्ठियाँ कुएँ में गिर जाने पर लेखक बहुत भारी मुसीबत में फँस गया। पिटने का डर और जिम्मेदारी का अहसास उसे चिट्ठियाँ निकालने के लिए विवश कर रहा था। लेखक ने धोतियों में गाँठ बाँध कर रस्सी बनाकर कुएँ में उतरने की योजना बना ली।
लेखक को स्वयं पर भरोसा था कि वह नीचे जाते ही डंडे से दबाकर साँप को मार देगा और चिट्ठियाँ लेकर ऊपर आ जाएगा क्योंकि वह पहले भी कई साँप मार चुका था। उसे अपनी योजना में कमी नहीं दिखाई दे रही थी, परन्तु लेखक द्वारा बनाई गई यह पूर्व योजना सफल नहीं हुई, क्योंकि योजना की सफलता परिस्थिति पर निर्भर करती है। कुएँ में स्थान की कमी थी और साँप भी व्याकुलता से उसको काटने के लिए तत्पर था। ऐसे में डंडे का प्रयोग करना संभव नहीं था।

17115.

निबंध लिखिए:आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में आदमी मानसिक तनाव से ग्रस्त है, इसे दूर करने तथा जीवन को खुशहाल बनाने के तरीकों के बारे में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए। 

Answer»

यह कटुसत्य है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में आम आदमी तनावग्रस्त हो रहा है। वह कम समय में अधिक-से-अधिक पाना और बड़े से बड़ा व्यक्ति होना चाहता है। भौतिकवाद ने इसे और भी तनावग्रस्त बना दिया है। हम अपने शारीरिक तथा मानसिक विकास से कोसों दूर होते जा रहे हैं।

मेरे विचार से आज के विभिन्न तनावों से मुक्त होकर स्वस्थ व संपूर्ण जीवन का आनंद लेने के लिए साहित्य, संगीत एवं कला का सहारा लेना चाहिए।

जब से मानव सभ्यता का विकास हुआ है तब से मनोरंजन के नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। साहित्य, संगीत एवं कला का मानव जीवन में विशिष्ट स्थान है। इनसे न केवल मनोरंजन होता है अपितु हमारे विकार भी दूर होते हैं। हमें नई प्रेरणाएँ मिलती हैं और हम उदात्त, उदार, सत्याधारित एवं निश्छल जीवन की ओर उन्मुख होने लगते हैं। ये हमारी सद्वृत्तियों को जगाने और पल्लवित करने वाले उपकरण हैं।

सर्वप्रथम साहित्य की बात की जाए साहित्य का अर्थ ही मनुष्य का हित-साधन है। मानव का स्वभाव है कि वह सीधे-सीधे दिए जाने वाले उपदेशों को ग्रहण नहीं करता। वही उपदेश जब निहित संदेश के रूप में साहित्य के माध्यम से दिए जाते हैं तो मनुष्य का साधारणीकरण हो जाता है। वह स्वयं को साहित्यिक परिवेश के अनुसार ढालने लगता है। वह उन स्थितियों, घटनाओं, पात्रों या भावनाओं को हृदय में स्थान दे देता है। उसे खल पात्रों और सज्जनों का बोध होने लगता है। धीरे-धीरे वह सत्साहित्य के माध्यम से अपने आपको ऊपर उठता अनुभव करता है।

कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्यकार अपने समाज में जो कुछ भी अच्छाबुरा देखता है उसे अपनी आँख अर्थात् दृष्टिकोण से मंडित और सिंचित करके साहित्य की अलगअलग विधाओं के माध्यम से अभिव्यक्त कर डालता है। उपन्यास, कहानी, कविता, एकांकी, नाटक, संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध, रिपोर्ताज आदि विविध विधाओं को अपनाकर साहित्यकार अपनी बात कहता है। इससे न केवल हमारा मनोरंजन होता है अपितु हमारा ज्ञान भी बढ़ता है। हमारे भीतर स्थितियों का सामना करने, समस्याओं का समाधान खोजने और परिवेश के अनुसार आचरण अपनाने की समझ पैदा होती है।

संगीत को एक श्रेष्ठ एवं लोकप्रिय कला होने का गौरव प्राप्त है। संगीत मनुष्य के स्नायु-तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। इससे हम दिनचर्या के बोझ एवं तनाव से मुक्त हो जाते हैं। प्रायः जन्म से ही मनुष्य को संगीत की समझ होती है। बच्चा जब लोरी सुनता है तो उसे संगीत की समझ नहीं होती। वह अबोध, अपठित तथा अज्ञानी होता है। तथापि उसे आनंद आता है। संगीत का मनुष्य तो मनुष्य पशु-पक्षियों पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि संगीत का दीवाना हिरण शिकारियों द्वारा फैलाए गए संगीत के जाल में फंसकर अपनी जान गँवा बैठता है।

जिस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण है उसी प्रकार कला उसके विभिन्न प्रकार के व्यवहारों की झाँकी कही जा सकती है। आचार्य विभु ने चौंसठ कलाओं का वर्णन किया है। कला हमारे जीवन को निखारती है। यह भावों को प्रस्फुटित करती है। मनुष्य के सुखी जीवन के लिए साहित्य, संगीत और कला अति महत्त्वपूर्ण हैं। साहित्य से ज्ञानवर्धन होता है और कला तथा संगीत से मनोरंजन होता है। कला और संगीत ईश्वर के अलौकिक आनंद की अनुभूति कराते हैं। साहित्य मनुष्य को सत्मार्ग की प्रेरणा देता है। वह उसके चरित्र का निर्माण कर उत्कर्ष पर ले जाता है। कला और संगीत मिलकर अद्भुत आनंद की अनुभूति कराते हैं। हमारे देश की संस्कृति कला और संगीत में छिपी होती है। साहित्य नए समाज का निर्माण करता है। मनुष्य पर साहित्य का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभाव पड़ता है। उसके सर्वांगीण विकास में साहित्य सहायक होता है। कला में नृत्य, चित्रकला, भवन निर्माण, मूर्ति कला, आदि विधाएँ आती हैं।

भारतीय मान्यता है कि जब सरस्वती ने अपने कोमल हाथों में वीणा धारण की तब सामवेद की रचना हुई, और संगीत के सात स्वरों का प्रादुर्भाव हुआ। धीरे-धीरे संगीत की यह परंपरा विदेशों में पहुँच गई और आज हमें संगीत की दो शैलियाँ पाश्चात्य संगीत और भारतीय संगीत के रूप में मिलती हैं। चाहे संगीत किसी भी शैली का क्यों न हो, उसका उद्देश्य मनुष्य को सुख और आनंद प्रदान करना ही होता है। संगीत सुनने व सीखने से मनुष्य को बहुत लाभ होते है।

संगीत के अंदर नवजीवन प्रदान करने की अद्भुत क्षमता होती है। जब थका-हारा मनुष्य कुछ समय संगीत का आनंद प्राप्त करता है तो उसकी सारी थकान दूर हो जाती है और वह स्वयं को तरोताजा अनुभव करने लगता है। गीत-संगीत और नृत्य तो प्राचीन काल से ही मनोरंजन के साधन माने गए हैं। आज भी यदि इस व्यस्त जीवन शैली में मनुष्य रोज सैर-सपाटे के लिए नहीं जा सकता है तो वह अपने घर में ही संगीत का आनंद प्राप्त करके मनोरंजन कर सकता है।

संगीत प्रेरणा स्रोत भी है। यह व्यक्ति को कार्य करने की प्रेरणा भी देता है। यदि हम काम करते समय संगीत भी सुनने जाते हैं तो वह काम जल्दी भी होता है और काम करने में आनंद का अनुभव होता है।

संगीत सुनने से हमारे ज्ञान में वृद्धि भी होती है। संगीत के क्षेत्र के अनेक राग-रागिनियों की जानकारी संगीत को सुनकर ही प्राप्त होती है। गीत, ग़ज़ल आदि को सुनकर समझने से हमारे शब्द भण्डार में भी वृद्धि होती है। अनेक जटिल शब्दों के अर्थ भी हमारी समझ में आते हैं।

शारीरिक दृष्टि से भी संगीत का आनंद मनुष्य के लिए लाभदायक होता है। संगीत की लय पर थिरकना एक प्रकार का व्यायाम है इससे शरीर का रक्त संचार बढ़ता है, संगीत की लय, गीतों के बोल याद रखना, उन्हें सटीक गाना इत्यादि क्रियाएँ मस्तिष्क को भी सुदृढ़ बनाती हैं। अतः हमारे जीवन में साहित्य, संगीत और कला का विशेष महत्त्व है क्योंकि ये तीनों हमारे लिए मनोरंजन, ज्ञानवर्द्धन, उदात्तीकरण तथा प्रेरणा के स्रोत हैं।

17116.

हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का पद मिलना चाहिए, यह नारा अब बिना मौसम का नारा है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनना नहीं है, वह राष्ट्रभाषा है। आज वह भारत की प्रमुख राजभाषा है, अंग्रेजी का स्थान उसके सामने गौण है। इसी प्रकार जो हिंदी प्रेमी अति उत्साह या क्रोध में आकर यह कह बैठते हैं कि ‘अरे मैं हिंदी के लिए रक्त दूंगा’ – वे भी बिना मौसम की बात कर रहे हैं। हिंदी अब रक्त लेकर क्या करेगी? अब तो उसे पैसे और पसीने की ज़रूरत है। पैसे उनके लिए चाहिए जिनके लिए हिंदी की किताबें और अखबार निकालते हैं और पसीना उनको चाहिए जो हिंदी के लेखक, कवि और पत्रकार हैं और जिन पर यह जिम्मा है कि वे विश्वविद्यालय स्तर की सारी पढ़ाई हिंदी के माध्यम से करें और शीघ्र ही हिंदी को विद्या की ऐसी भाषा बना दें कि उसके जरिए भारतवासियों के मस्तिष्क का चरम विकास हो सके। पसीना आज उनका भी चाहिए जो हिंदी जानते हैं और केंद्रीय या प्रांतीय सरकारों के दफ्तरों में काम कर रहे हैं। अब उन्हें पूरी छूट है कि वे केंद्रीय शासन के अधीन होने पर भी, यदि चाहें तो हिंदी में काम कर सकते हैं। यह स्वतंत्रता मिल जाने पर भी यदि वे हिंदी में काम करने से मुकरते हैं, तो उनकी देशभक्ति की भावना अधूरी है।1) सरकारी दफ्तरों में कार्य करने वाले अपनी देशभक्ति का परिचय किस प्रकार दे सकते हैं?2) ‘अब तो हिंदी को पैसे और पसीने की जरूरत है’ – इस पंक्ति से लेखक का क्या आशय है?3) लेखकों, कवियों और पत्रकारों पर आज क्या उत्तरदायित्व है?4) भारत की प्रमुख राजभाषा कौन सी है?5) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिएं।

Answer»

1) सरकारी दफ्तरों में काम करनेवाले चाहें तो हिन्दी में काम करके अपनी देशभक्ति का परिचय दे सकते है।
2) हिन्दी समझने वाले, पढ़ने वाले वर्ग के लिए नौकरी एवं जो लोग हिन्दी की नौकरी कर रहे हैं उनकी मेहनत अर्थात पसीने की जरूरत है।
3) हिन्दी के लेखक, पत्रकार एवं कवियों पर जिम्मेदारी है कि वे विश्वविद्यालय स्तर की पढ़ाई हिन्दी के माध्यम से करें। 4) भारत की प्रमुख राजभाषा हिन्दी है।
5) ‘राजभाषा हिन्दी’।

17117.

हमारे समाज में बहुत से लोग भाग्यवादी होते हैं और सब कुछ भाग्य के सहारे छोड़कर कर्म में विरत हो बैठते हैं। ऐसे व्यक्ति ही समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं होने देते।,आज तक किसी भाग्यवादी ने संसार में कोई महान कार्य नहीं किया। बड़ी-बड़ी खोजें, बड़े-बड़े आविष्कार और बड़े-बड़े निर्माण के कार्य श्रम के द्वारा ही पहुँचते हैं। जब हम परिश्रम से अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, तो हमारे मन को अलौकिक आनंद मिलता है। ऐसे व्यक्ति को धर्म के बाह्याचारों के अनुसरण की आवश्यकता नहीं होती; उसका परिश्रम ही उसकी पूजा है। यदि हम अपने कार्य में ईमानदारी से श्रम नहीं करते, तो हमारे मन में एक प्रकार का भय समाया रहता है। कभी-कभी तो हम ग्लानि का भी अनुभव करते हैं।1) भाग्यवादी व्यक्तियों का समाज की प्रगति पर क्या प्रभाव पड़ता है?2) लक्ष्य प्राप्ति में साधन संपन्नता, प्रतिभा और श्रम का क्या योगदान होता है?3) उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक दीजिए।4) ईमानदारी से काम न करने का हमारे हृदय पर क्या प्रभाव पड़ता है?5) हमारे समाज में बहुत से लोग क्या होते हैं?

Answer»

1) भाग्यवादी व्यक्ति समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर नहीं होने देते हैं।
2) बड़ी-बड़ी खोजें, बड़े-बड़े आविष्कार और बड़े-बड़े निर्माण के कार्य श्रम के द्वारा ही होते हैं।
3) ‘श्रम का महत्व’।
4) ईमानदारी से काम नहीं करने पर हमारे मन में एक भय समाया रहता है।
5) हमारे समाज में बहुत से लोग भाग्यवादी होते हैं।

17118.

What is the oxidation state of Cr in Cr2O7²-

Answer»

Oxygen is more electronegative than chromium, so it'll take its usual −2 charge here. There are seven oxygen atoms, so the total charge is −2⋅7=−14.

Let x be the oxidation number of two chromium atoms. So, we got:

x+(−14)=−2

x−14=−2

x=12

So, two chromium atoms have a total oxidation number of +12. Since one is not more electronegative than the other, we can divide the number by two to get one chromium's oxidation number.
12/6 =6

So, a chromium atom here has an oxidation number of +6.

17119.

What type of pump works like human lung

Answer»

The right ventricle pumps the oxygen-poor blood to the lungs through the pulmonary valve. The left atrium receives oxygen-rich blood from the lungs and pumps it to the left ventricle through the mitral valve. The left ventricle pumps the oxygen-rich blood through the aortic valve out to the rest of the body.

17120.

Main composition of glass making

Answer»

Glasses are made from three main materials—sand (silicon dioxide, or SiO2), limestone (calcium carbonate, or CaCO3), and sodium carbonate (Na2CO3). But such glasses are easily soluble in water (their solutions are called water glass).

17121.

A spliceosome contains all the following except

Answer»

Answer: Ribosome

17122.

A polycistronic MRNA can be seen in?

Answer» Generally, Polycistronic mRNA is found in prokaryotes.
17123.

Which one of the following is not a homosporous fem ?A. DryopterisB. PterisC. PteridiumD. Azolla

Answer» Correct Answer - D
17124.

Observe following figures and select true statement about them ? A. figure `(a)` is Sphagnum and it is monoediousB. figure `(b)` is moss and it is dioeciousC. figure `(b)` is Sphagnum and it is monoeciousD. both figure are representing moss with dioecious habit

Answer» Correct Answer - C
17125.

Which of the following tissues lines the majority of digestive tract ?A. Simple columnarB. Simple squamousC. Pseudostratified ciliated columnarD. Stratified cuboidal

Answer» Correct Answer - A
17126.

which of the following is not a function of areolar connective tissue ?A. Storing nutrients as fatB. Defending the body against infectionC. Movement of body partsD. Holding body fluids

Answer» Correct Answer - A
17127.

Name the issue which coverts the external surface of animal body and internal surface of the visceral organs `:-`A. epithelial tissuesB. connective tissueC. muscular tissueD. nervous tissue

Answer» Correct Answer - A
17128.

Bone marrow is composed of `:-`A. adipose tissue, areolar tissue & bloodB. adipose and areolar tissueC. adipose tissue and fibroblastsD. adipose tissue

Answer» Correct Answer - A
17129.

Embryonic ectoderm develops into which of the following major tissue types ?A. Connective and epithelial tissueB. Epithelial and nervous tissueC. Connective and muscle tissueD. Muscle tissue and epithelial tissue

Answer» Correct Answer - B
17130.

Mammalian pinna is supported by `:-`A. Hyaline cartilageB. Elastic cartilageC. Calcified cartilageD. White fibrous connective tissue

Answer» Correct Answer - B
17131.

(a). IVF is a very popular method these days that is helping childless couples to bear a child. Describe the different steps that are carried out in this technique. (b). Would you consider Gamete Intrafallopian Transfer (GIFT) as an IVF? Give a reason in support of your answer

Answer»

(a) Ova from the wife /donor (female) and sperms from the husband / donor (male) are collected and induced to form zygote in simulated conditions in laboratory. The zygote/ early embryos (up to 8 blastomeres) then transferred into the fallopian tube (ZIFT) and embryos with more than 8 blastomeres into the iuterus, (IUT) to complete its further development. 

(b) No, GIFT cannot be considered as IVF technique because fertilisation takes place in the female body / in vivo.

17132.

Name the cells that acts as HIV factory in humans when infected by HIV. Explain the events that occur in these infected cells.

Answer»

Macrophages act as HIV factory in human. 

Once the virus enters the human body the virus / viral genome infects macrophages where its RNA genome replicates, to form viral DNA. With the help of the enzyme reverse transcriptase, this viral DNA gets incorporated into host cell’s DNA, and directs the infected cells to produce virus particles.

17133.

Which of the following causes maximum indoor chemical pollution?1. Burning coal2. Burning cooking gas3. Room spray4. Burning mosquito coil

Answer» Correct Answer - Option 1 : Burning coal

The correct answer is Burning coal.

  • Coal is a highly variable fuel that contains different levels of moisture, non-combustible inorganic material (ash), sulfur, and sometimes significant levels of other impurities, e.g. arsenic, fluorine, lead and mercury.
  • Burning coal inside the home for the purposes of heating or cooking produces particulate and gas emissions that may contain a number of harmful chemicals, such as benzene, carbon monoxide, formaldehyde, and polycyclic aromatic hydrocarbons.
  • The combustion may lead to carbon monoxide which becomes fatal to human beings as it blocks oxygen to reach parts of the body.
  • Lung cancer is also associated with exposure to indoor coal combustion emissions. 
17134.

The green scum seen in the freshwater bodies isA. Blue green algaeB. Red algaeC. Green algaeD. Both (a) and ((c)

Answer» Correct Answer - d
17135.

Role of earthworms in agriculture. Give a very long essay on this topic.

Answer»

Earthworm is called Farmer's friend, nearly it can consume all biodegradable materials and convert it into Rich Manure. Farmers use earthworms for making manure this process is called vermicomposting.

Earthworms are annelidan worms which are considered to be ‘Friend of Farmers’. They are eco-friendly organisms.

Earthworms loosen the soil by burrowing deep into it. This is equal to tilling of the soil.

Earthworms consume animal and plant wastes and release organic matter as its excreta. This excreta of earthworms increases soil fertility. It improves the water holding capacity of the soil. 

The process of using worms to decompose animal and plant wastes is called as vermicomposting. The manure produced after decomposing of wastes is called as vermicompost.

Benefits of earthworms

By their actions in the soil, earthworms offer many benefits: increased nutrient availability, better drainage, and a more stable soil structure, all of which help improve farm productivity.

Improved nutrient availability
Worms feed on plant debris (dead roots, leaves, grasses, manure) and soil. Their digestive system concentrates the organic and mineral constituents in the food they eat, so their casts are richer in available nutrients than the soil around them. Nitrogen in the casts is readily available to plants. Worm bodies decompose rapidly, further contributing to the nitrogen content of a soil.

Improved drainage

The extensive channelling and burrowing by earthworms loosens and aerates the soil and improves soil drainage. Soils with earthworms drain up to 10 times faster than soils without earthworms. In zero-till soils, where worm populations are high, water infiltration can be up to 6 times greater than in cultivated soils. Earthworm tunnels also act, under the influence of rain, irrigation and gravity, as passageways for lime and other material.

Improved soil structure
Earthworm casts cement soil particles together in water-stable aggregates. These are able to store moisture without dispersing. Research has shown that earthworms which leave their casts on the soil surface rebuild topsoil. In favourable conditions they can bring up about 50 t/ha annually, enough to form a layer 5 mm deep. One trial found worms built an 18-cm thick topsoil in 30 years.

Improved productivity
Research into earthworms in New Zealand and Tasmania found earthworms introduced to worm-free perennial pastures produced an initial increase of 70–80% in pasture growth, with a long-term 25% increase: this raised stock carrying capacity. Researchers also found that the most productive pastures in the worm trials had up to 7 million worms per hectare, weighing 2.4 tonnes. There was a close correlation between pasture productivity and total worm weight, with some 170 kg of worms for every tonne of annual dry matter production.

How to encourage earthworms

Because earthworms do not like soil that is too acid, alkaline, dry, wet, hot or cold, their presence is a good indicator of soil conditions suitable for plant growth.

Ensure soil pH (CaCl2) is above 4.5
Earthworms do not like acid soils with pH (CaCl2))* less than 4.5. The addition of lime raises pH and also adds calcium. Earthworms need a continuous supply of calcium, so are absent in soils low in this element. The south Australian research found that earthworm numbers doubled when pH(CaCl2) rose from 4.1 to 6.7.

Increase organic matter
Earthworms feed on soil and dead or decaying plant remains, including straw, leaf litter and dead roots. They are the principal agents in mixing dead surface litter with the soil, making the litter more accessible to decomposition by soil microorganisms. Animal dung is also an attractive food for many species of earthworms. The following farming practices provide food for earthworms.

Permanent pasture: Permanent pasture provides organic matter as leaves and roots die and decay. Pasture slashings and manure from grazing animals are also good sources of organic matter in a pasture.

Green manure crops: Green manure crops are fodder crops turned into the soil to provide organic matter to benefit the following crop. The crops are grazed or slashed, sometimes pulverised, and then left on the surface or turned into the soil.

Crop stubble: Stubble is an important source of organic matter. Burning stubble destroys surface organic matter, and this affects worm numbers. It is best to leave stubble to rot down, and sow following crops into the stubble using aerial sowing, direct drill or (at least) minimum tillage. All these techniques mean less cultivation, and this also encourages earthworms.

Rotations: Rotating pasture with crops helps build up organic matter levels and earthworm numbers.

Reduce use of some fertilisers and fungicides
Highly acidifying fertilisers such as ammonium sulfate and some fungicides reduce worm numbers. Researchers have found that orchards sprayed with Bordeaux or other copper sprays contain few earthworms and have peaty surface mats and poor soil structure.

Keep soil moist
Worms can lose 20% of their body weight each day in mucus and castings, so they need moisture to stay alive. Groundcover such as pasture or stubble reduces moisture evaporation. Decaying organic matter (humus) holds moisture in the soil. In dry times some species burrow deep into the soil and are inactive until rain 'reactivates' them.

Improve drainage
Worms need reasonably aerated soil, so you may need to drain or mound soil in wetter areas to prevent waterlogging.

Reduce soil compaction
It is difficult for earthworms to move through heavily compacted soil, so keep vehicle and animal traffic to a minimum in wet conditions.

Reduce cultivation
Ploughing soil reduces earthworm numbers. Researchers have found that after four years, zero-tilled paddocks had twice as many worms as cultivated soils. However, shallow cultivation may not affect worm numbers.

Protect from climatic extremes
Earthworms are intolerant of drought and frost and do not like dry sandy soils. They are active only when the soil is moist, and are inactive when it is dry. Organic matter cover helps reduce the effect of climatic extremes and retains soil moisture.

17136.

The expanded form of DDT isA. dichloro diphenyl trichloroethaneB. dichloro diethyl trichloroethaneC. dichloro dipyrydyl trichloroethaneD. dichloro di phenyl tetrachloroacetate

Answer» Correct Answer - a
17137.

Choose the incorrect statement.A. The Montreal protocol is associated with the control of emission of ozone deplet- ing substancesB. Methane and carbon dioxide are green house gasesC. Dobson units are used to measure ox- ygen contentD. Use of incinerators is crucial to dispos- al of hospital wastes

Answer» Correct Answer - c
17138.

Open type of circulatory system is seen in Arthropods. Give another example.

Answer»

The earthworm.

17139.

For a particle rotating in a vertical circle with uniform speed, the maximum and minimum tension in the string are in the ratio 5 : 3. If the radius of vertical circle is 2 m, the speed of revolving body is (`g=10m//s^(2)`)A. `sqrt(5)m//s`B. `4sqrt(5)m//s`C. 5 m/sD. 10 m/s

Answer» Correct Answer - B
17140.

A small of mass m starts from rest at the position shown and slides along the frictionless loop the loop track of radius R. What is the smallest value of y such that the object will slide without losing contact with the track? A. R/2B. RC. R/4D. 3R/4

Answer» Correct Answer - A
17141.

A block is released from rest from top of a rough curved track as shown in figure. It comes to rest at some point on the horizontal part. If its mass is 200 gm, calculate work by friction is joules A. `+2J`B. `-2J`C. `+4J`D. `-4J`

Answer» Correct Answer - A

BY WORK ENERGY THEOREM

Wf+Wmgh=KEf-KEi

Wf+Wmgh=0(because kinetic energy at start and at end is zero)

Wf=-Wmgh

Wf=-200*10*2/1000

Wf=-4J

17142.

Finely divided catalyst has greater surface area and has greater catalytic activity than the compact solid. If a total surface area of 6291456 `cm^(2)` is required for adsorption in a catalytic gaseous reaction, then how many splits should be made in a cube of exactly 1 cm in length to achieve required surface area? [Given : One split of a cube gives eight cubes of same size]A. 60B. 80C. 20D. 22

Answer» Correct Answer - C
Total Surface area of eight cubes `=8xx6xx(1/2xx1/2)^2`
Apply the formula
Surface area on n split of a cube `=8^nxx6xx(1/2)^(2n)`
`6291456=8^n xx 6 xx (1/2)^(2n)`
17143.

difference between nuclear force and electrostatic repulsion force

Answer»

The nuclear force is stronger than the electrostatic ( rather electromagnetic) force by the inverse of the fine structure constant. The fine structure constant is given by = 2π e2/ h c and its value is 1/137. 05. The Strong Nuclear Force is what holds protons together with neutrons.

17144.

While going through the road, suddenly your friend has got dog bite. You have to provide the first aid to your friend. How can you deal with the situation?

Answer»

The situation can be dealt with following steps:

• Wash hands before attending to wound. 

• Wash wound with soap and running water. 

• Give pressure bandage to stop bleeding. 

• Cover using sterile bandage

17145.

In human body four basic type of joints are present. Name these joints with proper example.

Answer»

a. Ball and socket - As in hip, shoulder 

b. Hinge - As in elbow 

c. Gliding - As in carpals at wrist (small bones of hand) 

d. Pivot - As in radius and ulna

17146.

What is the basic difference between Medial and Lateral position of body?

Answer»

Medial : Nearer to the median line. 

Lateral : Away from the median line

17147.

What do you mean by breeding experiments? How can we develop a disease resistant variety with its help? Explain.

Answer»

For diseases such as malaria and filariasis that are transmitted through insect vectors, the most important measure is to control or eliminate the vector and their breeding places. This can be achieveed by avoiding staggation of water in and around residential aores regular cleaning of household coolers use of mosquito nets, introducing fishes like Gambusia in ponds that feed on mosquito larvae, spraying of insecticides inditches, drainage area and swamps etc. In addition doors and windows should be provided with wire mesh to prevent the entry of mosquitoes such precautions have become all the important especially in the light of recent widespread incidences of the vector borne (Acedes mosquitoes) disease like dengue and chikungunya in many parts of India.

The advancements made in biological science have armed is to effectively deal with many infections disease. The use of vaccines and immunisation programmes have enabled us to completely eradicate a deadly disease Iike small pox. A large number of other infections diseases like polio, diphtheria, pneumonia and tetanus have been controlled to a large extent by the use of vaccines. Biotechnology is the verge of making available newer and safer vaccines discovery of antibiotic and various other drugs has also enabled us to effectively treat infections diseases.

17148.

The voltage drop across the resistor in a lcr series circuit is

Answer»

The voltage drop across the resistance in LCR circuit is VR = IR

17149.

What is coulomb's law ?

Answer»

According to Coulomb’s law, the force of attraction or repulsion between two charged bodies is directly proportional to the product of their charges and inversely proportional to the square of the distance between them. It acts along the line joining the two charges considered to be point charges.

17150.

What do you mean by adaptation? Describe adaptations of aquatic organisms (for both plants and animals).

Answer»

Adaptations:-

Changes occuring in structure behaviour, physiolosy and development which are useful to organisms in adjusting themselves favourably to prevailing set of environmental conditions are called adaptations. Adaptations are a means with the help of which organisms thrive in different types of habitats and ecosystem. Adaptive features do not develop all of a sudden. They evolve a long peeriod of time through the process of natural selection. Maternal selection helps in picking up variations already present in the population (pre-adaptations) as well as variations which develop naturally though recombinations and mutations.

The plant which remain permanently in water are called hydrophytes. They may be submerged as partly submerged and have the following adaptation-

(i) They have the presence of aerenchyma charge air spaces in the leaves and petioles which help to other parts including roots located in anaerobic soil. This tissue also provides buoyancy to the plant.

(ii) Elchhornia (water hyacinth) has the presence of inflated petioles which keep the plants floating on the surface of water.

(iii) Roots are poorly developed or absent in free floating hydrophytes like wolfia, salvina and ceratophyllum.

(iv) Various emergent hyrophytes (having leaves projecting above water surface) have a continuous system of air passage which helps the submerged plant organs to exchange gases from the atmosphere through the stomata in the emergent organs.