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निबन्ध:जीवन में शिक्षा का महत्त्व

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प्रस्तावना-शिक्षा-विहीन व्यक्ति सींग और पूँछरहित जानवर के समान होता है। शिक्षा मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाती है। मनुष्य के भीतर विकास की जो सम्भावनाएँ होती हैं, उन्हें विकसित करना ही शिक्षा का मुख्य कार्य है। शिक्षा के अभाव में मनुष्य ने अपने लिए और न ही समाज के लिए उपयोगी हो पाता है। मानव सभ्यता का विकास, शिक्षा का ही विकास है। प्राचीन काल की शिक्षा में गुरु का अधिक महत्त्व रहता था। गुरुजनों ने जो सत्य उपलब्ध किया, उसे शिष्यों तक पहुँचाना वे अपना कर्तव्य समझते थे। पुस्तकीय ज्ञान को विद्यार्थियों के मस्तिष्क में ढूंस देना ही शिक्षा का मुख्य लक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।

शिक्षा का उद्देश्य–शिक्षा का उद्देश्य है-संस्कार देना। मनुष्य के शारीरिक, मानसिक तथा भावात्मक विकास में योगदान देना शिक्षा का मुख्य कार्य है। शिक्षित व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहता है, स्वच्छता को जीवन में महत्त्व देता है और उन सभी बुराइयों से दूर रहता है, जिनसे स्वास्थ्य को हानि पहुँचती है। रुग्ण शरीर के कारण शिक्षा में बाधा पड़ती है। शिक्षा हमारे ज्ञान का विस्तार करती है। ज्ञान का प्रकाश जिन खिड़कियों से प्रवेश करता है,  उन्हीं से अज्ञान और रूढ़िवादिता का अन्धकार निकल भागता है। शिक्षा के द्वारा मनुष्य अपने परिवेश को पहचानने और समझने में सक्षम होता है। विश्व में ज्ञान का जो विशाल भण्डार है, उसे हम शिक्षा के माध्यम से ही प्राप्त कर सकते हैं। सृष्टि के रहस्यों को खोलने की कुंजी शिक्षा ही है। अशिक्षित व्यक्ति रूढ़ियों, अन्धविश्वासों एवं कुरीतियों का शिकार हो सकता है। शिक्षा हमारी भावनाओं का संस्कार करती है और हमारे दृष्टिकोण को उदार बनाती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य मानव का सर्वांगीण विकास करना है।

शिक्षा की आवश्यकता–समाजे मानवीय सम्बन्धों का ताना-बाना है। व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है। व्यक्ति के अभाव में समाज का अस्तित्व और समाज के अभाव में सभ्य मनुष्य की कल्पना कर सकना भी असम्भव है। समाज का स्वास्थ्य, व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। यदि समाज में रहने वाले व्यक्ति स्वस्थ, सुशिक्षित, उदार, संवेदनशील एवं परोपकारी होंगे, तो समाज अवश्य उन्नति करेगा। प्रत्येक सभ्य समाज की प्रमुख चिन्ता यही होती है कि वह किसी प्रकारे अपने नागरिकों की क्षमता को बढ़ा सके। समाज का प्रत्येक व्यक्ति समाज से जितना लेता है उससे अधिक देने में सक्षम हो सके तभी समाज का विकास सम्भव है। शिक्षित व्यक्ति में ही यह क्षमता विकसित हो सकती है। शिक्षित व्यक्ति ही एक अच्छा व्यापारी, कर्मचारी, डॉक्टर, अध्यापक, इंजीनियर अथवा नेता हो सकता है। शिक्षित व्यक्ति समाज में रहने के लिए बेहतर स्थान बना सकता है।

शिक्षा से ही समाज का उत्थान सम्भव–शिक्षा के प्रसार द्वारा ही समाज में समता, सहयोग एवं शोषणरहित व्यवस्था का निर्माण सम्भव है। आज भारत में साक्षरता अभियान पर बल दिया जा रहा है; क्योंकि साक्षर और शिक्षित नागरिक ही सामाजिक कुरीतियों से लड़ सकते हैं। रूढ़िबद्ध समाज में परिवर्तन लाने का साधन शिक्षा ही हो सकती है। शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझ सकता है। वह आसानी से शोषण का शिकार नहीं हो सकता; क्योंकि प्राय: अज्ञानता ही मनुष्य को असहाय बनाती है।

शिक्षित व्यक्ति ही प्रजातन्त्र की सफलता में सहयोग दे सकते हैं। प्रजातन्त्र का आधार प्रबुद्ध जनमत है।  शिक्षित व्यक्ति ही राष्ट्रीय समस्याओं को ठीक प्रकार से समझ सकता है। इस प्रकार शिक्षा प्रजातन्त्र की सफलता के लिए अत्यधिक आवश्यक है।

नारी मुक्ति आन्दोलन में भी शिक्षा का अत्यधिक महत्त्व है। शिक्षित नारी अपने परिवार तथा समाज के लिए उपयोगी भूमिका निभा सकती है। वह बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकती है, घर को सजा-सँवार सकती है, आत्म-निर्भर हो सकती है, अपने अधिकारों के लिए लड़ सकती है और शोषण का विरोध कर सकती है।

उपसंहार-निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि सामाजिक परिवर्तन में शिक्षित नागरिकों की भूमिका ही महत्त्वपूर्ण हो सकती है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य का सर्वांगीण विकास है। व्यक्ति के विकास में ही समाज का विकास निहित है।



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