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This section includes 7 InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your Current Affairs knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.

1.

निकास/निर्यात व्यापार का अर्थ बताइए ।

Answer»

देश की सीमाओं के बाहर माल विक्रय किया जाये तो निर्यात व्यापार कहते हैं ।

2.

माल के उत्पादन के स्थल से ग्राहकों तक ले जाया जाए तो कौन-से तुष्टिगुण का सर्जन होता है ?

Answer»

स्थल/स्थान तुष्टीगुण का सर्जन होता है ।

3.

इनमें से उद्योग के साथ सम्बन्धित है ।(A) व्यापार(B) नौकरी(C) उत्पादन प्रक्रिया(D) विनिमय

Answer»

सही विकल्प है (C) उत्पादन प्रक्रिया

4.

आर्थिक प्रवृत्ति के विभिन्न प्रकारों में से कौन-सी प्रवृत्ति का समावेश नहीं होता है ?(A) धार्मिक प्रवृत्ति(B) धन्धा(C) पेशेवर धन्धार्थी(D) नौकरी

Answer»

सही विकल्प है (A) धार्मिक प्रवृत्ति

5.

आर्थिक और अनार्थिक प्रवृत्ति से आप क्या समझते है ? उदाहरण द्वारा समझाइये ।

Answer»

आर्थिक प्रवृत्ति (Economic Activity) : आर्थिक प्रवृत्ति अर्थात् धन की प्राप्ति की अपेक्षा से की जानेवाली प्रवृत्ति । उदाहरणार्थ बैंक में काम करनेवाले क्लर्क, होटल में काम करनेवाले व्यक्तियों की प्रवृत्ति, चीज-वस्तु की बिक्री करनेवाले व्यापारियों की प्रवृत्ति, विद्यालय में पढ़ानेवाले शिक्षक की प्रवृत्ति, डॉक्टर, बकील तथा चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट द्वारा दी जानेवाली सेवा इत्यादि का उद्देश्य आय उपार्जन करना होता है । ऐसी प्रवृत्तियों को आर्थिक प्रवृत्ति कहा जाता है ।

आर्थिक प्रवृत्ति की परिभाषाएँ : प्रो. जे. आर. हिक्स के अनुसार : “चीजवस्तु एवं सेवाओं का विनिमय द्वारा आय प्राप्त करने तथा खर्च करने की प्रवृत्ति को आर्थिक प्रवृत्ति कहते हैं ।”

प्रो. एरीक रॉल के अनुसार : “हमारी पसन्दगी की क्रियाएँ या प्रवृत्तियाँ सहज रूप से बाजार द्वारा होती है, और उनके द्वारा कम या अधिक मात्रा में वस्तु या सेवा का क्रय-विक्रय तथा विनिमय द्वारा व्यवहार करके आय या खर्च करने की प्रवृत्ति को आर्थिक प्रवृत्ति माना जाता है ।”

बिन-आर्थिक प्रवृत्ति (Non-Economic Activity) : कुछ प्रवृत्तियाँ ऐसी होती हैं, जो प्रेम, लगाव, आवेश, ममता, धारणा, सेवा, प्रतिष्ठा इत्यादि से प्रेरित होकर की जाती हैं । इन प्रवृत्तियों का उद्देश्य धन-प्राप्ति नहीं होता है, बल्कि समाज सेवा अथवा अन्य उद्देश्य होते हैं । ऐसी प्रवृत्ति को बिन-आर्थिक प्रवृत्ति कहते हैं । जैसे रोगनिदान शिबिर में निःशुल्क सेवा देनेवाले डॉक्टर, भूकंप राहत शिविर में काम करनेवाले स्वयं सेवक, कोलेज व स्कूल में सामान्य मंत्री के तौर पर कार्य करनेवाला विद्यार्थी-प्रतिनिधि, माता द्वारा बालकों का पालन-पोषण की प्रवृत्ति इत्यादि बिन-आर्थिक प्रवृत्तियाँ हैं ।

अलग-अलग संगठनों द्वारा बिन-आर्थिक प्रवृत्तियों का संचालन किया जाता है । जैसे कि सेवा भावी संस्थाओं या मण्डलों द्वारा निःशुल्क सेवा-कार्य, शिक्षक-संघ, लायन्स क्लब, रोटरी क्लब द्वारा आयोजित रक्तदान-शिबिर, वृक्षारोपण-कार्यक्रम, बाढ़ग्रस्त अकाल या भूकंप के समय . सहायता, विद्यालय के बालकों द्वारा ट्राफिक नियमन में सहयोग इत्यादि समस्त प्रवृत्तियाँ अनार्थिक प्रवृत्तियाँ मानी जाती हैं ।

6.

धन्धाकीय प्रवृत्तियों का वर्गीकरण कितने प्रकार से होता है ?

Answer»

धन्धाकीय प्रवृत्तियों का वर्गीकरण तीन प्रकार से होता है :

  1. व्यापार
  2. वाणिज्य
  3. उद्योग
7.

आयात व्यापार किसे कहते हैं ?

Answer»

दूसरे देश से माल मंगाना अथवा क्रय करना अर्थात् आयात व्यापार कहते हैं ।

8.

धन्धे में होनेवाली मानवसर्जित जोखिम बताइए ।

Answer»

कर्मचारियों में हड़ताल, टेक्नोलॉजी में परिवर्तन, ग्राहकों की रूचि व माँग में परिवर्तन, राजकीय अस्थिरता, बाजार में प्रतिस्पर्धा इत्यादि जोखिमें होती है ।

9.

उत्पादन के मुख्य साधन कौन-कौन-से होते हैं ?

Answer»

उत्पादन के मुख्य साधन निम्नलिखित हैं :

  1. भूमि
  2. पूँजी
  3. श्रम
  4. नियोजन-शक्ति इत्यादि ।
10.

व्यापार संज्ञा समझाइए ।

Answer»

लाभ के उद्देश्य से माल और सेवाओं का लेनदेन होता हो उसे व्यापार कहते हैं ।

11.

धन्धाकीय इकाइयाँ समाज के कौन-कौन-से वर्गों अथवा समूहों के साथ विभिन्न व्यवहार करती है ?

Answer»

धन्धाकीय इकाइयाँ समाज के मालिकों, ग्राहकों, कर्मचारियों, सरकार, लेनदार जैसे विभिन्न वर्गों के साथ विभिन्न व्यवहार करती है ।

12.

धन्धाकीय जोखिम से आप क्या समझते है ? धन्धाकीय जोखिम के कारण समझाइये ।

Answer»

धन्धाकीय जोखिम का अर्थ : विभिन्न धन्धाकीय इकाइयों में लाभ की अनिश्चितता अथवा हानि या नुकसान होने की आशंका बनी रहती है, जो भविष्य में इकाई के लाभ को प्रभावित करती है, जिसे धन्धाकीय जोखिम के रूप में जानते है ।

धन्धाकीय जोखिमों के सामने का प्रतिफल अर्थात् लाभ । धन्धे में दो स्वरूप की जोखिमें रहती है ।
(A) प्राकृतिक जोखिम
(B) मानवसर्जित जोखिम

(A) प्राकृतिक जोखिम : प्राकृतिक जोखिम, जैसे कि भूकंप, बाढ़ आदि धन्धे के विकास को बाधाएँ पहुँचाती है । धन्धे की सम्पत्तियों को नष्ट करते है अथवा नुकसान पहुंचाते है । ऐसी जोखिमों पर धन्धे का कोई नियंत्रण नहीं रहता है ।

(B) मानवसर्जित जोखिम : मानवसर्जित जोखिमों के कारण से धन्धे का विकास रुकता है तथा धन्धे में नुकसान सहन करना पड़ता है, जैसे कि कर्मचारियों की हड़ताल, टेक्नोलॉजी में परिवर्तन, ग्राहकों की रुचि-अभिरूचि और मांग में परिवर्तन, राजकीय अस्थिरता, बाजारं में स्पर्धा का जोखिम ।

धन्धाकीय जोखिम का कारण :

धन्धाकीय इकाइयों में दो प्रकार के जोखिम देखने को मिलते हैं, जिनमें प्राकृतिक जोखिम एवं मानवसर्जित जोखिम के कारण निम्नलिखित होते हैं .

  • तकनीकी में परिवर्तन होने से धन्धे में जोखिम रहता है । यंत्र, साधन या कम्प्यूटर लाया गया हो, लेकिन अधिक सुविधावाला यंत्र, साधन तथा कम्प्यूटर हो जाने से पुराने साधन तथा कम्प्यूटर अप्रचलित बन जाते हैं । जैसे कम्प्यूटर के पुराने पंच कार्ड किसी काम के नहीं रहते ।
  • मांग की अनिश्चितता के कारण भी धन्धे में जोखिम रहता है, कभी माँग (Demand) में वृद्धि होती है तो कभी मांग में कमी । जैसे ओलम्पिक अथवा क्रिकेट वर्ल्डकप मैच के दौरान टेलिविझन की माँग में एकाएक वृद्धि होती है ।
  • धन्धे में दो प्रतिस्पर्धी कम्पनियों के बीच स्पर्धा का भी पूर्ण जोखिम होता है । स्पर्धा से विज्ञापन (Advertising) खर्च अधिक होता है, जिसके परिणामस्वरूप लाभ में कमी होती है एवं अन्य स्पर्धी कम्पनियों के प्रवेश होने से कीमत में कमी करनी पड़ती है ।
  • धन्धे में आर्थिक जोखिम भी बाधक होता है, जैसे तेजी-मंदी, ब्याज की दर में घट-बढ़, खर्च में वृद्धि, महँगाई भत्ता (D.A.) बढ़ने से वेतन में वृद्धि, बिजली की दर में वृद्धि, कर की दर में वृद्धि होने से अधिक भुगतान करने का जोखिम रहता है ।
  • कानून/नियम : सरकार विभिन्न प्रकार के कानून/नियम बनाती है, जैसे प्रदूषण नियम, ग्राहक सुरक्षा कानून, श्रमसंघ कानून, कारखाना कानून इत्यादि । लेकिन उपरोक्त सभी कानून धन्धे के लिए जोखिम भी खड़ी करते है । जैसे न्यूनतम वेतन अधिनियम और कारखाना है । कानून/अधिनियम आदि धन्धाकीय इकाइयों को कई निर्णय लेने में रुकावट डालते है ।
  • भौतिक जोखिम : धन्धे में उपयोग में ली जानेवाली सम्पत्तियों को नुकसान होने से भौतिक जोखिम खड़ी हो जाती है । जैसे यंत्र और साधन काम करते हुए बन्द हो जाये, वहन के दौरान माल को नुकसान पहुंचे तब भौतिक जोखिम खड़ी हो जाती है ।
13.

सामाजिक जिम्मेदारी अर्थात क्या ?

Answer»

सामाजिक जिम्मेदारी अर्थात् समाज में विविध वर्गों के हित को ध्यान में रखकर धन्धे के उद्देश्य को पूर्ण करना और समाज के सम्पूर्ण कल्याण के लिए धन्धे का संचालन करना ।

14.

व्यापार की सहायक सेवाएँ कौन-कौन-सी हैं ?

Answer»

व्यापार की सहायक सेवाएँ इस प्रकार हैं : जैसे बैंक, बीमा, वाहन-व्यवहार, संदेशा-व्यवहार, गोदाम की सेवाएँ, प्रतिनिधि की सेवाएँ इत्यादि।

15.

अर्थशास्त्र की दृष्टि से आर्थिक प्रवृत्ति किसे कहा जाता है ?

Answer»

अर्थशास्त्र की दृष्टि से चीज़-वस्तु का उत्पादन, विनिमय, वितरण एवं उपभोग से सम्बन्धित प्रवृत्तियों का समावेश आर्थिक प्रवृत्ति के रूप में किया जाता है ।

16.

महत्तम सम्पत्ति के उद्देश्य से आप क्या समझते हैं ?

Answer»

जिसमें महत्तम सम्पत्ति अर्थात् धन्धे की शुद्ध सम्पत्ति की कीमत अधिक से अधिक हो वह परिस्थिति ।

17.

धन्धे (Business) से आप क्या समझते हैं ? धन्धे के उद्देश्य समझाइये ।

Answer»

धन्धा (Business) का अर्थ : धन्धा शब्द यह अंग्रेजी शब्द ‘Busy’ शब्द से आया है । जिसका अर्थ होता है ‘व्यस्त’ रहना अथवा सतत प्रवृत्तिमय (कार्यशील) रहना । कोई भी धन्धा लाभ और सम्पत्तियाँ प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है । धन्धा का सम्बन्ध लाभ के साथ होता है । फिर भी कई बार हानि भी हो सकती है फिर भी आर्थिक प्रवृत्ति ही मानी जाती है ।

व्याख्या :

  1. “धन्धा अर्थात् लाभ कमाने के उद्देश्य से की जानेवाली कोई भी कानूनी रूप से की जानेवाली आर्थिक प्रवृत्ति ।”
  2. प्रो. डिक्सी के मतानुसार : “धन्धा अर्थात् लाभ के उद्देश्य से की जानेवाली कोई भी आर्थिक प्रवृत्ति ।”
  3. श्री ल्यूइस हेन्री के मतानुसार : “धन्धा में वस्तुओं के क्रय विक्रय द्वारा सम्पत्ति (धन) उत्पन्न करने अथवा प्राप्त करने के उद्देश्य से की जानेवाली मानवीय प्रवृत्ति है ।”
  4. “धन्धा अर्थात् चीज-वस्तुओं एवं सेवाओं को लाभ के उद्देश्य से विक्रय के लिये किया जानेवाला उत्पादन एवं क्रय से सम्बन्धित सभी प्रवृत्तियाँ ।”

धन्धे के उद्देश्य : धन्धे का प्राथमिक उद्देश्य लाभ कमाना होता है इसके बावजूद भी ग्राहकों का जागृत होना, राज्य के नियंत्रण व बदलती हुई परिस्थिति के कारण धन्धे के एक से भी अधिक उद्देश्य स्वीकारे गये हैं । धन्धे के उद्देश्यों को दो भागों में बाँटा गया है :
I. आर्थिक उद्देश्य, II. सामाजिक उद्देश्य

(1) धन्धे के आर्थिक उद्देश्य :

धन्धे के आर्थिक उद्देश्य निम्नानुसार होते है :

(a) लाभ का उद्देश्य : धन्धा लाभ के उद्देश्य से की जानेवाली आर्थिक प्रवृत्ति हैं । अधिकतर व्यापारी एवं उत्पादक द्वारा लाभ के उद्देश्य से धन्धाकीय प्रवृत्तियाँ की जाती हैं । लाभ धन्धे के प्रेरक बल के समान है, धन्धे की कार्यक्षमता का मापदण्ड है । अगर किसी व्यापारिक इकाई में लाभ न मिले तो ऐसी इकाई को चलाने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता । धन्धे में अधिकतम लाभ कमाना पुरानी विचारधारा है, लेकिन वर्तमान में अधिकतम लाभ के स्थान पर योग्य लाभ प्राप्त करने का उद्देश्य रखा गया है ।

धन्धे में योग्य एवं.उचित लाभ लेने से धन्धा स्पर्धा में अधिक समय तक टिक सकता है, धन्धे में व्यक्ति प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है । उचित लाभ के उद्देश्य से ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होती है । धन्धे का एक मात्र उद्देश्य लाभ कमाना ही नहीं होना चाहिए, परन्तु दूसरे अन्य उद्देश्य भी होने चाहिए, इसके सन्दर्भ में संचालन-निष्णात उर्विक के मतानुसार : “जिस प्रकार जीवन का एक मात्र उद्देश्य खाना खाकर पेट भरना ही नहीं होता, ठीक इसी तरह धन्धे का भी एक मात्र उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता ।”

(b) महत्तम सम्पत्ति सर्जन करने का उद्देश्य : अधिकतर धन्धों में धन्धा की सम्पत्ति की कीमत अधिक से अधिक हो यह देखना होता है । विभिन्न धन्धा अथवा कम्पनी स्वरूप में समस्त लाभ लाभांश के रूप में वितरित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि कुछ लाभ को सम्पत्तियों को क्रय करने में लगाना चाहिए । महत्तम सम्पत्ति का उद्देश्य दीर्घकालीन उद्देश्य है । मंदी के समय आकस्मिक परिस्थितियों में लाभ प्राप्त करने का उद्देश्य कम करके धन्धे में सम्पत्ति और प्रतिष्ठा बनाये रखकर भविष्य में धन्धे को आगे बढ़ाने की नीति अपनानी पड़ती है ।

(c) अन्य आर्थिक उद्देश्य : अन्य आर्थिक उद्देश्यों में धन्धे की आर्थिक प्रगति और विकास करना, बाजार का विस्तार करना, उपलब्ध साधनों का अधिक से अधिक श्रेष्ठ उपयोग करना तथा आधुनिक तकनिकी को अपनाना इत्यादि ।

(2). धन्धे के सामाजिक उद्देश्य :

धन्धे की ओर से समाज के विभिन्न वर्गों को लाभ हो इसके लिए कई सामाजिक उद्देश्यों को महत्त्व दिया जाता है । किसी भी धन्धे का अस्तित्व समाज के बिना सम्भव नहीं । समाज है तो धन्धा है । इसलिए धन्धा का लाभ के अलावा के उद्देश्यों के महत्त्व को स्वीकारा गया है । धन्धे के सामाजिक उद्देश्य निम्नानुसार है :

(a) सामाजिक जिम्मेदारी पूर्ण करने का उद्देश्य : धन्धा समाज के विभिन्न वर्गों के साथ रहकर किया जाता है । जैसे ग्राहकों, मालिकों, कर्मचारियों, सरकार, देनदार, लेनदार इन सभी वर्गों के प्रति जिम्मेदारी को निभाते हुए आगे बढ़ने का उद्देश्य धन्धे का होना चाहिए । इसके अलावा धन्धार्थी द्वारा प्रदूषण नियंत्रण, कर्मचारी कल्याण नियम, कारखाना अधिनियम, गुमास्ता धारा अधिनियम का पालन, प्राकृतिक प्रकोप में मदद करना, कर्मचारी बीमा-योजना लागू करना, आरोग्य-सेवा इत्यादि सभी नियमों का पालन करते हुए आगे बढ़ना अर्थात् सामाजिक जिम्मेदारी ।

(b) रोजगार प्रदान करने का उद्देश्य : भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण समस्या रोजगार की हैं । इसके लिए रोजगार के नये-नये अवसर उत्पन्न करना तथा चालू रोजगार बन्द हों इस उद्देश्य से कई धन्धाकीय इकाइयाँ स्थापित हैं । जैसे राष्ट्रीय कपडा निगम National Textile Corporation (N.T.C.) संस्था द्वारा दुर्बल मिलें बन्द न होने पाएँ अत: ऐसी दुर्बल मिलों के NTC संस्था अपने अधिन ले लेती है जिसमे रोजगार बना रहता है । खादी ग्रामोद्योग बोर्ड द्वारा अधिक पिछड़े विस्तारों में औद्योगिक इकाई स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन देना, गुजरात । राज्य लघु उद्योग निगम के द्वारा छोटे उद्योगों को प्रोत्साहन देकर रोजगार बढ़ाना, पिछड़े क्षेत्रों में जहाँ आर्थिक विकास नहीं हुआ है वहाँ औद्योगिक इकाइयाँ प्रारम्भ करना अर्थात् रोजगार को बढ़ाना । कई बार उद्योगपतियों को अपने देश का ऋण अदा करने की जिम्मेदारी से प्रेरित किया जाता है, जिसमें देश के लोगों को रोज़गार का अवसर प्रदान करने का उद्देश्य होता है ।

(c) गुणवत्तावाली वस्तुएँ और सेवा प्रदान करने का उद्देश्य : धन्धे का उद्देश्य होता है कि समाज के लोग अपनी आवश्यकताएँ सन्तुष्ट कर सके तथा आसानी से उपलब्ध हो सके ऐसी गुणवत्तावाली वस्तुएँ और सेवाएँ प्रदान करने का उद्देश्य होता है । जैसे रसोई में उपयोग में लाये जानेवाले मसाले, पेय पदार्थ और खाद्य पदार्थों का उत्पादन करनेवाली इकाइयों को उच्चतम गुणवत्ता के स्तर अथवा नियमों का पालन करना चाहिए । सामाजिक उद्देश्य प्रदान करनेवाली धन्धाकीय इकाइयाँ उचित मूल्य पर वस्तुएँ और सेवाएँ प्रदान करने के लिए तैयार रहती है । जैसे ग्राहकों को वस्तुएँ विक्रय के पश्चात् घर तक पहुँचाना, वस्तुओं की व्यवस्था करना इत्यादि ।

(d) व्यापारिक रीति-रिवाजों का उचित रूप से निभाने का उद्देश्य : धन्धे के लिए कई गलत/अयोग्य रीति-रिवाज माने जाते है. जैसे वस्तुओं की कालाबाजारी, वस्तुओं को संग्रह करना, असत्य मार्ग दर्शानेवाले विज्ञापन देना । ऐसे कार्य धन्धे की ओर से नहीं किये जाने चाहिए । आवश्यकतावाली वस्तुओं की कृत्रिम कमी उत्पन्न नहीं करना चाहिए । ग्राहकों और समाज के कल्याण हेतु धन्धाकीय इकाइयाँ उचित/योग्य रूप से व्यापारिक रीति-रिवाज निभाने का उद्देश्य रखती है ।

(e) अन्य उद्देश्य : अन्य सामाजिक उद्देश्यों में

  1. इकाई द्वारा समाज में प्रतिष्ठा बनाना
  2. उत्पादन क्षेत्र में नये-नये संशोधन करना
  3. राष्ट्र के आर्थिक विकास में सहायक बनना और इसके लिये सरकार को सहकार देना
  4. कर्मचारियों प्रोत्साहित हो ऐसी कल्याणकारी योजनाएँ अमल में लाना ।
  5. उत्पादकता की ऊँची दर सिद्ध करना
  6. प्रतिस्पर्धा में टिके रहना, स्पर्धा में आगे आने के लिए नई वस्तुओं का विकास करना आदि धन्धे के अन्य उद्देश्य होते है ।
18.

सामाजिक जिम्मेदारी के क्या उद्देश्य होते हैं ?

Answer»

सामाजिक जिम्मेदारी का उद्देश्य समाज के अलग-अलग कर्मचारियों, अंशधारियों, ग्राहकों, लेनदारों, प्रतिस्पर्धी, सरकार सभी के हितों को ध्यान में रखकर कार्य करना इत्यादि सामाजिक जिम्मेदारी का उद्देश्य होता है ।

19.

धन्धे (Business) के सामाजिक दायित्व का उद्देश्य से आप क्या समझते है ?

Answer»

ग्राहकों में उत्पन्न जागृति, राज्य के नियंत्रण, ग्राहक शिक्षण, ग्राहक संगठनों के कारण धन्धे को अलग-अलग समूहों के हित के प्रति सजग रहने की आवश्यकता खड़ी हुई है । समाज के अलग अलग समूह या विभिन्न वर्ग जैसे कि मालिक, कर्मचारी, ग्राहक, लेनदार, सरकार इत्यादि सभी धन्धाकीय इकाई के साथ जुड़े हुए होते हैं और इन प्रत्येक समूहों का धन्धे के साथ के हित भी अलग अलग होते है । इन सभी अलग अलग समूहों के हितों का ख्याल धन्धाकीय इकाई को रखना अनिवार्य होता है । पर्यावरण की सुरक्षा, कर्मचारी कल्याण कानून, कारखाना कानून, ग्राहक सुरक्षा कानून इत्यादि का धन्धे को पालन करना पड़ता है ।

20.

‘समाज बिना धन्धे का अस्तित्व सम्भव नहीं ।’ धन्धे के सामाजिक उद्देश्य के संदर्भ में विधान समझाइये ।

Answer»

उपरोक्त विधान सत्य है । क्योंकि धन्धा समाज का एक अंग है । समाज के विभिन्न वर्गों के साथ उसका व्यवहार होता है । जैसे मालिक, ग्राहक, कर्मचारी, सरकार, लेनदार इत्यादि । इन सभी वर्गों का हित अलग-अलग होता है । तथा इन सभी के प्रति । धन्धे का सामाजिक दायित्व होता है । जो इकाई इन सभी वर्गों के प्रति दायित्व नहीं निभाती वो इकाई समाज में दीर्घ अवधि तक नहीं टिक सकेगी ।

समाज है तो धन्धा है, समाज नहीं तो धन्धा नहीं, अत: धन्धे की ओर से विभिन्न नियम/कानून का पालन करना चाहिए जैसे प्रदूषण नियंत्रण, कर्मचारी कल्याण नियम, कारखाना कानून, कर्मचारी बीमा योजना, ग्राहक सुरक्षा कानून आदि । इसके उपरांत रोजगार के अवसर प्रदान करना, उच्च गुणवत्तावाली वस्तुएँ तथा सेवाएँ प्रदान करना, व्यापारिक रीति-रिवाजों को निभाना और संशोधन को बल देना तथा राष्ट्र के विकास में सहायक बनना ऐसी कई योजनाएँ धन्धे की ओर से अमल में लाया जाना चाहिए । इस तरह कहा जाता है कि यदि धन्धे की ओर से समाज के प्रति दायित्व नहीं निभाया जायेगा तो वह इकाई दीर्घ अवधि तक टिक नहीं पायेगी तथा समाज बिना धन्धे का अस्तित्व सम्भव नहीं ।

21.

वर्तमान समय में लाभ कमाने का कौन-सा उद्देश्य स्वीकार हुआ है ?(A) कम(B) अधिक(B) अधिक(C) स्थिर(D) उचित

Answer»

सही विकल्प है (D) उचित

22.

वाणिज्य किसे कहते हैं ? इसके लक्षण स्पष्ट कीजिए ।

Answer»

वाणिज्य अर्थात् व्यापार एवं व्यापार की सहायक सेवाएँ । वाणिज्य के लक्षण निम्नलिखित हैं :

  • विनिमय : वाणिज्य का प्रारम्भ व्यापार से होता है । व्यापार में चीज़-वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता है । वस्तु या सेवा के विनिमय की प्रवृत्ति नियमित रूप से होनी चाहिए ।
  • सहायक सेवाएँ : वाणिज्य में व्यापार में सहायक सेवाओं का समावेश होता है । जैसे – बैंक, बीमा, गोदाम, वाहन-व्यवहार, संदेशाव्यवहार, एजेन्ट इत्यादि ।
  • आर्थिक प्रवृत्ति : वाणिज्य की प्रवृत्ति एक आर्थिक प्रवृत्ति है, आर्थिक प्रवृत्ति में वित्तीय आय प्राप्त की जाती है । व्यापार में लाभ के रूप में आय प्राप्त की जाती है । जैसे माल के संग्रह के बदले किराया लिया जाता है ।
  • सेवा का सातत्य : वाणिज्य के विकास का आधार उसकी सहायक सेवाओं से है, ये सेवाएँ सतत एवं नियमित प्राप्त होनी चाहिए । जैसे रेलवे, बैंक, बीमा कम्पनी इत्यादि ।
  • योग्य कीमत : आनुषंगिक सेवाओं की कीमत चीज़-वस्तु की कीमत की तुलना में योग्य एवं कम होनी चाहिए ।
  • मांगलक्षी : वाणिज्य की सेवाएँ मांगलक्षी होनी चाहिए । अगर सहायक सेवाएँ मांगलक्षी न हो तो वाणिज्य का विकास नहीं हो सकता ।
  • समय तथा स्थल की उपयोगिता में वृद्धि : वाणिज्य की प्रवृत्ति द्वारा वस्तुओं की स्थल-उपयोगिता तथा समय-उपयोगिता में वृद्धि होती है । जैसे नदी में पड़ी हुई रेत वाहन-व्यवहार की सेवा द्वारा भवन-निर्माण-स्थल तक लाने से उसकी स्थल उपयोगिता में वृद्धि होती है ।

गरम कपड़े का उत्पादन वर्ष भर होता है । किन्तु उसे संग्रह करके सर्दी की ऋतु में बाज़ार में रखने से उसकी समय उपयोगिता में वृद्धि होती है ।

23.

धन्धा (Business) के लक्षण/विशेषताएँ समझाइये ।

Answer»

धन्धे के लक्षण : धन्धे के लक्षण निम्नालिखित हैं :

1. लाभ का उद्देश्य : धन्धे में लाभ का उद्देश्य होता है । व्यापारी कम कीमत में वस्तु क्रय करके अधिक कीमत में वस्तु का विक्रय करते हैं जिससे उसे लाभ प्राप्त होता है । व्यापारी चाहे किसी भी प्रकार का धन्धा करे फिर चाहे वह माल या सेवा का उत्पादन हो या फिर व्यापारी प्रवृत्ति हो लाभ कमाने की इच्छा रखता है । जिस धन्धे में लाभ प्राप्त करने की कोई शक्यता न हो उस व्यापार को कोई करना नहीं चाहेगा । लाभ धन्धे की जीवन-रेखा के समान है । यदि धन्धे में लाभ बन्द हो जाता हैं तो धन्धा बन्द होने की संभावना हो जाती है ।

2. जोखिम तथा अनिश्चितता : धन्धे में जोखिम तथा अनिश्चितता का तत्त्व निहित है । आग, दुर्घटना, चोरी, हड़ताल, लूटपाट, दंगे, मांग में कमी, रूचि या फैशन में परिवर्तन, भूकंप, आँधी, तूफान, तकनीक में परिवर्तन, प्रतिस्पर्धा जैसे अनेक जोखिमों के कारण लाभ के स्थान पर कई बार नुकसान होने की संभावना रहती है ।

3. तुष्टिगुण का सर्जक : धन्धा तुष्टिगुण का सर्जन करता है । तुष्टिगुण अर्थात् वस्तु एवं सेवाओं से उपभोक्ताओं को संतुष्टि प्रदान करने का गुण । वस्तु के स्वरूप बदलने से स्वरूप – तुष्टिगुण, एक स्थान से दूसरे स्थान पर माल के स्थानान्तरण करने से स्थल – तुष्टिगुण, किसी निश्चित समय तक माल का संग्रह करके उसकी मांग होने पर वितरण करने से माल के समय-तुष्टिगुण का निर्माण होता है ।

4. प्रवृत्तियों का सातत्य : धन्धे में प्रवृत्तियों का सातत्य होना चाहिए । धन्धाकीय प्रवृत्तियों में नियमितता होना आवश्यक है । फैक्टरी (कारखाना), कम्पनी, दुकान, गल्ला, लारी, अनाज का व्यापारी, दूध की डेयरी इत्यादि द्वारा विभिन्न प्रवृत्तियाँ निरन्तर की जानी चाहिए ।

5. आर्थिक प्रवृत्ति : धन्धा आर्थिक प्रवृत्ति का एक भाग है । आर्थिक प्रवृत्ति में मुआवजा प्राप्त करने का उद्देश्य होता है । उसी प्रकार धन्धाकीय प्रवृत्ति में लाभ के रूप में मुआवजा प्राप्त किया जाता है ।

6. विनिमय : धन्धे में वस्तु एवं सेवाओं अथवा वस्तु एवं सेवा के बदले में मुद्रा का विनिमय होता है जिसमें दो पक्षकार होते हैं । क्रेता – सेवा प्राप्त कर्ता, विक्रेता – सेवा देनेवाला ।

7. वस्तु एवं सेवा : धन्धे में वस्तु एवं सेवाओं का विनिमय देखा जाता है । वस्तुएँ दृश्य होती हैं, जिन्हें हम देख सकते हैं, स्पर्श कर सकते हैं । जैसे वाशिंग मशीन एक वस्तु है ।

8. वित्त की आवश्यकता : धन्धे के लिए प्रारम्भ से अन्त तक वित्त की आवश्यकता रहती है । कारखाने में कच्चे माल में से तैयार माल का उत्पादन करने, व्यापारी को माल क्रय करने के लिए वित्त की आवश्यकता रहती है ।

24.

वाणिज्य (Commerce) का अर्थ, परिभाषाएँ एवं महत्त्व स्पष्ट कीजिए ।

Answer»

वाणिज्य का अर्थ : धन्धाकीय प्रवृत्ति में वाणिज्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है । जिस प्रकार उद्योग में चीज़-वस्तु के आकार तथा स्वरूप में परिवर्तन करके उसकी उपयोगिता में वृद्धि की जाती हैं, उसी प्रकार वाणिज्य के विभिन्न सहायक सेवाओं द्वारा वस्तु के स्थल तथा समय उपयोगिता में वृद्धि की जाती है । व्यापार में वस्तु के बदले वस्तु तथा वस्तु के बदले मुद्रा का विनिमय केन्द्र-स्थान में हैं । यह विनिमय प्रवृत्ति सरल एवं विस्तृत बन सके इसके लिए सहायक (आनुषंगिक) सेवाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है ।

“वाणिज्य का आशय व्यापार के अलावा उसकी सहायक सेवा से है ।”
“उत्पादक द्वारा उत्पादित चीज़-वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की प्रवृत्तियों का योग अर्थात वाणिज्य ।”

वाणिज्य की परिभाषाएँ (Definitions of Commerce) :

(i) बकनोल के मतानुसार : “वस्तु तथा सेवाओं की वितरण-प्रक्रिया अर्थात् वाणिज्य ।”

(ii) पोलकर के मतानुसार : “वाणिज्य में माल तथा सेवाओं के विनिमय से सम्बन्धित सभी सेवाओं का समावेश होता हैं ।”

(iii) प्रो. जेम्स स्टीफन्स के मतानुसार : “वाणिज्य अर्थात् वस्तु के विनिमय में अवरोध रूप ऐसी व्यक्ति-सम्बन्धी कठिनाइयाँ (एजेन्ट या आढ़तिया द्वारा), स्थल-सम्बन्धी कठिनाइयाँ (परिवहन द्वारा), समय-सम्बन्धी कठिनाइयाँ (माल-संग्रह द्वारा) एवं धन के लेनदेन की कठिनाइयाँ . (बैकिंग द्वारा) दूर करने के लिए आवश्यक कार्यों का समूह ।”

संक्षेप में वाणिज्य अर्थात् व्यापार एवं व्यापार की सहायक सेवाएँ जैसे बैंक, बीमा, वाहन-व्यवहार, गोदाम, संदेशा-व्यवहार एवं आढ़तिये की सेवा का समावेश होता है ।

वाणिज्य का महत्त्व (Importance of Commerce) :

वाणिज्य का महत्त्व दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है । जहाँ संभव नहीं होता है वहाँ भी वाणिज्य की प्रवृत्ति सम्भव बन पाई है । जहाँ वर्ष भर बर्फ रहती है फिर भी वहाँ वाणिज्य की प्रवृत्ति देखने को मिलती है । विश्व के किसी एक देश में तैयार हुई चीज़-वस्तु वाणिज्य की सहायता से अनेक देशों में पहुँचाना सम्भव बना हैं । भारत की चाय का स्वाद विश्व भर के लोग ले सकते हैं । ब्राजील की कॉफी का स्वाद भारत के लोग प्राप्त कर सकते हैं । जर्मनी एवं जापान में बने हुए केलक्युलेटर या विद्युत के साधन भारत के लोग उपयोग में ले सकते हैं ।

वाणिज्य के कारण शीघ्र नष्ट होनेवाली वस्तु का अधिक समय तक उपयोग किया जा सकता है तथा दूर-दूर तक के स्थानों तक उपयोग के लिए संभव बनाया जाता है । जैसे कश्मीर में उत्पादित सेव भारतभर के लोग खा सकते हैं । अहमदाबाद में तैयार किया गया आइसक्रीम तथा खाने की वस्तुएँ राजकोट, सुरत, भावनगर या महेसाना के बस स्टेण्ड या रेलवे स्टेशन पर प्राप्त कर सकते हैं । अहमदाबाद से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र गुजरात के सभी गाँव तथा अन्य राज्यों तक उसी दिन पहुँचाये जाते हैं । नाशवंत वस्तुएँ जैसे कि दूध, शाक-सब्जी, अण्डा, फल, मांस, मछली इत्यादि के स्थानान्तरण तथा संग्रह में वाणिज्य की सेवा महत्त्वपूर्ण है ।

जैसे-जैसे वाणिज्य का विकास होता गया, वैसे-वैसे मनुष्य की आवश्यकताएँ बढ़ती गई । इन सभी आवश्यकताओं की तुष्टि हेतु उत्पादन उसके आसपास नहीं होने से कुछ वस्तुओं के लिए अन्य राज्यों अथवा देशों पर आश्रित होना पड़ता है । वाणिज्य की सहायक सेवाओं के कारण ही ऐसी चीज़-वस्तुएँ दूसरे प्रदेश या राष्ट्र से प्राप्त करना सम्भव बना है । मनुष्य नई-नई चीज़-वस्तुओं का उपयोग करके जीवन सरल व सुविधापूर्ण बना सकते हैं ।

वाणिज्य की सहायक सेवाओं के द्वारा तकनीक, यंत्र, कच्चा माल तथा खनिज पदार्थों का स्थानान्तरण सम्भव होने से देश के विभिन्न उद्योगों को बल मिलता है । इसके अलावा वाणिज्य की सहायक सेवाओं में असंख्य लोगों को रोजगार सुलभ बना है । तथा बाजार का विकास सम्भव बनता है । सांस्कृतिक आदान-प्रदान संभव बना है । देश तथा दुनिया की समृद्धि-वाणिज्य की आभारी है । वर्तमान समय में कृषि-विकास भी वाणिज्य पर आधारित है, विभिन्न यंत्रों द्वारा उत्पादन तीव्र, कम खर्चीला तथा अधिक प्रमाण में तैयार होना संभव हुआ है ।

वाणिज्य की सहायक सेवाएँ नहीं हो तो भी विनिमय हो सकता है । किन्तु उसकी सेवा से विनिमय का कार्य सरल तथा तीव्र बनता है । जिससे यह सेवा अनिवार्य नहीं अपितु सहायक सेवा है । इस तरह से हम कह सकते हैं कि वाणिज्य का महत्त्व बहुत अधिक होता है ।

25.

संचालन द्वारा कौन-कौन से क्षेत्रों का विकास होता है ?

Answer»

संचालन द्वारा धार्मिक, संरक्षण, सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षणिक तथा खेलकूद इत्यादि क्षेत्रों का विकास होता है ।

26.

उद्योग वस्तु की स्वरूप-उपयोगिता में वृद्धि करता है ।

Answer»

उद्योग अर्थात् जमीन में से इच्छित वस्तुओं को खोदकर निकालना, मानवीय तथा यांत्रिक श्रम की मदद से मानव-उपयोगी हो ऐसे स्वरुप में परिवर्तित करने को उद्योग कहा जाता है । इसके लिए उत्पादन के चार साधन जमीन, श्रम, पूँजी एवं व्यवस्थाकीय ज्ञान की मदद से प्रकृति-प्रदत्त वस्तु का स्वरूप बदलकर उसे मानव-उपयोगी बनाया जाता है ।

27.

आंतरिक व्यापार की अपेक्षाकृत विदेश-व्यापार अधिक मुश्किल होता है ।

Answer»

आन्तरिक व्यापार देश की सीमाओं के मध्य होता है, जिसमें वित्तीय व्यवहार, वाहन-व्यवहार, भाषा, व्यक्तिगत सम्पर्क इत्यादि के रुप में कोई मुश्किल नहीं होती है । जबकि विदेश-व्यापार देश की सीमाओं के बाहर किया जाता है । अर्थात् अन्य देशों के साथ किया जाता है, ऐसी परिस्थिति में सरकारी नियंत्रण, आयात-निर्यात लाइसन्स, वित्तीय व्यवस्था, भाषा, बैंकिंग, वाहन-व्यवहार जैसी अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं । इसलिए कहा जा सकता है कि आन्तरिक व्यापार की अपेक्षाकृत विदेश-व्यापार मुश्किल होता है ।

28.

वाणिज्य को मनुष्य की प्रगति का बैरोमीटर कहा जाता हैं ।

Answer»

वाणिज्य मनुष्य-जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया है । व्यापार का क्षेत्र कोई एक शहर या देश तक मर्यादित न रहकर समस्त विश्व एक बाजार बन गया है । आधुनिक मनुष्य-समाज के अस्तित्व का आधार वाणिज्य पर है । आधुनिक समय में मनुष्य स्वयं की विविध आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकता है । एवं स्वयं की सुख-सुविधाओं में वृद्धि करता है । यह वाणिज्य के आभारी हैं । इसीलिए वाणिज्य को मनुष्य की प्रगति का बैरोमीटर कहा जाता है ।

29.

जैविक उद्योग में व्यक्तिगत देख-रेख आवश्यक है ।

Answer»

जैविक उद्योग या संवर्धन उद्योग में सजीवों को पाला जाता है । इसमें फल-फूल के मूल, वृक्ष, बीज, मुर्गी-पालन, मत्स्य-पालन, बतख पालन, पशु-पालन इत्यादि शामिल हैं । इनकी नस्ल में भी सुधार किया जाता है । इन सभी की व्यक्तिगत देख-रेख रखना आवश्यक होता हैं । व्यक्तिगत देखरेख के बिना रोग का फैलाव, गन्दगी का बढ़ना इत्यादि दूषणों से इन जीवों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है । इसलिए जैविक उद्योग में व्यक्तिगत देखरेख रखना अनिवार्य होता है ।

30.

अन्तर स्पष्ट कीजिए :धन्धा (Business) एवं पेशा (Profession) .

Answer»
धन्धा (Business)पेशा (Profession)
धन्धा अर्थात् लाभ के उद्देश्य से की जानेवाली कोई भी आर्थिक प्रवृत्ति ।किसी व्यक्ति द्वारा अपने विशिष्ट गुण, डिग्री, ज्ञान के द्वारा सेवा देकर फीस प्राप्त करना अर्थात् पेशा ।
धन्धा करनेवाले को उत्पादन या वितरण की प्रवृत्ति करनी पड़ती है ।पेशेवर व्यक्ति स्वयं की विशिष्ट सेवा लोगों को देता है 
धन्धे का मुख्य उद्देश्य लाभ प्राप्त करना होता है ।पेशेवर व्यक्तियों का मुख्य उद्देश्य सेवा प्रदान कर फीस के रूप में आय प्राप्त करना होता है ।
धन्धे के लिए कोई विशेष प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है ।पेशेवर व्यक्तियों की निश्चित योग्यता तथा निश्चित प्रकार के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है ।
धन्धा करनेवाले का स्वयं का मण्डल हो या न भी हो उसे किसी नियम का पालन करना अनिवार्य नहीं होता है ।पेशेवर व्यक्तियों के स्वयं के मण्डल होते हैं । ऐसे मण्डल के द्वारा निश्चित नीति-नियम का पालन करना होता है ।
धन्धे का विज्ञापन किया जा सकता हैं ।पेशेवर व्यक्तियों का प्राय: विज्ञापन नहीं किया जा सकता है ।

31.

वाणिज्य समग्र विश्व को गतिशील रखता है ।

Answer»

वस्तु को जमीन में से खोदकर निकालना, उस पर प्रक्रिया कर यंत्रों एवं मनुष्य की मदद से स्वरूप में परिवर्तन करना और तैयार माल ग्राहकों तक पहुँचाने का कार्य वाणिज्य का है । वाणिज्य की प्रवृत्ति में व्यापार और अन्य सहायक सेवाओं का समावेश होता है । इन प्रवृत्तियों के कारण समस्त विश्व गतिशील रहता है और इसे गतिशील रखने का कार्य वाणिज्य करता है ।

32.

नियंत्रण संचालन का कौन से क्रम का कार्य है ?

Answer»

नियंत्रण संचालन के अन्तिम क्रम का कार्य है ।

33.

संचालन किसे कहते हैं ?

Answer»

धन्धाकीय इकाइयों में विविध प्रकार के निर्णय लेनेवाला और इनका असरकारक अमल करनेवाले प्रशिक्षण प्राप्त, अनुभवी और निष्णांत वर्ग की आवश्यकता पड़ती है । इस वर्ग द्वारा की जानेवाले कार्य को संचालन कहते हैं । संचालन अर्थात् अन्य व्यक्तियों के पास से काम लेने की कला ।

34.

हेनरी फेयोल के मतानुसार संचालन के कार्यों के वर्गीकरण को कितने भागो में बाँटा है ?(A) दो(B) तीन(C) पाँच(D) सात

Answer»

सही विकल्प है (D) सात

35.

आयोजन का कार्य यह मूलभूत रूप से कौन-सा कार्य है ?

Answer»

आयोजन का कार्य यह मूलभूत रूप से चयन का कार्य है ।

36.

लिविंगस्टन के मतानुसार संचालन की परिभाषा दीजिए ।

Answer»

लिविंगस्टन के मतानुसार, ‘कम से कम समय में और खर्च पर, उपलब्ध साधन-सुविधाओं का श्रेष्ठ उपयोग करके इकाइयो के निर्धारित ध्येय को सिद्ध करने के कार्य को संचालन कहते हैं ।’

37.

आधुनिक समय में नियंत्रण का ख्याल कैसा है ?

Answer»

आधुनिक समय में नियंत्रण का ख्याल सकारात्मक है ।

38.

मार्गदर्शन यह संचालन के कौन से स्तर पर की जानेवाली प्रक्रिया है ?

Answer»

मार्गदर्शन यह संचालन के प्रत्येक स्तर पर अर्थात् तीनों स्तर पर की जानेवाली प्रक्रिया है ।

39.

संचालन के बारे में 6M (Men, Machines, Materials, Methods, Market, Money) का सूत्र किसने दिया है ?(A) डॉ. जॉर्ज टेरी(B) हेनरी फेयोल(C) पीटर ड्रकर(D) ल्युथर ग्युलिक

Answer»

सही विकल्प है (C) पीटर ड्रकर

40.

संचालन एक व्यवसाय कहलाता है, क्योंकि इसमें ……………….(A) विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है ।(B) इनसे इनको लाभ मिलता है ।(C) वह मध्य स्तर पर कार्य करते है ।(D) वह मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते है ।

Answer»

सही विकल्प है (A) विशिष्ट ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है ।

41.

संचालन के अन्य कार्यों का आधार किस पर रहता है ?

Answer»

संचालन के अन्य कार्यों का आधार आयोजन पर रहता है ।

42.

व्यवस्थातंत्र/प्रबन्ध किसे कहते हैं ?

Answer»

समान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कार्यरत व्यक्तियों के मध्य अधिकार और दायित्व का विभाजन करनेवाला ढाँचा अर्थात् व्यवस्थातंत्र ।

43.

डॉ. ज्यॉर्ज टेरी के अनुसार संचालन की व्याख्या दीजिए ।

Answer»

डॉ. जॉर्ज टेरी के अनुसार, ‘संचालन यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जो मानव (Men), यंत्र (Machine), साधन (Materials), पद्धति (Methods), मुद्रा (Money) और बाजार (Market) का आयोजन करके उनके उपर नियंत्रण रखने का कार्य करते है । वह मानव प्रयत्नों को नेतागीरी, संकलन और मार्गदर्शन देते है । जिससे इकाई के निश्चित ध्येयो को सिद्ध किया जा सकता है ।’

44.

यंत्र विन्यास (Lay out) से आप क्या समझते है ?

Answer»

यंत्र विन्यास अर्थात् यंत्रो अथवा मशीनरी को व्यवस्थित रूप से लगाने की प्रक्रिया ।

45.

मार्गदर्शन किसे कहते हैं ?

Answer»

कर्मचारियों को ध्येय सिद्धि के लिए मार्गदर्शन (निर्देशन) देना और उन पर देखरेख रखना अर्थात् मार्गदर्शन ।

46.

संचालन किस रूप में विकसित हो रहा है ?(A) व्यवसाय(B) धन्धे(C) व्यापार(D) नौकरी

Answer»

सही विकल्प है (C) व्यापार

47.

संचालन यह न तो भौतिक शास्त्र जैसा शुद्ध विज्ञान और ना ही वह किसके जैसी शुद्ध कला ?

Answer»

संचालन यह न तो भौतिक शास्त्र जैसा शुद्ध विज्ञान और ना ही वह शिल्प जैसी शद्ध कला ।

48.

‘संचालन अर्थात् अन्य व्यक्तियों के पास से काम लेने की कला’ यह परिभाषा किसने दी है ?(A) हेनरी फेयोल(B) लिविंगस्टन(C) कुन्टज और ओडोनेल(D) डॉ. जॉर्ज आर. टेरी

Answer»

सही विकल्प है (C) कुन्टज और ओडोनेल

49.

धन्धे की सफलता या असफलता का आधार किस पर रहता है ?

Answer»

धन्धे की सफलता या असफलता का आधार संचालन पर होता है ।

50.

प्रबन्ध अथवा व्यवस्थातंत्र का अर्थ दीजिए ।

Answer»

व्यवस्थातंत्र अर्थात् समान उद्देश्य की प्राप्ति हेतु कार्यरत व्यक्तियों के मध्य अधिकार तथा दायित्व का विभाजन करनेवाला ढाँचा । व्यवस्थातंत्र या प्रबन्ध अर्थात् निर्धारित उद्देश्य को सिद्ध करने के लिए इकाई की प्रवृत्ति को अलग-अलग विभागो में अलग-अलग मानव समूहों के मध्य बाँटा जाता है तथा उनको अधिकार और दायित्व का विभाजन किया जाता है ।