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धन्धाकीय जोखिम से आप क्या समझते है ? धन्धाकीय जोखिम के कारण समझाइये ।

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धन्धाकीय जोखिम का अर्थ : विभिन्न धन्धाकीय इकाइयों में लाभ की अनिश्चितता अथवा हानि या नुकसान होने की आशंका बनी रहती है, जो भविष्य में इकाई के लाभ को प्रभावित करती है, जिसे धन्धाकीय जोखिम के रूप में जानते है ।

धन्धाकीय जोखिमों के सामने का प्रतिफल अर्थात् लाभ । धन्धे में दो स्वरूप की जोखिमें रहती है ।
(A) प्राकृतिक जोखिम
(B) मानवसर्जित जोखिम

(A) प्राकृतिक जोखिम : प्राकृतिक जोखिम, जैसे कि भूकंप, बाढ़ आदि धन्धे के विकास को बाधाएँ पहुँचाती है । धन्धे की सम्पत्तियों को नष्ट करते है अथवा नुकसान पहुंचाते है । ऐसी जोखिमों पर धन्धे का कोई नियंत्रण नहीं रहता है ।

(B) मानवसर्जित जोखिम : मानवसर्जित जोखिमों के कारण से धन्धे का विकास रुकता है तथा धन्धे में नुकसान सहन करना पड़ता है, जैसे कि कर्मचारियों की हड़ताल, टेक्नोलॉजी में परिवर्तन, ग्राहकों की रुचि-अभिरूचि और मांग में परिवर्तन, राजकीय अस्थिरता, बाजारं में स्पर्धा का जोखिम ।

धन्धाकीय जोखिम का कारण :

धन्धाकीय इकाइयों में दो प्रकार के जोखिम देखने को मिलते हैं, जिनमें प्राकृतिक जोखिम एवं मानवसर्जित जोखिम के कारण निम्नलिखित होते हैं .

  • तकनीकी में परिवर्तन होने से धन्धे में जोखिम रहता है । यंत्र, साधन या कम्प्यूटर लाया गया हो, लेकिन अधिक सुविधावाला यंत्र, साधन तथा कम्प्यूटर हो जाने से पुराने साधन तथा कम्प्यूटर अप्रचलित बन जाते हैं । जैसे कम्प्यूटर के पुराने पंच कार्ड किसी काम के नहीं रहते ।
  • मांग की अनिश्चितता के कारण भी धन्धे में जोखिम रहता है, कभी माँग (Demand) में वृद्धि होती है तो कभी मांग में कमी । जैसे ओलम्पिक अथवा क्रिकेट वर्ल्डकप मैच के दौरान टेलिविझन की माँग में एकाएक वृद्धि होती है ।
  • धन्धे में दो प्रतिस्पर्धी कम्पनियों के बीच स्पर्धा का भी पूर्ण जोखिम होता है । स्पर्धा से विज्ञापन (Advertising) खर्च अधिक होता है, जिसके परिणामस्वरूप लाभ में कमी होती है एवं अन्य स्पर्धी कम्पनियों के प्रवेश होने से कीमत में कमी करनी पड़ती है ।
  • धन्धे में आर्थिक जोखिम भी बाधक होता है, जैसे तेजी-मंदी, ब्याज की दर में घट-बढ़, खर्च में वृद्धि, महँगाई भत्ता (D.A.) बढ़ने से वेतन में वृद्धि, बिजली की दर में वृद्धि, कर की दर में वृद्धि होने से अधिक भुगतान करने का जोखिम रहता है ।
  • कानून/नियम : सरकार विभिन्न प्रकार के कानून/नियम बनाती है, जैसे प्रदूषण नियम, ग्राहक सुरक्षा कानून, श्रमसंघ कानून, कारखाना कानून इत्यादि । लेकिन उपरोक्त सभी कानून धन्धे के लिए जोखिम भी खड़ी करते है । जैसे न्यूनतम वेतन अधिनियम और कारखाना है । कानून/अधिनियम आदि धन्धाकीय इकाइयों को कई निर्णय लेने में रुकावट डालते है ।
  • भौतिक जोखिम : धन्धे में उपयोग में ली जानेवाली सम्पत्तियों को नुकसान होने से भौतिक जोखिम खड़ी हो जाती है । जैसे यंत्र और साधन काम करते हुए बन्द हो जाये, वहन के दौरान माल को नुकसान पहुंचे तब भौतिक जोखिम खड़ी हो जाती है ।


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