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आर्थिक और अनार्थिक प्रवृत्ति से आप क्या समझते है ? उदाहरण द्वारा समझाइये ।

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आर्थिक प्रवृत्ति (Economic Activity) : आर्थिक प्रवृत्ति अर्थात् धन की प्राप्ति की अपेक्षा से की जानेवाली प्रवृत्ति । उदाहरणार्थ बैंक में काम करनेवाले क्लर्क, होटल में काम करनेवाले व्यक्तियों की प्रवृत्ति, चीज-वस्तु की बिक्री करनेवाले व्यापारियों की प्रवृत्ति, विद्यालय में पढ़ानेवाले शिक्षक की प्रवृत्ति, डॉक्टर, बकील तथा चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट द्वारा दी जानेवाली सेवा इत्यादि का उद्देश्य आय उपार्जन करना होता है । ऐसी प्रवृत्तियों को आर्थिक प्रवृत्ति कहा जाता है ।

आर्थिक प्रवृत्ति की परिभाषाएँ : प्रो. जे. आर. हिक्स के अनुसार : “चीजवस्तु एवं सेवाओं का विनिमय द्वारा आय प्राप्त करने तथा खर्च करने की प्रवृत्ति को आर्थिक प्रवृत्ति कहते हैं ।”

प्रो. एरीक रॉल के अनुसार : “हमारी पसन्दगी की क्रियाएँ या प्रवृत्तियाँ सहज रूप से बाजार द्वारा होती है, और उनके द्वारा कम या अधिक मात्रा में वस्तु या सेवा का क्रय-विक्रय तथा विनिमय द्वारा व्यवहार करके आय या खर्च करने की प्रवृत्ति को आर्थिक प्रवृत्ति माना जाता है ।”

बिन-आर्थिक प्रवृत्ति (Non-Economic Activity) : कुछ प्रवृत्तियाँ ऐसी होती हैं, जो प्रेम, लगाव, आवेश, ममता, धारणा, सेवा, प्रतिष्ठा इत्यादि से प्रेरित होकर की जाती हैं । इन प्रवृत्तियों का उद्देश्य धन-प्राप्ति नहीं होता है, बल्कि समाज सेवा अथवा अन्य उद्देश्य होते हैं । ऐसी प्रवृत्ति को बिन-आर्थिक प्रवृत्ति कहते हैं । जैसे रोगनिदान शिबिर में निःशुल्क सेवा देनेवाले डॉक्टर, भूकंप राहत शिविर में काम करनेवाले स्वयं सेवक, कोलेज व स्कूल में सामान्य मंत्री के तौर पर कार्य करनेवाला विद्यार्थी-प्रतिनिधि, माता द्वारा बालकों का पालन-पोषण की प्रवृत्ति इत्यादि बिन-आर्थिक प्रवृत्तियाँ हैं ।

अलग-अलग संगठनों द्वारा बिन-आर्थिक प्रवृत्तियों का संचालन किया जाता है । जैसे कि सेवा भावी संस्थाओं या मण्डलों द्वारा निःशुल्क सेवा-कार्य, शिक्षक-संघ, लायन्स क्लब, रोटरी क्लब द्वारा आयोजित रक्तदान-शिबिर, वृक्षारोपण-कार्यक्रम, बाढ़ग्रस्त अकाल या भूकंप के समय . सहायता, विद्यालय के बालकों द्वारा ट्राफिक नियमन में सहयोग इत्यादि समस्त प्रवृत्तियाँ अनार्थिक प्रवृत्तियाँ मानी जाती हैं ।



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