This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
| 32101. |
अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया? |
|
Answer» जब 1861 में अमेरिका में गृहयुद्ध छिड़ गया तो ब्रिटेन के कपास क्षेत्र में तहलका मच गया। अमेरिका से आने वाली कच्ची कपास के आयात में काफी गिरावट आई। 1860 के दशक से पहले, ब्रिटेन में कच्चे माल के तौर पर आयात की जाने वाली समस्त कपास का तीन-चौथाई भाग अमेरिका से आता था। ऐसे में ब्रिटेन के सूती वस्त्रों के निर्माता काफी लंबे समय से अमेरिकी कपास पर अपनी निर्भरता के कारण बहुत परेशान थे, क्योंकि इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति हो चुकी थी और अमेरिका जैसी बढ़िया कपास न तो भारत में और न ही मिस्र में पैदा होती थी। अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को निम्न तरीके से प्रभावित किया 1. ब्रिटेन के सूती वस्त्र निर्माता अमेरीकी कपास पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए काफी समय से कपास आपूर्ति के वैकल्पिक स्त्रोत की खोज कर रहे थे। भारत की भूमि और जलवायु दोनों ही कपास की खेती हेतु उपयुक्त थी। यहाँ श्रम भी सस्ता था। 2. 1861 ई० में अमेरीकी गृहयुद्ध आरंभ हो जाने की वजह से ब्रिटेन ने भारत को अधिकाधिक कपास निर्यात का संदेश भेजा। 3. उपर्युक्त बातों का दक्कन के देहाती इलाकों में काफी असर हुआ। दक्कन के गाँवों के रैयतों को अचानक असीमित ऋण उपलब्ध होने लगा। उन्हें प्रति एकड़ 100 रु. अग्रिम राशि दी जाने लगी। साहूकार भी लंबे समय तक ऋण देने के लिए एकदम तैयार हो गए। 4. जब तक अमेरिका में संकट की स्थिति बनी रही तब तक बंबई दक्कन में कपास का उत्पादन बढ़ता गया। 1860 से 1864 के दौरान कपास उगाने वाले एकड़ों की संख्या दोगुनी हो गई। 1862 तक स्थिति यह आई कि ब्रिटेन में जितना भी कपास का आयात होता था, उसका 90 प्रतिशत भाग अकेले भारत से जाता था। 5. इस तेजी में भी सभी कपास उत्पादकों को समृद्धि प्राप्त नहीं हो सकी। कुछ धनी किसानों को तो लाभ अवश्य हुआ, लेकिन अधिकांश किसान कर्ज के बोझ से और अधिक दब गए। 6. जिन दिनों कपास के व्यापार में तेजी रही, भारत के कपास व्यापारी, अमेरिका को स्थायी रूप से विस्थापित करके, कच्ची कपास के विश्व बाजार को अपने कब्जे में करने के सपने देखने लगे। 1861 में बांबे गजट के संपादक ने लिखा, “दास राज्यों (संयुक्त राज्य अमेरिका) को विस्थापित करके, लंकाशायर को कपास का एकमात्र आपूर्तिकर्ता बनने से भारत को कौन रोक सकता है?” 7. लेकिन 1865 तक ऐसे सपने आने बंद हो गए। जब अमेरिका में गृहयुद्ध समाप्त हो गया तो वहाँ कपास का उत्पादन फिर | से चालू हो गया और ब्रिटेन में भारतीय कपास के निर्यात में गिरावट आती चली गई। 8. महाराष्ट्र में निर्यात व्यापारी और साहूकार अब दीर्घावधिक ऋण देने के लिए उत्सुक नहीं रहे। उन्होंने यह देख लिया था कि भारतीय कपास की माँग घटती जा रही है और कपास की कीमतों में गिरावट आ रही है। इसलिए उन्होंने अपना कार्य-व्यवहार बंद करने, किसानों को अग्रिम राशियाँ प्रतिबंधित करने और बकाया ऋणों को वापिस माँगने का निर्णय लिया। इन परिस्थितियों में किसानों की दशा अत्यधिक दयनीय हो गई। |
|
| 32102. |
इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत-सी जमींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गईं? |
|
Answer» गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने 1793 ई० में भू-राजस्व वसूली की एक नयी पद्धति प्रचलित की जिसे ‘स्थायी बंदोबस्त’, ‘ज़मींदारी प्रथा’ अथवा ‘इस्तमरारी बंदोबस्त’ के नाम से जाना जाता है। इस बंदोबस्त के अंतर्गत ज़मींदारों द्वारा सरकार को दिया जाने वाला वार्षिक लगान स्थायी रूप से निश्चित कर दिया गया। जमींदार द्वारा लगान की निर्धारित धनराशि का भुगतान न किए जाने पर सरकार उसकी भूमि का कुछ भाग बेचकर लगान की वसूली कर सकती थी। इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत-सी ज़मींदारियाँ नीलाम की जाने लगीं। इसके अनेक कारण थे: 1. कंपनी द्वारा निर्धारित प्रारंभिक राजस्व माँगें अत्यधिक ऊँची थीं। स्थायी अथवा इस्तमरारी बंदोबस्त के अंतर्गत राज्य की राजस्व माँग का निर्धारण स्थायी रूप से किया गया था। इसका तात्पर्य था कि आगामी समय में कृषि में विस्तार तथा मूल्यों में होने वाली वृद्धि का कोई अतिरिक्त लाभ कंपनी को नहीं मिलने वाला था। अतः इस प्रत्याशित हानि को कम-से-कम करने के लिए कंपनी राजस्व की माँग को ऊँचे स्तर पर रखना चाहती थी। ब्रिटिश अधिकारियों का विचार था कि कृषि उत्पादन एवं मूल्यों में होने वाली वृद्धि के परिणामस्वरूप ज़मींदारों पर धीरे-धीरे राजस्व की माँग का बोझ कम होता जाएगा और उन्हें राजस्व भुगतान में कठिनता का सामना नहीं करना पड़ेगा। किंतु ऐसा संभव नहीं हो सका। परिणामस्वरूप ज़मींदारों के लिए राजस्व-राशि का भुगतान करना कठिन हो गया। 2. उल्लेखनीय है कि भू-राजस्व की ऊँची माँग का निर्धारण 1790 के दशक में किया गया था। इस काल में कृषि उत्पादों के मूल्य कम थे जिसके परिणामस्वरूप रैयत (किसानों) के लिए जमींदारों को उनकी देय राशि का भुगतान करना कठिन था। इस प्रकार जमींदार किसानों से राजस्व इकट्ठा नहीं कर पाता था और कंपनी को अपनी निर्धारित धनराशि का भुगतान करने में असमर्थ हो जाता था 3. राजस्व की माँग में परिवर्तन नहीं किया जा सकता था। उत्पादन अधिक हो या बहुत कम, राजस्व का भुगतान ठीक समय पर करना होता था। इस संबंध में सूर्यास्त कानून का अनुसरण किया जाता था। इसका तात्पर्य था कि यदि निश्चित तिथि को सूर्य छिपने तक भुगतान नहीं किया जाता था तो ज़मींदारियों को नीलाम किया जा सकता था। 4. इस्तमरारी अथवा स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत ज़मींदारों के अनेक विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया था। उनकी सैनिक टुकड़ियों को भंग कर दिया गया; उनके सीमाशुल्क वसूल करने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया था। उन्हें उनकी स्थानीय न्याय तथा स्थानीय पुलिस की व्यवस्था करने की शक्ति से भी वंचित कर दिया गया। परिणामस्वरूप अब ज़मींदार शक्ति प्रयोग द्वारा राजस्व वसूली नहीं कर सकते थे। 5. राजस्व वसूली के समय ज़मींदार का अधिकारी जिसे सामान्य रूप से ‘अमृला’ कहा जाता था, ग्राम में जाता था। कभी कम मूल्यों और फ़सल अच्छी न होने के कारण किसान अपने राजस्व का भुगतान करने में असमर्थ हो जाते थे, तो कभी रैयत जानबूझकरे ठीक समय पर राजस्व का भुगतान नहीं करते थे। इस प्रकार जमींदार ठीक समय पर राजस्व का भुगतान नहीं कर पाता था और उसकी जमींदारी नीलाम कर दी जाती थी। 6. कई बार ज़मींदार जानबूझकर राजस्व का भुगतान नहीं करते थे। भूमि के नीलाम किए जाने पर उनके अपने एजेन्ट कम-से-कम | बोली लगाकर उसे (अपने जमींदार के लिए) प्राप्त कर लेते थे। इस प्रकार जमींदार को राजस्व के रूप में पहले की अपेक्षा कहीं कम धनराशि का भुगतान करना पड़ता था। |
|
| 32103. |
किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती हैं? |
|
Answer» यह सत्य है कि इतिहास के पुनर्निर्माण में सरकारी स्रोतों; जैसे-राजस्व अभिलेखों, सरकार द्वारा नियुक्त सर्वेक्षणकर्ताओं की रिपोर्टों और पत्रिकाओं आदि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। किंतु किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों का उपयोग करते समय लेखक को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है ⦁ सरकारी स्रोत वास्तविक स्थिति को निष्पक्ष वर्णन नहीं करते। अतः उनके द्वारा प्रस्तुत विवरणों को पूरी तरह सत्य नहीं माना जा सकता। ⦁ सरकारी स्रोत विभिन्न घटनाओं के संबंध में किसी-न-किसी रूप में सरकारी दृष्टिकोण एवं अभिप्रायों के पक्षधर होते हैं। वे विभिन्न घटनाओं का विवरण सरकारी दृष्टिकोण से ही प्रस्तुत करते हैं ⦁ सरकारी स्रोतों की सहानुभूति प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के प्रति ही होती है। किन्तु आयोग इस प्रकार की टिप्पणी करते हुए यह भूल गया कि आखिर किसान साहूकारों की शरण में जाते क्यों थे। वास्तव में, सरकार द्वारा निर्धारित भू-राजस्व की दर इतनी अधिक थी और वसूली के तरीके इतने कठोर थे कि किसान को विवशतापूर्वक साहूकार की शरण में जाना ही पड़ता था। इसका स्पष्ट अभिप्राय यह था कि औपनिवेशिक सरकार जनता में व्याप्त असंतोष अथवा रोष के लिए स्वयं को उत्तरदायी मानने के लिए तैयार नहीं थी। अत: किसान इतिहास लेखन में सरकारी स्रोतों का उपयोग करते हुए कुछ बातों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए ⦁ सरकारी रिपोर्टों का अध्ययन अत्यधिक सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए। ⦁ सरकारी रिपोर्टों से उपलब्ध साक्ष्य का मिलान समाचार-पत्रों, गैर-सरकारी विवरणों, वैधिक अभिलेखों आदि में उपलब्ध साक्ष्यों से करने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। |
|
| 32104. |
1980 ई० के दशक में पाकिस्तान की संवृद्धि दर में भारी गिरावट के क्या कारण थे? |
|
Answer» ये कारण थे— (1) 1988 ई० में प्रारम्भ की गई सुधार प्रक्रिया तथा |
|
| 32105. |
वे समान विकासात्मक नीतियाँ कौन-सी हैं जिनका कि भारत और पाकिस्तान ने अपने-अपने विकासात्मक पथ के लिए पालन किया है? |
|
Answer» भारत व पाकिस्तान द्वारा अपनाई गई समान विकासात्मक नीतियाँ जिनके द्वारा उन्होंने अपने विकासात्मक पथ के लिए पालन किया है, निम्नलिखित हैं| ⦁ भारत और पाकिस्तान ने अपने विकास पथ पर लगभग एक ही समय चलना प्रारम्भ किया है। ⦁ भारत ने 1951 ई० में अपनी प्रथम पंचवर्षीय योजना की घोषणा की जबकि पाकिस्तान ने 1956 में अपनी प्रथम पंचवर्षीय योजना की घोषणा की। इस प्रकार दोनों ही देशों ने विकास के लिए आर्थिक नियोजन का मार्ग अपनाया। ⦁ दोनों ही देशों ने प्रारम्भ में सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार पर बल दिया किन्तु निजी क्षेत्र की भी उपेक्षा नहीं की। इस प्रकार दोनों ही देशों ने ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई। ⦁ दोनों ही देशों ने अपने व्यय का अधिकांश ‘सामाजिक विकास पर किया अर्थात् दोनों ही देशों की प्राथमिकता सार्वजनिक विकास’ रही। ⦁ दोनों ही देशों ने अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए लगभग एक ही समय पर आर्थिक सुधार कार्यक्रम लागू किए। |
|
| 32106. |
निम्नलिखित रिक्त स्थानों को भरिए(क) 1956 ई० में ………….” की प्रथम पंचवर्षीय योजना शुरू हुई थी पाकिस्तान/चीन)(ख) मातृत्व मृत्यु-दर ……….. में अधिक है। (चीन/पाकिस्तान)(ग) निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का अनुपात :………..’ में अधिक है। (भारत/पाकिस्तान)(घ) …………. में आर्थिक सुधार 1978 ई० में शुरू किए गए थे। (चीन/पाकिस्तान) |
|
Answer» (क) पाकिस्तान, |
|
| 32107. |
रोम साम्राज्य की प्रमुख भाषा थी(क) लैटिन(ख) अंग्रेजी(ग) स्पेनिश(घ) रूसी |
|
Answer» सही विकल्प है (क) लैटिन |
|
| 32108. |
रोम साम्राज्य की सामाजिक संरचना के विषय में आप क्या जानते हैं? |
|
Answer» इतिहासकार टैसिटस ने जिन प्रारम्भिक साम्राज्य के प्रमुख सामाजिक समूहों का उल्लेख किया है; वे हैं—सीनेटर, अश्वारोही वर्ग, जनता का सम्माननीय वर्ग, निम्नतम वर्ग। तीसरी सदी के प्रारम्भिक वर्षों में सीनेटर की सदस्य संख्या लगभग 1000 थी तथा कुल सीनेटरों में लगभग आधे सीनेटर इतालवी परिवारों के थे। साम्राज्य के परवर्तीकाल में, जो चौथी सदी के प्रारम्भिक भाग में कॉन्स्टेनटाइन प्रथम के शासनकाल में आरम्भ हुआ, टैसिटस द्वारा बताए गए प्रथम दो समूह (सीनेटर और अश्वारोही) एकीकृत होकर विस्तृत कुलीन वर्ग बन गए थे। इनके कुल परिवारों में से कम-से-कम आधे परिवार अफ्रीकी अथवा पूर्वी मूल के थे। यह ‘परवर्ती रोम’ कुलीन वर्ग अत्यधिक धनी थी। मध्यम वर्गों में नौकरशाही और सेना की सेवा से जुड़े लोग थे किन्तु इनमें अपेक्षाकृत अधिक समृद्ध सौदागर और किसान भी शामिल थे जिनमें बहुत-से लोग पूर्वी प्रान्तों के निवासी थे। टैसिटस ने इस सम्माननीय मध्यम वर्ग को सीनेट गृहों के आश्रितों के रूप में उल्लेख किया है। बड़ी संख्या में निम्न वर्गों के समूह थे जिन्हें ह्युमिलिओरिस अर्थात् ‘निम्नतर वर्ग’ कहा जाता था। इनमें ग्रामीण श्रमिक बल शामिल था जिनमें बहुत से लोग स्थायी रूप से मिलों में काम करते थे। |
|
| 32109. |
रोम समाज में महिलाओं की दशा कैसी थी? |
|
Answer» रोम के समाज में महिलाओं की दशा : ⦁ रोम के समाज में महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ थी। पत्नी अपनी सम्पत्ति अपने पति को हस्तान्तरित नहीं करती थी और पैतृक सम्पत्ति पर उसका अधिकार बना रहता था। |
|
| 32110. |
उपमहाद्वीप के बाह्यरेखा मानचित्र (खाके) में इस अध्याय में वर्णित क्षेत्रों को अंकित कीजिए। यह भी पता लगाइए । कि क्या ऐसे भी कोई इलाके थे जहाँ इस्तमरारी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू थी? ऐसे इलाकों को मानचित्र | में भी अंकित कीजिए। |
|
Answer» संकेत-अध्याय में वर्णित क्षेत्र-बंगाल (बिहार, उड़ीसा सहित), मद्रास प्रेसीडेंसी, सूरत, बम्बई प्रेसीडेंसी, मद्रास के कुछ ⦁ इस्तमरारी बंदोबस्त मुख्यतः बंगाल में शुरू किया गया। रैयतवाड़ी दक्षिण भारत, मद्रास और महाराष्ट्र में शुरू किया गया। ⦁ उपर्युक्त संकेत के आधार पर स्वयं करें। |
|
| 32111. |
रोम के तीन बड़े शहरी केंद्रों के नाम बताइए। |
|
Answer» (i) कॉर्थेज |
|
| 32112. |
रोम के शहरी जीवन की दो विशेषताएँ लिखिए। |
|
Answer» ⦁ प्रत्येक शहर में सार्वजनिक स्नानगृह होता था। |
|
| 32113. |
सैन्य संगठन के क्या उद्देश्य होते हैं? किसी ऐसे सैन्य गठबन्धन का नाम बताइए जो अभी मौजूद है तथा इस गठबन्धन के उद्देश्य भी बताएँ। |
|
Answer» पारम्परिक सुरक्षा नीति का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है—सैन्य गठबन्धन बनाना। सैन्य गठबन्धन में कई देश शामिल होते हैं। नाटो (NATO)-अमेरिका के नेतृत्व वाले पूँजीवादी गुट का प्रमुख सैन्य संगठन NATO अथवा उत्तरी अटलाण्टिक सन्धि संगठन है जिसकी स्थापना 4 अप्रैल, 1949 में हुई थी। साम्यवादी गुट का रूस के नेतृत्व में ‘वारसा’ सन्धि संगठन प्रमुख गठबन्धन था जो सन् 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद समाप्त कर दिया गया था, परन्तु ‘नाटो’ (NATO) अभी अस्तित्व में है। वर्तमान में ‘नाटो’ संगठन में अमेरिका सहित यूरोप के 19 देश शामिल हैं। नाटो के चार्टर में 14 धाराएँ हैं। नाटो (NATO) संगठन के प्रमुख उद्देश्य- |
|
| 32114. |
बेसिक शिक्षा-प्रणाली को किस अन्य नाम से भी जाना जाता है ? |
|
Answer» बेसिक शिक्षा-प्रणाली को ‘बुनियादी तालीम’ या ‘बुनियादी शिक्षा के नाम से भी जाना जाता है। |
|
| 32115. |
बेसिक शिक्षा प्रणाली द्वारा अपनाई जाने वाली शिक्षण-विधि का सामान्य विवरण प्रस्तुत कीजिए।या बेसिक शिक्षा की शिक्षण पद्धतियों का वर्णन कीजिए। |
|
Answer» बेसिक शिक्षा की शिक्षण-विधि निम्नलिखित है ⦁ विषयों को हस्तकला पर केन्द्रित करके पढ़ाना-बेसिक स्कूलों में हस्तकला के माध्यम से शिक्षा दी जाती है। विद्यार्थी स्कूल में अधिक समय उसी हस्तकौशल से सम्बन्धित कार्य करते हैं। शेष समय में जो विषय पढ़ाए जाते हैं, वे उसी दिन के कार्य से सम्बन्धित होते हैं। इस प्रकार इस पद्धति में केन्द्रीकरण विधि द्वारा शिक्षा देने का प्रमुख स्थान है। |
|
| 32116. |
बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व सँभालने के लिए पुराने शासकों से क्यों आग्रह किया? |
|
Answer» 1857 ई० की महान क्रान्ति, जिसे ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’, ‘सैनिक विद्रोह’, ‘हिन्दू-मुस्लिम संगठित षड्यंत्र’ आदि नामों से भी जाना जाता है, का बिगुल सैनिकों ने बजाया और चर्बी वाले कारतूसों का मामला विद्रोह का तात्कालिक कारण बना। किन्तु शीघ्र ही यह विद्रोह जन-विद्रोह बन गया। लाखों कारीगरों, किसानों और सिपाहियों ने कंधे से कंधा मिलाकर एक वर्ष से भी अधिक समय तक ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध संघर्ष किया। विद्रोहियों का प्रमुख उद्देश्य था- भारत से ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकना। वास्तव में, विद्रोही सिपाही भारत से ब्रिटिश सत्ता को समाप्त करके देश में 18वीं शताब्दी की पूर्व ब्रिटिश व्यवस्था की पुनस्र्थापना करना चाहते थे। ब्रिटिश शासकों ने भारतीय राजघरानों का अपमान किया था। साधनों के औचित्य अथवा अनौचित्य की कोई परवाह न करते हुए कहीं छल, कहीं बल, तो कहीं बिना किसी आड़ के ही अधिकाधिक भारतीय राज्यों एवं रियासतों का विलय अंग्रेजी साम्राज्य में कर लिया गया था। परिणामस्वरूप, उनमें ब्रिटिश शासन के विरुद्ध घोर असंतोष व्याप्त था। विशाल संसाधनों के स्वामी अंग्रेजों का सामना करने के लिए नेतृत्व और संगठन की अत्यधिक आवश्यकता थी। नि:संदेह, योग्य नेतृत्व और संगठन के बिना विद्रोह का कुशलतापूर्वक संचालन नहीं किया जा सकता था। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विद्रोही ऐसे लोगों की शरण में गए, जो भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से पहले नेताओं की भूमिका निभाते थे और जिन्हें नेतृत्व एवं संगठन के क्षेत्र में अच्छा अनुभव था। इसलिए विद्रोही सिपाहियों ने अनेक स्थानों पर पुराने शासकों को विद्रोह का नेतृत्व सँभालने के लिए आग्रह किया। मेरठ में विद्रोह करने के बाद सिपाहियों ने तत्काल दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया था। दिल्ली मुग़ल साम्राज्य की राजधानी थी और मुग़ल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय दिल्ली में निवास करता था। दिल्ली पहुँचते ही सिपाहियों ने वृद्ध मुग़ल सम्राट से विद्रोह का नेतृत्व सँभालने का अनुरोध किया था, जिसे सम्राट ने कुछ हिचकिचाहट के बाद स्वीकार कर लिया था। इसी प्रकार, कानपुर में सिपाहियों और शहर के लोगों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के उत्तराधिकारी नाना साहिब को अपना नेता बनाया था। उनकी दृष्टि में नाना साहिब एक योग्य और अनुभवी नेता थे, जिन्हें नेतृत्व एवं संगठन का पर्याप्त अनुभव था। इसी प्रकार, झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई, बिहार में आरा के स्थानीय जमींदार कुँवरसिंह और लखनऊ में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के युवा पुत्र बिरजिस कादर को विद्रोह का नेता घोषित किया गया था। पुराने शासकों को विद्रोह का नेतृत्व करने का आग्रह करके सिपाही विद्रोह को एक व्यापक जन विद्रोह बनाना चाहते थे। जनसाधारण को अपने पुराने शासकों से पर्याप्त लगाव था। उन्हें लगता था कि ब्रिटिश शासकों ने अनुचित रूप से उन्हें उनकी सत्ता से वंचित कर दिया था। ऐसे शासकों का नेतृत्व उनके विद्रोह को शक्तिशाली और जनप्रिय बना सकता था। |
|
| 32117. |
विद्रोहियों के बीच एकता स्थापित करने के लिए क्या तरीके अपनाए गए? । |
|
Answer» विद्रोहियों के बीच एकता स्थापित करने के लिए निम्न तरीके अपनाए गए 1. गाय और सूअर की चर्बी के कारतूस, आटे में सूअर और गाय की हड्डियों का चूरा, प्लासी की लड़ाई के 100 साल पूरे होते ही भारत से अंग्रेजों की वापसी जैसी खबरों ने हिंदू-मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को समान रूप से उत्तेजित करके उन्हें एकजुट किया। अनेक स्थानों पर विद्रोहियों ने स्त्रियों और पुरुषों दोनों का सहयोग लिया ताकि समाज में लिंग भेदभाव कम हो 2. हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर मुग़ल सम्राट बहादुर शाह का आशीर्वाद प्राप्त किया ताकि विद्रोह को वैधता प्राप्त हो सके | और मुग़ल बादशाह के नाम से विद्रोह को चलाया जा सके 3. विद्रोहियों ने मिलकर अपने शत्रु फिरंगियों का सामना किया। उन्होंने दोनों समुदायों में लोकप्रिय तीन भाषाओं-हिंदी, उर्दू और फ़ारसी में अपीलें जारी कीं। 4. बहादुरशाह के नाम से जारी की गई घोषणा में मुहम्मद और महावीर, दोनों की दुहाई देते हुए जनता से इस लड़ाई में शामिल होने का आह्वान किया गया। दिलचस्प बात यह है कि आंदोलन में हिंदू और मुसलमानों के बीच खाई पैदा करने की अंग्रेजों द्वारा की गई कोशिशों के बाबजूद ऐसा कोई फर्क नहीं दिखाई दिया। अंग्रेज़ शासन ने दिसंबर, 1857 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थित बरेली के हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ़ भड़काने के लिए 50,000 रुपये खर्च किए। लेकिन उनकी यह कोशिश नाकामयाब रही। 5. 1857 के विद्रोह को एक ऐसे युद्ध के रूप में पेश किया जा रहा था जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों का नफा-नुकसान बराबर था। इश्तहारों में अंग्रेजों से पहले के हिंदू-मुस्लिम अतीत की ओर संकेत किया जाता था और मुग़ल साम्राज्य के तहत विभिन्न समुदायों के सह-अस्तित्व को गौरवगान किया जाता था। 6. विद्रोहियों ने कई संचार माध्यमों का प्रयोग किया। सिपाही या उनके संदेशवाहक एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रहे थे। विद्रोहियों ने कार्यवाही को समरूपता, एक जैसी योजना और समन्वय स्थापित किया ताकि लोगों में एकता पैदा हो। 7. अनेक स्थानों पर सिपाही अपनी लाइनों में रात के समय पंचायतें करते थे, जहाँ सामूहिक रूप से कई फैसले लिए जाते थे। वे अपनी-अपनी जाति और जीवन-शैली के बारे में निर्णय लेते थे। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को और कानपुर के पेशवा नाना साहिब को मुस्लिम और हिंदू सिपाहियों ने साहस और वीरता का प्रतीक बनाया ताकि सभी लोग एक मंच पर आकर ब्रिटिश राज्य के खिलाफ लड़ सकें। 8. मुस्लिम शहजादों अथवा नवाबों की ओर से अथवा उनके नाम पर जारी की गई घोषणाओं में हिंदुओं की भावनाओं का भी आदर किया जाता था एवं उनका समान रूप से ध्यान रखा जाता था 9. सूदखोरों, सौदागरों और साहूकारों को बिना धार्मिक भेदभाव किए सभी लोगों ने मिलकर इसलिए लूटा ताकि पिछड़े और गरीब लोग उनसे बदला ले सकें और विद्रोहियों की संख्या आम लोगों के विद्रोह में शामिल होने से बढ़ सके। 10. जन सामान्य को यह विश्वास दिला दिया गया कि अंग्रेज़ संपूर्ण भारत का ईसाईकरण करना चाहते हैं। इस प्रकार जन सामान्य को यह प्रेरणा दी गई कि सब एक होकर धर्म और जाति के भेदभाव को भूलकर अपनी अस्मिता के लिए ब्रिटिश शासन के विरुद्ध छेड़े गए संघर्ष में भाग लें। |
|
| 32118. |
समूचे राष्ट्र को खादी पहनाने का गाँधीजी का सपना भारतीय जनता के केवल कुछ हिस्सों तक ही सीमित क्यों रहा? |
|
Answer» प्रत्येक भारतीय को खादी के वस्त्र पहनाने का आँधीजी का स्वप्न कुछ हिस्सों तक सीमित रहने के निम्नलिखित कारण थे- ⦁ भारत का उच्च अभिजात्य वर्ग मोटी खादी के स्थान पर हल्के व बारीक कपड़े पहनना पसंद करता था। ⦁ अनेक भारतीय पश्चिमी शैली के वस्त्रों को पहनना आत्मसम्मान का प्रतीक मानते थे। ⦁ सफेद रंग की खादी के कपड़े महंगे थे, तथा उनका रख-रखाव भी कठिन था, जिसके कारण निम्न वर्ग के मेहनतकश लोग इसे पहनने से बचते थे। इसलिए महात्मा गाँधी के विपरीत बाबा साहब अम्बेडकर जैसे अन्य राष्ट्रवादियों ने पाश्चात्य शैली का सूट पहनना कभी नहीं छोड़ा। सरोजनी नायडू और कमला नेहरू जैसी महिलाएँ भी हाथ से बुने सफेद, मोटे कपड़ों की जगह रंगीन व डिजाइनदार साड़ियाँ पहनती थीं। |
|
| 32119. |
क्या गैर-बराबरी के बढ़ने का सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर कुछ असर पड़ता है? |
|
Answer» हाँ, खुशहाली तथा बदहाली का काफी नजदीकी सम्बन्ध होता है और गैर-बराबरी बढ़ने का सुरक्षा से जुड़े पहलुओं पर काफी प्रभाव पड़ता है। |
|
| 32120. |
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की किस हद तक भूमिका थी? |
|
Answer» 1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की अहम् भूमिका थी। बैरकपुर की एक घटना ऐसी ही थी जिसका संबंध गाय और सूअर की चर्बी लिपटे कारतूसों से था। जब मेरठ छावनी में अंग्रेज़ अधिकारियों ने भारतीय सैनिकों को चर्बी लिपटे कारतूस को मुँह से खोलने के लिए मजबूर किया तो मेरठ के सिपाहियों ने सभी फिरंगी अधिकारियों को मार दिया और हिंदू और मुसलमान सभी सैनिक अपने धर्म को भ्रष्ट होने से बचाने के तर्क के साथ दिल्ली में आ गए थे। हिंदू और मुसलमानों को एकजुट होने और फिरंगियों का सफाया करने के लिए कई भाषाओं में अपीलें जारी की गईं। विद्रोह का संदेश कुछ स्थानों पर आम लोगों के द्वारा, तो कुछ स्थानों पर धार्मिक लोगों के द्वारा फैलाए गए। उदाहरण के लिए मेरठ के बारे में इस प्रकार की खबर फैली थी कि वह हाथी पर सवार एक फकीर आता है जिससे सिपाही बार-बार मिलने आते हैं। लखनऊ में अवध पर कब्जे के बाद बहुत सारे धार्मिक नेता और स्वयंभू ‘पैगंबर’ प्रचारक ब्रिटिश राज को समाप्त करने की अलख जगा रहे थे। सिपाहियों ने जगह-जगह छावनियों में कहलवाया कि यदि वे गाय और सूअर की चर्बी के कारतूसों को मुँह से लगाएँगे तो उनकी जाति और धर्म दोनों भ्रष्ट हो जाएँगे। अंग्रेजों ने सिपाहियों को बहुत समझाया, लेकिन वे टस-से-मस नहीं हुए। 1857 के प्रारंभ में एक अफवाह यह भी जोरों पर थी कि अंग्रेज सरकार ने हिंदू धर्म और मुस्लिम धर्म को नष्ट करने के लिए एक साजिश रच ली है। कुछ राष्ट्रवादी लोगों ने यह भी अफ़वाह उड़ा दी कि बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सूअर का चूरा अंग्रेज़ों ने मिलवा दिया है। लोगों में यह डर फैल गया कि अंग्रेज़ हिंदुस्तानियों को ईसाई बनाना चाहते हैं। कुछ योगियों ने धार्मिक स्थानों, दरगाहों और पंचायतों के माध्यम से इस भविष्यवाणी पर बल दिया कि प्लासी के 100 साल पूरा होते ही अंग्रेजों का राज 23 जून, 1857 को खत्म हो जाएगा। कुछ लोग गाँव में शाम के समय चपाती बँटवाकर यह धार्मिक शक फैला रहे थे कि अंग्रेजों का शासन किसी उथल-पुथल का संकेत है। |
|
| 32121. |
विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फ़र्क था? |
|
Answer» विद्रोही भारत से ब्रिटिश शासन सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहते थे। विभिन्न सामाजिक समूह एक सामान्य उद्देश्य से संघर्ष में भाग ले रहे थे और वह सामान्य उद्देश्य था-‘ भारत से ब्रिटिश शासन सत्ता को उखाड़ फेंकना।’ यही कारण था कि इस विद्रोह को अंग्रेजों के विरुद्ध एक ऐसे संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसमें सभी लाभ-हानि के समान रूप से भागीदार थे। वास्तव में, ब्रिटिश शासन के अधीन भारतीय समाज के प्रत्येक वर्ग के हितों को हानि पहुँची थी। अतः उनमें ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध असंतोष चरम सीमा पर पहुँच गया था। विभिन्न सामाजिक समूह अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए विद्रोह में सम्मिलित हुए थे। अतः एक सामान्य उद्देश्य होते हुए भी उनकी दृष्टि में अंतर था। बकाया लगान के कारण उनकी जागीरों को नीलाम कर दिया जाता था। किसी जनाना नौकर अथवा गुलाम द्वारा दायर किए मुकदमें में भी उन्हें अदालत में उपस्थित होना पड़ता था। उन्हें स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों आदि के लिए विशाल धनराशि चंदे के रूप में देनी पड़ती थी। ब्रिटिश शासन के समाप्त हो जाने से उन्हें इन सभी समस्याओं से छुटकारा मिल सकता था। भारतीय व्यापारी भी ब्रिटिश शासन से संतुष्ट नहीं थे। सरकार की व्यापारिक चुंगी, कर तथा परिवहन संबंधी नीतियाँ भारतीय उद्योगपतियों एवं व्यापारियों के हितों के विरुद्ध थीं। देश के आंतरिक एवं बाह्य व्यापार पर विदेशी उद्योगपतियों का नियंत्रण था। भारतीय व्यापारी चाहते थे कि उन्हें आंतरिक और बाह्य व्यापार में विदेशी व्यापारियों के समान सुविधाएँ प्राप्त हों तथा उनके परम्परागत लेन-देन के ढंग और बही-खातों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न किया जाए। किसान चाहते थे कि भू-राजस्व की दर उदार हो, कर-संग्रह के साधन कठोर न हों और भुगतान न कर पाने की स्थिति में उनकी भूमि को नीलाम न किया जाए। वे चाहते थे कि सरकार ज़मींदारों और महाजनों के शोषण एवं अत्याचारों से किसानों की रक्षा करे तथा कृषि को उन्नत एवं गतिशील बनाया जाए। ब्रिटिश प्रशासन की आर्थिक नीतियों ने भारत के परम्परागत आर्थिक ढाँचे को नष्ट करके भारतीय दस्तकारों एवं कारीगरों की दशा को दयनीय बना दिया था। इंग्लैंड में निर्मित वस्तुओं को ला-लाकर यूरोपीयों ने भारतीय बुनकरों, लोहारों, मोचियों आदि को बेरोजगार कर दिया था। भारतीय कारीगरों और दस्तकारों को विश्वास था कि भारत से ब्रिटिश शासन समाप्त कर दिए जाने पर निश्चित रूप से उनकी स्थिति उन्नत होगी। उनके उत्पादों की माँग बढ़ जाएगी और उन्हें राजाओं और अमीरों की सेवा में नियुक्त किया जाएगा। इसी प्रकार, सरकारी कर्मचारी चाहते थे कि उनके साथ सम्मानजनक बर्ताव किया जाए, उन्हें प्रशासनिक एवं सैनिक सेवाओं में प्रतिष्ठा और धन वाले पदों पर नियुक्त किया जाए तथा अंग्रेजों के समान वेतन एवं शक्तियाँ प्रदान की जाएँ। उन्हें लगता था कि देश में बादशाही सरकार की स्थापना हो जाने से उनकी इन सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। पंडित, फकीर एवं अन्य ज्ञानी व्यक्ति भी ब्रिटिश शासन के विरोधी थे। उन्हें लगता था कि ब्रिटिश प्रशासक उनके धर्म को नष्ट करके उन्हें ईसाई बना देना चाहते हैं। ब्रिटिश सत्ता को भारत से उखाड़कर वे भारतीय धर्मों एवं संस्कृति की रक्षा करना चाहते थे। वास्तव में, विद्रोही भारत से ब्रिटिश सत्ता को समाप्त करके देश में 18वीं शताब्दी की पूर्व ब्रिटिश व्यवस्था की पुनस्र्थापना करना चाहते थे। यही कारण था कि उन्होंने ब्रिटिश शासन के पतन के बाद दिल्ली, लखनऊ और कानपुर जैसे स्थानों में एक प्रकार की सत्ता एवं शासन संरचना की स्थापना का प्रयास किया। |
|
| 32122. |
दकियानूसी वर्ग के लोग क्यों पोशाक सुधार का विरोध कर रहे थे? |
|
Answer» उनका ऐसा मानना था कि इससे महिलाओं की शालीनता, खूबसूरती और जनानापन समाप्त हो जाएगा। |
|
| 32123. |
अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? किसान, ताल्लुक़दार और ज़मींदार उसमें क्यों शामिल हुए? |
|
Answer» अवध में विद्रोह का व्यापक प्रसार हुआ और यह विदेशी शासन के विरुद्ध लोक-प्रतिरोध की अभिव्यक्ति बन गया। किसानों, ताल्लुकदारों और जमींदारों सभी ने इसमें भाग लिया। अवध में विद्रोह का सूत्रपात लखनऊ से हुआ, जिसका नेतृत्व बेगम हजरत महल द्वारा किया गया। बेगम ने 4 जून, 1857 ई० को अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादर को अवध का नवाब घोषित करके अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष प्रारंभ कर दिया। अवध के ज़मींदारों, किसानों तथा सैनिकों ने बेग़म की मदद की। विद्रोहियों ने असीम वीरता का परिचय देते हुए 1 जुलाई, 1857 ई० को ब्रिटिश रेजीडेंसी का घेरा डाल दिया और शीघ्र ही सम्पूर्ण अवध में क्रान्तिकारियों की पताका फहराने लगी। अवध में विद्रोह के व्यापक प्रसार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि इस क्षेत्र में ब्रिटिश शासन ने राजकुमारों, ताल्लुकदारों, किसानों तथा सिपाहियों सभी को समान रूप से प्रभावित किया था। सभी ने अवध में ब्रिटिश शासन की स्थापना के परिणामस्वरूप अनेक प्रकार की पीड़ाओं को अनुभव किया था। सभी के लिए अवध में ब्रिटिश शासन का आगमन एक दुनिया की समाप्ति का प्रतीक बन गया था। जो चीजें लोगों को बहुत प्रिय थीं, वे उनकी आँखों के सामने ही छिन्न-भिन्न हो रही थीं। 1857 ई० का विद्रोह मानो उनकी सभी भावनाओं, मुद्दों, परम्पराओं एवं निष्ठाओं की अभिव्यक्ति का स्रोत बन गया था। अवध के ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्य में विलय से केवल नवाब ही अपनी गद्दी से वंचित नहीं हुआ था, अपितु इसने इस क्षेत्र के ताल्लुकदारों को भी उनकी शक्ति, सम्पदा एवं प्रभाव से वंचित कर दिया था। उल्लेखनीय है कि ताल्लुकदारों का चिरकाल से अपने-अपने क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान था। अवध के सम्पूर्ण देहाती क्षेत्र में ताल्लुकदारों की जागीरें एवं किले थे। उनका अपने-अपने क्षेत्र की ज़मीन और सत्ता पर प्रभावशाली नियंत्रण था। भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना से पहले ताल्लुकदारों के अपने किले और हथियारबंद सैनिक होते थे। कुछ बड़े ताल्लुकदारों के पास 12,000 तक पैदल सिपाही होते थे। छोटे-छोटे ताल्लुकदारों के पास भी लगभग 200 सिपाही तो होते ही थे। अवध के विलय के तत्काल पश्चात् ताल्लुकदारों के दुर्गों को नष्ट कर दिया गया तथा उनकी सेनाओं को भंग कर दिया गया। परिणामस्वरूप ब्रिटिश शासन के विरुद्ध ताल्लुकदारों और जमींदारों का असंतोष अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। ब्रिटिश भू-राजस्व नीति ने भी ताल्लुकदारों की शक्ति एवं प्रभुसत्ता पर प्रबल प्रहार किया। अवध के अधिग्रहण के बाद ब्रिटिश शासन ने वहाँ भू-राजस्व के ‘एकमुश्त बन्दोबस्त’ को लागू किया। इस बन्दोबस्त के अनुसार ताल्लुकदारों को केवल बिचौलिए अथवा मध्यस्थ माना गया जिनके ज़मीन पर मालिकाना हक नहीं थे। इस प्रकार इस बन्दोबस्त के अंतर्गत ताल्लुकदारों को उनकी जमीनों से वंचित किया जाने लगा। उपलब्ध साक्ष्यों से पता चलता है कि अधिग्रहण से पहले अवध के 67 प्रतिशत गाँव ताल्लुकदारों के अधिकार में थे, किन्तु एकमुश्त बन्दोबस्त लागू किए जाने के बाद उनके अधिकार में केवल 38 प्रतिशत गाँव रह गए। दक्षिण अवध के ताल्लुकदारों के 50 प्रतिशत से भी अधिक गाँव उनके हाथों से निकल गए। ताल्लुकदारों को उनकी सत्ता से वंचित कर दिए जाने के कारण एक सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो गई। किसानों को ताल्लुकदारों के साथ बाँधने वाले निष्ठा और संरक्षण के बंधन नष्ट-भ्रष्ट हो गए। उल्लेखनीय है कि यदि ताल्लुकदार जनता का उत्पीड़न करते थे तो विपत्ति की घड़ी में एक दयालु अभिभावक के समान वे उसकी देखभाल भी करते थे। अवध के अधिग्रहण के बाद मनमाने राजस्व आकलन एवं गैर-लचीली राजस्व व्यवस्था के कारण किसानों की स्थिति दयनीय हो गई। अब किसानों को न तो विपत्ति की घड़ी में अथवा फसल खराब हो जाने पर सरकारी राजस्व में कमी की जाने की आशा थी और न ही तीज-त्योहारों पर किसी प्रकार की सहायता अथवा कर्ज मिल पाने की कोई उम्मीद थी। इस प्रकार किसानों में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा। किसानों के असंतोष का प्रभाव फौजी बैरकों तक भी पहुँचने लगा था क्योंकि अधिकांश सैनिकों का संबंध किसान परिवारों से था। उल्लेखनीय है कि 1857 ई० में अवध के जिन-जिन क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन को कठोर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, उन-उन क्षेत्रों में संघर्ष की वास्तविक बागडोर ताल्लुकदारों एवं किसानों के हाथों में थी। अधिकांश ताल्लुकदारों की अवध के नवाब के प्रति गहरी निष्ठा थी। अतः वे लखनऊ जाकर बेगम हज़रत महल के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में सम्मिलित हो गए। उल्लेखनीय है कि कुछ ताल्लुकदार तो बेग़म की पराजय के बाद भी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में जुटे रहे। इस प्रकार, यह स्पष्ट हो जाता है कि किसानों, ताल्लुकदारों, ज़मींदारों तथा सिपाहियों के असंतोष ने अवध में इस विद्रोह की व्यापकता को विशेष रूप से प्रभावित किया था। |
|
| 32124. |
अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कुचलने के लिए क्या कदम उठाए? |
|
Answer» अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कुचलने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए ⦁ दिल्ली को कब्जे में लेने की अंग्रेजों की कोशिश जून, 1857 में बड़े पैमाने पर शुरू हुई, लेकिन यह मुहिम सितंबर के आखिर में जाकर पूरी हो पाई। दोनों तरफ से जमकर हमले किए गए और दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इसकी एक वजह यह थी कि पूरे उत्तर भारत के विद्रोही राजधानी को बचाने के लिए दिल्ली में आ जमे थे। |
|
| 32125. |
‘आन्तरिक रूप से विस्थापित जन’ से क्या तात्पर्य है? उदाहरण दीजिए। |
|
Answer» आन्तरिक रूप से विस्थापित जन उन्हें कहा जाता है जो अकेले राजनीतिक उत्पीड़न, जातीय हिंसा आदि किसी कारण से अपने मूल निवास से तो विस्थापित हो चुके हों परन्तु उन्होंने उसी देश में किसी अन्य भाग पर शरणार्थी के रूप में रहना प्रारम्भ कर दिया है। |
|
| 32126. |
भारत की सुरक्षा नीति के घटकों का विस्तार से वर्णन कीजिए। |
|
Answer» भारतीय सुरक्षा रणनीति के घटक-विश्व में भारत एक ऐसा देश है जो पारम्परिक एवं गैरपारम्परिक दोनों तरह के खतरों का सामना कर रहा है। यह खतरे सीमा के अन्दर तथा बाहर दोनों तरफ से हैं। भारत की सुरक्षा राजनीति के चार बड़े घटक हैं तथा अलग-अलग समय में इन्हीं घटकों के आस-पास सुरक्षा की रणनीति बनाई गयी है। संक्षेप में, भारत की सुरक्षा रणनीति के इन चारों घटकों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है- 1. सैन्य क्षमता-पड़ोसी देशों के आक्रमण से बचने हेतु भारत को अपनी सैन्य क्षमता को और अधिक सुदृढ़ करना होगा। भारत पर पाकिस्तान ने सन् 1947-48, 1965, 1971 तथा 1999 में तथा चीन ने 1962 में आक्रमण किया था। दक्षिण एशियाई क्षेत्र में भारत के चारों तरफ परमाणु शक्ति सम्पन्न देश हैं। अतः हमने सन् 1974 तथा 1998 में परमाणु परीक्षण किए थे। वैश्वीकरण तथा उदारीकरण के युग में भी अर्थव्यवस्था का इस तरह निर्देशन जरूरी है कि गरीबी, बेरोजगारी तथा असमानता की समस्याओं को शीघ्र हल किया जा सके। अन्त में, संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत की सुरक्षा नीति व्यापक स्तर पर सुरक्षा की नवीन तथा प्राचीन चुनौतियों को दृष्टिगत रखते हुए निर्मित की जा रही है। |
|
| 32127. |
भारतीय परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए किस किस्म की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए-पारम्परिक या अपारम्परिक? अपने तर्क की पुष्टि में आप कौन-से उदाहरण देंगे? |
|
Answer» यदि भारतीय परिदृश्य पर गौर किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय सुरक्षा को पारम्परिक व अपारम्परिक दोनों ही प्रकार के खतरे हैं। अत: पारम्परिक व अपारम्परिक दोनों ही प्रकार की सुरक्षा पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, भारत के लिए पड़ोसी देशों विशेषकर पाकिस्तान व चीन से पारम्परिक सैन्य खतरा बना हुआ है। पाकिस्तान ने 1947-48, 1965, 1971 तथा 1999 में तथा चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण किया था। पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता का विस्तार कर रहा है तथा चीन की सैन्य क्षमता भारत से अधिक है। दूसरी तरफ भारत के कई क्षेत्रों, यथा-कश्मीर, नागालैण्ड, असम आदि में अलगाववादी हिंसक गुट तथा कुछ क्षेत्रों में नक्सलवादी समूह सक्रिय हैं। अत: भारत की आन्तरिक सुरक्षा को भी खतरा है। |
|
| 32128. |
सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का विस्तार से वर्णन कीजिए। |
|
Answer» सुरक्षा की पारम्परिक धारणा-सुरक्षा की पारम्परिक धारणा को दो भागों में बाँटा जा सकता है- (1) बाहरी सुरक्षा की पारम्परिक धारणा, 2. आन्तरिक सुरक्षा की पारम्परिक धारणा-सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का दूसरा रूप आन्तरिक सुरक्षा का है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से सुरक्षा के इस पहलू पर अधिक जोर नहीं दिया गया क्योंकि दुनिया के अधिकांश ताकतवर देश अपनी अन्दरूनी सुरक्षा के प्रति कमोबेश आश्वस्त थे। द्वितीय महायुद्ध के बाद ऐसे हालात और सन्दर्भ सामने आए कि आन्तरिक सुरक्षा पहले की तुलना में कहीं कम महत्त्व की वस्तु बन गयी। |
|
| 32129. |
“राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबन्धन भी बदल जाते हैं।” एक उदाहरण देकर कथन को स्पष्ट कीजिए। |
|
Answer» गठबन्धन राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं और राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबन्धन भी बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1980 के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ के विरुद्ध इस्लामी उग्रवादियों को समर्थन दिया, लेकिन ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अलकायदा नामक समूह के आतंकवादियों ने जब 11 सितम्बर, 2001 के दिन उस पर ही हमला कर दिया तो उसने इस्लामी उग्रवादियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। |
|
| 32130. |
मानवीय सुरक्षा का अभिप्राय स्पष्ट कीजिए। |
|
Answer» मानवीय सुरक्षा का अभिप्राय है कि देश की सरकार को अपने नागरिकों की सुरक्षा अपने राज्य अथवा भू-भाग की सुरक्षा से बढ़कर मानना है। मानवता की सुरक्षा तथा राज्य की सुरक्षा परस्पर पूरक हैं। सुरक्षित राज्य का अभिप्राय सुरक्षित जनता नहीं होता है। देश के नागरिकों को विदेशी हमलों से बचाना सुरक्षा की गारण्टी नहीं है। |
|
| 32131. |
शिक्षा की कौन-सी विधि शिल्प के माध्यम से शिक्षा पर बल देती है ? |
|
Answer» गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक-शिक्षा प्रणाली शिल्प के माध्यम से शिक्षा पर बल देती है। |
|
| 32132. |
निम्नलिखित में से किसको आप सुरक्षा का परम्परागत सरोकार/सुरक्षा का अपारम्परिक सरोकार/खतरे की स्थिति नहीं’ का दर्जा देंगे-(क) चिकनगुनिया/डेंगू बुखार का प्रसार।(ख) पड़ोसी देश से कामगारों की आमद।(ग) पड़ोसी राज्य से कामगारों की आमद।(घ) अपने इलाके को राष्ट्र बनाने की माँग करने वाले समूह का उदय।(ङ) अपने इलाके को अधिक स्वायत्तता दिए जाने की माँग करने वाले समूह का उदय।(च) देश की सशस्त्र सेना को आलोचनात्मक नजर से देखने वाला अखबार। |
|
Answer» (क) अपारम्परिक सरोकार |
|
| 32133. |
तीसरी दुनिया के देशों और विकसित देशों की जनता के सामने मौजूद खतरों में क्या अन्तर है? |
|
Answer» तीसरी दुनिया के देशों और विकसित देशों की जनता के सामने मौजूद खतरों में अन्तर- ⦁ विकसित देशों के लोगों को केवल बाहरी खतरे की आशंका रहती है, परन्तु तीसरी दुनिया के देशों को आन्तरिक व बाह्य दोनों प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है। |
|
| 32134. |
शक्ति सन्तुलन क्या है? कोई देश उसे कैसे कायम करता है? |
|
Answer» शक्ति सन्तुलन का अर्थ एवं परिभाषा शक्ति अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्र बिन्दु है। आधुनिक विद्वानों ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को ‘शक्ति की राजनीति’ की संज्ञा प्रदान की है। शक्ति सन्तुलन सिद्धान्त की सहायता से अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाओं और राजनीतिज्ञों की नीतियों की विवेचना की जाती है। अत: शक्ति सन्तुलन की अवधारणा का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक महत्त्व है। शक्ति सन्तुलन की परिभाषा |
|
| 32135. |
बुनियादी तौर से किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में सुरक्षा के कितने विकल्प होते हैं। संक्षेप में बताइए। |
|
Answer» बुनियादी रूप से किसी सरकार के पास युद्ध की स्थिति में सुरक्षा के तीन विकल्प होते हैं- ⦁ आत्मसमर्पण करना एवं दूसरे पक्ष की बात को बिना युद्ध किए मान लेना, अथवा |
|
| 32136. |
विक्टोरियाई समाज में महिलाओं की स्थिति बताइए। उत्तर- विक्टोरियाई समाज में बचपन से ही महिलाओं को आज्ञाकारी, खिदमती, सुशील तथा दब्बू होने की शिक्षा दी जाती थी। प्रश्न 6. पादुका सम्मान से क्या आशय है? |
|
Answer» अंग्रेजों की ऐसी सोच थी कि भारतीय किसी भी पवित्र स्थान में घुसने से पहले जूते उतारते हैं, इसलिए किसी भी सरकारी संस्था में प्रवेश करने से पहले उन्हें जूते उतारने चाहिए। इस नियम को ‘पादुका सम्मान के नाम से जाना जाता है। |
|
| 32137. |
गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित बेसिक शिक्षा-प्रणाली के मुख्य गुणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।याबेसिक शिक्षा-प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।याबेसिक शिक्षा के गुण एवं दोषों का विस्तार से वर्णन कीजिए।याबेसिक शिक्षा के गुण-दोषों की विवेचना कीजिए। |
|
Answer» बेसिक शिक्षा के गुण (Merits of Basic Education) इस पद्धति के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं| बेसिक शिक्षा के दोष (Demerits of Basic Education) बेसिक शिक्षा-पद्धति में कुछ दोष भी हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है| |
|
| 32138. |
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के अन्तर्गत किस आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं की शिक्षा की व्यवस्था है ?यासन् 1937 में वर्धा योजना (बेसिक शिक्षा) में प्रस्तावित प्राथमिक शिक्षा के लिए बालकों की क्या आयु वर्ग निश्चित की गई थी? |
|
Answer» बेसिक शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत 7 से 14 वर्ष के बालक-बालिकाओं के लिए शिक्षा की व्यवस्था है। |
|
| 32139. |
बेसिक शिक्षा-प्रणाली के चार मुख्य सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए। |
|
Answer» (i) नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का सिद्धान्त, |
|
| 32140. |
फ्रांस में सम्प्चुअरी कानून क्या थे? |
|
Answer» सन् 1294 से 1789 ई0 की फ्रांसीसी क्रान्ति तक फ्रांस के लोगों को सम्प्चुअरी कानूनों का पालन करना पड़ता था। इन कानूनों द्वारा समाज के निम्न वर्ग के व्यवहार को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। फ्रांसीसी समाज के विभिन्न वर्गों के लोग किस प्रकार के वस्त्र पहनेंगे इसका निर्धारण विभिन्न कानूनों द्वारा किया जाता था। इन कानूनों को सम्प्चुअरी कानून (पोशाक संहिता) कहा जाता था। फ्रांस में सम्प्चुअरी कानून इस प्रकार थे- ⦁ किसी व्यक्ति के सामाजिक स्तर द्वारा यह निर्धारित होता था कि कोई व्यक्ति एक वर्ष में कितने कपड़े खरीद सकता था। ⦁ साधारण व्यक्तियों द्वारा कुलीनों जैसे कपड़े पहनने पर पूर्ण पाबंदी थी। ⦁ शाही खानदान तथा उनके संबंधी ही बेशकीमती कपड़े (एमइन, फर, रेशम, मखमल अथवा जरी आदि) पहनते थे। ⦁ निम्न वर्गों के लोगों को खास-खास कपड़े पहनने, विशेष व्यंजन खाने, खास तरह के पेय (मुख्यतः शराब) पीने और शिकार खेलने की अनुमति नहीं थी। यथार्थ में ये कानून लोगों के सामाजिक स्तर को प्रदर्शित करने के लिए बनाए गए थे। उदाहरण के लिए रेशम, फर, एर्माइन मखमल, जरी जैसी कीमती वस्तुओं का प्रयोग केवल राजवंश के लोग ही कर सकते थे। अन्य वर्गों के लोग इसका प्रयोग नहीं कर सकते थे। |
|
| 32141. |
बेसिक शिक्षा-प्रणाली द्वारा निर्धारित किए गए पाठ्यक्रम का विवरण प्रस्तुत कीजिए। |
|
Answer» बेसिक शिक्षा का पाठ्यक्रम बेसिक शिक्षा के पाठ्यक्रम के अन्तर्गत निम्नलिखित विषयों को प्रमुख स्थान दिया गया है| ⦁ हस्तकलाएँ- कताई, बुनाई, कृषि, काष्ठकला, चर्म कार्य, फलों तथा साग-सब्जी के उद्योग, मिट्टी के खिलौने बनाना, प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण के अनुकूल अन्य कोई हस्तकला, जिसका शैक्षिक मूल्य हो। ⦁ मातृभाषा। बेसिक स्कूल में विभिन्न विषयों के समय चक्र निम्नवत् हैं |
|
| 32142. |
दो विश्व युद्धों के दौरान महिलाओं की पोशाकों में आए अंतर को स्पष्ट कीजिए। |
|
Answer» दो विश्व युद्धों के दौरान महिलाओं की पोशाक में बड़े पैमाने पर परिवर्तन हुए, जिन्हें निम्न रूप में प्रस्तुत किया गया है- ⦁ पैंट पाश्चात्य महिलाओं की पोशाक का अहम् हिस्सा बन गई। ⦁ सुविधा के लिए महिलाओं ने बाल कटवाना प्रारंभ कर दिया। ⦁ बीसवीं सदी तक कठोर और सादगी-भरी जीवन-शैली गंभीरता और प्रोफेशनले अंदाज का पर्याय बन गयी। ⦁ बच्चों के नए विद्यालयों में सादी पोशाक पर जोर दिया गया और तड़क-भड़क को हतोत्साहित किया गया। ⦁ बहुत-सी यूरोपीय महिलाओं ने आभूषण एवं कीमती परिधान पहनना बंद कर दिया। ⦁ उच्च वर्गों की महिलाएँ अन्य वर्गों की महिलाओं से मिलने-जुलने लगीं जिससे सामाजिक अवरोधों का पतन हुआ। ⦁ प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के मध्य इंग्लैण्ड में 70,000 से अधिक महिलाएँ आयुध कारखानों में काम करती थीं और उन्हें स्कार्फ के साथ ब्लाउज एवं पैंट की कामकाजी वेशभूषा के साथ अन्य चीजें पहननी पड़ती थीं। ⦁ हल्के रंगों के वस्त्र पहने जाते थे। इस प्रकारे कपड़े सादे होते गए। ⦁ स्कर्ट छोटी होती चली गई |
|
| 32143. |
अब तक कितने विश्व युद्ध हो चुके हैं? |
|
Answer» अब तक दो विश्व युद्ध हो चुके हैं। |
|
| 32144. |
निम्नलिखित रिक्त स्थानों की पूर्ति उनके सामने दिए गए सही शब्दों से करें।(क) पानी में ____ को छानकर अलग कर सकते हैं।(ख) फिटकरी को जल से अलग करने के लिए ___ अपनाते हैं। |
|
Answer» (क) पानी में घुले चॉक को छानकर अलग कर सकते हैं। |
|
| 32145. |
केंद्र सरकार के कौन-कौन से तीन अंग हैं? |
|
Answer» (1) व्यवस्थापिका |
|
| 32146. |
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय कहाँ है? |
|
Answer» संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय अमेरिका के न्यूयार्क शहर में है। |
|
| 32147. |
चार पदार्थों के नाम बताएँ, जो जल में विलेय है। |
|
Answer» चीनी, नमक, फिटकरी, तूतिया। |
|
| 32148. |
देश का सबसे बड़ा पद कौन-सा है? |
|
Answer» राष्ट्रपति का पद देश का सबसे बड़ा पद है। |
|
| 32149. |
विश्व शांति की स्थापना में भारत ने किस प्रकार योगदान किया? |
|
Answer» विश्व शांति की स्थापना में भारत ने अपने सैनिक भेजकर संयुक्त राष्ट्र संघ का सहयोग किया। |
|
| 32150. |
राष्ट्रपति के दो या तीन कार्य बताओ। |
|
Answer» राष्ट्रपति के प्रमुख कार्य संसद की बैठक बुलाना, अध्यादेश जारी करना, राज्यों में राज्यपाल, मंत्रियों व न्यायाधीशों की नियुक्ति करना आदि है। |
|