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कबीर और बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस प्रकार संप्रेषण हुआ? |
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Answer» कबीर के अनुसार संसार का मालिक एक है जो निर्गुण ब्रह्म है। वे राम और रहीम को एक ही मानते थे। उनका कहना था कि विभिन्नता तो केवल शब्दों में है जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं। केवल जे फूल्या फूल बिन’ और ‘समंदरि लागि आगि’ जैसी अभिव्यंजनाएँ कबीर की रहस्यवादी अनुभूतियों को दर्शाती हैं। वे वेदांत दर्शन से प्रभावित हैं और सत्य को अलख (अदृश्य), निराकर ब्रह्मन् और आत्मन् कहकर संबोधित करते हैं। दूसरी ओर इस्लामी दर्शन से प्रभावित होकर वे सत्य को अल्लाह, खुदा, हजरत और पीर कहते हैं। बाबा गुरु नानक ने भी कबीर की तरह निराकार भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने यज्ञ, मूर्ति पूजा और कठोर तप जैसे बाहरी आडम्बरों का विरोध किया। हिंदू और मुसलमानों के धर्मग्रंथों को भी उन्होंने नकारा। बाबा के अनुसार परम पूर्ण रब का कोई लिंग या आकार नहीं होता। उन्होंने रब का निरंतर स्मरण व नाम जप को उपासना का आधार बताया। उन्होंने संगत (सामुदायिक उपासना) के नियम निर्धारित किए जहाँ सामूहिक रूप में पाठ होता था। उन्होंने गुरुपद परंपरा की भी शुरुआत की, जिसका पालन 200 वर्षों तक होता रहा। जहाँ कबीर ने अपने उपदेशों में क्षेत्रीय भाषा का इस्तेमाल किया, वहीं गुरुनानक ने अपने विचार पंजाबी भाषा के माध्यम से सामने रखा। |
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| 32052. |
चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार और वीरशैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की? |
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Answer» अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई। इन संतों में कुछ तो ब्राह्मण, शिल्पकार और किसान थे और कुछ उन जातियों से आए थे जिन्हें अस्पृश्य’ माना जाता था। अलवार और नयनारे संतों की रचनाओं को वेद जितना महत्त्वपूर्ण बताया गया। जैसे अलवार संतों के मुख्य काव्य संकलन नलयिरादिव्यप्रबन्धम् का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था। इस प्रकार इस ग्रंथ का महत्त्व संस्कृत के चारों वेदों जितना बताया गया जो ब्राह्मणों द्वारा पोषित थे। वीरशैवों ने भी जाति की अवधारणा का विरोध किया। उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मानने से इंकार कर दिया। ब्राह्मण धर्मशास्त्रों में जिन आचारों को अस्वीकार किया गया था; जैसे-वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह, वीरशैवों ने उन्हें मान्यता प्रदान की। इन सब कारणों से ब्राह्मणों ने जिन समुदायों के साथ भेदभाव किया, वे वीरशैवों के अनुयायी हो गए। वीरशैवों ने संस्कृत भाषा को त्यागकर कन्नड़ भाषा का प्रयोग शुरू किया। |
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| 32053. |
किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों को स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का | सम्मिश्रण है? |
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Answer» भारत में इस्लाम के आगमन के बाद होने वाले परिवर्तन शासक वर्ग तक ही सीमित नहीं रहे। उसने संपूर्ण उपमहाद्वीप में विभिन्न सामाजिक समुदायों अर्थात् किसानों, शिल्पियों, योद्धाओं आदि सभी को प्रभावित किया। एक ही समाज में रहते-रहते, हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे के खान-पान, रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक एवं सामाजिक परंपराओं आदि की ओर आकर्षित होने लगे। धर्मान्तरित लोगों पर भी स्थानीय लोकाचारों का प्रभाव ज्यों-का-त्यों बना रहा। इस प्रकार स्थानीय परम्पराएँ एक सार्वभौमिक धर्म को प्रभावित करने लगीं। उदाहरण के लिए, खोजा इस्माइली समुदाय के लोगों द्वारा कुरान के विचारों की अभिव्यक्ति के लिए देशी साहित्यिक विधा का सहारा लिया गया था। इसी प्रकार, मालाबार तट (केरल) पर बसने वाले मुस्लिम व्यापारियों ने स्थानीय मलयालम भाषा को अपनाने के साथ-साथ मातृकुलीयता तथा मातृगृहता जैसे स्थानीय आचारों को भी अपना लिया था। एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय परम्पराओं के साथ सम्मिश्रण का संभवत: सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उदाहरण मस्जिद स्थापत्य के क्षेत्र में देखने को मिलता है। उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली अनेक मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सराहनीय सम्मिश्रण है। मस्जिद स्थापत्य के कुछ तत्त्व सार्वभौमिक होते हैं; जैसे-इमारत का मक्का की तरफ अनुस्थापन। इसे मेहराब (प्रार्थना का आला) तथा मिंबर (व्यास पीठ) की स्थापना से लक्षित किया जाता है। ऐसे सार्वभौमिक तत्त्व सभी मस्जिदों में समान रूप से पाए जाते थे। किन्तु मस्जिद स्थापत्य के अन्य तत्त्वों पर स्थानीय परिपाटियों का पर्याप्त प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। उदाहरण के लिए, उपमहाद्वीप में बनाई गई मस्जिदों में अनेक तत्त्वों जैसे छत और निर्माण कार्य में प्रयोग किए जाने वाले सामान में भिन्नता देखने को मिलती है। इस भिन्नता का प्रमुख कारण था, मस्जिदों के स्थापत्य का स्थानीय स्थापत्य परम्पराओं से प्रभावित होना तथा निर्माण कार्य में स्थानीय रूप से उपलब्ध निर्माण सामग्री का प्रयोग किया जाना। उदाहरण के लिए केरल, बांग्लादेश और कश्मीर की मस्जिदों के स्थापत्य पर स्थानीय स्थापत्य का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। शिखर केरल के मंदिर स्थापत्य की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। अतः 13वीं शताब्दी में केरल में बनाई गई अनेक मस्जिदों की छतें शिखर के आकार की हैं। इसी प्रकार आधुनिक बांग्लादेश के जिला मैमनसिंग में 1609 ई० में बनाई गई अतिया मस्जिद के गुम्बदों एवं मीनारों में इस्लामी स्थापत्य कला-शैली का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इस मस्जिद का निर्माण ईंटों से किया गया था। 1395 ई० में झेलम नदी के किनारे पर बनाई गई शाहहमदान मस्जिद पर कश्मीरी स्थापत्य शैली का उल्लेखनीय प्रभाव है। यह मस्जिद कश्मीर काष्ठ (लकड़ी) स्थापत्यकला का एक प्रशंसनीय उदाहरण है। इसके शिखर और छज्जे नक्काशीदार हैं। उन्हें पेपरमैशी से सुसज्जित किया गया है। इस प्रकार यह कहना उचित ही होगा कि उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है। |
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उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं? |
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Answer» विभिन्न संप्रदायों-धार्मिक विश्वासों एवं आचरणों का समन्वय लगभग 8वीं-18वीं शताब्दी के काल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकारों का तात्पर्य है कि इस काल में विभिन्न पूजा-प्रणालियाँ समन्वय की ओर बढ़ने लगी थीं। इस काल के साहित्य एवं मूर्तिकला दोनों से ही अनेक प्रकार के देवी-देवताओं का परिचय मिलता है। विष्णु, शिव और देवी की विभिन्न रूपों में आराधना की परिपाटी न केवल प्रचलन में रही अपितु उसे और अधिक विस्तार एवं व्यापकता भी प्राप्त हुई। देश के विभिन्न भागों के स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप माना जाने लगा। “महान” संस्कृत पौराणिक परम्पराओं एवं “लघु” परम्पराओं के पारस्परिक सम्पर्क के परिणामस्वरूप सम्पूर्ण देश में अनेक धार्मिक विचारधाराओं तथा पद्धतियों का जन्म हुआ। विद्वान इतिहासकारों का विचार है कि विचाराधीन काल में पूजा-प्रणालियाँ के समन्वय के आधार में प्रमुख रूप से दो प्रक्रियाएँ कार्यशील थीं। इनमें से एक प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार से संबंधित थी। पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन तथा परिरक्षण ने इसके प्रसार को प्रोत्साहित किया था। पौराणिक ग्रंथों की रचना सरल संस्कृत छन्दों में की गई थी, जिन्हें वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियाँ और शूद्र भी समझ सकते थे। दूसरी प्रक्रिया का संबंध स्त्रियों, शूद्रों तथा अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं एवं आचरणों को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकृत किए जाने तथा उन्हें एक नवीन रूप प्रदान किए जाने से था। समन्वय की इस प्रक्रिया का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उदाहरण आधुनिक उड़ीसा राज्य में स्थित ‘पुरी’ में मिलता है। बारहवीं शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते यहाँ के प्रमुख देवता जगन्नाथ (इसका शाब्दिक अर्थ है-संपूर्ण विश्व का स्वामी) को विष्णु का एक रूप मान लिया गया था। यह और बात है कि विष्णु के उड़ीसा में प्रचलित रूप तथा देश के अन्य भागों से मिलने वाले स्वरूपों में अनेक भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। देवी संप्रदायों में भी समन्वय के ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध होते हैं। सामान्य रूप से देवी की पूजा-आराधना सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में ही किए जाने का प्रचलन था। पौराणिक परम्परा के अंतर्गत इन स्थानीय देवियों को मुख्य देवताओं की पत्नियों के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गई। कभी उन्होंने लक्ष्मी के रूप में विष्णु की पत्नी का स्थान प्राप्त किया तो कभी पार्वती के रूप में शिव की पत्नी को। |
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फसल काटने की पहली मशीन किसने बनायी थी? |
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Answer» साइरस मैक्कॉर्मिक ने सन् 1831 ई. में प्रथम फसल काटने की मशीन बनाई थी। |
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इंग्लैण्ड के गरीब किसान थेसिंग मशीन का विरोध क्यों कर रहे थे? |
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Answer» इंग्लैण्ड के गरीब किसान श्रेसिंग मशीन का विरोध इसलिए कर रहे थे, क्योंकि- ⦁ इसने फसल की कटाई के समय कामगारों के लिए रोजगार के अवसर कम कर दिए। इससे पहले मजदूर खेतो में विभिन्न काम करते हुए जमींदार के साथ बने रहते थे। बाद में, उन्हें केवल फसल कटाई के समय ही काम पर रखा जाने लगा। ⦁ अधिकतर मजदूर आजीविका के साधन गवाँ कर बेरोजगार हो गए। इसलिए वे औद्योगिक मशीनों का विरोध कर रहे थे। ⦁ फ्रांस के विरुद्ध युद्ध समाप्त होने पर गाँवों में वापस लौटे सैनिकों के लिए रोजगार की आवश्यकता थी परन्तु मशीनीकरण ने रोजगार के अवसर सीमित कर दिए थे। |
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18वीं सदी के अंत तक अमेरिका के कितने भू-भाग पर वन थे? |
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Answer» 18वीं सदी के अंत तक अमेरिका की 80 करोड़ एकड़ भूमि पर वन थे। |
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माओ ने चीन में किस क्रान्ति का आरम्भ किया? |
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Answer» 1965 ई० में माओ ने ‘महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति’ का आरम्भ किया जिसके अन्तर्गत छात्रों और विशेषज्ञों को ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने और अध्ययन करने के लिए भेजा गया। |
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अमेरिका के आदिम जनजातीय समुदाय के लोग किस तरह से जीवन-यापन करते थे? |
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Answer» महान् खोजकर्ता कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज करने से पहले इस भू-भाग पर अनेक आदिम जनजातियाँ निवास करती थीं, जिन्हें भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता था। 15वीं शताब्दी में यूरोपीय लोगों के अमेरिका में आगमन पर मूल जनजातीय समुदाय अमेरिका के पश्चिमी और दक्षिणी भागों में पीछे हटने लगी। जनजातीय समुदाय के लोग मक्का, फलियों, तंबाकू और कुम्हड़े की कृषि करते थे। इस समुदाय के कुछ लोग शिकार करके, खाद्य पदार्थों का संकलन करके तथा मछलियाँ पकड़कर अपना भरण-पोषण और जीवन-यापन करते थे। |
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अमेरिका पर नए अप्रवासियों के पश्चिमी प्रसार को क्या प्रभाव पड़ा? |
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Answer» अमेरिका पर नए अप्रवासियों के पश्चिमी प्रसार के प्रभाव- ⦁ वनों के कटाव तथा घास भूमियों के विनाश ने अमेरिका के पर्यावरण संतुलन को नष्ट कर दिया जिसके कारण देश के दक्षिण-पश्चिमी भागों में धूलभरी आँधियाँ चलने लगीं तथा वर्षा की मात्रा में कमी आने लगी। ⦁ नए प्रवासियों के पश्चिमी प्रसार के क्रम में बड़ी संख्या में वनों और घास भूमियों को कृषि क्षेत्रों में बदल दिया गया। ⦁ इन क्षेत्रों में रहने वाले मूल निवासियों कोपश्चिमी तथा दक्षिणी भागों की ओर विस्थापित कर दिया गया। ⦁ श्वेत आबादी तथा कृषि के पश्चिमी विस्तार के कारण शीघ्र ही अमेरिका विश्व का प्रमुख गेहूँ उत्पादक देश बन गया |
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| 32061. |
अमेरिका में गेहूं की खेती में आए उछाल और बाद में पैदा हुए पर्यावरण संकट से हम क्या सबक ले सकते हैं? |
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Answer» अमेरिका में गेहूं की खेती में आए तेज उछाल के चलते कृषि के अंतर्गत और अधिक क्षेत्रों को शामिल करने के उद्देश्य से बड़े पैमाने पर वन एवं घास भूमियों को साफ किया गया। एक व्यापक प्रयास के चलते अमेरिका शीघ्र ही विश्व का अग्रणी गेहूँ उत्पादक देश बन गया। लेकिन इसके फलस्वरूप पश्चिम एवं दक्षिण अमेरिका में एक नया पर्यावरण संकट उत्पन्न हो गया जिससे सारा क्षेत्र धूल भरी आँधियों से ढंक गया और यह प्राकृतिक आपदा बड़ी संख्या में मनुष्य एवं पशुओं की मृत्यु का कारण बनी। इस घटना से हमें यह सीख लेनी चाहिए कि हमें अपने आर्थिक हितों के लिए पर्यावरण का अनियंत्रित और अवैज्ञानिक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। हमें मानव विकास के ऐसे रास्ते तलाश ने चाहिए जिससे पर्यावरण को क्षति पहुँचाए बिना मानव विकास को उच्च स्तर पर स्थापित किया जा सके। |
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| 32062. |
इंग्लैण्ड के किसान 1660 ई. के दशक में किस फसल की खेती करने लगे थे? |
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Answer» इस अवधि में इंग्लैण्ड के कई हिस्सों में किसान शलजम और तिपतिया घास की खेती करने लगे थे। उन्हें शीघ्र ही यह एहसास हो गया कि इन दोनों फसलों की खेती से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। साथ ही शलजम को पशु बड़े चाव से खाते थे। |
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ग्रेट लीप फॉरवर्ड क्या है? |
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Answer» ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ 1958 ई० में चलाया चीन का एक मुख्य अभियान था जिसका मुख्य बिन्दु देश के औद्योगीकरण को उच्च पैमाने पर ले जाना था। |
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चीन में आर्थिक सुधारों को किस प्रकार लागू किया गया? |
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Answer» चीन में आर्थिक सुधार विभिन्न चरणों में लागू किए गए। प्रथम चरण में कृषि, विदेशी व्यापार तथा निवेश क्षेत्रों में सुधार किए गए तथा द्वितीय चरण में औद्योगिक क्षेत्र में सुधार आरम्भ किए गए। |
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भारत की आर्थिक स्थिति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» भारत एक विकासशील देश है। भारतीय जनसंख्या का लगभग 70% भाग कृषि कार्य में संलग्न है। जबकि सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान लगभग 19.7% है। 1970 के दशक के हरित क्रान्ति के फलस्वरूप कृषि क्षेत्र ने महत्त्वपूर्ण प्रगति की है। इसके बावजूद लगभग 26% भारतीय आज भी निर्धन ही हैं। गत वर्षों में औद्योगि उत्पाद में विस्तार एवं विविधीकरण हुआ है। कार्य-बल का लगभग 15% भाग उद्योग क्षेत्र में कार्यरत है। 1990 के दशक में सरकार ने आर्थिक सुधार लागू किए जिसके अन्तर्गत भारतीय उद्योग को सभी प्रकार के नियन्त्रणों से मुक्त कर दिया गया, व्यापार के लिए भारतीय द्वार खोल दिए गए, विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए उचित कदम उठाए गए। तब से सेवा क्षेत्रक को तेजी से विस्तार हुआ है, आधारिक संरचना का निर्माण हुआ है और रोजगार के नए-नए अवसर सृजित हुए हैं। फलस्वरूप आज भारत विकासशील देशों में अधिकतम विकसित देश है। |
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कोई दो मानव विकास संकेतांक बताइए। |
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Answer» ये हैं— |
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पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। जनसंख्या का लगभग 50% भाग इस कार्य में लगा है। खाद्यान्नों के उत्पादन में देश आत्मनिर्भर है। पाकिस्तान का उद्योग देश की अधिकांश उपभोक्ता वस्तुओं की जरूरतों को पूरा करता है। तेलशोधन, धातु प्रक्रमण तथा ताप बिजली संयन्त्रों के प्रयोग के फलस्वरूप बिजली के उत्पादन में बहुत अधूिक वृद्धि हुई है। इसके बावजूद आर्थिक दृष्टि से पाकिस्तान एक पिछड़ा देश है। यहाँ प्रति व्यक्ति आय कम है, आर्थिक निष्पादन अकुशल है और राजनीतिक अस्थिरता के कारण विकास की गति रुकी हुई है। विभिन्न आर्थिक एवं सामाजिक विकास की दृष्टि से पाकिस्तान पिछड़ता ही जा रहा है। |
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अमेरिका में फसल काटने वाली मशीन के फायदे-नुकसान क्या-क्या थे? |
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Answer» अमेरिका में फसल काटने वाली मशीनों के लाभ- ⦁ गेहूं के उत्पादन में तीव्र वृद्धि संभव-फसल काटने की नई मशीनों के प्रयोग से ही गेहूं का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सका जिसके कारण शीघ्र ही अमेरिका विश्व का प्रमुख गेहूँ उत्पादक देश बन गया। ⦁ समय की बचत-सन् 1831 में अमेरिका में साइरस मैककार्मिक नामक व्यक्ति ने फसल काटने की एक मशीन बनाई जिससे 15 दिन में 500 एकड़ भूमि पर कटाई संभव थी। ⦁ बड़े फार्मों पर कृषि संभव–कटाई की नई-नई मशीनों के फलस्वरूप ही विशाल आकार के खेतों पर कृषि कार्य संभव हो सका। नई मशीनों की सहायता से 4 आदमी मिलकर एक सीजन में 3,000 से 4,000 एकड़ भूमि पर फसल का उत्पादन कर सकते थे। अमेरिका में फसल काटने वाली मशीन से हानि- ⦁ निर्धन किसानों के लिए अभिशाप-अनेक छोटे किसानों ने भी बैंकों के ऋण की सहायता से इन मशीनों को खरीदा परंतु अचानक गेहूँ की माँग में कमी ने इन किसानों को बर्बाद कर दिया। ⦁ बेरोजगारी में वृद्धि–फसल कटाई की नई-नई मशीनों के कारण मजदूरों की माँग में तेजी से कमी आई जिसके कारण भूमिहीन मजदूरों के समक्ष रोजी-रोटी का संकट उपस्थित हो गया। |
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| 32069. |
चीन की अर्थव्यवस्था पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। |
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Answer» चीन एक विकासशील देश है। 1970 के दशक के पश्चात् इसका बड़ी तेजी से आर्थिक विकास हुआ है। कृषि अभी भी इसका मुख्य व्यवसाय है और 50% से भी अधिक जनसंख्या यहाँ कृषि कार्यों में संलग्न है। यहाँ पशुपालन व्यवसाय भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। यहाँ बड़ी मात्रा में खनिज पदार्थ पाए जाते हैं तथा बड़ी मात्रा में खनिज तेल का उत्पादन किया जाता है। 1970 के अन्तिम वर्षों में आर्थिक नीतियों में परिवर्तन किए गए जिसके अन्तर्गत उद्योगों का विकेन्द्रीकरण किया गया। विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना की गई तथा विदेशी पूँजी को आकर्षित करने के लिए प्रयास किए गए जिसके फलस्वरूप औद्योगिक विकास को गति मिली। |
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| 32070. |
विरुपाक्ष मंदिर के एक अन्य स्तंभ का रेखाचित्र है। क्या आप कोई पुष्प-विषयक रूपांकन देखते हैं? किन जानवरों को दिखाया गया है? आपके विचार में उन्हें क्यों चित्रित किया गया है? मानव आकृतियों का वर्णन कीजिए। |
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Answer» विरुपाक्ष मन्दिर के इस स्तम्भ को ध्यानपूर्वक देखने से पता लगता है कि इस स्तम्भ में अनेक पुष्पों के चित्रों के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों की आकृतियों को भी चित्रित किया गया है। इसमें मोर, घोड़ा जैसे पक्षियों और पशुओं की आकृतियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। ऐसा लगता है कि इस समय मन्दिर धार्मिक, सांस्कृतिक एवं अन्य गतिविधियों के केंद्र बिन्दु थे। मन्दिरों को अनेक प्रकार के चित्रों से सजाया जाता था। स्तम्भ पर की गई चित्रकारी को देखकर लगता है कि उस समय यह कला विशेष रूप से उन्नत थी। स्तम्भ पर बने चित्रों से स्पष्ट होता है कि उस समय मूर्तिपूजा का प्रचलन था। मन्दिरों में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा की जाती थी। अनेक पशु-पक्षियों; जैसे-सिंह, मोर, उल्लू, गुरुड़ आदि को देवी-देवताओं के वाहन चित्र 71 . विरुपाक्ष मन्दिर का स्तम्भ मानकर उनकी भी पूजा की जाती थी। वैष्णव धर्म और शैव धर्म उस समय के लोकप्रिय धर्म थे। वैष्णव धर्म में परमेश्वर के रूप में विष्णु की पूजा-आराधना की जाती थी। अवतारवाद की भावना–वैष्णव धर्म की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। इसमें विष्णु के अवतारों की पूजा पर बल दिया जाता था। यह विश्वास किया जाता था कि, जब-जब धरती पर पाप बढ़ जाते हैं और धर्म संकट में पड़ जाता है, तब-तब धरती और मानवता की रक्षा के लिए विष्णु अवतार लेते हैं। वैष्णव धर्म की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता विष्णु की पत्नी के रूप में लक्ष्मी अथवा श्री की परिकल्पना किया जाना था। लक्ष्बी की पूजा-आराधना धन-सम्पन्नता और समृद्धि की देवी के रूप में की जाती थी। शैव धर्म के साथ-साथ शाक्त, कार्तिकेय और गणपति जैसे सम्प्रदाय भी इस काल में पर्याप्त लोकप्रिय थे। वस्तुतः धार्मिक सहनशीलता इस काल की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। |
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आपके विचार में महानवमी डिब्बा से सम्बद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था? |
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Answer» महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठान सितंबर एवं अक्टूबर के शरद महीनों में 10 दिनों तक मनाया जाने वाला हिंदू त्योहार था। इस अनुष्ठान को उत्तर भारत में दशहरा, बंगाल में दुर्गा पूजा और प्रायद्वीपीय भारत में महानवमी के नाम से निष्पादित किए जाते थे। इस अवसर पर विजयनगर के शासक अपने रुतबे, ताकत तथा सत्ता की शक्ति का प्रदर्शन करते थे। इस अवसर पर होने वाले अनुष्ठानों में मूर्तिपूजा, अश्व-पूजा के साथ-साथ भैंसों तथा अन्य जानवरों की बलि दी जाती थी। नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा तथा घोड़ों, हाथियों तथा रथों व सैनिकों की शोभा यात्राएँ निकाली जाती थीं। साथ ही, प्रमुख नायकों और अधीनस्थ राजाओं द्वारा राजा को प्रदान की जाने वाली औपचारिक भेंट इस अवसर के प्रमुख आकर्षण थे। त्योहार के अंतिम दिन राजा सेनाओं का निरीक्षण करता था। साथ ही नए सिरे से कर निर्धारित किए जाते थे। |
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शहर के किलेबन्द क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फायदे और नुकसान थे? |
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Answer» विजयनगर शहर की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी विशाल एवं सुदृढ़ किलेबंदी थी। किलेबंदी की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता | यह थी कि इनसे केवल शहर को ही नहीं अपितु खेती के कार्य में प्रयोग किए जाने वाले आस-पास के क्षेत्र और जंगलों को भी घेरा गया था। अब्दुल रज्जाक के विवरण से भी किलेबन्द कृषि क्षेत्रों की पुष्टि होती है। शहर के किलेबन्द क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के कई लाभ और नुकसान थे। लाभ ⦁ मध्यकाल में विजय प्राप्ति में घेराबन्दियों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता था। घेराबन्दियों का प्रमुख उद्देश्य प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर देना होता था ताकि वे विवश होकर आत्मसमर्पण करने को तैयार हो जाएँ। हानियाँ ⦁ कृषिक्षेत्र को किलेबन्द क्षेत्र में रखने की व्यवस्था बहुत महँगी थी। राज्य को इस पर ज्यादा धने-राशि व्यय करनी पड़ती थी। |
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स्थापत्य की कौन-कौन सी परम्पराओं ने विजयनगर के वस्तुविदों को प्रेरित किया? उन्होंने इन परम्पराओं में किस प्रकार बदलाए किए?अथवाकिन्हीं दो स्थापत्य परंपराओं का उल्लेख कीजिए जिन्होंने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रेरित किया। उन्होंने इन परंपराओं का मंदिर स्थापत्य में किस प्रकार प्रयोग किया? स्पष्ट किजिए। |
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Answer» विजयनगर के लगभग सभी शासकों की स्थापत्यकला में विशेष अभिरुचि थी। अतः उनके शासनकाल में स्थापत्यकला का विशेष विकास हुआ। स्थापत्य की परम्परागत सभी परम्पराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रभावित किया, किन्तु उन्होंने आवश्यकता एवं समय के अनुसार इन परम्पराओं में अनेक परिवर्तन भी किए। विजयनगर अर्थात् ‘विजय का शहर’ एक शहर और राज्य दोनों के लिए प्रयुक्त नाम था। कृष्णदेव राय विजयनगर का महानतम शासक था। उसके काल में स्थापत्यकला का विशेष विकास हुआ। उसने अपनी माता के नाम पर विजयनगर के निकट नगलपुरम् नामक उपनगर की स्थापना की, जिसमें उसने अनेक भव्य भवनों एवं मंदिरों का निर्माण करवाया। उल्लेखनीय है कि विजयनगर साम्राज्य के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन में धर्म और धार्मिक वर्गों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। स्थापत्य की प्रचलित सभी परंपराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रभावित किया। उन्होंने इनमें कुछ परिवर्तन भी किए। उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारतीय राजशाही में वंशपरंपरा की एक प्रमुख विशेषता वंश देवता की सामूहिक भक्ति थी। अतः 1350 ई०-1650 ई० की अवधि में दक्षिण भारत में अनेक महत्त्वपूर्ण मन्दिरों का निर्माण हुआ। विजयनगर के शासकों ने मन्दिरों से संबद्ध पूर्वकालिक परम्पराओं के अनुसरण के साथ-साथ उन्हें नवीनता प्रदान की तथा और विकसित किया। राजकीय प्रतिकृति मूर्तियों को मन्दिर में प्रदर्शित किया जाने लगा तथा राजा की मन्दिर यात्रा को महत्त्वपूर्ण राजकीय अवसर माना जाने लगा। गोपुरम् और मंडप जैसी विशाल संरचनाएँ इस काल के मंदिर स्थापत्य की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ बन गईं। इन संरचनाओं का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उदाहरण रायगोपुरम् अथवा राजकीय प्रवेशद्वारों में मिलता है। गोपुरम् बहुत दूर से ही मन्दिर होने का संकेत देते थे। इनकी ऊँचाई और भव्यता के सामने केन्द्रीय देवालयों की दीवारें प्रायः बौनी-सी प्रतीत होती थीं। मंदिर परिसर में स्थित देवस्थलों के चारों ओर मंडप और लम्बे स्तम्भों वाले गलियारे भी बनाए जाने लगे। विजयनगर के शासकों ने विरुपाक्ष के प्राचीन मंदिर में गोपुरम् और मंडप जैसी अनेक संरचनाओं को जोड़कर इसके आकार को और अधिक बढ़ा दिया। कृष्णदेव राय ने अपने राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में मुख्य मन्दिर के सामने एक भव्य मंडप का निर्माण करवाया। इस मंडप को सुंदर उत्कीर्ण चित्रों वाले स्तम्भों से सुसज्जित किया गया था। इसके पूर्वी गोपुरम् के निर्माण का श्रेय भी कृष्णदेव राय को ही दिया जाता है। मन्दिर में कई सभागारों का निर्माण करवाया गया था। सभागारों का प्रयोग विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए किया जाता था। कुछ सभागारों में संगीत, नृत्य और नाटकों के विशेष कार्यक्रमों को देखने के लिए देवताओं की मूर्तियों को रखा जाता था। कुछ अन्य सभागारों में देवी-देवताओं के विवाह समारोहों का आयोजन किया जाता था तो कुछ का प्रयोग देवी-देवताओं को झूला झुलाने के लिए किया जाता था। विजयनगर के वास्तुविदों ने दिल्ली सुल्तानों के स्थापत्य की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का समावेश अपनी स्थापत्यशैली में किया। किलेबन्द बस्ती में जाने के लिए बनाए गए प्रवेश द्वार पर बनाई गई मेहराब और द्वार पर बना गुम्बद इस काल के प्रवेश द्वार स्थापत्य की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ थीं। इन दोनों विशेषताओं को दिल्ली सुल्तानों के स्थापत्य के चारित्रिक तत्व माना जाता है। स्थापत्यकला की इस शैली का विकास इस्लामिक कला के विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय स्थापत्य की परम्पराओं के संपर्क में आने के परिणामस्वरूप हुआ था, अतः कला इतिहासकारों ने इसे स्थापत्य की इंडो-इस्लामिक कला शैली का नाम दिया है। |
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स्वतन्त्रता संकेतक की परिभाषा दीजिए। स्वतन्त्रता संकेतकों के कुछ उदाहरण दीजिए। |
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Answer» स्वतन्त्रता संकेतक की परिभाषा स्वतन्त्रता संकेतक को ‘सामाजिक व राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में लोकतान्त्रिक भागीदारी के रूप में परिभाषित किया जाता है। प्रमुख स्वतन्त्रता संकेतांकों के उदाहरण निम्नलिखित हैं ⦁ नागरिक अधिकारों की संवैधानिक संरक्षण की सीमा। ⦁ न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को संरक्षण देने की संवैधानिक सीमा। ⦁ विधिसम्मत शासन। |
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‘शाही केंन्द्र’ शब्द शहर के किस भाग के लिए प्रयोग किए गए हैं, क्या वे उस भाग का सही वर्णन करते हैं? |
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Answer» विशाल एवं सुदृढ़ किलेबन्दी विजयनगर शहर की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। हमें इस शहर की तीन-तीन किलेबंदियों का उल्लेख मिलता है। पहली किलेबन्दी के द्वारा केवल शहर को ही नहीं अपितु खेती के कार्य में प्रयोग किए जाने वाले आस-पास का क्षेत्र और जंगलों को भी घेरा गया था। सबसे बाहरी दीवार के द्वारा शहर के चारों ओर की पहाड़ियों को परस्पर जोड़ दिया गया था। दूसरी किलेबन्दी को नगरीय केन्द्र के आंतरिक भाग के चारों ओर किया गया था। एक तीसरी किलेबन्दी शासकीय केन्द्र अथवा ‘शाही केन्द्र’ के चारों ओर की गई थी। इसमें सभी महत्त्वपूर्ण इमारतें अपनी ऊँची चहारदीवारी से घिरी हुई थीं। शाही केन्द्र बस्ती के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित था। उल्लेखनीय है कि ‘शाही केन्द्र’ शब्द का प्रयोग शहर के एक भाग विशेष के लिए किया गया है। इसमें 60 से भी अधिक मंदिर और लगभग 30 महलनुमा संरचनाएँ थीं। इन संरचनाओं और मन्दिरों के मध्य एक महत्त्वपूर्ण अंतर यह था कि मन्दिरों का निर्माण पूर्ण रूप से ईंट-पत्थरों से किया गया था, किंतु धर्मेतर भवनों के निर्माण में विकारी वस्तुओं का प्रयोग किया गया था। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि, ये संरचनाएँ अपेक्षाकृत बड़ी थीं और इनका प्रयोग आनुष्ठानिक कार्यों के लिए नहीं किया जाता था। अंतः क्षेत्र में सर्वाधिक विशाल संरचना, ‘राजा का भवन’ है, किंतु पुरातत्वविदों को इसके राजकीय आवास होने का कोई सुनिश्चित साक्ष्य उपलब्ध नहीं हुआ है। इसमें दो सर्वाधिक प्रभावशाली मंच हैं, जिन्हें सामान्य रूप से ‘सभामंडप’ और ‘महानवमी डिब्बा’ के नाम से जाना जाता है। सभामंडप एक ऊँचा मंच है। इसमें लकड़ी के स्तंभों के लिए पास-पास और निश्चित दूरी पर छेद बनाए गए हैं। इन स्तंभों पर दूसरी मंजिल को टिकाया गया था। दूसरी मंजिल तक पहुँचने के लिए सीढ़ी का निर्माण किया गया था। महानवमी डिब्बा एक विशाल मंच है जिसका निर्माण शहर के सबसे अधिक ऊँचे स्थानों में से एक पर किया गया था। इसमें एक वार्षिक राजकीय अनुष्ठान किया जाता था जो सितंबर और अक्टूबर के शरद मासों में इस दिन तक चलता रहता था। शाही केन्द्र में अनेक भव्य महल स्थित थे। इनमें से सर्वाधिक सुंदर भवन लोटस महल अथवा कमल महल था। यह नामकरण इस महल की सुंदरता एवं भव्यता से प्रभावित होकर अंग्रेज़ यात्रियों द्वारा किया गया था। संभवतः यह एक परिषद भवन था, जहाँ राजा और उसके परामर्शदाता विचार-विमर्श के लिए मिलते थे। कमल महल के समीप ही हाथियों का विशाल फीलखाना। (हाथियों के रहने का स्थान) था। शाही केन्द्र में अनेक सुंदर मन्दिर थे। इनमें से एक अत्यधिक सुंदर मंदिर हज़ार राम मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। ‘शाही केंन्द्र’ शब्द का औचित्य : |
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अध्याय के विभिन्न विवरणों से आप विजयनगर के सामान्य लोगों के जीवन की क्या छवि पाते हैं? |
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Answer» अध्याय के विभिन्न विवरणों से विजयनगर के सामान्य लोगों के जीवन के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती है। इस दृष्टि से 15वीं शताब्दी में विजयनगर शहर की यात्रा करने वाले निकोलों दे कॉन्ती (इतालवी व्यापारी), अब्दुरज्जाक (फारस के राजा का दूत), अफानासी निकितिन (रूस का एक व्यापारी) और 16वीं शताब्दी में विजयनगर जाने वाले दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस तथा फर्नावो नूनिज के विवरण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इन विवरणों से पता चलता है कि, समाज सुसंगठित था। समाज में वर्ण-व्यवस्था का प्रचलन था, जिसमें ब्राह्मणों का स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। उन्हें राज्य की सैनिक एवं असैनिक सेवाओं में उच्च पद प्रदान किए जाते थे तथा उन्हें किसी भी अपराध के लिए मृत्युदंड नहीं दिया जाता था। ब्राह्मण जिन स्थानों पर रहते थे, वहाँ भूमि पर उनका नियंत्रण था। उस भूमि पर आश्रित लोग भी उनके नियंत्रण में थे। पुजारी-वर्ग की हैसियत से उन्हें समाज में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त थी। असंख्य वैदिक मन्दिरों के आविर्भाव के कारण मन्दिर अधिकारियों के रूप में ब्राह्मणों की शक्ति में बहुत अधिक वृद्धि हो गई थी। विजयनगर युग में किसान सामाजिक व्यवस्था का आधार था, जिस पर समाज के सभी अन्य वर्ग निर्भर थे। विभिन्न अभिलेखों में शेट्टी और चेट्टी नामक एक समूह का भी उल्लेख मिलता है। यह प्रमुख व्यापारी वर्ग था, जो अत्यधिक धनी एवं संपन्न था। समाज में दास प्रथा को भी प्रचलन था। दास-दासियों का क्रय-विक्रय होता था। ऐसा प्रतीत होता है कि सामान्य लोग छप्पर वाले कच्चे घरों में रहते थे। 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली यात्री बारबोसा ने सामान्य लोगों के आवासों का वर्णन करते हुए लिखा था, “लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थानों वाली लम्बी गलियों में व्यवस्थित हैं।” विजयनगर में विभिन्न सम्प्रदायों और विभिन्न समुदायों के लोग रहते थे। विजयनगर के लगभग सभी शासक-वर्ग धर्म-सहिष्णु थे। उन्होंने बिना किसी भेद-भाव के सभी मंदिरों को अनुदान प्रदान किए। बारबोसा ने कृष्णदेव राय के साम्राज्य में प्रचलित न्याय और समानता के व्यवहार की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि “राजा इतनी आजादी देता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छानुसार आ-जा सकता है और अपने धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकता है। उसे उसके लिए किसी प्रकार की नाराजगी नहीं झेलनी पड़ती है और न उसके बारे में यह जानकारी हासिल करने की कोशिश की जाती है कि वह ईसाई है। अथवा यहूदी, मूर है या नास्तिक।” अधिकांश जनसंख्या हिन्दू धर्म की अनुयायी थी। बौद्ध, जैन, मुसलमान एवं ईसाई भी पर्याप्त संख्या में थे। विजयनगर के सभी शासकों ने सभी धर्मों के अनुयायियों के प्रति सहनशीलता की नीति का अनुसरण किया। समाज में स्त्रियों का सम्मानजनक स्थान था। वे साम्राज्य के राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में भाग लेती थीं। स्त्रियाँ लिए शिक्षा का प्रबंध था। कुछ स्त्रियाँ उच्च कोटि की शिक्षा भी प्राप्त करती थीं। स्त्रियाँ संगीत, नृत्य तथा अन्य ललित कलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक पारंगत थीं। धनी और संपन्न लोगों में बहु-विवाह की प्रथा प्रचलित थी। समाज में बाल-विवाह का प्रचलन था। सती प्रथा भी प्रचलन में थी। उच्च वर्गों की स्त्रियाँ पति की मृत्यु पर उसके शव के साथ जलकर सती हो जाती थीं। शाकाहारी तथा मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन किया जाता था। ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य जातियों के लिए खान-पान के प्रतिबंध नहीं थे। लोग आमोद-प्रमोद प्रिय थे। वे उत्सवों एवं मेलों में उत्साहपूर्वक भाग लेते थे। उनके प्रकार के खेलों द्वारा मनोरंजन किया जाता था। कुश्ती, घुड़दौड़ आदि पशु-पक्षियों के युद्ध भी आमोद-प्रमोद के साधन थे। विजयनगर साम्राज्य में उद्योग-धंधे एवं व्यापार-वाणिज्य उन्नत अवस्था में थे। कताई-बुनाई करना, लोहे के अस्त्र-शस्त्र बनाना आदि प्रमुख उद्योग थे। इत्र निकालना भी एक महत्त्वपूर्ण उद्योग था। समुद्र के तटवर्ती क्षेत्रों में नमक बनाने और मोती निकालने का उद्योग व्यापक स्तर पर किया जाता था। वास्तुकला, शिल्पकला और चित्रकला द्वारा भी अनेक लोग अपना जीविकोपार्जन करते थे। आंतरिक तथा विदेशी व्यापार उन्नत अवस्था में थे। व्यापारी शक्तिशाली संघों और निगमों में संगठित थे। अब्दुर्रज्ज़ाक के अनुसार विजयनगर साम्राज्य में तीन सौ बंदरगाह थे। विजयनगर की प्रसिद्धि विशेष रूप से मसालों, वस्त्रों एवं रत्नों के बाजारों के लिए थी। नूनिज के विवरण के अनुसार इसकी हीरे की खाने विश्व में सबसे बड़ी थीं। नगरों में अनेक बाजार होते थे, जिनमें व्यापारियों द्वारा व्यवसाय किया जाता था। विशेष वस्तुओं के पृथक बाजार होते थे। व्यापार से प्राप्त राजस्व राज्य की आय का एक महत्त्वपूर्ण साधन था। इस प्रकार की विवरण विजयनगर के जनसामान्य के जीवन के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी प्रदान करते हैं। |
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कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसे भवनों का स्थापत्य हमें उनके बनवाने वाले शासकों के विषय में क्या । बताता है? |
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Answer» विजयनगर के लगभग सभी शासकों की स्थापत्य कला में विशेष रुचि थी। मध्यकालीन अधिकांश राजधानियों के समान विजयनगर की संरचना में भी विशिष्ट भौतिक रूपरेखा तथा स्थापत्य शैली परिलक्षित होती है। अनेक पर्वतश्रृंखलाओं के मध्य स्थित विजयनगर एक विशाल शहर था। इसमें अनेक भव्य महल, सुन्दर आवास-स्थान, उपवन और झीलें थीं जिनके कारण नगर देखने में अत्यधिक आकर्षक एवं मनमोहक लगता था। बस्ती के दक्षिण-पश्चिमी भाग में शाही केन्द्र स्थित था जिसमें अनेक महत्त्वपूर्ण भवनों को बनाया गया था। लोटस महल अथवा कमल महल और हाथियों का अस्तबल इसी प्रकार की दो महत्त्वपूर्ण संरचनाएँ थीं। इन दोनों संरचनाओं से हमें उनके निर्माता शासकों की अभिरुचियों एवं नीतियों के विषय में पर्याप्त जानकारी मिलती है। शाही केन्द्र के भव्य महलों में सर्वाधिक सुन्दर कमल महल था। यह नामकरण इस महल की सुंदरता एवं भव्यता से प्रभावित होकर अंग्रेज़ यात्रियों द्वारा किया गया था। स्थानीय रूप से इस महल को चित्तरंजनी-महल के नाम से जाना जाता है। यह दो मंज़िलों वाला एक खुला चौकोर मंडप है। नीचे की मंज़िल में पत्थर का एक सुसज्जित अधिष्ठान है। ऊपर की मंज़िल में खिड़कियों वाले कई सुन्दर झरोखे हैं। कमल महल में नौ मीनारें थीं। बीच में सबसे ऊँची मीनार थी और आठ मीनारें उसकी भुजाओं के साथ-साथ थीं। महल की मेहराबों में इंडो-इस्लामी तकनीकों का स्पष्ट प्रभाव था, जो विज़यनगर शासकों की धर्म-सहनशीलता की नीति का परिचायक है। अभी तक विद्वान इतिहासकार इस विषय पर एकमत नहीं हो सके हैं कि इस महल का निर्माण किस प्रयोजन अथवा कार्य के लिए किया गया था। संभवत: यह एक परिषद भवन था, जहाँ राजा और उसके परामर्शदाता विचार-विमर्श के लिए मिलते थे। हाथियों का विशाल फीलखाना (हाथियों का अस्तबल अथवा रहने का स्थान) कमल महल के समीप ही स्थित था। फीलखाना की विशालता से स्पष्ट होता है कि विजय नगर के शासक अपनी सेना में हाथियों को अत्यधिक महत्त्व देते थे। उनकी विशाल एवं सुसंगठित सेना में हाथियों की पर्याप्त संख्या थी। फीलखाना की स्थापत्य कला शैली पर इस्लामी स्थापत्य कला शैली का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इसके निर्माण में भारतीय इस्लामी स्थापत्य कला शैली का अनुसरण किया गया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि विजय नगर के शासक धार्मिक दृष्टि से उदार एवं सहनशील थे। |
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कोई दो स्वतन्त्रता संकेतांक बताइए। |
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Answer» ऐसे संकेतांक हैं— |
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चीन में एक सन्तान नीति का महत्त्वपूर्ण निहितार्थ क्या है? |
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Answer» 1970 ई० के दशक के अन्त में चीन में एक सन्तान नीति लागू की गई थी। इस नीति के निम्नलिखित परिणाम सामने आए ⦁ चीन में जनसंख्या वृद्धि की गति बहुत धीमी हो गई। ⦁ चीन में लिंगानुपात (प्रति एक हजार पुरुषों में महिलाओं को अनुपात) में गिरावट आई। ⦁ यह अनुमान लगाया गया कि कुछ दशकों के बाद चीन में वयोवृद्ध लोगों की जनसंख्या का अनुपात युवा लोगों की अपेक्षा अधिक हो जाएगा। ⦁ चीन को सामाजिक सुरक्षा उपाय बढ़ाने होंगे। |
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पाकिस्तान में कब आर्थिक सुधार लागू किए गए?(क) सन् 1988 में(ख) सन् 1990 में(ग) सन् 2000 में(घ) सन् 1900 में |
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Answer» सही विकल्प है (क) सन् 1988 में। |
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विजयनगर की जल-आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था? |
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Answer» विजयनगर की जल-आवश्यकताओं को मुख्य रूप में तुंगभद्रा नदी से निकलने वाली धाराओं पर बाँध बनाकर पूरा किया जाता था। बाँधों से विभिन्न आकार के हौज़ों का निर्माण किया जाता था। इस हौज के पानी से न केवल आस-पास के खेतों को सींचा जा सकता था बल्कि इसे एक नहर के माध्यम से राजधानी तक भी ले जाया जाता था। कमलपुरम् जलाशय नामक हौज़ सबसे महत्त्वपूर्ण हौज़ था। तत्कालीन समय के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण जल संबंधी संरचनाओं में से एक, हिरिया नहर के भग्नावशेषों को आज भी देखा जा सकता है। इस नहर में तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाया जाता था और इस धार्मिक केंद्र से शहरी केंद्र को अलग करने वाली घाटी को सिंचित करने में प्रयोग किया जाता था। इसके अलावा झील, कुएँ, बरसत के पानी वाले जलाशय तथा मंदिरों के जलाशय सामान्य नगरवासियों के लिए पानी की आवश्यकताओं को पूरा करते थे। |
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चीन में एक सन्तान नीति कब लागू की गई?(क) सन् 1980 में(ख) सन् 1900 में(ग) सन् 1970 में(घ) सन् 1950 में |
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Answer» सही विकल्प है (ग) सन् 1970 में। |
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चीन ने जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए किस नीति का अनुसरण किया? |
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Answer» चीन ने जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए केवल एक सन्तान नीति’ का अनुसरण किया। |
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किन्हीं दो क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूहों के नाम बताइए। |
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Answer» क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह हैं- |
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उन विभिन्न कारकों का मूल्यांकन कीजिए जिनके आधार पर चीन में आर्थिक विकास में तीव्र वृद्धि (तीव्र आर्थिक विकास) हुई। |
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Answer» चीन में तीव्र आर्थिक विकास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं ⦁ विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के दिशा-निर्देशों के बिना ही चीन ने 1978 ई० में आर्थिक सुधारों को आरम्भ किया। ⦁ व्यापक भूमि सुधार, सामुदायिकीकरण और ग्रेट लीप फॉरवर्ड जैसी पहले (Initiatives) ली गईं। ⦁ स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में आधारिक संरचना का निर्माण किया गया, योजनाओं को विकेन्द्रीकरण किया गया, भू-सुधार कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू किया गया तथा लघु उद्योगों के विकास पर पर्याप्त बल दिया गया। ⦁ ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का बड़े व्यापक स्तर पर प्रसारण किया गया। ⦁ प्रत्येक सुधार को पहले छोटे स्तर पर लागू किया गया और बाद में उसे बड़े पैमाने पर लागू किया गया। उपर्युक्त सुधारों के कारण चीन की वार्षिक संवृद्धि दर में तेजी से वृद्धि हुई। |
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मानव विकास के विभिन्न संकेतकों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» मानव विकास के विभिन्न संकेतक निम्नलिखित हैं ⦁ प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद। |
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चीन, पाकिस्तान व भारत में से किस देश में कृषि निर्भरता सबसे अधिक है? |
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Answer» चीन, पाकिस्तान व भारत में से भारत में कृषि निर्भरता सबसे अधिक है। |
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चीन, पाकिस्तान और भारत में आर्थिक सुधारों का प्रेरणा-स्रोत क्या था? |
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Answer» चीन ने संरचनात्मक सुधारों का निर्णय स्वयं लिया था जबकि भारत और पाकिस्तान को अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने ऐसे सुधार करने के लिए बाध्य किया था। |
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पिछली दो शताब्दियों में हम्पी के भवनावशेषों के अध्ययन में कौन-सी पद्धतियों का प्रयोग किया गया है? आपके अनुसार यह पद्धतियाँ विरुपाक्ष मंदिर के पुरोहितों द्वारा प्रदान की गई जानकारी को किस प्रकार पूरक रहीं? |
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Answer» विजयनगर अर्थात् ‘विजय का शहर’ एक शहर तथा साम्राज्य दोनों के लिए प्रयुक्त नाम था। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई० में हरिहर तथा बुक्का राय नामक दो भाइयों ने की थी। 1565 ई० में तालीकोटा के युद्ध के परिणामस्वरूप होने वाली भयंकर लूटपाट के कारण विजयनगर निर्जन हो गया था। 17वीं-18वीं शताब्दियों तक पहुँचते-पहुँचते यह नगर पूरी तरह से विनाश को प्राप्त हो गया, फिर भी कृष्णा-तुंगभद्री दोआब क्षेत्र के निवासियों की स्मृतियों में यह जीवित बना रहा। उन्होंने इसे हम्पी नाम से याद रखा। आधुनिक कर्नाटक राज्य का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जिसे 1976 ई० में राष्ट्रीय महत्त्व के स्थान के रूप में मान्यता मिली। हम्पी के भग्नावशेषों के अध्ययन में पिछली दो शताब्दियों में अनेक पद्धतियों का प्रयोग किया गया है। ⦁ हम्पी के भग्नावशेषों के अध्ययन में सर्वप्रथम सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया गया। 1800 ई० में ब्रिटिश इस्ट इंडिया कम्पनी की सेवा में नियुक्त एक अभियंता एवं पुराविद् कर्नल कॉलिन मैकेन्जी द्वारा हम्पी के भग्नाशेषों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया। उन्होंने इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया। नि:संदेह ये पद्धतियाँ विरुपाक्ष मन्दिर के पुरोहितों द्वारा प्रदत्त सूचनाओं की पूरक थीं। उल्लेखनीय है कि मैकेन्जी द्वारा प्राप्त प्रारंभिक जानकारियाँ विरुपाक्ष मन्दिर और पम्पा देवी के मन्दिर के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थीं। उदाहरण के लिए, स्थानीय परंपराओं से पता चलता है कि तुंगभद्रा नदी के किनारे से लगे शहर के उत्तरी भाग की पहाड़ियों में स्थानीय मातृदेवी पम्पा देवी ने राज्य के संरक्षक देवता और शिव के एक रूप विरुपाक्ष से विवाह के लिए तपस्या की थी। विरुपाक्ष पम्पा की तपस्या से प्रसन्न होकर उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें हेमकूट में आने का निमंत्रण दिया। परिणय सूत्र में बँध जाने के बाद पम्पा ने विरुपाक्ष से अनुरोध किया कि उस स्थल का नामकरण उनके नाम के आधार पर किया जाए। विरुपाक्ष ने अनुरोध मान लिया और तब से इस स्थल का नाम पम्पा हो गया। हम्पी इसका बदला हुआ थानीय नाम है। आज भी प्रतिवर्ष विरुपाक्ष मन्दिर में इस विवाह समारोह का आयोजन अत्यधिक धूमधाम से किया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि चिरकाल से यह क्षेत्र अनेक धार्मिक मान्यताओं से संबद्ध था।। विद्वान इतिहासकारों का विचार है कि विजयनगर के स्थान का चुनाव वहाँ विरुपाक्ष और पम्पा देवी के मन्दिरों के अस्तित्व से प्रेरित होकर ही किया गया था। हमें याद रखना चाहिए कि विजयनगर के शासक विरुपाक्ष देवता के प्रतिनिधि के रूप में शासन करने का दावा करते थे। विजयनगर के सभी राजकीय आदेशों पर सामान्यतः कन्नड़ लिपि में ‘श्री विरुपाक्ष’ लिखा होता था। समकालीन स्रोतों से पता लगता है कि विजयनगर के शासक ‘हिन्दु सूरतराणा’ की उपाधि धारण करते थे, जो देवताओं से उनके घनिष्ठ संबंधों की परिचायक थी। |
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भारत और पाकिस्तान की एकसमान सफलताएँ और विफलताएँ क्या हैं? किन क्षेत्रों में पाकिस्तान का निष्पादन भारत से बेहतर है और किन क्षेत्रों में भारत का निष्पादन पाकिस्तान से बेहतर है? |
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Answer» भारत और पाकिस्तान की एकसमान सफलताएँ 1. भारत तथा पाकिस्तान दोनों ही देश प्रति व्यक्ति आय को दुगुना करने में सफल रहे हैं। भारत और पाकिस्तान की एकसमान विफलताएँ 1. दोनों ही देश एक ‘सकुशल अर्थव्यवस्था’ का निर्माण कर पाने में विफल रहे हैं। पाकिस्तान के बेतहर निष्पादन वाले क्षेत्र वे क्षेत्र जिनमें भारत का निष्पादन पाकिस्तान से बेहतर है, निम्नलिखित हैं |
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भारत सरकार ने कब आर्थिक सुधार लागू किए?(क) 1990 के दशक में ।(ख) 1980 के दशक में(ग) 2000 के दशक में ।(घ) 2010 के दशक में |
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Answer» सही विकल्प है (क) 1990 के दशक में। |
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| 32092. |
चीन में जनसंख्या वृद्धि की धीमी दर का क्या कारण रहा है? |
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Answer» 1970 ई० के दशक के अन्त में चीन में केवल एक सन्तान नीति’ को लागू करना। |
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| 32093. |
चीन, भारत व पाकिस्तान के जी०डी०पी० में किस क्षेत्र का योगदान सर्वाधिक है? |
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Answer» चीन में विनिर्माण क्षेत्रक का तथा भारत व पाकिस्तान में सेवा क्षेत्रक का योगदान सर्वाधिक है। |
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वे विभिन्न साधन कौन-से हैं जिनकी सहायता से देश अपनी घरेलू अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने का प्रयत्न कर रहे हैं ? |
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Answer» विभिन्न देश अपनी घरेलू अर्थव्यवस्थाओं को निम्न साधनों से मजबूत बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं ⦁ विभिन्न प्रकार के क्षेत्रीय एवं वैश्विक आर्थिक समूहों का निर्माण करके जैसे सार्क (SAARC), आसियान (ASEAN), जी-8 (G-8), यूरोपीय संघ (EU) आदि।। ⦁ अपनी अर्थव्यवस्था में आर्थिक सुधारों को अपनाकर अर्थात् वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अपनाकर। ⦁ अपने पड़ोसी राष्ट्रों द्वारा अपनाई गई विकासात्मक प्रक्रियाओं को समझकर। ⦁ अपने पड़ोसी देशों की शक्तियों एवं कमजोरियों को बेहतर ढंग से समझकर। ⦁ वैश्वीकरण के प्रभावों का आकलन करके। |
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चीन में तीव्र औद्योगिक संवृद्धि दर का मुख्य कारण क्या था? |
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Answer» चीन में तीव्र औद्योगिक संवृद्धि दर का मुख्य कारण 1978 ई० में लागू किए गए ‘सुधार कार्यक्रम' |
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1958 में प्रारम्भ की गई चीन के ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ (महान प्रगति उछाल) अभियाष की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» ‘महान् प्रगति उछाल’ (Great Leap Forward: GLF) 1958 ई० में चीन में आरम्भ किया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य बड़े पैमाने पर देश का औद्योगीकरण करना था। इस अभियान के अन्तर्गत सरकार ने एक ऐसी सामाजिक जागृति को प्रोत्साहित किया जिसके द्वारा लोग औद्योगीकरण (उद्योगों की स्थापना) की ओर आकर्षित हुए। इसके अन्तर्गत लोगों को अपने घरों के पिछवाड़े खाली स्थानों पर उद्योग लगाने को प्रोत्साहित किया गया। इस अभियान के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे ⦁ समष्टि स्तर पर औद्योगीकरण को प्रोत्साहित करना। ⦁ लोगों को अपने घरों के पिछवाड़े, खाली स्थानों पर उद्योग लगाने को प्रोत्साहित करना। ⦁ ग्रामीण क्षेत्रों में सामूहिक खेती’ (commune) को प्रोत्साहित करना। ⦁ रूस और चीन के मध्य संघर्ष हो गया और रूस ने अपने उन सभी विशेषज्ञों को वापस बुला लिया जिन्हें औद्योगीकरण की प्रक्रिया के लिए सहायता करने के लिए चीन भेजा गया था। |
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भारत व पाकिस्तान की दो समान नीतियाँ बताइए। |
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Answer» भारत व पाकिस्तान की दो समान नीतियाँ थीं |
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आर्थिक व सामाजिक प्रगति की दृष्टि से चीन व भारत की तुलना कीजिए। |
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Answer» चीन व भारत की तुलनात्मक प्रगति चीन में भारत का मुख्य बिन्दुओं को विवेचन निम्न प्रकार है ⦁ यद्यपि दोनो ही देश आकार व जनसंख्या की दृष्टि से विशाल हैं, भारत की वृद्धि दर चीन की वृद्धि | दर से कम है तथा इसमें व्यापक उतार-चढ़ाव की प्रवृत्ति भी पाई जाती है। ⦁ चीन में सुधार की प्रक्रिया अस्सी के दशक में प्रारम्भ हुई जबकि भारत में सुधार की प्रक्रिया 1990 के दशक में प्रारम्भ हुई। |
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इस अध्याय में वर्णित सूफ़ी व देव स्थलों से संबद्ध तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में अधिक जानकारी हासिल कीजिए। क्या यह यात्राएँ अभी भी की जाती हैं? इन स्थानों पर कौन लोग और कब-कब जाते हैं? वे यहाँ क्यों जाते हैं? इन तीर्थयात्राओं से जुड़ी गतिविधियाँ कौन-सी हैं? |
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Answer» ख्वाजा मुइनुद्दीन की अजमेर स्थित दरगाह विश्व प्रसिद्ध है। यह दरगाह मुइनुद्दीन चिश्ती की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा तथा उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता और राजसी मेहमानों द्वारा दिए गए प्रश्रय के कारण लोकप्रिय थी। मुहम्मद बिन तुगलक पहला सुल्तान था जिसने इस दरगाह की यात्रा की थी। मुगल सम्राट अकबर ने यहाँ 14 बार यात्रा की। मुगल शहजादी जहाँआरा ने अपने पिता शाहजहाँ के साथ 1643 में अजमेर शरीफ की तीर्थयात्रा की जिसका वर्णन उसने बड़े ही ओजस्वी भाषा में किया है। 18वीं शताब्दी में दक्कन के कुली खान ने शेख नसीरुद्दीन चिराग-ए-देहली की दरगाह के बारे में मुक्का-ऐ-देहली में लिखा कि शेख सिर्फ दिल्ली के ही चिराग नहीं अपितु सारे मुल्क के चिराग हैं। खासतौर पर रविवार के दिन यहाँ लोगों का हुजूम आता है। दीवाली के महीने में दिल्ली की सारी आबादी दरगाह पर उमड़ पड़ती है। यहाँ हिंदू और मुसलमान एक ही भावना से आते हैं। दाता गंज बक्श की दरगाह लाहौर में स्थित है। सुल्तान महमूद के पोते ने उनकी मजार पर दरगाह बनवाई है। यह दरगाह उनकी बरसी के अवसर पर उनके अनुयायियों के लिए तीर्थस्थल बन गई। आज भी हुजविरी दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय हैं और उनकी दरगाह को दाता दरबार कहा जाता है। अपनी यात्रा के दौरान अलवार और नयनार संतों ने कुछ पावन स्थलों को अपने इष्ट का निवास स्थल घोषित किया। इन्हीं स्थलों पर कालांतर में विशाल मंदिरों का निर्माण हुआ और वे तीर्थस्थल बन गए। अनुष्ठानों के समय इन मंदिरों में संत कवियों द्वारा भजन गाया जाता था और साथ-साथ इन संतों की प्रतिमा की भी पूजा की जाती थी। |
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पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस रूप से भिन्न थी? |
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Answer» पहाड़िया लोग राजमहल की पहाड़ियों के आस-पास रहते थे। संथालों को ब्रिटिश अधिकारियों ने जमीनें देकर राजमहल को तलहटी में बसने के लिए तैयार किया था। उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश अधिकारियों की नीति कृषि भूमि का विस्तार करके कंपनी । के राजस्व में वृद्धि करने की थी। इसके लिए उन्होंने राजमहल की पहाड़ियों में रहने वाले पहाड़िया लोगों को एक स्थान पर रहकर स्थायी खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया था। किंतु पहाड़िया लोग जंगलों को काटकर स्थायी कृषि करने के लिए। तैयार नहीं हुए। अतः ब्रिटिश अधिकारियों ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संथालों को वहाँ बसा दिया। पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से कई रूपों में भिन्न थी 1. पहाड़िया लोग झूम खेती करते थे और जंगल के उत्पादों से अपना जीविकोपार्जन करते थे। जंगल के छोटे से भाग में झाड़ियों को काटकर तथा घास-फूस को जलाकर वे ज़मीन साफ़ कर लेते थे। राख की पोटाश से ज़मीन पर्याप्त उपजाऊ बन जाती थी। पहाड़िया लोग उस ज़मीन पर अपने खाने के लिए विभिन्न प्रकार की दालें और ज्वार-बाजरा उगाते थे। इस प्रकार वे अपनी आजीविका के लिए जंगलों और चरागाहों पर निर्भर थे। किंतु संथाल स्थायी खेती करते थे। उन्होंने अपने परिश्रम से अपने कृषि क्षेत्र की सीमाओं में पर्याप्त वृद्धि करके इसे एक उपजाऊ क्षेत्र के रूप में बदल दिया था। 2. पहाड़िया लोगों की खेती मुख्य रूप से कुदाल पर आश्रित थी। वे कुदाल से जमीन को थोड़ा खुरच लेते थे और कुछ वर्षों तक उस साफ़ की गई ज़मीन में खेती करते रहते थे। तत्पश्चात् वे उसे कुछ वर्षों के लिए परती छोड़ देते थे और नए क्षेत्र में जमीन तैयार करके खेती करते थे। कुछ समय के बाद परती छोड़ी गई जमीन अपनी खोई हुई उर्वरता को प्राप्त करके पुनः खेती योग्य बन जाती थी। संथाल हल से खेती करते थे। वे नई ज़मीन साफ करने में अत्यधिक कुशल थे। अपने परिश्रम से उन्होंने चट्टानी भूमि को भी अत्यधिक उपजाऊ बना दिया था। 3. कृषि के अतिरिक्त जंगल के उत्पाद भी पहाड़िया लोगों की आजीविका के साधन थे। जंगल के फल-फूल उनके भोजन के महत्त्वपूर्ण अंग थे। वे खाने के लिए महुआ के फूल एकत्र करते थे। वे काठ कोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ एकत्र करते थे। रेशम के कोया (रेशम के कीड़ों का घर या घोंसला) एवं राल इकट्ठी करके बेचते थे। पेड़ों के नीचे उगने वाले छोटे-छोटे पौधे अथवा परती जमीन पर उगने वाली घास-फूस उनके पशुओं के चारे के काम आती थी। इस प्रकार शिकार करना, झूम खेती करना, खाद्य संग्रह, काठ कोयला बनाना, रेशम के कीड़े पालना आदि पहाड़िया लोगों के मुख्य व्यवसाय थे। खानाबदोश जीवन को छोड़कर एक स्थान पर बस जाने के कारण संथाल स्थायी खेती करने लगे थे, वे बढ़िया तम्बाकू और सरसों जैसी वाणिज्यिक फसलों को उगाने लगे थे। परिणामस्वरूप, उनकी आर्थिक स्थिति उन्नत होने लगी और वे व्यापारियों एवं साहूकारों के साथ लेन-देन भी करने लगे। 4. अपने व्यवसायों के कारण उनका जीवन जंगल से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ था। वे सीधा-सादा जीवन व्यतीत करते थे और प्रकृति की गोद में निवास करते थे। वे इमली के पेड़ों के झुरमुटों में अपनी झोंपड़ियाँ बनाते थे और आम के पेड़ों की ठंडी छाँव में आराम करते थे। संपूर्ण क्षेत्र की भूमि को वे अपनी निजी भूमि समझते थे। यह भूमि ही उनकी पहचान तथा जीवन का प्रमुख आधार थी। पहाड़िया लोग समूहों में संगठित थे। प्रत्येक समूह का एक मुखिया होता था। उसका प्रमुख कार्य अपने समूह में एकता बनाए रखना था। मुखिया अपने-अपने समूह के पारस्परिक झगड़ों का निपटारा करके उनमें शांति बनाए रखते थे। वे अन्य जनजातियों अथवा मैदानी लोगों के साथ संघर्ष की स्थिति में अपनी जनजाति का नेतृत्व भी करते थे। संथाल एक क्षेत्र विशेष में रहते थे। 1832 ई० तक एक विशाल भू-क्षेत्र का सीमांकन दामिन-ए-कोह अथवा संथाल परगना के रूप में कर दिया गया था। इस क्षेत्र को संथाल भूमि घोषित कर दिया गया और इसके चारों तरफ खंभे लगाकर इसकी परिसीमा का निर्धारण कर दिया गया। 5. पहाड़िया लोग उन मैदानी भागों पर बार-बार आक्रमण करते रहते थे, जहाँ किसानों द्वारा एक स्थान पर बसकर स्थायी खेती की जाती थी। इस प्रकार के आक्रमण प्रायः अभाव अथवा अकाल के वर्षों में खाद्य-सामग्री को लूटने, शक्ति का प्रदर्शन करने अथवा बाहरी लोगों के साथ राजनैतिक संबंध स्थापित करने के लिए किए जाते थे। इस प्रकार मैदानों में रहने वाले लोग प्रायः पहाड़िया लोगों के आक्रमणों से भयभीत रहते थे। मैदानों में रहने वाले जमींदार पहाड़िया लोगों के आक्रमणों से बचाव के लिए पहाड़िया मुखियाओं को नियमित रूप से खिराज का भुगतान करते थे। व्यापारियों को भी पहाड़िया लोगों द्वारा नियंत्रित मार्गों का प्रयोग करने के लिए पथकर का भुगतान करना पड़ता था। किंतु संथाल लोगों के जमींदारों और व्यापारियों के साथ संबंध प्रायः मैत्रीपूर्ण होते थे। वे व्यापारियों एवं साहूकारों के साथ लेन-देन भी करते थे। |
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