This section includes InterviewSolutions, each offering curated multiple-choice questions to sharpen your knowledge and support exam preparation. Choose a topic below to get started.
| 32001. |
रेतीला तूफान या काला तूफान क्या है? |
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Answer» अमेरिका में गेहूं की खेती का विस्तार 1930 ई. के दशक में भयानक रेतीले तूफानों का कारण बना। 1930 ई. के दशक में दक्षिण अमेरिकी मैदानों में आने वाली तबाही फैलाने वाले भयानक रेतीले तूफानों को ‘काला तूफान कहा गया। |
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| 32002. |
रेतीले तूफानों के परिणाम बताइए। |
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Answer» रेतीले तूफानों के आने से प्रभावित क्षेत्र में अँधेरा छा जाता था और ऊपर से रेत गिरता था जिससे लोग अन्धे हो जाते थे और लोगों का दम घुटने लगता था। पशु बड़ी संख्या में दम घुटने से मारे जाते थे। ट्रैक्टर और मशीने रेत के ढेरों में फंसकर इतने बेकार हो गए थे कि उनकी मरम्मत कर पाना संभव नहीं था। |
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| 32003. |
बर्नियर के वृत्तांत से उभरने वाले शहरी केंद्रों के चित्र पर चर्चा कीजिए। |
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Answer» बर्नियर मुगलकालीन शहरों को ‘शिविर नगर’ कहता है, जिससे उसका आशय उन नगरों से था जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे। उसका विश्वास था कि ये राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते थे और इसके कहीं और चले जाने के बाद तेजी से पतनोन्मुख हो जाते थे। उसने यह भी सुझाया कि इनकी सामाजिक और आर्थिक नींव व्यवहार्य नहीं होती थी और ये राजकीय प्रश्रय पर आश्रित रहते थे। वास्तव में, सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे— |
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| 32004. |
इब्न बतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोणों से भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे थे, उनकी तुलना कीजिए तथा अंतर बताइए। |
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Answer» जहाँ इन बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित किया और उत्सुक किया, वहीं बर्नियर एक भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से संबंधित था। उसने भारत में जो भी देखा, वह उसकी सामान्य रूप से यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस में व्याप्त स्थितियों से तुलना तथा भिन्नता को उजागर करने के प्रति अधिक चिंतित था, विशेष रूप से वे स्थितियाँ जिन्हें उसने अवसादकारी पाया। उसका विचार नीति-निर्माताओं तथा बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करने का था ताकि वे ऐसे निर्णय ले सकें जिन्हें वह ‘सही’ मानता था। बर्नियर के ग्रंथ ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ अपने गहन प्रेक्षण, आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि तथा गहन चिंतन के लिए उल्लेखनीय है। उसके वृत्तांत में की गई चर्चाओं में मुग़लों के इतिहास को एक प्रकार के वैश्विक ढाँचे में स्थापित करने का प्रयास किया गया। वह निरंतर मुगलकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से करता रहा, सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता को रेखांकित करते हुए। उसका भारत का चित्रण द्वि-विपरीतता के नमूने पर आधारित है, जहाँ भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाया गया है, या फिर यूरोप का ‘विपरीत’ जैसा कि कुछ इतिहासकार परिभाषित करते हैं। उसने जो भिन्नताएँ महसूस कीं, उन्हें भी पदानुक्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया, जिससे भारत, पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का प्रतीत हो। |
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| 32005. |
इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के संबंध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिए। |
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Answer» इब्न बतूता के अनुसार, बाजारों में दासे किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुलेआम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप एक-दूसरे को दिए जाते थे। जब इब्न बतूता सिंध पहुँचा तो उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक के लिए भेंटस्वरूप ‘घोड़े, ऊँट तथा दास’ खरीदे। जब वह मुल्तान पहुँचा तो उसने गवर्नर को ‘किशमिश बादाम के साथ एक दास और घोड़ा’ भेंट के रूप में दिए। इब्न बतूता बताता है कि मुहम्मद-बिन-तुगलक नसीरुद्दीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से इतना प्रसन्न हुआ कि उसे ‘एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास’ दे दिए। इब्न बतूता के विवरण से प्रतीत होता है कि दासों में काफी विभेद था। सुल्तान की सेवा में कार्यरत कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं। सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। दासों को सामान्यतः घरेलू श्रम के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था, और इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को, पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। दासों की कीमत, विशेष रूप से उन दासियों की, जिनकी आवश्यकता घरेलू श्रम के लिए थी, बहुत कम होती थी और अधिकांश परिवार जो उन्हें रख पाने में समर्थ थे, कम-से-कम एक या दो तो रखते ही थे। |
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| 32006. |
सती प्रथा के कौन-से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा? |
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Answer» उल्लेखनीय है कि यूरोपीय यात्रियों एवं लेखकों ने उन बातों का विस्तृत वर्णन करने में अधिक रुचि दिखाई थी, जो उन्हें किंतु अधिकांश को ऐसा करने के लिए विवश कर दिया जाता था। लाहौर में एक बालिका के सती होने की घटना का अत्यधिक मार्मिक विवरण देते हुए उसने लिखा है, “लाहौर में मैंने एक बहुत ही सुन्दर अल्पवयस्क विधवा जिसकी आयु मेरे विचार में बाहर वर्ष से अधिक नहीं थी, की बलि होते देखी। उस भयानक नर्क की ओर जाते हुए वह असहाय छोटी बच्ची जीवित से अधिक मृत प्रतीत हो रही थी; उसके मस्तिष्क की व्यथा का वर्णन नहीं किया जा सकता; वह काँपते हुए बुरी तरह से रो रही थी; लेकिन तीन-चार ब्राह्मण, एक बूढ़ी औरत, जिसने उसे अपनी आस्तीन के नीचे दबाया हुआ था, की सहायता से उस अनिच्छुक पीड़िता को घातक स्थल की ओर ले गए। उसे लकड़ियों पर बैठाया; उसके हाथ-पाँव बाँध दिए ताकि वह भाग न जाए और इस स्थिति में उस मासूम प्राणी को जिन्दा जला दिया गया। मैं अपनी भावनाओं को दबाने में असमर्थ था….” इस विवरण से स्पष्ट होता है कि सती प्रथा के अन्तर्गत सती होने वाली महिलाओं की अल्पवयस्कता, अनीच्छा, व्यथा, विवशता एवं असहायता जैसे तत्वों ने बर्नियर का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया था। |
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| 32007. |
चर्चा कीजिए कि बर्नियर का वृत्तांत किस सीमा तक इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निर्मित करने में सक्षम करता है? |
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Answer» बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भू-स्वामित्व का अभाव था। उसका निजी स्वामित्व के गुणों में दृढ़ विश्वास था और उसने भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक माना। उसे यह लगा कि मुगल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था जो इसे अपने अमीरों के बीच बाँटता था, जिससे अर्थव्यवस्था और समाज के लिए अनर्थकारी परिणाम सामने आते थे। इस प्रकार का अवबोधन बर्नियर तक ही सीमित नहीं था बल्कि सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के अधिकांश यात्रियों के वृत्तांतों में मिलता है। राजकीय भू-स्वामित्व के कारण बर्नियर तर्क देता है कि भू-धारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और उसमें बढ़ोत्तरी के दिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे। इस प्रकार निजी भू-स्वामित्व के अभाव ने ‘बेहतर’ भू-धारकों के वर्ग के उदय (जैसा कि पश्चिमी यूरोप में) को रोका जो भूमि के रख-रखाव व बेहतरी के प्रति सजग रहते। इसी के चलते कृषि का समान रूप से विनाश, किसानों का उत्पीड़न तथा समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में अनवरत पतन की स्थिति उत्पन्न हुई है, सिवाय शासक वर्ग के। बर्नियर भारतीय समाज को दरिद्र लोगों के समरूप जनसमूह से बना वर्णित करता है, जो एक बहुत अमीर तथा शक्तिशाली शासक वर्ग, जो अल्पसंख्यक होते हैं, के द्वारा अधीन बनाया जाता है। गरीबों में सबसे गरीब तथा अमीरों में सबसे अमीर व्यक्ति के बीच नाममात्र का भी कोई सामाजिक समूह या वर्ग नहीं था। बर्नियर बहुत विश्वास से कहता है, “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं हैं।” बर्नियर के विवरणों ने अठाहरवीं शताब्दी के पश्चिमी विचारकों को काफी प्रभावित किया। उदाहरण के लिए, फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत का प्रयोग प्राच्य निरंकुशवाद के सिद्धांत को विकसित करने में किया, जिसके अनुसार एशिया में शासक अपनी प्रजा के ऊपर निर्बाध प्रभुत्व का उपभोग करते थे। प्रजा को दासता और गरीबी की स्थितियों में रखा जाता था। इस तर्क का आधार यह था कि सारी भूमि पर राजा का स्वामित्व होता था तथा निजी संपत्ति अस्तित्व में नहीं थी। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजा और उसके अमीर वर्ग को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति मुश्किल से गुजर-बसर कर पाता था। कार्ल मार्क्स ने यह तर्क दिया कि भारत तथा अन्य एशियाई देशों में उपनिवेशवाद से पहले अधिशेष का अधिग्रहण राज्य द्वारा होता था। इससे एक ऐसे समाज का उद्भव हुआ जो बड़ी संख्या में स्वायत्त तथा (आंतरिक रूप से) समतावादी ग्रामीण समुदायों से बना था। इन ग्रामीण समुदायों पर राजकीय दरबार का नियंत्रण होता था और जब तक अधिशेष की आपूर्ति निर्विघ्न रूप से जारी रहती थी, इनकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाता था। यह एक निष्क्रिय प्रणाली मानी जाती थी। ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था। बल्कि सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में ग्रामीण समाज में चारित्रिक रूप से बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था। एक ओर बड़े जमींदार थे जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे और दूसरी ओर ‘अस्पृश्य’ भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार)। इन दोनों के बीच बड़ा किसान था जो किराए के श्रम का प्रयोग करता था और माल उत्पादन में संलग्न रहता था; साथ ही अपेक्षाकृत छोटे किसान भी थे जो मुश्किल से ही निर्वहन लायक उत्पादन कर पाते थे। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि बर्नियर का वृत्तांत समकालीन ग्रामीण समाज के पुर्निर्माण में इतिहासकारों की अधिक सहायता नहीं करता। इसका प्रमुख कारण यह है कि उसका भारत संबंधी विवरण पक्षपातपूर्ण है तथा द्वि-विपरीतता के नमूने । पर आधारित है, जिसमें भारत को यूरोप के ‘प्रतिलोम’ के रूप में वर्णित किया गया है। वास्तव में, बर्नियर का मुख्य उद्देश्य पूर्व और पश्चिम का तुलनात्मक अध्ययन करना था। परिणामस्वरूप उसके द्वारा भारत को ‘अल्पविकसित पूर्व के रूप में चित्रित किया गया है। |
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| 32008. |
भारतीय किसान अफीम की खेती के प्रति क्यों उदासीन थे? |
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Answer» भारतीय किसान निम्नलिखित कारणों से अफीम की खेती करने के प्रति उदासीन थे- ⦁ जिन किसानों के पास अपनी भूमि नहीं थी। वे जमींदारों से भूमि पट्टे पर लेकर खेती करते थे। इसके लिए उन्हें किराया देना पड़ता। गाँव के निकट स्थित अच्छी भूमि के लिए जमींदार बहुत अधिक किराया वसूल करते थे। ⦁ अफीम की खेती गाँवों के निकट स्थित सबसे उपजाऊ भूमि पर उगानी पड़ती थी। भूमि में अत्यधिक खाद भी डालनी पड़ती थी। किसान ऐसी भूमि पर प्रायः दालें उगाया करते थे। यदि वे इस भूमि पर अफीम उगाते, तो दालों को घटिया भूमि पर उगाना पड़ता। परिणामस्वरूप दालों का उत्पादन बहुत ही कम होता। ⦁ अफीम की खेती करना एक कठिन प्रक्रिया थी। इसका पौधा नाजुक होता था इसलिए फसल को अच्छी तरह पोषण करने के लिए बहुत अधिक समय लग जाता था। परिणामस्वरूप उनके पास अन्य फसलों की देखभाल करने के लिए समय नहीं बच पाता था। ⦁ सरकार किसानों को उनके द्वारा उगाई गई अफीम का बहुत ही कम मूल्य देती थी। इतनी कम कीमत पर अफीम की खेती करने में किसानों को लाभ की बजाय हानि उठानी पड़ती थी। अफीम को बेचने से होने वाला लाभ अंग्रेजों की जेब में जाता था। |
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| 32009. |
1750 से 1900 ई. के मध्य इंग्लैण्ड की जनसंख्या कितने गुना बढ़ी थी? |
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Answer» इंग्लैण्ड की जनसंख्या में 1750 से 1900 ई० की अवधि के बीच चार गुना की वृद्धि हुई |
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| 32010. |
संयुक्त राज्य अमेरिका में गेहूं के उत्पादन में तेजी से हुई वृद्धि का वर्णन कीजिए। |
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Answer» 19वीं सदी के अंत में संयुक्त राज्य अमेरिका के गेहूँ उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई तथा इसका वैश्विक निर्यात भी बढ़ा। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान विश्व बाजार में तेजी आई। रूसी गेहूँ की आपूर्ति बंद कर दी गई और अमेरिका को यूरोप के गेहूँ की आपूर्ति करनी पड़ी। अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने किसानों को गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया। 1910 ई० में अमेरिका की 4.5 करोड़ एकड़ जमीन पर गेहूं की खेती की जा रही थी। नौ वर्ष के बाद गेहूंउत्पाद का क्षेत्रफल लगभग 65 प्रतिशत से बढ़कर 7.4 करोड़ एकड़ हो गया था। माँग बढ़ने के साथ गेहूँ के दामों में भी उछाल आ रहा था। इससे उत्साहित होकर किसान गेहूँ उगाने की तरफ झुकने लगे। रेलवे के प्रसार से खाद्यान्नों को गेहूँ उत्पादक क्षेत्रों से निर्यात के लिए पूर्वी तट पर ले जाना आसान हो गया था। अमेरिका के राष्ट्रपति विल्सन ने किसानों से वक्त की पुकार सुनने का आह्वान किया‘खूब गेहूं उपजाओ। गेहूँ ही हमें जंग जिताएगा।” 1910 ई0 में अमेरिका की 4.5 करोड़ एकड़ जमीन पर गेहूं की खेती की जा रही थी। नौ साल बाद 1919 ई. में गेहूँ। उत्पादन का क्षेत्रफल बढ़कर 7.4 करोड़ एकड़ यानी लगभग 65 प्रतिशत ज्यादा हो गया था। इसमें से ज्यादातर वृद्धि विशाल मैदानों (ग्रेट प्लेस) में हुई थी। |
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| 32011. |
पश्चिमी अमेरिका में कृषि भूमि विस्तार और रेतीले तूफान का अन्तर्सम्बन्ध प्रकट कीजिए। |
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Answer» कृषि भूमियों के विस्तार से पूर्व अमेरिका का अधिकांश भाग वनों एवं घास भूमियों से ढका हुआ था। मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन वनों एवं घास भूमियों को साफ करके गेहूं के खेतों में बदल दिया। इन क्षेत्रों में गेहूँ। के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई जिसके कारण अमेरिका के विशाल मैदानों को ‘रोटी का कटोरा’ कहा जाने लगा। गेहूं की खेती का विस्तार 1930 ई0 के दशक में भयानक रेतीले तूफानों का कारण बना। अमेरिका के दक्षिणी मैदानों पर भयानक रेतीले तूफान आने लगे। इन्हें काले तूफान के नाम से जाना जाने लगा। काले रेतीले तूफान 7,000 से 8,000 फुट ऊँचे होते थे। ये गंदे पानी की भीमकाय लहरों की तरह प्रकट होते थे। 1930 ई0 के दशक में ऐसे तूफान प्रतिदिन एवं प्रतिवर्ष आते थे। जैसे ही आसमान में अंधेरा होता और रेत गिरता, रेत के कारण लोग अंधे हो जाते तथा उनका दम घुटने लगती। पशु दम घुटने के कारण मारे जाते, उनके फेफड़ों में रेत और कीचड़ भर जाता। रेत से खेतों की मेड़े (खेतों को एक-दूसरे खेत से अलग करने के लिए) गुम हो जातीं, खेत रेत से पट जाते तथा यह रेत नदी की सतह पर इस तरह जम जाती थी कि मछलियाँ साँस न ले पाने के कारण मर जाती थीं। मैदानों में चारों ओर पक्षियों और पशुओं की हड्डयाँ बिखरी दिखाई देती थीं। ट्रैक्टर और मशीनें अब रेत के ढेरों में फंस कर इतने बेकार हो गए थे कि उनकी मरम्मत भी नहीं की जा सकती थी। वर्षा में प्रतिवर्ष कमी होती गयी और लोगों को सूखे का सामना करना पड़ा। इस तरह रोटी का कटोरा शीघ्र ही धूल के कटोरे में परिवर्तित हो गया। ये समस्त मौसमी परिवर्तन वनस्पति आवरण के समाप्त होने का परिणाम थे। किसानों ने अधिक-से-अधिक कृषि-क्षेत्र प्राप्त करने के लालच में वनस्पति के आवरण को बुरी तरह नष्ट कर दिया था। मिट्टी को उलट-पुलट दिया गया था और उसमें फैंसी घास को जड़ों से उखाड़ दिया गया था। |
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| 32012. |
भारतीय किसान अफीम की खेती करने को कैसे तैयार हो गए? |
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Answer» ⦁ अंग्रेजों ने भारतीय किसानों से अफीम की खेती करवाने के लिए उन्हें अग्रिम धन का भुगतान किया जिसे पेशगी कहते थे। इसका आशय यह है कि अंग्रेजों ने अग्रिम धन भुगतान का प्रलोभन देकर किसानों को अपने जाल में फैंसाया। ⦁ उस समय बंगाल और बिहार में किसानों का एक बड़ा वर्ग आर्थिक संकट से गुजर रहा था, ऐसे में पेशगी में दिए धन ने उन्हें कमजोर बनाया। ⦁ 1790 ई0 के दशक में सरकार ने गाँव के मुखिया के माध्यम से किसानों को अफीम उगाने के लिए अग्रिम धनराशि (एडवांस) देनी आरंभ कर दी। इससे किसानों की ऋणग्रस्तता में कमी आई परंतु अग्रिम धनराशि लेने के पश्चात् किसान किसी अन्य व्यापारी को अपनी अफीम नहीं बेच सकते थे। ⦁ एक बार फसल को बोने के उपरांत किसान का उसे फसल पर कोई अधिकार नहीं होता था। इस व्यवस्था का सबसे बुरा पक्ष यह था कि फसल के दाम भी एजेंटों द्वारा निर्धारित किए जाते थे जोकि सामान्यतः बाजार भाव से बहुत कम होते थे। |
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| 32013. |
किस प्रकार अमेरिका में अप्रवासियों का पश्चिम की ओर प्रसार होने के कारण अमेरिकी इण्डियनों को पूरी तरह विनाश हो गया? |
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Answer» सन् 1775 से 1783 ई0 तक अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम चला। संयुक्त राज्य अमेरिका के गठन के बाद पूर्वी तट से देखने पर अमेरिका पूरी तरह संभावनाओं से भरपूर दिखता था। 1783 ई० तक सात लाख के लगभग श्वेत पश्चिम की ओर दरों के रास्ते अपलेशियन पठारी क्षेत्र में जाकर बस चुके थे। अमेरिका में अप्रवासियों के पश्चिम की ओर प्रसार होने के कारण अमेरिकी इंडियनों का पूरी तरह विनाश हो गया जिन्हें पहले मिसीसिपी नदी के पार और बाद में और भी पश्चिम की ओर खदेड़ दिया गया। उन्होंने वापसी के लिए संघर्ष किया किन्तु हरा दिए गए। बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ी गईं जिनमें इंडियन लोगों की हत्या किया गया। उनके गाँवों को जला दिया गया और पशुओं को मार डाला गया। | उन्होंने जंगल साफ करके बनाई गई जगहों पर लकड़ी के केबिन बना लिए। फिर उन्होंने बड़े क्षेत्र में जंगलों को साफ करके खेतों के चारों ओर बाड़े लगा दीं इसके बाद इस जमीन की जुताई की और इस जमीन पर उन्होंने मक्का और गेहूँ बो दिया। |
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| 32014. |
वे दो फसलें कौन-सी हैं जिनसे मृदा में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है? |
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Answer» मृदा में नाइट्रोजन की वृद्धि करने वाली दो फसलें शलजम और तिपतिया घास है। |
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| 32015. |
बाड़बंदी से क्या आशय है? 18वीं सदी में इंग्लैण्ड में जमीन की बाड़बंदी क्यों की गयी? |
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Answer» इंग्लैण्ड में बाड़बंदी से 18वीं सदी में आशय उस भूमि से था जिसमें भूमि के एक टुकड़े को चारों ओर से बाड़ के माध्यम से घेरा गया हो और जिसके चारों ओर बाड़ लगाई गयी हो। ऐसा करने से एक की भूमि दूसरे से पृथक् हो जाती थी। जमीन को अन्न के उत्पादन को बढ़ाने के लिए घेरा गया था ताकि इंग्लैण्ड की बढ़ती हुई जनसंख्या का भरण-पोषण किया जा सके जो कि 1750 और 1950 के बीच के समय में चार गुना बढ़कर 1750 में 70 लाख की जनसंख्या से बढ़कर 1850 में 2 करोड़ दस लाख एवं 1900 ई० में 3 करोड़ हो गई थी। इसने जनसंख्या का पेट भरने के लिए अनाज की माँग में वृद्धि कर दी। ब्रिटेन में औद्योगीकरण के कारण शहरी जनसंख्या में वृद्धि हो गई। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग काम की खोज में शहरों में प्रवास कर गए। जिंदा रहने के लिए उन्हें बाजार से अनाज खरीदना पड़ता था जिससे बाजारों का विस्तार हुआ और अंततः अनाज की कीमतें बढ़ गईं। अठारहवीं सदी के अंत तक फ्रांस का इंग्लैण्ड के साथ युद्ध छिड़ चुका था। इसने यूरोप से आयात किए जाने वाले अनाज एवं व्यापार में व्यवधान डाला। अनाज के दाम बढ़ गए जिसने जमींदारों को बाड़बंदी के लिए प्रोत्साहित किया। लंबे समय के लिए जमीन में निवेश करने एवं भूमि की उर्वरता को बनाए रखने के लिए अदल-बदल कर फसल बोने की योजना बनाने के लिए बाड़बंद करना जरूरी था। इसलिए संसद ने बाड़बंदी अधिनियम पारित किया। |
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| 32016. |
इंग्लैण्ड में हुए बाड़बंदी आंदोलन के कारणों की संक्षेप में व्याख्या करें। |
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Answer» इंग्लैण्ड में बाड़बंदी आंदोलन को प्रोत्साहित करने वाले सभी कारण अंततः लाभ कमाने के उद्देश्य से प्रेरित थे। इनमें से कुछ कारक इस प्रकार थे- ⦁ पौष्टिक चारा फसलों की कृषि के लिए-ऊन के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए पौष्टिक चारा फसलों की तथा पशुओं की नस्ल सुधारने की आवश्यकता थी। इसलिए अपने पशुओं को गाँव के अन्य पशुओं से अलग रखने तथा पौष्टिक चारा फसलों के उत्पादन के लिए भी संपन्न किसानों ने अपने खेतों की बाड़ाबंदी आरंभ कर दी। ⦁ अनाज की माँग में वृद्धि-18वीं सदी के अंतिम दशकों में बाड़ाबंदी आंदोलन तेजी से सारे इंग्लैण्ड में फैल गया। इसका मूल कारण दुनिया के सभी भागों में तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण अनाज की बढ़ती हुई माँग थी। किसानों ने अपनी भूमियों की बाड़ाबंदी आरंभ कर दी जिससे उनमें अधिक-से-अधिक अनाज उगाना संभव हो सके। ⦁ ऊन के मूल्यों में वृद्धि-16वीं सदी के आरंभ से ही ऊन के मूल्यों में होने वाली वृद्धि ने इंग्लैण्ड के किसानों को अधिक-से-अधिक भेड़ों को पालने के लिए प्रोत्साहित किया। ⦁ साझा भूमि पर अधिकार संपन्न किसान अपनी भूमि का विस्तार करना चाहते थे जिससे वे अधिक निजी चरागाह बना सकें। इसके लिए उन्होंने साझा भूमियों को काटकर उस पर बाड़ाबंदी आरंभ कर दी। |
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| 32017. |
यह बर्नियर से लिया गया एक उद्धरण है —ऐसे लोगों द्वारा तैयार सुंदर शिल्पकारीगरी के बहुत उदाहरण हैं जिनके पास औजारों का अभाव है, और जिनके विषय में यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने किसी निपुण कारीगर से कार्य सीखा है। कभी-कभी वे यूरोप में तैयार वस्तुओं की इतनी निपुणता से नकल करते हैं कि असली और नकली के बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। अन्य वस्तुओं में, भारतीय लोग बेहतरीन बंदूकें और ऐसे सुंदर स्वर्णाभूषण बनाते हैं कि संदेह होता है कि कोई यूरोपीय स्वर्णकार कारीगरी के इन उत्कृष्ट नमूनों से बेहतर बना सकता है। मैं अकसर इनके चित्रों की सुंदरता, मृदुलता तथा सूक्ष्मता से आकर्षित हुआ हूँ।उसके द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए। |
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Answer» प्रस्तुत उद्धरण से पता लगता है कि बर्नियर की भारतीय कारीगरों के विषय में अच्छी राय थी। उसके मतानुसार भारतीय कारीगर अच्छे औज़ारों के अभाव में भी कारीगरी के प्रशंसनीय नमूने प्रस्तुत करते थे। वे यूरोप में निर्मित वस्तुओं की इतनी कुशलतापूर्वक नकल करते थे कि असली और नकली में अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता था। बर्नियर भारतीय चित्रकारों की कुशलता से अत्यधिक प्रभावित था। वह भारतीय चित्रों की सुंदरता, मृदुलता एवं सूक्ष्मता से विशेष रूप से आकर्षित हुआ था। इस उद्धरण में बर्नियर ने बंदूक बनाने, स्वर्ण आभूषण बनाने तथा चित्रकारी जैसे शिल्पों की विशेष रूप से प्रशंसा की है। अलिखित शिल्प कार्य । बर्नियर द्वारा अलिखित शिल्पों या शिल्पकारों को इस प्रकार सूचीबद्ध किया जा सकता है-बढ़ई, लोहार, जुलाहा, कुम्हार, खरादी, प्रलाक्षा रस को रोगन लगाने वाले, कसीदकार दर्जी, जूते बनाने वाले, रेशमकारी और महीन मलमल का काम करने वाले, वास्तुविद, संगीतकार तथा सुलेखक आदि।। प्रस्तुत उद्धरण में बर्नियर ने लिखा है कि भारतीय कारीगर औजार एवं प्रशिक्षण के अभाव में भी कारीगरी के प्रशंसनीय नमूने प्रस्तुत करने में सक्षम थे। अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से पता चलता है कि कारखानों अथवा कार्यशालाओं में कारीगर विशेषज्ञों की देख-रेख में कार्य करते थे। कारखाने में भिन्न-भिन्न शिल्पों के लिए अलग-अलग कक्ष थे। शिल्पकार अपने कारखाने में प्रतिदिन सुबह आते थे और पूरा दिन अपने कार्य में व्यस्त रहते थे। |
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| 32018. |
अंग्रेजों द्वारा चीन में अफीम के व्यापार को चीन के लोगों पर प्रभाव बताइए। |
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Answer» अंग्रेजों द्वारा चीन में अफीम का व्यापार विस्तार करने से चीन के लोग अफीम के आदी हो गए। यह अफीम की लत चीन के समाज के सभी वर्गों जैसे-दुकानदार, सरकारी कर्मचारी, सैनिक, उच्च वर्ग और भिखारियों तक में फैल गयी। 1839 ई० में कैंटन के विशेष आयुक्त लिन जेशू के अनुसार चीन में 40 लाख लोग अफीम का सेवन कर रहे थे। कैंटन में रहने वाले एक अंग्रेज डॉक्टर के अनुसार उस समय चीन में लगभग 1 करोड़ 20 लाख व्यक्ति अफीम के नशे के आदी थे। |
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| 32019. |
खलिहान जलने की पहली घटना इंग्लैण्ड के किस भाग में घटित हुई? |
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Answer» खलिहान जलने की प्रथम घटना इंग्लैण्ड के उत्तर-पश्चिम भाग में घटित हुई। |
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| 32020. |
इंग्लैण्ड के किस भाग में सघन कृषि की जाती थी? |
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Answer» इंग्लैण्ड के मध्य भाग में सघन कृषि की जाती थी। |
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| 32021. |
अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड की ग्रामीण जनता खुले खेत की व्यवस्था को किस दृष्टि से देखती थी। संक्षेप में व्याख्या करें। |
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Answer» (1) एक संपन्न किसान की दृष्टि में – 16वीं शताब्दी में जब ऊन की कीमतें बढ़ीं तो संपन्न किंसानों ने साझा भूमि की सबसे अच्छी चरागाहों की निजी पशुओं के बाड़बंदी शुरू कर दी। ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि भेड़ी को अच्छा चारा मिल सके। उन्होंने गरीब लोगों को भी बाहर खदेड़ना शुरू कर दिया और उन्हें साझा भूमि पर पशु चराने से भी मना कर दिया। बाद में 18वीं सदी के मध्य में इस बाड़बंदी को कानूनी मान्यता देने के लिए ब्रिटिश संसद ने 4,000 से अधिक अधिनियम पारित किए। (2) एक मजदूर की दृष्टि में – गरीब मजदूरों के जीवित बने रहने के लिए साझा भूमि बहुत आवश्यक थी। यहाँ वे अपनी गायें, भेड़े आदि चराते थे और आग जलाने के लिए जलावन तथा खाने के लिए कंद-मूल एवं फल इकट्ठा करते थे। वे नदियों तथा तालाबों में मछलियाँ पकड़ते थे, और साझा वनों में खरगोश का शिकार करते थे। (3) एक खेतिहर स्त्री की दृष्टि में – खेतिहर महिला प्रायः खुले खेतों पर अपने परिवार के सदस्यों के साथ कार्य करती थी। साझी भूमि से वह घरेलू कार्यों के लिए ईंधन एकत्रित करती थी तथा चरागाहों में पशुओं को चराने में सहयोग करती थी। इस प्रकार खुले खेतों के अतिरिक्त साझी भूमि ही उसके आर्थिक विकास का एकमात्र साधन थी। वे अपने पशुओं को चराने, फल और जलावन एकत्र करने के लिए साझा भूमि का प्रयोग करते थे। यद्यपि खुले खेतों के गायब हो जाने से इन सभी क्रियाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। जब खुली खेत प्रणाली समाप्त होना प्रारंभ हुई, वनों से जलाने के लिए जलावन एकत्र करना या साझा भूमि पर पशु चराना अब संभव नहीं था। वे कंद-मूल एवं फल इकट्ठा नहीं कर सकते थे या मांस के लिए छोटे जानवरों का शिकार नहीं कर सकते थे। |
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| 32022. |
चीन के लोगों को अफीम का आदी कैसे बनाया गया? |
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Answer» चीन के लोग अफीम के आदी हो गए थे, इस बात से वहाँ के लोग चिंतित थे। चीन के शासकों ने औषधीय उपयोग के अतिरिक्त अफीम के उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। किन्तु 18वीं सदी के मध्य में पश्चिम के व्यापारियों ने अफीम का अवैध व्यापार करना आरंभ कर दिया। चीन के दक्षिण-पूर्वी बंदरगाहों पर अफीम जहाजों से उतारी जाती थी, और वहाँ से स्थानीय एजेंटों के माध्यम से देश के आंतरिक हिस्सों में इसे पहुँचाया जाता था। 1820 ई0 के दशक की शुरुआत में प्रतिवर्ष लगभग 10,000 क्रेट अवैध रूप से चीन में मँगवाए जाते थे। 15 वर्ष बाद प्रतिवर्ष अफीम के लगभग 35,000 क्रेट उतारे जाने लगे थे। शीघ्र ही चीन के लगभग सभी वर्ग के लोग अफीम का सेवन करने लगे। संपन्न तो संपन्न भिखारी भी चीन में अफीम के बिना नहीं रह सकते थे। सन् 1839 तक चीन में अफीम का सेवन करने वालों की संख्या बहुत बढ़ गयी थी। |
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| 32023. |
निर्धन किसानों को साझा भूमि से प्राप्त होने वाले दो लाभ बताइए। |
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Answer» ⦁ पशुओं के लिए चरागाह की प्राप्ति। ⦁ जलावन के लिए लकड़ी की प्राप्ति। |
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| 32024. |
निर्धन लोग बाड़बंद आंदोलन से किस प्रकार प्रभावित हुए? |
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Answer» बाड़बंद आंदोलन निर्धन लोगों के लिए अभिशाप सिद्ध हुआ क्योंकि- ⦁ गरीबों को जमीन से विस्थापित कर दिया गया। ⦁ अब उन्हें प्रत्येक चीज को पाने के लिए उसका मूल्य चुकाना पड़ता था। ⦁ उनके पारंपरिक अधिकार छीन लिए गए। ⦁ उन्हें काम की खोज करनी पड़ी। ⦁ गरीब अब न तो जंगल से जलावन की लकड़ी बटोर सकते थे और न ही साझा जमीन पर अपने पशुओं को चरा सकते थे। ⦁ वे न तो सेब या कंद-मूल बीन सकते थे और न ही गोश्त के लिए छोटे जानवरों का शिकार कर सकते थे। |
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| 32025. |
कैप्टन स्विंग आन्दोलन’ से आप क्या समझते हैं? |
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Answer» कैप्टन स्विंग आन्दोलन – मजदूरों के बढ़ते असन्तोष ने धीरे-धीरे आंदोलन का रूप धारण कर लिया। शुरुआत में यह आन्दोलन रात में किसानों के बाड़ों तथा खलिहानों में आग लगाने तक सीमित था। ईस्ट कैण्ड के मजदूरों ने 28 अगस्त, 1830 ई0 को एक श्रेसिंग मशीन को तोड़ डाला। इस घटना के बाद इंग्लैण्ड के पूर्वी तथा दक्षिणी भागों में श्रेसिंग मशीनों को तोड़ने की घटनाएँ बढ़ने लगीं। इस आंदोलन में लगभग 387 श्रेसिंग मशीनों को तोड़ा गया। किसानों को धमकी भरे पत्र भेजे गए जिनमें उनसे कहा जाता था कि वे अपनी मशीनों को स्वयं ही तोड़ दें अन्यथा आंदोलनकारी उन्हें नष्ट कर देंगे। इन पत्रों पर प्रायः ‘कैप्टन स्विंग’ नामक व्यक्ति के हस्ताक्षर होते थे। आंदोलनकारियों के संभावित आक्रमण से बचने के लिए अनेक लोगों ने अपनी मशीनों को स्वयं ही तोड़ दिया। आंदोलन का दमन-कैप्टन स्विंग आन्दोलन के बढ़ते प्रभाव से इंग्लैण्ड की सरकार चिंतित हो उठी। सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए सख्त कार्यवाही की। जिन लोगों पर भी सरकार को शक था उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार किए गए लोगों में से 1976 लोगों पर मुकदमा चलाया गया जिनमें से 9 लोगों को फाँसी दी गई, 505 लोगों को देश निकाला दिया गया तथा अन्य लोगों को कठोर सजाएँ दी गईं परंतु ‘कैप्टन स्विंग’ सदा सरकार के लिए एक रहस्य ही बना रहा। |
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| 32026. |
भारत में अफीम के उत्पादन में वृद्धि का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» 1767 ईo से पहले भारत से मात्र 500 पेटी अफीम निर्यात की जाती थी। अगले चार वर्ष के अंदर यह मात्रा बढ़कर 1,500 पेटी हो गयी। 1870 ई0 तक प्रतिवर्ष भारत से 50,000 पेटी अफीम निर्यात की जाने लगी। इस प्रकार जैसे-जैसे भारत से अफीम का निर्यात चीन में बढ़ता गया वैसे-वैसे, भारत में अफीम के उत्पादन में वृद्धि होती गयी। |
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| 32027. |
नवीन कृषि मशीनों से किसानों को क्या लाभ हुआ? |
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Answer» नवीन कृषि मशीनों के उपयोग से किसानों को निम्नलिखित लाभ हुए- ⦁ नवीन कृषि मशीनों के उपयोग से किसानों का काफी समय बचा। उदाहरण के लिए, 4 आदमी मिलकर एक सीजन में 3,000 से 4,000 एकड़ भूमि में फसल का उत्पादन करते थे। ⦁ इन मशीनों से जमीन के बड़े टुकड़ों पर फसल काटने, ढूँठ निकालने, घाट हटाने और भूमि को दोबारा खेती के लिए तैयार करने का काम बहुत आसान हो गया था। ⦁ मशीनों के उपयोग से गेहूं के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई जिससे बड़े किसानों को बहुत अधिक लाभ हुआ। |
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| 32028. |
कृषि मशीनों के विकास को किसानों पर प्रभाव बताइए। |
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Answer» ⦁ नवीन कृषि मशीनें कृषकों के लिए अभिशाप सिद्ध हुईं। अनेक किसानों ने इस आशा के साथ कृषि मशीनों को खरीदा कि गेहूँ के मूल्यों में तेजी बनी रहेगी। इन किसानों को बैंक सरलता पूर्वक ऋण दे देते थे। लेकिन इस ऋण को चुकाना उन किसानों के लिए कठिन होता था। बैंक ऋण समय पर न चुका पाने की स्थिति में किसान अपनी जमीनें गंवा बैठे। ऐसे में जीविकाविहीन किसानों को नए सिरे से रोजगार की तलाश करनी पड़ती थी। ⦁ इस समयावधि में निर्धन किसानों को सरलता से रोजगार नहीं मिल पाता था। बिजली से चलने वाली मशीनों के प्रचलन में आने से मजदूरों की माँग अत्यधिक घट गयी थी। ⦁ प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार में गेहूं की माँग घटने लगी, लेकिन उत्पादन ज्यादा होने से बाजार गेहूँ से पट गया। फलस्वरूप गेहूं का मूल्य गिरने लगा। गेहूं का निर्यात लगभग बंद हो गया। ज्यादातर किसानों के सम्मुख ऋणग्रस्तता का संकट उपस्थित हो गया। इस मंदी का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर पड़ा। 1930 ई. की विश्वव्यापी मंदी के लिए कृषि मंदी को महत्त्वपूर्ण कारण माना जाता है। |
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| 32029. |
विशाल मैदानों का पूरा क्षेत्र ‘रेत का कटोरा’ कैसे बन गया? |
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Answer» अमेरिका में 19वीं सदी की शुरुआत में गेहूं का उत्पादन अत्यधिक बढ़ गया था। ऐसे में किसानों ने लापरवाही से जमीन के यथासंभव हिस्से से समस्त वनस्पति को साफ कर डाली। ट्रैक्टरों की मदद से इस जमीन की मिट्टी को पलट डाला गया और मिट्टी को धूल में बदल दिया। 1930 ई0 के दशक में यह समस्त क्षेत्र विशालकाय रेत के कटोरे में रूपान्तरित हो गया था। इसके पश्चात् अमेरिका के दक्षिणी मैदानों में भयानक रेतीले तूफान आने लगे। ये तूफान 7,000 से 8,000 फुट की ऊँचाई तक के ऊपरी क्षेत्र आवृत करते हुए गतिशील होते थे। इस तरह अमेरिका का विशाल कृषि क्षेत्र के रूप में परिवर्तित होने का स्वप्न दुःस्वप्न में बदल गया। |
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| 32030. |
खुले खेतों और कॉमन्स भूमि का आवंटन किस तरह किया जाता था? |
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Answer» 18वीं सदी के अंतिम वर्षों में इंग्लैण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत खुलापन पाया जाता था। जमीन भू-स्वामियों की निजी संपत्ति नहीं होती है और इस भूमि की बाड़ाबंदी भी नहीं की गयी थी। किसान अपने गाँवों के निकटवर्ती क्षेत्रों में कृषि कार्य करते थे। प्रत्येक वर्ष के आरंभ में एक सभा बुलाई जाती थी जिसमें गाँव के प्रत्येक व्यक्ति की भूमि के टुकड़े बाँट दिए जाते थे। |
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| 32031. |
चीन में अफीम के व्यापार की शुरुआत किस देश ने की थी? |
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Answer» पुर्तगाल ने चीन में अफीम व्यापार की शुरुआत की थी। |
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| 32032. |
चीन के अफीम व्यापार का संक्षिप्त विवरण दीजिए। |
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Answer» 18वीं सदी के अंत तक इंग्लैण्ड में चीन की चाय व रेशम की माँग में अत्यधिक वृद्धि हो गयी थी। इंग्लैण्ड की ईस्ट इंडिया कंपनी चीन से इन वस्तुओं को खरीदकर इंग्लैण्ड में बेचा करती थी। इंग्लैण्ड में चाय की लोकप्रियता बढ़ने के साथसाथ इंग्लैण्ड में इसकी माँग तेजी से बढ़ी। 1785 ई0 के आसपास इंग्लैण्ड में 1.5 करोड़ पौंड चाय का आयात किया जा रहा था। 1830 ई0 तक आते-आते यह आँकड़ा 3 करोड़ पौंड को पार कर चुका था। वास्तव में, इस समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी के मुनाफे का एक बहुत बड़ा हिस्सा चाय के व्यापार से पैदा होने लगा था। ईस्ट इंडिया कंपनी की मुख्य समस्या यह थी कि उसके पास चाय के आयात के बदले चीन को निर्यात करने के लिए कुछ नहीं था। अंग्रेजों को चीनी और चाय का मूल्य सोनेचाँदी में चुकाना पड़ता था। फलस्वरूप इंग्लैण्ड के सोने-चाँदी के भंडार समा; हो रहे थे। वे चाय के बदले में चीन को कोई चीज भेज कर अपने व्यापार को बनाए रखना चाहते थे। यह वस्तु अफीम के रूप में सामने आई। चीन में सबसे पहले पुर्तगालियों ने अफीम भेजनी शुरू की थी। इसका प्रयोग मुख्यतः कुछ औषधियों में होता था। परंतु चीनी सरकार को भय था कि लोगों को धीरे-धीरे अफीम खाने की लत लग जाएगी। अतः चीनी सम्राट ने अफीम के उत्पादन तथा बिक्री पर रोक लगा दी थी। अब अंग्रेजों ने चीन में अफीम का अवैध व्यापार करने की योजना बनाई ताकि चाय पर खर्च होने वाली राशि को पूरा किया जा सके। अतः भारत में बंगाल पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के पश्चात् अंग्रेजी सरकार ने वहाँ के किसानों को अफीम उगाने के लिए विवश किया। भारत में पैदा होने वाली अफीम को अंग्रेज अवैध रूप से चीन भेजने लगे। पश्चिम के व्यापारी चीन के दक्षिण-पूर्वी बंदरगाहों पर अफीम लाते थे और वहाँ से स्थानीय एजेंटों के जरिए देश के आंतरिक हिस्सों में भेज देते थे। 1820 ई० के आस-पास अफीम के लगभग 10,000 क्रेट अवैध रूप से चीन में लाए जा रहे थे। 15 साल बाद गैरकानूनी ढंग से लाए जाने वाली इस अफीम की मात्रा 35,000 क्रेट का आँकड़ा पार कर चुकी थी। इस अवैध व्यापार के कारण शीघ्र ही चीनी जनता अफीम की लत का शिकार होने लगी। चीन विश्व में अफीम का नशा करने वालों के देश के रूप में जाना जाने लगा। कैंटन शहर के निवासी एक अंग्रेज डॉक्टर के अनुसार चीन के लगभग 1 करोड़, 20 लाख लोगों को अफीम के नशे ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था। |
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| 32033. |
विश्व के किस देश को ‘रोटी की टोकरी’ कहा जाता था? |
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Answer» संयुक्त राज्य अमेरिका को रोटी की टोकरी’ कहा जाता था। |
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| 32034. |
अंग्रेज व्यापारी चीन को चाय का मूल्य किस रूप में चुकाते थे? |
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Answer» अंग्रेज व्यापारी चाय के बदले चाँदी के सिक्के (बुलियन) का भुगतान करते थे। |
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| 32035. |
औपनिवेशिक सरकार द्वारा आरंभ की गयी पेशगी प्रणाली का निर्धन किसानों पर क्या प्रभाव पड़ा। |
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Answer» बंगाल और बिहार में निर्धन किसानों की बहुत बड़ी जनसंख्या थी जिनके पास रोटी-कपड़ा खरीदने तथा जमींदार को लगान देने के लिए पैसों की कमी थी। 1780 ई० से ऐसे किसानों को यह जानकारी प्राप्त हुई कि गाँव का मुखिया किसानों को अफीम की खेती के लिए अग्रिम धन (पेशगी) देता है। जब किसानों को ऋण देने की पेशकश की गयी तो उन्होंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया क्योंकि इससे उनकी तात्कालिक आवश्यकताओं को पूरी करने के बाद ऋण चुका पाने की आशा बलवती हो गयी। किसानों के सामने प्रस्तुत पेशगी प्रणाली के निम्नलिखित परिणाम हुए- ⦁ उसके पास इस जमीन पर कोई दूसरी फसल उगाने का विकल्प भी नहीं था और इस फसल को सरकारी एजेंट को छोड़कर कहीं और बेचने की आजादी भी नहीं थी। ⦁ उसे उसकी फसल की कम कीमत स्वीकार करनी पड़ती थी। ⦁ ऋण वास्तव में किसानों को मुखिया के बंधुआ और उसके जरिए सरकार का बंधुआ बना देते थे। ⦁ ऋण लेने के बाद किसान को निर्धारित क्षेत्र में अफीम बोनी पड़ती थी और पूरी फसल को एजेंटों के हवाले करना पड़ता था। |
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| 32036. |
कृषि में जुताई के यंत्रों ने क्या परिवर्तन किए? |
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Answer» कृषि में जुताई के यंत्रों के प्रयोग से निम्नलिखित परिवर्तन आए- ⦁ अमेरिकी किसान पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ने के क्रम में जब पश्चिमी प्रेयरी के मध्य में पहुँचे तो उनके हल बेकार हो गए जिनका उपयोग वे पूर्वी तटीय प्रदेशों में करते आ रहे थे। ⦁ प्रेयरी का प्रदेश घनी घासों से पूरी तरह ढंका हुआ था। इन घासों की जड़े अत्यन्त कठोर थीं। मिट्टी से इन घास की जड़ों को बाहर निकालने के लिए दूसरे प्रकार के हलों का विकास करना पड़ा। इनमें से कुछ हल 12 फुट तक लंबे थे। इन हलों का अग्रभाग छोटे-छोटे पहियों पर टिका हुआ था। इन हलों को खीचने के लिए अधिक शक्ति की आवश्यकता थी, अतः इन्हें 6 बैल या घोड़े खींचते थे। ⦁ 20वीं शताब्दी के आगमन के साथ ही विशाल मैदानों के किसान अपने खेतों को तैयार करने के लिए ट्रैक्टरों तथा डिस्क हलों का प्रयोग करने लगे। इसके पश्चात् कृषि का पूरी तरह यंत्रीकरण हो गया। |
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| 32037. |
इंग्लैण्ड में कृषि क्षेत्र में घटित प्रमुख परिवर्तनों का विवेचन कीजिए। |
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Answer» इंग्लैण्ड में कृषि क्षेत्र में घटित प्रमुख परिवर्तन इस प्रकार हैं- (1) कृषि क्षेत्र में नवीन तकनीक का प्रयोग – निजी भूमियों की बाड़ाबंदी ने उनके विस्तार की भावना को भी प्रोत्साहित किया। किसान अपनी भूमियों को अधिक-से-अधिक बढ़ाना चाहते थे। इसका अन्य क्रारण यह भी था कि इस काल में जनसंख्या में वृद्धि के कारण गेहूँ की माँग भी तेजी से बढ़ रही थी। खेतों के आकार में वृद्धि के कारण मजदूरों की आवश्यकता भी बढ़ी। मजदूरों की कमी को दूर करने के लिए उन्होंने नई-नई मशीनों का कृषि में उपयोग करना आरंभ कर दिया। इन मशीनों में ट्रैक्टरों तथा श्रेसिंग मशीनों की उल्लेखनीय भूमिका थी। पहले गेहूं की खेती को काटने तथा उससे गेहूँ निकालने में बड़ी संख्या में मजदूरों की आवश्यकता होती थी परंतु श्रेसिंग मशीनों के उपयोग ने मजदूरों की कमी की इस समस्या को दूर कर दिया। इन मशीनों के उपयोग से जहाँ किसान ज्यादा-से-ज्यादा भूमि पर खेती करने में सफल हुए वहीं मजदूरों के रोजगार में कमी हुई। गरीब और मजदूर लोग काम की तलाश में गाँव-गाँव भटकने लगे। अनेक ीग रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने लगे जबकि कुछ लोगों ने मशीनों के उपयोग के विरुद्ध आवाज उठानी आरंभ कर दी। (2) सरल उर्वरक तकनीकों का प्रयोग – इंग्लैण्ड में खेतों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए 19वीं सदी के मध्य तक शलजम तथा तिपतिया घास की कृषि की जाती थी। कृषि कार्य हेतु खेतों को निरंतर उपयोग में लाने से उनकी उत्पादन क्षमता बढ़ती थी, इसीलिए भूमि नाइट्रोजन और उर्वरता बढ़ाने के लिए शलजम व तिपतिया घास का उपयोग किया गया। पशु भी इन्हें रुचिपूर्वक खाते थे। इस तरह किसानों को दोहरा लाभ होता था। एक ओर भूमि की उर्वरता बढ़ती साथ ही पशुओं को भी पोषण ५ मिलता था। बाड़ाबंदी आन्दोलन के उपरान्त किसान अपनी निजी भूमियों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए आसान तरीकों का इस्तेमाल करने लगे। (3) कृषि का प्रारंभिक स्वरूप – 18वीं सदी के मध्य तक इंग्लैण्ड में कृषि का मूल स्वरूप पूर्ववत् बना रहा। भूमि पर भूस्वामियों का निजी स्वामित्व नहीं था और न ही खेतों की बाड़ाबंदी की गयी थी। किसान अपने गाँव के आसपास की जमीन पर फसल उगाते थे। साल की शुरुआत में एक सभा बुलाई जाती थी जिसमें गाँव के हर व्यक्ति को जमीन के टुकड़े आबंटित कर दिए जाते थे। जमीन के ये टुकड़े समान रूप से उपजाऊ नहीं होते थे और कई जगह बिखरे होते थे। कोशिश यह होती थी कि हर किसान को अच्छी और खराब, दोनों तरह की जमीन मिले। खेती की इस जमीन के परे साझा जमीन होती थी। इस साझा जमीन पर सभी गाँव वालों का हक होता था। यहाँ वे अपने पशु चराते थे, जलावन की लकड़ियाँ और कंदमूल फल आदि । इकट्ठा करते थे। यह साझा भूमि गरीब व्यक्तियों की अनेक प्रकार से सहायता करती थी। किसी प्राकृतिक संकट के कारण फसल न होने की स्थिति में भी यह भूमि उन्हें तथा उनके पशुओं को जीवित रखने में सहायक होती थी। (4) बाड़ाबंदी – इंग्लैण्ड के कुछ भागों में साझी भूमि की इस परंपरा में 16वीं सदी के उत्तरार्द्ध में परिवर्तन आरंभ हो । गए। इसे काल में विश्व बाजार में ऊन की माँग में वृद्धि आरंभ हुई जिससे उसकी कीमतें बहुत तेजी से बढ़ीं। ऊन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए भेड़ों की गुणवत्ता में सुधार, उचित सफाई व्यवस्था तथा अच्छे चारे की आवश्यकता पर बल दिया जाने लगा। इन्हीं मूलभूत कारणों ने किसानों को निजी खेतों एवं चरागाहों की स्थापना के लिए प्रेरित किया। किसानों ने साझी भूमि की संकल्पना को त्यागकर साझा भूमि को काट-छाँट कर घेरना आरंभ कर दिया और इस निजी भूमि को चारों ओर से बाड़ लगाकर सुरक्षित करने लगे। इस व्यवस्था को ‘बाड़ाबंदी’ के नाम से जाना जाता है। 1750 ई० के बाद खेतों के चारों ओर बाड़ लगाने की यह परंपरा बहुत तेजी से इंग्लैण्ड के ग्रामीण क्षेत्रों में फैलने लगी जिसके कारण इसे ‘बाड़ाबंदी आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है। 1750 ई0 से 1850 ई० के मध्य लगभग 60 लाख एकड़ भूमि पर बाड़े लगाई गईं। |
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| 32038. |
त्रिकोण व्यापार का अर्थ और विकास स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» 18वीं सदी में भारत, चीन और ब्रिटेन के बीच व्यापार को त्रिकोणीय व्यापार की संख्या दी गयी है। अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी चीन से चाय और रेशम खरीद कर उसे इंग्लैण्ड में बेचती थी। जैसे-जैसे चाय लोकप्रिय पदार्थ बन गयी, चाय का व्यापार और महत्त्वपूर्ण बन गया। इस समय तक इंग्लैण्ड कोई भी ऐसी वस्तु नहीं बनाता था जिसे चीन में बेचा जा सके। ऐसी स्थिति में पश्चिमी व्यापारी चाय का व्यापार करने के लिए पैसे का प्रबन्ध नहीं कर सकते थे। वे चाय की खरीद केवल चाँदी के सिक्के (बुलियन) देकर ही कर सकते थे। इसका आशय था कि इंग्लैण्ड का खजाना एक दिन रिक्त हो जाएगा। अंततः अंग्रेजों ने यह निश्चित किया कि अफीम भारत में उगायी जाए और इसे चीन में बेचकर लाभार्जन किया जाए। |
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| 32039. |
बंगाल और बिहार के किसानों के लिए औपनिवेशिक सरकार द्वारा आरंभ, की गयी पेशगी प्रणाली क्या थी? |
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Answer» बंगाल व बिहार को औपनिवेशिक सरकार द्वारा अफीम की खेती करने के लिए अग्रिम धन की अदायगी की जाती थी, जिसे पेशगी कहते थे। इस पेशगी की एवज में उन्हें अफीम की खेती करने को विवश किया जाता था। इस तरह इस क्षेत्र के किसान फसल एजेंटों के अधीन हो गए। |
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| 32040. |
भारत के अफीम व्यापार का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। |
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Answer» भारत अंग्रेजों द्वारा चीन ले जाकर बेची जाने वाली अफीम का प्रमुख स्रोत था। बंगाल विजय के बाद अंग्रेजों ने अपने कब्जे वाली भूमि पर अफीम की खेती शुरू की। जैसे-जैसे चीन में अफीम की माँग बढ़ती गयी वैसे-वैसे बंगाल के बंदरगाहों से अफीम का निर्यात बढ़ता गया। 1767 ई० से पहले भारत से केवल 500 पेटी (लगभग 2 मन) अफीम का निर्यात होता था, लेकिन 1870 ई0 तक यह निर्यात बढ़कर प्रतिवर्ष 50,000 पेटी हो गया। |
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| 32041. |
बंगाल के अफीम व्यापार को नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने क्या किया? |
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Answer» ब्रिटिश सरकार ने 1773 ई0 तक बंगाल में अफीम के व्यापार पर अधिकार कर लिया। ब्रिटिश सरकार के अलावा किसी को अफीम का व्यापार करने की अनुमति नहीं थी। ब्रिटिश सरकार अफीम को सस्ती दरों पर उत्पादित करके इसे कलकत्ता (कोलकाता) स्थित अफीम एजेंटों को ऊँचे दामों पर बेचना चाहती थी जो समुद्री जहाज के माध्यम से इसे चीन भेज सकें। अफीम पैदा करने वाले किसानों को दिया जाने वाला मूल्य इतना कम होता था कि अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत में किसान बेहतर कीमत की माँग करने लगे थे और पेशगी लेने से मना करने लगे थे। बनारस के आस-पास के क्षेत्रों में अफीम पैदा करने वाले किसानों ने अफीम की खेती बंद करने का फैसला किया। इसकी अपेक्षा वे अब गन्ने और आलू की खेती करने लगे थे। बहुत से किसानों ने अपनी फसलों को घुमंतू व्यापारियों (पैकारों) को बेच डाला था जो किसानों को बेहतर दाम देते थे। इस स्थिति पर नियंत्रण करने के लिए सरकार ने रियासतों में तैनात अपने एजेंटों को इन व्यापारियों की अफीम जब्त करने और फसलों को नष्ट करने के आदेश दिए। जब तक अफीम का उत्पादन जारी रहा तब तक ब्रिटिश सरकार, किसानों और स्थानीय व्यापारियों के मध्य यह टकराव चलता रहा। |
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| 32042. |
त्रिकोणीय व्यापार में शामिल देश कौन-से थे? |
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Answer» भारत, चीन और इंग्लैण्ड त्रिकोणीय व्यापार में शामिल देश थे। |
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| 32043. |
फसल कटाई के यंत्रों में हुए क्रान्तिकारी परिवर्तनों का उल्लेख कीजिए। |
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Answer» फसल कटाई के यंत्रों में निम्नलिखित क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए- ⦁ अमेरिका में 1830 ई0 के दशक से पूर्व फसल की कटाई के लिए हंसिए का प्रयोग किया जाता था। ⦁ खेतों के बड़े आकार के कारण हंसिए की सहायता से फसलों को काटने के लिए बड़ी संख्या में मजदूरों की आवश्यकता होती थी। इस कार्य में अत्यधिक पूँजी एवं श्रम की आवश्यकता होती थी। इसलिए किसानों को फसल की कटाई के लिए मशीनों की आवश्यकता हुई। ⦁ साइरस मैक्कॉर्मिक नामक व्यक्ति ने 1831 ई0 में एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया जो एक साथ 16 मजदूरों के बराबर कटाई कर सकती थी। ⦁ 20वीं शताब्दी के आरंभ में ज्यादातर किसान गेहूँ की कटाई के लिए कंबाइंड हार्वेस्टरों का प्रयोग करने लगे। इस मशीन से 15 दिन में 500 एकड़ भूमि पर गेहूं की कटाई की जा सकती थी। |
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| 32044. |
1830 ई. से पहले फसल की कटाई के लिए किस औजार का प्रयोग होता था? |
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Answer» 1830 ई. से पहले फसल काटने के लिए हंसिए का प्रयोग होता था। |
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| 32045. |
जी०एल०एफ० अभियान में कौन-कौन-सी प्रमुख समस्याएँ आई? |
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Answer» जी०एल०एफ० अभियान में दो प्रमुख समस्याएँ सामने आईं- |
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| 32046. |
अंग्रेज सरकार के सरकारी आय का प्रमुख स्रोत क्या था? |
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Answer» भू-राजस्व अंग्रेज सरकार के सरकारी आय को प्रमुख स्रोत था। |
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| 32047. |
क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफी संतों से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया? |
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Answer» चोल शासकों ने नयनार संतों के साथ संबंध बनाने पर बल दिया और उनका समर्थन हासिल करने का प्रयत्न किया। अपने राजस्व के पद को दैवीय स्वरूप प्रदान करने और अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए चोल शासकों ने सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया और उनमें पत्थर और धातु से बनी मूर्तियाँ स्थापित करवाईं। इस प्रकार, लोकप्रिय संत-कवियों की परिकल्पना को, जो जन-भाषाओं में गीत रचते व गाते थे, मूर्त रूप प्रदान किया गया। चोल शासकों ने तमिल भाषा के शैव भजनों का गायन मंदिरों में प्रचलित किया परान्तक प्रथम ने संत कवि अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं। इन मूर्तियों को मात्र उत्सव के दौरान निकाला जाता था। सूफी संत सामान्यतः सत्ता से दूर रहने की कोशिश करते थे, किन्तु यदि कोई शासक बिना माँगे अनुदान या भेट देता था तो वे उसे स्वीकार करते थे। कई सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को करमुक्त भूमि इनाम में दे दी और दान संबंधी न्यास स्थापित किए। सूफी संत अनुदान में मिले धन और सामान का इस्तेमाल जरूरतमंदों के खाने, कपड़े एवं रहने की व्यवस्था तथा अनुष्ठानों के लिए करते थे। शासक वर्ग इन संतों की लोकप्रियता, धर्मनिष्ठा और विद्वत्ता के कारण उनका समर्थन हासिल करना चाहते थे। जब तुर्की ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उलेमा द्वारा शरिया लागू किए जाने की माँग को ठुकरा दिया गया था। सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा गैर-इस्माली है। ऐसे समय में सुल्तानों ने सूफ़ी संतों का सहारा लिया जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता को अल्लाह से उद्भुत मानते थे। यह भी माना जाता था कि सूफ़ी संत मध्यस्थ के रूप में ईश्वर से लोगों की ऐहिक और आध्यात्मिक दशा में सुधार लाने का कार्य करते हैं। शायद यही कारण है कि शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे। |
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भारत के मुख्य आयात और निर्यात कौन-से हैं? |
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Answer» भारत की मुख्य आयातक वस्तुएँ हैं-उर्वरक, खाद्य तेल, अखबारी कागज, पेट्रोलियम उत्पाद, मशीनरी, परियोजना का सामान, औषधि और फार्मास्युटिकल उत्पाद, कार्बनिक और अकार्बनिक रसायन, कोयला, कुकिंग कोल व कृत्रिम रेजिन आदि। भारत की मुख्य निर्यातक वस्तुएँ हैं—समुद्री उत्पाद, अयस्क और खनिज, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, जवाहराते और आभूषण, रसायन और सह-उत्पाद, इन्जीनियरिंग का सामना, कपड़ा और दस्तकारी का सामान, चीनी, दुग्ध उत्पाद व इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि। |
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बे-शरिया और बा-शरिया सूफी परम्परा के बीच एकरूपता और अंतर, दोनों स्पष्ट कीजिए। |
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Answer» सूफ़ीवाद कई पन्थों अथवा सिलसिलों में संगठित था। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है-जंज़ीर, जो शेख और मुरीद के मध्य एक निरन्तर संबंध की परिचायक है। सूफी सिलसिला को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैबा-शरीआ (बा-शरा) और बे-शरिया (बे-शरा)। बा-शरीआ का अभिप्राय था-इस्लामी कानून अर्थात् शरीआ का पालन करने वाले सिलसिले। बे-शरीआ का तात्पर्य था—ऐसे सिलसिले जो शरीआ में बँधे हुए नहीं थे। शरीआ की अवहेलना करने के कारण उन्हें बे-शरीआ के नाम से जाना जाता था। उल्लेखनीय है कि मुस्लिम समुदाय को निदेर्शित करने वाले कानून को शरीआ कहा जाता है। शरीआ कुरान शरीफ़ तथा हदीस पर आधारित है। हदीस का अर्थ है-पैगम्बर साहब से जुड़ी परम्पराएँ। पैगम्बर साहब के स्मृत शब्द और क्रियाकलाप भी इनके अंतर्गत आते हैं। अरब क्षेत्र के बाहर (जहाँ के आचार-विचार भिन्न थे) इस्लाम का प्रसार होने पर क्रियास अर्थात् सदृशता के आधार पर तर्क तथा इजमा अर्थात् समुदाय की सहमति को भी कानून का स्रोत माना जाने लगा। बे-शरीआ और बा-शरीआ सिलसिलों में कुछ एकरूपताएँ और कुछ अंतर विद्यमान थे। एकरूपताएँ ⦁ दोनों सिलसिले एकेश्वर में विश्वास करते थे। उनके अनुसार अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च, सर्वशक्तिशली और सर्वव्यापक है। अंतर ⦁ बा-शरीआ सिलसिले शरीआ का पालन करते थे, किन्तु बे-शरीआ शरीआ में बँधे हुए नहीं थे। |
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सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए। |
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Answer» इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में धार्मिक तथा राजनीतिक संस्था के रूप में खिलाफत की बढ़ती शक्ति के विरुद्ध कुछ आध्यात्मिक लोगों का रहस्यवाद तथा वैराग्य की तरफ झुकाव बढ़ा। इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा। इन लोगों ने रूढ़िवादी परिभाषाओं तथा धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की। उन्होंने मुक्ति की प्राप्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया। उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद को इंसान-ए-कामिल बताते हुए उनका अनुसरण करने की सीख दी। सूफ़ियों ने कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की। ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था जिसका सूफ़ी और कुरान से जुड़ा अपना साहित्य था। संस्थागत दृष्टि से सूफ़ी अपने को एक संगठित समुदाय-ख़ानक़ाह (फारसी) के इर्द-गिर्द स्थापित करते थे। ख़ानक़ाह का नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में था। वे अनुयायियों (मुरीदों) की भर्ती करते थे और अपने वारिस (खलीफा) की नियुक्ति करते थे। आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करने के अलावा ख़ानक़ाह में रहने वालों के बीच के संबंध और शेख व जनसामान्य के बीच के रिश्तों की सीमा भी नियत करते थे। बारहवीं शताब्दी के आसपास इस्लामी दुनिया में सूफ़ी सिलसिलों का गठन होने लगा। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है-जंजीर, जो शेख और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते का द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगंबर मोहम्मद से जुड़ी है। इस कड़ी के द्वारा आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों तक पहुँचता था। दीक्षा के विशिष्ट अनुष्ठान विकसित किए गए जिसमें दीक्षित को निष्ठा का वचन देना होता था, और सिर मुँड़ाकर थेगड़ी लगे वस्त्र धारण करने पड़ते थे। पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह (फ़ारसी में इसका अर्थ दरबार) उसके मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। इस तरह पीर की दरगाह पर जियारत के लिए जाने की, खासतौर से उनकी बरसी के अवसर पर, परिपाटी चल निकली। इस परिपाटी को उर्स (विवाह, मायने, पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन) कहा जाता था, क्योंकि लोगों का मानना था कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत हो जाते हैं और इस तरह पहले के बजाय उनके अधिक करीब हो जाते हैं। लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं की पूर्ति के लिए उनका आशीर्वाद लेने जाते थे। इस तरह शेख का वली के रूप में आदर करने की परिपाटी शुरू हुई। कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नवीन आंदोलनों की नींव रखी। ख़ानक़ाह का तिरस्कार करके यह रहस्यवादी, फकीर की जिदंगी बिताते थे। निर्धनता और ब्रह्मचर्य को उन्होंने गौरव प्रदान किया। इन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता था-कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी इत्यादि। शरिया की अवहेलना करने के कारण उन्हें बे-शरिया कहा जाता था। इस तरह उन्हें शरिया का पालन करने वाले (बा-शरिया) सूफियों से अलग करके देखा जाता था। |
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